Showing posts with label #Chief Justice. Show all posts
Showing posts with label #Chief Justice. Show all posts

गवई पर जूता फेंके जाने को लेकर वामपंथी और कांग्रेसी बहा रहे ‘घड़ियाली आँसू’, जज लोया केस में उन पर नहीं था भरोसा

                                                                   गवई और दिवंगत जज लोया (साभार: पीटीआई/इंडियन एक्सप्रेस)
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई पर सोमवार (6 अक्टूबर 2025) को एक मामले की सुनवाई के दौरान जूता फेंकने की कोशिश की गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना उस समय हुई जब CJI गवई की अध्यक्षता वाली बेंच में कुछ मामलों की सुनवाई चल रही थी।

इस दौरान 71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर अचानक न्यायाधीशों के मंच के पास पहुँचे, अपना जूता उतारा और उसे CJI की ओर फेंकने का प्रयास किया। हालाँकि, मौके पर मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें तुरंत रोक लिया और अदालत से बाहर ले गए।

बताया जा रहा है कि इस दौरान अधिवक्ता ने चिल्लाकर कहा, “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे।” इसके बाद उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने उन पर कोई मामला दर्ज कराने से इनकार कर दिया जिसके बाद पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया।

बाद में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अधिवक्ता राकेश किशोर का वकालत लाइसेंस निलंबित कर दिया। घटना के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही प्रभावित नहीं हुई। CJI ने अदालत में मौजूद वकीलों से कहा कि वे सुनवाई जारी रखें।

CJI गवई की ‘हिंदू विरोधी टिप्पणी’ से परेशान था वकील

जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील राकेश किशोर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वे CJI गवई की ‘हिंदू विरोधी टिप्पणी’ से बेहद परेशान थे। उनका कहना था कि चीफ जस्टिस ने पिछले महीने एक मामले की सुनवाई के दौरान भगवान विष्णु के एक भक्त की आस्था का मजाक उड़ाया था। इसी बात ने उन्हें अंदर तक चोट पहुँचाई।

यह मामला मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति की पुनरुद्धार से जुड़ा था। उस याचिका की सुनवाई के दौरान CJI गवई ने याचिकाकर्ता से तंज भरे लहजे में कहा था, “यह तो पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका लगती है। आप खुद भगवान से जाकर कहिए कि वे कुछ करें। आप कहते हैं कि आप भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हैं, तो जाकर प्रार्थना कीजिए।”

कानूनी तौर पर यह याचिका तकनीकी कारणों से खारिज की जा सकती थी लेकिन CJI गवई की इस व्यंग्यात्मक टिप्पणी को लेकर काफी आलोचना हुई। इसमें आस्था का मजाक उड़ा गया और कई लोगों ने इसे पूरी तरह अनावश्यक और असंवेदनशील बताया।

कांग्रेस और वामपंथी-लिबरल गैंग ने CJI की जाति को बनाया मुद्दा

हालाँकि, CJI पर हिंदू विरोधी टिप्पणी को लेकर जूता फेंकने का प्रयास किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता लेकिन कांग्रेस और वामपंथी-लिबरल समूह ने इस मौके का इस्तेमाल अपने राजनीतिक नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए किया। उन्होंने पूरे मामले को CJI गवई की जाति से जोड़ दिया।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि जातिगत पूर्वाग्रह और मनुवादी सोच अब भी समाज में बनी हुई है। वहीं, ब्राह्मण विरोधी रुख के लिए जानी जाने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह भी इस बहस में शामिल हो गईं और उन्होंने भी इस घटना को CJI गवई की जाति से जोड़ने की कोशिश की। जयसिंह के अनुसार, यह घटना मुख्य न्यायाधीश की जाति के चलते की गई है और संस्थान के भीतर से उन्हें अलग-थलग करने की कोशिश है।

