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मातृशक्ति BJP का मास्टरस्ट्रोक: महिला आरक्षण से लोकसभा सीटें बढ़कर 816 होंगी, 273 महिला सांसद बनेंगी


क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को विकसित हिन्दू राष्ट्र बनाने की ओर अग्रसर है? नारी शक्ति को जितना सम्मान सनातन धर्म में दिया गया है किसी अन्य धर्म में नहीं। पौराणिक कथाओं का अवलोकन करने पर एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि जीवन में जब पुरुष  किसी असुर शक्ति से मानव को राहत देने में असमर्थ होने पर महिला शक्ति जिसे आज देवी माता के रूप में पूजा जाता है, का सहारा लिया। देवी माता को अस्त्र-शस्त्र प्रदान करने वाले सभी देवता हैं। यही कारण है कि वर्ष में 2 बार नवरात्रे मनाने की प्रथा चली आ रही है।    

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी और सरकार ने मातृशक्ति और युवाशक्ति पर खास फोकस किया है। देश की राजनीति में मातृशक्ति भागीदारी बढ़ाने को लेकर सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है। केंद्र सरकार अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम को 2034 के बजाय 2029 से लागू करने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में करीब 50% तक बढ़ोतरी की जा सकती है, ताकि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रभावी तरीके से दिया जा सके। इस योजना का मकसद यह है कि महिला आरक्षण लागू करने के साथ-साथ किसी राज्य की मौजूदा सीटों में कटौती न हो और सभी को संतुलित प्रतिनिधित्व मिले। साथ ही, आरक्षित सीटों के भीतर एससी और एसटी वर्ग के लिए भी अलग से आरक्षण जारी रहेगा। 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए संसद के मौजूदा सत्र या अगले सत्र में दो बिल लाए जा सकते हैं। इसके जरिए महिला आरक्षण लागू करने की मौजूदा शर्त में बदलाव किया जाएगा। इससे लोकसभा में सदस्यों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो सकती है। इनमें महिला सांसदों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 273 हो जाएगी।

गृहमंत्री अमित शाह की सभी राजनीतिक दलों में सहमति की कवायद
पीएम मोदी के दिशा निर्देशन में गृह मंत्री अमित शाह ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठकें भी की हैं। इस दौरान सीट बढ़ाने के “स्ट्रेट जैकेट फॉर्मूला” पर चर्चा हुई, जिसमें मौजूदा सीटों को बढ़ाकर नए ढांचे में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें तय की जाएंगी। इससे लोकसभा की कुल सीटें बढ़कर करीब 800 से ज्यादा हो सकती हैं। इस बीच दक्षिण भारत के कुछ राज्यों ने जनसंख्या के आधार पर परिसीमन पर ऐतराज किया है। इसलिए सरकार अब ऐसा फॉर्मूला लाने की कोशिश कर रही है, जिससे सभी राज्यों के हितों का संतुलन बना रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने इस पर सहमति बनाने के लिए एनडीए और गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बैठक की। सहमति बनने पर बिल लोकसभा में पेश किए जा सकते हैं।

महिला सांसदों ने सरकार के कदम को स्वागत योग्य बताया
महिला सांसदों ने बजट सत्र या अगले सत्र के दौरान महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए विधेयक लाने की केंद्र सरकार की योजना का स्वागत किया और कहा कि इस कदम से शासन में महिलाओं की भागीदारी और मजबूत होगी। जेडीयू सांसद लवली आनंद ने इसे “स्वागत योग्य कदम” बताया और कहा कि राजनीति में महिलाओं की अधिक भागीदारी देश की प्रगति को गति देगी। भाजपा सांसद कमलजीत सहरावत ने कहा कि महिला आरक्षण कानून के पारित होने से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश की “आधी आबादी” से किया गया एक लंबे समय से चला आ रहा वादा पूरा हुआ है। सहरावत ने कहा कि इस देश में कई लोगों ने महिलाओं के बारे में बात की है, लेकिन नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लाने का प्रयास और उसमें मिली सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है। आरक्षण विधेयक लाना प्रधानमंत्री द्वारा देश की आधी आबादी से किया गया वादा है, और वह आधी आबादी उन पर भरोसा करती है।

2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन करने की रणनीति
दरअसल, 2023 में महिला आरक्षण कानून संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था। इसके तहत महिला आरक्षण नई जनगणना के बाद लागू होना है। अब सरकार का प्रस्ताव है कि नई जनगणना का इंतजार करने की बजाय 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन किया जाए। इससे प्रोसेस तय समय पर पूरी हो सकेगी और आरक्षण लागू किया जा सकेगा। इसके लिए दो बिल लाए जा सकते हैं। एक बिल के जरिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन होगा, जबकि दूसरा परिसीमन कानून में बदलाव से जुड़ा होगा। इसे पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा। इसी वजह से सरकार विपक्ष का समर्थन जुटाने में लगी है।

महिला आरक्षण के लिए पूरे देश में एकरूपता लाने की कवायद
महिला आरक्षण प्रस्ताव के मुताबिक 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। आरक्षण का ढांचा ऐसा होगा, जिसमें एससी और एसटी वर्ग की महिलाओं को उनके कोटे के भीतर हिस्सा मिलेगा। ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान फिलहाल शामिल नहीं है। इसी फॉर्मूले पर राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ाने और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की योजना है, ताकि पूरे देश में एक जैसा ढांचा रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों इसके लिए कई नेताओं से बैठकें की हैं। इनमें वाईएसआर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एनसीपी (एसपी), आरजेडी और एआईएमआईएम के नेता शामिल रहे। बीजेडी और शिवसेना (यूबीटी) से भी बातचीत हुई है, जबकि कांग्रेस से चर्चा बाकी है।

महिला आरक्षण बिल दोनों सदनों से पास, पर अभी लागू नहीं
महिला आरक्षण कानून 2023 में संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसकी मंजूरी दे चुकी हैं। लोकसभा और राज्यसभा में यह बिल सर्वसम्मति से पास हुआ था। हालांकि, यह कानून अभी लागू नहीं हुआ है। इसकी लागू होने की तारीख केंद्र सरकार अधिसूचना के जरिए तय करेगी और जरूरत पड़ने पर संसद इसमें संशोधन कर सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 लोकसभा सीटें बढ़ेंगी। 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित हो जाएंगी। यहां लोकसभा की सीटें 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी। बिहार में महिला सीटों की संख्या 20 हो सकती है। यहां कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती है। एमपी में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु में 20 और दिल्ली में 4 यानी महिला सीटें होंगी। झारखंड में 7 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है।

1931 में पहली बार महिला आरक्षण का मुद्दा उठा था
• 1931: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। तब प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने महिलाओं को पुरुषों पर तरजीह देने के बजाय समान राजनीतिक स्थिति की मांग पर जोर दिया।
• 1971: भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति का गठन किया गया। इसके कई सदस्यों ने विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध किया।
• 1974: महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं की स्थिति पर एक समिति ने शिक्षा और समाज कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की गई थी।
• 1988: महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perpective Plan) ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी।
• 1993: 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम-2023
1998: 13 जुलाई को अटल की एनडीए सरकार ने लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश की, लेकिन RJD सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने बिल की कॉपी फाड़ दी।
1998: 14 जुलाई को सरकार ने लोकसभा में दोबारा पेश करने की कोशिश की, लेकिन हंगामे और विरोध की वजह से पेश नहीं हो सका।
1998: 11 दिसंबर को लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश हुई, लेकिन सपा सांसद दरोगा प्रसाद स्पीकर पोडियम तक पहुंच गए।
1998: 23 दिसंबर को अटल सरकार बिल पेश करने में कामयाब रही। हालांकि JDU ने विरोध कर दिया और पारित नहीं हो सका।
2000: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2002: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2003: जुलाई में बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी ने सर्वदलीय बैठक में आम सहमति बनाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।
2008: मनमोहन सरकार ने 6 मई को राज्यसभा में विधेयक पेश किया। खूब हंगामा हुआ। स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया।
2010: 9 मार्च को राज्यसभा में विधेयक पेश किया गया और दो तिहाई बहुमत से पारित हो गया। लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो पाया। बिल लैप्स हो गया।
2023: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में विधेयक संसद में पेश किया। कुशल प्रबंधन के चलते यह लोकसभा और राज्यसभा दोनों में ही पारित हो गया। 106वा संविधान संशोधन और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह कानून बना।

