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पवित्र पहाड़ी पर मद्रास हाई कोर्ट का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आने पर मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने वाली कहानी गढ़ने में जुट गया The News Minute

                                           थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी ( फोटो साभार-द न्यूज मिनट्स)
तमिलनाडु के मदुरै में स्थित प्रसिद्ध ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव का कारण रहा है। हालाँकि मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में अपना फैसला सुना कर भगवान मुरुगन की इस पहाड़ी पर विवाद खत्म करने की कोशिश की है।

पहाड़ी के नाम से लेकर सुल्तान सिकंदर बधुशा दरगाह (मंदिर) में पशु बलि की प्रथा और नेल्लितोप्पु क्षेत्र में मुसलमानों के इबादत करने के अधिकार पर अक्टूबर में मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, जिसकी काफी चर्चा की गई।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पवित्र स्थल का नाम ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी‘ ही रहेगा, सिविल न्यायालय के फैसले तक पशु बलि पर प्रतिबंध रहेगा और मुसलमान केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान ही नेल्लितोप्पु क्षेत्र में शर्तों के साथ इबादत कर सकेंगे।

यह जगह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी पूजनीय है, क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी का मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह निवास स्थानों में एक माना जाता है।

फिर भी, वामपंथी मुखपत्र ‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट के फैसले के बावजूद इस मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की है। इसका मकसद धार्मिक भावनाओं को भड़काना और भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना है। 5 नवंबर को प्रकाशित ‘दक्षिण की अयोध्या – अनादि काल की एक समयरेखा’ शीर्षक वाले लेख में, मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की झूठी कोशिश की गई। इसके लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।

‘अयोध्या’ का जिक्र किए जाने से साफ पता चलता है कि मीडिया हाउस इस लेख के जरिए क्या हासिल करना चाहता है। इस दौरान इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया गया कि राम जन्मभूमि का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। हालाँकि, यह वामपंथी प्रोपेगेंडा ऐसे फैसलों को तभी स्वीकार करता है जब वे उनके अनुसार हो। वरना वे हर संस्था को समझौतावादी बताते हैं या फैसलों का सम्मान नहीं करते, जैसा कि इस स्थिति में भी हुआ।

मुस्लिम को ‘पीड़ित’ बता बीजेपी पर हमला तेज

आर्टिकल में 4 जुलाई को 52 वर्षीय रसोइये सैयद अबुताहिर के साथ हुए एक साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जो तिरुपरनकुंड्रम स्थित दरगाह पर एक बकरे की बलि देना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि ‘सुन्नी मुसलमानों ने अपनी सूफी तीर्थयात्रा की तारीख क्रिसमस पर बदल दी। ताकि उनके गैर-ब्राह्मण हिंदू पड़ोसी इस उत्सव में शामिल हो सकें।”

हालाँकि, एक पुलिस निरीक्षक ने उन्हें बताया कि यहाँ पशुबलि निषेध है और उन्हें रोक दिया। दरगाह समिति के सदस्यों, स्थानीय जमात और कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। इस दौरान आरोप लगा कि केवल मुस्लिम पुरुषों पर ही एफआईआर दर्ज कीं, जबकि हिंदुओं, महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया।

इस लेख की शुरुआत में मुसलमानों को ऐसे चित्रित किया गया, जैसे वे काफी प्यार से रहते हैं और ‘गैर ब्राह्मण’ हिन्दुओं के लिए अपनी आस्था तक कुर्बान कर देते हैं। लेख में थोड़ा आगे बढ़ते ही हिंदू मुन्नानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला शुरू हो गया। जाहिर तौर पर वामपंथी प्रोपेगेंडा शुरू था, ताकि राज्य विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही इस मुद्दे को तूल दिया जा सके। लेख में हिन्दुओं पर पहाड़ी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए राज्यव्यापी आंदोलन चलाने का भी आरोप लगाया गया।

मीडिया संस्थान ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू वर्ग दरगाह में नमाज पढ़ने और पशु बलि पर रोक लगाना चाहते थे, क्योंकि उनका तर्क था कि यह पूरी चट्टान हिंदू देवता मुरुगन के शरीर का प्रतिनिधित्व करती है।