कई लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि CJI की जाति का उस व्यक्ति की हरकत से क्या संबंध है, जिसने हिंदू विरोधी टिप्पणी से आहत होकर जूता फेंकने की कोशिश की थी। लेकिन कांग्रेस और वामपंथी नैरेटिव में यह पूरी तरह फिट बैठता है। उनके लिए न तो यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है और न ही कोई वास्तविक जातिगत भेदभाव। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण हमेशा उनका नैरेटिव ही होता है बाकी सब कुछ उसके बाद आता है।

जज लोया केस में वामपंथी-लिबरल गैंग ने CJI गवई के बयानों को किया खारिज

जब 2014 में सीबीआई जज बीएच लोया की मौत हुई थी तब CJI गवई या उनके बयान का वामपंथी-लिबरल समूह पर कोई असर नहीं पड़ा था। CJI गवई ने 2017 में NDTV से बातचीत के दौरान जज लोया की मौत को लेकर फैलाई जा रही सभी साजिशी बातों को सिरे से खारिज किया था।

उस समय वह बॉम्बे हाईकोर्ट में कार्यरत रहे थे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जज लोया की मौत में कोई गड़बड़ी नहीं थी। गवई खुद उस अस्पताल में मौजूद थे जहाँ जज लोया को दिल का दौरा पड़ने के बाद भर्ती कराया गया था।

CJI गवई ने कहा था कि उन्होंने ICU में जज लोया का शव देखा जहाँ डॉक्टर उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की थी। उन्होंने यह भी बताया था कि जज लोया के कपड़ों पर कोई खून के निशान नहीं थे और उन्हें किसी तरह की संदिग्ध स्थिति नहीं दिखी।

इसके बावजूद कांग्रेस और वामपंथी-लिबरल समूहों ने उस समय CJI गवई के बयान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने जज लोया की मौत को लेकर झूठी कहानियाँ फैलाते हुए बीजेपी को निशाना बनाना जारी रखा। इन अफवाहों और आरोपों के पीछे उनका मकसद सिर्फ यह था कि जज लोया उस समय सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें उस वक्त बीजेपी अध्यक्ष और वर्तमान में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य आरोपी थे।

इंदिरा जयसिंह और उनके गैंग ने जब न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश की

इंदिरा जयसिंह और उनके गैंग ने पहले भी न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश की थी। उस समय जस्टिस गवई बॉम्बे हाई कोर्ट में थे और अब वही भारत के चीफ जस्टिस हैं। जयसिंह का सर्वोच्च न्यायालय के प्रति सम्मान का इतिहास अच्छा नहीं रहा ह और अब जूता फेंकने की घटना को न्यायपालिका पर हमला बता रही हैं। लेकिन पहले वे खुद न्यायपालिका को बदनाम करने वाले गिरोह का हिस्सा थीं।

कांग्रेस से जुड़ी मानी जाने वाली इंदिरा जयसिंह उस लॉबी का हिस्सा थीं जिसने जज लोया की मौत को लेकर झूठ फैलाया। उस लॉबी ने यह आरोप लगाने की कोशिश की थी कि अमित शाह और बीजेपी का इसमें हाथ था। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कहा था कि जज लोया की मौत प्राकृतिक थी और इसमें किसी तरह की साजिश नहीं थी।

इंदिरा जयसिंह के साथ वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे और प्रशांत भूषण भी इस अभियान में शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों को अदालत की गरिमा को ठेस पहुँचाने और न्याय की प्रक्रिया में रुकावट डालने की कोशिश के लिए फटकार लगाई थी।

उस समय चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खानविलकर और जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा था कि इन वरिष्ठ वकीलों की याचिकाएँ न्यायाधीशों की छवि को नुकसान पहुँचाने और पूर्वाग्रह फैलाने की कोशिश हैं, खासकर बॉम्बे हाई कोर्ट के जज बी.आर. गवई के खिलाफ।

