Showing posts with label Aurangzeb. Show all posts
Showing posts with label Aurangzeb. Show all posts

मुगल बादशाह औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़ने का नहीं दिया फरमान’: ज्ञानवापी पर मस्जिद कमेटी की दलील, कहा- परिसर में शिवलिंग नहीं फव्वारा है

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के पूरे सर्वे की माँग के विरोध में अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी ने वाराणसी कोर्ट में एप्लीकेशन दायर की है। इस एप्लीकेशन में न केवल हिंदुओं की याचिका का विरोध किया गया बल्कि औरंगजेब के आतंक को धो-पोंछने का प्रयास भी हुआ है। इसमें कहा गया है औरंगजेब निर्दयी नहीं था और उसने आदि विशेश्वर मंदिर को नहीं तोड़ा था।

हिंदुओं ने पूरे विवादित ढाँचे के एएसआई सर्वे के लिए याचिका डाली थी। इसमें उन्होंने कहा था भगवान आदि विशेश्वर मंदिर को मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तोड़ दिया था। बाद में राजा टोंडल ने सन् 1580 में इसका दोबारा निर्माण कराया।

कमेटी ने अब इसी याचिका का विरोध करते हुए कहा है दो काशी विश्वनाथ मंदिरों की कोई अवधारणा है ही नहीं। इसके अलावा उन्होंने ‘आक्रमणकारी’ शब्द के प्रयोग पर भी आपत्ति जताई। कमेटी ने इसे हिंदू और मुस्लिमों के बीच नफरत फैलाने का एक प्रयास बताया।

एप्लीकेशन में कहा गया, “जमीन पर जो मस्जिद आलमगिरी/ज्ञानवापी मस्जिद है वो हजारों सालों से है। वह कल भी मस्जिद था और अब भी मस्जिद ही है। वाराणसी के मुसलमान या पड़ोसी जिलों के मुसलमान, अधिकार के नाते और बिन किसी पाबंदी के नमाज पंजगाना और नमाज जुमा और नमाज इदान यहाँ अदा कर रहे हैं।”

कमेटी यह भी मानने से इनकार करती है कि विवादित ढाँचे के परिसर में कोई शिवलिंग बरामद हुआ है। उनका अब भी यही कहना है कि वो एक फव्वारा है। वो कोर्ट से माँग करते हैं कि हिंदू श्रद्धालुओं की याचिका को खारिज कर दिया जाए।

मालूम हो कि अप्रैल 2021 में वाराणसी के सिविल जज ने विवादित ढाँच की एएसआई जाँच के लिए ऑर्डर पास किया था। इसपर मुस्लिमों ने इलाहाबाद कोर्ट में याचिका लगाई। मामला की सुनवाई हुई और दलीलों के बाद फैसला रिजर्व रख लिया गया। मस्जिद कमेटी का कहना है कि ऐसी स्थिति में एएसआई सर्वे का निर्देश नहीं दिया जा सकता है।

हिंदुओं ने वकील विष्णु शंकर जैन के माध्यम से याचिका देते हुए माँग उठाई है कि विवादित ढाँचे का पूरा सर्वे ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार का इस्तेमाल होते हुए होना चाहिए। इस पर कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष से और यूपी सरकार को आपत्ति जाहिर करने के लिए 19 मई का समय दिया। अब मामले में एप्लीकेशन दायर हो गई है। मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई है।

औरंगजेब नहीं था क्रूर…कितना सच?

इस एप्लीकेशन में मस्जिद कमेटी ने दावा किया है कि औरंगजेब ने भगवान विशेश्वर के मंदिर को नहीं तोड़ा। जबकि इतिहास की किताबों में यह विदित है कि सन् 1669 CE में काशी विश्वनाथध मंदिर पर औरंगजेब ने हमला किया था। उसने मंदिर को तुड़वाकर ज्ञानवापी मस्जिद बनाया। इसके प्रमाण अब भी विवादित ढाँचों के खंबों में देखने को मिल जाते हैं।
हिंदू श्रद्धालु जिस काशी विश्वनाथ परिसर में आज पूजा करते हैं वो ज्ञानवापी मस्जिद के सामने हैं। इसे महान अहिल्या बाई होल्कर ने इंदौर में 1780 में बनवाया था। मासिर-ई-आलमगिरी में इस बात का उल्लेख मिलता है कि अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी किया था जिसमें काफिरों के स्कूल और मंदिर तोड़ने का आदेश दिया गया था। इसके अलावा इस फरमान के बारे में वाराणसी गजेटियर में भी पढ़ने को मिलता है जो 1965 में प्रकाशित हुआ था।

1667 का आदेश : औरंगजेब ने भी पटाखों पर लगाया था प्रतिबंध

दिवाली के मौके पर पटाखों पर लगने वाला बैन अक्सर सवाल खड़ा करता है कि क्या सारे प्रदूषण के लिए एक पर्व ही जिम्मेदार है। पिछले कुछ सालों से वायु प्रदूषण का रोना रोकर दिवाली आते ही कई राज्यों में प्रतिबंध लग जाता है। लोग सोशल मीडिया पर सवाल करते हैं लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। 

कुछ लोग ये भी कहते हैं कि ये सब सिर्फ पिछले कुछ सालों में बढ़े प्रदूषण के कारण हो रहा है लेकिन बता दें कि पटाखों पर प्रतिबंध लगाकर भावनाओं को ठेस पहुँचाना कोई नई बात नहीं है। 350 साल पहले मुगल आक्रांता औरंगजेब ने भी ऐसे ही पटाखे फोड़ने पर प्रतिबंध लगाया था।

आज दिवाली के मौके पर और वर्तमान हालातों को देखते हुए ये जानना जरूरी है कि हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करने वाले औरंगजेब ने भी अपने काल में पटाखे फोड़ने पर रोक लगवाई थी। उसका आदेश बीकानेर के स्टेट अर्काइव में सुरक्षित है। आदेश 8 अप्रैल 1667 का है। 

                                                           साभार: दैनिक भास्कर

आदेश में लिखा है- “बादशाह के सूबों के अफसरों को लिख दीजिए कि वे आतिशबाजी पर रोक लगा दें। शहर में भी घोषणा कर दें कि कोई आतिशबाजी न करें।” इस आदेश में किसी त्यौहार का जिक्र नहीं है। न ही कोई समय का उल्लेख है। बस इससे इतना पता चलता है कि उसने आतिशबाजी पर रोक लगाई थी इस आदेश के हिसाब से लंबे समय तक आतिशबाजी पर रोक लगाई गई थी।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान स्टेट आर्काइव के निदेशक महेंद्र सिंह खड़गावत ने कहा, “औरंगजेब के समय आतिशबाजी पर प्रतिबंध लगाया गया था। अप्रैल 1667 का औरंगजेब के समय का लेटर आर्काइव में हमारे पास सुरक्षित है। उस लेटर में दिवाली का जिक्र नहीं है, लेकिन वह लेटर सही है।”

इतिहास की इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर लोग सवाल करते रहते हैं। लोग तंज कसते हैं कि औरंगजेब ने भी पटाखों पर प्रतिबंध लगाया था। कितना महान पर्यावरणविद् और दूरदर्शी है।

दिवाली के आते ही पटाखों से उठने वाले धुएँ पर कई वामपंथी-कट्टरपंथी अपनी सांस फुलाते हैं। इस सूची में प्रियंका चोपड़ा जैसे नाम हैं जिन्हें सिगरेट या सिगार पीने से समस्या नहीं है लेकिन उन्हें दिवाली के मौके पर सांस की शिकायत हो जाती है। इसी तरह रोशनी अली से जुड़ा विवाद हाल का है। उन्हीं की याचिका पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट ने दीवाली/काली पूजा के दौरान पूरे पश्चिम बंगाल में सभी प्रकार के पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था।

गैवीनाथ धाम: जहाँ औरंगजेब ने शिवलिंग पर चलाई थी तलवार लेकिन सेना सहित जान बचाकर भागा, आज भी हैं निशान

गैवीनाथ धाम स्थित शिवलिंग पर आज भी हैं औरंगजेब की तलवार और छेनी-हथौड़े के निशान (फोटो : सोशल मीडिया/विकीपीडिया)
भारत के कई ऐसे महान मंदिर रहे जो इस्लामिक आक्रान्ताओं का शिकार हुए। अयोध्या, काशी और मथुरा सहित देश के कई बड़े-छोटे मंदिरों को इस्लामिक कट्टरपंथी आक्रान्ताओं ने अपने मजहबी उन्माद की भेंट चढ़ा दिया लेकिन कई ऐसे दिव्य मंदिर भी थे, जहाँ ये आक्रांता अपने मंसूबों में सफल नहीं हो सके। ऐसा ही एक त्रेताकालीन मंदिर पूर्वी मध्य प्रदेश में स्थित है, जहाँ मुगल आक्रांता औरंगजेब और उसकी सेना ने शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास किया था लेकिन उसे अपनी सेना सहित जान बचाकर भागना पड़ा।

त्रेताकालीन हैं भगवान गैवीनाथ

विंध्य समेत पूरे मध्य भारत में आस्था का केंद्र गैवीनाथ मंदिर मध्य प्रदेश के सतना जिले से 35 किमी दूर बिरसिंहपुर नामक कस्बे में स्थित है। त्रेतायुग में यह स्थान देवपुर कहलाता था। इस स्थान और गैवीनाथ मंदिर का वर्णन पदम पुराण के पाताल खंड में मिलता है।
देवपुर में राजा वीर सिंह का राज्य हुआ करता था। राजा ठहरे महाकाल के अनन्य भक्त तो घोड़े पर सवार होते और पहुँच जाते महाकाल की नगरी उज्जैन। सालों तक ऐसा ही चलता रहा लेकिन जब राजा वृद्ध हुए तब उन्होंने महाकाल से अपनी व्यथा बताई। तब महाकाल ने राजा के स्वप्न में देवपुर में ही दर्शन देने की बात कही। उसी समय नगर के ही गैवी यादव नामक व्यक्ति के यहाँ चूल्हे से शिवलिंग निकला लेकिन गैवी की माँ उस शिवलिंग को दोबारा जमीन के अंदर कर देती।
                                               गैवीनाथ धाम (फोटो : पत्रिका)
महाकाल एक दिन फिर से राजा वीर सिंह के स्वप्न में आए और बताया कि वह जमीन से निकलना चाहते हैं लेकिन गैवी की माँ उन्हें फिर जमीन में धकेल देती है। अंततः राजा गैवी के घर पहुँचे और जिस स्थान से शिवलिंग चूल्हे से बाहर आने का प्रयास कर रहा था, उस स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया और महाकाल के आदेश के अनुसार भगवान शिव इस स्थान पर गैवीनाथ के रूप में प्रतिष्ठित हुए। गैवीनाथ मंदिर में स्थित शिवलिंग को भगवान महाकाल का ही रूप माना जाता है।
औरंगज़ेब भागा था अपनी जान बचाकर 
बिरसिंहपुर स्थित गैवीनाथ धाम भी मुस्लिम आक्रान्ताओं की हिन्दू घृणा का शिकार हुआ था। यह अलग बात है कि आक्रांता न तो मंदिर का और न ही भगवान की मूर्ति का कुछ बिगाड़ सके। स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार आज से 317 साल पहले 1704 में मुगल आक्रांता औरंगजेब हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने के क्रम में इस स्थान पर पहुँचा था।
लाखों की झुण्ड में मधुमक्खियां निकली 
औरंगजेब के साथ उसकी सेना भी थी। औरंगजेब ने पहले अपनी तलवार से शिवलिंग पर प्रहार किया लेकिन उसे तोड़ने में असफल रहने पर उसने अपनी सेना को आदेश दिया, जिसके बाद शिवलिंग को हथौड़े और छेनी से तोड़ने का प्रयास किया गया। कहा जाता है कि शिवलिंग पर पाँच प्रहार किए गए थे। पहले प्रहार में शिवलिंग से दूध निकला, दूसरे प्रहार में शहद, तीसरे प्रहार में खून और चौथे प्रहार में गंगाजल। जैसे ही औरंगजेब के सैनिकों ने शिवलिंग पर पाँचवाँ प्रहार किया, लाखों की संख्या में भँवर (मधुमक्खी) निकली। औरंगजेब और उसकी पूरी सेना तितर-बितर हो गई और किसी तरह अपनी जान बचाकर भागी।
                                    बिरसिंहपुर के गैवीनाथ धाम स्थित शिवलिंग (फोटो सोर्स : सोशल मीडिया)
आज भी गैवीनाथ धाम में शिवलिंग पर तलवार के निशान हैं और खंडित शिवलिंग की ही पूजा होती है। हिन्दू धर्म में खंडित मूर्तियों की पूजा प्रतिबंधित है किन्तु गैवीनाथ धाम देश का इकलौता मंदिर है, जहाँ खंडित शिवलिंग ही पूजे जाते हैं और उनकी मान्यता पूरे हिन्दू धर्म में है।
बिरसिंहपुर के निवासी कहते हैं कि इसी शिवलिंग के कारण न केवल मंदिर की अपितु उनके शहर और उनकी माँ-बेटियों की रक्षा भी हो सकी। यही कारण है कि पूरे विंध्य क्षेत्र में गैवीनाथ धाम का महत्व भारत के किसी भी बड़े मंदिर की भाँति ही है।
मंदिर में स्थापित शिवलिंग के बारे में कहा जाता है कि जमीन के अंदर कितनी गहराई तक शिवलिंग है, इसके विषय में कोई नहीं जानता। स्थानीय मान्यता है कि चारधाम धाम यात्रा तभी पूरी मानी जाती है, जब चार धामों का जल भगवान गैवीनाथ को अर्पित किया जाए। वैसे तो यह मंदिर हमेशा से ही भक्तों से भरा रहता है लेकिन सावन महीने और महाशिवरात्रि जैसे पर्वों में यहाँ भक्तों की संख्या लाखों तक पहुँच जाती है।
कैसे पहुंचे 
सतना जिले से नजदीकी हवाईअड्डा खजुराहो में स्थित है। गैवीनाथ धाम से खजुराहो हवाईअड्डे की दूरी लगभग 142 किमी है। इसके अलावा बिरसिंहपुर पहुँचने के लिए सतना तक ट्रेन से पहुँचा जा सकता है। सतना रेलवे स्टेशन पूर्वी मध्य प्रदेश का एक बड़ा और व्यस्त रेलवे स्टेशन है और यहाँ से बस, टैक्सी एवं निजी वाहन के माध्यम से बिरसिंहपुर स्थित गैवीनाथ धाम पहुँच सकते हैं। प्रयागराज और वाराणसी के लोग रीवा होते हुए इस मंदिर तक पहुँच सकते हैं। रीवा से गैवीनाथ धाम की दूरी लगभग 58 किमी है। (साभार) 