ओम बिरला को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा विपक्ष: लोकसभा स्पीकर को हटाने का नियम और कब-कब लाया गया प्रस्ताव

आखिर राहुल गाँधी के गुलाम बन INDI गठबंधन देश को कहां ले जाना चाहता है? वैसे लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला जो अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने जा रहे हैं उसके जिम्मेदार वे स्वयं हैं। लोक सभा में हंगामा कर रोज के करोड़ों रूपए बर्बाद करने वालों को सदन से बाहर नहीं करना। आखिर मार्शल किस लिए हैं? लोक सभा अध्यक्ष की अपेक्षा विधान सभा के अध्यक्ष हंगामा करने वालों के विरुद्ध मार्शल को बुलाकर उन सदस्यों को सदन से बाहर करते हैं। बिरला को हंगामा करने वाले सदस्यों को बाहर निकलवाकर सदन की कार्यवाही को चालू रखना चाहिए। जब तक ईंट का जवाब पत्थर नहीं दिया जाएगा उपद्रवी बाज़ नहीं आने वाले।   
लोकसभा में विपक्ष लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी को संसद में बोलने नहीं देने का आरोप विपक्ष लगा रहा है। राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान राहुल गाँधी पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे के अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए सरकार पर आरोप लगा रहे थे। उस वक्त स्पीकर ओम बिरला ने नियमों का हवाला देते हुए राहुल गाँधी को रोका। इस मुद्दे पर कई दिनों तक विपक्ष ने सदन को नहीं चलने दिया।

कांग्रेस इस बात से भी नाराज है कि जब महिला सांसदों ने पीएम की सीट को सदन में घेरा, तो स्पीकर ओम बिरला ने कहा था कि कोई अप्रत्याशित घटना घट सकती थी, इसलिए प्रधानमंत्री को सदन आने से उन्होंने रोका। लेकिन ऐसी घटनाएँ सदन में पहली बार हुई कि महिला सांसद राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान लोकसभा को संबोधित नहीं कर पाए। इसकी वजह महिला सांसदों का इस तरह से पीएम की सीट को घेरना था। चर्चा यह है कि नरेंद्र मोदी पर हमले की सूचना ओम बिरला को कांग्रेस में इस घिनौनी हरकत के विरोधी सदस्यों ने दी थी।  

विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी सांसद निशिकांत दूबे ने पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी और दूसरे प्रधानमंत्रियों पर आरोप लगाया। संसद में हंगामे के दौरान 8 विपक्षी सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित कर दिया गया। सासंदों के निलंबन और महिला सांसदों द्वारा पीएम की सीट घेरने को लेकर कांग्रेस पर आरोप लगे थे। इस पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी बोलना चाहते हैं, लेकिन बोलने की अनुमति नहीं मिली।

स्पीकर के खिलाफ ‘हटाने का प्रस्ताव’ लाया जाता है

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया सरकार के खिलाफ जो अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, उससे थोड़ा अलग होता है। इसमें लोकसभा स्पीकर को ‘हटाने का प्रस्ताव’ यानी मोशन ऑफ रिमूवल ऑफ स्पीकर लाया जाता है। यह संविधान की अनुच्छेद 94 सी के तहत लाया जाता है। इस अनुच्छेद में लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है।

लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव पेश करने के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना होता है। ये नोटिस लिखित होना चाहिए। इस प्रस्ताव पर कम से कम 50 सांसदों का हस्ताक्षर होना जरूरी है यानी कोई भी सांसद लोकसभा में खड़े होकर अपने दम पर स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव नहीं ला सकता। स्पीकर पर स्पष्ट और ठोस आरोप लगे हों। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद इस पर सदन में चर्चा होती है और फिर सांसद वोटिंग करते हैं। इस दौरान स्पीकर सदन की अध्यक्षता नहीं करते हैं, बल्कि डिप्टी स्पीकर या सदन का वरिष्ठ सदस्य सदन की अध्यक्षता करते हैं।

हटाने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत

लोकसभा में प्रस्ताव सदन में उपस्थित सांसदों द्वारा बहुमत से पास होना जरूरी है, कोई दो-तिहाई बहुमत की जरूरत नहीं होती। स्पीकर को हटाने के लिए सिर्फ बहुमत की जरूरत होती है। जितने सांसद वोट दे रहे हों, उनका 50 फीसदी से एक ज्यादा जरूरी है।

अगर प्रस्ताव पास हो जाता है तो तुरंत ही स्पीकर पद से हट जाता है। वह सांसद बना रहता है, लेकिन स्पीकर नहीं और फिर सदन को दूसरा स्पीकर चुनना होता है।

स्पीकर को हटाने के लिए आज तक कभी वोटिंग नहीं हुई

सदन में स्पीकर को हटाने के लिए कई बार नोटिस दिया गया है। सदन में प्रस्ताव पर बहस भी हुई है, लेकिन वोटिंग नहीं हुई है।

पहली बार 1954 में तत्कालीन स्पीकर जीवी मावलंकर के खिलाफ विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया था। इस पर सदन में बहस हुई। विपक्ष ने उनपर कांग्रेस का पक्ष लेने का आरोप लगाया था। सदन ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया और वोटिंग हुई नहीं।

दूसरी बार लोकसभा स्पीकर डॉक्टर नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ 1967 में हटाने का प्रस्ताव पेश किया। इन पर कांग्रेस का पक्ष लेने का विपक्ष ने आरोप लगाया। विपक्ष का कहना था कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा है। इस वक्त भी मतदान नहीं हुआ।

तीसरी बार 8वीं लोकसभा स्पीकर बलराम जाखड के खिलाफ विपक्ष ने 1987 में अविश्वास प्रस्ताव रखा। उस वक्त बोफोर्स को लेकर कांग्रेस सरकार पर विपक्ष हमलावर था। विपक्ष का आरोप था कि जाखड नियमों का हवाला देकर विपक्ष को बोलने से रोकते हैं और सरकार को बचाते हैं। इस प्रस्ताव पर भी वोटिंग की नौबत नहीं आई।

13वीं लोकसभा स्पीकर जीएमसी बालयोगी को हटाने के लिए विपक्ष ने नोटिस दिया। उस वक्त एनडीए की सरकार थी। 2001 में नोटिस दिया गया, लेकिन प्रस्ताव खारिज हो गई। उन पर आरोप था कि सरकार के पक्ष में स्थगन प्रस्ताव को वह खारिज कर देते हैं।

2011 में 15वीं लोकसभा की स्पीकर मीरा कुमार पर विपक्ष ने आरोप लगाया कि उन्हें 2जी, सीडब्लूजी घोटालों को लेकर बहस में बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा। स्पीकर सरकार का बचाव कर रही हैं। इस नोटिस को भी खारिज कर दिया गया और वोटिंग तक बात नहीं पहुँची।

17वीं लोकसभा में 2020 में वर्तमान स्पीकर ओम बिरला ने कृषि कानूनों को लेकर विपक्ष के जबरदस्त हंगामे पर विपक्षी सांसदों को निलंबित किया था। इसके विरोध में विपक्ष ने स्पीकर को हटाने का नोटिस देने की बात सार्वजनिक रूप से कीकांग्रेस लेकिन पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने पर प्रस्ताव सदन में लाया ही नहीं जा सका।

LoP राहुल गाँधी का संसद में ‘चीनी प्रोपेगेंडा’ फैलाने का propaganda फेल, पूर्व सेना प्रमुख के नाम पर फैलाया ‘झूठ’: चीन की बीन पर नाचती रही है कांग्रेस

