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आखिर सोनिया नेहरू के पत्र क्यों नहीं वापस कर रही? सोनिया गाँधी के पास मौजूद इन दस्तावेजों में दफन है क्या राज?

             सोनिया गाँधी के पास है जवाहरलाल नेहरू के 51 बक्से पत्र (फोटो साभार : RGF/News18)
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ’51 बक्से पत्रों’ को लेकर एक बार फिर राजनीति गर्मा गई है। सोनिया गाँधी के पास मौजूद नेहरू-एडविना समेत कई हस्तियों के पत्रों के कॉन्टेंट को लेकर अक्सर चर्चा होती है। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) लंबे वक्त से इन पत्रों को माँग रहा है लेकिन कॉन्ग्रेस इनकी मौजूदगी से इनकार करती रही है। अब कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में नेहरू के पत्रों से जुड़े सरकार के एक जवाब के बाद खुद की ‘जीत’ की डुगडुगी बजाकर बीजेपी पर आरोप लगा दिया। लेकिन कॉन्ग्रेस की यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी और केंद्र सरकार ने सारा सच सामने रखते हुए कॉन्ग्रेस की खुशी पर पानी फेर दिया। अब इस मामले को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

कैसे शुरु हुआ विवाद?

हालिया विवाद की शुरुआत हुई 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में बीजेपी सांसद संबित पात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल से। संबित ने संस्कृति मंत्रालय से पूछा कि ‘क्या वर्ष 2025 में पीएमएमएल के वार्षिक निरीक्षण के दौरान भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कतिपय दस्तावेज संग्रहालय से गायब पाए गए हैं। इसके जबाव में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि ‘निरीक्षण के दौरान संग्रहालय से जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कोई दस्तावेज गायब नहीं पाया गया है’।

कॉन्ग्रेस का ‘मनगढ़ंत’ नैरेटिव: ‘गायब’ शब्द के सहारे बचने की कोशिश

कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दिए गए एक लिखित उत्तर को अपनी ढाल बनाया है। बस, इसी एक शब्द ‘गायब’ को पकड़कर कॉन्ग्रेस ने ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया कि भाजपा का प्रोपेगेंडा धराशायी हो गया।
कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने X पर (ट्वीट) पोस्ट कर पूछा, “कल आखिरकार लोकसभा में सच्चाई सामने आ ही गई। क्या अब माफी माँगी जाएगी?”

संस्कृति मंत्रालय का ‘पोस्ट वार’: कॉन्ग्रेस को दिखाया आईना

कॉन्ग्रेस के शोर के बीच संस्कृति मंत्रालय ने सिलसिलेवार पोस्ट के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। मंत्रालय ने बताया कि 29 अप्रैल 2008 को सोनिया गाँधी के प्रतिनिधि एमवी राजन ने बकायदा पत्र लिखकर माँग की थी कि सोनिया गाँधी पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सभी निजी पारिवारिक पत्र और नोट्स वापस लेना चाहती हैं।
इसके बाद, 5 मई 2008 को 51 कार्टन (बक्से) भरकर नेहरू पेपर्स सोनिया गाँधी के आवास पर भेज दिए गए थे। मंत्रालय ने यह भी लिखा कि PMML पेपर्स को वापस पाने के लिए सोनिया गाँधी के ऑफिस के साथ लगातार संपर्क में है।
मंत्रालय ने दो तारीख ’28 जनवरी 2025 और 3 जुलाई 2025′ को बताते हुए लिखा कि नेहरू पेपर्स PMML से ‘गायब’ नहीं हैं क्योंकि उनकी लोकेशन (whereabouts) का पता है- वे सोनिया गाँधी के पास हैं।
मंत्रालय का सबसे कड़ा प्रहार यह था कि ये दस्तावेज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री से संबंधित हैं और राष्ट्र की ‘दस्तावेजी विरासत’ हैं, न कि किसी की ‘निजी संपत्ति’ (Private Property)। इनका PMML की कस्टडी में होना और नागरिकों एवं विद्वानों के लिए उपलब्ध होना शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इन 51 बक्सों में आखिर क्या है?

