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ऑस्ट्रेलिया लौटाएगा तमिलनाडु के मंदिरों की 3 दुर्लभ कलाकृतियाँ: भद्रकाली का त्रिशूल, नंदी की मूर्ति और 6 मुख वाले कार्तिकेय

                             भद्रकाली, नंदी और कार्तिकेय की दुर्लभ प्रतिमाएँ (फोटो साभार - एनडीटीवी)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान भारत के लिए एक बड़ी सांस्कृतिक खुशखबरी सामने आई है। ऑस्ट्रेलिया ने घोषणा की है कि वह भारत की तीन प्राचीन धार्मिक कलाकृतियाँ वापस लौटाएगा।

इनमें देवी भद्रकाली की छवि वाला धातु का त्रिशूल, भगवान शिव के वाहन नंदी की पत्थर की मूर्ति और छह सिर वाले भगवान कार्तिकेय की दुर्लभ पत्थर की प्रतिमा शामिल हैं। इन सभी धरोहरों का संबंध तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों से है।

ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने कहा कि यह फैसला दोनों देशों के बीच दोस्ती और सांस्कृतिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है।

ऑस्ट्रेलिया ने क्यों लौटाईं ये प्राचीन धरोहरें?

ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने बताया कि ये कलाकृतियाँ पहले ऑस्ट्रेलिया की नेशनल गैलरी और न्यू साउथ वेल्स की आर्ट गैलरी के संग्रह में रखी गई थीं। अब इन्हें स्वेच्छा से भारत को लौटाया जाएगा। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करना और ऐतिहासिक धरोहरों को उनके मूल स्थान तक पहुँचाना ऑस्ट्रेलिया की जिम्मेदारी है।

भारत लौटाई जा रही धरोहरों में सबसे खास देवी भद्रकाली की आकृति वाला धातु का त्रिशूल है, जो तमिलनाडु के कोल्लुमंगुडी स्थित श्री काशी विश्वनाथ स्वामी मंदिर से जुड़ा माना जाता है और 13वीं से 16वीं शताब्दी का बताया जाता है।

इसके अलावा नंदी की पत्थर की मूर्ति भी इसी मंदिर से संबंधित है। वहीं तीसरी प्रतिमा चोल काल की छह सिर वाले भगवान कार्तिकेय की है, जो तंजावुर जिले के मनमबाड़ी स्थित नागनाथस्वामी मंदिर से जुड़ी मानी जाती है।

मोदी-अल्बनीज की मुलाकात में सांस्कृतिक रिश्तों पर भी जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने मेलबर्न में तीसरे भारत-ऑस्ट्रेलिया वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात की। दोनों नेताओं ने पहले आमने-सामने बातचीत की और फिर प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता हुई।

इस दौरान दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी के छह वर्ष पूरे होने पर संतोष जताया गया। साथ ही बढ़ते सांस्कृतिक आदान-प्रदान और लोगों के बीच मजबूत होते संबंधों पर भी चर्चा हुई।

इस मौके पर ऑस्ट्रेलिया ने एक और महत्वपूर्ण घोषणा की। अल्बनीज ने बताया कि चेन्नई के सरकारी संग्रहालय में सुरक्षित ऑस्ट्रेलिया के ‘फर्स्ट नेशंस’ समुदाय के एक पूर्वज के अवशेष भी उनके पारंपरिक संरक्षकों को वापस सौंपे जाएँगे।

उन्होंने कहा कि यह कदम न्याय, सम्मान, मेल-मिलाप और ऐतिहासिक घावों को भरने की दिशा में महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस प्रक्रिया में सहयोग का भरोसा दिया। दोनों नेताओं ने कहा कि सांस्कृतिक धरोहरों और ऐतिहासिक विरासत का सम्मान भारत और ऑस्ट्रेलिया के रिश्तों को भविष्य में और मजबूत बनाएगा।

आखिर सोनिया नेहरू के पत्र क्यों नहीं वापस कर रही? सोनिया गाँधी के पास मौजूद इन दस्तावेजों में दफन है क्या राज?

             सोनिया गाँधी के पास है जवाहरलाल नेहरू के 51 बक्से पत्र (फोटो साभार : RGF/News18)
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ’51 बक्से पत्रों’ को लेकर एक बार फिर राजनीति गर्मा गई है। सोनिया गाँधी के पास मौजूद नेहरू-एडविना समेत कई हस्तियों के पत्रों के कॉन्टेंट को लेकर अक्सर चर्चा होती है। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) लंबे वक्त से इन पत्रों को माँग रहा है लेकिन कॉन्ग्रेस इनकी मौजूदगी से इनकार करती रही है। अब कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में नेहरू के पत्रों से जुड़े सरकार के एक जवाब के बाद खुद की ‘जीत’ की डुगडुगी बजाकर बीजेपी पर आरोप लगा दिया। लेकिन कॉन्ग्रेस की यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी और केंद्र सरकार ने सारा सच सामने रखते हुए कॉन्ग्रेस की खुशी पर पानी फेर दिया। अब इस मामले को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

कैसे शुरु हुआ विवाद?