विडंबना यह है कि वही इंदिरा जयसिंह जिन्होंने पहले जस्टिस गवई की प्रतिष्ठा पर हमला किया था। वो अब उनकी जाति और न्यायपालिका पर हमले की बात कर रही हैं। जब वे बॉम्बे हाई कोर्ट में थे तब उन पर सवाल उठाना उन्हें सही लगा लेकिन अब जब वे चीफ जस्टिस हैं तो वही बात जातिगत भेदभाव बताई जा रही है।

आज तक भी कुछ लोग जज लोया की मौत को लेकर झूठी कहानियाँ फैलाते रहते हैं। वे लगातार यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि इस मामले में केंद्र सरकार की कोई भूमिका थी और यह साबित करना चाहते हैं कि न्यायपालिका जैसी संस्था भी सरकार के प्रभाव में है। इन साजिशी दावों के लिए कभी कोई सबूत नहीं दिया जाता है। जज लोया से जुड़े वे सभी तथ्य और बयान जो वामपंथी नैरेटिव के खिलाफ जाते हैं। उन्हें जानबूझकर अनदेखा कर दिया जाता है।

उस समय वामपंथी सोच रखने वाले कई विचारकों ने यहाँ तक कहा था कि जज गवई वरिष्ठ न्यायाधीशों को दरकिनार कर चीफ जस्टिस बनेंगे क्योंकि उन्होंने जज लोया की मौत को लेकर किसी गड़बड़ी से इनकार किया था।

विडंबना यह है कि वही जज गवई, जिन्हें पहले ‘सरकारी आदमी’ या ‘सरकार के इशारों पर चलने वाला’ बताया गया था, अब वामपंथी-लिबरल वर्ग के ‘प्रिय’ बन गए हैं। ऐसा लगता है कि भगवान विष्णु से जुड़े मजाक के बाद ये समूह उन्हें अपने नए नैरेटिव में फिट मानने लगे हैं।

जूता फेंकने की घटना पर कांग्रेस और वामपंथी-लिबरल समूह की प्रतिक्रिया ने उनकी दोहरी सोच और पाखंड को उजागर कर दिया है। ये लोग किसी सिद्धांत या सच्चाई के लिए नहीं बल्कि सिर्फ अपनी जहरीली और स्वार्थी विचारधारा के लिए खड़े रहते हैं। उनकी राजनीति देश में विभाजन फैलाने पर टिकी हुई है।

अवलोकन करें:-

क्या Gen Z की शुरुआत हमारे सुप्रीम कोर्ट से ही हो गई है? अफ़सोस इस बात पर है कि कुछ ज्ञानी लोग गवई की ब

इनके लिए न CJI गवई में और न ही पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ में कोई अंतर है। चंद्रचूड़ जो कभी वामपंथी वर्ग के प्रिय थे राम मंदिर पर फैसला सुनाने के बाद उनके निशाने पर आ गए। इस समूह के लिए हर व्यक्ति तब तक उपयोगी है जब तक वह उनके राजनीतिक हितों की सेवा करता है। जैसे ही कोई उनके एजेंडे से बाहर चला जाता है, वह उनके लिए बेकार हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के किस जज के पास कितनी प्रॉपर्टी, कैसे हुई नियुक्ति… पहली बार सार्वजनिक


सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों की संपत्ति का विवरण वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। वेबसाइट पर 33 में से केवल 21 जजों की जानकारी ही देखी जा सकती है। बाकी जजों ने ब्योरा केवल सुप्रीम कोर्ट को सौंपा है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर से कैश मिलने के विवाद के बाद लिया था।

वेबसाइट में सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्त होने वाले जजों के नाम, अनुभव, उनकी नियुक्ति की समेत उनका किसी पहले से सेवा दे रहे जज के साथ रिश्ते आदि की जानकारी भी सार्वजनिक की है।