विवाद की सबसे बड़ी जड़ वे दस्तावेज हैं जो इन 51 बक्सों के भीतर कैद हैं। PMML के रिकॉर्ड बताते हैं कि इन कागजातों में नेहरू जी द्वारा विभिन्न महान हस्तियों को लिखे गए पत्र और नोट्स शामिल हैं। संबित पात्रा ने ट्वीट कर पूछा कि आखिर एडविना माउंटबेटन को लिखे गए उन पत्रों में ऐसा क्या है जिसे ‘सेंसर’ करने की जरूरत पड़ गई? एडविना के अलावा, इन बक्सों में जयप्रकाश नारायण, अल्बर्ट आइंस्टीन, अरुणा आसफ अली, विजयलक्ष्मी पंडित और बाबू जगजीवन राम के साथ हुए पत्राचार भी शामिल हैं।
इतिहासकारों का मानना है कि इन पत्रों में देश के विभाजन, तत्कालीन कूटनीति और नेहरू के व्यक्तिगत विचारों के ऐसे पहलू हो सकते हैं जो कॉन्ग्रेस के बनाए ‘महिमा मंडित’ इतिहास को चुनौती दे सकें। अहमदाबाद के इतिहासकार रिजवान कादरी ने पत्र लिखकर इन पत्रों तक पहुँच माँगी। उनका कहना है कि गाँधी जी और पटेल के रिकॉर्ड तो व्यवस्थित हैं, लेकिन नेहरू के रिकॉर्ड का एक बड़ा हिस्सा (जो सोनिया गाँधी के पास है) शोध के लिए उपलब्ध नहीं है। क्या कॉन्ग्रेस डरती है कि अगर ये 51 बक्से सार्वजनिक हुए, तो नेहरू की वह छवि धूमिल हो जाएगी जो दशकों से पेश की जाती रही है?

पहले भी हुआ है विवाद: क्या इतिहास पर किसी एक परिवार का एकाधिकार है?

नेहरू के दस्तावेजों पर कब्जे का विवाद कोई नया नहीं है। 1971 के बाद इंदिरा गाँधी ने ये कागजात नेहरू मेमोरियल को सौंपे थे, लेकिन एक शर्त के साथ। शर्त यह थी कि इंदिरा गाँधी ही इन दस्तावेजों की ‘मालकिन’ रहेंगी और उनकी अनुमति के बिना कोई भी शोधकर्ता इन्हें देख नहीं पाएगा।
1984 में इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद सोनिया गाँधी इन दस्तावेजों की ‘ट्रस्टी-गार्जियन’ बन गईं। PMML सोसाइटी अब इस पर कानूनी राय ले रही है कि क्या कोई दान की गई चीज इस तरह वापस ली जा सकती है और क्या राष्ट्रीय इतिहास के दस्तावेजों पर किसी परिवार का मालिकाना हक हो सकता है।
हाल ही में ‘द नेहरू आर्काइव‘ के नाम से एक डिजिटल प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें नेहरू के 104 खंडों के कार्यों को ऑनलाइन किया गया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सोनिया गाँधी के पास रखे 51 बक्से वापस नहीं आते, तब तक यह आर्काइव अधूरा रहेगा। भाजपा का तर्क है कि कॉन्ग्रेस ने हमेशा इतिहास को ‘कंट्रोल’ करने की कोशिश की है।
नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय (NMML) का नाम बदलकर प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) करने पर भी कॉन्ग्रेस ने खूब विरोध किया था, क्योंकि वे नेहरू को केवल एक परिवार तक सीमित रखना चाहते हैं, जबकि सरकार उन्हें देश के सभी प्रधानमंत्रियों की विरासत का हिस्सा मानती है।

माफी किसे माँगनी चाहिए?

कॉन्ग्रेस ने ‘गायब’ शब्द के पीछे छिपकर जिस तरह भाजपा से माफी की माँग की है, वह ‘चोरी और ऊपर से सीनाजोरी’ जैसा मामला है। सरकार के जवाब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दस्तावेज चोरी नहीं हुए, बल्कि सोनिया गाँधी ने उन्हें ‘होल्ड’ कर रखा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या देश के पहले प्रधानमंत्री के पत्र किसी निजी अलमारी में बंद होने चाहिए या राष्ट्रीय पुस्तकालय में?
अगर कॉन्ग्रेस पारदर्शी है, तो उसे ये 51 बक्से तुरंत वापस करने चाहिए। माफी भाजपा को नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस को माँगनी चाहिए जिसने 2008 में राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेजों को एक निजी आवास की संपत्ति बना दिया।

क्या सोनिया गाँधी पर दर्ज होगा चोरी का मुकदमा? नेहरू के एडविना-अरुणा अली वाले पत्रों पर एक्शन लेगा PMML; UPA काल में 51 डिब्बों में भर ले गए थे दस्तावेज