18 अप्रैल 1669… जब औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का दिया था आदेश, साढ़े 4 महीने में कर ली गई थी तामील

                                    औरंगज़ेब के आदेश के बाद ध्वस्त किया गया था था विश्वनाथ मंदिर
वाराणसी के फास्ट ट्रैक कोर्ट ने जब काशी विश्वनाथ मंदिर को जबरन ढाह कर बनाई गई आलमगीरी मस्जिद के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) द्वारा 
सर्वे का फैसला दिया, तो कल (8 अप्रैल 2020) नासमझ हिंदू इस पर बल्लियों उछल रहे थे। यह सचमुच दुःख और हैरानी की बात है कि एक हिंदू राष्ट्र (भले ही संवैधानिक तौर पर इसमें धर्मनिरपेक्षता का पुछल्ला एक तानाशाह ने जोड़ दिया हो) में हिंदुओं को अपने सबसे बड़े आराध्यों के लिए बने मंदिर के लिए इतनी छोटी जीत पर भी उचक-उचक कर खुश होना पड़ता है।

यह कोई बधाई या प्रसन्नता की बात नहीं है और इसके दो कारण हैं। आज भी जब आप काशी विश्वनाथ के दर्शन को जाएँगे, तो उसकी ठीक बगल में जो आलमगीरी मस्जिद है (जिसे ज्ञानवापी भी कहा जाता है) – उसको देखकर एक धर्मप्राण हिंदू होने के नाते आपके आँसू निकल आएँगे। मस्जिद की दीवारों को देखकर ही समझ में आ जाता है कि उसे किसी ध्वस्त मंदिर के मलबे से बनाया गया है, यहाँ तक कि कुछेक जगहों पर तो दीवारों को भी नहीं मिलाया गया है।

 जिस तरह दिल्ली में कुतुबमीनार साफ-साफ मंदिरों के मलबे से बना दिखता है (और शर्मनाक तरीके से वहाँ ASI ने बोर्ड भी लगा रखा है), उसी तरह काशी-विश्वनाथ मंदिर की छाती पर पैबस्त आलमगीरी मस्जिद भी मंदिर पर निर्मित है, यह बात केवल आँख के अंधों को ही नज़र नहीं आएगी। 

लगभग 500 वर्षों के संघर्ष के बाद हिंदुओं को अपने आराध्य के पूजन का, उनके मंदिर का अधिकार मिला है। इसके साथ ही अदालत ने 5 एकड़ का मुआवजा भी थमा दिया है, जो हिंदुओं के ऊपर जुर्माने से कम नहीं है। भाई, मुकदमा तो इसका था न कि अयोध्या में मंदिर को तोड़कर (भारत की अधिकांश मस्जिदें, मंदिर तोड़कर बनीं) मस्जिद बनाई गई, वह स्थल हिंदुओं के आराध्य की जगह है, उसे वापस हिंदुओं को देना है।

इसमें 5 एकड़ मुआवजा क्यों देना था? हिंदुओं को तो राम के अस्तित्व का प्रमाण देना पड़ा, अदालती लड़ाई में कूदना पड़ा, जो राम इस देश के कण-कण में हैं, उस राम को झुठलाने के जिहादी-वामपंथी षड्यंत्र का कालकूट पीना पड़ा। इसमें बधाई की कौन सी बात थी। अब केवल सर्वेक्षण मात्र के फैसले पर कई सेक्युलर-कुबुद्धिजीवी खुलकर न्यायालय के फैसले की आलोचना कर रहे हैं। ओवैसी जैसा जिहादी सीना ठोक कर मुखालफत करता है।

वह कहता है कि राम जन्मभूमि की तरह ही इस मामले में भी बेईमानी की जाएगी। ध्यान दीजिएगा, उसके शब्दों पर। कौमी-कॉन्ग्रेसी-कुबुद्धिजीवियों ने अयोध्या के फैसले पर हमें याद दिलाया था कि ‘तथ्यों के मुकाबले आस्था को प्राथमिकता’ डील पर यह निर्णय हुआ। कुतुबमीनार हो या ज्ञानवापी, भोजशाला हो या मथुरा, ढाई दिन का झोपड़ा हो या कोई भी बुलंद मस्जिद, वह हिंदुओं के स्वाभिमान को ध्वस्त करने के लिए उनके परम पूज्य आराध्यों के मंदिरों को भूमिसात कर बनाई गई हैं।

आज भी उनके साक्षात प्रमाण हिंदुओं को मुँह चिढ़ाते हैं, उसके ज़ख्मों पर नमक छिड़कते हैं। और ये मक्कार, झूठे, लबार तथ्यों की बात करेंगे, जिन्होंने रोमिला-हबीब जैसे उपन्यासकारों के जरिए भयानक झूठ बोले, षड्यंत्र किए और जन्मभूमि के मामले को उलझाने की कोशिश की? कौन नहीं जानता है कि इस्लाम इस देश में एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में तलवार लेकर आया था। कौन नहीं जानता है कि मुगलों के दो सौ वर्षों के शासनकाल में, उनके सबसे सेकुलर राजाओं यथा अकबर और शाहजहाँ ने भी हिंदुओं के मंदिर तोड़े, जजिया लगाया और धर्म-परिवर्तन कराया।

कौन नहीं जानता है कि गायों को हरावल दस्ते में आगे रखकर हिंदुओं को जीतने वाले कायर रेगिस्तानी बर्बरों ने हिंदुओं की चेतना को खत्म करने के लिए मंदिरों को अपवित्र किया, मूर्तियाँ तोड़ीं और बलात्कार किए। काशी-विश्वनाथ हो या राम-मंदिर, मथुरा हो या 30 हजार मंदिरों को तोड़ना और कब्जाना, आप इस देश में जहाँ कहीं भी एक भव्य मंदिर देखेंगे, ठीक उसके साथ ही, उसकी बगल में मस्जिद तामीर कर, 5 बार लाउडस्पीकर से चीखती-पुकारती आवाज़ आप हरेक शहर में सुन सकते हैं। पटना के महावीर मंदिर से लेकर मुंबई का खारघर तक, यही कहानी है।

आलमगीरी मस्जिद प्रमाण है, औरंगजेब की कट्टरता का। 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खाँ द्वारा लिखित ‘मासीदे आलमगिरी’ में इस ध्वंस का वर्णन है। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी।

1777-80 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया था। अहिल्याबाई होलकर ने इसी परिसर में विश्वनाथ मंदिर बनवाया जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहाँ विशाल नंदी प्रतिमा स्थापित करवाई। नंदी प्रतिमा का मुख उल्टा होने का रहस्य यही है कि पहले मंदिर जहाँ थी, वहाँ मस्जिद बना ली गई।

इतिहास को विकृत करने की कॉन्ग्रेसी-कम्युनिस्ट कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकी हैं औऱ बारहाँ इतिहास कब्र से जीवित होकर उठ खड़ा होता है। ऐतिहासिक दस्तावेज चीख-चीख कर कहते हैं कि मुहम्मद गोरी से लेकर औरंगजेब तक काशी विश्वनाथ ने जितने बर्बर आक्रमण झेले हैं, उसके बावजूद काशी की आत्मा बची है, तो केवल बाबा विश्वनाथ की महिमा से, हिंदुत्व की ज्योति से। और अंत में अचानक से कुछ धिम्मियों की आत्मा जागी है, उनके अंग-विशेष से आँसू निकल रहे हैं।

वे हमें सिखा रहे हैं कि ‘प्रतिक्रिया देना मजहब विशेष से सीखें। उन्होंने जो संयम दिखाया है, उसे देखकर हिंदुओं को शर्म आनी चाहिए।’ पहली बात, सरकार के इक़बाल और पूरी तैयारी की वजह से हमारे ‘शांतिदूत’ भाई चुप हैं। हालाँकि, यह एक वृहत तैयारी के पहले की खामोशी भी हो सकती है। हिन्दू असहिष्णु होता न तो दिल्ली, पटना, मध्य प्रदेश, गुजरात, यूपी… कोई भी जगह शांत न रहती, जहाँ सीधे नंगी आँखों को मंदिरों के ऊपर तामीर की गई मस्जिद दिखाई देती है।

तीसरी और अंतिम बात, यह दूसरा मजहब यदि सचमुच सहिष्णु है तो तत्काल कम से कम काशी और मथुरा के मंदिरों को खुद खाली करे और हिंदुओं के साथ वहाँ भव्य मंदिर बनवाए। बाकी, 30 हज़ार मंदिरों की तो बात भी नहीं हुई है।(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार व्यालोक ने लिखा है)(साभार)

‘औरंगजेब-शाहजहाँ ने बनवाए मंदिर’ – NCERT के पास नहीं कोई प्रमाण – RTI में खुलासा

                                                          NCERT, कक्षा-12
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 

मुगलों का महिमामंडन मुख्यधारा की मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर उदारवादियों और वामपंथियों द्वारा अक्सर किया जाता है। यहाँ तक भी दावे किए जाते हैं कि औरंगजेब जैसे आक्रांताओं ने भी भारत में रहते हुए मंदिरों की रक्षा की और उनकी देखरेख का जिम्मा उठाया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्कूलों में जिस पाठ्यक्रम में हमें NCERT यह सब बातें सदियों से पढ़ाते आई है, उसके पास इसकी पुष्टि के लिए कोई आधिकारिक विवरण ही मौजूद नहीं है?

यह भारतवासियों का दुर्भाग्य है कि कांग्रेस और वामपंथियों ने भारत के वास्तविक इतिहास को इतना धूमिल कर दिया है कि सच्चाई बताने वाले को इनके गैंग "गंगा-जमुनी तहजीब" जैसे भ्रमिक नारों से साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त और शान्ति के दुश्मन आदि उपनामों से बदनाम करते आ रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व युपीए के कार्यकाल में RTI के माध्यम से पूछा गया था कि (1) महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता की उपाधि कब मिली; (2) नोट पर महात्मा गाँधी की फोटो किसके कहने से छापी जा रही है। इन दोनों RTI में सरकार की तरफ से एक ही जवाब था, "कोई जानकारी नहीं।" 

दूसरे यह कि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में केन्द्रीय शिक्षा मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी ने वास्तविक इतिहास को लाने का प्रयास कर रहे थे, तब तुष्टिकरण पुजारी कांग्रेस, वामपंथी एवं इनके समर्थक दलों ने इतिहास के भगवाकरण किये जाने का इतना शोर मचाया था कि 21 बैसाखियों के सहारे खड़े अटल बिहारी ने डॉ जोशी से अपने कदम पीछे हटाने को कहा। 

2012 में सेवानिर्वित होने उपरांत एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते अपने स्तम्भ "झोंक आँखों में धूल" में शीर्षक "लाल किला किसने और कब बनवाया?", के प्रकाशन पर लोगों ने जी-भरकर आलोचना की थी, लेकिन 2014 के चुनावों में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह द्वारा भारतीय इतिहास और भूगोल को कलंकित किये जाने के आरोप पर अपने इसी स्तम्भ में शीर्षक "प्रधानमंत्री राष्ट्र को जवाब दो" में लाल किले से लेकर क़ुतुब मीनार और ताजमहल तक के विषय में प्रश्न किये थे, जिसका इन तुष्टिकरणकर्ताओं की तरफ से तो कोई जवाब नहीं मिला, परन्तु दर्ज हुई वर्तमान RTI के माध्यम से सकारात्मक जवाब मिल गया। जो प्रमाणित कर रहा है कि मुस्लिम वोटबैंक को खुश करने के लिए हमारे नेताओं ने इतिहास और जनता के साथ कितना घोर निंदनीय काम किया है। जनता को चाहिए ऐसे कुर्सी के भूखे नेताओं को अपने वोट के माध्यम से पाताललोक में भेजें। क्योकि जो नेता अपने देश के गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर सकते हैं, वह जनता का क्या हित करेंगे?     