                                           राहुल गाँधी और राजनाथ सिंह (साभार-x@ani)
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर देश को गुमराह करने की कोशिश की है। सदन में चीन का प्रोपेगेंडा परोसते हुए उन्होंने कहा कि चीनी सेना भारतीय सीमा में घुस रही है। चीनी टैंक भारतीय क्षेत्र में घुस आते हैं। इस दौरान उन्होंने पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज नरवणे के अप्रकाशित किताब का हवाला दिया।

इस पर रक्षा मंत्री ने राहुल गाँधी को चुनौती दी और कहा कि इस निराधार आरोप का कोई सबूत नहीं है और खुद पूर्व आर्मी चीफ नरवणे ने अपनी किताब में लिखा है कि चीनी टैंक भारतीय पोजिशन से कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे। भारत ने एक इंच जमीन भी नहीं दी। रक्षा मंत्री के अलावा गृहमंत्री अमित शाह समेत पूरे सत्ता पक्ष ने मिलकर कड़ी आपत्ति जताई और सदन के माध्यम से देश में गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया।

राहुल गाँधी को स्पीकर ओम बिरला ने गैर सूचीबद्ध मुद्दे को उठाने पर सख्त चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी सदन के नियमों के तहत बोलने की इजाजत दी थी, लेकिन उन्होंने तथ्यों और संसदीय नियमों का उल्लंघन किया।

चीन को लेकर राहुल गाँधी ने सदन को किया गुमराह

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने एलएसी पर चीनी अतिक्रमण की बात कही और केन्द्र से सवाल पूछे। उनका कहना है कि एलएसी की स्थिति काफी गंभीर है और चीनी सेना घुस गई है। इन आरोपों का आधार पूर्व आर्मी चीफ नरवणे का अप्रकाशित किताब बताया गया।

इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने राहुल गाँधी के आरोपों को निराधार बताया और कहा कि माननीय सांसद ये साफ करें कि किस आधार पर ये आरोप लगा रहे हैं। इसका कोई ठोस आधार होना चाहिए। इस दौरान स्पीकर ने भी कहा कि सार्वजनिक डोमन में जो उपलब्ध न हो या जिसका प्रमाण न हो, उसके संदर्भ का जिक्र नहीं किया जा सकता। पूर्व आर्मी चीफ नरवणे के अप्रकाशित किताब को लेकर वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले कारवां ने भी झूठी खबर फैलाई है।

राहुल गाँधी का ‘चीन प्रेम’ और विवादित बयान

ये पहली बार नहीं है जब डोकलाम और चीन को लेकर राहुल गाँधी ने देश को नीचा दिखाने की कोशिश की हो। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने दावा किया था कि चीन ने 2,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है। साथ ही कहा था कि चीनी सैनिक ‘अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सैनिकों की पिटाई’ कर रहे हैं। उस वक्त भी उनके पास कोई सबूत नहीं था और आज भी कोई प्रमाण नहीं है।

राहुल गाँधी पहले भी चीन की खुलकर तारीफ कर चुके हैं। मार्च 2023 में कैम्ब्रिज बिजनेस स्कूल में अपने विवादित भाषण में राहुल गाँधी ने चीन को ‘महाशक्ति बनने की आकांक्षा रखने वाला’ और ‘प्राकृतिक शक्ति’ बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि चीन में ‘सामाजिक समरसता’ है।

राहुल गाँधी ने चीन की विवादित और आक्रामक बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का भी समर्थन किया था। 2022 में ‘The Print’ की कॉलमनिस्ट श्रुति कपिला से बातचीत में उन्होंने कहा था कि चीन अपने आसपास के देशों की तरक्की चाहता है।

हालाँकि, 2023 में लद्दाख दौरे के दौरान राहुल गाँधी ने यह भी कहा था कि “चीन ने लद्दाख में भारत की चारागाह भूमि पर कब्जा कर लिया है।” लेकिन 2022 में ब्रिटेन में उन्होंने बयान दिया था कि “लद्दाख, चीन के लिए वही है, जो रूस के लिए यूक्रेन है।”

राहुल गाँधी ने 2020 में विदेशी ताकतों से भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की अपील भी की थी।

इतना ही नहीं, राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) और चीन के बीच वित्तीय लेन-देन की जानकारी 2020 में सामने आई थी। 2006 के बाद चीनी सरकार ने RGF को 1 करोड़ रुपये से ज्यादा की फंडिंग दी थी।

नरवणे ने अपने इंटरव्यू में बताया गलवान में क्या हुआ

राहुल गाँधी जिस पूर्व आर्मी चीफ नरवणे के अप्रकाशित किताब का जिक्र कर रहे हैं, उन्होंने अपने इंटरव्यू में ऐसी कोई बात नहीं कही हैं। उन्होंने साफ कहा है कि भारत ने एक इंच जमीन भी नहीं खोई थी।

भारत-चीन बॉर्डर पर दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि भारत और चीन के बीच ऐसे इलाके हैं, जिस पर दोनों देश अपना दावा करते हैं। ऐसी जगहों पर कोई चिन्ह, पिलर नहीं है। भौगोलिक दृष्टि से ये इलाका काफी अलग है इसलिए नरवणे ने इंटरव्यू में कहा कि गलवान में पहली बार चीन को ऐसा लगा कि सीमा पर सड़क बनाने का विरोध हो सकता है। 3000 किमी तक सीमा तय नहीं होने का फायदा चीन ने उठाने की कोशिश की, लेकिन भारत ने एक इंच जमीन भी नहीं दिया।

पूर्व आर्मी चीफ ने कहा कि एक दर्जन से ज्यादा इलाका है। इन इलाकों में पेट्रोलिंग के दौरान दोनों देश की सेनाओं का आमना-सामना होता है। कई एग्रीमेंट प्रोटोकॉल भी हैं। इसका पालन चीनी सेना की तरफ से उस वक्त नहीं किया गया इसलिए दिक्कत आई।

चीनी सेना आक्रामक तरीके से सारे प्रोटोकॉल तोड़ रहे थे इसलिए हमारे जवानों ने विरोध किया। भिड़ंत में पी 14 में केजुएल्टी हुई दोनों तरफ से। 20 हमारे जवान शहीद हुए हैं। धीरे-धीरे पता चला। चीन में 2-4 महीनों बाद 4 के मरने की घोषणा की।

चीन में भी केजुएल्टी हुई। अपने पड़ोसी देश को पहली बार ऐसा लगा कि मनमर्जी नहीं चलेगी। चीन अक्सर पड़ोसी देशों के साथ अपनी मर्जी चलाता है लेकिन उसे भारत के रुख से झटका लगा।

उन्होंने कहा कि गलवान में सड़क बना रहे थे और सोच रहे थे कि विरोध में कोई कार्रवाई नहीं होगा, तो हमने उसे रोका वही वजह था। कई बार कोशिश की, लेकिन उसका विरोध किया गया। उन्होंने इससे भी इनकार किया कि मीडियो को आर्मी की तरफ से इस बात को भी दबाने के लिए कहा गया था कि वे लोग 100 बार भारत में घुसे और हम 200 बार घुसे, क्योंकि इससे चीन नाराज हो सकता था।

राहुल गाँधी को सदन में बोलने का मौका राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के तहत मिला था। राष्ट्रपति ने जो बातें कही थि उन पर उन्हें अपनी बात रखनी थी, लेकिन वे उन मुद्दों की बात की, जिसका अभिभाषण में जिक्र भी नहीं किया गया था। इस दौरान उन्होंने जिस किताब को कोट किया, उसका प्रकाशन भी नहीं हुआ है। उसकी विश्वनीयता के बारे में नहीं बताया जा सकता।

अगर पूर्व आर्मी चीफ नरवणे की बात सामने आती, उनका किताब छपा होता, तो उसकी विश्वसनीयता को समझा जा सकता था। इसके बावजूद वह अपनी बात कहने पर अड़े रहे और कहते रहे कि ‘सरकार उनकी बातों से डरी हुई है’। अगर चीन के जमीन कब्जे की बात है तो 1959 से 1962 के बीच जो जमीन चीन ने कब्जा ली, उस पर क्यों नहीं राहुल गाँधी कुछ कहते हैं।

सदन की मर्यादा का सबको पालन करना जरूरी है। अगर स्पीकर ने उन्हें रोका, तो क्यों चीन और डोकलाम पर चर्चा पर अड़े रहे राहुल गाँधी। आखिर नियमों का कोई मतलब है या नहीं। सदन में कॉन्ग्रेस के सीनियर नेता वेणुगोपाल जोश में दिखे और ताली बजाते नजर आए। अगर नियमों का उल्लंघन ही राहुल गाँधी की विशेषता है तो कॉन्ग्रेस का भला नहीं हो सकता।

आखिर सोनिया नेहरू के पत्र क्यों नहीं वापस कर रही? सोनिया गाँधी के पास मौजूद इन दस्तावेजों में दफन है क्या राज?

