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चर्च के अनाथालय में पॉर्न वीडियो दिखाकर 15 नाबालिग बच्चियों का रेप करने वाले क्रिश्चियन राजेंद्रन और जॉय जेल में सड़ेंगे

बॉम्बे हाई कोर्ट
महाराष्ट्र के रायगढ़ में शांति आश्रम अनाथालय में नाबालिग लड़कियों से हुए यौन शोषण मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरोपित क्रिश्चियन राजेन्द्रन को 14 साल जेल की सजा को बरकरार रखा है। जबकि उसके भाई जॉय के 10 साल की सजा को बरकरार रखा है।

अनाथालय चर्च ऑफ एवरलास्टिंग लाइफ एंड सोशल वेलफेयर ट्रस्ट द्वारा संचालित था। राजेन्द्रन और जॉय ने 2015 में अनाथालय की 15 नाबालिग लड़कियों का शोषण किया। इस पर 2020 में पनवेल सेशंस कोर्ट ने दोषियों को 14 साल और 10 साल की सजा दी थी जबकि उसकी माँ को अपराध छिपाने के लिए 1 साल की सजा सुनाई थी।

ये मामला तब सामने आया जब अनाथालय की लड़कियों ने टीचर को आपबीती बताई। टीचर ने बाल कल्याण समिति को नाबालिगों के शोषण की जानकारी दी और फिर जाँच टीम आई और मामला उजागर हुआ।

बचाव पक्ष के वकीलों ने कोर्ट मे में दलील दी कि बच्चियाँ अनाथालय में खुश थीं। उन्हें फिल्में दिखाई जाती थी, जन्मदिन मनाया जाता था। कोर्ट ने वकीलों के दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि भोजन कपड़ा और आवास के लिए लड़कियाँ वहाँ निर्भर थीं। इसलिए सालों तक शिकायत नहीं करना स्वाभाविक था। 

PETA का Bombay High Court के फैसले के खिलाफ अभियान, ‘मुंबईकर’ को पहनाया कबूतर का मुखौटा: क्या कबूतर सेहत के लिए नुकसानदेह है?

              मुंबई में कबूतर को दाना डालने पर रोक के खिलाफ PETA का अभियान (साभार: PETA/TOI)
बुजुर्गों का कहना था कि "पक्षियों(कबूतर, चिड़िया और कौए) को दाना देने से दानी न दिखने वाले कष्टों से बचता है। लेकिन आज सनातन विरोधी इन्हे ही दाना देने के खिलाफ अदालत जा रहे हैं और अदालतें तो बैठी है इसी इंतज़ार में। इतना ही नहीं, जब कोई मरीज को अपनी अंतिम साँस लेने में दिक्कत हो रही होती है, उस स्थिति में उस मरीज के हाथों से रूपए छुआ कर कबूतरों को दाना या गाय को चारा खिलाया जाता है। जब कबूतर ही नहीं होगा किसको दान किया जाएगा। इस धरती पर कबूतर वो पक्षी है जो दाना नहीं मिलने पर मिट्टी या कंकड़ खा कर पेट भर लेता लेकिन कभी कीड़े मकोड़े नहीं खाएगा। क्योकि इस धरती पर समुद्र के दूसरा शुद्ध ब्राह्मण कबूतर ही है।         

कारों से लेकर घरों और दफ्तरों में लगे वातानुकूलित(AC) से निकलने की वजह से चिड़ियों का आभाव हो गया है।  

कबूतरों को दाना देने की परंपरा को बचाने के लिए पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) ने हाल ही में एक अभियान शुरू किया। खासतौर पर यह अभियान मुंबई में कबूतरों को दाना देने पर लगाए गए बैन को देखते हुए लॉन्च किया गया। अब इस अभियान के खिलाफ सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है।

दरअसल, पेटा इंडिया ने अभियान से जुड़ा एक वीडियो जारी किया, जिसमें मुंबई के लोग कबूतरों के मुखौटे पहनकर संदेश दे रहे हैं कि कबूतरों को भी प्यार और देखभाल की जरूरत है। इस वीडियो में यह भी दिखाया गया है कि कबूतरों को खाना देने पर बैन लगाने से ये पक्षी भूख से मर सकते हैं।

पेटा इंडिया ने वीडियो जारी कर लिखा, कबूतरों के बिना मुंबई का आसमान पहले जैसा नहीं रहा। फीडिंग पर लगे बैन के बाद ये कोमल पक्षी भुखमरी का सामना कर रहे हैं। सभी मुंबईवासियों ने ‘कबूतर’ बनकर सबको याद दिलाया कि कबूतर भी यहीं के हैं।

सोशल मीडिया पर पेटा के कबूतर अभियान का विरोध

सोशल मीडिया पर पेटा के इस अभियान की आलोचना शुरू हो गई। लोगों ने कबूतरों को इंसान के लिए खतरा बताया और कहा कि इससे कई बीमारियाँ होती है। इसके साथ पेटा को भारत-विरोधी भी बताया गया क्योंकि ये दिखावे का एक्टिविजम करता है। पेटा पर आर्टिकल 21 के तहत केस करने की भी माँग उठी।

ओपन लेटर नाम के एक्स हैंडल ने लिखा, “एक 400 ग्राम का कबूतर अपने जीवनकाल में लगभग 11 किलोग्राम बीट छोड़ता है। ये बीट सूखकर धूल में बदल जाती है और हवा में मिल जाती है। जब हम उस हवा में साँस लेते हैं तो धूल हमारे फेफड़ों तक पहुँच सकती है और निमोनिया, ब्रोंकाइटिस और अस्थमा जैसे संक्रमण पैदा कर सकती है।”