अबुताहिर ने तो यह भी आरोप लगाया कि इस स्थल पर मुस्लिम प्रथाओं को लेकर वर्षों से कोई समस्या नहीं रही है, और यह भी कहा कि अगर पहले कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब भी नहीं होनी चाहिए।

सबसे पहले तो यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि कोई खास प्रथा वर्षों से चली आ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जारी रहने दिया जाना चाहिए। क्या इसी तरह तीन तलाक कानून जैसी प्रथाओं को भी वैसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था, जैसा पहले था। इसके लिए कानूनी बदलाव ये बताता है कि प्रथाएँ हमेशा सही नहीं होती।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई हालिया विवाद नहीं है, बल्कि एक सदी से भी ज़्यादा समय से चला आ रहा है। हिंदुओं ने हमेशा से पूरी पहाड़ी पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है, खासकर 1920 में दरगाह द्वारा मंडप बनाने के प्रयास के बाद से।

‘समन्वित पूजा स्थल’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ स्थल होने का दावा

लेख के अनुसार, जब पुलिस ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया, तब न तो स्थानीय भाजपा इकाई और न ही कोई अन्य हिंदुत्व संगठन ‘तस्वीर में’ था। पुलिस को पशु बलि के संबंध में तिरुपरनकुंड्रम के किसी भी हिंदू निवासी से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी।

दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया और दलीलों के दौरान दावा किया कि यह एक ‘समन्वित पूजा स्थल है जहाँ दोनों या सभी धर्मों के तीर्थयात्री आते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दरगाह में हलाल समारोह आयोजित करने वाला व्यक्ति परमशिवम नाम का एक हिंदू है, जो मुक्कुलाथोर या थेवर समुदाय का सदस्य है।’

परमशिवम के बेटे का हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र भी लेख में दिखाया गया है, जिसमें उसे ‘दरगाह का भक्त’ बताया गया है। लेख में कहा गया है कि परमशिवम का परिवार ‘हलाल’ करता है और एक पुराने अनुष्ठान के तहत मांस का एक हिस्सा अपने पास रखता है।

                                            (फोटो साभार- तमिलनाडु टूरिज्म)

इस्लामी आस्था के प्रतीक दरगाह को समन्वित संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थल के रूप में बताया गया है। साथ ही कहा गया कि इसके कार्यक्रम में हिंदू भी भाग लेते हैं, जो बेहद निराशाजनक है।

ईद या क्रिसमस पर हिंदुओं की भागीदारी या किसी मंदिर में गैर-हिंदुओं का जाना, इन अवसरों या स्थलों की धार्मिक प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाता। इससे धार्मिक तत्वों को अलग नहीं किया जा सकता, भले ही इनमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हों।

इसी तरह, जब हिंदू सैकड़ों वर्षों से पहाड़ी पर अपने वैध दावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगातार इससे वंचित रखा जा रहा है, तो यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है?

दरगाह के कार्यक्रमों में शामिल कुछ हिंदुओं की हरकतें, व्यापक हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिन्दुओं की आस्था को दूसरों की आस्था के समान ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

फर्जी बयान को बनाए रखने के लिए आधिकारिक बयानों पर संदेह

तिरुपरनकुंद्रम राजस्व निरीक्षक के अनुसार, “दरगाह तक जाने वाले आम रास्ते को मुसलमानों ने जाम कर दिया था। उन्होंने बताया कि मुस्लिमों ने ‘पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका’ और शिकायत में ‘पुलिस अराजकता मुर्दाबाद’ समेत कई विवादित नारे लगाए गए।” लेख में सवाल किया गया कि एक समुदाय के तीर्थयात्रियों को दूसरे समुदाय के तीर्थयात्रियों को दरगाह तक जाने देने में क्या आपत्ति हो सकती है?

