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‘बाबरी हमारी, मुगल हमारे बाप-दादा’: सिवान में बोला पढ़ा-लिखा मुसलमान, राम मंदिर का निर्माण गलत; राममन्दिर का विरोध करने वाले हिन्दुओं को डूब मरना चाहिए

                                                                  बिहार के मुगलपुत्र
बिहार के सिवान में ऑपइंडिया की यात्रा दौरान अनुराग मिश्रा ने कॉलेज पढ़े मुस्लिम युवकों से बात की। एक इंजीनियरिंग स्टूडेंट ने कहा, “राम मंदिर तोड़कर बनाया गया, बाबरी मस्जिद हमारी थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था ना?” दूसरा MA पास युवक बोला, “मुगल हमारे पूर्वज हैं, औरंगजेब ने हिंदू मंदिर तोड़े तो क्या गलत किया? वो इस्लाम फैला रहे थे।”

शहाबुद्दीन को लेकर सब एक स्वर में बोले, “साहेब गरीब मुसलमानों के मसीहा थे, ऊँची जाति वालों से लड़ते थे।”

राम मंदिर पर गुस्सा साफ था। एक टीचर ने कहा, “हिंदू हमेशा मुसलमानों को दबाते हैं, राम मंदिर इसका सबूत है।” लोग मुगलों को गौरवशाली योद्धा बताते हैं और राम मंदिर को अन्याय।

मुस्लिम कट्टरपंथियों की इस बात को सुन अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर का विरोध करने वाले सारे हिन्दुओं को शर्म आनी चाहिए। जो अपने पुरुषोत्तम श्रीराम मंदिर का विरोध कर रहे थे। वही स्थिति काशी, मथुरा और अन्य धार्मिक स्थलों की हैं। इन सनातन विरोधी हिन्दुओं को मुसलमानों से सीखना चाहिए कि किस तरह कब्जाए स्थान को अपना हक़ जमाया जाता है। और तुम बेशर्म अपने धार्मिक स्थलों का विरोध करते हो। क्या तुम्हारे पूर्वजों ने यही संस्कार दिए। उनकी आत्माएं भी तुम्हे कोसती होंगी कि हमारी संतानें सनातन विरोधी हो गयी हैं।  

ग्राउंड रिपोर्ट में साफ है – सिवान के पढ़े-लिखे मुस्लिम अभी भी बाबरी को अपनी जमीन और मुगलों को अपना इतिहास मानते हैं।


वक्फ संशोधन विधेयक को JPC से मंजूरी, 14 बदलावों पर लगी मुहर: विपक्ष के सुझाव खारिज, हंगामा मचाने का नहीं हुआ फायदा


वक्फ संशोधन बिल को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से मंजूरी मिल गई है। लोकसभा और राज्यसभा सांसदों से मिलाकर बनाई गई इस समिति ने महीनों तक इस पर चर्चा और कई पक्ष सुनने के बाद इसे मंजूरी दी है। नए वक्फ अधिनियम में इस JPC ने 14 खंड में बदलाव किए हैं।

नई दिल्ली में सोमवार (27 जनवरी, 2025) को वक्फ बिल के अंतिम ड्राफ्ट को JPC ने बहुमत से स्वीकार किया है। इस बिल के मूल स्वरुप में 14 बदलाव, JPC में शामिल NDA सांसदों ने प्रस्तावित किए थे। इन्हें JPC की बैठक में मंजूरी मिल गई। यह 14 खंड में बदलाव बिल के अलग-अलग नियमों को लेकर किए गए हैं।

वहीं विपक्ष ने भी इस वक्फ बिल में कई बदलाव प्रस्तावित किए थे लेकिन उन्हें मतदान में मंजूरी हासिल नहीं हुई। समिति में 16 सदस्य NDA जबकि 10 बाकी दलों के लोग शामिल थे। ऐसे में मतदान के दौरान विपक्ष द्वारा सुझाए गए बदलाव 16:10 के बहुमत से गिर गए।

विपक्ष के सदस्यों ने बिल के सभी 44 खंड में संशोधन के प्रस्ताव दिए थे। इनकी संख्या सैकड़ों में थी। हालाँकि, वह सफल नहीं हुए। NDA द्वारा किए गए बदलावों में वक्फ ट्रिब्यूनल में सदस्यों की संख्या और सरकारी अधिकारियों की वक्फ संपत्तियों को लेकर अधिकार से जुड़े हुए थे।

वक्फ संशोधन अधिनियम के लिए बनाई गई JPC के मुखिया और सांसद जगदम्बिका पाल ने कहा कि बदलाव को लेकर अपनाई गई पद्धति पूरी तरीके से लोकतांत्रिक थी। उन्होंने कहा कि इससे ज्यादा लोकतांत्रिक तरीका कुछ नहीं हो सकता था।

विपक्ष के सांसद और वक्फ बिल का विरोध करने वाले नेता कल्याण बनर्जी ने पूरी प्रक्रिया को ही गड़बड़ करार दिया। उन्होंने दावा किया कि सब कुछ पहले से तय था और सरकार की मर्जी से ही काम हुआ है। उन्होंने कहा कि विपक्षी सांसदों को बोलने का भी मौका नहीं दिया गया।

इससे पहले कई बार हुई वक्फ की बैठकों में विपक्ष के सांसदों ने हंगामा भी काटा। कल्याण बनर्जी ने एक बार ग्लास तोड़ हाथ चोटिल कर लिया था। वक्फ बिल को अब संभवतः संसद के बजट सत्र में पेश किया जा सकता है। बजट सत्र 31 जनवरी, 2025 से लेकर 13 फरवरी, 2025 तक चलेगा। इसका मसौदा पेश किए जाने से पहले जनता के सामने भी आएगा।

संसद में घुसपैठ से भी खतरनाक इनका रवैया, ये लोकसभा में लौटकर नहीं आएँगे: 2024 में विपक्ष की होगी दुर्गति : नरेंद्र मोदी

संसदीय बोर्ड की बैठक में पीएम मोदी ने भाजपा सांसदों से भी कहा कि वो विरोध के जवाब में मर्यादा में रहें, जनादेश का सम्मान करें (फोटो साभार: ANI)

संसद भवन में बुधवार (13 दिसंबर, 2023) को 2 लोग लोकसभा के सदन में कार्यवाही के दौरान घुस गए और कनस्तर से रंगीन धुएँ छोड़ने लगे। इस मामले में 6 आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है। कस्टडी में उनसे पूछताछ चल रही है और प्लानिंग की पूरी तह खुल रही है। इस प्रकरण के बाद विपक्षी दलों ने संसद में हंगामा शुरू कर दिया और अभद्र तरीके से प्रदर्शन करने लगे। इस मामले में अब तक 138 सांसदों को संसद से निलंबित किया जा चुका है।

सांसदों का निलंबन कोई पहली नहीं हुआ है। स्मरण करे, जब विपक्ष ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की जाँच रपट सदन में रखने की मांग करने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के कार्यकाल में विपक्ष के पचासियों सदस्यों का निलंबन हुआ था। दूसरे, तेलंगाना के अलग राज्य के मुद्दे पर कांग्रेस प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी दसियों सदस्यों का निलंबन हुआ था। 