उन्होंने आगे बताया, “सिंगापुर में कबूतरों को खाना खिलाने पर आपको 500 डॉलर का जुर्माना लग सकता है। उनकी बीट अम्लीय भी होती है, जिसका मतलब है कि वे कारों, एयर कंडीशनर, इमारतों और स्मारकों को नुकसान पहुँचा सकती हैं। लेकिन जब मुंबई के दादर में कबूतरखाने बंद कर दिए गए तब भी कुछ लोग विरोध करने के लिए सामने आए और अब पेटा ऐसे ही बेतुके अभियान चला रहा है।”

एक्स पर राहुल देवधर लिखते हैं, “कबूतर अक्सर लोगों के लिए परेशानी का कारण बनते हैं क्योंकि ये कई तरह की बीमारियाँ फैलाते हैं। इन्हें आमतौर पर ‘आसमान के चूहे’ कहा जाता है। कई शहरों में कबूतरों को सक्रिय रूप से मारा जा रहा है। पेटा सचमुच भारत विरोधी है।”

डिमेंटर नाम के एक्स यूजर लिखते हैं, “किसी को @PetaIndia के खिलाफ केस दर्ज करना चाहिए क्योंकि वे अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ जीवन के अधिकार का उल्लंघन कर रहे हैं। कबूतरों को खाना देना फेफड़ों की बीमारियों का कारण बनता है। पेटा वाले केवल दिखावे के लिए एक्टिविज्म कर रहे हैं।”

क्या है कबूतरों को दाना डालने पर रोक लगाने वाला फैसला ?

पेटा ने कबूतरों के समर्थन में ये अभियान मुबंई में कबूतरों को दाना डालने पर रोक के बाद शुरू किया। दरअसल, जुलाई 2025 में BMC ने शहरभर के कबूतरखानों में दाना डालने पर रोक लगा दी। यह कदम सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं के मद्देनजर उठाया गया था क्योंकि कबूतरों के मल से फेफड़ों की बीमारियाँ फैलने का खतरा था। मामले में 31 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने BMC को निर्देश दिया कि वह कबूतरों को खाना देने वालों के खिलाफ FIR दर्ज करें।

क्या सचमुच कबूतर इंसान के लिए हानिकारक?

अब सवाल यह उठता है कि क्या सचमुच कबूतर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं? तो स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कबूतरों के कारण स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएँ पैदा होती हैं। खासकर, कबूतरों के मल में कई तरह के फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण मौजूद होते हैं, जो मनुष्यों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।
इनमें प्रमुख रूप से हिस्टोप्लास्मोसिस (Histoplasmosis) इंफेक्शन है, जो Histoplasma capsulatum नाम के फंगस से फैलता है और बुखार, खाँसी, थकान और छाती में दर्द जैसे लक्षण पैदा करता है।
इसके अलावा क्रिप्टोकोकोसिस, जो Cryptococcus neoformans नाम का फंगस है, गंभीर स्थिति में दिमाग की सूजन यानी मेंनिंजाइटिस का कारण बनता है। साथ ही सिटिकोसिस नाम के बैक्टीरियल संक्रमण भी कबूतरों के मल से ही फैलता है, जो फ्लू जैसे लक्षण पैदा करता है।
बच्चों, बुजुर्गों और प्रेग्ननेंट महिलाओं में कबूतरों के मल और पंखों से एलर्जी और अस्थमा जैसे समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं। इसके अलावा कबूतरों के मल में Salmonella और E. coli बैक्टीरिया पाया जाता है, जो पाचन तंत्र में संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन स्वास्थ्य जोखिमों से बचने के लिए कबूतरों के मल के सीधे संपर्क से बचना चाहिए। खासकर जब यह सूखा हो और हवा में उड़ने लगे। अगर मल को साफ करना जरूरी हो तो मास्क और दस्ताने का उपयोग करना चाहिए।

महाराष्ट्र : ठाणे में जमीन कब्जा 17000 स्क्वायर फीट में फ़ैल गई दरगाह, बॉम्बे HC ने गिराने से रोक पर किया इनकार: कहा- यहाँ ज्यादा लोग आते हैं, इससे ये वैध नहीं हो जाती

                                                                                           प्रतीकात्मक फोटो साभार: Grok AI & ET)
बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के ठाणे में एक दरगाह गिराने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। यह दरगाह पहले 160 स्क्वायर फीट में थी और बाद में धीमे-धीमे इसने 17 हजार स्क्वायर फीट जमीन पर कब्जा कर लिया था। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि यहाँ आने वालों की संख्या के नाम पर कब्जे की अनुमति नहीं दी जा सकती।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा, “हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि किसी भीड़ के आने और कहीं बड़ी संख्या में ज्यादा लोगों के आने के आधार पर यह दरगाह कानूनी सरंचना साबित हो जाती है। यह जमीन हड़पने और उसके तरीके का एक क्लासिक मामला है इस तरह से जमीन हड़पने को कोर्ट अपनी मंजूरी नहीं दे सकती।”

बॉम्बे हाई कोर्ट ने क्या कहा?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में दरगाह ट्रस्ट की तरफ से दायर याचिका को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा ट्रस्ट ने उस जमीन को कभी खरीदा ही नहीं और ना ही किसी तरह की निर्माण अनुमति ली। कोर्ट ने कहा कि केवल चैरिटी कमिश्नर द्वारा सार्वजनिक नोटिस जारी करना भूमि पर स्वामित्व या कब्जे का प्रमाण नहीं हो सकता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ने यह जमीन एक निजी व्यक्ति की है, जिसने सिविल कोर्ट में अतिक्रमण का मुकदमा जीत लिया है। 5 अप्रैल 2025 को ठाणे के सिविल न्यायालय ने स्पष्ट रूप से माना कि ट्रस्ट ने उस जमीन पर अवैध अतिक्रमण किया है और न तो वों मालिक है और न ही कब्जेदार।

कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके संज्ञान में आने वाले पक्ष को दावे पर सही होना चाहिए और अपने अधिकारों को साबित करने के लिए पुख्ता दस्तावेज पेश करने चाहिए। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रस्ट ने दरगाह को मिले नोटिस के जवाब में कोई ठोस तर्क नहीं दिया और सुनवाई तक में हिस्सा नहीं लिया।

आखिरकार, बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रस्ट की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ट्रस्ट न तो जमीन का मालिक है, न ही उसने किसी भी तरह की अनुमति ली है। दरगाह की संरचना पूरी तरह अवैध है और इसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है।

कोर्ट ने ठाणे नगर निगम को तोड़ने की कार्रवाई को जारी रखने की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी संस्था इस तरह से सार्वजनिक या निजी भूमि पर कब्जा कर निर्माण नहीं कर सकती और फिर उसे मजहबी स्थल का नाम देकर वैध ठहराने की कोशिश नहीं कर सकती।

वहीं हाई कोर्ट के सामने दरगाह ट्रस्ट का तर्क था कि यह दरगाह 1982 के पहले से ही उस स्थान पर मौजूद है और वह ‘मजहबी केंद्र’ है। हालाँकि, उनकी कोई दलील काम नहीं आई।

मामला क्या है?

यह मामला ठाणे जिले की गज़ी सलाउद्दीन रेहमतुल्ला होल दरगाह से संबंधित है। इसे ठाणे नगर निगम (TMC) ने अवैध करार देते हुए गिराने का आदेश दिया था। TMC के अनुसार, यह दरगाह पहले 160 वर्ग फुट में बनी थी, लेकिन धीमे-धीमे इसे बिना किसी वैध अनुमति के बढ़ाकर 17,610 वर्ग फुट कर दिया गया।
ट्रस्ट ने इस विध्वंस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने मई 2024 में ट्रस्ट की दलीलों को खारिज करते हुए नगर निगम के फैसले को सही ठहराया। इसके बाद ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहाँ कोर्ट ने ट्रस्ट को यह छूट दी कि वह हाईकोर्ट में दोबारा आवेदन दाखिल कर सके और राहत माँगे। हालाँकि, इस बार भी दरगाह वैध नहीं सिद्ध हुई।

रमजान के बाद अवैध मस्जिद और नमाज पढ़ने वाला हॉल ढाह दो: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा – ‘कानून का उल्लंघन करती भीड़ का विरोध बर्दाश्त नहीं’

                                                                                                                              साभार: टीवी9
महाराष्ट्र की बॉम्बे हाईकोर्ट ने निर्देश के बाद भी एक अवैध मस्जिद को नहीं गिराने पर ठाणे नगर निगम को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि यह जरूरी है कि वे नागरिकों के मन में यह बात बैठा दें कि कानून का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दरअसल, इस मस्जिद को बनाने के लिए नगरपालिका से अनुमति नहीं ली गई थी। कोर्ट ने 27 जनवरी को इसे गिराने का आदेश दिया, लेकिन इसकी पूरी तरह तामील नहीं की गई।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति एएस गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खता की पीठ ने की। पीठ ने मस्जिद को गिराने में देरी के लिए निगम के बहाने को खारिज कर दिया और कहा कि कानून को सख्ती से लागू करने की जरूरत है। कोर्ट ने कहा कि एक लोकतांत्रिक देश में किसी भी व्यक्ति या संगठन को यह कहने की भी अनुमति नहीं दी जा सकती कि वह देश के कानून का पालन नहीं करेगा और इसका विरोध करेगा।

अदालत पीठ ने साफ शब्दों में कहा, “ऐसी परिस्थितियों में कानून लागू करने वालों का कर्तव्य है कि वे ऐसे व्यक्ति/संगठन को देश के कानून का पालन करने के लिए बाध्य करें। कानून लागू करने वालों के लिए यह भी आवश्यक है कि वे नागरिकों के मन में यह बात बैठा दें कि सरकार द्वारा कानून का उल्लंघन या कानून को लागू करने का विरोध बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”

दरअसल, कासरवडावली के बोरिवडे गाँव में न्यू श्री स्वामी समर्थ बोरिवडे हाउसिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड की 18,000 वर्ग मीटर से अधिक की जमीन है। उस जमीन पर अवैध रूप से एक मस्जिद बना दी गई। इसके बाद कंपनी ने ठाणे नगर निगम से इस अवैध ढाँचे को ध्वस्त करने के लिए कहा। हालाँकि, नगर निगम ने इसमें कार्रवाई नहीं तो कंपनी हाई कोर्ट पहुँच गई।

कंपनी ने कोर्ट से नगर निगम को ढाँचा हटाने के लिए निर्देश देने की माँग की। याचिका के अनुसार, गाजी सलाउद्दीन रहमतुल्ला हूले उर्फ ​​परदेशी बाबा ट्रस्ट ने साल 2013 से उसकी 18,122 वर्ग मीटर भूमि पर अतिक्रमण कर लिया है। इस पर अवैध ढाँचे का निर्माण कर दिया गया है, जिसमें एक मस्जिद और नमाज पढ़ने के लिए एक बड़ा हॉल शामिल है।

ठाणे नगर निगम ने कोर्ट को बताया कि 1 जनवरी 2025 को साइट का निरीक्षण किया गया था। वहाँ 3,600 वर्ग फुट पर एक मंजिल का ढाँचा बना है। उसमें नमाज के लिए एक हॉल भी है। नगर निगम ने कोर्ट को बताया कि 19 फरवरी को निगम के 10 अधिकारी 65 श्रमिकों तथा कुछ पुलिसकर्मियों के साथ ढाँचा गिराने पहुँचे, लेकिन वहाँ जमा हुई भारी भीड़ के विरोध के कारण यह काम पूरा नहीं हो सका।