                                   NCERT कक्षा-12 की पुस्तक का हिस्सा, पेज -234 (हिंदी)
                                      NCERT कक्षा-12 की पुस्तक का हिस्सा, पेज -234
एक व्यक्ति ने नवंबर 18, 2020 में एक आरटीआई (RTI) आवेदन दायर कर NCERT (नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग) की पुस्तकों (जो स्कूलों में इस्तेमाल होती आई हैं) में किए गए दावों के स्रोत के बारे में जानकारी माँगी।

इस RTI में विशेष रूप से उन स्रोतों की माँग की गई, जिनमें NCERT की कक्षा-12 की इतिहास की पुस्तक में यह दावा किया गया था कि ‘जब (हिंदू) मंदिरों को युद्ध के दौरान नष्ट कर दिया गया था, तब भी उनकी मरम्मत के लिए शाहजहाँ और औरंगजेब द्वारा अनुदान जारी किए गए।

इसके अंतर्गत मुग़ल आक्रांता शाहजहाँ और औरंगज़ेब द्वारा मरम्मत किए गए मंदिरों की संख्या भी पूछी गई। इन दोनों ही सवालों के जवाब बेहद चौंकाने वाले थे। RTI में पूछे गए इन दोनों सवालों के सम्बन्ध में NCERT का जवाब था- “जानकारी विभाग की फाइलों में उपलब्ध नहीं है।”

डॉक्टर इंदु विश्वनाथन द्वारा NCERT द्वारा RTI के अनुरोध के इस जवाब की प्रति ट्वीट की है और इस पर प्रतिक्रिया करने वाले सभी लोग हैरान हैं। इंदु विश्वनाथन ने अपने ट्विटर थ्रेड में लिखा है, “दूसरे शब्दों में, भारतीय स्कूल की पाठ्यपुस्तकें यह दावा तो कर रही हैं कि ये आतताई वास्तव में उदार, और हिंदुओं के प्रति दयावान थे, लेकिन इन पुस्तकों को प्रकाशित करने वाला संगठन कोई पुख्ता सबूत देने में असमर्थ है।”

उन्होंने लिखा है कि यह हिंदुओं की संस्थागत गैसलाइटिंग किए जाने का स्तर है, जिसे अंतरराष्ट्रीय शैक्षिक संस्था द्वारा मान्यता प्राप्त होना चाहिए। इसके बजाय, श्वेत अमेरिकी ‘विद्वानों’ को इससे लाभ होता है और भारतीय ‘प्रख्यात इतिहासकार’ की इसके लिए वाह-वाही होती है।

इंदु विश्वनाथन लिखती हैं कि इसके बावजूद भी ये झूठ वैकल्पिक-वास्तविकता बनाने वाली मशीनरी का हिस्सा बने हुए हैं और जब हिंदू सिर्फ सच की माँग कर रहा है तो इसके लिए उन्हें खतरनाक इस्लामोफोबिक कट्टरपंथियों की संज्ञा दी जाती है।

‘बाबर मुस्लिमों का पिता नहीं है और औरंगजेब उनका चाचा नहीं है’: सामना, शिव सेना का मुख्य पत्र

                                  औरंगाबाद का नाम संभाजी नगर करने पर कॉन्ग्रेस ने विरोध किया है
महाराष्ट्र में महा विकास आघाडी गठबंधन में गठबंधन के सहयोगियों के बीच टकराव अब स्पष्ट नजर आने लगा है। यह टकराव कांग्रेस और शिवसेना के बीच औरंगाबाद का नाम बदलकर ‘संभाजी नगर’ करने के प्रयासों के बीच बढ़ता हुआ देखा जा रहा है। गौरतलब है कि यह महा विकास अघाड़ी गठबंधन भाजपा के विरोध में एकजुट हुए दलों का समूह है, जिसे शरद पवार ने महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार बनाने के लिए एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना को एकजुट कर बनाया था।

शिवसेना काफी समय से से औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजी नगर करने की माँग करती रही है। यह माँग उस वक्त भी की गई थी, जब शिवसेना भाजपा के साथ गठबंधन सरकार का हिस्सा थी। लेकिन कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री बालासाहेब थोराट ने औरंगाबाद को संभाजी नगर करने का विरोध किया। इसके ही एक दिन बाद ही, शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के माध्यम से शहर का नाम बदलने के विषय को जोरशोर से उठाया है।

इस बात से इंकार करते हुए कि नाम बदलने से महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी सरकार के भविष्य पर कोई असर पड़ेगा, लेख में बताया गया है कि कैसे शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने 30 साल पहले इसका नाम संभाजी नगर रखा था और लोगों ने इसे तहे दिल से स्वीकार भी किया था। ‘सामना’ के सम्पादकीय में कहा गया है कि नाम को आधिकारिक रूप से लागू करने के लिए बस दस्तावेजों की औपचारिकताओं को छोड़ दिया गया था।

लेख में कहा गया है कि जिस तरह से अयोध्या में श्री राम मंदिर सर्वसम्मति से बनाया जा रहा है, उसी तरह, औरंगाबाद का नाम भी आम सहमति से बदल दिया जाएगा। संपादकीय में दावा किया गया कि भारत में मुस्लिम बाबर और औरंगज़ेब का तिरस्कार करते हैं और उन्हें औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजी नगर करने से कोई असहमति नहीं होगी।

कांग्रेस पार्टी पर कटाक्ष करते हुए इस लेख में कहा गया है कि औरंगाबाद का नाम बदलने से देश के धर्मनिरपेक्षता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और राज्य के अधिकांश कांग्रेसी शिवसेना द्वारा शहर का नाम बदलने की माँग से सहमत होंगे।

‘बाबर मुस्लिमों का पिता नहीं है और औरंगजेब उनका चाचा नहीं है’: सामना

सामना के इस लेख के अनुसार, “बाबर भारत के मुस्लिमों का पिता नहीं है, जिस तरह पापी औरंगज़ेब यहाँ के मुस्लिमों का चाचा नहीं है। बाबर को अयोध्या में दफनाया गया था और राम मंदिर वहीं खड़ा है। न तो इस्लाम वहाँ खतरे में था, न ही किसी की धर्मनिरपेक्षता का हरण हुआ। अगर किसी को लगता है कि औरंगज़ेब का कब्रिस्तान धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक है, तो वह भारत की पहचान का मज़ाक बना रहा है।”
संपादकीय में आगे कहा गया है कि मुगल वंशज औरंगजेब की मौत का जश्न पूरे देश में मनाया जा रहा है। लेख में कहा गया है कि औरंगजेब ने छत्रपति संभाजी पर बहुत अत्याचार किए और उन पर इस्लाम अपनाने के लिए दबाव डाला। हालाँकि, वो उनके अत्याचारों के सामने झुके नहीं। लेख में कहा गया है कि यह शिवाजी महाराज का घोर अपमान है कि औरंगजेब के नाम पर एक शहर महाराष्ट्र की भूमि पर मौजूद है।
शिवसेना के मुखपत्र में लिखा गया है, “इस देश के मुस्लिम बाबर को भूल गए हैं और महाराष्ट्र के मुस्लिम औरंगज़ेब को भूल गए हैं। औरंगजेब और औरंगाबाद अब वोट का विषय नहीं हैं। महाराष्ट्र के मुस्लिमों ने राष्ट्रवाद का रास्ता अपनाते हुए शिवसेना का समर्थन किया है।”

औरंगाबाद का नाम न बदलने पर भाजपा पर उठाए सवाल

औरंगाबाद का नाम बदलने पर एमवीए गठबंधन के भीतर चल रहे टकराव के बीच भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने कहा कि इस मुद्दे पर विचारों का अंतराल केवल एमवीए गठबंधन और इसके सहयोगियों के बीच सामंजस्य की कमी को बताता है।
औरंगाबाद के नाम बदलने के संबंध में एमवीए सरकार के भीतर चल रहे अलग-अलग विचारों पर भाजपा की आलोचना के जवाब में, शिवसेना ने अपने मुखपत्र के संपादकीय में भाजपा पर आरोप लगाते हुए लिखा कि वे औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजी नगर रख सकते थे जब वे राज्य में सत्ता में थे। शिवसेना ने कहा कि यह उसी तरह किया जा सकता था जैसे उन्होंने दिल्ली में औरंगजेब रोड और उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद का नाम बदल दिया।

महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता बाला साहब थोराट ने जताई नाम बदलने पर आपत्ति

शिवसेना की ओऱ से औरंगाबाद का नाम संभाजी नगर करने के प्रस्ताव का कॉन्ग्रेस विरोध कर रही है। महाराष्ट्र सरकार के मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता बाला साहब थोराट ने औरंगाबाद का नाम संभाजी नगर करने के विचार पर कहा, “महा अघाड़ी सरकार का गठन एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के आधार पर हुआ है। हमारे सारे फैसले इसी प्रोग्राम के आधार पर होने चाहिए। औरंगाबाद का नाम बदलने का फिलहाल कोई भी प्रस्ताव अघाड़ी के दलों के बीच नहीं है और अगर ऐसा कोई प्रस्ताव आता है तो हम उसका विरोध भी करेंगे। महाराष्ट्र में सरकार का कोई भी फैसला महा अघाड़ी के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम से हटकर नहीं होगा।”

हिन्दुओं और सिखों के बीच दूरी बनाने का षड़यंत्र : औरंगजेब के कपट का जवाब वेदों से दिया, गुरु ने शीश कटा दिया पर झुके नहीं

आज पूरा देश सिख धर्म के नौवें गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस मना रहा है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरु तेग बहादुर जी को श्रद्धांजलि दी और एक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज के लिए सिख गुरु के सपने को याद किया। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया, “श्री गुरु तेग बहादुर जी के जीवन ने साहस और करुणा का परिचय दिया। ऐसे में शहीदी दिवस पर, मैं महान श्री गुरु तेग बहादुर जी को नमन करता हूं और एक न्यायसंगत और समावेशी समाज के लिए उनके दृष्टिकोण को याद करता हूं।”
भारत में एक से बढ़ कर एक महान संत हुए हैं और उन्होंने धर्म के लिए अपना सर्वस्व बलिदान किया है। ऐसी ही हस्तियों में से एक थे गुरु तेग बहादुर, जो सिखों के नौवें गुरु कहलाए। उनके बेटे गुरु गोविंद सिंह सिखों के अंतिम व दसवें गुरु हुए। यहाँ हम आपको बताएँगे कि कैसे गुरु तेग बहादुर ने कश्मीरी पंडितों के खिलाफ हो रहे अत्याचार और जबरन धर्मांतरण के खिलाफ औरंगजेब से लोहा लिया, लेकिन झुके नहीं।

ये वो समय था, जब औरंगजेब का अत्याचार लगातार ही बढ़ता जा रहा था और देश भर के हिन्दू सहित कश्मीरी पंडित भी हलकान थे। वाराणसी, उदयपुर और मथुरा सहित हिन्दुओं की श्रद्धा वाले कई क्षेत्रों में औरंगजेब की फ़ौज मंदिरों को ध्वस्त किए जा रही थी। सन 1669 में तो हद ही हो गई जब हिन्दुओं को नदी किनारे मृतकों का अंतिम-संस्कार तक करने से रोक दिया गया। शाही आदेश और जोर-जबरदस्ती, दोनों के जरिए हिन्दुओं पर प्रहार हो रहे थे।

 जम्मू-कश्मीर में शेर अफगान नामक आक्रांता कश्मीरी पंडितों का नामोनिशान मिटा देना चाहता था और बादशाह औरंगजेब को उसका वरदहस्त प्राप्त था। ऐसे कठिन समय में कश्मीरी पंडितों का एक प्रतिनिधिमंडल गुरु तेग बहादुर के पास पहुँचा और उन्हें अपनी समस्या बताई। कृपाराम की अध्यक्षता में आए इस प्रतिनिधिमंडल ने जब गुरु को बादशाही अत्याचार और क्रूरता की दास्तान सुनाई तो वो काफी दुःखी हो उठे।

-------------------                                                  -------------------

कब्र में मुर्दे को खाने वाले कीड़े भी कुछ सालो मे नष्ट हो जाते हैं। परन्तु हिन्दू उन पर सिर रगड़ते हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक शहर है,बहराइच ।बहराइच में हिन्दू समाज का मुख्य पूजा स्थल है गाजी बाबा की मजार। मूर्ख हिंदू लाखों रूपये हर वर्ष इस पीर पर चढाते है। इतिहास का जानकार हर व्यक्ति जानता है,कि महमूद गजनवी के उत्तरी भारत को 17 बार लूटने व बर्बाद करने के कुछ समय बाद उसका भांजा सलार गाजी भारत को दारूल इस्लाम बनाने के उद्देश्य से भारत पर चढ़ आया । वह पंजाब ,सिंध, आज के उत्तर प्रदेश को रोंद्ता हुआ बहराइच तक जा पंहुचा। रास्ते में उसने लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम कराया, लाखों हिन्दू औरतों के बलात्कार हुए, हजारों मन्दिर तोड़ डाले।

राह में उसे एक भी ऐसा हिन्दू वीर नही मिला जो उसका मान मर्दन कर सके। इस्लाम की जेहाद की आंधी को रोक सके। परंतु बहराइच के राजा सुहेल देव पासी ने उसको थामने का बीडा उठाया । वे अपनी सेना के साथ सलार गाजी के हत्याकांड को रोकने के लिए जा पहुंचे। महाराजा व हिन्दू वीरों ने सलार गाजी व उसकी दानवी सेना को मूली गाजर की तरह काट डाला । सलार गाजी मारा गया। उसकी भागती सेना के एक एक हत्यारे को काट डाला गया। हिंदू ह्रदय राजा सुहेल देव पासी ने अपने धर्म का पालन करते हुए, सलार गाजी को इस्लाम के अनुसार कब्र में दफ़न करा दिया।

कुछ समय पश्चात् तुगलक वंश के आने पर फीरोज तुगलक ने सलारगाजी को इस्लाम का सच्चा संत सिपाही घोषित करते हुए उसकी मजार बनवा दी। आज उसी हिन्दुओं के हत्यारे, हिंदू औरतों के बलातकारी ,मूर्ती भंजन दानव को हिंदू समाज एक देवता की तरह पूजता है। सलार गाजी हिन्दुओं का गाजी बाबा हो गया है सलार गाजी हिन्दुओं का भगवान बनकर हिन्दू समाज का पूजनीय हो गया है। अब गाजी की मजार पूजने वाले ,ऐसे हिन्दुओं को मूर्ख न कहे तो क्या कहें ।

ख्वाजा गरीब नवाज़, अमीर खुसरो, निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर

जाकर मन्नत मांगने वाले सनातन धर्मी (हिन्दू) लोगो के लिए विशेष :--

पूरे देश में स्थान स्थान पर बनी कब्रों,मजारों या दरगाहों पर हर वीरवार को जाकर शीश झुकाने व मन्नत करने वालों से कुछ प्रश्न :-

1.क्या एक कब्र जिसमे मुर्दे की लाश मिट्टी में बदल चुकी है वो किसी की मनोकामना पूरी कर सकती हैं?