                                                          साभार- आउटलुक ट्रेवलर

इसका जवाब शायद वैसा ही हो सकता है जैसे हर त्योहार पर हिंदू जुलूसों पर हमले होते हैं और उन्हें अक्सर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाती। हालाँकि, वामपंथी लॉबी इस चर्चा के लिए तैयार नहीं है और न ही कभी होगी। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात उनके पसंदीदा जनसांख्यिकी की सच्चाई को उजागर करने वाली असुविधाजनक सच्चाइयाँ हैं। इसलिए वे समुदाय के हर नापाक पहलू को नज़रअंदाज करते रहते हैं।

लेख में बताया गया है कि राजस्व निरीक्षक के आरोपों को मदुरै के पुलिस आयुक्त जे लोगनाथन ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में अपनी याचिका में दोहराया और इस बात पर अफसोस जताया कि वे यह बताने को तैयार नहीं थे कि कैसे ‘राजपलायम के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ एक परिवार की तरह बकरे की बलि देने और सूफ़ी रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा करते थे’, ताकि ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ का प्रचार जोर शोर से किया जा सके।

कथित तौर पर अबुताहिर ने लगभग पंद्रह मिनट तक बात की और फिर अचानक संपर्क तोड़कर गायब हो गए। उन्होंने जमात के उन सदस्यों से भी संपर्क तोड़ दिया जिन्होंने मीडिया हाउस को उनसे संपर्क करवाया था और बातचीत जारी रखने के लिए तभी राज़ी हुए जब मदुरै के वकील एस वंचिनाथन ने उनका मामला लेने का वादा किया और उनके गायब होने के लिए स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इसके बाद लेख में एक ‘आदर्श समाज’ को दिखाने की कोशिश की गई है। इसमें कहा गया कि एक अकेला मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच रहता है। दोनों समुदायों के लोग तब तक मिलजुल कर रहते हैं, जब तक कि भाजपा या हिंदुत्व कार्यकर्ता उनके बीच तनाव पैदा नहीं कर देते।

हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया गया

यह लेख बड़ी चालाकी से दोष दोनों पर डाल देता है। इस दौरान इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि यह मामला लंबे समय से हिंदू धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लेख मूलतः हिंदुओं से ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ के नाम पर अपने अधिकारों को छोड़ने या आरोप झेलने के लिए तैयार रहने को कहता है।

लेख के अनुसार, पुलिस ने जिला कलेक्टर से आदेश मिलने का दावा किया और उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने से रोक दिया, लेकिन जमात ने जब जाँच की तो पाया कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था। अधिकारियों ने तब दावा किया कि ये निर्देश जिला के राजस्व विकास अधिकारी (आरडीओ) ने जारी किए गए थे। हालाँकि, मुसलमानों ने दावा किया कि पुलिस को ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था।

अगर यह सच है, तो क्या यह वर्तमान सरकार के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक विफलता नहीं है? हालाँकि, लेख में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल पूछने के बजाय, हिंदू समूहों और भाजपा से सवाल पूछे गए हैं। ऐसा तब है जब राज्य विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 4 सदस्य हैं।

लेख में यह भी जोड़ा गया कि जैनियों ने पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने अन्य दो धर्मों से बहुत पहले तीर्थस्थल स्थापित किए थे, बिना यह बताए कि कैसे इस्लामवादियों ने उनकी गुफाओं को भी नहीं छोड़ा और उन्हें हरे रंग से रंग दिया।

लेख में कहा गया, “इस संघर्ष से जुड़े बदलते कानूनी और राजनीतिक समीकरणों ने विस्तार से बताया कि कैसे पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयों ने एक खालीपन पैदा किया , जिसे भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर दिया।”

निष्पक्षता का भ्रम पैदा करने के लिए लेख में दावा किया गया कि “धर्मनिरपेक्ष समूह पुलिस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व वाली राज्य मशीनरी से बेहद निराश हैं, जिसे वे द्रविड़ मॉडल की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कमज़ोर करने वाला मानते हैं।”

पूरा लेख हिंदुत्व और भाजपा की निंदा करने के लिए समर्पित है, जबकि जिस सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, उसकी आलोचना केवल राज्य में उनकी बढ़ती उपस्थिति के बावजूद “सामाजिक न्याय” प्रदान करने में विफल रहने के लिए की जा रही है।