हालिया विवाद की शुरुआत हुई 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में बीजेपी सांसद संबित पात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल से। संबित ने संस्कृति मंत्रालय से पूछा कि ‘क्या वर्ष 2025 में पीएमएमएल के वार्षिक निरीक्षण के दौरान भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कतिपय दस्तावेज संग्रहालय से गायब पाए गए हैं। इसके जबाव में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि ‘निरीक्षण के दौरान संग्रहालय से जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कोई दस्तावेज गायब नहीं पाया गया है’।

कॉन्ग्रेस का ‘मनगढ़ंत’ नैरेटिव: ‘गायब’ शब्द के सहारे बचने की कोशिश

कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दिए गए एक लिखित उत्तर को अपनी ढाल बनाया है। बस, इसी एक शब्द ‘गायब’ को पकड़कर कॉन्ग्रेस ने ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया कि भाजपा का प्रोपेगेंडा धराशायी हो गया।
कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने X पर (ट्वीट) पोस्ट कर पूछा, “कल आखिरकार लोकसभा में सच्चाई सामने आ ही गई। क्या अब माफी माँगी जाएगी?”

संस्कृति मंत्रालय का ‘पोस्ट वार’: कॉन्ग्रेस को दिखाया आईना

कॉन्ग्रेस के शोर के बीच संस्कृति मंत्रालय ने सिलसिलेवार पोस्ट के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। मंत्रालय ने बताया कि 29 अप्रैल 2008 को सोनिया गाँधी के प्रतिनिधि एमवी राजन ने बकायदा पत्र लिखकर माँग की थी कि सोनिया गाँधी पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सभी निजी पारिवारिक पत्र और नोट्स वापस लेना चाहती हैं।
इसके बाद, 5 मई 2008 को 51 कार्टन (बक्से) भरकर नेहरू पेपर्स सोनिया गाँधी के आवास पर भेज दिए गए थे। मंत्रालय ने यह भी लिखा कि PMML पेपर्स को वापस पाने के लिए सोनिया गाँधी के ऑफिस के साथ लगातार संपर्क में है।
मंत्रालय ने दो तारीख ’28 जनवरी 2025 और 3 जुलाई 2025′ को बताते हुए लिखा कि नेहरू पेपर्स PMML से ‘गायब’ नहीं हैं क्योंकि उनकी लोकेशन (whereabouts) का पता है- वे सोनिया गाँधी के पास हैं।
मंत्रालय का सबसे कड़ा प्रहार यह था कि ये दस्तावेज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री से संबंधित हैं और राष्ट्र की ‘दस्तावेजी विरासत’ हैं, न कि किसी की ‘निजी संपत्ति’ (Private Property)। इनका PMML की कस्टडी में होना और नागरिकों एवं विद्वानों के लिए उपलब्ध होना शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इन 51 बक्सों में आखिर क्या है?

विवाद की सबसे बड़ी जड़ वे दस्तावेज हैं जो इन 51 बक्सों के भीतर कैद हैं। PMML के रिकॉर्ड बताते हैं कि इन कागजातों में नेहरू जी द्वारा विभिन्न महान हस्तियों को लिखे गए पत्र और नोट्स शामिल हैं। संबित पात्रा ने ट्वीट कर पूछा कि आखिर एडविना माउंटबेटन को लिखे गए उन पत्रों में ऐसा क्या है जिसे ‘सेंसर’ करने की जरूरत पड़ गई? एडविना के अलावा, इन बक्सों में जयप्रकाश नारायण, अल्बर्ट आइंस्टीन, अरुणा आसफ अली, विजयलक्ष्मी पंडित और बाबू जगजीवन राम के साथ हुए पत्राचार भी शामिल हैं।
इतिहासकारों का मानना है कि इन पत्रों में देश के विभाजन, तत्कालीन कूटनीति और नेहरू के व्यक्तिगत विचारों के ऐसे पहलू हो सकते हैं जो कॉन्ग्रेस के बनाए ‘महिमा मंडित’ इतिहास को चुनौती दे सकें। अहमदाबाद के इतिहासकार रिजवान कादरी ने पत्र लिखकर इन पत्रों तक पहुँच माँगी। उनका कहना है कि गाँधी जी और पटेल के रिकॉर्ड तो व्यवस्थित हैं, लेकिन नेहरू के रिकॉर्ड का एक बड़ा हिस्सा (जो सोनिया गाँधी के पास है) शोध के लिए उपलब्ध नहीं है। क्या कॉन्ग्रेस डरती है कि अगर ये 51 बक्से सार्वजनिक हुए, तो नेहरू की वह छवि धूमिल हो जाएगी जो दशकों से पेश की जाती रही है?

पहले भी हुआ है विवाद: क्या इतिहास पर किसी एक परिवार का एकाधिकार है?

नेहरू के दस्तावेजों पर कब्जे का विवाद कोई नया नहीं है। 1971 के बाद इंदिरा गाँधी ने ये कागजात नेहरू मेमोरियल को सौंपे थे, लेकिन एक शर्त के साथ। शर्त यह थी कि इंदिरा गाँधी ही इन दस्तावेजों की ‘मालकिन’ रहेंगी और उनकी अनुमति के बिना कोई भी शोधकर्ता इन्हें देख नहीं पाएगा।
1984 में इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद सोनिया गाँधी इन दस्तावेजों की ‘ट्रस्टी-गार्जियन’ बन गईं। PMML सोसाइटी अब इस पर कानूनी राय ले रही है कि क्या कोई दान की गई चीज इस तरह वापस ली जा सकती है और क्या राष्ट्रीय इतिहास के दस्तावेजों पर किसी परिवार का मालिकाना हक हो सकता है।
हाल ही में ‘द नेहरू आर्काइव‘ के नाम से एक डिजिटल प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें नेहरू के 104 खंडों के कार्यों को ऑनलाइन किया गया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सोनिया गाँधी के पास रखे 51 बक्से वापस नहीं आते, तब तक यह आर्काइव अधूरा रहेगा। भाजपा का तर्क है कि कॉन्ग्रेस ने हमेशा इतिहास को ‘कंट्रोल’ करने की कोशिश की है।
नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय (NMML) का नाम बदलकर प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) करने पर भी कॉन्ग्रेस ने खूब विरोध किया था, क्योंकि वे नेहरू को केवल एक परिवार तक सीमित रखना चाहते हैं, जबकि सरकार उन्हें देश के सभी प्रधानमंत्रियों की विरासत का हिस्सा मानती है।

माफी किसे माँगनी चाहिए?