2. ज्यादातर कब्र या मजार उन मुसलमानों की हैं जो हमारे पूर्वजो से लड़ते हुए मारे गए

थे, उनकी कब्रों पर जाकर मन्नत मांगना क्या उन वीर पूर्वजो का अपमान नहीं हैं जिन्होंने अपने प्राण धर्म की रक्षा करते हुए बलि वेदी पर समर्पित कर दियें थे?

3. क्या हिन्दुओ के राम, कृष्ण अथवा ३३ करोड़ देवी देवता शक्तिहीन हो चुकें हैं जो मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने के लिए जाना आवश्यक हैं?

4. जब गीता में श्री कृष्ण जी महाराज ने कहाँ हैं की कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती हैं तो मजारों में दुआ मांगने से क्या हासिल होगा?

"यान्ति देवव्रता देवान्

पितृन्यान्ति पितृव्रताः

भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति

मद्याजिनोऽपिमाम्"

श्री मद भगवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि भूत प्रेत, मुर्दा, पितृ (खुला या दफ़नाया हुआ अर्थात् कब्र,मजार अथवा समाधि) को सकामभाव से पूजने वाले स्वयं मरने के बाद भूत- प्रेत व पितृ की योनी में ही विचरण करते हैं व उसे ही प्राप्त करते हैं l

5. भला किसी मुस्लिम देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरी सिंह नलवा आदि वीरो की स्मृति में कोई स्मारक आदि बनाकर उन्हें पूजा जाता हैं तो भला हमारे ही देश पर आक्रमण करनेवालो की कब्र पर हम क्यों शीश झुकाते हैं?

6. क्या संसार में इससे बड़ी मूर्खता का प्रमाण आपको मिल सकता हैं?

7. हिन्दू कौनसी ऐसी अध्यात्मिक प्रगति मुसलमानों की कब्रों की पूजा कर प्राप्त कर रहे हैं जो वेदों- उपनिषदों में कहीं नहीं गयीं हैं?

8. कब्र, मजार पूजा को हिन्दू मुस्लिम सेकुलरता की निशानी बताना हिन्दुओ को अँधेरे में रखना नहीं तो क्या हैं ?

इसमें कोई दो राय नहीं कि हिन्दुओं के ही कारण कब्रों का बोलबाला है, अन्यथा कोई इन्हें पूछे भी नहीं। 

---------------------------------------------------------

कहते हैं, जब पूरे दरबार में निराशा का माहौल था, तब बालक गोविंद राय को भी ये ठीक नहीं लगा और उन्होंने कई सवाल दाग दिए। वो पूछने लगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जहाँ दिन-रात भजन-कीर्तन और शास्त्रों की बातें होती थीं, वहाँ आज इस तरह नीरसता का माहौल छाया हुआ है। बच्चे की जिद के आगे गुरु तेग बहादुर झुक गए और सारी व्यथा कह डाली। दरबार में कौन लोग आए थे और उनकी व्यथा थी- सब।

उन्होंने ये तक कह दिया कि इनके दुःखों के निवारण के लिए किसी महापुरुष का बलिदान चाहिए। इस पर बालक गोविंद राय ने पूछा इस समय भारतवर्ष में आपसे बढ़ कर विद्वान, सद्गुणों वाला और महान महापुरुष कौन है, इसीलिए क्या आपको ही इस बलिदान के लिए स्वयं को प्रस्तुत नहीं करना चाहिए? एक बालक के मुँह से गुरु नानक की शिक्षाओं और शरणागत की रक्षा के लिए प्राण त्यागने की बातें सुन कर गुरु तेग बहादुर समझ गए कि ये ईश्वर का ही संदेशा है।

गुरु तेग बहादुर ने इसे ईश्वर का आदेश मान कर कश्मीरी पंडितों की रक्षा का निर्णय लिया और बादशाह औरंगजेब के पास उनके ही हाथों संदेशा भेजा। औरंगजेब को लगा कि अगर धर्मांतरण वाले अभियान को गुरु तेग बहादुर का समर्थन मिल गया तो एक-एक कश्मीरी पंडित मुस्लिम मजहब अपना लेगा। औरंगजेब ये सोच कर खुश हुआ कि गुरु तेग बहादुर इस्लाम अपना लेंगे और पीछे से पूरे कश्मीर पर भी इस्लाम का राज होगा।

गुरु तेग बहादुर की दिल्ली आने की सूचना को उसने भ्रामक खबर बना कर दुष्प्रचारित करवाया कि गुरु इस्लाम अपनाने ही आ रहे हैं। लेकिन, कपटी औरंगजेब ने गुरु को आगरा के नजदीक ही गिरफ्तार करवा लिया। इसके ठीक अगले दिन उसने गुरु को अपने दरबार में बुलाया। हमेशा की तरह गुरु तेग बहादुर शांतचित्त मुद्रा में बैठे हुए थे और उनके मुख पर डर या घृणा, किसी भी चीज का जरा भी भाव नहीं था।

दरबार में उनके बीच हुई बातचीत का वर्णन हिंदी समाचार पत्र ‘उगता भारत’ के संस्थापक-संपादक राकेश कुमार आर्य ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दू राष्ट्र स्वप्नदृष्टा: बंदा वीर बैरागी‘ में किया है। इसकी चर्चा कई अन्य जगह भी मिलती है। वहाँ औरंगजेब का पूरा जोर इस बात पर था कि वो हिन्दुओं और सिखों को अलग-अलग साबित कर गुरु तेग बहादुर को भ्रमित कर सके और दोनों समुदायों के बीच कटुता पैदा कर सके।

उसने गुरु तेग बहादुर से कहा कि वो हिन्दुओं का नेतृत्व न करें, क्योंकि वे तो सिखों से अलग होते हैं। औरंगजेब के जवाब में गुरु तेग बहादुर ने उसे वेदों और उपनिषदों के माध्यम से समझाना शुरू किया। गुरु तेग बहादुर इन समस्त शास्त्र-पुराणों में पारंगत थे और साथ ही मानवता को परम धर्म मानते थे। इसीलिए उन्होंने इन सबके माध्यम से औरंगजेब के क्रियाकलापों को धर्मविरुद्ध साबित कर दिया, जिससे वो भड़क गया।

औरंगजेब ने अरब मुल्कों का उदाहरण देते हुए दावा किया कि जैसे वहाँ पर सारे मुस्लिम ही होते हैं, ठीक उसी तरह सम्पूर्ण भारतवर्ष में भी एक ‘दीन’ मजहब होगा तो सारी समस्याएँ अपनेआप ही ख़त्म हो जाएँगी- न कोई मतभेद होगा, न कोई कटुता। गुरु तेग बहादुर ने उसे याद दिलाया कि जहाँ केवल मुस्लिम रहते हैं, वहाँ भी तो शिया-सुन्नी के झगड़े चलते ही रहते हैं। उन्होंने मुस्लिमों में भी कई पंथ-समुदाय होने की बात याद दिलाई।

गुरु तेग बहादुर का जोर इस बात पर था कि ये पूरी दुनिया ईश्वर की बनाई वो वाटिका है, जहाँ भाँति-भाँति के पुष्प खिल सकते हैं। उन्होंने औरंगजेब से सवाल किया कि अगर प्रकृति की इच्छा होती कि भारत में सिर्फ मुस्लिम ही पैदा हों, तब तो उन्हें संतान ही नहीं होती और केवल मुस्लिमों को ही संतान पैदा होती। उन्होंने समझाया कि प्रकृति सबके साथ बराबर व्यवहार करती है, इसीलिए उसे भी जबरन धर्मांतरण अभियान रोक देना चाहिए।

इसके बाद का प्रसंग लगभग सभी को पता ही है। क्रूर और आततायी बादशाह ने गुरु को मृत्यु अथवा इस्लाम में से कोई एक चुनने के लिए दिया। गुरु तेग बहादुर ने धर्म की रक्षा के लिए मृत्यु का वरन करने की इच्छा प्रकट की, लेकिन इस्लाम अपनाने से साफ़ इनकार कर दिया। उन्हें जेल में डाल दिया गया। उन पर अमानवीय अत्याचार किए जाने लगे। गुरु ने सबका सामना किया। उन्हें विभिन्न माध्यमों से प्रताड़ित किया जाता था।

इस पूरे प्रकरण के दौरान अगर भाई मतिदास के बलिदान का जिक्र न किया गया तो ये अधूरा ही रहेगा। उन्हें भी गुरु तेग बहादुर के साथ ही पकड़ा गया था। दिल्ली के चाँदनी चौक पर उन्हें मृत्युदंड देने के लिए लाया गया। आक्रांताओं ने उनकी अंतिम इच्छा पूछी तो उन्होंने कहा कि मृत्यु के वक्त उनका सिर गुरु के समक्ष रहे, ताकि वो उन्हें देखते हुए मौत को गले लगा सकें। गुरु तेग बहादुर के पिंजरे के ठीक सामने उन्हें रखा गया।

लकड़ी के दो शहतीरों की पाट में उनकी शरीर को टिका दिया गया और दो जल्लाद आड़े लेकर खड़े हो गए। उनसे अंतिम बार पूछा गया कि क्या वो इस्लाम कबूल करेंगे, लेकिन उनका जवाब ना में था। तुरंत ही आड़े से उनके शरीर को चीर डाला गया। खून के फव्वारे छूट पड़े, देखने वालों के रोंगटे खड़े हो गए और फिर भी अत्याचारी आक्रांता मजे लेते रहे। औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर की मृत्यु की भी तारीख निश्चित कर दी।

पूरे दिल्ली में ढिंढोरा पिटवा दिया गया कि गुरुवार, 12 मार्गशीष, सुदी 5, सम्मत 1732, विक्रमी (नवंबर 11, 1675) को चाँदनी चौक स्थित दिल्ली चबूतरे पर उनका क़त्ल कर दिया जाएगा। उससे पहले भाई दयाल जी और मति दास जी के जीवन का अंत कर दिया गया था। उपर्युक्त तारीख़ पर सैकड़ों लोग वहाँ जुटे पर किसी की कुछ भी बोलने की हिम्मत नहीं हुई। अत्याचारियों ने सबके सामने गुरु का शीश काट दिया। ‘हिंद की चादर’ का बलिदान हो गया।

अंत में जिक्र उन दो बहादुरों का, जिहोने गुरु के शीश और धड़ को शत्रु के द्वारा अपमानित होने से बचाया और विधि-विधान से अंतिम संस्कार हेतु लेकर गए। गुरु की मृत्यु के बाद वहाँ बड़ी भगदड़ मच गई थी। भाई वीर जैता और भाई लखीशाह ने क्रमशः गुरु के शीश और धड़ को उठाया और वहाँ से निकल गए। बाद में ससम्मान उनका अंतिम संस्कार हुआ। इन दोनों की बहादुरी आज भी याद की जाती है।

इन सबके बावजूद आज नारा लगाया जाता है- जय भीम-जय मीम। इस नारे का अब तक का सफर विश्वासघातों से ही भरा है। ऐसे मौकों की फेहरिस्त काफी लंबी है, जब फायदे के लिए दलितों का पहले इस्तेमाल करने वालों ने ही बाद में मजहब के नाम पर उनका नरसंहार किया। हिन्दुओं और सिखों के साथ ये हर दौर में होता आया है। ऐसी एक नहीं, बल्कि कई घटनाएँ हैं जो इस्लामी क्रूरता को बयान करती है। निशाना हिन्दू होते हैं, या सिख।

इतिहास पर गांधीवाद की काली छाया ; गांधीजी का आदर्श औरंगजेब


डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

06 दिसम्बर 2017 को 'बीबीसी' ने एक लेख 'औरंगजेब और मुगलों की तारीफ क्यों करते थे- महात्मा गांधी' - शीर्षक से प्रकाशित किया। इस लेख में 'बीबीसी' ने बताया कि गांधीजी के औरंगजेब और मुगल शासकों के प्रति बहुत ही नेक विचार थे। वह उनके धर्मनिरपेक्ष विचारों के प्रशंसक थे और यह भी मानते थे कि उनके शासनकाल में भारत में भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता थी। लोग सुख -चैन के साथ परस्पर मिलकर रहते थे । कहीं भी कोई साम्प्रदायिक तनाव नहीं था। सर्वत्र शान्ति थी । यही कारण था कि गांधीजी मुगलों या तुर्कों के भारतवर्ष में शासन को विदेशियों का शासन नहीं मानते थे और ना ही उनके शासनकाल को गुलामी का काल मानते थे। गांधीजी उसे 'स्वराज' का प्रतीक मानते थे । उनके लिए औरंगजेब बहुत ही आदर्श, सहिष्णु और उदार शासक था , जबकि अंग्रेज उतने उदार नहीं थे। यही कारण था कि वह अंग्रेजों के शासन को भारत की गुलामी का काल मानते थे और मुगलों को इस 'पाप' से मुक्त कर देते थे। गांधीजी के ऐसे विचारों को समझ कर स्पष्ट हो जाता है कि उनके ऐसे विचारों की 'काली छाया' वर्तमान इतिहास पर भी पड़ी है। जिसने मुगलों का गुणगान और महाराणा प्रताप व शिवाजी जैसे राष्ट्रभक्तों की उपेक्षा करने का 'पाप' किया है।