             सोनिया गाँधी के पास है जवाहरलाल नेहरू के 51 बक्से पत्र (फोटो साभार : RGF/News18)
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ’51 बक्से पत्रों’ को लेकर एक बार फिर राजनीति गर्मा गई है। सोनिया गाँधी के पास मौजूद नेहरू-एडविना समेत कई हस्तियों के पत्रों के कॉन्टेंट को लेकर अक्सर चर्चा होती है। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) लंबे वक्त से इन पत्रों को माँग रहा है लेकिन कॉन्ग्रेस इनकी मौजूदगी से इनकार करती रही है। अब कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में नेहरू के पत्रों से जुड़े सरकार के एक जवाब के बाद खुद की ‘जीत’ की डुगडुगी बजाकर बीजेपी पर आरोप लगा दिया। लेकिन कॉन्ग्रेस की यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी और केंद्र सरकार ने सारा सच सामने रखते हुए कॉन्ग्रेस की खुशी पर पानी फेर दिया। अब इस मामले को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

कैसे शुरु हुआ विवाद?

हालिया विवाद की शुरुआत हुई 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में बीजेपी सांसद संबित पात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल से। संबित ने संस्कृति मंत्रालय से पूछा कि ‘क्या वर्ष 2025 में पीएमएमएल के वार्षिक निरीक्षण के दौरान भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कतिपय दस्तावेज संग्रहालय से गायब पाए गए हैं। इसके जबाव में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि ‘निरीक्षण के दौरान संग्रहालय से जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कोई दस्तावेज गायब नहीं पाया गया है’।

कॉन्ग्रेस का ‘मनगढ़ंत’ नैरेटिव: ‘गायब’ शब्द के सहारे बचने की कोशिश

कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दिए गए एक लिखित उत्तर को अपनी ढाल बनाया है। बस, इसी एक शब्द ‘गायब’ को पकड़कर कॉन्ग्रेस ने ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया कि भाजपा का प्रोपेगेंडा धराशायी हो गया।
कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने X पर (ट्वीट) पोस्ट कर पूछा, “कल आखिरकार लोकसभा में सच्चाई सामने आ ही गई। क्या अब माफी माँगी जाएगी?”

संस्कृति मंत्रालय का ‘पोस्ट वार’: कॉन्ग्रेस को दिखाया आईना

कॉन्ग्रेस के शोर के बीच संस्कृति मंत्रालय ने सिलसिलेवार पोस्ट के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। मंत्रालय ने बताया कि 29 अप्रैल 2008 को सोनिया गाँधी के प्रतिनिधि एमवी राजन ने बकायदा पत्र लिखकर माँग की थी कि सोनिया गाँधी पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सभी निजी पारिवारिक पत्र और नोट्स वापस लेना चाहती हैं।
इसके बाद, 5 मई 2008 को 51 कार्टन (बक्से) भरकर नेहरू पेपर्स सोनिया गाँधी के आवास पर भेज दिए गए थे। मंत्रालय ने यह भी लिखा कि PMML पेपर्स को वापस पाने के लिए सोनिया गाँधी के ऑफिस के साथ लगातार संपर्क में है।
मंत्रालय ने दो तारीख ’28 जनवरी 2025 और 3 जुलाई 2025′ को बताते हुए लिखा कि नेहरू पेपर्स PMML से ‘गायब’ नहीं हैं क्योंकि उनकी लोकेशन (whereabouts) का पता है- वे सोनिया गाँधी के पास हैं।
मंत्रालय का सबसे कड़ा प्रहार यह था कि ये दस्तावेज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री से संबंधित हैं और राष्ट्र की ‘दस्तावेजी विरासत’ हैं, न कि किसी की ‘निजी संपत्ति’ (Private Property)। इनका PMML की कस्टडी में होना और नागरिकों एवं विद्वानों के लिए उपलब्ध होना शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इन 51 बक्सों में आखिर क्या है?

विवाद की सबसे बड़ी जड़ वे दस्तावेज हैं जो इन 51 बक्सों के भीतर कैद हैं। PMML के रिकॉर्ड बताते हैं कि इन कागजातों में नेहरू जी द्वारा विभिन्न महान हस्तियों को लिखे गए पत्र और नोट्स शामिल हैं। संबित पात्रा ने ट्वीट कर पूछा कि आखिर एडविना माउंटबेटन को लिखे गए उन पत्रों में ऐसा क्या है जिसे ‘सेंसर’ करने की जरूरत पड़ गई? एडविना के अलावा, इन बक्सों में जयप्रकाश नारायण, अल्बर्ट आइंस्टीन, अरुणा आसफ अली, विजयलक्ष्मी पंडित और बाबू जगजीवन राम के साथ हुए पत्राचार भी शामिल हैं।
इतिहासकारों का मानना है कि इन पत्रों में देश के विभाजन, तत्कालीन कूटनीति और नेहरू के व्यक्तिगत विचारों के ऐसे पहलू हो सकते हैं जो कॉन्ग्रेस के बनाए ‘महिमा मंडित’ इतिहास को चुनौती दे सकें। अहमदाबाद के इतिहासकार रिजवान कादरी ने पत्र लिखकर इन पत्रों तक पहुँच माँगी। उनका कहना है कि गाँधी जी और पटेल के रिकॉर्ड तो व्यवस्थित हैं, लेकिन नेहरू के रिकॉर्ड का एक बड़ा हिस्सा (जो सोनिया गाँधी के पास है) शोध के लिए उपलब्ध नहीं है। क्या कॉन्ग्रेस डरती है कि अगर ये 51 बक्से सार्वजनिक हुए, तो नेहरू की वह छवि धूमिल हो जाएगी जो दशकों से पेश की जाती रही है?

पहले भी हुआ है विवाद: क्या इतिहास पर किसी एक परिवार का एकाधिकार है?

नेहरू के दस्तावेजों पर कब्जे का विवाद कोई नया नहीं है। 1971 के बाद इंदिरा गाँधी ने ये कागजात नेहरू मेमोरियल को सौंपे थे, लेकिन एक शर्त के साथ। शर्त यह थी कि इंदिरा गाँधी ही इन दस्तावेजों की ‘मालकिन’ रहेंगी और उनकी अनुमति के बिना कोई भी शोधकर्ता इन्हें देख नहीं पाएगा।
1984 में इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद सोनिया गाँधी इन दस्तावेजों की ‘ट्रस्टी-गार्जियन’ बन गईं। PMML सोसाइटी अब इस पर कानूनी राय ले रही है कि क्या कोई दान की गई चीज इस तरह वापस ली जा सकती है और क्या राष्ट्रीय इतिहास के दस्तावेजों पर किसी परिवार का मालिकाना हक हो सकता है।
हाल ही में ‘द नेहरू आर्काइव‘ के नाम से एक डिजिटल प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें नेहरू के 104 खंडों के कार्यों को ऑनलाइन किया गया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सोनिया गाँधी के पास रखे 51 बक्से वापस नहीं आते, तब तक यह आर्काइव अधूरा रहेगा। भाजपा का तर्क है कि कॉन्ग्रेस ने हमेशा इतिहास को ‘कंट्रोल’ करने की कोशिश की है।
नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय (NMML) का नाम बदलकर प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) करने पर भी कॉन्ग्रेस ने खूब विरोध किया था, क्योंकि वे नेहरू को केवल एक परिवार तक सीमित रखना चाहते हैं, जबकि सरकार उन्हें देश के सभी प्रधानमंत्रियों की विरासत का हिस्सा मानती है।

माफी किसे माँगनी चाहिए?