हालाँकि, कोर्ट ने इसे बहाना बताते हुए नगर निगम के दावे को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब इतनी बड़ी संरचना का निर्माण किया जा रहा था तो इसे नगर निगम के अधिकारियों ने रोकने के लिए क्या किया, इसको लेकर याचिकाकर्ताओं ने बार-बार पत्राचार किया था। कोर्ट ने कहा कि नगर निगम कानून को सख्ती से लागू करने में असमर्थ रहा है।

कोर्ट ने कहा कि इसकी तस्वीरें देखने से पता चलता है कि ढाँचे का अधिकांश भाग गिरा दिया गया है। वहीं, रमजान के महीने के खत्म होते ही तुरंत गिराने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि ढाँचे गिराने के बाद इसे दोबारा बनाने की कोशिश होनी चाहिए। न्यायालय ने कहा है कि उसके आदेश के पूरी तरह लागू करने के लिए नगर निगम के अधिकारी जवाबदेह हैं।

ठाणे की अवैध मस्जिद गिराने में देरी से उखड़ा हाई कोर्ट, श्री स्वामी समर्थ हाउसिंग की जमीन पर खड़ा कर रखा है ढाँचा: पुणे इमामबाड़ा का वक्फ दर्जा रद्द

                                                 प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI_Bing)
बॉम्बे हाई कोर्ट ने ठाणे नगर निगम को जमकर लताड़ लगाई है। एक अवैध मस्जिद को तोड़ने में देरी पर कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई। बॉम्बे हाई कोर्ट में जस्टिस एएस गडकरी और कमल खाता की बेंच ने कहा कि कानून का पालन करवाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले भी इस मामले में साफ निर्देश दिए थे, फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। कोर्ट ने साफ कहा कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। कुछ मुस्लिम समूह लगातार इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन कोर्ट ने दो टूक कहा कि विरोध के नाम पर कानून तोड़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

इस केस में न्यू श्री स्वामी समर्थ बोरिवडे हाउसिंग कंपनी ने कोर्ट से गुहार लगाई थी। कंपनी के पास कासरवडवली के बोरिवडे गाँव में 18,000 वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन है। कंपनी ने ठाणे नगर निगम (टीएमसी) से कहा कि उनकी जमीन पर बनी एक अवैध इमारत को तोड़ा जाए। ठाणे नगर निगम ने 1 जनवरी 2025 को जाँच की, तो पता चला कि ये 3,600 वर्ग फुट की ग्राउंड-प्लस-वन मस्जिद है, जिसमें नमाज हॉल भी है। इसका संचालन परदेसी बाबा ट्रस्ट करता है।

मस्जिद के पक्ष वालों का कहना था कि ये तब बनी थी, जब इलाका ग्राम पंचायत के अधीन था, लेकिन ठाणे नगर निगम के रिकॉर्ड में इसके लिए कोई ऑर्डर नहीं मिला। इस मामले में नोटिस और सुनवाई के बाद 27 जनवरी को थाणे नगर निगम ने इसे अवैध ठहराया और तोड़ने का ऑर्डर दिया। हालाँकि दूसरा पक्ष कोर्ट पहुँच गया और अब हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ठाणे नगर निगम को जल्द से जल्द ये मस्जिद ढहाना चाहिए।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “लोकतंत्र में कोई व्यक्ति, समूह या संगठन यह नहीं कह सकता कि वह कानून नहीं मानेगा। अगर कोई ऐसा करता है, तो प्रशासन को सख्ती से उसे कानून का पालन करवाना चाहिए। यह भी जरूरी है कि लोगों के मन में यह बात बैठे कि कानून तोड़ने या उसका विरोध करने की इजाजत नहीं मिलेगी।”

पुणे इमामबाड़ा का वक्फ दर्जा रद्द, बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक और बड़ा फैसला सुनाते हुए पुणे के हाजी मोहम्मद जवाद इस्पाहानी इमामबाड़ा ट्रस्ट का वक्फ दर्जा रद्द कर दिया। महाराष्ट्र स्टेट वक्फ ट्रिब्यूनल ने 2023 में इसे वक्फ संगठन माना था, लेकिन अब हाई कोर्ट ने उस फैसले को पलट दिया। जस्टिस संदीप वी. मार्ने ने कहा कि वक्फ बोर्ड ने 2016 में गलत तरीके से इसे वक्फ एक्ट 1995 की धारा 43 के तहत दर्ज किया था। कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट 1950 के तहत रजिस्ट्रेशन से कोई ट्रस्ट अपने आप वक्फ नहीं बन जाता।
पुणे का ये इमामबाड़ा 1953 से मुस्लिम पब्लिक ट्रस्ट के तौर पर रजिस्टर्ड था। ट्रस्ट में गड़बड़ियों की शिकायतों के बाद वक्फ बोर्ड से इसे वक्फ बनाने की माँग उठी। 2016 में वक्फ बोर्ड ने इसे मंजूरी दी, लेकिन ट्रस्ट के ट्रस्टी इसके खिलाफ वक्फ ट्रिब्यूनल गए। ट्रिब्यूनल ने 2023 में उनकी याचिका खारिज कर दी, तो मामला हाई कोर्ट पहुँचा। अब कोर्ट ने ट्रिब्यूनल को नए सिरे से मामले की सुनवाई करने को कहा है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि ट्रिब्यूनल अपना फैसला खुद ले, बिना हाई कोर्ट के प्रभाव के।

