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मातृशक्ति BJP का मास्टरस्ट्रोक: महिला आरक्षण से लोकसभा सीटें बढ़कर 816 होंगी, 273 महिला सांसद बनेंगी


क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को विकसित हिन्दू राष्ट्र बनाने की ओर अग्रसर है? नारी शक्ति को जितना सम्मान सनातन धर्म में दिया गया है किसी अन्य धर्म में नहीं। पौराणिक कथाओं का अवलोकन करने पर एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि जीवन में जब पुरुष  किसी असुर शक्ति से मानव को राहत देने में असमर्थ होने पर महिला शक्ति जिसे आज देवी माता के रूप में पूजा जाता है, का सहारा लिया। देवी माता को अस्त्र-शस्त्र प्रदान करने वाले सभी देवता हैं। यही कारण है कि वर्ष में 2 बार नवरात्रे मनाने की प्रथा चली आ रही है।    

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी और सरकार ने मातृशक्ति और युवाशक्ति पर खास फोकस किया है। देश की राजनीति में मातृशक्ति भागीदारी बढ़ाने को लेकर सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है। केंद्र सरकार अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम को 2034 के बजाय 2029 से लागू करने पर विचार कर रही है। इस प्रस्ताव के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में करीब 50% तक बढ़ोतरी की जा सकती है, ताकि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रभावी तरीके से दिया जा सके। इस योजना का मकसद यह है कि महिला आरक्षण लागू करने के साथ-साथ किसी राज्य की मौजूदा सीटों में कटौती न हो और सभी को संतुलित प्रतिनिधित्व मिले। साथ ही, आरक्षित सीटों के भीतर एससी और एसटी वर्ग के लिए भी अलग से आरक्षण जारी रहेगा। 2029 के लोकसभा चुनाव से महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए संसद के मौजूदा सत्र या अगले सत्र में दो बिल लाए जा सकते हैं। इसके जरिए महिला आरक्षण लागू करने की मौजूदा शर्त में बदलाव किया जाएगा। इससे लोकसभा में सदस्यों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो सकती है। इनमें महिला सांसदों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 273 हो जाएगी।

गृहमंत्री अमित शाह की सभी राजनीतिक दलों में सहमति की कवायद
पीएम मोदी के दिशा निर्देशन में गृह मंत्री अमित शाह ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठकें भी की हैं। इस दौरान सीट बढ़ाने के “स्ट्रेट जैकेट फॉर्मूला” पर चर्चा हुई, जिसमें मौजूदा सीटों को बढ़ाकर नए ढांचे में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें तय की जाएंगी। इससे लोकसभा की कुल सीटें बढ़कर करीब 800 से ज्यादा हो सकती हैं। इस बीच दक्षिण भारत के कुछ राज्यों ने जनसंख्या के आधार पर परिसीमन पर ऐतराज किया है। इसलिए सरकार अब ऐसा फॉर्मूला लाने की कोशिश कर रही है, जिससे सभी राज्यों के हितों का संतुलन बना रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने इस पर सहमति बनाने के लिए एनडीए और गैर-कांग्रेसी विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बैठक की। सहमति बनने पर बिल लोकसभा में पेश किए जा सकते हैं।

महिला सांसदों ने सरकार के कदम को स्वागत योग्य बताया
महिला सांसदों ने बजट सत्र या अगले सत्र के दौरान महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए विधेयक लाने की केंद्र सरकार की योजना का स्वागत किया और कहा कि इस कदम से शासन में महिलाओं की भागीदारी और मजबूत होगी। जेडीयू सांसद लवली आनंद ने इसे “स्वागत योग्य कदम” बताया और कहा कि राजनीति में महिलाओं की अधिक भागीदारी देश की प्रगति को गति देगी। भाजपा सांसद कमलजीत सहरावत ने कहा कि महिला आरक्षण कानून के पारित होने से प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश की “आधी आबादी” से किया गया एक लंबे समय से चला आ रहा वादा पूरा हुआ है। सहरावत ने कहा कि इस देश में कई लोगों ने महिलाओं के बारे में बात की है, लेकिन नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लाने का प्रयास और उसमें मिली सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री को जाता है। आरक्षण विधेयक लाना प्रधानमंत्री द्वारा देश की आधी आबादी से किया गया वादा है, और वह आधी आबादी उन पर भरोसा करती है।

2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन करने की रणनीति
दरअसल, 2023 में महिला आरक्षण कानून संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था। इसके तहत महिला आरक्षण नई जनगणना के बाद लागू होना है। अब सरकार का प्रस्ताव है कि नई जनगणना का इंतजार करने की बजाय 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन किया जाए। इससे प्रोसेस तय समय पर पूरी हो सकेगी और आरक्षण लागू किया जा सकेगा। इसके लिए दो बिल लाए जा सकते हैं। एक बिल के जरिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन होगा, जबकि दूसरा परिसीमन कानून में बदलाव से जुड़ा होगा। इसे पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा। इसी वजह से सरकार विपक्ष का समर्थन जुटाने में लगी है।