कॉन्ग्रेस ने ‘गायब’ शब्द के पीछे छिपकर जिस तरह भाजपा से माफी की माँग की है, वह ‘चोरी और ऊपर से सीनाजोरी’ जैसा मामला है। सरकार के जवाब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दस्तावेज चोरी नहीं हुए, बल्कि सोनिया गाँधी ने उन्हें ‘होल्ड’ कर रखा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या देश के पहले प्रधानमंत्री के पत्र किसी निजी अलमारी में बंद होने चाहिए या राष्ट्रीय पुस्तकालय में?
अगर कॉन्ग्रेस पारदर्शी है, तो उसे ये 51 बक्से तुरंत वापस करने चाहिए। माफी भाजपा को नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस को माँगनी चाहिए जिसने 2008 में राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेजों को एक निजी आवास की संपत्ति बना दिया।

ब्रिटेन : भारत आएगा छत्रपति शिवाजी का ‘वाघ नघ’, इसी से अफजल खान को मौत के घाट उतारा था

                    ब्रिटेन से भारत आएगा छत्रपति शिवाजी महाराज का वाघ नख (फोटो साभार: टीओआई)
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चहुओर विरोध किए जाने के कारण सामंने आते रहे हैं, क्योकि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से जितनी तेजी से विदेशों में पहुंची भारतीय धरोहरों का वापस आने से
 किसी भी तुष्टिकरणकर्ता और छद्दम धर्म-निरपेक्ष से बर्दास्त नहीं हो रहा, जिस कारण इनकी नींद, रोटी और पानी तक हराम कर दिया है। ये तुष्टिकरण और छद्दम धर्म-निरपेक्ष गैंग तो भारतीय संस्कृति को धूमिल करने में व्यस्त थे, लेकिन अब इनके गंदे इरादे उजागर हो रहे हैं। जनता को महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के नाम से भ्रमित किया जा रहा है, जबकि ये मुद्दे भी उतने ही पुराने हो चुके हैं, जितनी स्वतंत्र भारत में बनी सरकारें। देश में ऐसा कौनसा चुनाव हुआ है जिसमे ये मुद्दे न उठाए गए हो? 

छत्रपति शिवाजी महाराज के खंजर वाघ नख (Wagh Nakh) की घर वापसी होने वाली है। उन्होंने इसका ही उपयोग कर 1659 में बीजापुर सल्तनत के सेनापति अफजल खान को मौत के घाट उतारा था। बाद में अंग्रेज गिफ्ट के तौर पर इसे ब्रिटेन लेकर चले गए। लेकिन अब खबर आ रही है कि ब्रिटेन इसे भारत को लौटाने के लिए तैयार हो गया है।

महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री सुधीर मुनगंटीवार सितंबर 2023 के आखिर में इसे वापस भारत लाने की आधिकारिक प्रक्रिया के लिए लंदन जाएँगे। वहाँ वे विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करेंगे। इसी संग्रहालय में ये नख रखा हुआ है। यदि सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ तो ‘वाघ नख’ इसी साल देश में आ जाएगा।

 जगदंबा तलवार के भी वापस आने के आसार

रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने बताया, “हमें ब्रिटेन के अधिकारियों से एक पत्र मिला है। इसमें कहा गया है कि वे हमें छत्रपति शिवाजी महाराज का वाघ नख वापस देने पर राजी हो गए हैं। हिंदू कैलेंडर के आधार पर हम इसे उस दिन वापस पा सकते हैं, जिस तिथि को शिवाजी ने अफ़ज़ल खान को मार डाला था। कुछ अन्य तारीखों पर भी विचार किया जा रहा है और वाघ नख को वापस लाने के तौर-तरीकों पर भी काम किया जा रहा है।”
मंत्री मुनगंटीवार ने आगे कहा, “एमओयू पर हस्ताक्षर करने के अलावा, हम अन्य वस्तुओं जैसे कि शिवाजी की जगदंबा तलवार को भी देखेंगे, जो यूके में प्रदर्शित है और इन्हें वापस लाने के लिए भी कदम उठाएँगे। तथ्य यह है कि वाघ पंजा वापस आ रहा है। यह महाराष्ट्र और उसके लोगों के लिए एक बड़ा कदम है। अफजल खान की हत्या की तारीख ग्रेगोरियन कैलेंडर के आधार पर 10 नवंबर है, लेकिन हम हिंदू तिथि कैलेंडर के आधार पर तारीखें तय कर रहे हैं।” उन्होंने ये भी कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज का वाघ नख इतिहास का अमूल्य खजाना है और इनसे राज्य के लोगों की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं।