EVM पर झूठ फैलाने के लिए राहुल गांधी, ध्रुव राठी, उद्धव ठाकरे के खिलाफ बंबई हाईकोर्ट में याचिका

भारत और मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए विदेशी ताकतें तरह-तरह के नैरेटिव बनाती हैं। और बिना तर्क के इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने में भारत का विपक्षी दल आगे आ जाता है। इसी तरह का एक नैरेटिव बनाया गया कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है। लोकसभा चुनाव के रिजल्ट आने के 11 दिन बाद ईवीएम को लेकर यह झूठ फैलाया गया। सबसे पहले दुनिया के सबसे अमीर बिजनेसमैन एलन मस्क ने 15 जून को लिखा- EVM को खत्म कर देना चाहिए। इसे इंसानों या AI द्वारा हैक किए जाने का खतरा है। इसके एक दिन बाद 16 जून, 2024 को मिड डे ने एक सनसनीखेज रिपोर्ट प्रकाशित की कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है, जिसने राजनीतिक हलकों और आम जनता में विवाद खड़ा कर दिया। इसके बाद एक चुनाव अधिकारी ने मिड-डे की एक रिपोर्ट को ‘झूठी खबर’ कहकर खारिज कर दिया। अधिकारी ने कहा कि पब्लिकेशन को मानहानि का नोटिस जारी किया गया है। नोटिस मिलते ही मिड डे ने माफीनामा प्रकाशित कर दिया लेकिन इंडी अलायंस के नेता राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे समेत विपक्षी नेता इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश करते रहे। उधर ध्रुव राठी और अन्य लेफ्ट लिबरल एजेंडा चलाने वालों ने इसे जोर-शोर से उठाकर मोदी सरकार को बदनाम करने की कोशिश की। ईवीएम को लेकर जनता में भ्रम पैदा करने के लिए अब कांग्रेस नेता राहुल गांधी, शिवसेना-यूबीटी नेता उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे, संजय राउत और यूट्यूबर ध्रुव राठी के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही की मांग को लेकर बंबई हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है।

राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे, ध्रुव राठी के खिलाफ अवमानना कार्यवाही की मांग
कांग्रेस नेता राहुल गांधी, शिवसेना-यूबीटी नेता उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे, संजय राउत और यूट्यूबर ध्रुव राठी के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की मांग को लेकर बंबई हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका में इन नेताओं के खिलाफ EVM को लेकर झूठ फैलाने और जनता में भ्रम पैदा करने का आरोप लगाया गया है। याचिका में कहा गया है कि उक्त लोगों ने अपने ‘छुपे एजेंडे’ के तहत ईवीएम को लेकर अलग-अलग धारणाएं बनाई और लोगों में भ्रम पैदा किया।

आरोपियों पर चले आपराधिक अवमानना का मामला
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि ध्रुव राठी और अन्य लोग लगातार फेक न्यूज फैलाकर आम जनता को भ्रमित करते हैं, ये उनकी आदत में शुमार है। ऐसा करना नीलेश नवलखा बनाम भारत संघ (2021) में बंबई हाई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। उक्त आदेश में मीडिया को ‘मीडिया ट्रायल’ का सहारा लेने से बचने के लिए दिशा-निर्देश दिए गए थे। याचिका के अनुसार, राहुल गांधी, ध्रुव राठी समेत सभी आरोपितों ने उस आदेश का उल्लंघन किया है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि जिन मामलों की सुनवाई चल रही हो, उस पर कोई राय बनाकर जनता के बीच गलत बातें फैलाने पर आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आएगा। ऐसा करना कोर्ट की अवमानना अधिनियम की धारा 2(सी) के तहत दंडनीय अपराध है।

आरोपियों की ‘छिपी मंशा’ की जांच के लिए बने एसआईटी
इस मामले की सुनवाई बॉम्बे हाई कोर्ट में जस्टिस श्याम चांडक और जस्टिस मोहिते-डेरे की बेंच में हुई। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में CBI, IB और ED सहित विशेष जांच दल (SIT) के गठन की भी मांग की है, ताकि राहुल गांधी, ध्रुव राठी, उद्धव ठाकरे व अन्य लोगों की ‘छिपी मंशा’ की जांच की जा सके। याचिकाकर्ता ने कोर्ट की अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 2(बी) और 12 के तहत राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे, ध्रुव राठी, आदित्य ठाकरे और संजय राउत के खिलाफ कार्यवाही की मांग की। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से पुलिस को आईपीसी की धारा 192, 193, 107, 409, 120(बी) और 34 के तहत लंबित जांच के संबंध में सार्वजनिक मशीनरी का दुरुपयोग करने और झूठे सबूत बनाने के लिए उपरोक्त लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया।

जस्टिस रेवती मोहिते-डेरे से इस मामले से अलग होने की अपील
इस दौरान याचिकाकर्ता ने जस्टिस रेवती मोहिते-डेरे से इस मामले की सुनवाई से अलग होने की भी अपील की, क्योंकि जस्टिस डेरे की बहन शरद पवार की एनसीपी से जुड़ी हुई हैं। हालाँकि, पीठ ने इस मामले की सुनवाई करने से इनकार किया। साथ ही कहा कि इसे गलत तरीके से उसके समक्ष रखा गया। याचिकाकर्ताओं से कहा गया कि वे चीफ जस्टिस से संपर्क करें और अपनी याचिका को उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का अनुरोध करें।

विपक्षी दलों और लेफ्ट लिबरल एजेंडा चलाने वालों ने किस तरह ईवीएम पर लोगों को गुमराह करने की कोशिश की

