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असम से लेकर म्यांमार सीमा तक 220 बीघा में लगी अफीम की खेती की गई नष्ट : बोले मुख्यमंत्री सरमा- ड्रग्स के बारे में सोचने से पहले पुलिस को याद कर लेना

                      असम पुलिस ने अफीम की खेती को किया नष्ट (साभार: NDTV/X @Goalpara_Police)
असम पुलिस ने राज्य में लगभग 170 बीघे में लगी अफीम की खेती को नष्ट कर दिया। इस ड्रग्स की अनुमानित कीमत 27 करोड़ रुपए है। इसकी जानकारी ग्वालपाड़ा पुलिस और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने दी है। वहीं, असम राइफल्स ने मणिपुर में भारत-म्यांमार सीमा पर स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर लगभग 30 एकड़ (लगभग 50 बीघा) की अवैध अफीम की खेती को नष्ट कर दिया।

असम के सीएम सरमा ने सोशल मीडिया साइट X पर अपने पोस्ट में लिखा, “प्रिय स्थानीय पाब्लो एस्कोबार्स (कोलंबिया का कुख्यात ड्रग माफिया), आपकी योजनाबद्ध उड़ता असम पार्टी को बिगाड़ने के लिए क्षमा करें! क्योंकि ग्वालपाड़ा पुलिस ने जनवरी में चार इलाकों में 27.20 करोड़ रूपए मूल्य की 170 बीघा अफीम की खेती नष्ट कर दी थी। तो अगली बार जब आप ड्रग्स के बारे में सोचें तो सबसे पहले असम पुलिस के बारे में सोचें।”

वहीं, ग्वालपाड़ा पुलिस ने अपने ट्वीट में कहा, “नशीली दवाओं के खिलाफ अपने अभियान को जारी रखते हुए चुनारी थाने के अंतर्गत सीतलमारी चार में 100 बीघा भूमि पर अवैध अफीम की खेती को एएसपी (मुख्यालय) जीएलपी और ओसी एलपीआर पीएस के नेतृत्व में ग्वालपाड़ा पुलिस टीम ने सीओ लखीपुर, आबकारी निरीक्षक और अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में नष्ट कर दिया।”

पिछले सप्ताह 30 जनवरी 2025 को ग्वालपाड़ा पुलिस ने सोनारी सर में 40 बीघा क्षेत्र में अफ़ीम की खेती को नष्ट कर दिया था। ग्वालपाड़ा प्रशासन ने 2021 और 2023 में शियालमारी में बड़े पैमाने पर अफ़ीम की खेती को नष्ट किया था। सर क्षेत्र में अफ़ीम की खेती सबसे पहले 2010 में दरंग ज़िले के मगुरमारी सर में सामने आई थी।

सूत्रों के अनुसार, राज्य के बाहर का एक गिरोह राज्य में सर की दुर्गमता का फायदा उठाकर स्थानीय निवासियों के एक वर्ग के साथ मिलकर अफीम की खेती करता है। यह गिरोह स्थानीय निवासियों को अफीम के बीज और अन्य सामग्री सहित हर चीज की आपूर्ति करता है। दरअसल, सर के इलाकों में रहने वाले लोगों को असल पता ही नहीं है कि अफीम वास्तव में होता क्या है।

द सेंटिनेल की रिपोर्ट के मुताबिक, सर निवासी अशरफ अली ने कहा, “लोगों को लगता है कि यह फूलों की खेती है। सर के इलाकों के कुछ नेता इसका फायदा उठाकर स्थानीय लोगों को मज़दूर के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। अगर ज़िला प्रशासन अफीम की खेती देखने के लिए बाहर से आने वाले रैकेट के लोगों और उन्हें पनाह देने वाले लोगों पर नज़र रखे तो उनके ठिकानों का पता लगाया जा सकता है।”

मणिपुर : अब नैरेटिव युद्ध, ड्रग्स पर लगी लगाम, ड्रग्स माफिया और मिशनरीज ने प्रदेश को हिंसा की आग में झोंका


पिछले 10 दिनों से संसद ठप करने वाले विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के नेताओं ने 30 जुलाई 2023 को मणिपुर का दौरा किया, लोगों से मिले और फोटो खिंचवाई। विपक्षी दल अब इसे नैरेटिव युद्ध बनाना चाहते हैं और ड्रग्स तस्करी करने वाले देश विरोधी ताकतों का ढाल बनना चाहते हैं। विपक्षी दल जिस तरह से पाला बदल रहे हैं वह भी एक संदेह पैदा करता है। पहले उन्होंने कहा कि मणिपुर पर प्रधानमंत्री बयान दें। प्रधानमंत्री ने बयान दिया तो लोकसभा में चर्चा की मांग की। लोकसभा में चर्चा की मांग स्वीकार हुई तो वे अविश्वास प्रस्ताव ले आए। सरकार मणिपुर पर चर्चा करने के लिए तैयार है लेकिन विपक्षी दल अब चर्चा से भागकर इसे नैरेटिव वॉर बनाने पर तुले हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह ड्रग माफिया और मिशनरीज की अंतर्राष्ट्रीय साजिश है। दरअसल बीजेपी के शासन में पिछले पांच-सात साल में ड्रग माफिया पर लगाम लगाया गया है। पिछले पांच-सात साल में हजार करोड़ से ज्यादा के ड्रग्स जब्त किए गए हैं और अफीम की खेती पर रोक लगाई जा रही है। देश विरोधी गतिविधियों पर लगाम लगाए जाने से तिलमिलाए भ्रष्टाचारी दलों को समझ नहीं आ रहा कि वे अब क्या करें इसीलिए वे लगातार पाला बदल रहे हैं।

विपक्षी गठबंधन का नैरेटिव, अनिश्चितता और भय का माहौल

मणिपुर के दौरे से लौटने बाद कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि मणिपुर में ‘अनिश्चितता और भय’ व्याप्त है। विपक्षी दलों के गठबंधन ‘I.N.D.I.A.’ का एक प्रतिनिधिमंडल दो दिवसीय दौरे के बाद हिंसा प्रभावित मणिपुर से लौट आया है। ‘I.N.D.I.A.’ गठबंधन ने कहा कि तीन महीने से जारी मणिपुर जातीय संघर्ष जल्द हल नहीं किया गया, तो यह देश के लिए सुरक्षा समस्याएं पैदा कर सकता है।

नैरेटिव का खेलः कुकी समुदाय के लिए खड़ा हो गया यूरोपीय संसद

कुकी समुदाय के लोग ईसाई धर्म को मानते हैं और वे मिशनरीज से जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि यह मुद्दा यूरोपीय संसद जैसे वैश्विक मंचों तक पहुंच गया और उन्होंने इसकी निंदा की। जबकि यह भारत का आंतरिक मामला है। इससे समझा जा सकता है कि इस मुद्दे को किस तरह नैरेटिव का खेल बनाया जा रहा है। भारत ने यूरोपीय संसद के 16 जुलाई 2023 के प्रस्ताव को “भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप” करार दिया और उसके रवैये को “औपनिवेशिक मानसिकता” से प्रेरित बताया।

म्यांमार से हो रही घुसपैठ मणिपुर को कर रहा अस्थिर

पिछले कुछ माह से म्यांमार (बर्मा) की सीमा से लगे राज्य मणिपुर में हिंसा देखी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि बर्मा के चरमपंथी समूह और विस्थापित नागरिक, देश के गृह युद्ध की आंच के तहत, भारत में घुसपैठ कर रहे हैं और सीमावर्ती राज्य को अस्थिर कर रहे हैं। 2021 में सैन्य जुंटा के सत्ता संभालने और उग्रवाद विरोधी अभियान शुरू करने के बाद स्थिति और खराब हो गई।

म्यांमार से आए कुकी समुदाय आज पूर्वोत्तर भारत में फैल गए

मणिपुर म्यांमार के साथ लगभग 250 मील की जंगली और अत्यधिक खुली सीमा साझा करता है। लेकिन मई 2023 से बहुसंख्यक मैतेई, गैर-आदिवासी स्थानीय लोगों और कुकी जातीयता के बीच हिंसक झड़पें देखी गई हैं। मूल रूप से म्यांमार के रहने वाले कुकी समुदाय आज पूर्वोत्तर भारत, बांग्लादेश और बर्मा में फैले हुए हैं। मणिपुर में हुई हिंसा में नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप के अनुसार, 70,000 से अधिक लोग विस्थापित हो गए हैं और वर्तमान में उन्होंने चार पूर्वोत्तर भारतीय राज्यों में विभिन्न राहत शिविरों में शरण ली है।

 सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे फर्जी वीडियो

सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो फैलाए जा रहे हैं जिनमें जातीय संघर्ष को धार्मिक दृष्टि से चित्रित करने का प्रयास किया गया। झूठी कहानियां भारतीय समाज में व्यापक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रही हैं। यह स्थिति क्षेत्र में दीर्घकालिक शांति के लिए खतरा पैदा कर रही है और भारत के खिलाफ एक घातक प्रभाव अभियान को बढ़ावा दे रही है, एक ऐसा देश जहां सामाजिक और धार्मिक पहचान पारंपरिक रूप से एक संवेदनशील मुद्दा रही है।
मणिपुर हिंसा से अंतरजातीय दंपतियों के लिए बड़ी मुश्किलें
मणिपुर हिंसा ने समाज पर व्यापक प्रभाव डाला है और अंतरजातीय दंपतियों के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी कर दी है। मैतेई और कुकी समुदाय के बीच झड़प से कई अंतरजातीय दंपति प्रतिशोध के डर से अलग रहने को मजबूर हुए हैं। अंतरजातीय दंपतियों के खिलाफ हिंसा ने एक घायल सात वर्षीय लड़के जैसे अत्याचार को जन्म दिया। उसकी मां मैतेई थी और उसे मां सहित एम्बुलेंस में जिंदा जला दिया गया था। लड़के का पिता कुकी समुदाय से था। विपक्षी दलों को इनकी पीड़ा से कोई मतलब नहीं है। वे अपनी राजनीति चमकाने में लगे हुए हैं। 
अंतराष्ट्रीय ड्रग माफिया का मैदान बन रहा मणिपुर
भारत-म्यांमार की लगभग 400 किमी लंबी सीमा भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक चुनौती बनी हुई है। चुनौती इसलिए क्योंकि पूरी सीमा ऐसी है कि कहीं से भी आर पार आवाजाही की जा सकती है। यही खूबी मणिपुर को दुनिया भऱ में बदनाम ड्रग्स सप्लाई का हिस्सा बना रही थी। मणिपुर की मुश्किल ये कि पड़ोसी देशों में राजनीतिक अस्थिरता और ड्रग माफिया का अंतराष्ट्रीय स्तर पर चल रहा खुले ऑपरेशन ने राज्य में ड्रग्स के खतरे को और बढ़ा दिया है।
ड्रग्स के खिलाफ जंग भी मणिपुर हिंसा की वजह
संगठित ड्रग माफिया मणिपुर के रास्ते नारकोटिक्स जैसे हेरोईन, गांजा, अफीम, सिंथेटिक ड्रग में क्रिस्टल मेथामफेटामिन, सूडो इफएड्रीन, डब्लू वाई टैबलेट भरत के दूसरे हिस्सों में भेजते हैं। केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने भी माना है कि देश में ड्रग का खतरा बढ़ता जा रहा है और युवा इसके शिकार होते जा रहे हैं। इसलिए गृह मंत्रालय ने भी ड्रग्स के खिलाफ जंग को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। मणिपुर में हिंसा की एक प्रमुख वजह यह भी है जिससे ड्रग के धंधे से देश का ध्यान भटकाया जाए।
मणिपुर सरकार ने ड्रग्स के खिलाफ खुली जंग का ऐलान किया
मणिपुर सरकार ने ड्रग्स के खिलाफ खुली जंग का ऐलान किया है जिसे मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने वॉर ऑन ड्रग्स 2.0 का नाम दिया है। सीएम बिरेन सिंह ने इसे अपने दूसरे कार्यकाल के पहले 100 दिन के एजेंडे का हिस्सा बनाया है। सरकार ने इस बार ड्रग्स के खिलाफ जंग शुरू की है एक नए अवतार में और गठित किया है एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स। और इस जंग में हर स्तर पर ड्रग्स रोकने के लिए कई स्तरों पर रणनीति बनाई है जिसमें कानून, समाजिक, मानव संसाधन और तकनीकि पहलुओं का इस्तेमाल किया जा रहा है ड्रग्स के खतरे को रोकने के लिए।
ड्रग्स की सप्लाई के सभी रास्तों पर शिकंजा कसा
मणिपुर सरकार की कड़ाई से ड्रग्स की सप्लाई के सभी रास्तों पर शिकंजा कसता जा रहा है। संवेदनशील राष्ट्रीय राजमार्ग-2 पर 24 घंटे हाईवे पेट्रोलिंग करने वाली जीपीएस युक्त गाड़ियों को लगाया गया है। राज्य हाईवे सिक्यूरिटी योजना पर भी एक महत्वाकांक्षी काम शुरू हो चुका है। इसके तहत मणिपुर को म्यांमार, असम और नगालैंड से जोड़ने वाले 3 मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-2, एनएच-102 और एनएच-37 पर ड्रग्स माफिया को कोई मौका नहीं देने की तैयारी चल रही है। इस योजना के तहत ड्रग्स माफिया को मणिपुर को ट्रांसिट रूट की तरह इस्तेमाल करना मुश्किल होगा।
ड्रग्स की तस्करी पर लगाम, पांच साल में 3 हजार करोड़ के ड्रग जब्त
राज्य सरकार की लगातार कोशिशों के बाद मणिपुर में गैरकानूनी ड्रग्स ट्रैफिकिंग पर क्रैक डाउन शुरु हो चुका है और भारी मात्रा में ड्रग्स बरामद किए गए हैं। पिछले पांच सालों में इतने ड्रग्स जब्त किए है जिनकी अंतराष्ट्रीय बाजार में कीमत 3,213 करोड़ रुपये आंकी जा रही है। एनडीपीएस एक्ट के तहत कुल 1674 केस दर्ज किए गए हैं और 2104 पैडलरों को गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा पुलिस ने 170 किलो हेरोईन पाउडर, 1265 किलो अफीम, 520 किलो ब्राउन शुगर, 725 सिंथेटिक ड्रग्स, 16 लाख साइकोट्रोपिक टैबलेट, ड्रग्स सीरप की 63000 बोतलें जब्त की हैं। मणिपुर सरकार और पुलिस बल ने अफीम की गैरकानूनी रुप से चल रही 13894 एकड़ जमीन पर खेती और गांजा उगायी जा रही 20 एकड़ जमीन पर पूरी फसल नष्ट कर दी।
एनडीपीएस एक्ट के तहत 174 लोग गिरफ्तार
एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स के 2020 में गठन के बाद से गैरकानूनी सप्लाई में लगे ड्रग्स पैडलर्स के खिलाफ सख्त कारवाई की गई है। इसमें एनडीपीएस एक्ट के तहत 174 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और 18 किलो हेरोईन पाउडर, 135 किलो अफीम, 85 किलो डब्लू वाई टैबलेट, 44000 कैप्सूल और 24000 ड्रग्स के सीरिंज जब्त किया गया है और 382 एकड पॉपी की फसल को नष्ट कर दिया गया है। मणिपुर सारकार के मुताबिक 70 दिनों के भीतर ही 142 करोड रुपये के ड्रग्स जब्त किए गए हैं।
मणिपुर में 400 करोड़ रुपये की नशीली दवाओं के साथ म्यांमार का व्यक्ति गिरफ्तार
जनवरी 2020 में म्यांमार के एक ड्रग डीलर को इंफाल में 400 करोड़ रुपये की बड़ी मात्रा में वर्ल्ड इज योर्स (डब्ल्यूवाई) टैबलेट जब्त किया गया और गिरफ्तार किया गया। उसे राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया है। रंगून के काव्हू गांव के आरोपी क्याव क्याव निंग उर्फ ​​अब्दुल रहीम (33) की हिरासत का आदेश जिला मजिस्ट्रेट (थौबल) द्वारा 29 जनवरी को जारी किया गया था, जिसके एक दिन बाद उसे नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक द्वारा जमानत पर रिहा किया गया था।
ड्रग्स पैडलरों के रोजगार की वैकल्पिक व्यवस्था
एन बीरेन सिंह के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ड्रग्स के व्यापार और उसकी सप्लाई में लगे लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था और पुनर्वास के लिए भी योजनाएं लागू कर रही है। रोजगार नहीं मिलने के कारण गांवों के लोग अफीम की गौरकानूनी खेती में नहीं लगें इसके लिए उन इलाकों में सरकार नई योजनाएं बना कर उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था देने की कोशिश कर रही है। सरकार ने जिला स्तर पर समिति बनाई है जो आबादी के साथ साथ सही योजना की पहचान कर ड्रग्स से दूर जा रहे लोगों को वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था पर नजर रखेगी। इसमें हॉर्टीकल्चर, पॉल्ट्री, फूल, मधुमक्खी पालन, बीजेपी सरकार स्थानीय वस्तुओं को सीधा बाजार से जोड़ने की तैयारी कर रही है।
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम है ड्रग्स मुक्त मणिपुर
मणिपुर की सरकार और प्रशासन जानता है कि बिना जन समर्थन और मुख्य स्टेक होल्डरों से चर्चा किए बिना वॉर ऑन ड्रग्स 2.0 सफल नहीं होगा. खास कर युवा वर्ग का समर्थन जरूरी है जो इस मुहिम में सबसे बड़ा स्टेक होल्डर है. इसलिए सरकार ने पहले चरण में पहाड़ी जिलों के 70 स्थानों पर जनजागरण अभियान शुरू किया। इसलिए इसके उद्घाटन के लिए भी चुना गया एक लोकप्रिय फुटबॉल टुर्नामेंट को जिसमें राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हिस्सा ले रहे थे और शीर्ष पुलिस अधिकारी मौजूद रहे।
मणिपुर को अंतराष्ट्रीय ड्रग्स तस्करी के जाल से निकालने की मुहिम
ड्रग्स के खिलाफ जंग में मोदी सरकार और मणिपुर के सीएम एन बीरेन सिंह की व्यक्तिगत पहल ने ड्रग्स के खिलाफ इस जंग में धार डाल दी है। इसके नतीजे भी मिलने लगे हैं। ड्रग्स माफिया को संदेश साफ है कि मणिपुर को अंतराष्ट्रीय ड्रग्स तस्करी के जाल से निकालने की मुहिम चल पड़ी है और एन बीरेन सिंह के नेतृत्व में बीजेपी सरकार इस मुहिम में सभी स्टेकहोल्डर्स और आम आदमी को शामिल कर इसे जन आंदोलन का रुप दे रही है ताकि इन ड्रग्स माफियाओं को मणिपुर में घुसने की जगह नहीं मिले।
मणिपुर में मैतेई की आबादी 53 प्रतिशत और नगा व कुकी 40 प्रतिशत
मणिपुर में अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मैतेई समुदाय की मांग के विरोध में पर्वतीय जिलों में तीन मई को ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ के आयोजन के बाद राज्य में जातीय हिंसा भड़क उठी थी। पूर्वोत्तर राज्य की आबादी में मैतेई समुदाय के लोगों की संख्या लगभग 53 प्रतिशत है और वे मुख्य रूप से इंफाल घाटी में रहते हैं। वहीं, नगा और कुकी जैसे आदिवासियों की आबादी 40 प्रतिशत है और वे ज्यादातर पर्वतीय जिलों में रहते हैं।