 पारदर्शिता बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 मई 2025) को कहा है कि उसने न्यायाधीशों की संपत्ति का विवरण अपनी वेबसाइट पर अपलोड कर दिया है। यह जानकारी न्यायालय के उस निर्णय के मुताबिक है जिसमें संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक डोमेन में रखने का निर्णय लिया गया है, हालाँकि वेबसाइट पर 33 में से केवल 21 जजों की जानकारी ही देखी जा सकती है। बाकी जजों ने ब्योरा केवल सुप्रीम कोर्ट को सौंपा है।

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि “भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण अदालत ने 1 अप्रैल, 2025 को निर्णय लिया है कि इस न्यायालय के न्यायाधीशों की संपत्ति का विवरण इस न्यायालय की वेबसाइट पर अपलोड करके सार्वजनिक डोमेन में रखा जाएगा। न्यायाधीशों की संपत्ति का विवरण जो पहले से उपलब्ध है, उसे अपलोड किया जा रहा है। बाकी जजों की जानकारी मिलने पर अपलोड की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर से कैश मिलने के विवाद के बाद लिया था। जस्टिस वर्मा के सरकारी बंगले में 14 मार्च को आग लगी थी। आग बुझाने के लिए आई फायर सर्विस टीम को जस्टिस वर्मा के घर से अधजले नोट मिले थे।

सुप्रीम कोर्ट ने वेबसाइट पर क्या दी जानकारी?

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी वेबसाइट पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों की पूरी प्रक्रिया की जानकारी दी है जिसमें राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार से मिलनेवाला इनपुट और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के रोल के बारे में बताया गया है। इसका मकसद पारदर्शिता लाना और जनता को जागरूक बनाना है।

इसमें 9 नवंबर 2022 से अब तक हाईकोर्ट के जजों की नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जो प्रस्ताव रखा था उसे अपलोड किया गया है। कॉलेजियम ने 221 नामों की सिफारिश पिछले ढ़ाई साल में की थी। इनमें से 29 उम्मीदवारों के नामों को सरकार ने मंजूरी दी। इसमें ओबीसी 21, अत्यंत पिछड़ा वर्ग 7, एससी 7 और एसटी 5 शामिल हैं।

इसमें जानकारी दी गई है कि कोई भी उम्मीदवार किसी रिटायर्ड या मौजूदा सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज का रिश्तेदार या परिवार तो नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने जिन नामों की सिफारिश की थी उनमें से 11 जजों में 6 के पिता, 3 के रिश्तेदार और 1-1 के भाई या ससुर पूर्व में या वर्तमान में जज हैं।

सीजेआई की गणेश पूजा में पीएम मोदी के जाने से इफ्तार पार्टी गैंग को लगी मिर्ची


देश-दुनिया में आजकल गणेश उत्सव मनाया जा रहा है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल 11 सितंबर को देश के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के घर जाकर पूजा-अर्चना और आरती की। प्रधानमंत्री ने एक्स पर एक फोटो शेयर करते हुए लिखा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ जी के आवास पर गणेश पूजा में शामिल हुआ। भगवान श्री गणेश हम सभी को सुख, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद दें।

प्रधानमंत्री मोदी ने सीजेआई चंद्रचूड़ के यहां जाकर देश की खुशहाली के लिए प्रार्थना की, लेकिन देश के कथित लिबरल-सेकुरल गैंग को इससे मिर्ची लग गई। इस कथित इफ्तार पार्टी गैंग ने सोशल मीडिया पर छाती पीटना शुरू कर दिया। उन्हें पीएम मोदी के सीजेआई के घर जाने मात्र से लोकतंत्र खतरे में नजर आने लगा। इन लेफ्ट और खान मार्केट गैंग के लोगों ने इस पूजा-अर्चना और आरती पर ही सवाल उठा दिए। सोशल मीडिया पर इस गैंग के लोग विधवा विलाप करने लगे।