मिडडे ने ईवीएम को लेकर झूठी खबर छापी
मिडडे अखबार ने 16 जून 2024 को एक खबर छापी थी, जिसमें ईवीएम मशीन को ओटीपी के जरिए अनलॉक करने का दावा किया गया था। विपक्षी नेताओं ने उसका इस्तेमाल देश के लोकतंत्र पर सवाल खड़ा करने के लिए किया। 16 जून को मिड डे समाचार पत्र में प्रकाशित 5 कॉलम की रिपोर्ट में दावा किया गया था पुलिस ने अपनी जांच में पाया है कि एनडीए के प्रत्याशी रवींद्र वायकर के रिश्तेदार ने मतदान के वक्त फोन इस्तेमाल कर रहे थे जो कि ईवीएम से कनेक्ट था। इस रिपोर्ट में पुलिस के हवाले से कहा गया था कि प्रत्याशी का रिश्तेदार ओटीपी के जरिए ईवीएम अनलॉक कर रहा था। पुलिस उसका फोन फॉरेंसिक जांच को भेज चुकी है। हालांकि बाद में मिड-डे ने अपनी खबर का खंडन छापा था और कहा था कि ये खबर गलत थी। ऐसा होना मुमकिन नहीं है

ध्यान भटकाने के लिए निकाला गया ईवीएम का जिन्न!
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान राहुल गांधी ने गरीब महिलाओं के खाते में हर महीने 8500 और सालाना एक लाख रुपए भेजने की गारंटी दी थी। 4 जून को रिजल्ट आने के बाद 5 जून से देश के कई इलाकों में मुस्लिम महिलाएं कांग्रेस का गारंटी कार्ड लेकर पहुंच रही हैं और एक लाख रुपए की मांग कर रही हैं। देश के कई शहरों में महिलाओं की लगातार जुटती भीड़ से कांग्रेस की काफी बदनामी होने लगी। यह गारंटी कांग्रेस के गले की फांस बन गई। कांग्रेस को इस गारंटी से पार पाने का रास्ता नहीं सूझ रहा था तो लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के 11 दिन बाद ईवीएम का जिन्न बाहर निकाला गया। मोदी विरोधी ग्लोबल पावर्स और डीप स्टेट ने इसके लिए एलन मस्क का इस्तेमाल किया। मस्क ने अमेरिका के संदर्भ में कहा कि EVM को हैक किए जाने का खतरा है इसलिए इसे खत्म कर देना चाहिए। इसके बाद राहुल गांधी को जैसे संजीवनी मिल गई। राहुल गांधी ने मस्क की पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए कहा- भारत में EVM ब्लैक बॉक्स की तरह है। डीप स्टेट ने इसके बाद मिड डे में प्लांटेड खबर छपवा दी कि OTP से EVM को अनलॉक किया जा सकता है। जबकि यह भ्रामक बातें हैं। चुनाव आयोग ने कहा कि ईवीएम में किसी फोन या OTP की जरूरत नहीं है।

चुनाव आयोग को बदनाम करना मकसद
कांग्रेस के 99 सांसदों पर अयोग्यता की तलवार लटक रही है। ऐसे में चुनाव आयोग बदनाम करने के लिए ईवीएम मुद्दा उठाया गया है। राहुल गांधी समेत कांग्रेस के सभी 99 नवनिर्वाचित सांसदों के खिलाफ याचिका दायर किया है। नई दिल्ली स्थित वकील विभोर आनंद ने कांग्रेस के सभी 99 सांसदों को अयोग्य ठहराने के लिए याचिका दायर की है। विभोर आनंद ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने सत्ता में आने पर एक लाख रुपये देने का वादा करके मतदाताओं को रिश्वत का झांसा दिया है। उन्‍होंने याचिका में कहा है कि कांग्रेस ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(1) के तहत अपराध किया है। विभोर आनंद ने इस संबंध राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखा है। उनसे चुनाव आयोग को मामले का तत्काल संज्ञान लेने का निर्देश देने की मांग की है। 

भारत की चुनावी प्रक्रिया की दुनिया ने की तारीफ
लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर सवाल उठाने वालों को चुप तो कराया ही पूरी दुनिया ने भी चुनाव नतीजों के बाद भारत की चुनावी प्रक्रिया की तारीफ की। मगर एलन मस्क ने अब एक अलग ही राग छेड़ा है। ये EVM का भूत खड़ा किया गया है ताकि देश का ध्यान कांग्रेस द्वारा 8500 रुपये वाले चुनावी फ्रॉड से हट सके। वहीं अब तक मुद्दाविहीन विपक्ष और खटाखट गारंटी से परेशान कांग्रेस ने ईवीएम मुद्दे को हाथोंहाथ लिया। राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव तक ने एलन मस्क के पोस्ट को री-ट्वीट कर ईवीएम पर चिंता जताने लगे। अगर राहुल और अखिलेश को ईवीएम पर भरोसा नहीं है तो उन्हें अपने सभी सांसदों से इस्तीफा दिलवा देना चाहिए और फिर इस पर बात करनी चाहिए। विधवा विलाप करने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि देशवासियों को इनकी करतूतें पता चल चुकी है।

लोकसभा चुनाव परिणाम आने के 11 दिन बाद क्यों उठा ईवीएम मुद्दा
लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के 11 दिन बाद एक बार फिर ईवीएम पर सवाल उठे हैं। आखिर 11 दिन बाद इस मुद्दे की उठने की वजह क्या हो सकती है? इसकी टाइमिंग लेकर यह साफ है कि राहुल गांधी की चुनावी गारंटी से ध्यान भटकाने के लिए इस मुद्दे को उछाला गया है। जैसे ही यह मुद्दा उछला राहुल गांधी ने इसे लपक लिया। उन्होंने इसे ब्लैक बॉक्स बताया और कहा कि भारत जैसे देश में किसी को भी इसकी जांच करने की अनुमति नहीं है। राहुल ने इसके अलावा एक न्यूजपेपर की कटिंग भी शेयर की है जिसमें लिखा है कि मुंबई उत्तरपश्चिम लोकसभा सीट जीतने वाले शिवसेना सांसद(शिंदे गुट) रवींद्र वायकर के रिश्तेदार के पास ऐसा फोन है जिससे ईवीएम को आसानी से खोला जा सकता है।