मणिपुर हिंसा पर एक्शन में CBI: केंद्र सरकार ने कहा – 6 महीने में वीडियो काण्ड के अपराधियों को दिलाएँगे सज़ा

मणिपुर वीडियो काण्ड की जाँच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने CBI को सौंप दी। 3 महिलाओं को नग्न परेड कराए जाने और उनका गैंगरेप किए जाने के इस मामले की जाँच अब ‘केंद्रीय जाँच एजेंसी’ ने शुरू भी कर दी है। इतना ही नहीं, मणिपुर हिंसा को लेकर 6 FIR दर्ज करने के बाद CBI ने आरोपितों की धर-पकड़ भी शुरू कर दी है और 10 गिरफ्तारियाँ हुई हैं। बताया जा रहा है कि पिछले कुछ दिनों में ये गिरफ्तारियाँ हुई हैं। वीडियो काण्ड मामले में अब CBI मामला दर्ज करेगी।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई होनी है, लेकिन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अनुपस्थिति के कारण मामला नहीं सुना जा सका। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि सरकार कार्रवाई करे, वरना हम कुछ एक्शन लेने के लिए मजबूर होंगे। केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में फास्टट्रैक कोर्ट के माध्यम से 6 महीने में आरोपितों को सज़ा दिलाए जाने की बात कही है। इस वारदात के 7 अपराधी अब तक गिरफ्तार किए जा चुके हैं, ये भी केंद्र ने बताया था।

केंद्र सरकार ने कहा है कि ये न सिर्फ एक घृणित वारदात है, बल्कि इस मामले में कड़ी कार्रवाई करते हुए नजीर पेश की जानी चाहिए। इसीलिए, इस मामले की जाँच CBI को दिए जाने का निर्णय लिया गया है। जिस मोबाइल फोन से इस वीडियो को शूट किया गया था, उसे जब्त कर लिया गया है। साथ ही जिस व्यक्ति ने महिलाओं का नग्न परेड कराए जाने वाला वीडियो शूट किया था, उसकी पहचान के बाद उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया है कि केंद्र सरकार इस मामले में कुकी और मैतेई, दोनों समुदायों के संपर्क में है और शांति बहाली के लिए हर प्रकार के प्रयास किए जा रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर विपक्ष संसद भी नहीं चलने दे रहा है, जिसके बाद अमित शाह ने राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी, दोनों को पत्र लिख कर मणिपुर की घटनाओं पर चर्चा के लिए सहयोग माँगा था। 


यहूदियों का खोया हुआ समुदाय या भारत के पहाड़ी जनजातीय? इजरायल लौटने के लिए क्यों बेचैन थे कुकी? सदियों पुराने पलायन का अनसुलझा रहस्य

                   उत्तर-पूर्वी भारत में एक एक सिनेगॉग में प्रार्थना करते 'Bnei Menashe' समाज के लोग
जातीयता से लेकर मजहब, इतिहास और भौगोलिकता कुकी समाज दशकों से अपनी पहचान को अलग-अलग रूप देता रहा है। बताया जाता है कि ये लोग म्यांमार के चीन क्षेत्र से भारत में आए थे। ये इलाका सीमा पर ही स्थित है। बताया जाता है कि चीन-कुकी-मिजो (CHIKUMI) समुदाय अधिकतर ईसाई मजहब का अनुसरण करते हैं। लेकिन, क्या आपको पता है कि उनके पूर्वजों को लेकर एक थ्योरी ये भी है कि ये लोग इजरायल से आकर भारत में बसे थे।

मणिपुर में जब कुकी-मैतेई हिंसा के दौरान कुकी समाज के घरों में आग लगाई गई थी, तब इजरायली मीडिया ने भी इसे खूब कवर किया था। कुकी समाज ने यहूदी राष्ट्र से भी मदद की माँग की है, जिसके बाद एक बार फिर से कुकी-इजरायल संबंधों को लेकर चर्चा शुरू हो गई। ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि मणिपुर में जो आज कुकी समाज रह रहा है, वो क्या है। आइए, इस पर चर्चा करते हैं कि कुकी समाज और इजरायल का क्या संबंध है।

आज का कुकी समाज कौन है

जहाँ तक चीन-कुकी-मिजो जनजातीय समाज की बात है, वो उत्तर-पूर्वी राज्यों मणिपुर, मिजोरम, असम, मेघालय और त्रिपुरा में बसे हुए हैं। ये सामान्यतः म्यांमार और बांग्लादेश से लगी सीमावर्ती इलाकों में ये रहते हैं। उन्हें तिब्बत-बर्मा भाषाई समूह का हिस्सा माना जाता है। इनका ताल्लुक मिजोरम के मिजो और म्यांमार के चीन से भी है। कुकी समाज के भीतर भी 20 समुदाय आते हैं, अधिकतर ईसाई ही हैं। वो माइग्रेशन ही कारण है कि इन्हें ‘नए कुकी’ और ‘पुराने कुकी’ के रूप में जाना जाता है।
‘ओल्ड कुकीज़’ उन्हें कहा जाता है, जो सन् 1600 या उससे पहले नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में माइग्रेट हुए थे। वहीं ‘न्यू कुकीज’ उन्हें कहा जाता है, जो 18वीं या 19वीं सदी में आए। CHIKUMI से जुड़े जितने भी साहित्य हैं, वो बताते हैं कि कई चरणों में इनका पलायन संपन्न हुआ। निश्चित रूप से ये नहीं कहा जा सकता कि वो उत्तर-पूर्वी राज्यों के मूलनिवासी हैं या नहीं। हालाँकि, म्यांमार के चीन स्टेट से आए हुए कुकी समाज के बारे में बहुत कुछ नहीं पता है।

फिर कुकी समाज का इजरायल से क्या संबंध है?