गांधीजी का दोगलापन

1 नवंबर, 1931 की सुबह लन्दन के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के पेम्ब्रोक कॉलेज में आयोजित एक कार्यक्रम में गांधीजी का एक भाषण रखा गया था। जिसके बारे में 'बीबीसी' ने अपने उपरोक्त लेख में बताया है कि गांधी के सहयोगी महादेव देसाई के अनुसार इस बैठक में गांधी खुलकर बोल रहे थे। बोलते-बोलते एक स्थान पर उन्होंने कहा, "मैं यह जानता हूँ कि हर ईमानदार अंग्रेज़ भारत को स्वतन्त्र देखना चाहता है, लेकिन उनका ऐसा मानना क्या दुःख की बात नहीं है कि ब्रिटिश सेना के वहाँ से हटते ही दूसरे देश उस पर टूट पड़ेंगे और देश के अंदर आपस में भी भारी मार-काट मच जाएगी ? …आपके बिना हमारा क्या होगा, इसकी इतनी अधिक चिंता आप लोगों को क्यों हो रही है ? आप अंग्रेज़ों के आने से पहले के इतिहास को देखें, उसमें आपको हिंदू-मुस्लिम दंगों के आज से ज्यादा उदाहरण नहीं मिलेंगे. ...औरंगज़ेब के शासन-काल में हमें दंगों का कोई हवाला नहीं मिलता।"
इसका अभिप्राय है कि गांधी जी ने मुगलों और तुर्कों के शासनकाल में होने वाले हिन्दुओं के सामूहिक नरसंहारों और लोगों के सामूहिक धर्मांतरण को न तो साम्प्रदायिक दंगा माना और न ही मुस्लिम शासकों का हिन्दुओं पर किसी प्रकार का अत्याचार माना । उन्होंने इस प्रकार का प्रदर्शन किया कि जैसे मुगलों व तुर्कों के शासनकाल में यदि ऐसा होता भी रहा तो वह सब कुछ क्षम्य था। वास्तव में यह गांधीजी का दोगलापन ही था।

औरंगजेब बुरा नहीं था

उसी दिन दोपहर को कैम्ब्रिज में ही 'इंडियन मजलिस' की एक सभा में गांधीजी ने और स्पष्ट रूप से कहा- 'जब भारत में ब्रिटिश शासन नहीं था, जब वहाँ कोई अंग्रेज़ दिखाई नहीं देता था, तब क्या हिन्दू, मुसलमान और सिख आपस में बराबर लड़ ही रहे थे ?
हिन्दू और मुसलमान इतिहासकारों द्वारा दिए गए विस्तृत और सप्रमाण विवरणों के आधार पर हम कह सकते हैं कि तब हम अपेक्षाकृत अधिक शान्तिपूर्वक रह रहे थे और ग्रामवासी हिन्दुओं और मुसलमानों में तो आज भी कोई झगड़ा नहीं है। उन दिनों तो उनके बीच झगड़े का नामो-निशान तक नहीं था।"
स्वर्गीय मौलाना मुहम्मद अली, जो खुद एक हद तक इतिहासकार थे, मुझसे अक्सर कहा करते थे कि "अगर अल्लाह ने मुझे इतनी ज़िंदगी बख्शी तो मेरा इरादा भारत में मुसलमानी हुक़ूमत का इतिहास लिखने का है। उसमें दस्तावेज़ी सबूतों के साथ यह दिखा दूँगा कि अंग्रेज़ों ने गलती की है। औरंगज़ेब उतना बुरा नहीं था जितना बुरा अंग्रेज़ इतिहासकारों ने दिखाया है, मुग़ल हुक़ूमत इतनी खराब नहीं थी जितनी खराब अंग्रेज़ इतिहासकारों ने बताई है।"
गांधीजी ने मुगल काल के इतिहास को इस प्रकार परिभाषित करके स्पष्ट किया कि वह मुगल काल में जितने भर भी अत्याचार हिन्दुओं पर होते रहे , उन्हें अत्याचार नहीं मानते। मुगलों और तुर्कों ने भारत की संस्कृति और धर्म को चाहे जितना नष्ट करने का प्रयास किया हो और चाहे जितने धर्मांतरण करके उन्होंने मुस्लिमों की संख्या बढ़ाने का काम भारत में किया हो , वे सब गांधी जी के लिए स्वीकार करने योग्य थे । उन्होंने हिन्दू स्त्रियों और मुगलों व तुर्कों के द्वारा किए गए अमानवीय अत्याचारों को भी क्षमा के योग्य माना । इसके अतिरिक्त भारत पर उनके बलात शासन को भी गाँधीजी ने 'वैध और स्वराज कहकर महिमामंडित किया।
गांधी जी ने अपने उपरोक्त भाषण में यह भी स्पष्ट किया कि भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता या हिन्दू मुस्लिम दंगों का इतिहास बहुत अधिक पुराना नहीं है ।यह झगड़ा तो तब शुरू हुआ जब हम ग़ुलामी की शर्मनाक स्थिति में पड़े।"
गांधी जी ने मुगलों व टीपू सुल्तान जैसे शासकों के इतिहास को तोड़ मरोड़ कर हिन्दू विरोधी दिखाने के प्रयासों की आलोचना अपनी पुस्तक 'हिन्द स्वराज' में भी की है । जिसमें उन्होंने तत्कालीन विदेशी इतिहासकारों को इस दुर्भावना के लिए जिम्मेदार ठहराया है।
गांधी जी स्वयं चरखा चलाते थे और इस चरखा चलाने के ढोंग व पाखण्ड का 'सच' उस समय चाहे लोग न जानते हो पर आज सभी जानते हैं कि वह जिस बकरी का दूध पीते थे वह भी बादाम खाती थी। जिस बापू या 'महात्मा' की बकरी भी बादाम खाती हो , उसके लिए आश्रम में वे सारी 'सुविधाएं उपलब्ध' रहती थीं या कहिए की सारी सुविधाएं उपलब्ध होने में किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं आती थी जो आज के आश्रम वाले ' बापुओं' के लिए उपलब्ध होती हैं। यही कारण था कि उन्होंने 'महात्मा' रहकर भी वह सारी सुख सुविधाएं भोगीं , जिन्हें एक साधारण व्यक्ति नहीं भोग पाता । गांधी जी ने औरंगजेब को अपने समरूप मानते हुए उसकी इस बात के लिए प्रशंसा की कि वह भी 'टोपियां सीकर' अपना जीवन यापन करता था अर्थात गांधीजी का चरखा चलाना और औरंगजेब का 'टोपी सीकर' गुजारा करना दोनों समान थे । स्वाभाविक है कि यदि इस सबके पीछे गांधी जी का यह 'आदर्श नायक' औरंगजेब भी वही काम करता था जो गांधीजी करते थे तो उसे गांधीजी क्यों बुरा मानते ?
उपरोक्त लेख से हमें पता चलता है कि 21 जुलाई, 1920 को 'यंग इंडिया' में लिखे अपने प्रसिद्ध लेख 'चरखे का संगीत' में गांधीजी ने कहा था, "पंडित मालवीयजी ने कहा है कि जब तक भारत की रानी-महारानियां सूत नहीं कातने लगतीं, और राजे-महाराजे करघों पर बैठकर राष्ट्र के लिए कपड़े नहीं बुनने लगते, तब तक उन्हें संतोष नहीं होगा । उन सबके सामने औरंगज़ेब का उदाहरण है, जो अपनी टोपियां खुद ही बनाते थे।"

'नवजीवन' में गांधी जी ने लिखा था ....

इसी प्रकार 20 अक्तूबर, 1921 को गुजराती पत्रिका 'नवजीवन' में उन्होंने लिखा, "जो धनवान हो वह श्रम न करे, ऐसा विचार तो हमारे मन में आना ही नहीं चाहिए। इस विचार से हम आलसी और दीन हो गए हैं. औरंगज़ेब को काम करने की कोई ज़रूरत नहीं थी, फिर भी वह टोपी सीता था। हम तो दरिद्र हो चुके हैं, इसलिए श्रम करना हमारा दोहरा फर्ज है।"
ठीक यही बात वह 10 नवम्बर, 1921 के 'यंग इंडिया' में भी लिखते हैं, "दूसरों को मारने का धंधा करके पेट पालने की अपेक्षा चरखा चलाकर पेट भरना हर हालत में ज्यादा मर्दानगी का काम है. औरंगज़ेब टोपियां सीता था , क्या वह कम बहादुर था ?"
टोपी सीकर हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाला औरंगजेब गांधी जी को 'बहादुर' दिखाई देता था।
उड़ीसा के कटक में एक सभा को सम्बोधित करते हुए गांधी जी ने संकेत किया था कि - ''अंग्रेज़ों के शासनकाल में भारतीय मानसिक रूप से ग़ुलाम हो गए और उनकी निर्भीकता और रचनात्मकता जाती रही. जबकि मुग़लों के शासन में भारतीयों की स्वतन्त्र चेतना और सांस्कृतिक स्वतन्त्रता पर कभी आंच नहीं आई।"
24 मार्च, 1921 को आयोजित इस कार्यक्रम में महात्मा गांधी के शब्द थे, "अंग्रेज़ों से पहले का समय ग़ुलामी का समय नहीं था। मुग़ल शासन में हमें एक तरह का स्वराज्य प्राप्त था। अकबर के समय में प्रताप का पैदा होना संभव था और औरंगज़ेब के समय में शिवाजी फल-फूल सकते थे। लेकिन 150 वर्षों के ब्रिटिश शासन ने क्या एक भी 'प्रताप' और 'शिवाजी' को जन्म दिया है ? कुछ सामंती देशी राजा जरूर हैं, पर सब-के-सब अंग्रेज़ कारिंदे के सामने घुटने टेकते हैं, और अपनी दासता स्वीकार करते हैं।"

ब्रिटिश काल के 'प्रताप' और 'शिवाजी'

ऐसा कहते समय गांधीजी यह भूल गए थे कि महाराणा प्रताप और शिवाजी को समाप्त करने के हर संभव प्रयास उस समय के मुगल शासकों ने किए थे। वह यह भी भूल गए थे कि महाराणा प्रताप और शिवाजी के बनाने में मुगलिया शासन का योगदान नहीं था , बल्कि इन दोनों महान देशभक्तों की देशभक्ति और उनकी शूरवीरता ही इसके लिए उत्तरदायी थी । वे देश की मूल चेतना के प्रतीक थे जो इस बात के लिए कुलबुला रही थी कि देश आजाद हो। इस प्रकार वे उस समय हमारी स्वाधीनता की लड़ाई के नायक थे । गांधीजी में इतना साहस नहीं था कि वे स्वाधीनता के इन महानायकों को इस प्रकार की उपाधि से विभूषित कर पाते। गांधी जी यह भी भूल गए कि महाराणा प्रताप और शिवाजी की इसी क्रान्तिकारी सोच व स्वाधीनता प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा की विचारधारा को अर्थात क्रान्तिकारी विचारधारा को गांधीजी के समकालीन नेताजी सुभाषचन्द्र बोस तथा वीर सावरकर और उनके अन्य साथियों ने यथावत अपनाया हुआ था। जैसे प्रताप और शिवाजी मुगलकाल में भारत की मूल चेतना के प्रतीक बनकर खड़े हुए थे , वैसे ही हमारी इसी मूल चेतना के प्रतीक बनकर हमारे ये क्रान्तिकारी अंग्रेजों के काल में मुगलों के काल से भी अधिक तीव्र गति से उठ खड़े हुए थे और अन्त में इन्हीं के बलिदान, त्याग व तपस्या के कारण देश स्वतन्त्र हुआ था।
जब तक हमारे देश के वर्तमान इतिहास पर गांधी जी के मुगलों व औरंगजेब सम्बन्धी इन विचारों की 'काली छाया' पड़ी रहेगी तब तक हमारे महाराणा प्रताप , शिवाजी , सुभाष व सावरकर जैसे अनेकों क्रान्तिकारी देशभक्तों के महान कार्यों को उनके विचारों की यह काली छाया दबाए रखेगी। निश्चित रूप से अब समय आ गया है जब हम गांधीजी के इन विचारों की इतिहास पर पड़ने वाली 'काली छाया' का पर्दाफाश करें और अपने इतिहास को सही रूप में स्थापित कर वर्तमान पीढ़ी को पढ़ने के लिए प्रस्तुत करें।

दारा शिकोह : आखिर क्यों खोजी जा रही है दारा की कब्र?