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विपक्ष के इस व्यवहार पर आपत्ति जताई है। संसद भवन की लाइब्रेरी बिल्डिंग में मंगलवार (19 दिसंबर, 2023) को उनकी अध्यक्षता में भाजपा के संसदीय बोर्ड की बैठक हुई। इसे संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि ऐसा लगता है कि इन सांसदों ने तय कर लिया है कि उन्हें लोकसभा में वापस नहीं आना है। उन्होंने कहा कि अगर इन सांसदों का ऐसा ही रवैया रहा तो समझिए ये तय है कि इन्हें इस ताकत के साथ भी लोकसभा में वापस नहीं आना है।

उन्होंने कहा कि कुछ लोग सोचते हैं कि कुछ रचनात्मक और अच्छे काम किए जाएँ, लेकिन कुछ लोग इससे अलग ही सोचते हैं। ‘हिंदुस्तान’ ने बैठक में मौजूद एक नेता के हवाले से बताया है कि पीएम मोदी ने क्या-क्या कहा। प्रधानमंत्री ने कहा कि संविधान के हिसाब से विपक्षी दलों को मुद्दे उठाने का अधिकार है, लेकिन हंगामा नहीं करना चाहिए। उन्होंने संविधान और संसदीय व्यवस्था के अपमान को विपक्ष का एजेंडा बताते हुए इस पर दुःख जताया।

इस दौरान वो अपनी पार्टी के सांसदों को भी नसीहत देने से नहीं चूके और उनसे कहा कि विरोध के जवाब में वो भी मर्यादा में ही रहें। संविधान का सम्मान और संसदीय नियमों के पालन की सलाह देते हुए उन्होंने भाजपा सांसदों से कहा कि वो जनादेश का सम्मान करें। संसदीय मामलों और कोयला एवं खदान विभाग के केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी के अनुसार, पीएम मोदी ने बैठक में संसद में हुई घुसपैठ का भी जिक्र करते हुए कहा कि हर वो शख्स इसकी निंदा करेगा जो लोकतंत्र में भरोसा रखता हो।

प्रह्लाद जोशी ने बताया कि ये साल की अंतिम बैठक थी भाजपा के संसदीय दल की और पीएम ने इस दौरान याद दिलाया कि वो दिल्ली में रहे हैं तो इस बैठक में हमेशा शामिल हुए हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं के लिए सम्मान की बात की। विचारधारा के लिए जीने-मरने की बात की। I.N.D.I. गठबंधन की बैठक पर भी उन्होंने तंस कसा। ‘भारत का भविष्य उज्जवल बनाना’ – इसे उन्होंने भाजपा की सोच बताई। बकौल प्रह्लाद जोशी, पीएम मोदी ने कहा ‘विकसित भारत संकल्प यात्रा’ में सहभागिता का अनुभव साझा करते हुए कहा कि लोगों का विश्वास सरकार में बढ़ गया है।

बकौल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, हाल के चुनाव में हार चुके कुछ दल ऐसी भाषा बोल रहे हैं जिससे लगता है कि वो इस घटना का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने विपक्ष के इस रवैये को इस घटना से भी खतरनाक करार दिया। पीएम मोदी के संबोधन का सार ये था कि विपक्ष ने विपक्ष में रहने का मन बना लिया है और ऐसा लगता है कि संसद में घुसपैठ करने वालों को उनका समर्थन है। उन्होंने लोकसभा चुनाव 2024 पर कहा कि ऐसा लगता है कि इस मीटिंग हॉल में जो कुर्सियाँ खाली हैं वो भी अगली बार भर जाएँगी।

मोदी ने कहा, “विपक्ष हताशा और निराशा में आकर ये सब कर रहा है। हमारा उद्देश्य है देश का विकास करना, जबकि विपक्ष चाहता है हमारी सरकार को उखाड़ फेंकना। हमारी और उनकी सोच में यही अंतर है। अब छुट्टियों का समय नज़दीक आ गया है। आपलोग दूर गाँव के इलाकों में जाकर वहाँ का हालचाल लें, विकास का पता लगाएँ। मैं काशी गया था और देखा कि वहाँ के युवाओं में उम्मीदें हैं। नए मतदाताओं ने वो दौर नहीं देखा है जब आए दिन घोटाले होते थे। उन्हें विपक्ष के कारनामों के बारे में जागरूक करने की ज़रूरत है।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दौरान सीमावर्ती क्षेत्रों की भी बात की। वो अक्सर सीमा पर स्थित गाँवों में ‘आखिरी’ की जगह ‘पहला’ कह कर संबोधित करते रहे हैं। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया ि सीमावर्ती क्षेत्रों में अभी उत्सव चल रहा है। इसके लिए गुजरात के कच्छ में स्थित एक गाँव को पर्यटन के हिसाब से सर्वश्रेष्ठ गाँव का सम्मान मिला है। ‘रण उत्सव’ में भाग लेने की उन्होंने अपील की। साथ ही उन्होंने ‘काशी तमिल संगमम’ का भी जिक्र किया।


झाड़खंड, पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और प. बंगाल पर जवाब देने से बचने के लिए विपक्ष ने उछाला मणिपुर ; साजिश के तहत वायरल किया गया वीडियो

मणिपुर में भीड़ द्वारा दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने और गैंगरेप की घटना से पूरा देश मर्माहत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस घटना पर गहरा दु:ख व्यक्त किया और दोषियों को कठोर सजा देने का देश को अश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि मैं देश को आश्वस्त करता हूं, किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। कानून पूरी ताकत से अपना काम करेगा। मणिपुर की बेटियों के साथ जो हुआ उसे कभी माफ नहीं किया जा सकता। इसके बाद मोदी सरकार मानसून सत्र के पहले दिन संसद के दोनों सदनों में इस मामले पर चर्चा के लिए तैयार हो गई। लेकिन विपक्ष ने हंगामा कर सदन की कार्यवाही को बाधित कर दिया। इससे सवाल उठ रहे हैं कि जब सरकार चर्चा के लिए तैयार है तो विपक्ष हंगामा कर चर्चा से क्यों भाग रहा है? इसके साथ ही घटना के 77 दिनों बाद वीडियो जारी करने के पीछे गहरी साजिश की आशंका व्यक्त की जा रही है।

मणिपुर की घटना को लेकर संसद में विपक्ष का हंगामा, कार्यवाही स्थगित

संसद के मानसून सत्र की शुरुआत हो चुकी है। सत्र के पहले दिन सदन की कार्यवाही शुरू होते ही मणिपुर की घटना को लेकर विपक्ष ने हंगामा शुरू कर दिया। हंगामे की वजह से संसद की कार्यवाही दोपहर दो बजे तक स्थगित की गई थी लेकिन हंगामा जारी रहने पर अब कार्यवाही शुक्रवार सुबह 11 बजे तक स्थगित कर दी गई। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि विपक्ष को देखकर साफ हो गया है कि वह संसद की कार्यवाही को सुचारू रूप से नहीं चलने देने का मन बना चुके हैं। जब सरकार ने साफ कर दिया है कि हम मणिपुर की घटना पर चर्चा के लिए तैयार हैं तो कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां सदन की कार्यवाही को चलने नहीं दे रही हैं। साफ है कि वह संसद को चलने नहीं देना चाहती। विपक्षी दल अपने खोट छिपाने के लिए चर्चा से भाग रहे हैं। चर्चा करना नहीं चाहते हैं। जब चर्चा होगी तो और खुलासा माननीय गृहमंत्री जी करेंगे।