जबकि इन लोगों के जमाने में सीजेआई से से लेकर पीएम तक इफ्तार पार्टी में खुलकर मिलते थे। सोशल मीडिया पर वामपंथी गैंग जहां उल्टी करने में लगे हैं वहीं नेशन फर्स्ट वाले लोग उनका खाता-खेसरा निकाल कर उन्हें लताड़ लगा रहे हैं। देखिए किस तरह से खान मार्केट गैंग के लोगों की किरकिरी हो रही है…

 

पाकिस्तान : चीफ जस्टिस का सिर काटने पर 1 करोड़ रुपए, इस्तीफे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में घुसी ‘भीड़’

             पाकिस्तान के चीफ जस्टिस के सर पर 1 करोड़ का ईनाम (फोटो साभार: X_AjayKauljourno)
पाकिस्तान के चीफ जस्टिस काजी फैज ईसा के सिर पर 1 करोड़ का ईनाम रख दिया गया है, जिन्होंने एक अहमदिया व्यक्ति मुबारकी सानी को ‘राइट टू रिलीजन’ के तहत ‘ईशनिंदा’ के आरोपों से बरी कर दिया था। यही नहीं, अब हजारों कट्टरपंथियों की भीड़ सुप्रीम कोर्ट में घुस आई है और चीफ जस्टिस काजी फैज ईसा के इस्तीफे की माँग कर रही है। उन्हें पीछे ढकेलने के लिए वॉटर कैनन और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा है।

काजी फैज ईसा पिछले साल ही पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस नियुक्त किए गए थे, लेकिन फरवरी 2024 में उनके एक फैसले की वजह से आज उनकी जान पर बन आई है। इस मामले में उन्होंने फरवरी में उसकी सजा पर रोक लगाई थी और फिर 29 मई को मामले की सुनवाई पूरी करते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया था। उनके साथ सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस इरफान सआदत खान और जस्टिस नईम अख़्तर अफगान भी शामिल थे।

ताजा विरोध प्रदर्शन 24 जुलाई को शुरू हुए, जब उन्होंने इस मामले में पंजाब सरकार की याचिका स्वीकार कर ली। इसके साथ ही कई इस्लामी संगठनों ने भी याचिकाएँ दायर की और सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले की समीक्षा की माँग की। इन मामलों में सुनवाई 22 अगस्त 2024 को होगी, लेकिन उससे पहले ही हजारों कट्टरपंथियों की भीड़ ने इस्लामाबाद के अति सुरक्षित रेड-जोन को पार कर लिया और सुप्रीम कोर्ट के बाह पड़ाव डालकर प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

 

इस्लामिक कट्टरपंथियों की नाराजगी की वजह

जानकारी के मुताबिक, 19 अगस्त 2024 को इस्लामिक कट्टरपंथियों के बड़े समूह ने इस्लामाबाद के आत्यधिक सुरक्षित माने जाने वाले रेड-जोन की सुरक्षा को तोड़ दिया और सुप्रीम कोर्ट के गेट पर धावा बोल दिया। इस्लामिक कट्टरपंथियों की माँग है कि चीफ जस्टिस तुरंत इस्तीफा दें। दरअसल, फरवरी के फैसले में जस्टिस ईसा ने अहमदिया व्यक्ति मुबारक अहमद सानी को जमानत दे दी थी, जिस पर साल 2019 में ईशनिंदा का आरोप लगा था। उसने अहमदियों से जुड़े पर्चे बाँटे थे। सानी को पंजाब पवित्र कुरान (प्रिंटिंग एंड रिकॉर्डिंग) (संसोधन) एक्ट, 2021 के तहत सजा सुनाई गई थी।
हालाँकि जस्टिस ईसा की अगुवाई में तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि सानी को उस कानून के तहत सजा दी गई है, जो साल 2021 से पहले थी ही नहीं। इसके बाद कोर्ट ने सानी को जमानत देते हुए उसकी तुरंत रिहाई का आदेश दिया था। इसके तुरंत बाद तहरीक-ए-लब्बैक-पाकिस्तान और अन्य इस्लामिक संगठनों ने काजी फैज ईसा के खिलाफ नफरती अभियान चलाना शुरू कर दिया। फरवरी 2024 में पेशावर में 3 हजार से अधिक इस्लामिक कट्टरपंथियों ने रोड़ ब्लॉक करके ‘कादियानों को मौत’ के नारे लगाए। इस प्रदर्शन के बाद सुप्रीम कोर्ट को बाकायदा बयान जारी कर अपने फैसले पर सफाई देनी पड़ी थी।