यहूदी मानते हैं कि 3000 साल पहले इजरायल के उत्तरी साम्राज्य के 10 समुदायों को अश्शूर से आए असीरियन लोगों के हमले के कारण पलायन करना पड़ा था। उसके बाद से उनके बारे में बहुत कुछ पता नहीं चल पाया। इजरायली लोगों का मानना है कि उस समय पलायन करने वाले ये लोग वापस आएँगे और तब एक नए युग का प्रारंभ होगा। उस समय इन्हीं में से एक राजा डेविड का वंशज मसीहा भी होगा।
माना जाता है कि जो समुदाय खो गए हैं, वो जहाँ जाकर बसे वहीं की संस्कृति में घुल-मिल गए हैं। कुकी समाज को भी ऐसे ही एक ट्राइब के रूप में जाना जाता है, जिसे वो ‘Bnei Menashe’ कहा जाता है। इन्हें पैगंबर जोसेफ के बेटे बिबिलिकल मनस्सेह के वंशजों के रूप में जाना जाता है। बताया जाता है कि 1950 के दशक में मिजोरम-मणिपुर के 10,000 कुकी लोगों ने ईसाई मजहब छोड़ कर यहूदी मजहब अपना लिया था, जब उन्हें अपनी तथाकथित वास्तविक मातृभूमि का पता चला था।
कैसे ये समुदाय अपने कथित मूलस्थान से परिचित हुआ, इसकी भी एक अलग कहानी है। इसकी शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी। मिजोरम के बुआल्लॉन में मेई चलाह नाम के एक मजहबी मंत्री ने बताया था कि उसने सपने में आया है कि कुकी लोग ज़िओन समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। साथ ही उन्होंने बताया था कि सपने में ये भी आया कि कुकी लोगों को अब अपने मूलस्थान की तरफ लौट चलना चाहिए।
इतिहास की बात करें तो कुकी समाज जीववाद (Animism), अर्थात पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के अलाव प्रकृति की पूजा करता रहा है। साथ ही वो ‘मनमासी’ (मानसिया) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इसके बाद वहाँ मिशनरियों का प्रभाव बढ़ने लगा और कई जनजातीय समुदायों, खासकर कुकी लोगों ने ईसाई मजहब अपना लिया। ये मिशनरी ब्रिटेन और अमेरिका से आए थे। बनेई मेनाशे कम्युनिटी का दावा है कि धर्मांतरण के दौरान उन्होंने ईसाई मजहब और अपने परंपराओं के बीच समानता पाई।
मिशनरियों ने उन्हें खूब बाइबिल की कहानियाँ सुनाईं और खुद की परंपराओं से समानता पाते हुए उन्होंने थोक में धर्मांतरण किया। ब्रिटिश मिशनरियों को भी खुद के और इनकी परंपराओं में समानता मिली। दावा किया जाता है कि कुकी लोगों के कुछ प्राचीन गानों में बाइबिल के शब्द मिलते हैं। ‘सिकपुई हला’ उनमें से ही एक गाना है, एक कुकी सब-ट्राइब हमार द्वारा सदियों से गाया जाता रहा है।
                       मिजोरम का ‘Bnei Menashe’ समाज (फोटो साभार: Timeline YouTube)
ये लोग फसल की कटाई के मौसम ‘सिकपुइरोइ’ के दौरान इसे गाते हैं। ये गाना इजिप्ट से इजरायली लोगों के पलायन की बात करता है। फिर इसमें बताया जाता है कि कैसे लाल सागर ने उन्हें बचाया। ‘लिटेन्टेन ज़िओन’ नाम का एक गीत भी है, जिसका अर्थ है – ‘चलो, जिओन की ओर चलें।’ इजरायल की लोककथाएँ भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में गीत के रूप में कैसे आ गईं, ये एक रहस्य है। ‘सेलाह’, ‘अबोरीज़ा’ और ‘एलो’ जैसे शब्द बाइबिल में कई बार मिलते हैं।
वहीं Pslam की किताब में जहाँ ‘Selah’ शब्द मिलता है, ‘अबोरीज़ा’ एक हिब्रू शब्द है जिसका इस्तेमाल ईश्वर की प्रशंसा के लिए किया जाता है। ‘बुलपिजेम’ नाम की कुकी स्क्रिप्ट में 32 अक्षर हैं और इनका कनेक्शन भी Jews से सामने आता है। बताया जाता है कि ये चीन में राजा शीह हुंगताई के समय खो गया था। ये 214 ईसापूर्व की बात है। बिबिलिकल इजरायलियों से भी कुछ समानताएँ कुकी समाज से हैं।
                                     कुकी ये शॉल ओढ़ते हैं, जो इजरायली शॉल से मिलता-जुलता है
समुदाय ‘Bnei Menashe’ द्वारा ओढ़ी जाने वाली एक प्रकार की शॉल यहूदियों द्वारा प्रार्थना के समय पहनी जाने वाली ‘तल्लीत’ से काफी मिलती-जुलती है। बाइबिल में लिखा है कि ऐसे शॉल के किनारों पर एक नाले रंग की डिजाइन वाला घेरा होना चाहिए, जो ‘Puan’ के लिए भी सटीक बैठता है। ‘Zelengam’ के तथाकथित झंडे में भी एक प्रकार का स्टार है, जिसे ‘स्टार ऑफ डेविड’ भी कहा गया है।
                                 बताया जाता है कि ‘Zelengam’ के झंडे में ‘स्टार ऑफ डेविड’ है
इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारियों के आधार पर रिसर्च करने पर पता चलता है कि माना जाता है कि 30 लाख कुकी ‘Bnei Menashe’ हैं, जिन्हें उत्तरी इजरायल से निकाला गया था और वो सदियों तक चले पलायन में मध्य एशिया तक आए। फिर वो चीन और बर्मा से होते हुए उत्तर-पूर्वी भारत में पहुँचे। बताया जाता है कि उन्हें यहाँ पर ‘Shinlung’ कहा गया, क्योंकि वो चीन में यालुंग नदी के किनारे स्थित छीनलूंगसान से आए थे।

सबूत कहाँ है?

कही-सुनी गई बातों के अलावा इजरायल के ‘Manasseh’ और कुकी समाज के बीच संबंध को लेकर कोई और सबूत नहीं है। 2003 में कुकी समाज के सब ट्राइब्स हमार, कोम, लेंथंग, चांगसां, लुन्किम और हूआलंगो समाज के लोगों का DNA टेस्ट कराया गया, जो नेगेटिव निकला। 2005 में एक अन्य डीएनए टेस्ट में कुछ कनेक्शन निकला। कलकत्ता के सेन्ट्रल फॉरेंसिक इंस्टीट्यूट ने इस टेस्ट सैम्पल्स की जाँच की थी।
इसमें पाया गया कि जहाँ उनके पुरुष वाले हिस्से का कोई विदेशी लिंक सामने नहीं आया, उनके महिला वाले हिस्से का कनेक्शन मध्य-पूर्व से सामने आया। इस रिसर्च में शामिल एक स्कॉलर ने कहा था कि दुनिया के दो अलग-अलग इलाकों में रह रहे समुदायों के डीएनए में समानता मुश्किल है, जब तक वो एक ही जगह से न आएँ रहे हों। एक अन्य रिसर्च में पता चला कि रोग ‘Tay-Sachs’ और हड्डी रोग ‘Saitika-Zenghit’ रोग CHIKIMZO ट्राइब्स के अलावा सेमिटिक यहूदियों में भी पाया जाता है।
हालाँकि, 2005 में कराए गए ये टेस्ट इतने विश्वसनीय नहीं हैं। इजरायल के प्रोफेसर स्कोरकी जेनेटिसिस्ट्स ने पार्शियल सिक्वेंसिंग का सहारा लिया और पूरी तरह से सेक्वेंशिंग नहीं की। उन्होंने कहा था कि हजारों वर्षों बाद कॉमन जेनेटिक ओरिजिन का पता लगा पाना मुश्किल है।