 

अपना खोट छिपाने और सदन की कार्यवाही बाधित करने की विपक्ष की साजिश

जिस वायरल वीडियो को लेकर विपक्ष हंगामा कर रहा है, वो दो महीने से अधिक पुराना है। वीडियो 4 मई, 2023 का बताया जा रहा है,जब हिंसा शुरुआती चरण में थी। वायरल वीडियो में जिन दो महिलाओं को नग्न करके घुमाया जा रहा है, वो कुकी समुदाय की हैं। महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने का आरोप मैतई समुदाय के लोगों पर लगा है। लेकिन इस वीडियो को 77 दिन बाद संसद के मानसून सत्र से एक दिन पहले साजिश के तहत जानबूझकर वायरल किया गया। सरकार इस घटना को लेकर चर्चा करने के लिए तैयार है, इसके बावजूद जिस तरह विपक्ष ने सदन की कार्यवाही शुरू होते ही हंगाम शुरू किया, उससे लगता है कि विपक्ष संसद की कार्यवाही बाधित करने के लिए पहले से तैयार था। कार्यवाही बाधित कर विपक्ष असल मुद्दे से भागने की कोशिश कर रहा है।

राजस्थान, छत्तीसगढ़ और प. बंगाल पर जवाब देने से भाग रहा विपक्ष

अगर विपक्ष मणिपुर मामले में संवेदनशील है, तो उसे सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलने देना चाहिए। सदन की कार्यवाही में शामिल होकर सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए। दरअसल विपक्ष इस पर चर्चा करना नहीं चाहता है। मुद्दाविहीन विपक्ष का मकसद सिर्फ मोदी सरकार के साथ ही भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करना है। विपक्ष चर्चा से इस लिए भाग रहा है कि चर्चा के दौरान उसे अपने शासित राज्यों में महिलाओं और दलितों पर हो रहे अत्याचार के मामले में जवाब देना पड़ेगा। इसका संकेत प्रधानमंत्री मोदी ने सत्र शुरू होने से पहले ही राजस्थान और छत्तीसगढ़ का जिक्र कर दे दिया। उन्होंने कहा कि सभी मुख्यमंत्रियों से आग्रह करता हूं कि वो अपने राज्य में कानून और व्यवस्था को और मजबूत करें। खासकर के हमारी माताओं और बहनों की रक्षा के लिए कठोर से कठोर कदम उठाए। घटना चाहे राजस्थान की हो, घटना चाहे छत्तीसगढ़ की हो, घटना चाहे मणिपुर की हो।

कुकी – मैतई संघर्ष और सियासी साजिश में जल रहा मणिपुर

मणिपुर के जिस वीडियो को लेकर पूरे देश में हंगामा मचा हुआ है, उसके पीछे की कहानी काफी भयावह है। मणिपुर में हिंसा भड़कने की बड़ी वजह हाईकोर्ट के द्वारा मैतई समुदाय को जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग को स्वीकार करना है। हाईकोर्ट के इसी फैसले के बाद मैतई समुदाय निशाने पर आ गया और चुराचंदपुर जिले में हिंसा भड़क उठी। कुकी बहुल चुराचंदपुर में 28 अप्रैल को द इंडिजेनस ट्राइबल लीडर्स फोरम ने आठ घंटे बंद का ऐलान किया था। देखते ही देखते इस बंद ने हिंसक रूप ले लिया। चार मई को चुराचंदपुर में मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की एक रैली होने वाली थी। पूरी तैयारी हो गई थी, लेकिन रात में ही उपद्रवियों ने टेंट और कार्यक्रम स्थल पर आग लगा दी। सीएम का कार्यक्रम स्थगित हो गया। हथियारबंद कुकी उग्रवादियों ने हिन्दू मैतई समुदाय के घरों पर हमला और नरसंहार शुरू कर दिया। हिन्दू मंदिरों और घरों को जलाया जाने लगा। जब तक मैतई मर रहे थे, तबतक राहुल गांधी, तमाम विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट सोया हुआ था। जैसे ही मैतई बहुल इलाकों में इसकी प्रतिक्रिया शुरू हुई, हिंसा ने भयंकर रूप ले लिया। चर्चों में आग लगाई जाने लगी। इससे कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष परेशान हो गया। यहां तक यूरोपीय यूनियन में भी प्रस्ताव पेश होने लगा। विपक्ष की सियासी साजिश ने आग में घी डालने का काम किया। आज सोशल मीडिया मेें मैतई लोगों के नरसंहार का वीडियो वायरल हो रहा है, जिसे देखकर हर किसी की रूह कांप जाती है।

महिला अपराध में राजस्थान नंबर वन, एक ही परिवार के चार लोगों को जलाया

महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान पूरे देश में अव्वल है। महिलाओं के साथ गैंगरेप और हत्या की घटनाएं लगातार हो रही है। हाल ही में एक दलित लड़की को गैंगरेप के बाद चेहरे पर तेजाब डालकर मार डाला गया था और उसे कुएं फेंक दिया गया था। इसी बीच जोधपुर जिले के ओसियां में मंगलवार रात एक ही परिवार के चार लोगों को जलाकर मारने की घटना ने पूरे देश को झकझोंर दिया। चारों शव जली अवस्था में एक झोपड़ी में मिले। पुलिस के मुताबिक मरने वालों में एक पुरुष, दो महिलाओं के साथ एक मासूम बच्ची शामिल है, जिन्हें गला काटकर हत्या कर दी गई थी। अपराधियों ने वारदात को अंजाम देने के बाद झोपड़ी में आग लगा दी थी। इस तरह की अनेक घटनाएं राजस्थान में हो रही है, लेकिन इस तरफ ध्यान न तो विपक्षी दलों का जाता है और ना सेक्युलर, लिबरल और वामपंथी मीडिया का। महिलाओं के साथ हो रहे अपराध के खिलाफ आवाज उठाने में विपक्ष का सेलेक्टिव अप्रोच अपराधियों का हौसला बढ़ा रहा है। 

छत्तीसगढ़ के कांग्रेस सरकार में एससी-एसटी के अधिकारों का हनन

कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ में एससी-एसटी के अधिकारों का हनन हो रहा है। अपने साथ हो रहे अन्याय के विरोध में एससी-एसटी के युवक नग्न होकर सड़कों पर प्रदर्शन के लिए मजबूर हो रहे हैं। रायपुर में विधानसभा रोड पर एससी-एसटी युवाओं ने नग्न होकर प्रदर्शन किया। आमासिवनी के पास फर्जी आरक्षण प्रमाणपत्रों का आरोप लगाते हुए करीब 12 युवाओं ने पूरी तरह नग्न होकर सड़क पर प्रदर्शन किया। युवाओं ने फर्जी आरक्षण प्रमाण पत्रों से नौकरी पाने वालों का विरोध किया। प्रदर्शनकारी युवाओं का कहना है कि गैर आरक्षित वर्ग के लोग आरक्षित वर्ग के कोटे का शासकीय नौकरियों और राजनैतिक क्षेत्रों में लाभ उठा रहे हैं। राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए उच्चस्तरीय जाति छानबीन समिति गठित की थी। इसकी रिर्पोट के आधार पर सामान्य प्रशासन विभाग ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी कर रहे अधिकारी कर्मचारियों को महत्वपूर्ण पदों से तत्काल बर्खास्त करने के आदेश जारी कर दिए, लेकिन कांग्रेस की बघेल सरकार अभी तक कार्रवाई के नाम पर युवाओं को गुमराह कर रही है।