चीफ जस्टिस का सर काटने पर 1 करोड़ का ईनाम

पाकिस्तान के कट्टरपंथी इस्लामी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) ने पाकिस्तान के चीफ जस्टिस ईसा के सिर पर 1 करोड़ का ईनाम घोषित किया है। टीएलपी के दूसरे नंबर के नेता पीर जहीरुल हसन शाह ने ये ईनाम घोषित किया। उसने अपने बयान में कहा, “टीएलपी को छोड़िए, एक मोमिन और प्रोफेट मोहम्मद का गुलाम होने के तौर पर, मैं अपनी हैसियत से घोषणा करता हूँ कि जो फैज ईसा का सिर कलम करेगा, उसे मैं 1 करोड़ रुपए दूँगा।” उसने अहमदियों को मरजई भी कहा।
इस बीच, सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने शाह की भड़काऊ टिप्पणी का एक वीडियो साझा किया और कहा, “पाकिस्तान राज्य में इस तरह के बयानों के लिए कोई जगह नहीं है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। काजी साहब ने किसी समूह या समूह के पक्ष में कोई फैसला नहीं दिया। जिस आधार पर यह घृणित कथा प्रचारित की जा रही है, हम इस तरह के बयानों की कड़ी निंदा करते हैं और इसका पुरजोर खंडन करते हैं, ऐसी मानसिकता पाकिस्तान को गंभीर नुकसान पहुँचा रही है। इस झूठे नरेटिव के पीछे राजनीतिक मकसद हैं।”
पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के लोगों को 1974 में राज्य द्वारा औपचारिक रूप से गैर-मुस्लिम घोषित किए जाने के बाद से ही गंभीर उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है और उनके खिलाफ नियमित रूप से ईशनिंदा कानून का इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ अहमदिया समुदाय को काफिर माना जाता है। ये विडंबना ही है कि जिस अहमदिया समुदाय ने पाकिस्तान के निर्माण में सबसे ज्यादा अहम भूमिका निभाई थी, आज वही पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम हो गए हैं। वैसे, इस्लामिक कट्टरपंथियों के दबाव की वजह से सुप्रीम कोर्ट बैकफुट पर दिख रहा है। ऐसे में इस बात की संभावना कहीं अधिक है कि सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले को बदल दे और आरोपित अहमदिया व्यक्ति को फिर से जेल में डाल दे।

 



क्या CJI चंद्रचूड़ डरपोक हैं या Judicial Fraternity में जंगल राज चल रहा है?

सुभाष चन्द्र 

एक खबर दब गई चुनाव के माहौल में, परसों 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार पुनीत सहगल ने एडवोकेट मैथूस नेदमपरा की कॉलेजियम को ख़त्म करने और NJAC को बहाल करने की याचिका को accept करने से मना करते हुए कहा कि-

“कॉलेजियम को पहले ही Upheld किया जा चुका है और NJAC को, जिसमे जजों की नियुक्ति के मामले में सरकार को बराबर के अधिकार दिए गए थे, संविधान पीठ ने October, 2015 में ख़ारिज कर दिया था। review petition भी 2018 में ख़ारिज हो गई थी। इसलिए Repeat litigation न्यायपालिका के समय और energy की बर्बादी करना है”।

लेखक 
चर्चित यूटूबर 
पुनीत सहगल ने 2013 के सुप्रीम कोर्ट के Rules का सहारा लेते हुए कहा कि -

“I hold that the registration of the present case was not proper and by virtue of order XV Rule 5 of the Supreme Court Rules, 2013 I hereby decline to receive the same”