वाघ नख लेने कौन जाएगा लंदन

सांस्कृतिक मंत्रालय ने बताया है कि मंत्री मुनगंटीवार के साथ संस्कृति मंत्रालय के प्रमुख सचिव डॉ. विकास खड़गे और राज्य के पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालय के निदेशक डॉ. तेजस गर्गे लंदन का दौरा करेंगे। यह तीन सदस्यीय टीम की 29 सितंबर से 4 अक्टूबर तक छह दिनों की यात्रा के लिए ब्रिटेन जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि स्टील से बने वाघ नख में चार पंजे होते हैं जो एक पट्टी पर लगे होते हैं और पहली तथा चौथी ऊँगलियों के लिए दो छल्ले होते हैं।

कैसे भारत से ब्रिटेन पहुँचा वाघ नख

महाराष्ट्र के अधिकरियों के मुताबिक, वाघ नख मुट्ठी में पहने जाने वाला अपनी तरह का पहला पंजा खंजर है। ये बड़ी बिल्लियों यानी शेर, बाघ, चीते के पंजों से प्रेरणा लेकर बनाया गया है। ये अंगुली के जोड़ों पर पहना जाता है। ये हथेली के नीचे छुपा कर पहना जा सकता है। इसमें चार ब्लेड होते हैं जो दस्तानों या क्रॉस बार में फिक्स होते हैं।
ये दुश्मन की स्किन और माँसपेशियों को चीर देने के लिए डिजाइन किया गया होता है। ये वाघ नख सतारा कोर्ट में शिवाजी के वंशजों के पास था। 1818 में अंग्रेज अधिकारी जेम्स ग्रांट डफ को यह उपहार के तौर पर मिला था। डफ को उस वक्त ईस्ट इंडिया कंपनी ने सतारा स्टेट का रेजिडेंट राजनीतिक एजेंट बनाकर भेजा था। उसने सतारा की कोर्ट में 1818 से लेकर 1824 तक अपनी सेवाएँ दी थी। इसके बाद वो वाघ नख अपने साथ ब्रिटेन ले गया। वहाँ उसके वंशजों ने इस हथियार को विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय को दान कर दिया।

यहूदियों का खोया हुआ समुदाय या भारत के पहाड़ी जनजातीय? इजरायल लौटने के लिए क्यों बेचैन थे कुकी? सदियों पुराने पलायन का अनसुलझा रहस्य

                   उत्तर-पूर्वी भारत में एक एक सिनेगॉग में प्रार्थना करते 'Bnei Menashe' समाज के लोग
जातीयता से लेकर मजहब, इतिहास और भौगोलिकता कुकी समाज दशकों से अपनी पहचान को अलग-अलग रूप देता रहा है। बताया जाता है कि ये लोग म्यांमार के चीन क्षेत्र से भारत में आए थे। ये इलाका सीमा पर ही स्थित है। बताया जाता है कि चीन-कुकी-मिजो (CHIKUMI) समुदाय अधिकतर ईसाई मजहब का अनुसरण करते हैं। लेकिन, क्या आपको पता है कि उनके पूर्वजों को लेकर एक थ्योरी ये भी है कि ये लोग इजरायल से आकर भारत में बसे थे।

मणिपुर में जब कुकी-मैतेई हिंसा के दौरान कुकी समाज के घरों में आग लगाई गई थी, तब इजरायली मीडिया ने भी इसे खूब कवर किया था। कुकी समाज ने यहूदी राष्ट्र से भी मदद की माँग की है, जिसके बाद एक बार फिर से कुकी-इजरायल संबंधों को लेकर चर्चा शुरू हो गई। ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि मणिपुर में जो आज कुकी समाज रह रहा है, वो क्या है। आइए, इस पर चर्चा करते हैं कि कुकी समाज और इजरायल का क्या संबंध है।

आज का कुकी समाज कौन है

जहाँ तक चीन-कुकी-मिजो जनजातीय समाज की बात है, वो उत्तर-पूर्वी राज्यों मणिपुर, मिजोरम, असम, मेघालय और त्रिपुरा में बसे हुए हैं। ये सामान्यतः म्यांमार और बांग्लादेश से लगी सीमावर्ती इलाकों में ये रहते हैं। उन्हें तिब्बत-बर्मा भाषाई समूह का हिस्सा माना जाता है। इनका ताल्लुक मिजोरम के मिजो और म्यांमार के चीन से भी है। कुकी समाज के भीतर भी 20 समुदाय आते हैं, अधिकतर ईसाई ही हैं। वो माइग्रेशन ही कारण है कि इन्हें ‘नए कुकी’ और ‘पुराने कुकी’ के रूप में जाना जाता है।
‘ओल्ड कुकीज़’ उन्हें कहा जाता है, जो सन् 1600 या उससे पहले नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में माइग्रेट हुए थे। वहीं ‘न्यू कुकीज’ उन्हें कहा जाता है, जो 18वीं या 19वीं सदी में आए। CHIKUMI से जुड़े जितने भी साहित्य हैं, वो बताते हैं कि कई चरणों में इनका पलायन संपन्न हुआ। निश्चित रूप से ये नहीं कहा जा सकता कि वो उत्तर-पूर्वी राज्यों के मूलनिवासी हैं या नहीं। हालाँकि, म्यांमार के चीन स्टेट से आए हुए कुकी समाज के बारे में बहुत कुछ नहीं पता है।

फिर कुकी समाज का इजरायल से क्या संबंध है?