                                         सोनिया गाँधी प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार - डैल-ई)
सत्ता से बाहर होते ही कांग्रेस द्वारा ऊलजलूल बोलने की वजह है। अब इनकी चोरियां सामने आने पर उनसे ध्यान भटकाने के सब ड्रामा किया जा रहा है। जिन दस्तावेजों के 
प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) सोसाइटी से लेकर जाने का मामला तूल पकड़ने वाला है। कहते हैं ये वो दस्तावेज है जो नेहरू-एडविना की प्रेम कहानी बयां करते हैं। जिनका जिक्र जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव M.O.Mathai ने अपनी पुस्तक में भी किया है। मथाई के अनुसार इन्ही पत्रों की वजह से मथाई और इंदिरा के बीच प्रेम परवान चढ़ा था। इसका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक के अध्याय 13 में किया है।(नीचे दिए लिंक का अवलोकन करें) दरअसल कांग्रेस ने देश को अपनी बपौती समझ रखा था। कोई पूछने की हिम्मत नहीं कर सकता था, लेकिन अब सरकार हर काम की जाँच कर कांग्रेस की चोरियां पकड़ रही है।     

कांग्रेस नेता सोनिया गाँधी पर जल्द ही चोरी का मुकदमा दर्ज हो सकता है। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) सोसाइटी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़े कुछ निजी दस्तावेजों को वापस पाने के लिए इस एक्शन पर विचार कर रही है। ये दस्तावेज वर्ष 2008 में UPA सरकार के दौरान हटाए गए थे।

इस मामले में 23 जून, 2025 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अध्यक्षता में एक बैठक हुई थी। यह बैठक PMML सोसाइटी की थी। PMML की यह वार्षिक बैठक थी। इस बैठक में इस मुद्दे पर भी गंभीर चर्चा की गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बैठक में शामिल सदस्यों के बीच सहमति बनी कि अब इस मामले को कानूनी रास्ते से सुलझाया जाना चाहिए।

PMML ट्रस्ट के सूत्रों ने बताया कि वे इन दस्तावेजों की कथित ‘चोरी’ को लेकर कानूनी जाँच पर विचार कर रहे हैं। PMML के लोगों का कहना है कि ये दस्तावेज पहले दान किए गए थे और इसलिए ये अब कानूनी रूप से संस्थान की संपत्ति हैं।

अगर यह साबित होता है कि इन दस्तावेजों को गैरकानूनी तरीके से संस्थान के कब्जे से हटाया गया था, तो सोनिया गाँधी को इस मामले में कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। मामले में गंभीर जाँच होने की संभावना है, जो सोनिया गाँधी पर शिकंजा बढ़ाएगी।

UPA काल में 51 डिब्बों में भर ले गए थे दस्तावेज

इस पूरे विवाद की जड़ पंडित जवाहरलाल नेहरू के निजी संग्रह से जुड़े उन ऐतिहासिक दस्तावेजों में है, जिनमें कई मशहूर हस्तियों के साथ उनकी पत्रों से बातचीत शामिल है। इनमें एडविना माउंटबेटन, अल्बर्ट आइंस्टीन, जयप्रकाश नारायण, विजया लक्ष्मी पंडित, बाबू जगजीवन राम और अरुणा आसफ अली जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

ये दस्तावेज 1971 से लेकर 2008 तक नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (NMML) में रखे गए थे। NMML का नाम बदल कर अब प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) हो गया है। यह पूरा विवाद वर्ष 2008 में चालू हुआ था। तब यह कागज कथित तौर प 51 बक्सों में पैक कर सोनिया गाँधी द्वारा संग्रहालय से निकाल लिए गए।

बताया गया है कि इनमें वे दस्तावेज भी शामिल थे जिन्हें पहले इंदिरा गाँधी और बाद में सोनिया गाँधी ने NMML को दान किया था, क्योंकि गाँधी परिवार उत्तराधिकारी के रूप में काम कर रहा था। PMML इससे पहले कई बार सोनिया गाँधी के कार्यालय को कई बार पत्र भेजकर उन दस्तावेजों को लौटाने की अपील कर चुका है।

गुजरात के इतिहासकार और PMML सोसाइटी के सदस्य प्रोफेसर रिजवान कादरी ने भी सितंबर 2024 में सोनिया गाँधी और फिर दिसंबर, 2024 में राहुल गाँधी को पत्र लिखे। उन्होंने निवेदन किया कि अगर दस्तावेज वापस नहीं दिए जा सकते, तो कम से कम उनकी फोटोकॉपी या डिजिटल स्कैन ही भेज दिए जाएँ।

लगातार कहने के बावजूद सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने कोई जवाब नहीं दिया है। इसके चलते यह मामला काफी गंभीर हो गया है। अब PMML इस मामले में कानूनी रास्ते तलाश रहा है और जल्द एक्शन ले सकता है।