2013 के rule के अनुसार रजिस्ट्रार याचिका को Receive करने से मना कर सकता है अगर याचिकाकर्ता ने कोई reasonable cause नहीं बताया या यह याचिका तुच्छ है या इसमें scandalous matter है।

याचिका Receive करने से मना करने का क्या मतलब हो सकता है जब यह याचिका नवंबर, 2022 से सुप्रीम कोर्ट में पड़ी है। एडवोकेट नेदमपरा ने 17 नवंबर, 2022 को याचिका दायर की थी और CJI चंद्रचूड़ ने याचिका को उचित समय पर list करना स्वीकार किया था (The Hindu की 17 नवंबर, 2022 की रिपोर्ट कोई भी देख सकता है)।

उसके बाद 23 अप्रैल 2023 को CJI चंद्रचूड़ ने नेदुमपरा द्वारा याचिका mention करने पर कहा था कि कॉलेजियम को 9 जजों के बेंच ने बनाया था, इसे क्या एक Writ Petition से Challenge कर सकते हैं।

जब याचिका CJI चंद्रचूड़ ने ही Admit कर ली थी तो रजिस्ट्रार उसे  receive करने से मना कैसे कर सकता है। रजिस्ट्रार का काम किसी याचिका को ख़ारिज करने का नहीं होता, उसका काम याचिका में खामी देखने का होता है और यदि कुछ कमी है तो याचिकाकर्ता से सुधार करवा का चीफ जस्टिस के सामने प्रस्तुत करना होता है जिससे उचित तारीख पर लिस्ट किया जाए। ये Repeat Litigation है तो EVM पर 40 याचिकाएं कैसे स्वीकार हुईं।

यह Judicial Fraternity का झोल है - ऐसा प्रतीत होता है कि चंद्रचूड़ याचिका सुनने से बचना चाहते थे क्योंकि यदि सुनवाई होती तो बहुत कुछ छुपी हुई बातें सामने आ सकती थी जिससे यह पूरी Judicial Fraternity बेनकाब हो सकती थी कि उसमे कैसा जंगल राज चल रहा है।  याचिका पर सुनवाई से बचने के लिए यह रास्ता निकाला गया कि रजिस्ट्रार से मामले को दबा दिया जाए। एक collegium गैर-संवैधानिक/गैर-कानूनी और अब याचिका को भी ख़ारिज करने का तरीका ऐसा अपनाया गया जो किसी को भी स्वीकारनीय नहीं हो सकता।

रजिस्ट्रार पुनीत सहगल ने यह कैसे कह दिया कि NJAC में जजों की नियुक्ति के लिए “बराबर” के अधिकार दिए गए थे जबकि सच यह है कि NJAC में प्रस्तावित 6 सदस्यों की नियुक्ति समिति में सरकार की तरफ से केवल एक कानून मंत्री था और बाकी 5 सदस्यों के चयन में चीफ जस्टिस का ही रोल था। 

समिति में CJI, सुप्रीम कोर्ट के 2 अन्य जज, कानून मंत्री और 2 प्रतिष्ठित व्यक्ति थे (जिनका चयन एक समिति ने करना था जिसमें प्रधानमंत्री, CJI और विपक्ष के नेता थे) ऐसे में सब कुछ न्यायपालिका के हाथ में था लेकिन एक कानून मंत्री से समस्या हो गई थी और 2015 में संविधान पीठ ने NJAC को “न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला” बता कर ख़ारिज कर दिया जबकि जजों को वह अधिकार नहीं था क्योंकि वो स्वयं  stakeholder और interested party थे, जो  अपने ही खिलाफ सुनवाई नहीं कर सकते थे।

नेदुमपुरा ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के NJAC पर फैसले को void ab initio और कॉलेजियम को “nepotism and favouritism” का पर्यायवाची कहा था जिसमें कुछ गलत नहीं था।