कॉन्ग्रेस ने ‘गायब’ शब्द के पीछे छिपकर जिस तरह भाजपा से माफी की माँग की है, वह ‘चोरी और ऊपर से सीनाजोरी’ जैसा मामला है। सरकार के जवाब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दस्तावेज चोरी नहीं हुए, बल्कि सोनिया गाँधी ने उन्हें ‘होल्ड’ कर रखा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या देश के पहले प्रधानमंत्री के पत्र किसी निजी अलमारी में बंद होने चाहिए या राष्ट्रीय पुस्तकालय में?
अगर कॉन्ग्रेस पारदर्शी है, तो उसे ये 51 बक्से तुरंत वापस करने चाहिए। माफी भाजपा को नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस को माँगनी चाहिए जिसने 2008 में राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेजों को एक निजी आवास की संपत्ति बना दिया।

लोकसभा में TMC सांसद द्वारा E-Ciggrette पीने पर हुआ बवाल: भारत समेत 37 देशों में है बैन, फूँकने से सिर्फ फेफड़े नहीं दिमाग भी होता है खराब

प्रतिकात्मक तस्वीर ( साभार- chatgpt )
ई सिगरेट पर प्रतिबंध लगा हुआ है, लेकिन सदन में टीएमसी के सांसद पर इसे पीने का आरोप लगा है। बताया जा रहा है कि टीएमसी के 3 सांसद हैं, जो सदन में ई सिगरेट पी रहे थे। हालाँकि इनका नाम उजागर नहीं किया गया है। बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने लोकसभा में स्पीकर के सामने ये मुद्दा उठाया है। हालाँकि इस दौरान उन्होंने टीएमसी सांसद के ई सिगरेट पीने की बात कही। किसी का नाम नहीं लिया। स्पीकर ने लिखित शिकायत देने के बाद कार्रवाई का भरोसा दिया है।

लोकसभा में गूँजा ई-सिगरेट पीने का मामला

टीएमसी के सांसद पर संसद परिसर में ई सिगरेट पीने का सांसद अनुराग ठाकुर ने आरोप लगाया। लोकसभा में ई-सिगरेट पीने का मुद्दा उठाते हुए सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि “देशभर में ई सिगरेट बैन है, क्या संसद में सिगरेट पीना अलाउ कर दिया गया है।” इस पर लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने ‘ना’ कहा। तब अनुराग ठाकुर ने कहा कि टीएमसी के सांसद कई दिनों से बैठकर पी रहे हैं। सदन में ई-सिगरेट पी जा रही है। इसकी जाँच करवाएँ।’ उन्होंने कहा कि लाखों लोग संसद की सीधी कार्रवाई देखते हैं, ये संसद की गरिमा के खिलाफ है।

पूरे मामले पर स्पीकर ओम बिरला ने कहा कि ‘हमें संसदीय परंपराओं और संसदीय नियमों का अनुपालन करना चाहिए। ऐसा कोई विषय मेरे पास आएगा तो कार्रवाई करेंगे।’

न्यूज 18 के मुताबिक, पिछले कई दिनों में सांसदों के बीच ये मुद्दा गरम है। बीजेपी का कहना है कि टीएमसी के 3 सांसद संसद भवन के भीतर ई-सिगरेट का सेवन कर रहे थे। सांसद अनुराग ठाकुर ने सांसद शब्द का जिक्र किया, उनकी संख्या नहीं बताई और न ही नाम उजागर किया।

क्या होता है ई सिगरेट

ई-सिगरेट यानी वेप पेन या वेप्स, बैटरी से चलने वाला डिवाइस है जो एक लिक्विड को गर्म करके भाप बनाता है। इसे इस्तेमाल करने वाला यूजर साँस के जरिए शरीर के अंदर लेता है। इस लिक्विड में आमतौर पर निकोटीन, फ्लेवरिंग और दूसरे केमिकल होते हैं।

शुरुआत में इन्हें आमतौर पर सिगरेट पीने वाले लोग ‘सुरक्षित’ विकल्प के तौर पर देख रहे थे। इसके बनाने की प्रक्रिया में निकोटीन, फ्लेवरिंग, प्रोपलीन ग्लाइकॉल और दूसरे पदार्थ डाले जाते हैं और गर्म करने पर ये एरोसोल में बदल जाता है। इससे साँस लेने में समस्या पैदा होती है।

फेफड़ों समेत शरीर के दूसरे अंगों को नुकसान पहुँचता है। ये सिगरेट पीने जैसा ही है। बस तम्बाकु को जलाने के बजाए यहाँ लिक्विड को गर्म किया जाता है और उसके भाप का सेवन किया जाता है।

दुनियाभर में इससे होने वाले नुकसान को देखते हुए जागरुकता फैलाया जा रहा है। लोगों से इसे नहीं पीने की अपील की जा रही है। दुनिया के 37 देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है, उनमें भारत भी एक है।

भारत सरकार ने 2019 में ई-सिगरेट की बिक्री, इसे बनाने, बाँटने या आयात करने पर रोक लगा दी थी। सरकार को चिंता थी कि ये युवा पीढ़ी को नुकसान पहुँचा रही हैं और नशे का आदी बना रही है।

क्यों लगा है बैन

ई-सिगरेट से तंबाकू नहीं जलता, लेकिन फिर भी इसके इस्तेमाल से गंभीर खतरे हैं। ज्यादातर वेपिंग लिक्विड में निकोटीन होता है, जो बहुत ज़्यादा एडिक्टिव होता है और टीनएजर्स और युवा पीढ़ी के ब्रेन डेवलपमेंट पर असर डालता है। वेपर में ऐसे केमिकल भी होते हैं, जो फेफड़ों में जलन पैदा कर सकते हैं। सांस लेने में दिक्कत पैदा कर सकते हैं और शायद लंबे समय तक सांस की समस्या का कारण बन सकते हैं।

कई स्टडीज़ से पता चला है कि वेपिंग से दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है, नसों को नुकसान पहुँचता है और फेफड़े सिकुड़ने लगते हैं। विदेशों में, ई-सिगरेट के इस्तेमाल से फेफड़ों को नुकसान पहुँचने के कई मामले सामने आए हैं, यानी वेपिंग से खतरा है इस पर पूरी दुनिया सहमत है।

ई सिगरेट के प्रकार

ई सिगरेट कई तरह की होती है। वेप्स, वेप पेन या स्टिक, हुक्का, ई-हुक्का, मॉड्स, पर्सनल वेपोराइजर यानी पीवी। पूरे को मिलाकर इलेक्ट्रॉनिक निकोटीन डिलीवरी सिस्टम यानी ईएनडी कहते हैं।

किसी भी ई सिगरेट में एक टैंक या पॉड होता है, जिसमें लिक्विड भरा जाता है।

लिक्विड को गरम करने के लिए उपकरण लगा होता है। उसे चलाने के लिए बैटरी लगी होती है। साथ में एक कंट्रोल बटन होता है।

इसमें इस्तेमाल होने वाले लिक्विड को ई जूस या वेप जूस भी कहते हैं। लेकिन ये कोई ‘जूस’ नहीं होता। इसमें पानी भी नहीं होता है। भाप पैदान करने के लिए प्रोपिलीन ग्लाइकॉल और ग्लिसरीन का इस्तेमाल किया जाता है। फ्लेवरिंग के लिए अलग अलग सामग्री इस्तेमाल की जाती है।