अपनी ‘मूल भूमि’ की तरफ लौटने वाली थ्योरी

1970 के दशक में ‘Bnei Menashe’ का एक समूह इजरायल की यात्रा पर निकला, जहाँ उसने रब्बी एलियाहु अविचाईल से मुलाकात की, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ही इस समुदाय का नामकरण किया। साथ ही ‘Amishav’ नाम का एक NGO (जिसका अर्थ है – मेरे लोग वापस आएँगे) भी है, जो इजरायल से पलायन करने वाले ट्राइब्स को ढूँढने में लगा हुआ है। साथ ही ये संगठन उन्हें वापस यहूदी मजहब में धर्मांतरित करने करने के प्रयास में भी ये लगा रहता है।
उसी साल अविचाईल ने भारत का दौरा कर ‘बनई मेनाशे’ समुदाय के लोगों से मुलाकात की। उन्होंने ही इस समुदाय को इजरायल के करीब लाने में अहम भूमिका निभाई और आइजोल के साथ-साथ इम्फाल में भी धर्मांतरण की शुरुआत की। उन्होंने इस दावे पर भी रिसर्च किया कि उनके इजरायल से पलायन करने की बातों में कितनी सच्चाई है। इम्फाल में येरुसलम के रब्बी ने ‘अमिषाव हाउस’ भी खोला। उसमें एक सिनेगॉग भी है।
उसमें 2 गेस्ट रूम, एक मिक्वाह (परंपरागत नहाने का स्थान), एक क्लासरूम और कर्मचारियों के रहने के लिए क्वार्टर भी हैं। हालाँकि, इजरायल सरकार ने इस समुदाय के इजरायल माइग्रेशन ‘अलियाह’ का समर्थन नहीं किया। 90 के दशक में इस समाज के कुछ लोग इजरायल पर्यटक बन कर पहुँचे और वहाँ बस गए। उन्हें वहाँ की नागरिकता भी मिली और वो यहूदी कहलाए। 1997 में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के डिप्टी कम्युनिकेशंस डायरेक्टर माइकल फ्रूंड को इस समाज का एक पत्र मिला और उन्होंने इनसे मिलने का मन बनाया।
उन्होंने इसके बाद कहा कि उक्त समाज और बिबिलिकल इजरायलियों में काफी समानताएँ हैं। उनकी परंपराओं और विश्वासों में भी उन्हें समानता मिली। उन्होंने इस समाज के माइग्रेशन को सपोर्ट करने के लिए फंड भी इकट्ठा किया। उनका मानना है कि इजरायल का खोया हुआ समुदाय यही है। उनके प्रयासों के कारण हर साल 100 ‘बनई मेनाशे’ को इजरायल में जाकर बसने और यहूदी बनने की अनुमति मिली।
उन्होंने एक ‘Shavei’ नामक एक NGO की भी स्थापना की, जिसने इजरायल की खोई हुई ट्राइब्स को वापस लेकर बसाने को अपना लक्ष्य बताया। 2003 तक इस समाज के 1000 लोगों को इजरायल में बसाया जा चुका था। उसी साल इजरायल के तत्कालीन इंटीरियर मिनिस्टर अवराहम पोराज ने कुछ राजनीतिक और मजहबी कारणों से फिर इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी। लेकिन, फ्रूंड इसके लिए प्रयास करते रहे और 2005 में एक फैसला कराया कि इस समाज को यहूदियों का ही हिस्सा माना जाए।
इस फैसले के बाद उनके NGO का खासा उत्साहवर्धन हुआ और उन्होंने मिजोरम और मणिपुर में धर्मांतरण के लिए सेंटरों की स्थापना की। अगर ‘Bnei Menashe’ को यहूदी का दजा मिल गया तो वो बिना रोकटोक इजरायल में जाकर बस सकेंगे। 2006 में इस प्रक्रिया के तहत 218 ऐसे लोगों को ‘Bnei Menashe’धर्मांतरित कर इजरायल ले जाया जाना था, लेकिन भारत सरकार ने इस पर आपत्ति दर्ज कराई। बताया जाता है कि 10,000 लोग इजरायल जा चुके हैं।

क्या कुकी और ‘Bnei Menashe’ को उनकी असली भूमि मिल गई?

यहूदियों ने भी कुकी समाज के ‘Bnei Menashe’ होने के दावों पर आपत्ति जताई है। भारत और इजरायल की सरकारों ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई है। इजरायल के कई नेता भी इन्हें यहूदी नहीं मानते। इजरायली आलोचकों का कहना है कि उन्हें वेस्ट बैंक और गाजा से लगे इलाकों में जानबूझकर एक साजिश के तहत बसाया गया। बेंजामिन नेतन्याहू इन्हें वहाँ बसाने के पक्ष में थे, ऐसे में वो अपने देश में विवादों के केंद्र में भी आ गए।
इस समाज को पूरी तरह यहूदी कहलाने के लिए भी काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा। स्टैण्डर्ड ऑफ लिविंग से लेकर आर्थिक स्थिति तक, शुरुआत में बिल्कुल भी इस समाज को समर्थन नहीं मिला। कइयों ने नागरिकता ली और इजरायल की सेना में भी शामिल हुए। भारत में इस धर्मांतरण के खिलाफ भी आवाज उठी। इसमें कोई शक नहीं है कि कुकी समाज में अधिकतर प्रवासी ही रहे हैं।
वहीं दूसरी तरफ ‘कुकी नेशनल ऑर्गेनाइजेशन (KNO)’ का नेता पीएस हाओकीप अभियान चला रहा है कि पूरे कुकी समाज को एक ‘Zelengam’ के अंतर्गत लाया जाए। इसे ‘लैंड ऑफ फ्रीडम’ भी कहा जाता है और यहूदी थ्योरी ही मानी जाती है। कुकी समाज की कई पहचान है, जिससे वो कहाँ से ताल्लुक रखते हैं इस पर संशय बना रहता है। अब इस पर और रिसर्च हो या कोई सबूतों वाला इतिहास निकले तो इस बारे में और पता चलेगा। इतिहास के गर्त में छिपा पलायन के इस रहस्य से पूरी तरह पर्दा हटना अभी बाक़ी है।(साभारPragya Bakshi Sharma
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राजस्थान : मणिपुर की बजाए हमें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए : मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा

                                        अशोक गहलोत ने मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा को बर्खास्त किया
मोदी विरोधियों ने जिस षड़यंत्र के चलते मणिपुर मुद्दा उछाला, लेकिन तीर उल्टा विपक्ष की ओर चला गया। कांग्रेस पार्टी मणिपुर की घटना को लेकर भाजपा पर हमलावर है। मणिपुर में 3 महिलाओं को भीड़ द्वारा नग्न कर के जुलूस निकाला गया और उनका गैंगरेप किया गया। घटना के ढाई महीने बाद वीडियो वायरल हुआ। संसद के मॉनसून सत्र का पहले दिन इसकी ही भेंट चढ़ गया। कांग्रेस  पार्टी राजस्थान के विधानसभा में भी इस पर चर्चा करना चाहती थी, लेकिन उनके अपने ही मंत्री ने कुछ ऐसा कहा, जिससे राजस्थान सरकार की कलई खुल गई।

उन्होंने विधानसभा में कहा, “सच्चाई ये है कि महिलाओं की सुरक्षा में हम असफल रहे। राजस्थान में जिस तरह से महिलाओं के ऊपर अत्याचार बढ़े हैं, मणिपुर की बजाए हमें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए।” उनके इस बयान पर भाजपा विधायकों ने मेज थपथपाई। इसके बाद नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने संविधान के अनुच्छेद-162(2) हवाला देते हुए कहा कि ये सरकार सामूहिक जिम्मेदारी से चलती है। फिर उन्होंने समझाया कि संविधान कहता है कि अगर एक मंत्री बोल रहा है तो समझिए पूरी सरकार बोल रही है।

राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि मंत्री महोदय ने सरकार की कलई खोल दी है। उन्होंने कहा, “मैं मंत्री महोदय को तो बधाई दूँगा ..., लेकिन ये शर्मनाक बात है मर्दों के प्रदेश वाले मंत्री जी।” बता दें कि मार्च 2022 में राजस्थान के संसदीय कार्यमंत्री शांति धारीवाल ने विधानसभा में बलात्कार की घटनाओं पर चर्चा के दौरान हँसते हुए कहा था कि राजस्थान ‘मर्दों का प्रदेश’ है।कॉन्ग्रेस के कई मंत्री-विधायक भी इस दौरान हँसे थे और किसी ने उन्हें टोका तक नहीं था।

राजस्थान में बढ़ा महिला अपराध

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा को पद से बर्खास्त कर दिया है। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध पर अपनी ही सरकार को आईना दिखाया था। विधानसभा का ये वीडियो सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल हो गया। साथ ही मणिपुर के वायरल वीडियो पर राजनीति कर रही कांग्रेस को झटका लगा था। अब खबर आ रही है कि राजेंद्र सिंह गुढ़ा को पद से हटा दिया गया है, अब वो राजस्थान सरकार में मंत्री नहीं रहे।

राजस्थान: मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा बर्खास्त किए गए

राज्यपाल कलराज मिश्रा ने मुख्यमंत्री की सिफारिश को मंजूर करते हुए राजेंद्र सिंह गुढ़ा की बर्खास्तगी पर मंजूरी की मुहर लगा दी है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राजभवन से सिफारिश की थी कि मंत्री को त्वरित रूप से उनके पद से बर्खास्त किया जाए। याद दिला दें कि राजेंद्र सिंह गुढ़ा उन 6 बसपा विधायकों में शामिल थे, जिन्होंने सितंबर 2019 में कांग्रेस का दामन थाम लिया था। वो झुंझनू के उदयपुरवाटी से दूसरी बार विधायक बने हैं।
पिछले 1 साल में कई मौकों पर राजेंद्र सिंह गुढ़ा का बयान पार्टी लाइन से अलग गया था। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कांग्रेस आलाकमान की मंजूरी मिलने के बाद ये कदम उठाया है। इसीलिए, उनके बयान के कुछ देर बाद ही उनकी बर्खास्तगी की फ़ाइल को राजभवन भेज दिया गया। 21 जुलाई, 2023 को उनका बयान आया और उसी दिन रात तक बर्खास्तगी का आदेश भी।
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मणिपुर में 3 महिलाओं को भीड़ द्वारा नग्न कर के जुलूस निकाला गया और उनका गैंगरेप किया गया। घटना के ढाई महीने बाद वीडियो वायरल हुआ। संसद के मॉनसून सत्र का पहले दिन इसकी ही भेंट चढ़ गया। कांग्रेस पार्टी राजस्थान के विधानसभा में भी इस पर चर्चा करना चाहती थी, लेकिन उनके अपने ही मंत्री ने कुछ ऐसा कहा, जिससे राजस्थान सरकार की कलई खुल गई। राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस विधायक मणिपुर काण्ड पर भाजपा विरोधी तख्तियाँ लहरा रहे थे।
राजेंद्र सिंह गुढ़ा ने विधानसभा में कहा था, “सच्चाई ये है कि महिलाओं की सुरक्षा में हम असफल रहे। राजस्थान में जिस तरह से महिलाओं के ऊपर अत्याचार बढ़े हैं, मणिपुर की बजाए हमें अपने गिरेबान में झाँकना चाहिए।” उनके इस बयान पर भाजपा विधायकों ने मेज थपथपाई। इसके बाद नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने संविधान के अनुच्छेद-162(2) हवाला देते हुए कहा कि ये सरकार सामूहिक जिम्मेदारी से चलती है। फिर उन्होंने समझाया कि संविधान कहता है कि अगर एक मंत्री बोल रहा है तो समझिए पूरी सरकार बोल रही है।

35 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ रहे योगी आदित्यनाथ, मणिपुर में भी BJP सरकार, गोवा-उत्तराखंड में काँटे की टक्कर,पंजाब में AAP की बड़ी जीत

उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी, गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत, यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ, 
मणिपुर के मुख्यमंत्री एन वीरेन सिंह और पंजाब में AAP के मुख्यमंत्री उम्मीदवार भगवंत मान (बाएँ से दाएँ)

पाँचों राज्यों के विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल्स सामने आ गए हैं। जानिए उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में किसको कितनी सीटें मिल रही हैं। जहाँ उत्तर प्रदेश और मणिपुर में भाजपा को स्पष्ट विजेता बताया जा रहा है, गोवा और उत्तराखंड में कॉन्ग्रेस के साथ उसकी काँटे की टक्कर बताई जा रही है। वहीं पंजाब में AAP को लगभग सभी एग्जिट पोल्स ने पूर्ण बहुमत मिलते दिखाया है। 

वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की वापसी उत्तर प्रदेश में 35 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ने के अलावा उस मिथ्या को भी गलत सिद्ध करने जा रहे हैं, जो पिछली मुख्यमंत्रियों ने नोएडा जाने वाले वाले को पदमुक्त होने की बना रखी थी। योगी ने नोएडा में एक बार नहीं बल्कि 4/5 बार पदापर्ण किया। आइए, देखते हैं किस राज्य में किस पार्टी को कौन से एग्जिट पोल कितनी सीटें दे रहे हैं।

403 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा को ‘ABP News-CVoter’ ने 228-244, ‘ETG Research’ ने 230-245, ‘India News’ ने 222-260, ‘India TV -Ground Zero Research’ ने 182-220, ‘India TV-CNX’ ने 240-250, ‘India Today- Axis My India’ ने 288-326, ‘News 24- Todays Chanakya’ ने 294, ‘NewsX-Polstrat’ ने 212-225, ‘Republic-P Marq’ ने 240, ‘Times Now-VETO’ ने 225 और ‘Zee News-DESIGNBOXED’ ने 223-248 सीटें मिलते हुए दिखाया है।

वहीं 117 सीटों वाले पंजाब में ‘ABP News-CVoter’ ने AAP को 51-61, ‘ETG Research’ ने 70-75, ‘India News’ ने 39-43, ‘India TV -Ground Zero Research’ ने 27-37, ‘India Today- Axis My India’ ने 76-90, ‘News 24- Todays Chanakya’ ने 100, ‘NewsX-Polstrat’ ने 56-61, ‘Republic-P Marq’ ने 62-70, ‘Times Now-VETO’ ने 70 और ‘Zee News-DESIGNBOXED’ ने 52-61 सीटें मिलते हुए दिखाया है।

70 विधानसभा सीटों वाले उत्तराखंड में भाजपा को ‘ABP News-CVoter’ ने 26-32, ‘ETG Research’ ने 37-40, ‘India News’ ने 32-41, ‘India TV -Ground Zero Research’ ने 25-29, ‘India TV-CNX’ ने 35-43, ‘India Today- Axis My India’ ने 36-46, ‘News 24- Todays Chanakya’ ने 43, ‘NewsX-Polstrat’ ने 31-33, ‘Republic-P Marq’ ने 35-39, ‘Times Now-VETO’ ने 37 तो ‘Zee News-DESIGNBOXED’ ने 26-30 सीटें दी हैं।

40 सीटों वाले गोवा में भाजपा को ‘ABP Majha-C Voter’ ने 13-17, ‘ETG Research’ ने 17-20, ‘India News’ ने 13-19, ‘India TV -Ground Zero Research’ ने 10-14, ‘India TV-CNX’ ने 16-22, ‘India Today- Axis My India’ ने 16-18, ‘NewsX-Polstrat’ ने 17-19, ‘Republic-P Marq’ ने 13-17, ‘Times Now-VETO’ ने 14 और ‘Zee News-DESIGNBOXED’ ने 13-18 सीटें मिलने का अंदाज़ा लगाया है।

वहीं 60 विधानसभा सीटों वाले उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर की बात करें तो यहाँ ‘ABP Majha-C Voter’ ने भाजपा को 23-27, ‘India News’ ने 23-28, ‘India TV -Ground Zero Research’ ने 26-31, ‘India Today- Axis My India’ ने 33-43, Republic-P Marq ने 27-31 और ‘Zee News-DESIGNBOXED’ ने 32-38 सीटें दी हैं। अब देखना है कि 10 मार्च को नतीजे आने पर किसके आँकड़े कितने सटीक बैठते हैं।