CJI चंद्रचूड़ को दखल देकर रजिस्ट्रार के आर्डर को स्वतः ही ख़ारिज कर देना चाहिए और 13 लोगों की पीठ का गठन करना चाहिए जिसमें 6 जज हों और 7 Eminent Personalities हों क्योंकि एक बार फिर से जजों के हाथ से  फैसला नहीं होना चाहिए।

आफताब ने श्रद्धा का मर्डर किया… क्योंकि इंटरनेट पर सब कुछ आसानी से मिलता है: दीपांकर दत्ता, चीफ जस्टिस, बॉम्बे हाई कोर्ट

श्रद्धा मर्डर केस पर बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस का बयान (फाइल फोटो)
बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता के बयान से यकायक माध्यमिक स्तर पर रामधारी सिंह दिनकर की कविता "अभिनव मानव" की वह पंक्तियाँ 'विज्ञानं जितनी प्रगति करेगी, उतनी विनाशकारी होगी..." स्मरण हो गयी। श्रद्धा मर्डर केस (Shraddha Murder Case) पर बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता (Chief Justice Dipankar Datta) का भी बयान आया है। 19 नवम्बर 2022 को उन्होंने भारत में बढ़ रहे साइबर अपराध पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि इंटरनेट पर हर चीज आसानी से मिल जाने के सकारात्मक के साथ नकारात्मक परिणाम भी होते हैं।

बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस दत्ता ने यह बयान पुणे में टेलीकॉम डिस्प्यूट स्टेटमेंट अपीलेट ट्रिब्यूनल (TDSAT) के ‘टेलीकॉम, ब्रॉडकास्टिंग, आईटी और साइबर सेक्टर्स में डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन मैकेनिज्म’ सेमिनार को संबोधित करते हुए दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सेमिनार में बोलते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा कि लोगों ने श्रद्धा मर्डर केस के बारे में अख़बारों में पढ़ा होगा। उन्होंने इसे मुंबई में प्रेम और दिल्ली में खौफ की संज्ञा दी। आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह से अपराधों में बढ़ोत्तरी इसलिए हो रही है क्योंकि इंटरनेट के माध्यम से लोगों को वो तमाम चीजें आसानी से मिल जाती हैं, जिसकी तो तलाश करते हैं।

जस्टिस दत्ता के मुताबिक उन्हें आशा है कि भारत सरकार भी इस दिशा में गंभीरता से विचार कर रही होगी। बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपांकर के मुताबिक हालॉंकि भारत में दूरसंचार विधेयक मौजूद है लेकिन भविष्य की चुनौतियों के लिए एक मजबूत कानून जरूरी होगा।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने निजी सम्मान की रक्षा करते हुए समाज में सभी को न्याय दिलाने की दिशा में प्रयास करना होगा। न्यायाधीश ने लोगों से इसे एक टारगेट के तौर पर लेने की अपील की है। NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के मुद्दे पर बोलते हुए जस्टिस दत्ता ने कहा कि इसकी क्षेत्र के हिसाब से बेंच होनी चाहिए। अंत में उन्होंने लोगों से संवैधनिक मूल्यों की रक्षा करने की अपील की।

भारत की साइबर दुनिया में तेजी से हो रहे बदलाव पर जस्टिस दत्ता ने पिछले दिनों की याद दिलाई। उन्होंने बताया कि 1989 में लोगों के पास मोबाइल फोन नहीं थे लेकिन 2-3 वर्षों के अंदर उनके पास पेजर आ गए। पहले मोटोरोला के बड़े हैंडसेट की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि बाद में छोटे हैंडसेट आ गए।

बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता के मुताबिक अब आ रहे फोन में ऐसी चीजें उपब्लध हैं, जो पहले सोच से भी परे थीं। न्यायाधीश ने इस नए सिस्टम में हैकिंग के खतरे बढ़ने से सतर्क करते हुए इसे लोगों की निजता पर हमला बताया है।