गौरतलब है कि यह वही पार्टी है जिसके मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। इसके प्रति अपनी घृणा सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद हास्यास्पद है कि लेख में यह सुझाव दिया गया है कि ऐसे प्रशासन ने उन शरारती ‘हिंदुत्ववादी ताकतों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिनका वास्तव में राज्य में कोई दबदबा नहीं है।

इसके बाद मीडिया संस्थान ने इसी बयानबाजी को दोहराया और कहा कि ‘हिंदुत्व समूह इसे दक्षिण भारत का अयोध्या कह रहे हैं।’ इसने आगे इस बात की निंदा की कि कैसे ‘हिंदू मुन्नानी, हिंदू मक्कल कच्ची, आरएसएस और भाजपा लगभग पाँच लाख लोगों के साथ 22 जून को मदुरै में मुरुगन ‘मानडु’ (सम्मेलन) के लिए एकत्रित हुए।’ यह राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा हिंदुत्व सम्मेलन था।

इस दौरान पूरी पहाड़ी पर कब्जा करने का संकल्प लिया गया। भगवान मुरुगन के इस निवास स्थान में मौजूद दरगाह में पशु बलि पर रोक लगाने की माँग की गई। हिंदू मक्कल कच्ची ने अदालत में सिकंदर मलाई नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की और इस बात पर ज़ोर दिया कि मुरुगन के कई नामों में से एक के सम्मान में पहाड़ी को स्कंदर मलाई कहा जाए।

मुसलमानों ने उस स्थान पर अपनी बलि प्रथा जारी रखी और मुस्लिम नेताओं ने भी उस स्थान का दौरा किया। हालाँकि, मीडिया संगठन ने सिर्फ हिंदुओं के वहाँ जमा होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर आपत्ति जताई। अगर हिंदू धर्मनिरपेक्षता के निर्धारित मार्ग से ज़रा भी विचलित होते हैं, अपनी धार्मिक पहचान का दावा करते हैं या कोई सच्ची माँग करते हैं, तो अदालत के फैसले की परवाह किए बिना उन्हें ‘हिंदुत्ववादी’ करार दिया जाएगा।

कानूनी विवादों का इतिहास एक सदी पुराना है

लेख में आरोप लगाया गया है कि “कुंड्रम, कुंदरू या मलाई हर एक नाम और दावे के पीछे एक कहानी है, जो उस समय से जुड़ी है जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य काफी कम है।” हालाँकि, जैसा कि पहले बताया गया है, दरगाह ने 1920 में एक मंडप बनाने की कोशिश की, लेकिन तिरुपरनकुंड्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर ने पूरे क्षेत्र पर स्वामित्व की घोषणा की।

निचली अदालत ने 1923 में कहा कि मंदिर के पास लगभग पूरी पहाड़ी है, सिवाय नेल्लीथोप्पु की लगभग 33 सेंट ज़मीन के, जहाँ दरगाह का ध्वजस्तंभ और मस्जिद स्थित हैं। उस समय की सर्वोच्च अदालत, प्रिवी काउंसिल ने, दरगाह की अपील के बाद, 1931 में ‘अनादि काल से’ पहाड़ी पर मंदिर के अधिकारों को बरकरार रखा।

इस रुख का समर्थन अन्य मामलों द्वारा भी किया गया। अदालत ने 1958 में दरगाह की प्रतिबंधित सीमाओं के बाहर खुदाई पर रोक लगा दी। साल 2011 में कोर्ट ने मंदिर की सहमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।

अदालतें एक सदी से भी ज़्यादा समय से पहाड़ी पर मंदिर के नियंत्रण को बरकरार रखती आई हैं, और दरगाह के अधिकारों को केवल उसके 33 सेंट के दायरे तक ही सीमित कर दिया है।