यदि EVM हैक होती तो BJP 272 से नीचे क्यों रहती?
यहां सवाल यह उठता है कि यदि EVM हैक होती तो BJP 272 से नीचे क्यों रहती? यदि EVM हैक होती तो मोदी जी काउंटिंग में पीछे क्यों चलते? यदि EVM हैक होती तो मोदी जी मात्र डेढ़ लाख वोटों से क्यों जीतते? यदि EVM हैक होती तो BJP के 18 मंत्री चुनाव क्यों हारते? यदि EVM हैक होती तो BJP अयोध्या क्यों हारती? यदि EVM हैक होती तो मोदी जी गठबंधन का रिस्क क्यों लेते?

ईवीएम में किसी फोन या OTP की जरूरत नहींः चुनाव आयोग
ओटीपी के जरिए ईवीएम अनलॉक का दावा करने वाली मिड डे अखबार की रिपोर्ट को चुनाव आयोग ने नकार दिया। चुनाव आयोग ने कहा, ‘आज एक न्यूजपेपर (मिड डे) में खबर आई कि ईवीएम को एक फोन से अनलॉक किया जाता है। यह बिलकुल गलत है। ईवीएम में किसी फोन या OTP की जरूरत नहीं है। यह पूरी तरह वायरलेस प्रोसिजर है और स्वतंत्र है। चुनाव आयोग ने साफ कहा कि ईवीएम हैक नहीं हो सकती। यह खबर गलत है। जिस अखबार में यह खबर आई है, उसे हमने गलत खबर फैलाने के लिए धारा 499 और 505 के तहत नोटिस भेजा है।

मिड डे की न्यूज़ रिपोर्ट अपने आप में भ्रामक
मिड डे की न्यूज़ रिपोर्ट अपने आप में भ्रामक है। ओटीपी जनरेशन सर्विस वोटर के लिए मतदान में शामिल होने की एक प्रक्रिया का हिस्सा है। सर्विस वोटर (सेना, सुरक्षा बल और भारत सरकार में कार्यरत) एन्क्रिप्टेड ईटीपीबी फ़ाइल डाउनलोड करता है और फिर वोट डालने के लिए इस फ़ाइल को खोलने के लिए ओटीपी उत्पन्न होता है। ईटीपीबीएस ईवीएम से बहुत अलग है।

EVM को खत्म कर देना चाहिएः एलन मस्क
दुनिया के सबसे अमीर बिजनेसमैन एलन मस्क ने 15 जून को लिखा- EVM को खत्म कर देना चाहिए। इसे इंसानों या AI द्वारा हैक किए जाने का खतरा है। हालांकि ये खतरा कम है, फिर भी बहुत ज्यादा है। अमेरिका में इससे वोटिंग नहीं करवानी चाहिए। दरअसल, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी के भतीजे और अगले अमेरिकी चुनावों के लिए स्वतंत्र उम्मीदवार रॉबर्ट एफ कैनेडी जूनियर के एक पोस्ट के जवाब में एलन मस्क ने यह ट्वीट किया था। रॉबर्ट एफ कैनेडी जूनियर ने अपने पोस्ट में प्यूर्टो रिको में हुए मतदान में अनियमितताएं बताई थीं। मस्क ने इसी पर एक्स पर पोस्ट कर लिखा, “हमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को खत्म कर देना चाहिए। इंसानों या एआई द्वारा हैक किए जाने का जोखिम, हालांकि छोटा है, फिर भी यह बहुत अधिक है।”

भारतीय EVM सुरक्षित हैंः राजीव चंद्रशेखर
एलन मस्क के ट्वीट पर भाजपा नेता और पूर्व IT मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने कहा- मस्क के मुताबिक, कोई भी सुरक्षित डिजिटल हार्डवेयर नहीं बना सकता, ये गलत है। उनका बयान अमेरिका और अन्य स्थानों पर लागू हो सकता है – जहां वे इंटरनेट से जुड़ी वोटिंग मशीन बनाने के लिए नियमित कंप्यूट प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं। भारतीय EVM सुरक्षित हैं और किसी भी नेटवर्क या मीडिया से अलग हैं। कोई कनेक्टिविटी नहीं, कोई ब्लूटूथ, वाईफाई, इंटरनेट नहीं। यानी कोई रास्ता नहीं है। फैक्ट्री प्रोग्राम्ड कंट्रोलर जिन्हें दोबारा प्रोग्राम नहीं किया जा सकता। EVM को ठीक उसी तरह डिजाइन किया जा सकता है, जैसा कि भारत ने किया है। भारत में इसे हैक करना संभव नहीं है। इलॉन, हमें ट्यूटोरियल (सिखाने वाला संस्थान) चलाकर खुशी होगी।

भारत में EVM ब्लैक बॉक्स की तरहः राहुल गांधी
भारत की हर सफलता में नकारात्मकता ढूंढ़ने में माहिर राहुल गांधी ने मस्क की पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए कहा- भारत में EVM ब्लैक बॉक्स की तरह है। किसी को भी इसकी जांच की अनुमति नहीं है। हमारी चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं। जब संस्थाओं में जवाबदेही की कमी होती है, तो लोकतंत्र एक दिखावा बन जाता है और धोखाधड़ी की संभावना बढ़ जाती है। राहुल गांधी ने इस ट्वीट के साथ ईवीएम को लेकर मिड डे में छपी खबर को भी पोस्ट किया है।