मणिपुर : भाजपा के झंडे पर गाय को लिटाया और काट दिया : अब्दुल राशिद, नजबुल हुसैन और मोहम्मद आरिफ खान गिरफ्तार

                                                                        प्रतीकात्मक 
मणिपुर में लिलोंग पुलिस ने तीन युवकों अब्दुल रशीद, नजबुल हुसैन और मोहम्मद आरिफ खान को गाय की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया है। गाय को काटने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें कुुछ युवाओं को भारतीय जनता पार्टी के झंडे पर गाय को काटते हुए देखा जा सकता है। वीडयो वायरल होने के बाद आरोपितों को पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार कर मामला दर्ज किया गया है।

आरोपित जिस उम्मीदवार का समर्थन कर रहे थे, उसे बीजेपी द्वारा टिकट नहीं दिए जाने के बाद इस घटना को अंजाम दिया गया। गाय की हत्या का जो वीडियो इंटरनेट पर वायरल हुआ है वह 29 सेकंड का है। इसमें 10 युवाओं के एक समूह (शायद मुस्लिम) को भाजपा के झंडे पर गोवंश का गला काटते हुए देखा जा सकता है। भीड़ ने मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह और भाजपा मणिपुर इकाई के अध्यक्ष अधिकारीमयुम सारदा देवी को भी गालियाँ दी।

यह भी आरोप है कि समुदायों के बीच कलह और दुश्मनी की भावनाओं को बढ़ावा देने की कोशिश के तहत सोशल मीडिया पर वीडियो अपलोड किया गया। इंफाल पश्चिम जिले के लिलोंग पुलिस के अधिकारियों ने इस घटना की पुष्टि की। उनका मानना था कि इससे क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती थी और विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच सांप्रदायिक सद्भाव बाधित हो सकती थी।

घटना पर स्वत: संज्ञान लेते हुए पुलिस ने लिलोंग पुलिस स्टेशन में FIR संख्या 10(01)2022 के अंतर्गत आईपीसी की धारा 153ए, 429, 504 और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के धारा 11(1) तहत मामला दर्ज किया। पुलिस ने फिलहाल जिन तीन आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया है, उसमें मोहम्मद अब्दुल रशीद (28), नजबुल हुसैन (38) और मोहम्मद आरिफ खान (31) का नाम शामिल है।

240 सीटों के साथ उत्तर प्रदेश में फिर से योगी सरकार, 5 में से 4 राज्यों में BJP को बहुमत: सर्वे में राम मंदिर और काशी कॉरिडोर से पब्लिक गदगद

‘टाइम्स नाउ’ और ‘टाइम्स नाउ नवभारत’ के ओपिनियन पोल्स में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ की सत्ता में वापसी तय दिख रही है। सर्वे के अनुसार भाजपा की उत्तर प्रदेश में वापसी 35 साल का रिकॉर्ड टूटेगा। जब सत्तारूढ़ पार्टी की वापसी होगी। जहाँ ‘टाइम्स नाउ’ के हिसाब से भाजपा को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में 227-254 सीटें मिलने का अनुमान है, ‘टाइम्स नाउ नवभारत’ ने पार्टी को 240 सीटें मिलने का अंदेशा जताया है। समाजवादी पार्टी को ‘TN नवभारत’ के ओपिनियन पोल में 143 और मायावती की बसपा को 10 सीटें मिलती दिख रही हैं।

वहीं वोट प्रतिशत के मामले में भी भाजपा का ही बोलबाला दिखाया जा रहा है। चैनल द्वारा किए गए ओपिनियन पोल की मानें तो भाजपा 39.4% वोटों के साथ पहले नंबर पर रहेगी और अखिलेश यादव की सपा 34.6% वोट के साथ दूसरे नंबर पर। बसपा को 12.9% और कांग्रेस  को 6.9% वोट मिलता दिखाया गया है। कांग्रेस को इस ओपिनियन पोल में महज 8 सीट ही दी गई है, जो दिखाता है कि पार्टी की दुर्गति बनी रहेगी। कांग्रेस पार्टी के प्रचार की कमान प्रियंका गाँधी संभाल रही हैं।

वहीं अगर उत्तराखंड की बात करें तो TNN के ओपिनियन पोल में यहाँ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी एक बड़े बहुमत के साथ सत्ता में लौटते दिख रहे हैं। पहाड़ी राज्य में भाजपा को 48 और कांग्रेस को 14 सीटें मिलती हुई दिख रही हैं। वहीं आम आदमी पार्टी (AAP) भी राज्य में अपना खाता खोलेगी और उसे 7 सीटें मिलती हुई दिख रही हैं। इस तरह भाजपा यहाँ दो तिहाई बहुमत से सत्ता में वापस आती दिख रही है। पार्टी को पिछले एक साल में 3 बार मुख्यमंत्री का बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

सबसे चौंकाने वाले नतीजे पंजाब के दिखाए जा रहे हैं, जहाँ AAP की सरकार बनती हुई दिख रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पार्टी को यहाँ 56 सीटों पर जीत मिलते हुए दिखाया गया है, जबकि कांग्रेस 44 पर रह जाएगी। ‘शिरोमणि अकाली दल (SAD)’ को 13 और भाजपा को महज 2 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। गोवा में भी AAP 10 सीटें जीतते हुए दिख रही है, जबकि 20 सीटों के साथ भाजपा बहुमत प्राप्त करती हुई दिख रही है।

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योगी आदित्यनाथ बनेंगे दोबारा यूपी के मुख्यमंत्री, राज्य में लोगों की पहली पसंद: जन की बात ओपिनि
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योगी आदित्यनाथ बनेंगे दोबारा यूपी के मुख्यमंत्री, राज्य में लोगों की पहली पसंद: जन की बात ओपिनि

इस ओपिनियन पोल की मानें तो मणिपुर में भी भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में वापसी करेगा। वहीं ‘टाइम्स नाउ’ के हिसाब से 57.84% लोगों का कहना है कि राम मंदिर और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण से भाजपा को फायदा होगा, जबकि 36.73% लोग इसके उलट सोच रखते हैं। जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ‘जाटलैंड’ कहा जाता है और जहाँ किसान आंदोलन का असर था, वहाँ भी भाजपा को 37.61% वोट मिलते दिख रहे हैं। 46.32% लोगों ने कहा कि योगी आदित्यनाथ की सरकार किसान विरोधी नहीं है।

ABP-सी वोटर का सर्वे : उत्तर प्रदेश समेत 4 राज्यों में खिलेगा ‘कमल’, पंजाब में झाडू

जब भी देश में कहीं भी चुनाव होने को होते हैं, पोल सर्वे आने लगते हैं, कितने सही उतरते हैं, कितने गलत यह चुनाव परिणाम आने पर ही सामने आता है। साल 2022 में पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों पर इस समय सबकी नजरें हैं। ऐसे में एबीपी न्यूज के सी वोटर ने जनता का रुख जानने के लिए इन पाँचों राज्यों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब) में 1 लाख 7 हजार से अधिक लोगों पर सर्वे किया है। इस सर्वे में जो नतीजे निकल कर आए हैं वो कुछ लोगों की अपेक्षाओं से मेल खाते हैं वहीं कुछ के लिए ये संतोषजनक नहीं है।

सबसे ज्यादा नजरें इस बार उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर हैं। वहाँ कुल 403 विधानसभा सीटों पर वोट पड़ने हैं। कुछ लोग मान रहे हैं कि इस बार उत्तर प्रदेश में बीजेपी दोबारा लौटकर रिकॉर्ड बनाएगी और कुछ को अखिलेश यादव के आने की उम्मीद है। बीजेपी के पुनः सत्ता में आने के कई कारण माने जा रहे हैं, जैसे योगी राज में हिन्दू अपने तीज-त्यौहार जिस उत्साह से मना रहे हैं, तुष्टिकरण के चलते उतने उत्साह से कभी नहीं मना पाते थे; दूसरे, वर्षों से विवादित रहे अयोध्या में राममंदिर के पुनः निर्माण का श्रीगणेश होना, प्रदेश में गुंडागर्दी पर लगाम, पहले से अधिक बिजली सप्लाई आदि का सामान्य जनजीवन पर बहुत असर पड़ने के कारण लोग उत्तर प्रदेश में वापस योगी सरकार को ही चाहते हैं। ऐसे में एबीपी सी-वोटर सर्वे के अनुसार यूपी में भाजपा को 213 से 221 सीट मिलने का अनुमान है, जबकि अखिलेश यादव की सपा को 152-160 सीट मिल सकती हैं। इस सर्वे में मायावती की बसपा को 16-20 सीट मिलने की बात कही गई है और कांग्रेस के हिस्से 6-10 सीट आ सकती है। यूपी में बीजेपी का वोट शेयर सबसे आगे है। पार्टी को 41% वोट मिल सकते हैं। वहीं सपा 31%, बीएसपी 15%, कांग्रेस 9% और अन्य को 4% वोट मिलने का अनुमान है।