मुस्लिम अतिक्रमण का विरोध करते रहे हैं हिन्दू

हकीकत उस चित्रण के बिल्कुल उलट है जो द न्यूज़ मिनट ने अपने लेख में गढ़ने की कोशिश की थी। मुसलमानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमणों का विरोध करने के लिए हिंदुओं को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने पड़े और कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।
डीएमके सरकार की मंज़ूरी से पशु बलि की अनुमति दी गई थी। जब प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, तो हिंदू श्रद्धालुओं के उग्र प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को अंततः कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, डीएमके पहाड़ी का नाम बदलकर सिकंदर मलाई करने की कोशिश करता रहा।
निजी स्वार्थों वाले लोग दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसका इस्तेमाल हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने, उनके पवित्र स्थल पर अतिक्रमण करने और उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय का फैसला और इस क्षेत्र की कानूनी पृष्ठभूमि भी इसी सच्चाई को रेखांकित करती है, जिसे उदार-वामपंथी मीडिया छिपानी की कोशिश करता है।

महाराष्ट्र : ठाणे में जमीन कब्जा 17000 स्क्वायर फीट में फ़ैल गई दरगाह, बॉम्बे HC ने गिराने से रोक पर किया इनकार: कहा- यहाँ ज्यादा लोग आते हैं, इससे ये वैध नहीं हो जाती

                                                                                           प्रतीकात्मक फोटो साभार: Grok AI & ET)
बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के ठाणे में एक दरगाह गिराने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। यह दरगाह पहले 160 स्क्वायर फीट में थी और बाद में धीमे-धीमे इसने 17 हजार स्क्वायर फीट जमीन पर कब्जा कर लिया था। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि यहाँ आने वालों की संख्या के नाम पर कब्जे की अनुमति नहीं दी जा सकती।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा, “हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि किसी भीड़ के आने और कहीं बड़ी संख्या में ज्यादा लोगों के आने के आधार पर यह दरगाह कानूनी सरंचना साबित हो जाती है। यह जमीन हड़पने और उसके तरीके का एक क्लासिक मामला है इस तरह से जमीन हड़पने को कोर्ट अपनी मंजूरी नहीं दे सकती।”

बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में दरगाह ट्रस्ट की तरफ से दायर याचिका को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा ट्रस्ट ने उस जमीन को कभी खरीदा ही नहीं और ना ही किसी तरह की निर्माण अनुमति ली। कोर्ट ने कहा कि केवल चैरिटी कमिश्नर द्वारा सार्वजनिक नोटिस जारी करना भूमि पर स्वामित्व या कब्जे का प्रमाण नहीं हो सकता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ने यह जमीन एक निजी व्यक्ति की है, जिसने सिविल कोर्ट में अतिक्रमण का मुकदमा जीत लिया है। 5 अप्रैल 2025 को ठाणे के सिविल न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि ट्रस्ट ने उस जमीन पर अवैध अतिक्रमण किया है और न तो वों मालिक है और न ही कब्जेदार।

कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके संज्ञान में आने वाले पक्ष को दावे पर सही होना चाहिए और अपने अधिकारों को साबित करने के लिए पुख्ता दस्तावेज पेश करने चाहिए। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रस्ट ने दरगाह को मिले नोटिस के जवाब में कोई ठोस तर्क नहीं दिया और सुनवाई तक में हिस्सा नहीं लिया।

आखिरकार, बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रस्ट की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ट्रस्ट न तो जमीन का मालिक है, न ही उसने किसी भी तरह की अनुमति ली है। दरगाह की संरचना पूरी तरह अवैध है और इसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है।

कोर्ट ने ठाणे नगर निगम को तोड़ने की कार्रवाई को जारी रखने की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी संस्था इस तरह से सार्वजनिक या निजी भूमि पर कब्जा कर निर्माण नहीं कर सकती और फिर उसे मजहबी स्थल का नाम देकर वैध ठहराने की कोशिश नहीं कर सकती।

वहीं हाई कोर्ट के सामने दरगाह ट्रस्ट का तर्क था कि यह दरगाह 1982 के पहले से ही उस स्थान पर मौजूद है और वह ‘मजहबी केंद्र’ है। हालाँकि, उनकी कोई दलील काम नहीं आई।

मामला क्या है?