महिला आरक्षण के लिए पूरे देश में एकरूपता लाने की कवायद
महिला आरक्षण प्रस्ताव के मुताबिक 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। आरक्षण का ढांचा ऐसा होगा, जिसमें एससी और एसटी वर्ग की महिलाओं को उनके कोटे के भीतर हिस्सा मिलेगा। ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान फिलहाल शामिल नहीं है। इसी फॉर्मूले पर राज्यों की विधानसभाओं में भी सीटें बढ़ाने और महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की योजना है, ताकि पूरे देश में एक जैसा ढांचा रहे। गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों इसके लिए कई नेताओं से बैठकें की हैं। इनमें वाईएसआर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, एनसीपी (एसपी), आरजेडी और एआईएमआईएम के नेता शामिल रहे। बीजेडी और शिवसेना (यूबीटी) से भी बातचीत हुई है, जबकि कांग्रेस से चर्चा बाकी है।

महिला आरक्षण बिल दोनों सदनों से पास, पर अभी लागू नहीं
महिला आरक्षण कानून 2023 में संविधान के 106वें संशोधन के रूप में पास हुआ था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसकी मंजूरी दे चुकी हैं। लोकसभा और राज्यसभा में यह बिल सर्वसम्मति से पास हुआ था। हालांकि, यह कानून अभी लागू नहीं हुआ है। इसकी लागू होने की तारीख केंद्र सरकार अधिसूचना के जरिए तय करेगी और जरूरत पड़ने पर संसद इसमें संशोधन कर सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला आरक्षण के बाद यूपी में सबसे ज्यादा 40 लोकसभा सीटें बढ़ेंगी। 80 से बढ़कर 120 हो जाएंगी। महाराष्ट्र में महिलाओं के लिए 24 सीटें आरक्षित हो जाएंगी। यहां लोकसभा की सीटें 48 से बढ़कर 72 हो जाएंगी। बिहार में महिला सीटों की संख्या 20 हो सकती है। यहां कुल सीटें 40 से 60 तक पहुंच सकती है। एमपी में 15 महिला आरक्षित सीटें बढ़ सकती हैं। तमिलनाडु में 20 और दिल्ली में 4 यानी महिला सीटें होंगी। झारखंड में 7 महिला आरक्षित सीटें बढ़ने का अनुमान है।

1931 में पहली बार महिला आरक्षण का मुद्दा उठा था
• 1931: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। तब प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने महिलाओं को पुरुषों पर तरजीह देने के बजाय समान राजनीतिक स्थिति की मांग पर जोर दिया।
• 1971: भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति का गठन किया गया। इसके कई सदस्यों ने विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध किया।
• 1974: महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं की स्थिति पर एक समिति ने शिक्षा और समाज कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की गई थी।
• 1988: महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perpective Plan) ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी।
• 1993: 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया है।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम-2023
1998: 13 जुलाई को अटल की एनडीए सरकार ने लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश की, लेकिन RJD सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने बिल की कॉपी फाड़ दी।
1998: 14 जुलाई को सरकार ने लोकसभा में दोबारा पेश करने की कोशिश की, लेकिन हंगामे और विरोध की वजह से पेश नहीं हो सका।
1998: 11 दिसंबर को लोकसभा में बिल पेश करने की कोशिश हुई, लेकिन सपा सांसद दरोगा प्रसाद स्पीकर पोडियम तक पहुंच गए।
1998: 23 दिसंबर को अटल सरकार बिल पेश करने में कामयाब रही। हालांकि JDU ने विरोध कर दिया और पारित नहीं हो सका।
2000: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2002: अटल सरकार ने पेश करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
2003: जुलाई में बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी ने सर्वदलीय बैठक में आम सहमति बनाने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।
2008: मनमोहन सरकार ने 6 मई को राज्यसभा में विधेयक पेश किया। खूब हंगामा हुआ। स्टैंडिंग कमेटी को भेजा गया।
2010: 9 मार्च को राज्यसभा में विधेयक पेश किया गया और दो तिहाई बहुमत से पारित हो गया। लेकिन लोकसभा में पेश नहीं हो पाया। बिल लैप्स हो गया।
2023: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के रूप में विधेयक संसद में पेश किया। कुशल प्रबंधन के चलते यह लोकसभा और राज्यसभा दोनों में ही पारित हो गया। 106वा संविधान संशोधन और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद यह कानून बना।

मोदी की सुरक्षा कवच नारीशक्ति ने बिहार विधानसभा चुनाव में पावर-फैक्टर बनकर लिखी ऐतिहासिक कहानी


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चार आधार स्तंभों में से एक नारीशक्ति ने बिहार विधानसभा चुनाव में सबसे अहम भूमिका निभाई है। पीएम मोदी मातृशक्ति को हमेशा अपना सुरक्षा कवच कहते रहे हैं। बिहार की इन्हीं माताओं-बहनों और बेटियों ने पीएम मोदी के आह्वान पर लोकतंत्र के महायज्ञ में अपने वोट की बढ़चढ़ कर आहूति दी। पुरुषों की तुलना में सात प्रतिशत ज्यादा मतदान करके उन्होंने भाजपा-एनडीए का प्रचंड विजय सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त किया। यही वजह रही की इस ऐतिहासिक जीत में भाजपा का उम्मीदवारों के मुकाबले विनिंग परसेंटेज अब तक के चुनावों में सबसे ज्यादा रहा। दरअसल, महिलाओं पर पीएम मोदी के भाषण और नारों का जबरदस्त असर हुआ। इसलिए उन्होंने जंगलराज और कट्टा सरकार को चुनने के बजाए सुशासन और समृद्धि की डबल इंजन सरकार को चुना।