उत्तर प्रदेश में जहाँ भाजपा के साथ सपा की कड़ी टक्कर है। वहीं उत्तराखंड में बीजेपी के सामने कांग्रेस चुनौती है। सी वोटर सर्वे के अनुसार बीजेपी को प्रदेश में 41% वोट शेयर के साथ 36-40 सीट मिलेंगी जबकि कांग्रेस इस सर्वे में ज्यादा पीछे नहीं है वहाँ पार्टी को 36 % वोट शेयर के साथ 30-34 सीट मिलने का अनुमान है। आम आदमी पार्टी के खाते में 0-2 सीटें आ सकती हैं।

इसके बाद गोवा में सीधे-सीधे भाजपा के लौटने के आसार है। यदि इस सर्वेक्षण की मानें तो भारतीय जनता पार्टी के इर्द-गिर्द कोई पार्टी नहीं है। यहाँ भाजपा के खाते में 19-23 सीटें आती दिख रही हैं जबकि कांग्रेस 2-6 सीट पाकर सिमटती दिख रही है। AAP को भी यहाँ 3-7 सीट मिलेगी और अन्य के खाते में 8-12 सीटें आएँगी।

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा की तरह मणिपुर में भारतीय जनता पार्टी के लौटने के आसार हैं। सर्वे में 25-29 सीट बीजेपी के खाते में, 20-24 सीट कांग्रेस के हिस्से में वहीं एनपीएफ 4-7 सीट मिल सकती हैं। वोट शेयर की बात करें तो बीजेपी को 39फीसद वोट मिलेंगे, कांग्रेस को 33%,एनपीएफ को 9% और अन्य के हिस्से 19% वोट आएँगे।

इसके बाद पंजाब में न बीजेपी और न ही कांग्रेस के पास सत्ता आती दिख रही है बल्कि अनुमान है कि इस बार आम आदमी पार्टी बाजी मारेगी। कांग्रेस ने 2017 में वहाँ 70 सीट पर विजय प्राप्त की थी लेकिन अब 42 से 50 सीटों में वह सिमटते दिख रहे है। क्योकि सिद्धू और अमरिंदर सिंह हुए घमासान ने कांग्रेस को बहुत नुकसान पहुँचाया है। चुनाव में आम आदमी पार्टी को 47 से 53 सीट मिल सकती है और बीजेपी को यहाँ 16 से 24 सीट के बीच सीट पाकर ही संतोष करना पड़ेगा।

आम आदमी पार्टी की आशाओं पर पानी वर्तमान में दिल्ली में यमुना के दूषित जल में छठ पर्व का मनाना, किसी न किसी विभाग का वेतन रोकना, कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों को दिल्ली से भागने के लिए मजबूर करना आदि कारण इसे सत्ता से दूर कर सकते हैं। लेकिन दिल्ली की भांति पंजाब में भी बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए आप और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार बनने से भी इंकार नहीं किया जा सकता।   

गोवा, मणिपुर के बाद त्रिपुरा भी कोरोना फ्री

त्रिपुरा, कोरोना

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
एक तरफ सरकार कोरोना को हराने में व्यस्त है, तो दूसरी तरफ साम्प्रदायिक तत्व हिन्दू-मुस्लिम कर जनता को भड़काने में व्यस्त हैं। 2014 और 2019 में अपनी दुर्दशा होने के बावजूद तुष्टिकरण करने वाले बाज़ नहीं आ रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुस्लिमों से भेदभाव को आधार बनाकर पत्र लिखने वाले राष्ट्र को बताएं कि मोदी ने अब तक जितनी भी जनहित योजनाएं लागू की हैं, उनसे कितने मुसलमान लाभाविंत हो रहे हैं? हिम्मत है तो बताओं उनकी संख्या। ऐसे संकट के समय हिन्दू-मुसलमान करते शर्म नहीं आती। इस कदम से जितने भी हस्ताक्षरी हैं, अपनी योग्यता को मद्देनज़र रख बताएं कि क्या यह समय हिन्दू-मुसलमान का रोना रोने का है? क्यों और किसको पागल बना रहे हो? किस मुसलमान को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा? 
वास्तव में यदि कोरोना बीमारी 2014 में मोदी सरकार बनने से पूर्व आयी होती, निस्संदेह भारत में संक्रमितों की संख्या अमेरिका, स्पेन और इटली से अधिक होती। चीन तो अपना वास्तविक आंकड़ा छुपा रहा है। 
गोवा और मणिपुर के बाद अब त्रिपुरा कोरोना वायरस के संक्रमण से मुक्त हो गया है। गुरुवार (अप्रैल 23, 2020) को राज्य के दूसरे और आखिरी मरीज की रिपोर्ट निगेटिव आई। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी है।
मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने ट्वीट कर कहा, “माँ त्रिपुरसुंदरी जी के आशीर्वाद से तथा माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के दिखाए मार्ग से प्रेरित होकर, हमारा अपना त्रिपुरा आज कोरोना मुक्त हो गया है। आशा है कि जल्द ही पूरा भारत और फिर पूरा विश्व इस वैश्विक महामारी से मुक्त होगा।”
इसके बावजूद उन्होंने लोगों से सरकारी गाइडलाइन्स और सोशल डिस्टेंसिंग को फॉलो करने की अपील की है। बता दें कि, त्रिपुरा में अब तक सिर्फ दो ही कोरोना मरीज़ मिले थे। दोनों अब संक्रमण से स्वस्थ हो चुके हैं। मुख्यमंत्री ने सभी डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों, अग्रणी पंक्ति के योद्धाओं और जनता को राज्य को कोरोना मुक्त करने में योगदान के लिए आभार जताया।
सीएम देब ने एक अन्य ट्वीट में लिखा, “त्रिपुरा में कोरोना के दूसरे मरीज की टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आई है। इसके साथ ही हमारा राज्य कोरोना से मुक्त हो गया है। मैं सभी से अनुरोध करता हूँ कि वह सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखें और सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करें। घर पर रहिए, सुरक्षित रहिए।”


त्रिपुरा में पहली कोरोना मरीज एक महिला थी जो गोमती जिले के उदयपुर शहर की रहने वाली थी। वह लॉकडाउन से ठीक पहले राज्य में वापस लौटी थी। 6 अप्रैल को उसकी टेस्ट रिपोर्ट पॉजिटिव आई। ठीक होकर 16 अप्रैल को उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी।
उन्हें बाद में गोमती जिले के क्वारांटाइन केंद्र में शिफ्ट कर दिया गया था। वहीं दूसरा मरीज त्रिपुरा राज्य राइफल्स का एक जवान था जो 16 अप्रैल को उत्तरी त्रिपुरा के डामचेरा में पॉजिटिव पाया गया था। उसे जीबी पंत अस्पताल में भर्ती कराया गया था। गुरुवार को उसकी टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आई है।
दो राज्य पहले ही कोरोना मुक्त हो चुके हैं 
कोरोना मुक्त होने वाला देश का पहला राज्य गोवा है। दूसरे नंबर पर मणिपुर है। त्रिपुरा तीसरा राज्य है जहाँ कोरोना के एक भी मरीज नहीं हैं। पिछले दिनों गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने ऐलान किया था कि राज्य अब कोरोना से मुक्त हो गया है। उन्होंने इसे राज्य को लिए संतुष्टि और राहत की बात बताते हुए सभी डॉक्टरों, मेडिकल और पैरा मेडिकल कर्मचारियों का आभार जताया था। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने ट्वीट कर मणिपुर के कोरोना मुक्त होने की जानकारी दी थी।