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव में हिंसा, महिलाओं के साथ बदसलूकी

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक रक्त चरित्र पंचायत चुनाव में भी देखने को मिला। नामांकन से लेकर मतगणना तक लोकतंत्र का चीरहरण होता रहा, लेकिन लोकतंत्र के सभी ठेकेदार अपनी आंखों पर पट्टी बांधे हुए थे। चुनाव में 30 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। मतपेटियों में तोड़फोड़ की गई और उसे आगे के हवाले किया गया। राज्य में उत्तर से लेकर दक्षिण तक हिंसा, बमबाजी, गोलीबारी, चाकूबाजी और आगजनी से वोटर्स भी भय के साये में आ गए। कई इलाकों से तो वोटर्स तक को घर से नहीं निकलने दिया गया। 24 घंटे में 19 लोगों की जान गई। 50 से ज्यादा लोग घायल भी हुए। हिंसा की ये वारदातें मुर्शिदाबाद, कूचबिहार, पूर्वी बर्दवान, मालदा, नादिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना में हुई हैं। केंद्र सरकार ने सीएपीएफ की 649 कंपनियां भेजी थी। लेकिन राज्य चुनाव आयोग और पुलिस की लापरवाही से उनका संवेदनशील इलाकों में तैनाती नहीं की गई। इससे अपराधी तत्वों के हौसले बुलंद हो गए और उन्होंने जमकर हिंसा की। महिलाओं के साथ बदसलूकी की गई। महिलाओं के खिलाफ अपराध की एफआईआर दर्ज नहीं की जा रही है। केंद्रीय मंत्री निशीथ प्रमाणिक का पैर पकड़ कर एक महिला विलाप करती नजर आई। वहीं महिलाओं पर हुए अत्याचार की जांच के लिए बीजेपी को एक जांच कमेटी पश्चिम बंगाल भेजनी पड़ी।

 



विपक्ष की बारात से ‘फूफा’ बन निकले नीतीश कुमार

नीतीश कुमार को लगता है कि कांग्रेस उनका सारा क्रेडिट खा गई, (फोटो: बैठक में सोनिया गाँधी से मिलते नीतीश)
विपक्षी नेताओं ने कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में मंगलवार (18 जुलाई, 2023) को बैठक कर अपने नए गठबंधन का नाम ‘INDIA’ रखा। विपक्षी नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बड़ी-बड़ी बातें की और ‘लोकतंत्र की हत्या’ का आरोप लगाते हुए अगली विपक्षी बैठक मुंबई में होने की बात कही। इसी बीच खबर आई कि नीतीश कुमार नाराज़ हो गए हैं। इन अटकलों को हवा तब मिली जब नीतीश कुमार बिना प्रेस कॉन्फ्रेंस अटेंड किए ही पटना के लिए निकल गए।

ज्ञात हो, जब देश में आपातकाल के बाद 1977 में चुनाव होने थे, तब संघ प्रचारक नानाजी देशमुख ने समस्त विपक्ष को एकजुट करने में जो परिश्रम किया था, उसे नकारा नहीं जा सकता। वामपंथियों को छोड़, समस्त पार्टियां अपने भेदभाव भूल और पार्टी की साख को ताक पर रख एकजुट हुए थे, तब नानाजी ने किसी पद की लालसा नहीं थी और न ही चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। परन्तु ये जितने भी भाजपा विरोधी एकजुट हुए हैं किसी ने अपना नाम नहीं छोड़ा, पद के अभिलाषी सभी हैं, जिसे देख यह सम्भावना व्यक्त की जा रही कि चुनाव आते-आते गठबंधन धराशायी हो सकता है। 

प्रेस कॉन्फ्रेंस में लालू यादव और तेजस्वी यादव भी नहीं दिखाई दिए। राजद ने ‘INDIA’ को लेकर जो ट्वीट किया था, उसे भी डिलीट कर लिया। इसके बाद चर्चा चलने लगी कि आखिर नीतीश कुमार और लालू यादव किस बात से नाराज हैं? सबसे पहली बात तो ये छन कर सामने आई कि गठबंधन का नया नाम रखने को लेकर नीतीश कुमार की सलाह को दरकिनार कर दिया गया। वो नहीं चाहते थे कि ‘INDIA’ इस गठबंधन का नाम हो, वो हिंदी में कुछ नाम रखना चाहते थे।

ANI ने भी अपने सूत्रों के हवाले से कहा है कि नीतीश कुमार ने अंत में जब अन्य नेताओं को उनकी सलाह को दरकिनार करते हुए देखा तो कह दिया कि ठीक है, अगर आप लोगों की यही इच्छा है तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन, सबको पता है कि नीतीश कुमार जैसे नेता के लिए ये एक ‘अपमानजनक’ बात हो गई। नीतीश कुमार 2005 से ही बिहार की सत्ता पर काबिज हैं और 2025 के विधानसभा चुनाव तक सत्ता में उनके 2 दशक हो जाएँगे। उससे पहले वो केंद्र सरकार में मंत्री थे।

आपको ये तो याद ही होगा कि नीतीश कुमार पिछले 11 महीनों से विपक्षी गठबंधन बनाने के लिए पहल कर रहे थे और इसके लिए उन्होंने दिल्ली से लेकर लखनऊ, भुवनेश्वर और चेन्नई तक का दौरा किया था। उन्होंने 11 महीने तक दौरा कर-कर के माहौल बनाया, लेकिन अंत में उन्हें ही किनारे कर दिया गया। पटना में विपक्ष की जो पहली बैठक हुई थी, उसकी मेजबानी भी नीतीश कुमार ने ही की थी। साथ ही उसमें विपक्षी नेता काफी हँसी-ख़ुशी वाले माहौल में मिलते हुए दिखे थे।

लेकिन, बेंगलुरु में हुई दूसरी बैठक में ये नजारा नहीं दिखा। यहाँ प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी अधिकतर नेता मुँह बनाए हुए दिखे। ऊपर से नीतीश कुमार की गैर-मौजूदगी ने सबका ध्यान खींचा। गठबंधन के नाम में सहमति न होने वाली तो एक बात है, दूसरी और सबसे बड़ी बात ये है कि विपक्षी गठबंधन का संयोजक कौन होगा, इस पर कोई एकमत नहीं बन पाया। नीतीश कुमार की इच्छा थी कि वो संयोजक बनाए जाएँ, लेकिन इसके लिए सभी दल राजी नहीं हुए।