मतदान में महिलाओं की लंबी-लंबी कतारों ने भाजपा की जीत सुनिश्चित की

बिहार विधानसभा चुनाव में महिलाओं नई पावर बनकर उभरी हैं। चुनाव की असली कहानी अब सिर्फ पार्टियों या जातियों तक सीमित नहीं रही। इस बार बिहार चुनाव में महिला और युवा मतदाताओं ने बड़ी भूमिका निभाई है। उनके बढ़ते प्रभाव ने चुनावी परिदृश्य बदल दिया है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का नतीजा आते ही यह तय हो गया है कि महिलाएं किस कदर भाजपा-एनडीए की जीत की भागीदार बनीं। चुनाव में सबसे बड़ा बदलाव महिला मतदाताओं में देखने को मिला। मतदान के लिए उनकी लंबी-लंबी कतारों ने ही भाजपा की जीत सुनिश्चित कर दी थी। यही कारण है कि अब चुनाव के नतीजे इन्हीं वोटरों के इर्द-गिर्द घूमते दिख रहे हैं।
महिलाशक्ति ने आठ प्रतिशत अधिक वोट कर अपना कर्तव्य निभाया
बीते दशकों में बिहार में चुनाव अक्सर जातिगत समीकरणों और पुराने गठबंधनों पर आधारित होते थे, लेकिन 2025 में महिलाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई। चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि कई क्षेत्रों में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों के बराबर या उनसे ज्यादा भी रहा है। यही वजह रही कि विधानसभा चुनाव में पुरुष मतदाताओं का मतदान तो करीब 63 प्रतिशत ही रहा। लेकिन महिला मतदाताओं ने उनसे बढ़कर चुनाव के महोत्सव में हिस्सा लिया। इसी के चलते उनका कुल मतदान लगभग 71 प्रतिशत रहा। यानि महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में करीब आठ प्रतिशत ज्यादा मतदान किया।
मतदान के दोनों ही चरणों में पुरुषों से आगे रहीं महिलाओं
बिहार में छह नवंबर को हुए पहले चरण में कुल 65.08 प्रतिशत मतदान हुआ, जिसमें महिलाओं का प्रतिशत 69.04 और पुरुषों का प्रतिशत 61.56 रहा। यानी महिलाओं का मतदान प्रतिशता ज्यादा रहा। दूसरे चरण में मतदान प्रतिशत बढ़कर 68.76 हो गया, जिसमें महिलाओं का प्रतिशत 74.03 और पुरुषों का प्रतिशत 64.1 रहा। दोनों चरणों के कुल आंकड़े देखें तो महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 71.6 रहा, जबकि पुरुषों का प्रतिशत 62.8 रहा। राज्य के कुल 7,45,26,858 मतदाताओं में से 3,51,45,791 महिला और 3,93,79,366 पुरुष मतदाता थे।
महिलाएं सुरक्षित जीवन और युवा चाहते हैं नए-नए अवसर
महिला और युवा दोनों ही स्थिरता, अवसर और सुरक्षा चाहते हैं। उनके लिए शासन का मतलब सिर्फ प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष लाभ होना चाहिए। यही कारण है कि उन्होंने उस पार्टी को चुना, जो अपने एजेंडे में विकास, कल्याण, सुरक्षा और रोजगार पर जोर दे रही है। यह बदलाव न केवल महिला मतदाताओं की प्राथमिकताओं को दर्शाता है, बल्कि राजनीतिक रणनीतियों को भी भविष्य में नया आकार देने वाला है। भाजपा की तरह अब अन्य दलों को भी विकास और सुशासन की राजनीति पर जोर देना ही होगा।
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महिला और युवा मतदाताओं को अपने अभियान का केंद्र बनाया
इस बार भाजपा और आरजेडी समेत एनडीए के दलों ने महिला और युवा मतदाताओं को अपने अभियान का केंद्र बनाया। सत्तारूढ़ गठबंधन ने महिला कल्याण और छात्रवृत्ति योजनाओं को प्रमुखता दी, जबकि विपक्षी दल युवाओं के रोजगार और पलायन रोकने की बात करते रहे। वहीं उम्मीदवारों की सूची में महिला प्रतिनिधियों की संख्या भी बढ़ी है। सरकारी योजनाओं जैसे मुफ्त साइकिल, छात्रवृत्ति और महिलाओं के लिए खाते में नकद 10 हजार के लाभ ने उन्हें सीधे राजनीतिक प्रक्रिया और एनडीए से जोड़ा है। कह सकते हैं कि अब महिलाएं केवल एक सहायक मतदाता समूह नहीं, बल्कि निर्णायक ताकत बन गई हैं।