यह मामला ठाणे जिले की गज़ी सलाउद्दीन रेहमतुल्ला होल दरगाह से संबंधित है। इसे ठाणे नगर निगम (TMC) ने अवैध करार देते हुए गिराने का आदेश दिया था। TMC के अनुसार, यह दरगाह पहले 160 वर्ग फुट में बनी थी, लेकिन धीमे-धीमे इसे बिना किसी वैध अनुमति के बढ़ाकर 17,610 वर्ग फुट कर दिया गया।
ट्रस्ट ने इस विध्वंस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने मई 2024 में ट्रस्ट की दलीलों को खारिज करते हुए नगर निगम के फैसले को सही ठहराया। इसके बाद ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहाँ कोर्ट ने ट्रस्ट को यह छूट दी कि वह हाईकोर्ट में दोबारा आवेदन दाखिल कर सके और राहत माँगे। हालाँकि, इस बार भी दरगाह वैध नहीं सिद्ध हुई।

उत्तराखंड : हर मस्जिद-दरगाह-मदरसे को देना होगा ब्यौरा: RTI के दायरे में वक्फ बोर्ड

                 कलियर शरीफ दरगाह के बारे में जानकारी देने से कर दिया गया था इनकार (फोटो साभार: NBT)
उत्तराखंड में अब मस्जिद, दरगाह, मदरसों को भी अपनी आय और संपत्तियों की जानकारी देनी पड़ेगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली बीजेपी शासित राज्य में वक्फ बोर्ड भी अब सूचना के अधिकार कानून (RTI) के दायरे में आ गया है। यह फैसला वक्फ बोर्ड के स्वामित्व वाली संपत्तियों और उनसे संबंधित फंडिंग के बारे में कम जानकारी होने की वजह से किया गया है।

दरअसल जुलाई 2022 में वकील दानिश सिद्दीकी ने उत्तराखंड वक्फ बोर्ड से आरटीआई के तहत कलियर दरगाह के बारे में सूचना माँगी थी। उन्हें यह कहकर सूचना देने से मना कर दिया गया कि पिरान कलियर में कोई लोक सूचना प्राधिकारी नहीं है। जब उन्हें प्रथम विभागीय अपीलीय अधिकारी से भी सूचना नहीं मिली तो वे राज्य सूचना आयोग पहुँच गए। सिद्दीकी की अपील पर राज्य सूचना आयुक्त योगेश भट्ट ने वक्फ बोर्ड के अधिकारियों से पूछताछ की। उनसे वक्फ अधिनियम और वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण को लेकर साफ और सही जानकारी देने को कहा गया।

इसके बाद यह बात सामने आई कि उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अधीन होने के बावजूद कलियर शरीफ दरगाह सहित अन्य वक्फ संपत्तियों को सूचना के अधिकार से बाहर रखा गया था। केवल बोर्ड के मुख्य कार्यपालक अधिकारी ही वक्फ संपत्ति के दस्तावेजों आदि की जाँच-परख कर या करवा सकते हैं। इसके बाद सूचना आयुक्त ने इस मामले में पूर्व और मौजूदा मुख्य कार्यपालक अधिकारी से भी जवाब-तलब किया। इसके तहत पिरान कलियर दरगाह के प्रबंधन को आरटीआई एक्ट के दायरे में लाने के आदेश दिए गए। साथ ही यहाँ लोक सूचना अधिकारी को भी तैनात करने को कहा गया।

इस केस का निपटारा करते हुए राज्य सूचना आयुक्त योगेश भट्ट ने अन्य सभी वक्फ बोर्ड और वक्फ संपत्तियों को भी आरटीआई एक्ट के दायरे में लाने का आदेश दिया। छह महीने के अंदर आरटीआई एक्ट की धारा-4 के तहत मैनुअल बनाने का निर्देश दिया। आयोग के कड़े रवैये के बाद उत्तराखंड वक्फ बोर्ड ने वक्फ संपत्तियों को आरटीआइ एक्ट में दायरे में लाने के आदेश दिया है। राज्य में लगभग 2200 वक्फ संपत्तियाँ वक्फ बोर्ड में रजिस्टर्ड हैं।