बताया जाता है कि अंत में भारत के 4 अलग-अलग हिस्सों का प्रतिनिधित्व करते हुए 4 संयोजक बनाए जाने की चर्चा चली, लेकिन छोटे विपक्षी दलों ने इस पर भी ऐतराज जताया। अंत में घोषणा कर दी गई कि 11 सदस्यों की एक समिति बनेगी जो ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ का ड्राफ्ट तैयार करेगी और साथ ही संयोजक के नाम का ऐलान भी मुंबई की बैठक में किया जाएगा। साफ़ है, ‘संयोजक’ बनने के लिए ही नीतीश कुमार ‘नाराज फूफा’ बन कर मुँह फुलाए हुए हैं।

भाजपा विधायक हरिभूषण ठाकुर का इस संबंध में बयान देखिए। उनका कहना है कि कांग्रेस  की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने नीतीश कुमार की सारी मेहनत को कांग्रेस पार्टी के खाते में डाल दिया। जिस तरह से बेंगलुरु में KC वेणुगोपाल सक्रिय दिखे और कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी बड़े पैमाने पर रही, उससे साफ़ है कि नीतीश कुमार को ऐसा लग रहा है कि उनके हिस्से का एटेंशन किसी को मिल रहा है। नीतीश कुमार की बेचैनी के और भी कारण हैं।

उन्हें पता है कि वो मुख्यमंत्री हैं और पुराने नेता हैं, लेकिन ये सच्चाई भी उन्हें मन ही मन पता ही है कि बिहार में उनकी पार्टी तीसरे नंबर की है और सांसदों या विधायकों की संख्या गिनी जाए तो उनका कोई खास महत्व नहीं बनता। हालाँकि, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश पूरी की। गठबंधन तोड़ कर फिर से राजद के साथ जा मिलने के बाद से ही वो लगातार उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के साथ मिल कर राज्य-राज्य घूमते रहे।

कुछ नेताओं ने कहा है कि नीतीश कुमार की फ्लाइट का समय हो गया था, इसीलिए वो चले गए थे। इस पर भी सवाल उठ सकते हैं कि ये नेता तो चार्टर्ड प्लेन से बेंगलुरु गए थे, फिर कैसा शेड्यूल? चार्टर्ड प्लेन का शेड्यूल तो फिर से तय किया जा सकता है। क्या ऐसे नेताओं के लिए पैसा कोई समस्या है? बिलकुल नहीं। चार्टर्ड प्लेन भी हो तो ये दिन भर में 20 बार टिकट बुक कर सकते हैं। इसीलिए, कांग्रेस पार्टी का ये बयान बिलकुल ही बचकाना लगता है कि नीतीश कुमार की फ्लाइट का समय हो गया था।

नीतीश कुमार की नाराजगी का तीसरा कारण – बेंगलुरु में ‘The Unstable Prime Ministerial Candidate’ बताते हुए उनके नामों के साथ पोस्टर लगाए गए। साथ ही इन पोस्टरों में बिहार में ध्वस्त हुए पुलों के बारे में भी बताया गया। बता दें कि बिहार में हाल ही में सुल्तानगंज और सहरसा समेत कई इलाकों में पुल ध्वस्त हुए हैं। कांग्रेस की सरकार के रहते इस तरह के पोस्टर्स का लग्न नीतीश कुमार को रास नहीं आया।

अब राजद और जदयू के नेता डैमेज कंट्रोल में जुटे हुए हैं। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने नीतीश कुमार को विपक्षी एकता का सूत्रधार बताते हुए कह दिया कि जिस व्यक्ति ने सबको साथ लाया हो वो नाराज़ नहीं हो सकता। उन्होंने ‘INDIA’ नाम के पीछे भी सबकी सहमति होने की बात कही। इसी तरह राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने विपक्षी बैठक की सफलता की बात करते हुए कहा कि भाजपा 2024 में साफ़ हो जाएगी। इन पार्टियों के नेता लगातार साबित करने में लगे हुए हैं कि कोई मनमुटाव नहीं है।

यहाँ सवाल ये भी उठता है कि नीतीश कुमार के साथ-साथ लालू यादव और तेजस्वी यादव भी बैठक से क्यों चले गए? असल में लालू यादव की भी यही इच्छा है कि विपक्षी एकता गठबंधन का संयोजक नीतीश कुमार को बनाया जाए। वो चाहते हैं कि इसके बाद नीतीश कुमार CM की कुर्सी तेजस्वी यादव को दे दें। अपने बेटे के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी सुनिश्चित करने में ही लालू का सारा ध्यान है। खुद नीतीश कुमार भी तेजस्वी को भविष्य बता चुके हैं।

अंत में सवाल ये भी उठ सकता है कि क्या नीतीश कुमार ‘संयोजक’ का पद पाने और विपक्षी बैठकों में अटेंशन के लिए इस तरह की पैंतरेबाजी कर रहे हैं? ऐसे नेताओं द्वारा इस तरह के तिकड़म आजमाए जाते हैं, ताकि उनकी महत्ता बनी रहे। इससे मीडिया में चर्चा मिलती है और मनाने की कोशिशें की जाती हैं बाकियों द्वारा। अब नीतीश कुमार को भी मनाने की कोशिश की जाएगी। हो सकता है वो गठबंधन के पक्ष में कोई बयान भी दे दें, लेकिन देखना ये है कि उनकी नाराजगी रहती है या वो संयोजक बनाए जाते हैं।

2024 से पहले विपक्ष के 4 आंदोलन! यादव, जाट, किसान और एससी-एसटी को भड़काने की साजिश

एक बात तो स्पष्ट हो चुकी है कि आज विपक्ष के पास मोदी विरोध में  कोई मुद्दा ही नहीं। संविधान की शपथ लेने वाले ही अपना स्वार्थ सिधारने हिन्दुओं को भड़काने का प्रयत्न किया जा रहा है। लेकिन मुस्लिम और ईसाई समाज पर नरम रुख रखे हैं। ये कौन-सा समाजवाद या धर्म-निरपेक्षता है? हिन्दुओं का जात-पात पर विभाजन क्यों?  
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से घबराए विपक्ष को समझ नहीं आ रहा है कि 2024 में भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला कैसे किया जाए। इसके लिए उन्होंने विदेशी साजिश का हिस्सा बनने से भी गुरेज नहीं किया। अडानी समूह के खिलाफ हिंडनबर्ग रिपोर्ट और गोधरा दंगे पर बीबीसी डॉक्यूमेंट्री विदेश में तैयार की गई और इस बैसाखी के सहारे विपक्ष ने किस कदर हंगामा किया, यह सबने देखा। लेकिन जब इससे दाल नहीं गली तो एक-एक के बाद एक आंदोलन तैयार किए जा रहे हैं। फिलहाल चार आंदोलन जोर-शोर से किया जा रहा है। इनमें अहीर आंदोलन, जाट आंदोलन, किसान आंदोलन और एससी-एसटी आंदोलन को भड़काकर देश में अराजकता पैदा करने की कोशिश की जा रही है। यह सब बीजेपी के खिलाफ एक साजिश के तहत की जा रही है। सत्ता के लिए विपक्ष देश को कमजोर करने से भी बाज नहीं आ रहा जो कि चिंता की बात है।