to locate the grave of the mughal prince dara shikoh ministry of culture  set up a seven member panel | मुगल शासक औरंगजेब के भाई दारा शिकोह की कब्र  ढूंढ रही मोदी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आखिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दारा शिकोह के चरित्र में क्या खोजा की उसकी कब्र की तलाश हो रही है। कहते हैं, हीरे की कदर जौहरी ही कर सकता है। दारा शिकोह अन्य मुगलों से एकदम अलग विचारों वाला मुग़ल बादशाह था, जिसकी महानता को पाखंडी, छद्दम धर्म-निरपेक्षों, कुर्सी के भूखे और तुष्टिकरण पुजारी नेताओं ने कभी उजागर नहीं होने दिया, क्योकि उसका गुणगान करने से इन छलावा करने वालों को वोट नहीं मिलता। अगर औरंगज़ेब की बजाए दारा शिकोह बादशाह होता, भारत में हिन्दू-मुसलमानों में शायद कोई विवाद नहीं होता। कांग्रेस और वामपंथी गठजोड़ ने वास्तव में भारतीय इतिहास को अपने हिसाब से लिखा। इतने वर्षों के बाद भारत में दारा शिकोह को याद किया गया है, वह भी उस सरकार द्वारा, जिसके प्रधानमंत्री को मुस्लिम विरोधी चेहरे के रूप में उजागर किया जाता है। 
दारा शिकोह वो मुगल शासक था, जिनके साथ इतिहासकारों ने छलावा किया और गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया। उस दारा शिकोह को उसका वाजिब हक दिलाने के लिए मोदी सरकार आगे आई है। जिस दारा शिकोह ने हिन्दू धर्म ग्रंथों का फारसी में अनुवाद किया था। उस दारा शिकोह को इतिहास में दफन पन्नों से बाहर निकालने का बीड़ा मोदी सरकार ने उठाया है। जिस दारा शिकोह के साथ उसके सगे भाई औरंगजेब ने क्रूरता की हदें पार कर दी थी और उसका सिर कलम करवा दिया था, उस दारा शिकोह की कब्र खोजने में मोदी सरकार जुट गई है।
दूसरे, इसका यह भी अर्थ निकाला जा सकता है कि मोदी ने कांग्रेस के साथ-साथ छद्दम इतिहासकारों को भी बेनकाब करने का भी मन बना लिया है। क्योकि इन्हीं छद्दम इतिहासकारों के कारण मुस्लिम कट्टरपंथी किसी भी निर्णय अथवा कानून को साम्प्रदायिकता दृष्टि से देख दंगे करवाने की चेष्टा कर, हिन्दू-मुसलमानों के बीच नफरत की फसल बोकर बेगुनाहों के खून की होली खेलकर मालपुए खाने के साथ-साथ अपनी तिजोरियों को भी भरते हैं। जिस दिन सरकार इन छद्दम इतिहासकारों को बेनकाब करने में सफल हो गयी, देश से फिरकापरस्ती और तुष्टिकरण का भी जनाजा निकल जाएगा। इन छद्दम इतिहासकारों की हालत इतनी दयनीय हो जाएगी की शायद उन्हें अपने परिवार से भी सम्मान से वंचित होना पड़ सकता है। छद्दम इतिहासकार यह भूल बैठे थे, कि भगवान ने रात बनाई है तो सुबह भी जरूर बनाई होगी, और जब रात का अँधेरा छटकर सुबह होगी, तब उनकी क्या हालत होगी।  
इतिहास में औरंगजेब की खूब चर्चा हुई है और दारा शिकोह को नजरअंदाज कर दिया गया है। सच्चे मायने में एक धर्मनिरपेक्ष मूर्त वाले दारा शिकोह को काफिर तक करार दिया गया था। इतिहासकारों ने भी औरंगजेब का ही महिमामंडन किया। लेकिन दारा शिकोह को वो पहचान नहीं दी, जिनके वो हकदार थे। देश भर में औरंगजेब के नाम से तमाम सड़के मिल जाएँगी। लेकिन दारा शिकोह के नाम पर एक स्मारक तक नहीं बना। हालाँकि 2017 में दिल्ली के डलहौजी मार्ग का नाम बदलकर दारा शिकोह रोड जरूर कर दिया गया था। 
Dara Shikoh and the Upanishads by Satya Chaitanyaशाहजहाँ और औरंगजेब जैसे मुगल बादशाहों के बारे में तो पूरी दुनिया जानती है, लेकिन दारा शिकोह को बहुत कम ही लोग जानते होंगे। दरअसल, दारा शिकोह शाहजहाँ के बड़े बेटे और औरंगजेब के बड़े भाई थे। इतिहास में आज के दिन एक भाई ने अपने ही भाई को सत्ता के लिए मरवा दिया था। भारतीय मुगलकालीन इतिहास में 30 अगस्त 1659 को ही मुगल शासक शाहजहाँ के बेटे दारा शिकोह की उसके ही छोटे भाई ने हत्या करवा दी थी। भारतीय इतिहास में भुला दिया गया यह शख्स शाही मुगल परिवार में अनोखा और अद्भुत व्यक्तित्व वाला था।
पुरातत्वविद् केके मुहम्मद के मुताबिक शिकोह अपने दौर के बड़े फ्री थिंकर (स्वतंत्र विचारक) थे। उन्होंने उपनिषदों का महत्व समझा और अनुवाद किया। तब इसे पढ़ने की सुविधा सवर्ण हिंदुओं तक सीमित थी। उपनिषदों के दारा के किए फारसी अनुवाद से आज भी फ्री थिंकर्स को प्रेरणा मिलती है। यहाँ तक कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसको स्वीकार किया है।
'सर्व संप्रदाय समभाव' में विश्वास रखने वाला दारा
दारा शिकोह के एक हाथ में पवित्र कुरान थी और दूसरे हाथ में पवित्र उपनिषद। वो मानता था कि हिन्दू और इस्लाम धर्म की बुनियाद एक है। वो नमाज भी पढ़ता था और प्रभु नाम की अँगूठी भी पहनता था। मस्जिद भी जाता था और मंदिर में भी आस्था रखता था। लेकिन सत्ता की लड़ाई में उसे काफिर बताकर मार दिया गया। तभी से ये सवाल भी बना हुआ है कि क्या भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास अलग होता अगर औरंगजेब की जगह दारा शिकोह भारत का बादशाह बनता।
मुगल बादशाह शाहजहाँ के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह में भारतीय संस्कृति कूट-कूट कर भरी हुई थी। वो उदारवादी और बेहद नम्र मुगल शासक थे। वो एक बड़े लेखक भी थे। दारा शिकोह सूफीवाद से बेहद प्रभावित थे। उनके मन में हर धर्म के प्रति सम्मान था। 
दाराशिकोह का नाम मुगल वंश के एक ऐसे नक्षत्र का नाम है जिसने विपरीत, परिस्थितियों और विपरीत परिवेश मंज जन्म लेकर भी 'सर्व संप्रदाय समभाव' की मानवोचित और राजोचित व्यवस्था में अपना विश्वास व्यक्त किया था और उसके विषय में यह भी सत्य है कि अपने इसी आदर्श के लिए वह बलिदान भी हो गया था। किसी महान आदर्श को लक्षित कर उसी के लिए जीवन होम कर देना ही यदि सच्ची शहादत है तो दाराशिकोह का नाम ऐसे शहीदों में सर्वोपरि रखना चाहिए क्योंकि दाराशिकोह का जीवन मानवता के लिए समर्पित रहा था और उसी के लिए होम हो गया था।
Muslim society should get out of colour of Aurangzeb and join stream of Dara  Shikohअच्छे लोगों को देता है -इतिहास दंड
विश्व के ज्ञात साम्प्रदायिक इतिहास में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब इतिहास नायकों का क्रूरता पूर्वक वध किया गया और उन्हें लोगों ने इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया। कभी भूलवश यदि इतिहास ने इन इतिहास नायकों को झाड़ पोंछकर स्वच्छ करने का प्रयास भी किया तो क्रूर और निर्दयी सत्ता में बैठे लोगों ने इतिहास की भी हत्या करने में देर नही की। फलस्वरूप इतिहास के विषय में लोगों की धारणा बनी कि 'जो जीतेगा वही मुकद्दर का सिकंदर होगा या जो जीत जाता है-इतिहास उसी का हो जाता है।'
वस्तुत: ऐसा है नहीं, जीतने वाला क्षणिक समय के लिए 'मुकद्दर का सिकंदर' हो सकता है, परंतु यह आवश्यक नहीं कि वह इतिहास का भी नायक बन जाए। क्योंकि एक यथार्थवादी और सच्चा इतिहास तो स्वयं 'सिकंदर' को भी अपना नायक नही मानता।
इतिहास का नायक वही होता है जो मानवतावाद के लिए संघर्ष करता है, नीति की स्थापनार्थ और अनीति के समूलोच्छेदन के लिए संघर्ष करता है, जो मानव और मानव के मध्य साम्प्रदायिक आधार पर भेदभाव नहीं करता, और जो केवल मानव निर्माण से राष्ट्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण से विश्व निर्माण का लक्ष्य बनाकर चलता है।
जो लोग विश्व में विध्वंसात्मक शक्तियों का नेतृत्व करते हैं और अपनी विध्वंसक नीतियों से दाराशिकोह जैसी पुण्यात्माओं का जीवनांत कर देते हैं, वे सत्ता पाकर 'आलमगीर' हो सकते हैं, परंतु वास्तव में 'आलमगीर' हो गये हों-उनके विषय में यह नहीं कहा जा सकता।
पुरातत्वविद् केके मुहम्मद के मुताबिक शिकोह अपने दौर के बड़े फ्री थिंकर (स्वतंत्र विचारक) थे। उन्होंने उपनिषदों का महत्व समझा और अनुवाद किया। तब इसे पढ़ने की सुविधा सवर्ण हिंदुओं तक सीमित थी। उपनिषदों के दारा के किए फारसी अनुवाद से आज भी फ्री थिंकर्स को प्रेरणा मिलती है। यहाँ तक कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसको स्वीकार किया है।
फारसी में दारा शिकोह के ग्रंथ हैं- सारीनतुल् औलिया, सकीनतुल् औलिया, हसनातुल् आरफीन (सूफी संतों की जीवनियाँ), तरीकतुल् हकीकत, रिसाल-ए-हकनुमा, आलमे नासूत, आलमे मलकूत (सूफी दर्शन के प्रतिपादक ग्रंथ), सिर्र-ए-अकबर (उपनिषदों का अनुवाद)। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और योगवासिष्ठ का भी फारसी भाषा में अनुवाद किया। ‘मज्म-उल्-बहरैन्’ फारसी में उनकी अमर कृति है, जिसमें उन्होंने इस्लाम और वेदांत की अवधारणाओं में मूलभूत समानताएँ बताई हैं। इसके अलावा दारा शिकोह ने ‘समुद्रसंगम’ (मज़्म-उल-बहरैन) नाम से संस्कृत में भी रचना की। 
फारसी में दारा शिकोह के ग्रंथ हैं- सारीनतुल् औलिया, सकीनतुल् औलिया, हसनातुल् आरफीन (सूफी संतों की जीवनियाँ), तरीकतुल् हकीकत, रिसाल-ए-हकनुमा, आलमे नासूत, आलमे मलकूत (सूफी दर्शन के प्रतिपादक ग्रंथ), सिर्र-ए-अकबर (उपनिषदों का अनुवाद)। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और योगवासिष्ठ का भी फारसी भाषा में अनुवाद किया। ‘मज्म-उल्-बहरैन्’ फारसी में उनकी अमर कृति है, जिसमें उन्होंने इस्लाम और वेदांत की अवधारणाओं में मूलभूत समानताएँ बताई हैं। इसके अलावा दारा शिकोह ने ‘समुद्रसंगम’ (मज़्म-उल-बहरैन) नाम से संस्कृत में भी रचना की। 
बादशाह शाहजहां का उत्तराधिकारी दाराशिकोह
बादशाह शाहजहां अपने जीवन काल में अपने बड़े पुत्र दाराशिकोह से असीम स्नेह करता था। संभवत: इसीलिए बादशाह दारा शिकोह को सामान्यत: अपने साथ ही रखता था। उसे अपने चार पुत्रों दारा शिकोह, शुजा मुहम्मद, औरंगजेब और मुराद बख्श में से दारा की बातों और नीतियों में ही आचरण और व्यवहार में मानवता का प्रकाश उत्कीर्ण होता दिखता था, इसलिए वह अपने इसी पुत्र को सबसे अधिक अपने निकट पाता था। कदाचित यही कारण रहा होगा कि उसने दाराशिकोह को अपना उत्तराधिकारी तक बनाने का मन बना लिया था।
बादशाह की यह योजना निश्चित रूप से उसके दूसरे पुत्रों औरंगजेब आदि को उचित नही लगी। इस पर हम पूर्व में प्रकाश डाल चुके हैं। इस आलेख में हम कुछ दूसरी बातों पर चिंतन करेंगे।
आज का सभ्य समाज और इतिहास
मानव समाज हर काल में और हर युग में कुछ स्वनिर्मित मतिभ्रमों का शिकार बना रहा है, आज भी बना हुआ है और भविष्य में भी बना रहेगा। इसी को स्वयं को स्वयं के द्वारा स्वयं के लिए छलना भी कहा जा सकता है। जैसे हम आज कल एक मतिभ्रम का शिकार है कि हम लोकतंत्र में जी रहे हैं और एक सभ्य समाज के प्राणी हैं-इत्यादि। परंतु धनबल, जनबल, और गन बल ने लोकतंत्र को किस प्रकार तार-तार किया है-यह भी हमसे छिपा नहीं है।
विकास की पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़े मनुष्य को आगे आने से आज भी उतनी ही क्रूरता से रोका जा रहा है, जितनी क्रूरता से मध्यकालीन इतिहास के समाज में उसे रोका जाता था। तब आज के समाज को 'सभ्य समाज' कैसे कहा जा सकता है? पर हमने इसे सभ्य समाज माना है और अपनी मान्यता के मतिभ्रम में जिये जा रहे हैं। हम नित्य लोकतंत्र की हत्या कर रहे हैं, और कहे जा रहे हैं कि हम लोकतांत्रिक हैं। यह सोच हमारे लिए अभिशाप बन गयी है।
एक अन्य सोच जो इन सबसे अधिक घातक है, वह है व्यक्ति का साम्प्रदायिक होना और अपने सम्प्रदाय की मान्यताओं को सर्वप्रमुख मानना। इस सोच के कारण व्यक्ति को संप्रदाय के कठमुल्ला या मठाधीश शासित करने की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं। यह खेल सदियों से होता आ रहा है। आज भी साम्प्रदायिक मान्यताओं को या तो समाप्त करने की या सर्व समाज के अनुकूल बनाने की, या उन्हें समाप्त करने की योजना या साहस किसी भी सरकार के पास नहीं है। यहां तक कि अमेरिका जैसा सर्वशक्ति संपन्न देश और उसकी सरकार भी इस विषय में कुछ ठोस कार्य कर दिखाने में असमर्थ है।
इस्लाम निरपेक्ष राजनीति कभी संभव नहीं
कहने का अभिप्राय है कि-जैसे हम आज मतिभ्रमों में जी रहे हैं वैसे ही मध्यकाल में भी जी रहे थे। उस समय बादशाहत अपने कठमुल्लों के सामने पानी भरती थी। उन्होंने वैसे ही समाज पर अपना शिकंजा कस रखा था, जैसे आज कस रखा है। वैसे इस्लाम का रूप विकृत करने में राजनीति और कठमुल्लों दोनों का बराबर का सहयोग रहा है। राजनीति ने इस्लाम को अपने ढंग से प्रयोग किया है और कठमुल्लों ने अपने ढंग से। इसलिए राजनीति इस्लाम में इस्लाम निरपेक्ष हो ही नहीं सकती।
जब बादशाह और सुल्तान 'इस्लाम खतरे में है' का नारा केवल इसलिए देने के अभ्यासी रहे हों, या हैं कि इससे इस्लाम में आस्था रखने वाले लोगों का उन्हें समर्थन प्राप्त होगा और वह अधिक शक्तिशाली बनकर उभरेंगे, तब राजनीति के इस्लाम निरपेक्ष बनने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। राजनीति पंथनिरपेक्ष तभी बन सकती है जब राजनीतिज्ञों के मुंह से कोई एक शब्द भी संप्रदाय के विषय में नहीं सुना जाएगा।कठमुल्लावाद का शिकार हुआ दाराशिकोह
हम जिस काल की बात कर रहे हैं उस काल की राजनीति तो घृणास्पद स्वरूप तक साम्प्रदायिक थी। अत: दारा को बादशाह बनाने से रोकने के लिए इस्लाम के कठमुल्ला सक्रिय हुए और उन्हें मोहरा औरंगजेब मिल गया, या कहिए कि औरंगजेब ने कठमुल्लों को मोहरा बनाकर इस्लाम का अपने हित में प्रयोग किया और वह अपने ही परिवार को समाप्त करने पर लग गया। कठमुल्लों ने औरंगजेब को और औरंगजेब ने कठमुल्लों को अपनी आवश्यक समझा और प्रयोग किया। इसलिए 1658 ई. में शाहजहां को गद्दी से हटाने के समय ही यह निश्चित हो गया था कि अब औरंगजेब इस्लाम की व्याख्या अपने ढंग से करेगा और कठमुल्ला अपने ढंग से। परंतु यह भी निश्चित था कि दोनों की व्याख्या में समरूपता होगी, एक दिन को रात कहेगा तो दूसरा दूर से ही उसके समर्थन में चिल्लाएगा-''जी हुजूर! तारे मुझे भी दिखाई दे रहे हैं।''
हिन्दू शक्ति और दाराशिकोह
भविष्य के इस भयानक हिंदू द्रोही गठबंधन को रोकने के लिए हिंदू समाज के तत्कालीन गणमान्य लोग सतर्क और सावधान थे। अत: उनका चिंतन भी सही दिशा में कार्य कर रहा था। जब बादशाह शाहजहां बीमार हुआ और उसने अपने पुत्र दाराशिकोह को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा तो औरंगजेब ने कपटपूर्ण राग अलापा कि-''मैं हज करने मक्का चला जाऊंगा। मुझे इस समय एक ही चिंता है कि दाराशिकोह जैसा काफिर व्यक्ति बादशाह न बने। यदि वह बादशाह बन गया तो 'इस्लाम खतरे' में पड़ जाएगा।'' उसके पश्चात औरंगजेब ने जो कुछ किया उससे देश में सर्वत्र अराजकता का वातावरण व्याप्त हो गया।
दारा शिकोह इतिहास की सबसे बड़ी सेना लेकर औरंगजेब से लड़ने गया था। लेकिन उसकी सेना में सैनिकों से ज्यादा छोटे दुकानदार, मजदूर, दस्तकार और यहाँ तक की भांडे-बर्तन बेचने वाले भी शामिल थे। उन्हें लड़ने का कोई अनुभव नहीं था, सिर्फ दारा शिकोह के आदेश पर उन्हें सेना में भर्ती कर लिया गया था। दारा शिकोह के पास 4 लाख सैनिक थे और औरंगजेब के पास सिर्फ 40 हजार।
दारा को हराने में उसके अपने ही विश्वासपात्र का हाथ था। दारा शिकोह ने कभी उसे बुरी तरह से अपमानित किया था। उसने दारा से जंग के मैदान में बदला चुकाया। दारा हाथी पर थे और वह जंग लगभग जीत चुके थे। औरंगजेब के पास गिनती के सैनिक रह गए थे। उसी वक्त उनके एक विश्वासपात्र खलीलुल्लाह ने कहा- हजरत सलामत, आपको जीत मुबारक। अब आप हाथी से उतरकर घोड़े पर बैठिए। पता नहीं कब कोई तीर आपको आकर लग जाए। अगर ऐसा हो गया तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। दारा शिकोह बिना सोच विचार किए हाथी से उतरकर घोड़े पर सवार हो गए।