यहूदी मानते हैं कि 3000 साल पहले इजरायल के उत्तरी साम्राज्य के 10 समुदायों को अश्शूर से आए असीरियन लोगों के हमले के कारण पलायन करना पड़ा था। उसके बाद से उनके बारे में बहुत कुछ पता नहीं चल पाया। इजरायली लोगों का मानना है कि उस समय पलायन करने वाले ये लोग वापस आएँगे और तब एक नए युग का प्रारंभ होगा। उस समय इन्हीं में से एक राजा डेविड का वंशज मसीहा भी होगा।
माना जाता है कि जो समुदाय खो गए हैं, वो जहाँ जाकर बसे वहीं की संस्कृति में घुल-मिल गए हैं। कुकी समाज को भी ऐसे ही एक ट्राइब के रूप में जाना जाता है, जिसे वो ‘Bnei Menashe’ कहा जाता है। इन्हें पैगंबर जोसेफ के बेटे बिबिलिकल मनस्सेह के वंशजों के रूप में जाना जाता है। बताया जाता है कि 1950 के दशक में मिजोरम-मणिपुर के 10,000 कुकी लोगों ने ईसाई मजहब छोड़ कर यहूदी मजहब अपना लिया था, जब उन्हें अपनी तथाकथित वास्तविक मातृभूमि का पता चला था।
कैसे ये समुदाय अपने कथित मूलस्थान से परिचित हुआ, इसकी भी एक अलग कहानी है। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। मिजोरम के बुआल्लॉन में मेई चलाह नाम के एक मजहबी मंत्री ने बताया था कि उसने सपने में आया है कि कुकी लोग ज़िओन समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। साथ ही उन्होंने बताया था कि सपने में ये भी आया कि कुकी लोगों को अब अपने मूलस्थान की तरफ लौट चलना चाहिए।
इतिहास की बात करें तो कुकी समाज जीववाद (Animism), अर्थात पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के अलाव प्रकृति की पूजा करता रहा है। साथ ही वो ‘मनमासी’ (मानसिया) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इसके बाद वहाँ मिशनरियों का प्रभाव बढ़ने लगा और कई जनजातीय समुदायों, खासकर कुकी लोगों ने ईसाई मजहब अपना लिया। ये मिशनरी ब्रिटेन और अमेरिका से आए थे। बनेई मेनाशे कम्युनिटी का दावा है कि धर्मांतरण के दौरान उन्होंने ईसाई मजहब और अपने परंपराओं के बीच समानता पाई।
मिशनरियों ने उन्हें खूब बाइबिल की कहानियाँ सुनाईं और खुद की परंपराओं से समानता पाते हुए उन्होंने थोक में धर्मांतरण किया। ब्रिटिश मिशनरियों को भी खुद के और इनकी परंपराओं में समानता मिली। दावा किया जाता है कि कुकी लोगों के कुछ प्राचीन गानों में बाइबिल के शब्द मिलते हैं। ‘सिकपुई हला’ उनमें से ही एक गाना है, एक कुकी सब-ट्राइब हमार द्वारा सदियों से गाया जाता रहा है।
                       मिजोरम का ‘Bnei Menashe’ समाज (फोटो साभार: Timeline YouTube)
ये लोग फसल की कटाई के मौसम ‘सिकपुइरोइ’ के दौरान इसे गाते हैं। ये गाना इजिप्ट से इजरायली लोगों के पलायन की बात करता है। फिर इसमें बताया जाता है कि कैसे लाल सागर ने उन्हें बचाया। ‘लिटेन्टेन ज़िओन’ नाम का एक गीत भी है, जिसका अर्थ है – ‘चलो, जिओन की ओर चलें।’ इजरायल की लोककथाएँ भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में गीत के रूप में कैसे आ गईं, ये एक रहस्य है। ‘सेलाह’, ‘अबोरीज़ा’ और ‘एलो’ जैसे शब्द बाइबिल में कई बार मिलते हैं।
वहीं Pslam की किताब में जहाँ ‘Selah’ शब्द मिलता है, ‘अबोरीज़ा’ एक हिब्रू शब्द है जिसका इस्तेमाल ईश्वर की प्रशंसा के लिए किया जाता है। ‘बुलपिजेम’ नाम की कुकी स्क्रिप्ट में 32 अक्षर हैं और इनका कनेक्शन भी Jews से सामने आता है। बताया जाता है कि ये चीन में राजा शीह हुंगताई के समय खो गया था। ये 214 ईसापूर्व की बात है। बिबिलिकल इजरायलियों से भी कुछ समानताएँ कुकी समाज से हैं।
                                     कुकी ये शॉल ओढ़ते हैं, जो इजरायली शॉल से मिलता-जुलता है
समुदाय ‘Bnei Menashe’ द्वारा ओढ़ी जाने वाली एक प्रकार की शॉल यहूदियों द्वारा प्रार्थना के समय पहनी जाने वाली ‘तल्लीत’ से काफी मिलती-जुलती है। बाइबिल में लिखा है कि ऐसे शॉल के किनारों पर एक नाले रंग की डिजाइन वाला घेरा होना चाहिए, जो ‘Puan’ के लिए भी सटीक बैठता है। ‘Zelengam’ के तथाकथित झंडे में भी एक प्रकार का स्टार है, जिसे ‘स्टार ऑफ डेविड’ भी कहा गया है।
                                 बताया जाता है कि ‘Zelengam’ के झंडे में ‘स्टार ऑफ डेविड’ है
इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारियों के आधार पर रिसर्च करने पर पता चलता है कि माना जाता है कि 30 लाख कुकी ‘Bnei Menashe’ हैं, जिन्हें उत्तरी इजरायल से निकाला गया था और वो सदियों तक चले पलायन में मध्य एशिया तक आए। फिर वो चीन और बर्मा से होते हुए उत्तर-पूर्वी भारत में पहुँचे। बताया जाता है कि उन्हें यहाँ पर ‘Shinlung’ कहा गया, क्योंकि वो चीन में यालुंग नदी के किनारे स्थित छीनलूंगसान से आए थे।

सबूत कहाँ है?