इस फैसले को लेकर जमीयत उलेमा ए हिंद के मौलाना काब रशीदी का कहना है कि धर्म के आधार पर कानून में किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। अगर मस्जिद, दरगाह और मदरसों को इसके तहत लाया गया है तो फिर गुरुकुल और मंदिरों समेत सभी धर्म के धार्मिक स्थलों को भी इस कानून के तहत लाना चाहिए। केवल किसी एक धर्म के लिए कानून लाया जाना गलत है और यह संविधान के खिलाफ है।

अजमेर : मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्दों ने हर दिन मंदिर में काटी गाय-गिराए मंदिर

अजमेर दरगाह के खादिम सलमान चिश्ती ने नूपुर शर्मा की हत्या के लिए भड़काया

उदयपुर में 28 जून 2022 को कन्हैया लाल और महाराष्ट्र में उमेश कोल्हे की हत्या का मामला अभी ठंडा नहीं पड़ा था कि हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के खादिम सलमान चिश्ती ने नूपुर शर्मा का कत्ल करने की खुलेआम धमकी देने पर FIR दर्ज कर लिया गया है। वहीं वीडियो वायरल होने के बाद सलमान चिश्ती के खिलाफ अजमेर शहर के अलवर गेट थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया है जिस पर जाँच जारी है। इसके अलावा इस मामले में एएसपी विकास सांगवान ने बताया कि सलमान चिश्ती के खिलाफ हत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया है और उसकी तलाश की जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सलमान चिश्ती दरगाह पुलिस थाने का एक हिस्ट्रीशीटर भी है, और उसके खिलाफ हत्या व हत्या के प्रयास के कई मामले दर्ज हैं। जो नूपुर शर्मा का सिर कलम करने वालों को अपना मकान देने की बात कहता नजर आता है। यह वीडियो वैसा ही है, जैसा वीडियो उदयपुर में दर्जी कन्हैयालाल के हत्यारे मोहम्मद रियाज अट्टारी और गौस मोहम्मद ने कन्हैयालाल की हत्या से पहले तैयार किया था। करीब दो मिनट पचास सेकंड के इस वायरल विडियो में सलमान चिश्ती खुलेआम नूपुर शर्मा का गर्दन काटने के लिए उकसा रहा है।

पुलिस ने बताया कि प्रथमदृष्टया जो जानकारी सामने आई है ये उसके हुजरे का ही वीडियो है। उसके खिलाफ हत्या के लिए उकसाने, धमकी देने और उसे धार्मिक रूप देने के साथ अन्य धाराओं में मामला दर्ज कर लिया गया है। पुलिस का कहना है कि वीडियो के बारे में तथ्यपूर्ण जानकारी तभी सामने आएगी जब आरोपित गिरफ्तार होगा। रात से ही उसकी तलाश जारी है।

कन्हैया लाल का मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद द्वारा गला काटने के बाद अजमेर की दरगाह के दीवान जैनुल आबेदीन अली खान ने कहा था कि भारतीय मुस्लिम तालिबानी मानसिकता कबूल नहीं करेंगे। लेकिन अब दरगाह के खादिम सलमान चिश्ती का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह, नूपुर शर्मा की गर्दन लाने वाले को अपना मकान देने की बात कह रहा है।

यह दरगाह ‘सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती (Khwaja Moinuddin Chishti) का है, जिन्हें हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के नाम से भी जाना जाता है। सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ईरान में हुआ था, लेकिन उन्हें राजस्थान के अजमेर में दफनाया गया था। संयोगवश ‘सूफी संत’ मोईनुद्दीन चिश्ती के बारे में इतिहास में दर्ज तथ्य बॉलीवुड की फिल्मों, गानों, सूफी संगीत और वामपंथी इतिहास से एकदम अलग हैं।