उधर जैसे ही दारा हाथी से उतरे, उनके सैनिकों के बीच दारा के मरने की अफवाह फैल गई। औरंगजेब ने इसका फायदा उठाया। दारा के सैनिक उनका साथ छोड़कर भाग गए और औरंगजेब और मुराद की मुट्ठीभर सेना ने जंग जीत लिया।
औरंगजेब ने जब साल 1659 में एक भरोसेमंद सिपाही के जरिए दारा शिकोह का सर कलम करवा दिया था तब सिर आगरा में दफनाया गया था और धड़ को दिल्ली में। शाहजहाँनामा के मुताबिक औरंगजेब से हारने के बाद दारा शिकोह को जंजीरों से जकड़कर दिल्ली लाया गया और उसके सिर को काटकर आगरा फोर्ट भेजा गया, जबकि उनके धड़ को हुमायूँ के मकबरे के परिसर में दफनाया गया था।
दारा शिकोह पहुंचा गुरू हरिराय जी की शरण में
दारा शिकोह की इमेज लिबरल मुस्लिम की मानी जाती है। वो हिंदू और इस्लामिक ट्रेडिशन को साथ लेकर चलने वाले मुगल थे। दारा शिकोह ने भगवद्गीता और 52 उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था। कहा-लिखा तो ये भी गया है कि दारा के सभी धर्मों को साथ लेकर चलने के ख्याल के कारण ही कट्टरपंथियों ने उन्हें इस्लाम-विरोधी करार दे दिया था। इन्हीं हालातों का फायदा उठाकर औरंगज़ेब ने दारा के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया था। एक सच्चाई यह भी है कि जहाँ एक ओर शाहजहाँ ने दारा शिकोह को सैन्य मुहिमों से दूर रखा वहीं औरंगजेब को 16 वर्ष की आयु में एक बड़ी सैन्य मुहिम की कमान सौंप दी।
दारा शिकोह एक सच्चा कर्मनिष्ठ सहृदयी व्यक्ति था, वह औरंगजेब के अत्याचारों से बचते बचाते पंजाब की गुरूभूमि पर जा पहुंचा। यहां उस समय हिन्दू धर्म रक्षक गुरू के रूप में गुरू हरिराय जी का मार्गदर्शन लोगों को मिल रहा था। दाराशिकोह ने गुरू हरिराय जी से आशीर्वाद लेना चाहा। जिसके लिए वह गुरूदेव के दर्शनों के लिए उनके निवास स्थान कीरतपुर के लिए चल दिया। तब हरिराय जी कीरतपुर में नहीं थे। उनके गोइंदवाल होने की सूचना मिली तो वह वहीं मिलने के लिए चल दिया।
औरंगजेब भी अपने भाई की हर गतिविधि की जानकारी ले रहा था कि वह कब कहां है और किन लोगों से मिलना जारी रखे हुए है, साथ ही मिलने वाले व्यक्ति उसकी ओर किस दृष्टिकोण से बढ़ रहे हैं, स्वागत सत्कार कर रहे हैं, या उसे उपेक्षित कर रहे हैं?
गुरू हरिराय ने किया दारा शिकोह का स्वागत
गुरू हरिराय ने एकसच्चे मानव का उसी रूप में स्वागत किया जिसका वह पात्र था। दाराशिकोह को अपने समक्ष उपस्थित पाकर गुरू हरिराय कृतकृत्य थे और दारा गुरूजी के समक्ष अपने आप को पाकर भाव विभोर था। ये दोनों महापुरूष भविष्य के संसार के लिए एक सुंदर सपना लेकर मिले थे, पर इनके इस मधुर मिलन पर औरंगजेब की गिद्घ दृष्टि भी लगी थी।
दारा शिकोह विद्वान था। वो भारतीय उपनिषद और भारतीय दर्शन की अच्छी जानकारी रखता था। इतिहासकार बताते हैं कि वो विनम्र और उदार ह्रिदय का था। दारा के सबसे बड़े योगदानों में उपनिषदों का फारसी भाषा में अनुवाद करना माना जाता है। इन अनुवादित किताबों को उसने ‘सिर्रेअकबर‘ यानी महान रहस्य का नाम दिया था। फारसी भाषा में अनुवाद कराए जाने का मुख्य कारण ये था कि फारसी मुगलिया कोर्ट में इस्तेमाल की जाती थी। हिंदुओं का भी विद्वान वर्ग इस भाषा के साथ बखूबी परिचित था।
इतिहासकार लिखता है :-''(गुरूजी से मिलकर) दाराशिकोह का क्षीण आत्मबल गुरूदेव का स्नेह पाकर पुन: जीवित हो उठा। किंतु वह त्यागी प्रवृत्ति का स्वामी अब सम्राट बनने की इच्छा नहीं रखता था। वह गुरूदेव के श्रीचरणों में प्रार्थना करने लगा, मुझे तो अटल साम्राज्य चाहिए। मैं इस क्षणभंगुर ऐश्वर्य से मुक्त होना चाहता हूं। गुरूदेव ने उसे सांत्वना दी और कहा-यदि तुम चाहो तो हम तुम्हें तुम्हारा खोया हुआ साम्राज्य वापस दिला सकते हैं, किंतु दारा गुरूदेव के सान्निध्य में ब्रहम ज्ञान की प्राप्ति कर चुका था। उसे बैराग्य हो गया। वह कहने लगा कि मुझे तो अटल राज्य ही चाहिए। गुरूदेव उसकी मनोकामना देख अति प्रसन्न हुए-उन्होंने उसे आशीष दिया और कहा ऐसा ही होगा।''
औरंगजेब की विध्वंसात्मक शक्तियां
समाज के जिस सौंदर्य का रस इन दो महापुरूषों के वात्र्तालाप से टपक रहा था, उसके स्रोत को बंद कर देने के लिए औरंगजेब की विध्वंसात्मक शक्तियां भी कम सक्रिय नहीं थीं। उसे जैसे ही ज्ञात हुआ कि दाराशिकोह गुरू हरिराय के पास है, तो वह भी उसका पीछा करता हुआ वहीं के लिए चल दिया। दाराशिकोह को जब औरंगजेब के आने की सूचना मिली तो वह गुरूजी से विदा लेकर लाहौर की ओर को चल दिया। साथ ही गुरूजी से विनती करने लगा कि वह जैसे भी हो सके औरंगजेब को एक दिन के लिए यहां रोक लें, जिससे कि वह पर्याप्त दूरी तक अपनी यात्रा पूर्ण कर ले और औरंगजेब के संकट से अपने आपको सुरक्षित रखने मेें सफल हो सके। गुरूजी ने दाराशिकोह को वचन दिया कि वह औरंगजेब को व्यास नदी के किनारे एक दिन का विलंब करा देंगे।
गुरूजी ने अपनी योजना और दिये वचन को पूर्ण करने के लिए व्यास नदी के तट की सभी नौकाओं को अपने नियंत्रण में ले लिया। इससे औरंगजेब के सैन्य बल को नदी पार करने के लिए नौकाओं की उपलब्धता न होने से उसे एक दिन का विलंब हो गया। जिससे दाराशिकोह तब तक पर्याप्त दूरी तक चला गया। वहां वह एक संन्यासी के रूप में रहने लगा, पर औरंगजेब के किसी गुप्तचर ने उसका पता लगा लिया और उसे छल से वह दिल्ली ले आया।
औरंगजेब की दुष्टता और दारा शिकोह
औरंगजेब की दुष्टता अब नंगा नाच करने लगी, उसे भाई क्या मिला, मानो कई दिन के भूखे किसी नरभक्षी को उसका मनचाहा शिकार ही मिल गया था। अत: वह अपने संत जैसे भाई दाराशिकोह को अपने मध्य पाकर उसी प्रकार झूम उठा जिस प्रकार की ऐसे समय में उस जैसे नरभक्षी से आशा की जा सकती है।
सिर काटकर भेज दिया शाहजहां के पास
जंग हारने के बाद दारा शिकोह यहाँ-वहाँ भटकते रहे। कभी वो मुल्तान तो कभी थट्‌टा और कभी अजमेर भागे। आखिरकार औरंगजेब के एक सैनिक के हाथों वो पकड़े गए। दिल्ली में उन्हें बुरी तरह से अपमानित किया गया। उन्हें बीमार और गंदे हाथी पर घुमाया गया। दारा शिकोह को भिखमंगों जैसे कपड़े पहनाए गए थे।
दारा शिकोह को औरंगजेब ने कैदखाने में डाल दिया। बाद में एक रात जब दारा और उनका बेटा कैदखाने में ही अपने लिए खाना बना रहे थे तो औरंगजेब के एक गुलाम नजीर ने उनका सिर काट डाला। 
औरंगजेब ने बड़ी क्रूरता से दाराशिकोह की हत्या दिल्ली के चांदनी चौक में करायी और उसकी नीचता तब कहीं अधिक स्पष्ट हुई जब उसने अपने संत सम भाई दारा का कटा हुआ सिर अपनी जेल में बंद अपने पिता शाहजहां के पास एक थाली में रखकर 'ईद मुबारक' कहकर भेजने की धृष्टता की। शाहजहां ने जब अपने प्रिय पुत्र का सिर इस प्रकार देखा तो वह मारे वेदना के करूण चीत्कार कर उठा था। पर अब वह इससे अधिक कुछ कर भी नहीं सकता था।
अवीक चंदा की किताब ‘दारा शिकोह, द मैन हू वुड बी किंग’ के मुताबिक, औरंगजेब ने दारा शिकोह के कटे हुए सिर को शाहजहाँ के पास तोहफे के तौर पर भिजवाया और उनके धड़ को दिल्ली में ही हुमायूँ के मकबरे में दफना दिया गया। वहीं इटैलियन इतिहासकार निकोलाओ मनूची ने अपनी किताब ‘स्टोरिया दो मोगोर’ में लिखा है कि औरंगजेब के आदेश पर दारा के सिर को ताजमहल के प्रांगण में गाड़ दिया गया, क्योंकि उसका मानना था कि शाहजहाँ जब भी अपनी बेगम के मकबरे को देखेंगे तो उन्हें बार-बार ये ख्याल आएगा कि उनके सबसे प्रिय और बड़े बेटे दारा का सिर वहाँ सड़ रहा है। 
दारा के परिवार का भी बुरा हाल हुआ। उनके एक बेटे को मार दिया गया। दूसरे को ग्वालियर के किले में कैद कर लिया गया। दारा की बेगम अपनी जान बचाने के लिए लाहौर भाग गई। बाद में उन्होंने जहर खाकर जान दे दी।
औरंगजेब ने दारा शिकोह की हत्या करने वाले गुलाम को भी नहीं छोड़ा। दारा को अपमानित कर हाथी पर घुमाने वाले जीवन खाँ और उनका सिर काटने वाले गुलाम नजीर को पहले उसने इनाम देकर विदा किया। फिर रास्ते में दोनों के सिर कटवा दिए।
औरंगज़ेब एक धोखेबाज़ 
औरंगजेब ने दारा शिकोह की हत्या करने वाले गुलाम को भी नहीं छोड़ा। दारा को अपमानित कर हाथी पर घुमाने वाले जीवन खाँ और उनका सिर काटने वाले गुलाम नजीर को पहले उसने इनाम देकर विदा किया। फिर रास्ते में दोनों के सिर कटवा दिए।
ये एक ऐतिहासिक तथ्य है कि जहाँ औरंगजेब ने हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं, मान्यताओं को नष्ट करने का काम किया, वहीं उसके भाई दारा शिकोह ने हमेशा सर्वधर्म समभाव की बात कही। दारा शिकोह धार्मिक सहिष्णुता और धर्म निरपेक्षता का हिमायती रहा। दारा शिकोह के लिए दूसरे धर्मों की आस्था के बारे में जानकारी हासिल करना राजनीति से प्रेरित नहीं था। इसमें किसी राज्य विस्तार या राज्य संभालने जैसी कोई कवायद नहीं शामिल थी। 
अब गुरू हरिराय जी की बारी थी
अपने शत्रु दाराशिकोह से अब औरंगजेब पूर्णत: निश्चिंत हो गया। पर उसे गुरू हरिराय का वह कृत्य बार-बार स्मरण आता था कि उसने किस प्रकार दाराशिकोह की सहायता की थी उसे आशीर्वाद दिया था, और उसे एक दिन विलंब से नदी पार करने के लिए विवश कर दिया था। अब मानवता राजनीति के दण्ड की पात्र बनने लगी। सियासत से लोगों को घृणा ही इसलिए हुई है कि इसने अनेकों बार मानवता को दंडित कर अपने धर्म को कलंकित और लज्जित किया है। आज पुन: राजनीति का धर्म ही उसके समक्ष अपराधी की मुद्रा में सिर झुकाये खड़ा था, तब उससे नैतिकता और मानवता की अपेक्षा कैसे की जा सकती थी? जो लोग गुरूजी से किसी कारण से भी ईष्र्या करते थे उन्होंने भी बादशाह को उनके प्रति भडक़ाने का काम किया।
औरंगजेब ने दाराशिकोह से गुरू हरिराय के मिलने को विद्रोह का नाम देना आरंभ किया। जिससे कि उन्हें कैद करने की दिशा में कार्य किया जा सके, अपनी योजना को श्रेय चढ़ाने के लिए औरंगजेब ने एक पत्र गुरूदेव को लिखा। जिसमें उनके और दाराशिकोह के मिलने का उसने यह कहकर उपहास किया कि आपने तो दारा को दिल्ली का सिंहासन दिलाना चाहा था पर मैंने उसे मृत्युदंड दे दिया है। अत: आप झूठे गुरू हुए जो कि अपना वचनपूर्ण न कर सके।
इतिहासकार भाई जसवीरसिंह 'श्री गुरू प्रताप ग्रंथ' में लिखते हैं-''इस पत्र के उत्तर में श्री हरिराय जी ने लिखा-हमने तो दाराशिकोह को कहा था-तुम्हें सत्ता वापिस दिलवा देते हैं , किंतु वह अटल सिंहासन चाहता था। अत: हमने उसे अटल सिंहासन उसकी अपनी इच्छा के अनुसार दे दिया है। यदि तुम्हें हमारी बात पर विश्वास न हो तो रात को सोते समय तुम दारा का ध्यान करके सोना तो वह प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो जाएगा।''
औरंगजेब ने गुरू की बात को अनुभव करके देखा
''इस पत्र के मिलते ही औरंगजेब ने वैसा ही किया। सपने में औरंगजेब ने देखा कि एक अद्भुत दरबार सजा हुआ है, जिसमें बहुत से ओहदेदार शाही पोशाक में दारा शिकोह का स्वागत कर रहे हैं। फिर उसने अपनी ओर देखा तो उसके हाथ में झाडू है जिससे सजे हुए दरबार के बाहर वह सफाई कर रहा है। इतने में एक संतरी आता है और उसे लात मारकर कहता है कि यह तेरी सफाई का समय है, देखता नहीं महाराजा दाराशिकोह का दरबार सज चुका है। लात पडऩे की पीड़ा ने औरंगजेब की निद्रा भंग कर दी, और उसे उसका बहुत कष्ट हो रहा था। बाकी की रात औरंगजेब ने बहुत बेचैनी से काटी। सुबह होते ही उसने एक विशाल सैन्यबल श्री गुरू हरिराय को गिरफ्तार करने के लिए जालिम खान के नेतृत्व में भेजा।''
अब शंका की जा सकती है कि क्या ऐसा संभव है कि औरंगजेब को दाराशिकोह इस प्रकार सपने में दिखाई दिया हो? इस शंका समाधान यह है कि महापुरूष किसी भी व्यक्ति के मनोविज्ञान को पढऩे-समझने में बड़े प्रवीण होते हैं। उस समय चाहे औरंगजेब गुरू हरिराय जी पर व्यंग्य कस रहा था, परंतु यह भी सच होगा कि एक दारा जैसे संत को समाप्त करके उसकी आत्मा उसे अवश्य कचोटती होगी। उसका मन उस समय उसे धिक्कारता होगा, इसलिए दारा का चित्र बार-बार उसके मन में आता-जाता होगा।
गुरू हरिराय के कहने पर चित्र की यह आवृत्ति और भी अधिक तीव्रता से बनी होगी, उस दिन उसका चिंतन भी दारा के विषय में यही रहा होगा कि वह कैसे अटल साम्राज्य का भोग कर रहा होगा। बस, इसी चिंतन से उसे उक्त सपना दिख गया होगा।
मारा गया जालिमखां
जालिम जिस जुल्म को ढहाने चला था, उसमें उसे सफलता नही मिली। कारण कि जब वह गुरू हरिराय को गिरफ्तार करने के लिए सैन्य बल के साथ पंजाब की ओर बढ़ा तो मार्ग में ही उसकी सेना हैजा की शिकार हो गयी, और वह स्वयं भी हैजा का शिकार होकर मार्ग में ही मृत्यु को प्राप्त हो गया। इस प्रकार एक महापुरूष का उत्पीडऩ करने चले एक आततायी को प्रकृति ने भी क्षमा नही किया और वह अपने गंतव्य पर पहुंचने से तथा मंतव्य को पूर्ण करने से पूर्व ही इस असार संसार से चल बसा।
औरंगजेब की धृष्टता और दुष्टता निरंतर जारी रही
इसके पश्चात भी औरंगजेब शांत नही बैठा, उसे तो हठ थी कि जैसे भी हो गुरू हरिराय का अंत किया जाए। अत: जालिम खां के देहांत के उपरांत उसने फिर गुरू हरिराय जी की गिरफ्तारी के लिए कंधार के रहने वाले एक अधिकारी को भेजा। इसका नाम दूंदे था। ईश्वर की अनुकंपा देखिये कि गुरूजी पुन: इस अधिकारी की पकड़ में नहीं आ सके, उसकी सेना में परस्पर वेतन आदि के वितरण को लेकर ठन गयी, यह पारस्परिक कलह इतनी बढ़ी कि शत्रु की सेना में परस्पर ही मारकाट फैल गयी। इसी मारकाट में सेनापति दूंदे भी मारा गया। फलस्वरूप गुरूजी की पुन: रक्षा हो गयी। इसके उपरांत भी औरंगजेब ने सहारनपुर के नाहर खान को एक विशाल सेना के साथ कीरतपुर भेजने का आदेश दिया। इस बार इस नायक को औरंगजेब ने यह भी आदेश दिया कि हरिराय को तो कैद करना ही है, साथ ही उसकी नगरी कीरतपुर का भी सर्वनाश करके आना है।
गुरूजी पर रही ईश्वर की अनुकंपा
ईश्वर जिनकी सहायता करता है उनके लिए अदभुत घटनाएं होती हैं, और वह किसी भी व्यक्ति के प्रकोप से बड़ी सहजता से बचने में सफल हो जाते हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। जब नाहर खां की सेना यमुना नदी को पार करने के लिए उसके तट पर शिविर लगाये बैठी थी तभी नदी में अचानक बाढ़ आ गयी, जिस कारण नाहर खां की सेना के अधिकांश सैनिक उस बाढ़ में बह गये। नाहरखां को भारी क्षति, उठानी पड़ी। इस घटना का शेष बचे सैनिकों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा और उन्होंने सोचा कि बार-बार के आक्रमण यदि प्राकृतिक प्रकोपों के कारण असफल हो रहे हैं तो इसमें निश्चय ही गुरू हरिराय की किसी सिद्घि का योगदान है। अत: उन्होंने अपनी मृत्यु को अवश्यम्भावी जानकर आगे बढऩे से इनकार कर दिया और वह युद्ध से पूर्व ही भाग गये। इस प्रकार तीन बार के आक्रमणों में असफल रहे मुगल अधिकारी शांत हो गये। गुरूजी का सचमुच ईश्वर की विशेष अनुकंपा रही।
औरंगजेब ने लिया छल का सहारा
अब औरंगजेब के पास केवल छल-कपट का मार्ग ही शेष बचा था इसलिए उसने गुरू हरिराय को अपने जाल में फंसाने के लिए उनको एक पत्र लिखा और बड़े सम्मानभाव का प्रदर्शन करते हुए संबंधों को प्रेमपूर्ण बनाने का वचन देते हुए उनसे भेंट करने की इच्छा व्यक्त की।
अवलोकन करें:-


NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
पिताश्री एम.बी.एल. निगम श्री केवल रतन मलकानी अस्सी के दशक में विश्व चर्चित पत्रकार श्री केवल रतन मलकानी, मुख्य सम्प....
About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित अमेरिकी वैदिक शिक्षक डेविड फ्रॉली ने बुधवार (अगस्त 5, 2020) को कहा कि राम मंदिर के निर्माण ...
About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार ऐसा लगता है मानो जैसे-जैसे समय बीत रहा है, CAA-NRC का विरोध अब शाहीन बाग़ से होते हुए अपने असल....
About this website

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
साभार : यूट्यूब आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार शीर्षक देख आप सोंचगे...
गुरूजी ने जब औरंगजेब का पत्र सुना तो उन्होंने गंभीरता से विचार किया और कह दिया कि बादशाह का स्वभाव कपटी है। अत: हम उससे मिलना उचित नहीं समझते। परंतु उन्होंने अपने पुत्र रामराय को अपना प्रतिनिधि बनाकर बादशाह के पास भेजना अवश्य स्वीकार कर लिया। पर रामराय औरंगजेब की चाटुकारिता में लग गया और गुरूवाणी में आये शब्द 'मिट्टी मुसलमान की' को 'मिट्टी बेईमानी की' कहकर बादशाह को प्रसन्न करने लगा। इसकी सूचना पाकर गुरू हरिराय ने अपने इस पुत्र को अपने घर से निष्कासित कर दिया था। वह नहीं चाहते थे उनका पुत्र सत्य से समझौता करे।