कही-सुनी गई बातों के अलावा इजरायल के ‘Manasseh’ और कुकी समाज के बीच संबंध को लेकर कोई और सबूत नहीं है। 2003 में कुकी समाज के सब ट्राइब्स हमार, कोम, लेंथंग, चांगसां, लुन्किम और हूआलंगो समाज के लोगों का DNA टेस्ट कराया गया, जो नेगेटिव निकला। 2005 में एक अन्य डीएनए टेस्ट में कुछ कनेक्शन निकला। कलकत्ता के सेन्ट्रल फॉरेंसिक इंस्टीट्यूट ने इस टेस्ट सैम्पल्स की जाँच की थी।
इसमें पाया गया कि जहाँ उनके पुरुष वाले हिस्से का कोई विदेशी लिंक सामने नहीं आया, उनके महिला वाले हिस्से का कनेक्शन मध्य-पूर्व से सामने आया। इस रिसर्च में शामिल एक स्कॉलर ने कहा था कि दुनिया के दो अलग-अलग इलाकों में रह रहे समुदायों के डीएनए में समानता मुश्किल है, जब तक वो एक ही जगह से न आएँ रहे हों। एक अन्य रिसर्च में पता चला कि रोग ‘Tay-Sachs’ और हड्डी रोग ‘Saitika-Zenghit’ रोग CHIKIMZO ट्राइब्स के अलावा सेमिटिक यहूदियों में भी पाया जाता है।
हालाँकि, 2005 में कराए गए ये टेस्ट इतने विश्वसनीय नहीं हैं। इजरायल के प्रोफेसर स्कोरकी जेनेटिसिस्ट्स ने पार्शियल सिक्वेंसिंग का सहारा लिया और पूरी तरह से सेक्वेंशिंग नहीं की। उन्होंने कहा था कि हजारों वर्षों बाद कॉमन जेनेटिक ओरिजिन का पता लगा पाना मुश्किल है।

अपनी ‘मूल भूमि’ की तरफ लौटने वाली थ्योरी

1970 के दशक में ‘Bnei Menashe’ का एक समूह इजरायल की यात्रा पर निकला, जहाँ उसने रब्बी एलियाहु अविचाईल से मुलाकात की, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ही इस समुदाय का नामकरण किया। साथ ही ‘Amishav’ नाम का एक NGO (जिसका अर्थ है – मेरे लोग वापस आएँगे) भी है, जो इजरायल से पलायन करने वाले ट्राइब्स को ढूँढने में लगा हुआ है। साथ ही ये संगठन उन्हें वापस यहूदी मजहब में धर्मांतरित करने करने के प्रयास में भी ये लगा रहता है।
उसी साल अविचाईल ने भारत का दौरा कर ‘बनई मेनाशे’ समुदाय के लोगों से मुलाकात की। उन्होंने ही इस समुदाय को इजरायल के करीब लाने में अहम भूमिका निभाई और आइजोल के साथ-साथ इम्फाल में भी धर्मांतरण की शुरुआत की। उन्होंने इस दावे पर भी रिसर्च किया कि उनके इजरायल से पलायन करने की बातों में कितनी सच्चाई है। इम्फाल में येरुसलम के रब्बी ने ‘अमिषाव हाउस’ भी खोला। उसमें एक सिनेगॉग भी है।
उसमें 2 गेस्ट रूम, एक मिक्वाह (परंपरागत नहाने का स्थान), एक क्लासरूम और कर्मचारियों के रहने के लिए क्वार्टर भी हैं। हालाँकि, इजरायल सरकार ने इस समुदाय के इजरायल माइग्रेशन ‘अलियाह’ का समर्थन नहीं किया। 90 के दशक में इस समाज के कुछ लोग इजरायल पर्यटक बन कर पहुँचे और वहाँ बस गए। उन्हें वहाँ की नागरिकता भी मिली और वो यहूदी कहलाए। 1997 में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के डिप्टी कम्युनिकेशंस डायरेक्टर माइकल फ्रूंड को इस समाज का एक पत्र मिला और उन्होंने इनसे मिलने का मन बनाया।
उन्होंने इसके बाद कहा कि उक्त समाज और बिबिलिकल इजरायलियों में काफी समानताएँ हैं। उनकी परंपराओं और विश्वासों में भी उन्हें समानता मिली। उन्होंने इस समाज के माइग्रेशन को सपोर्ट करने के लिए फंड भी इकट्ठा किया। उनका मानना है कि इजरायल का खोया हुआ समुदाय यही है। उनके प्रयासों के कारण हर साल 100 ‘बनई मेनाशे’ को इजरायल में जाकर बसने और यहूदी बनने की अनुमति मिली।
उन्होंने एक ‘Shavei’ नामक एक NGO की भी स्थापना की, जिसने इजरायल की खोई हुई ट्राइब्स को वापस लेकर बसाने को अपना लक्ष्य बताया। 2003 तक इस समाज के 1000 लोगों को इजरायल में बसाया जा चुका था। उसी साल इजरायल के तत्कालीन इंटीरियर मिनिस्टर अवराहम पोराज ने कुछ राजनीतिक और मजहबी कारणों से फिर इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी। लेकिन, फ्रूंड इसके लिए प्रयास करते रहे और 2005 में एक फैसला कराया कि इस समाज को यहूदियों का ही हिस्सा माना जाए।
इस फैसले के बाद उनके NGO का खासा उत्साहवर्धन हुआ और उन्होंने मिजोरम और मणिपुर में धर्मांतरण के लिए सेंटरों की स्थापना की। अगर ‘Bnei Menashe’ को यहूदी का दजा मिल गया तो वो बिना रोकटोक इजरायल में जाकर बस सकेंगे। 2006 में इस प्रक्रिया के तहत 218 ऐसे लोगों को ‘Bnei Menashe’धर्मांतरित कर इजरायल ले जाया जाना था, लेकिन भारत सरकार ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई। बताया जाता है कि 10,000 लोग इजरायल जा चुके हैं।