भारतीय समाज को जातियों और वर्गों में बांटने की साजिश
इन आंदोलनों के जरिये विपक्ष भारतीय समाज को जातियों और वर्गों में बांटने की साजिश रच रहा है। इसका एकमात्र एजेंडा यादवों, जाटों, एससी-एसटी, किसानों को बीजेपी के खिलाफ भड़काना है और इन जातियों के वोट बीजेपी को न मिले इसका तिकड़म करना है।

1- अहीर रेजीमेंट आंदोलनः यादव वोटों को भड़काने की साजिश

अहीर रेजीमेंट आंदोलन पिछले दो साल से चल रहा है। अब यह धीरे-धीरे हरियाणा और राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में फैल चुका है और इससे बड़ी तादाद में अहीर (यादव) जुड़ चुके हैं। 18 जून 2023 को बड़े पैमाने पर रैलियां की गईं। आंदोलन की वजह से राष्ट्रीय राजमार्ग 8 पर यातायात को वैकल्पिक मार्गों पर मोड़ना पड़ा। कई बार पुलिस को उन पर लाठीचार्ज भी करना पड़ा। उन पर कई प्राथमिकी दर्ज की गईं, जिनमें से अधिकांश बाद में वापस ले ली गईं। जैसे ही लोकसभा चुनाव करीब आता है, हरियाणा के इन प्रदर्शनकारियों द्वारा दिल्ली में प्रवेश के रास्तों को अवरुद्ध करना शुरू कर दिया जाता है। वे चाहते हैं कि मोदी सरकार उन्हें बलपूर्वक हटाए जिससे उसे बदनाम किया जा सके।

2- पहलवानों की आड़ में जाट आंदोलन : राजपूत बनाम जाट रंग देने की साजिश
यह ध्यान देने की बात है कि जनवरी में जब पहलवानों का आंदोलन हुआ था तो पहलवानों ने किसी भी राजनीतिक पार्टी को अपने मंच पर जगह नहीं दी थी। यह भी योजना के तहत किया गया जिससे शुरू में आंदोलन को पहलवानों का बताया जाए और चूंकि पहलवान जाट थे तो फिर बाद में इसे जाट बनाम राजपूत का रंग दिया जा सके। कुछ ही दिन बाद सोशल मीडिया पर ऐसी खबरें चलने लगीं कि ये आंदोलन जाति विशेष के पहलवानों का है। इसके बाद सोशल मीडिया पर राजपूत बनाम जाट की बहस छिड़ गई है। आंदोलन को जाति विशेष का नाम दे दिया गया। उसके बाद तमाम विपक्षी दल के नेता भी उस मंच पर पहुंचने लगे। इससे इसके पीछे की साजिश समझी जा सकती है।

3- एमएसपी को लेकर किसानों का धरना : मोदी राज में सबसे ज्यादा MSP फिर भी आंदोलन
मोदी सरकार में पिछली सभी सरकारों से फसलों की MSP सबसे ज्यादा बढ़ाई गई लेकिन उसके बावजूद विपक्ष एक नॉन इश्यू को मुद्दा बनाकर किसानों को भड़काने के जुगत में लगी हुई है। हरियाणा में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग को लेकर किसान आंदोलन कर रहे हैं। किसानों ने कुरुक्षेत्र में 12 जून 2023 को महापंचायत बुलाई, जिसमें भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत भी शामिल हुए। राकेश टिकैत ने कहा कि एमएसपी की गारंटी के लिए पूरे देश में आंदोलन होगा। राकेश टिकैत ने कहा कि इस मीटिंग पर सभी की नजरें हैं। ये सवाल पूरे देश की फसलों की एमएसपी का है। इससे समझा जा सकता है कि इस आंदोलन 2024 से पहले देशभर में ले जाने की तैयारी है।

4-एससी/एसटी आंदोलन : एससी/एसटी वोटों में बिखराव से कांग्रेस टेंशन में
कांग्रेस पिछले 19 वर्षों से मध्य प्रदेश की सत्ता में काबिज बीजेपी को हटाना चाहती है। मध्यप्रदेश में अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति वोटों पर कांग्रेस का एकाधिकार माना जाता है। अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति वोटों के बिखराव ने कांग्रेस को टेंशन में ला दिया है। इसी को ध्यान में रखते हुए अब एससी/एसटी आंदोलन को हवा दी जा रही है। भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद एससी/एसटी आंदोलन शुरू करेंगे और सपा, रालोद, आप और कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल फंड करेंगे और इस विरोध को हवा देंगे। इसके तहत वे निजी नौकरियों में और भारत में सभी खेलों में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण जैसी मांग करेंगे। मकसद सिर्फ एक है कि एससी/एसटी को मोदी सरकार के खिलाफ भड़काना। कुछ इसी तरह का दलित आंदोलन 2019 लोकसभा चुनाव से पूर्व 2018 में किया गया था जबकि उस समय सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी और गिरफ्तारी के लिए डीएसपी स्तर के अधिकारी की मंजूरी ज़रूरी कर दी थी। उस वक्त आंदोलन को इस कदर हिंसक रूप दिया गया कि कई लोगों की मौत भी हो गई थी।

सीएए और किसान आंदोलन जैसा प्रदर्शन खड़ा करने की साजिश
विपक्ष की कुटिल चाल यह है कि अब एक बार फिर से भारतीय समाज को आपस में लड़ाया जाएगा जैसे सीएए और किसान विरोध के दौरान हुआ था। दोनों विरोध प्रदर्शन भारत को अस्थिर करने के उद्देश्य से आयोजित किए गए थे। बाहरी ताकतों ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से लोगों को विभाजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसके लिए रिहाना, ग्रेटा और मिया खलीफा जैसी अंतर्राष्ट्रीय हस्तियों को इससे जोड़ा गया और उन्हें पैसे दिए गए। इस बार नए सेलेब्रिटी चुने जाएंगे। इससे सभी लोगों को सावधान रहने की जरूरत है।

राष्ट्रपति और राज्यपाल को अपमानित करने वाला घड़ियाली आंसू बहता विपक्ष

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आजाद भारत गुलामी की मानसिकता और निशानी से मुक्ति पाकर आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी के प्रयास से भारत को एक और गुलामी की निशानी से मुक्ति मिलने वाली है। प्रधानमंत्री मोदी 28 मई को दोपहर 12 बजे से हवन पूजन के साथ नव निर्मित नए संसद भवन का उद्घाटन करेंगे।यह संसद भवन आजाद भारत की संसदीय परंपरा की प्रगति, लोकतंत्र की मजबूती और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। लेकिन विपक्ष को रास नहीं आ रहा है कि एक गरीब और काफी पिछड़े परिवार से उठकर भारत का प्रधानमंत्री और विश्व का सबसे लोकप्रिय नेता बनने वाला व्यक्ति इस नए संसद भवन का उद्घाटन करें।