ई सिगरेट से होने वाली बीमारियाँ

इससे सांस की तकलीफें, अस्थमा, फेफड़े में सूजन, जकड़न और सिकुड़न हो सकता है। फेफड़े में हमेशा के लिए निशान पड़ सकता है या छोटे कण गहराई से घुस सकते हैं, जिससे कैंसर हो सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉर्थ कैरोलिना की एक स्टडी के अनुसार ई-सिगरेट में पाए जाने वाले दो मुख्य इंग्रीडिएंट्स- प्रोपलीन ग्लाइकॉल और वेजिटेबल ग्लिसरीन शरीर के लिए घातक होते हैं।
इनका सबसे बुरा प्रभाव कोशिकाओं पर पड़ता है। ब्रेन के विकास पर असर डालता है। इसलिए टीनएजर्स और जेनजी के लिए खास तौर पर खतरनाक है। ब्लड प्रेशर बढ़ा सकता है। भारी धातु जैसे निकेल, लेड कैडमियन खून में घुलकर नसों को नुकसान पहुँचा सकता है।
इतने नुकसान और प्रतिबंध के बावजूद लोकतंत्र के मंदिर संसद में सांसदों द्वारा ई सिगरेट का सेवन करना काफी आश्चर्यजनक है। टीएमसी के सांसदों के खिलाफ लिखित शिकायत के बाद कार्रवाई का आश्वासन लोकसभा स्पीकर ने दिया है। लेकिन ये सिर्फ अनुशासनहीनता का मामला नही है। जनता के प्रतिनिधि का आचरण अनुसरणीय होनी चाहिए। जनता संसद की सीधी कार्रवाई देखती है। ऐसे में ये सांसद जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं।
सांसदों पर संसदीय मर्यादा को भंग करने का आरोप भी है। संसद तो इसके लिए कार्रवाई करेगी ही। अच्छा होता, अगर टीएमसी भी अपने सांसदों की जाँच के बाद आरोप साबित होने पर कार्रवाई करती। ये दूसरे सांसदों के लिए सीख होती और पार्टियों के लिए अनुकरणीय होता। आखिर जनता का नुमाइंदा इस तरह से सार्वजनिक तौर पर अनुशासनहीनता और अमर्यादित काम करे, तो जनता को ये क्या शिक्षा देंगे।

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूँज से गूंजेगी संसद; धधकाई राष्ट्रप्रेम की ज्वाला, पर इस्लामवादियों ने नहीं किया कबूल: नेहरू ने हटवाए माँ दुर्गा की स्तुति वाले छंद, ‘वंदे मातरम के 150 साल’ पर संसद में बेनकाब होगा लिबरल गैंग

आज हर बीतते दिन के साथ भारत का वह धूमिल इतिहास सामने आने लगा है, जिसे मुस्लिम वोटबैंक और मुस्लिम कट्टरपंथियों के क़दमों में घुटने टेक चुके नेताओं और उनकी पार्टियों ने जनता के सामने नहीं आने दिया। इन मुस्लिम वोट के भूखे नेताओं ने उस राष्ट्रीय गीत को ही खंडित करने में कोई हिचक नहीं दिखाई, जिसने स्वतंत्रता सेनानियों को एक ऊर्जा दी थी। जो नेता और पार्टियां अपने राष्ट्रीय गीत को ही खंडित कर दे क्या उनसे देशप्रेम की उम्मीद की जा सकती है और करनी भी नहीं चाहिए। 

याद हो कुछ समय जब भगवा ध्वज पर विवाद होने पर TimesNow नवभारत पर एंकर सुशांत सिन्हा ने भगवा ध्वज के राष्ट्रीय झंडे पर खुलकर प्रकाश डालते हुए बताया था कि जब सामने स्वतंत्रता दिखनी शुरू होने पर राष्ट्रीय ध्वज पर चर्चा में एक कमेटी का गठन किया गया जिसमे कई सुझाव भी आए। लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने 1906 में भगवा झंडे का सुझाव दिया जिसे स्वीकार भी कर लिया गया था। लेकिन कट्टरपंथी महात्मा गाँधी के पास गए और नेहरू का सुझाया भगवा ध्वज को नज़रअंदाज़ कर आखिर में विवश होकर तिरंगा रखा गया। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (8 दिसंबर 2025) को लोकसभा में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगाँठ पर ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत करने जा रहे हैं। यह पहला अवसर है जब संसद में इस गीत के इतिहास, उसके महत्व और स्वतंत्रता आंदोलन में उसकी भूमिका पर इतने व्यापक स्तर पर चर्चा होगी।

सरकार इस बहस को विशेष रूप से युवाओं तक वंदे मातरम् के संदेश को पहुँचाने का अवसर मान रही है। यह वही गीत है, जिसने स्वतंत्रता की अलख जगाई और भारतीय स्वाभिमान की नींव रखी।

संसद में ऐतिहासिक डिबेट की शुरुआत

 लोकसभा की कार्यसूची में सोमवार (8 दिसंबर 2025) को ‘राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर चर्चा’ शामिल की गई है और इसके लिए दस घंटे का समय निर्धारित किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बहस की शुरुआत करेंगे और उनके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अपने विचार रखेंगे।

विपक्ष की ओर से कॉन्ग्रेस ने प्रियंका गाँधी वाड्रा और सांसद गौरव गोगोई को इस बहस में हिस्सा लेने के लिए चुना है। वहीं राज्यसभा में मंगलवार (9 दिसंबर 2025) को गृह मंत्री अमित शाह इस बहस का नेतृत्व करेंगे और उनके बाद स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा बोलेंगे। यह चर्चा उस समय हो रही है, जब हाल ही में चुनाव सुधारों और एसआईआर को लेकर संसद में कई बार गतिरोध देखने को मिला था।

वंदे मातरम् की रचना: साहित्य से राष्ट्रगीत बनने की यात्रा

वंदे मातरम् की रचना बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी। यह पहली बार 7 नवंबर 1875 को उनकी प्रसिद्ध पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में प्रकाशित हुआ। बाद में 1882 में उन्होंने इसे अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया।

यह गीत केवल कविता नहीं था, बल्कि माँ और मातृभूमि दोनों की आराधना का एक अद्भुत संगम था। इसमें भारत की धरती, प्रकृति और संस्कृति को देवी रूप में प्रस्तुत किया गया। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया।

स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् की गूँज

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, तब वंदे मातरम् एक साधारण गीत से आगे बढ़कर आंदोलन की आवाज बन गया। स्कूलों, कॉलेजों, जनसभाओं और रैलियों में युवा इसे गाते थे और ब्रिटिश राज के खिलाफ संघर्ष को नई ऊर्जा देते थे।

रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार संगीत में ढालकर जनता के सामने प्रस्तुत किया। इसके बाद अरविंदो घोष, बिपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और अनेक नेताओं ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बना दिया। उस समय यह गीत हर भारतीय के हृदय में साहस और प्रेरणा की अग्नि जलाने वाला एक मन्त्र बन चुका था।

अंग्रेजों का भय और प्रतिबंध

ब्रिटिश सरकार इस गीत को विद्रोह और स्वतंत्रता की भावना बढ़ाने वाला मानती थी। इसलिए 1910 के बाद प्रशासन ने स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् बोलने या गाने पर प्रतिबंध लगा दिया।

छात्रों को स्कूलों से निकाला गया, नेताओं को जेल भेजा गया और कई लोगों को सजाएँ दी गईं, लेकिन फिर भी इस गीत की आवाज को दबाया नहीं जा सका। प्रतिबंध जितना कड़ा होता गया, वंदे मातरम् उतनी ही ताकत के साथ जनमानस में गूँजता रहा।

विदेशों में भारतीय पहचान का प्रतीक

1907 में जर्मनी के स्टटगार्ट में मैडम भीकाजी कामा ने भारत का पहला तिरंगा फहराया और उस तिरंगे पर वंदे मातरम् लिखा हुआ था। यह वह क्षण था जब यह गीत भारत की सीमाओं से बाहर निकलकर विश्वभर में भारत की आजादी और अस्मिता का प्रतीक बन गया।

मुस्लिम लीग ने किया विरोध और नेहरू ने की काँट-छाँट

जब यह गीत स्वतंत्रता की पहचान बन रहा था, 1908 में मुस्लिम लीग ने इसके विरोध की शुरुआत की। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।

इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है।

नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही पद स्वीकार किए जाएँ। नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने संक्षिप्त संस्करण अपनाने का फैसला किया था, जिसमें से जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए गए थे। ऐसा करते हुए कॉन्ग्रेस ने अपने सांप्रदायिक एजेंडे के लिए फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।

कट्टरपंथियों ने हमेशा ही खड़ा किया विवाद

आज भी समय के साथ नाम और बहाने बदल गए हैं, लेकिन मानसिकता वही है। कभी इसे इस्लाम विरोधी कहा जाता है, तो कभी सेकुलरिज्म के नाम पर अस्वीकार किया जाता है। बिहार विधानसभा में ओवैसी की पार्टी के विधायकों ने वंदे मातरम् गाने से इनकार किया, तो समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने संसद में इसे ‘इस्लाम के खिलाफ’ बताया।
बर्क का यह रवैया नया नहीं था, 1997, 2013 और 2019 में भी उन्होंने यही तर्क दोहराया। इसी तरह राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने कहा, “जो एकेश्वर में विश्वास रखता है, वह वंदे मातरम् नहीं गा सकता।”
यह सोच केवल राजनीति तक सीमित नहीं रही। 2019 में देवबंद के मदरसे जामिया हुसैनिया के मुफ्ती तारिक कासमी ने आदेश जारी कर वंदे मातरम् और भारत माता की जय बोलने पर पाबंदी लगा दी, यह कहते हुए कि ‘इस्लाम में केवल अल्लाह की इबादत होती है।”

आज का वंदे मातरम्: भावना, पहचान और राष्ट्रगौरव

150 वर्ष बीत जाने के बाद भी वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं है। यह राष्ट्रगौरव, समर्पण और मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह गीत धर्म या राजनीति की सीमाओं में कैद नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज है।

प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में संसद में होने वाली यह चर्चा केवल इतिहास याद करने का अवसर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देने का क्षण है कि राष्ट्र के प्रति प्रेम ही सच्चा राष्ट्रधर्म है।

‘महाराज बहुत हो गया अब रोक दीजिए’: राजनाथ सिंह ने संसद से बताया ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से कैसे पाकिस्तान कर रहा था बाप-बाप

  लोकसभा में बोलते रक्षामंत्री राजनाथ सिंह/कश्मीर में ढेर हुए आतंकी (फोटो साभार: X@SansadTV/IndiaToday)
लोकसभा में सोमवार 28 जुलाई को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर हुई चर्चा के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान और आतंकवाद के खिलाफ जोरदार प्रहार करते हुए विपक्ष को आईना दिखाया। उन्होंने जोर देकर कहा कि कभी-कभी विपक्षी दलों के लोग सवाल उठाते हैं कि हमारे कितने विमान गए? लेकिन उनका यह सवाल हमारी राष्ट्रीय भावनाओं का सही से प्रतिबिंब नहीं है। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने एक बार भी यह नहीं पूछा कि हमारी सेनाओं ने दुश्मन के कितने विमान मार गिराए? यदि सवाल ही करना है तो सही सवाल यह होना चाहिए कि क्या भारत ने आतंकी ठिकानों को प्रभावी तरीके से तबाह किया और ऑपरेशन सिंदूर सफल रहा तो उसका उत्तर है, हां।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम आतंकी हमले पर सरकार का पक्ष रखा। इस दौरान उन्होंने भारतीय सेना की वीरता और रणनीतिक सफलता का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि 6-7 मई 2025 की रात भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए, जिसका उद्देश्य पहलगाम हमले का बदला लेना और आतंकवाद की नर्सरियों को नष्ट करना था। इस कार्रवाई में 100 से अधिक आतंकी और उनके हैंडलर मारे गए।

रक्षामंत्री ने कहा कि पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले में आतंकियों ने पर्यटकों से धर्म पूछकर 26 लोगों की हत्या की थी, जिसमें ज्यादातर हिंदू थे। इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF) ने ली थी।

इसके जवाब में प्रधानमंत्री ने सेना को निर्णायक कार्रवाई की छूट दी। भारतीय सेना ने पाकिस्तान में घुसकर आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में सिर्फ 22 मिनट में सभी आतंकी हमलों को हिट किया और 100 से अधिक आतंकियों को मार गिराया।

इसके बाद पाकिस्तान की ओर से हमले 7 मई से 10 मई की रात 1 बजकर 30 मिनट तक मिसाइल और लंबी दूरी के हथियारों का इस्तेमाल किया। उसके निशाने पर हमारे सैन्य अड्डे थे। हमारा डिफेंस सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट ने पाकिस्तान के हर हमले को नाकाम कर दिया और पाकिस्तान किसी भी टार्गेट को हिट नहीं कर पाया। भारत के रक्षा तंत्र ने सभी हमलों को विफल कर दिया।

राजनाथ सिंह ने जोर देकर कहा कि पाकिस्तान एक भी लक्ष्य को हिट नहीं कर पाया। इसके जवाब में 10 मई की सुबह भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के एयरफील्ड पर करारा प्रहार किया, जिसके बाद पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारत से संपर्क कर कार्रवाई रोकने की अपील की।

रक्षामंत्री ने स्पष्ट किया कि ऑपरेशन को केवल पॉज किया गया है और यदि पाकिस्तान ने फिर उकसाया तो इसे दोबारा शुरू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन युद्ध छेड़ने के लिए नहीं, बल्कि आतंकवाद को खत्म करने के लिए था, जिसमें भारत ने अपने सभी लक्ष्य हासिल किए।

ऑपरेशन महादेव में हासिम मूसा समेत 3 आतंकी ढेर, जारी है एनकाउंटर

वहीं, जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन महादेव के तहत श्रीनगर के लिदवास में 28 जुलाई को सुरक्षाबलों ने तीन आतंकियों सुलेमान साहा, अबु हमजा और यासिर को मार गिराया। चिनार कॉर्प्स के अनुसार, मुठभेड़ सुबह 11:30 बजे शुरू हुई, जब 24 राष्ट्रीय राइफल्स और 4 पैरा ने आतंकियों को घेर लिया।

मारे गए आतंकी सुलेमान साहा को मीडिया रिपोर्ट्स में हासिम मूसा बताया जा रहा है, जो पहलगाम आतंकी हमले का मास्टरमाइंड था।

आतंकियों के पास से भारी मात्रा में हथियार और ग्रेनेड बरामद हुए। माना जा रहा है कि ये आतंकी पहलगाम हमले से जुड़े थे, जिसके लिए एनआईए ने पहले दो आतंकियों को गिरफ्तार किया था। ऑपरेशन अभी जारी है, क्योंकि एक अन्य आतंकी की तलाश चल रही है।

रक्षामंत्री ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि वे सही सवाल नहीं पूछ रहे। उन्होंने जोर दिया कि ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना की वीरता और रणनीतिक शक्ति का प्रतीक है। भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी संप्रभुता पर किसी भी हमले का करारा जवाब देगा।

राजनाथ सिंह ने कॉन्ग्रेस पर तंज करते हुए कहा कि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को दोनों देशों की डायलॉग प्रॉसेस से 2009 की सरकार ने डीलिंक कर दिया था। साल 2006 में यह मान लिया गया था कि पाकिस्तान आतंक से पीड़ित है। इसने भारत की रणनीति को कमजोर किया। हमारे डेलिगेशन ने दुनिया के देशों में जाकर ऑपरेशन सिंदूर को लेकर भारत के स्टैंड को प्रभावी तरीके से रखा।

रक्षामंत्री ने कहा, “पीएम मोदी ने भी कहा है कि ऑपरेशन सिंदूर रुका है, समाप्त नहीं हुआ है। पाकिस्तान अगर फिर कोई हरकत करता है, तो हम और भी कठोर कार्रवाई करेंगे। पाकिस्तान के मन में गलतफहमी थी, उसे हमने ऑपरेशन सिंदूर से दूर कर दिया। अगर कुछ बचा होगा तो उसे भी दूर कर देंगे।”