क्या कुकी और ‘Bnei Menashe’ को उनकी असली भूमि मिल गई?

यहूदियों ने भी कुकी समाज के ‘Bnei Menashe’ होने के दावों पर आपत्ति जताई है। भारत और इजरायल की सरकारों ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई है। इजरायल के कई नेता भी इन्हें यहूदी नहीं मानते। इजरायली आलोचकों का कहना है कि उन्हें वेस्ट बैंक और गाजा से लगे इलाकों में जानबूझकर एक साजिश के तहत बसाया गया। बेंजामिन नेतन्याहू इन्हें वहाँ बसाने के पक्ष में थे, ऐसे में वो अपने देश में विवादों के केंद्र में भी आ गए।
इस समाज को पूरी तरह यहूदी कहलाने के लिए भी काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा। स्टैण्डर्ड ऑफ लिविंग से लेकर आर्थिक स्थिति तक, शुरुआत में बिल्कुल भी इस समाज को समर्थन नहीं मिला। कइयों ने नागरिकता ली और इजरायल की सेना में भी शामिल हुए। भारत में इस धर्मांतरण के खिलाफ भी आवाज उठी। इसमें कोई शक नहीं है कि कुकी समाज में अधिकतर प्रवासी ही रहे हैं।
वहीं दूसरी तरफ ‘कुकी नेशनल ऑर्गेनाइजेशन (KNO)’ का नेता पीएस हाओकीप अभियान चला रहा है कि पूरे कुकी समाज को एक ‘Zelengam’ के अंतर्गत लाया जाए। इसे ‘लैंड ऑफ फ्रीडम’ भी कहा जाता है और यहूदी थ्योरी ही मानी जाती है। कुकी समाज की कई पहचान है, जिससे वो कहाँ से ताल्लुक रखते हैं इस पर संशय बना रहता है। अब इस पर और रिसर्च हो या कोई सबूतों वाला इतिहास निकले तो इस बारे में और पता चलेगा। इतिहास के गर्त में छिपा पलायन के इस रहस्य से पूरी तरह पर्दा हटना अभी बाक़ी है।(साभार: Pragya Bakshi Sharma
I have been a journalist for 7+ years with experience in Print and Broadcast News. I love writing, reading, temple-hopping, listening to traditional Indian music and more. I am a Type 1 Diabetic = Type Oneder Woman :))

हिमाचल चुनाव : पंजाब सिख टीचर्स ने लगाए केजरीवाल मुर्दाबाद के नारे, भाषण छोड़ भागे ; AAP कार्यकर्ताओं ने पगड़ियां उतार दी

दिल्ली को बार-बार ठगने वाले अरविन्द केजरीवाल को पंजाब दिखा रहा आईना। चुनाव में किये वायदों के पूरा न होने पर सिख हिमाचल प्रदेश तक पहुँच चुनाव रैली को भी बाधित करने से नहीं चुके। एक दिल्ली वाले हैं, जो हर साल प्रदुषण का शिकार हो रहे हैं। 
हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए सोलन पहुंचे अरविंद केजरीवाल के रोड शो में खूब हंगामा हुआ। यहां पंजाब से आए कुछ शिक्षक आम आदमी पार्टी के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे, जिनके साथ मारपीट की गई। आम आदमी पार्टी सोलन के कार्यकर्ता उनके साथ उलझ गए व दोनों पक्ष में मारपीट हुई। केजरीवाल के रोड शो में विरोध जताने पर जिन लोगों से AAP के कार्यकर्ताओं ने मारपीट की, उनमें से ज्यादातर पंजाब की ETT TET पास अध्यापक संघ के मेंबर थे। पंजाब में भगवंत मान की अगुवाई वाली AAP सरकार द्वारा सुनवाई नहीं किए जाने पर यह लोग सोलन में केजरीवाल से मिलने पहुंचे थे। यहां जब इन लोगों ने रोड शो के दौरान अपनी बात रखने की कोशिश की तो आम आदमी पार्टी के वर्कर बदसलूकी पर उतर आए। रोड शो में मारपीट के बाद केजरीवाल भाषण बीच में ही खत्म कर दिल्ली लौट गए। पंजाब की ETT-TET पास अध्यापक संघ के अध्यक्ष कमल ठाकुर कहा कि आम आदमी पार्टी के वर्करों ने उन लोगों के साथ जिस तरह की धक्कामुक्की की, वह किसी भी सूरत में बर्दाश्त करने लायक नहीं है।