इतिहासकार एमए खान ने अपनी पुस्तक ‘इस्लामिक जिहाद: एक जबरन धर्मांतरण, साम्राज्यवाद और दासता की विरासत’ (Islamic Jihad: A Legacy of Forced Conversion, Imperialism, and Slavery) में इस बारे में विस्तार से लिखा है कि मोइनुद्दीन चिश्ती, निज़ामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग और शाह जलाल जैसे सूफी संत जब इस्लाम के मुख्य सिद्धांतों की बात करते थे, तो वे वास्तव में रूढ़िवादी और असहिष्णु विचार रखते थे, जो कि मुख्यधारा के जनमत के विपरीत था।

उदाहरण के लिए, सूफी संत मोईनुद्दीन चिश्ती और औलिया इस्लाम के कुछ पहलुओं जैसे- नाच (रक़) और संगीत (सामा) को लेकर उदार थे, जो कि उन्होंने रूढ़िवादी उलेमा के धर्मगुरु से अपनाया, लेकिन एक बार भी उन्होंने कभी हिंदुओं के उत्पीड़न के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। औलिया ने अपने शिष्य शाह जलाल को बंगाल के हिंदू राजा के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए 360 अन्य शागिर्दों के साथ बंगाल भेजा था।

इस पुस्तक में इस बात का भी जिक्र किया है गया है कि वास्तव में, हिंदुओं के उत्पीड़न का विरोध करने की बात तो दूर, इन सूफी संतों ने बलपूर्वक हिंदुओं के इस्लाम में धर्म परिवर्तन में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। यही नहीं, ‘सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्दों ने हिंदू रानियों का अपहरण किया और उन्हें मोईनुद्दीन चिश्ती को उपहार के रूप में प्रस्तुत किया।

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि चिश्ती, शाह जलाल और औलिया जैसे सूफी ‘काफिरों’ के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए भारत आए थे। उदाहरण के लिए- मोइनुद्दीन चिश्ती, मुइज़-दीन मुहम्मद ग़ोरी की सेना के साथ भारत आए और गोरी द्वारा अजमेर को जीतने से पहले वहाँ गोरी की तरफ से अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए अजमेर में बस गए थे। यहाँ उन्होंने पुष्कर झील के पास अपने ठिकाने स्थापित किए।

मध्ययुगीन लेख ‘जवाहर-ए-फरीदी’ में इस बात का उल्लेख किया गया है कि किस तरह चिश्ती ने अजमेर की आना सागर झील, जो कि हिन्दुओं का एक पवित्र तीर्थ स्थल है, पर बड़ी संख्या में गायों का क़त्ल किया, और इस क्षेत्र में गायों के खून से मंदिरों को अपवित्र करने का काम किया था। मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्द प्रतिदिन एक गाय का वध करते थे और मंदिर परिसर में बैठकर गोमांस खाते थे।

इस अना सागर झील का निर्माण ‘राजा अरणो रा आनाजी’ ने 1135 से 1150 के बीच करवाया था। ‘राजा अरणो रा आनाजी’ सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता थे। आज इतिहास की किताबों में अजमेर को हिन्दू-मुस्लिम’ समन्वय के पाठ के रूप में तो पढ़ाया जाता है, लेकिन यह जिक्र नहीं किया जाता है कि यह सूफी संत भारत में जिहाद को बढ़ावा देने और इस्लाम के प्रचार के लिए आए थे, जिसके लिए उन्होंने हिन्दुओं के साथ हर प्रकार का उत्पीड़न स्वीकार किया।

खुद मोइनुद्दीन चिश्ती ने तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को पकड़ लिया था और उन्हें ‘इस्लाम की सेना’ को सौंप दिया। लेख में इस बात का प्रमाण है कि चिश्ती ने चेतावनी भी जारी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था – “हमने पिथौरा (पृथ्वीराज) को जिंदा पकड़ लिया है और उसे इस्लाम की सेना को सौंप दिया है।”

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मोइनुद्दीन चिश्ती का एक शागिर्द था मलिक ख़ितब। उसने एक हिंदू राजा की बेटी का अपहरण कर लिया और उसे चिश्ती को निकाह के लिए ‘उपहार’ के रूप में प्रस्तुत किया। चिश्ती ने खुशी से ‘उपहार’ स्वीकार किया और उसे ‘बीबी उमिया’ नाम दिया।