विपक्ष राष्ट्रपति को ढाल बनाकर प्रधानमंत्री मोदी से वो हक छीनना चाहता है, जिसने इस संसद को मंदिर मानकर एक पुजारी की तरह उसकी सेवा की है और उसकी गरिमा को बढ़ाया है। संसद और भारतीय लोकतंत्र की ताकत का एहसास पूरी दुनिया को कराया है। फिर भी विपक्ष अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए ऐतिहासिक दिन का स्वागत करने की जगह उसके बहिष्कार का ऐलान किया है। विपक्ष नए संसद भवन के उद्घाटन के ऐतिहासिक समारोह में विघ्न डालने की कोशिश कर रहा है। इस समय कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल राष्ट्रपति का हितैषी बन रहे हैं और घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। लेकिन असल में उनका ये प्रेम सिर्फ दिखावा है। आइए आपको बताते हैं इन विपक्षी दलों ने कई मौकों पर राष्ट्रपति और राज्यपाल के पद की गरिमा का ख्याल नहीं रखा और उसे अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

संसद के बजट सत्र के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार 

इस साल 31 जनवरी को संसद के बजट सत्र की शुरुआत हुई। संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संबोधित किया। यह एक बहुत ही ऐतिहासिक अवसर था,क्योंकि भारत की प्रथम आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संसद का बजट सत्र शुरू करने के लिए अभिभाषण पढ़ा। लेकिन दुख और हैरान करने वाली बात यह है कि इतने महत्वपूर्ण अवसर पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर की पार्टी बीआरएस और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार किया। इस दौरान इन दलों को राष्ट्रपति की याद नहीं आई। इन दलों ने भारत के राष्ट्रपति के साथ-साथ देश की संसदीय परंपरा और मर्यादा का भी अपमान किया।

कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने किया ‘राष्ट्रपत्नी’ शब्द का इस्तेमाल

कांग्रेस के नेता महिला खासकर आदिवासी महिला राष्ट्रपति के प्रति कितना सम्मान रखते हैं, इसकी पोल तो राष्ट्रपति चुनाव के समय ही खुल गई थी। चुनाव के दौरान कांग्रेस के नेताओं ने अपने बयानों से सारी मर्यादाओं को तार-तार कर दिया था। कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का अपमान किया। कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के लिए राष्ट्रपति नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रपत्नी’ शब्द इस्तेमाल किया। कांग्रेस के प्रदर्शन के दौरान अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “हिन्दुस्तान की राष्ट्रपति जी सबके लिए हैं। राष्ट्रपति जी नहीं राष्ट्रपत्नी जी, हिन्दुस्तान की राष्ट्रपत्नी जी सबके लिए हैं।

 

कांग्रेस नेता अजय कुमार ने बुरी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाला बताया

राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार द्रोपदी मुर्मू को लेकर कांग्रेस नेता अजय कुमार ने विवादित बयान दिया। अजय कुमार ने कहा है कि द्रौपदी मुर्मू देश की एक बुरी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने कहा कि वह आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि देश की एक बुरी विचारधारा (इविल फिलॉसफी) का प्रतिनिधित्व करती हैं। हमें द्रौपदी मुर्मू को आदिवासी प्रतीक नहीं बनाना चाहिए। अनुसूचित जाति की स्थिति बदतर हो गई है।

कांग्रेस नेता उदित राज ने राष्ट्रपति को बताया चमचा

राष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए ने द्रौपदी मुर्मू को अपना उम्मीदवार बनाया। इसको लेकर कांग्रेस नेता उदित राज ने मौजूदा राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नाम पर ट्वीट कर उनपर तंज कसने की कोशिश की। उदित राज ने लिखा कि ‘जाति देखकर खुश न होना। कोविंद जी राष्ट्रपति बने तो दलित खुश हुए और भला एक चपरासी का नहीं कर पाए।’ एक दूसरे ट्वीट में उदित राज ने राष्ट्रपति को चमचा तक करार दिया। उन्होंने लिखा, “द्रौपदी मुर्मू जी जैसा राष्ट्रपति किसी देश को न मिले। चमचागिरी की भी हद्द है । कहती हैं 70% लोग गुजरात का नमक खाते हैं । खुद नमक खाकर ज़िंदगी जिएँ तो पता लगेगा।” कांग्रेस सांसद के इस ट्वीट पर सोशल मीडिया यूजर्स भड़क गए। उन्होंने कांग्रेस नेता को फटकार लगानी शुरू कर दी। उदित राज के इस ट्वीट के कारण कांग्रेस की भी किरकिरी हुई थी।

टीएमसी नेता की राष्ट्रपति मुर्मू के रूप-रंग को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी

कांग्रेस के अलावा दूसरे दलों के नेता भी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपमानित करने की होड़ में शामिल रहे हैं। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार में मंत्री और टीएमसी नेता अखिल गिरि ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के रूप-रंग को लेकर लेकर बेहद आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। अखिल गिरि नंदीग्राम में एक भीड़ को संबोधित करते हुए कहा कि हम किसी को उसके रूप-रंग से नहीं आंकते, हम राष्ट्रपति (भारत के) के पद का सम्मान करते हैं। लेकिन हमारी राष्ट्रपति कैसी दिखती हैं?’

तेजस्वी यादव ने राष्ट्रपति मुर्मू को बताया मूर्ति

राष्ट्रपति चुनाव से पहले राजद नेता तेजस्वी यादव ने एनडीए की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू पर तंज कसा था। एक कार्यक्रम में तेजस्वी यादव ने कहा कि राष्ट्रपति भवन में कोई मूर्ति तो नहीं चाहिए। आप समझ रहे हैं। हम लोग राष्ट्रपति का चुनाव कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि यशवंत सिन्हा जी को आपने हर जगह सुना होगा। लेकिन सत्ता पक्ष से जो उम्मीदवार है छोटा मुंह, बड़ी बात बोलनी नहीं चाहिए, लेकिन हमने नहीं सुना है। हमको लगता है कि आप लोगों ने भी उनकी आवाज को सुना होगा। लेकिन तेजस्वी याद भूल गए थे कि उनकी मां और एक अशिक्षित गृहिणी राबड़ी देवी को पार्टी में अनेक अनुभवी नेताओं की अनदेखी कर सर्वोच्च पद पर बैठा दिया गया था।

उपराष्ट्रपति धनखड़ को राज्यपाल रहते ममता बनर्जी ने हर मौके पर किया अपमानित

देश के मौजूदा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहते काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हर मौके पर नीचा दिखाने की कोशिश की। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राज्यपाल के रूप में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए धनखड़ ने कहा था कि बंगाल की मुख्यमंत्री लगातार उनकी अंदेखी करती है। उन्होंने कहा था कि क्या आपने पूरे देश में कभी भी देखा है कि मौजूदा गवर्नर को सदन में पांचवें नंबर पर बोलने के लिए आमंत्रित किया जाए और पूर्व राज्यपाल, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को पहले बोलने के लिए कहा जाए। यह प्रोटोकॉल का उल्लंघन है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा गेट के बाहर धरने पर बैठे थे राज्यपाल धनखड़

पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ को विधानसभा में लंच पर बुलाया था लेकिन ऐन वक्त पर कार्यक्रम कैंसिल कर दिया गया। इसके साथ ही दो दिन के लिए विधानसभा को बंद कर दिया गया। जब गवर्नर जगदीप धनखड़ विधानसभा पहुंचेे तो मेन गेट बंद होने कारण उन्होंने गेट नंबर दो से सदन में प्रवेश किया और वहीं गेट पर धरने पर बैठ गए। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में ऐसेेे गणतंत्र नहीं चलेगा। यह उनका अपमाान है।