ईवीएम में छेड़छाड़ की जा सकती हैः सैम पित्रोदा
इसके बाद राहुल गांधी और उनके राजनीतिक गुरु सैम पित्रोदा ने कहा कि देश में बैलट पेपर से ही चुनाव कराया जाना चाहिए क्योंकि ईवीएम की व्यवस्था ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि मैंने ईवीएम की व्यवस्था का पूरा अध्ययन किया है और मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि यह व्यवस्था ठीक नहीं है और इसमें छेड़छाड़ की जा सकती है। उन्होंने कहा कि ईवीएम से छेड़छाड़ की आशंका को देखते हुए बैलट पेपर से ही चुनाव कराना उचित होगा और इसी के जरिए चुनाव में हार-जीत का फैसला किया जाना चाहिए।

आगामी सभी चुनाव बैलेट पेपर होः अखिलेश यादव
सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक बार फिर से ईवीएम पर शक जताया है। उन्होंने यह बात एलन मस्क के एक बयान के बाद यह बात कही है। सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए अखिलेश ने लिखा कि “टेक्नॉलजी समस्याओं को दूर करने के लिए होती है, अगर वही मुश्किलों की वजह बन जाए, तो उसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। आज जब विश्व के कई चुनावों में EVM को लेकर गड़बड़ी की आशंका ज़ाहिर की जा रही है और दुनिया के जाने-माने टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट्स EVM में हेराफेरी के ख़तरे की ओर खुलेआम लिख रहे हैं, तो फिर EVM के इस्तेमाल की ज़िद के पीछे की वजह क्या है, ये बात भाजपाई साफ़ करें। आगामी सभी चुनाव बैलेट पेपर (मतपत्र) से कराने की अपनी मांग को हम फिर दोहराते हैं।” अखिलेश यादव जब ईवीएम पर शक है तो ऐसे में उन्हें अपने सभी सांसदों से इस्तीफा दिलवा देना चाहिए फिर इस पर बात करें तो लोगों को भरोसा होगा कि वे साफ नीयत से बोल रहे हैं।

आफताब ने श्रद्धा का मर्डर किया… क्योंकि इंटरनेट पर सब कुछ आसानी से मिलता है: दीपांकर दत्ता, चीफ जस्टिस, बॉम्बे हाई कोर्ट

श्रद्धा मर्डर केस पर बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस का बयान (फाइल फोटो)
बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता के बयान से यकायक माध्यमिक स्तर पर रामधारी सिंह दिनकर की कविता "अभिनव मानव" की वह पंक्तियाँ 'विज्ञानं जितनी प्रगति करेगी, उतनी विनाशकारी होगी..." स्मरण हो गयी। श्रद्धा मर्डर केस (Shraddha Murder Case) पर बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता (Chief Justice Dipankar Datta) का भी बयान आया है। 19 नवम्बर 2022 को उन्होंने भारत में बढ़ रहे साइबर अपराध पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर हर चीज आसानी से मिल जाने के सकारात्मक के साथ नकारात्मक परिणाम भी होते हैं।

बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस दत्ता ने यह बयान पुणे में टेलीकॉम डिस्प्यूट स्टेटमेंट अपीलेट ट्रिब्यूनल (TDSAT) के ‘टेलीकॉम, ब्रॉडकास्टिंग, आईटी और साइबर सेक्टर्स में डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन मैकेनिज्म’ सेमिनार को संबोधित करते हुए दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सेमिनार में बोलते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा कि लोगों ने श्रद्धा मर्डर केस के बारे में अख़बारों में पढ़ा होगा। उन्होंने इसे मुंबई में प्रेम और दिल्ली में खौफ की संज्ञा दी। आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह से अपराधों में बढ़ोत्तरी इसलिए हो रही है क्योंकि इंटरनेट के माध्यम से लोगों को वो तमाम चीजें आसानी से मिल जाती हैं, जिसकी तो तलाश करते हैं।

जस्टिस दत्ता के मुताबिक उन्हें आशा है कि भारत सरकार भी इस दिशा में गंभीरता से विचार कर रही होगी। बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपांकर के मुताबिक हालॉंकि भारत में दूरसंचार विधेयक मौजूद है लेकिन भविष्य की चुनौतियों के लिए एक मजबूत कानून जरूरी होगा।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने निजी सम्मान की रक्षा करते हुए समाज में सभी को न्याय दिलाने की दिशा में प्रयास करना होगा। न्यायाधीश ने लोगों से इसे एक टारगेट के तौर पर लेने की अपील की है। NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के मुद्दे पर बोलते हुए जस्टिस दत्ता ने कहा कि इसकी क्षेत्र के हिसाब से बेंच होनी चाहिए। अंत में उन्होंने लोगों से संवैधनिक मूल्यों की रक्षा करने की अपील की।

भारत की साइबर दुनिया में तेजी से हो रहे बदलाव पर जस्टिस दत्ता ने पिछले दिनों की याद दिलाई। उन्होंने बताया कि 1989 में लोगों के पास मोबाइल फोन नहीं थे लेकिन 2-3 वर्षों के अंदर उनके पास पेजर आ गए। पहले मोटोरोला के बड़े हैंडसेट की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि बाद में छोटे हैंडसेट आ गए।

बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता के मुताबिक अब आ रहे फोन में ऐसी चीजें उपब्लध हैं, जो पहले सोच से भी परे थीं। न्यायाधीश ने इस नए सिस्टम में हैकिंग के खतरे बढ़ने से सतर्क करते हुए इसे लोगों की निजता पर हमला बताया है।