राहुल गाँधी झूठ परोसने से पहले देश को बताओ जब जवाहर लाल नेहरू को booth capturing का मास्टरमाइंड क्यों कहा जाता था, देश के पहले ही चुनाव में booth capturing कर लोकतंत्र का गला घोट दिया था

राहुल गाँधी की हरकतों को देख कहा जा सकता है कि इसे अपने पद की उसी तरह जरा सी भी चिंता जिस तरह अरविन्द केजरीवाल को नहीं थी। आज केजरीवाल का क्या हश्र है आने वाले समय में राहुल, कांग्रेस और इसके समर्थकों का होने वाला है। क्योकि काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती। 
 
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की आज सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोलिंग हो रही है। लोग कांग्रेस सांसद को लताड़ लगा रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के आरोपों पर अन्य लोगों के साथ चुनाव आयोग ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है और उनके बयानों को ‘बेतुका’ करार दिया है। आयोग ने कहा कि ऐसे बयान न सिर्फ संस्थान की साख को नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनता का भरोसा भी कमजोर करते हैं। चुनाव आयोग ने एक बयान जारी कर साफ कहा है कि ‘महाराष्ट्र की मतदाता सूची के खिलाफ लगाए गए निराधार आरोप कानून के शासन का अपमान हैं। 

चुनाव आयोग ने 24 दिसंबर 2024 को ही कांग्रेस को भेजे अपने जवाब में ये सभी तथ्य सामने रखे थे, जो चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध है। ऐसा लगता है कि बार-बार ऐसे मुद्दे उठाते हुए इन सभी तथ्यों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है।’ आयोग ने आगे कहा कि ‘किसी के द्वारा फैलाई जा रही कोई भी गलत सूचना न केवल कानून के प्रति अनादर का संकेत है, बल्कि अपने ही राजनीतिक दल द्वारा नियुक्त हजारों प्रतिनिधियों की बदनामी भी करती है और लाखों चुनाव कर्मचारियों का मनोबल भी गिराती है, जो चुनाव के दौरान अथक और पारदर्शी तरीके से काम करते हैं। मतदाताओं द्वारा किसी भी प्रतिकूल फैसले के बाद, यह कहकर चुनाव आयोग को बदनाम करने की कोशिश करना पूरी तरह से बेतुका है।’

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर फैलाया भ्रम

लेख के पहले चरण में राहुल ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘खेल के शीर्ष प्रतियोगियों ने ही अपना अंपायर चुन लिया।’ उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को नियुक्ति पैनल से हटाने को लेकर भी सवाल खड़े किए।
राहुल गाँधी यह भूल गए कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति हमेशा केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति के द्वारा की जाती रही है और सुप्रीम कोर्ट ने बाद में इस मामले में सरकार को कानून बनाने का आदेश दिया था।
सरकार ने इसके लिए 2023 में ‘चुनाव आयुक्त नियुक्ति अधिनियम’ बनाया था। इसके लागू होने के बाद 2:1 के पैनल में विपक्ष के प्रतिनिधि को भी शामिल किया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार में विपक्ष की अपेक्षा का भाव नहीं है। इसके बावजूद भी राहुल गाँधी द्वारा सवाल उठाया जाना लज्जाजनक है।
जहाँ पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में विपक्ष का 1% भी रोल नहीं था, वहीं अब उनका प्रतिनिधि इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा है। सरकार द्वारा चुनाव आयोग की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश को हटाने का फैसला अनावश्यक न्यायिक बाधाओं को दूर करने और चुनाव प्रक्रिया को गति प्रदान करने के लिए लिया गया है।
अवलोकन करें:- 

दरअसल में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ‘मैच-फिक्सिंग महाराष्ट्र’ शीर्षक से एक लेख लिखा है। ये कई अखबारों में छपा है। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं और बीजेपी ने सुनियोजित तरीके से चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किया।

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी के आरोपों के बाद न सिर्फ सियासी घमासान तेज हुआ है, बल्कि सोशल मीडिया पर उनकी ट्रोलिंग और मीम्स की बाढ़ आ गई है। चुनाव आयोग और बीजेपी दोनों ने उनके बयानों को सिरे से खारिज किया है और राहुल पर हार का ठीकरा संस्थाओं पर फोड़ने का आरोप लगाया है। बीजेपी ने कहा है कि राहुल गांधी बार-बार लोकतांत्रिक संस्थाओं की छवि खराब करते हैं और जनता उन्हें गंभीरता से नहीं लेती। बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि वे हार स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं और बार-बार संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करते रहते हैं। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने आरोप लगाया कि ‘राहुल गांधी का नवीनतम लेख, चुनाव दर चुनाव हारने की उनकी उदासी और हताशा के कारण, फर्जी कहानियां गढ़ने का एक खाका है।’

केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने तंज कसते हुए कहा कि अनेकों बार चुनावों में जनता द्वारा नकारे जाने के बावजूद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। हर चुनावी हार के बाद चुनाव आयोग और जनादेश को कठघरे में खड़ा करना राहुल गांधी की हताशा है।

बीजेपी के अन्य नेताओं ने भी राहुल के बयान को “अराजकता फैलाने की कोशिश” बताया और कहा कि जब कांग्रेस जीतती है तो यही सिस्टम सही लगता है, लेकिन हारने पर साजिश की बातें शुरू हो जाती हैं।

शिवसेना नेता संजय निरुपम ने कहा है कि चाहे राहुल गांधी हों या कांग्रेस पार्टी का वर्तमान नेतृत्व, उन्हें यह स्वीकार करना चाहिए कि दोष चुनाव आयोग, चुनावी प्रक्रिया या मतदाताओं का नहीं है। दोष उनकी अपनी कार्यप्रणाली में है।

मतदाताओं की संख्या पर भी बोला झूठ

राहुल गाँधी ने एक्सप्रेस को दिए अपने लेख में यह बताया कि महाराष्ट्र में 2019 के विधानसभा चुनाव में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 8.98 करोड़ थी जो 5 साल बाद 2024 लोकसभा चुनाव के लिए बढ़कर 9.29 करोड़ हो गई। उन्होंने प्रश्न उठाए कि 41 लाख की छलाँग 5 महीने में कैसे संभव है।
वर्ष 2024 में 4.26%, 2019 में 1.31%, 2014 में 3.48%, 2009 में 4.13 और 2004 में 4.69% (2024 की वृद्धि से भी अधिक) मतदाताओं का अंतर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में देखा गया था।इन आँकड़ों से यह स्पष्ट है कि राहुल गाँधी अपनी पार्टी के घटते आधार से खिन्न होकर कुछ भी दावे कर रहे हैं।

मतदान प्रतिशत पर भी रिपीट किया झूठ

राहुल गाँधी ने दावा किया कि शाम 5 बजे मतदान प्रतिशत 58.22% था जो मतदान बंद होने के बाद भी लगातार बढ़ता गया। उन्होंने 76 लाख मतदाताओं के प्रतिशत वृद्धि का भी हवाला दिया। इस मामले में राहुल गाँधी चतुराई से एक बात छुपा ले गए।
सच्चाई है कि 5 बजे मतदाताओं की नई लाइन लगना बंद होती हैं, लेकिन जितने लोग लाइन में लग चुके होते हैं, उन्हें वोट डालने दिए जाते हैं। कई मामलों में चुनाव आयोग ने वोटिंग का समय भी बढ़ाया है। ऐसे में अंतिम आँकड़े 5 बजे के आँकड़ों से हमेशा ही अलग होंगे।
इस मामले पर महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोकलिंगम ने जवाब देते हुए कहा था कि ‘तय समय के बाद भी मतदान में वृद्धि होना कोई असामान्य बात नहीं है। बल्कि यह प्रक्रियाओं पर आधारित है। महाराष्ट्र के कई शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लोग बड़ी संख्या में शाम को मतदान देने आते हैं इसलिए यह कोई असामान्य बात नहीं है।