केजरीवाल को बीच में ही भाषण छोड़कर लौटना पड़ा

हिमाचल विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की रैली में हंगामा हो गया। 3 नवंबर 2022 को सोलन में रोड-शो कर रहे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सामने पंजाब के टीचरों ने अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन किया। वे केजरीवाल से मिलना चाहते थे लेकिन जब मिलने नहीं दिया गया तो मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे। इस पर AAP कार्यकर्ता नारे लगाने वालों से भिड़ गए। इसके बाद AAP कार्यकर्ताओं ने टीचरों के साथ मारपीट शुरू कर दी। दोनों पक्षों के बीच झड़प होने से स्थिति यह बनी कि केजरीवाल को बीच में ही भाषण छोड़कर लौटना पड़ा।

केजरीवाल 5 मिनट भी भाषण नहीं दे पाए

केजरीवाल 5 मिनट ही बोले थे कि पंजाब से आए ETT-TET पास अध्यापक संघ के सदस्यों ने अपने मांग पत्र लहराने शुरू कर दिए। जब आम आदमी पार्टी के वर्कर इन्हें रोकते हुए धक्कामुक्की करने लगे तो इन लोगों ने पर्चे उछालते हुए केजरीवाल मुर्दाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिए। इस पर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें पीटते हुए धक्के देना शुरू कर दिया। AAP वर्करों ने इन लोगों पर जमकर लात-घूंसे बरसाए।

हिमाचल में 12 नवंबर को वोटिंग

हिमाचल प्रदेश में हो रहे विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी सभी 68 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। केजरीवाल सोलन सीट से उम्मीदवार अंजू राठौर के लिए रोड-शो कर रहे थे, तभी हंगामा हो गया। हिमाचल में 12 नवंबर को वोटिंग होना है।

AAP कार्यकर्ताओं ने सिख टीचरों की पगड़ियां उतार दी

हिमाचल में AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल के रोड शो में जिन लोगों से AAP कार्यकर्ताओं ने मारपीट की, उनमें से ज्यादातर पंजाब की ETT TET पास अध्यापक संघ के मेंबर थे। इनमें कई सिख भी थे। ETT TET पास अध्यापक संघ के प्रधान कमल ठाकुर का आरोप है कि आम आदमी पार्टी के वर्करों ने बदसलूकी करते हुए उनकी पगड़ियां उतार दी और केश की बेअदबी की। कमल ठाकुर ने कहा कि प्रदर्शन में उनके संघ के कई सिख मेंबर भी शामिल थे। आम आदमी पार्टी के वर्करों ने मारपीट में उनकी पगड़ियां उतार दी। AAP वर्करों ने प्रदर्शनकारियों के केश की बेअदबी की। सिख समुदाय इसे बर्दाश्त नहीं करेगा।

आम आदमी पार्टी ने दिया था अध्यापकों को स्थायी करने का आश्वासन

कमल ठाकुर ने कहा कि पंजाब में अकाली-भाजपा सरकार के दौरान वर्ष 2016 में ETT-TET पास 4500 अध्यापकों की एक साथ भर्ती हुई। 6 साल की नौकरी पूरी करने के बाद, पिछली कांग्रेस सरकार ने उनमें से 180 अध्यापकों की सैलरी अचानक आधी कर दी। साथ ही उनकी 6 साल की नौकरी खत्म करते हुए नए सिरे से ज्वाइनिंग लेटर थमा दिए गए। इसके बाद भी ETT-TET पास अध्यापकों ने अपना प्रोबेशन पीरियड पूरा किया। कमल ठाकुर ने बताया कि इसके बाद उन पर फिर से 3 साल का प्रोबेशन थोप दिया गया। पंजाब में इसी साल फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी के नेता हरपाल चीमा ने उन्हें रेगुलर करने का भरोसा दिया था जो अभी तक पूरा नहीं हुआ। अपनी यही मांग लेकर वह AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल से मिलने दिल्ली गए तो केजरीवाल उनसे मिले तक नहीं। दिल्ली में केजरीवाल के घर के बाहर पुलिस ने उनके साथ धक्कामुक्की की। महिला टीचरों से दुर्व्यवहार किया गया।

पंजाब के टीचरों ने शिमला में 3 दिन पहले भी जताया विरोध

पंजाब के कुछ अध्यापकों ने तीन दिन पहले पंजाब टीचर्स एसोसिएशन के बैनर तले शिमला में रिज मैदान पर भी AAP के खिलाफ प्रदर्शन किया था। एसोसिएशन का आरोप है कि पंजाब के सरकारी स्कूलों में टीचरों और अन्य स्टाफ की 25 हजार से ज़्यादा सीटें खाली है जिस पर भर्ती नहीं की जा रही। इसके अलावा शिक्षा अधिकारियों, ब्लॉक प्राथमिक शिक्षा अधिकारियों (बीपीईओ) और स्कूल शिक्षकों के 40% पद खाली है। पंजाब टीचर्स एसोसिएशन का कहना है कि पंजाब में भगवंत मान की अगुवाई वाली AAP सरकार से बार- बार भर्ती करने की मांग की गई मगर कोई फायदा नहीं हुआ। पंजाब के शिक्षामंत्री हरजोत सिंह बैंस के अपने जिले रोपड़ में ही कई ब्लॉक प्राथमिक शिक्षा अधिकारी के बिना चल रहे हैं।