राज्यपाल का अधिकार छीन कर ममता बनर्जी खुद बन गईं विश्वविद्यालयों की चांसलर

राष्ट्रपति के लिए आंसू बहाने वाला विपक्ष किस तरह राज्यपाल को अपमानित करता है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण ममता बनर्जी ने पेश किया है। ममता बनर्जी ने राज्यपाल के अधिकार को ही छीन लिया। पश्चिम बंगाल विधानसभा ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ की जगह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को राज्य के विश्वविद्यालयों की चांसलर बनाने के लिए विधेयक पारित किया। इस विधेयक का बीजेपी ने सदन में पूरजोर विरोध किया। इससे पहले विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी और छह अन्य बीजेपी नेताओं, जिन्हें अनुशासनात्मक आधार पर विधानसभा की कार्यवाही में भाग लेने से रोक दिया गया था, ने विधेयक और उन पर प्रतिबंध के खिलाफ सदन के बाहर विरोध प्रदर्शन किया।

तमिलनाडु में स्टालिन सरकार का राज्यपाल के खिलाफ प्रस्ताव

तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने राज्यपाल आरएन रवि पर विधानसभा में अभिभाषण पढ़ते समय एक पैराग्राफ को छोड़ने का आरोप लगाया। इसके बाद स्टालिन सरकार ने राज्यपाल के अभिभाषण के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास किया गया। तय किया गया कि राज्यपाल के भाषण की जगह उन्हें जो अभिभाषण लिखकर दिया गया था, वही सदन की कार्यवाही में शामिल किया जाएगा। डीएमके विधायकों ने ‘बीजेपी, आरएसएस की विचारधारा मत थोपें’ जैसे नारे लगाए। विधानसभा से बाहर भी राज्यपाल के खिलाफ अभियान चलाया गया। पश्चिम चेन्नई में राज्यपाल के खिलाफ पोस्टर्स लगाए गए। इन पोस्टर्स में ‘#Getout Ravi’ लिखा था।

ये एलजी कौन है? जो हमारे सिर पर आकर बैठ गया- केजरीवाल

राष्ट्रपति को ढाल बनाकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी सियासी भड़ास निकालने की कोशिश कर रहे हैं। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में जिस तरह एलजी के लिए भाषा का इस्तेमाल किया, वो किसी मुख्यमंत्री के लिए शोभा नहीं देती। विधानसभा में मुख्यमंत्री केजरीवाल ने एलजी पर निशाना साधते हुए कहा कि उपराज्यपाल कौन हैं? एलजी कहां से आ गया? कहां का एलजी, किस बात का एलजी। बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। वह हमारे सिर पर बैठे हैं। सोशल मीडिया में लोग एक संवैधानिक पद के लिए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की इस तरह की भाषा पर सवाल खड़े किए।

 

कब-कब कांग्रेस और विपक्षी दलों की सरकारों ने राष्ट्रपति और राज्यपालों की अनदेखी की है…

इंदिरा गांधी ने किया अनेक्सी बिल्डिंग का उद्घाटन

1970 में संसद भवन परिसर में बड़ा निर्माण करवाया गया। उस वक्त राष्ट्रपति वीवी गिरि ने अनेक्सी बिल्डिंग की नींव रखी थी। लेकिन इसका उद्घाटन 24 अक्टूबर, 1975 को इंदिरा गांधी ने किया। वह भी आपातकाल लगाए जाने के चार महीने बाद। उस वक्त बहुत सारे विपक्षी नेता जेल में थे।

राजीव गांधी ने 1987 में रखी थी संसद की लाइब्रेरी की नींव 

इंदिरा गांधी के बाद उनके उत्तराधिकारी राजीव गांधी ने तत्कालीन राष्ट्रपति की अनदेखी की। राजीव गांधी ने 15 अगस्त, 1987 को संसद की लाइब्रेरी की नींव रखी थी। 

The Congress which has an issue with the PM inaugurating the New Parliament doesn’t seem to know its own history.

Here is the beautiful moment when Rajiv Gandhi laid the foundation stone of the Parliament Library in 1987. pic.twitter.com/meFOfFvXG0

— Rishi Bagree (@rishibagree) May 24, 2023

सोनिया गांधी ने मुंबई में किया बांद्रा-वर्ली सी लिंक का उद्घाटन

मुंबई में बांद्रा-वर्ली सी लिंक UPA काल में बनाया गया था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 30 जून 2009 को इसका उद्घाटन किया था।

मनमोहन सिंह ने किया तमिलनाडु के नए विधानसभा-सह-सचिवालय परिसर का उद्घाटन

मार्च 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चेन्नई में तमिलनाडु के नए विधानसभा-सह-सचिवालय परिसर का उद्घाटन किया। इस मौके पर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और मुख्यमंत्री एम करुणानिधि भी मौजूद थे।

मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने मणिपुर के नए विधानसभा परिसर का किया उद्घाटन

दिसंबर 2011 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मणिपुर की राजधानी इंफाल में नए विधानसभा परिसर और सिटी कन्वेंशन सेंटर समेत कई भवनों का उद्घाटन किया था।

नीतीश कुमार ने किया था बिहार विधानसभा के नए केंद्रीय कक्ष का उद्घाटन

6 फरवरी 2019 को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा के नए केंद्रीय कक्ष का उद्घाटन किया था।

छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने आदिवासी महिला राज्यपाल का किया अपमान

छत्तीसगढ़ में अगस्त 2020 में विधानसभा का शिलान्यास किया गया था। उस समय गवर्नर अनुसुइया उईके थीं। मध्य प्रदेश के छिन्दवाड़ा से आती हैं। राज्यपाल का नाम शिलापट्ट पर नहीं है। लेकिन सांसद होते हुए सोनिया गांधी और राहुल गांधी का नाम शिलापट्ट पर अंकित है।

छत्तीसगढ़ में विधान सभा शिलान्यास के समय (अगस्त 2020 में) गवर्नर अनुसुइया उईके जी थीं। मध्य प्रदेश के छिन्दवाड़ा से आती हैं। जनजातीय समाज से हैं।

उनका नाम शिलापट्ट पे नहीं है अपितु सोनिया गांधी और राहुल गांधी का नाम अंकित है। सोनिया और राहुल गांधी मात्र सांसद हैं। फिर किस… pic.twitter.com/4RfzHgmhx4

— Amit Malviya (@amitmalviya) May 24, 2023

सीएम केसी राव ने किया तेलंगाना के सचिवालय भवन का उद्घाटन

 

30 अप्रैल 2023 को तेलंगाना के सचिवालय भवन का शुभारंभ सीएम केसी राव ने किया, लेकिन राज्यपाल को नहीं बुलाया गया। इस दौरान सीएम केसीआर कहा कि यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है कि आज मेरे हाथों से एक प्रशासनिक केंद्र के रूप में सचिवालय का उद्घाटन किया जा रहा है। सचिवालय का नाम बीआर अंबेडकर सचिवालय रखा गया है।