पीएम मोदी वाली बैठक में भी हुई वापसी की माँग

प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) सोसाइटी की 47वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) हाल ही में तीन मूर्ति भवन में आयोजित की गई। इस बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की। इसमें सोसाइटी के उपाध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, निर्मला सीतारमण, धर्मेंद्र प्रधान और अश्विनी वैष्णव सहित कई प्रमुख नेता शामिल हुए।

अन्य प्रमुख सदस्यों में भाजपा नेता स्मृति ईरानी, गीतकार प्रसून जोशी और रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अश्विनी लोहानी भी मौजूद थे। लोहानी अब PMML के निदेशक के रूप में कार्य कर रहे हैं। बैठक में इस मुद्दे पर दोबारा चर्चा की गई। यह इससे पहल फरवरी 2024 की AGM में उठाया गया था।

PMML के सदस्यों का मानना है कि ये दस्तावेज सिर्फ परिवार की निजी संपत्ति नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय धरोहर हैं और इन्हें संस्थान के पास सुरक्षित रहना चाहिए। इस पर सभी सदस्यों की आम सहमति बनी।

फरवरी की बैठक के बाद इस मामले में कानूनी सलाह ली गई और इसी के आधार पर सोनिया गाँधी के कार्यालय को एक औपचारिक पत्र भेजा गया। इसमें पहली बार आधिकारिक तौर पर यह रिकॉर्ड में रखा गया कि दस्तावेज वापस ले लिए गए हैं और उन्हें लौटाने का अनुरोध किया गया है। हालाँकि, गाँधी परिवार की ओर से अभी तक कोई जवाब नहीं आया।

अब PMML सोसाइटी के सदस्य 2014 से पहले की प्रशासनिक चूक को सुधारने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, ताकि नेहरू से जुड़े ये ऐतिहासिक दस्तावेज दोबारा सार्वजनिक संग्रह में आ सकें।

ट्रस्ट ने बताया- दान किए कागज नहीं हो सकते वापस

प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) ट्रस्ट अब कानूनी सलाह पर विचार कर रहा है। इसके अनुसार, एक बार जो दस्तावेज दान कर दिए जाते हैं, उनको वापस नहीं लिया जा सकता। इसलिए ट्रस्ट का मानना है कि नेहरू गाँधी परिवार द्वारा दान किए गए दस्तावेज अब भी संग्रहालय की वैध संपत्ति हैं।

बैठक में इन कागजों के मालिकाना हक़, इनके संरक्षण, कॉपीराइट और इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को शोधकर्ताओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने से जुड़ी चिंताओं पर भी चर्चा हुई। खासतौर पर नेहरू और एडविना माउंटबेटन के बीच हुए पत्राचार की पूरी जानकारी रखने पर जोर दिया गया।

सदस्यों ने यह भी माँग की कि जो दस्तावेज संग्रहालय से लिए गए थे, उनका फोरेंसिक ऑडिट कराया जाए ताकि यह साफ हो सके कि कहीं कोई अहम कागज गुम तो नहीं हो गया।

जनवरी 2025 में PMML की कार्यकारी परिषद का पुनर्गठन हुआ था। इसमें कई नए और प्रमुख लोगों को शामिल किया गया था। स्मृति ईरानी, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन, फिल्म निर्देशक शेखर कपूर और कलाकार वासुदेव कामथ को इसमें सदस्य बनाया गया था।

नृपेंद्र मिश्रा को परिषद का अध्यक्ष बनाए रखा गया और उन्हें 5 साल का नया कार्यकाल दिया गया। इस बैठक में सिर्फ नेहरू पेपर्स का मामला ही नहीं उठा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशभर के संग्रहालयों की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए दो नए सुझाव भी दिए।

उन्होंने पूरे देश में ‘म्यूजियम मैप’ बनाने और सभी संग्रहालयों का एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही उन्होंने आपातकाल की 50वीं वर्षगाँठ के मौके पर उससे जुड़े सभी कानूनी दस्तावेजों और घटनाओं को इकट्ठा करने की योजना भी पेश की।

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जब हम पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की बात करते हैं, तो कई कांग्रेसी कहते हैं कि
 

भाजपा ने दस्तावेजों को बताया ऐतिहासिक

दिसंबर 2024 में भाजपा सांसद संबित पात्रा ने नेहरू से जुड़े दस्तावेजों के मामले पर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने साफ कहा कि ये सिर्फ पारिवारिक पत्र नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेज हैं। पात्रा ने यह भी कहा कि जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उन कागजों में क्या लिखा है।

यह मुद्दा पहले भी संसद में उठ चुका है, जिससे साफ होता है कि अगर सोनिया गाँधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू होती है, तो मामला और तूल पकड़ सकता है।