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UNESCO ने दीपावली को घोषित किया अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर, प्रधानमंत्री मोदी ने दी बधाई


भारत के लिए यह एक ऐतिहासिक और बेहद खुशी का पल है। दुनिया भर में प्रकाश और उल्लास फैलाने वाले त्योहार दिवाली को यूनेस्को (UNESCO) ने अपनी प्रतिष्ठित अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage) की लिस्ट में शामिल कर लिया है। यह न सिर्फ दीपावली के लिए, बल्कि भारत की समग्र सांस्कृति
क पहचान के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

इस घोषणा के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुरंत देशवासियों को बधाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर कहा कि “भारत और दुनिया भर के लोग बहुत खुश हैं। हमारे लिए, दीपावली हमारी संस्कृति और रीति-रिवाजों से बहुत करीब से जुड़ी हुई है। यह हमारी सभ्यता की आत्मा है। यह रोशनी और नेकी का प्रतीक है। दीपावली को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर लिस्ट में शामिल करने से इस त्योहार की दुनिया भर में लोकप्रियता और बढ़ेगी। प्रभु श्री राम के आदर्श हमेशा हमारा मार्गदर्शन करते रहें।”

यह अहम फैसला यूनेस्को के 20वें सत्र में लिया गया, जो वर्तमान में दिल्ली के लालकिला में 8 दिसंबर से 13 दिसंबर तक चल रहा है। इस सत्र के दौरान हुई अहम बैठक में दीपावली को यूनेस्को की सूची में शामिल करने का निर्णय लिया गया। यूनेस्को ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पोस्ट पर इसका जानकारी साझा की। यूनेस्को ने लिखा कि ‘अमूर्त धरोहर की लिस्ट में नया नाम: दीपावली, भारत। बधाई हो!’

दिवाली को विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने से भारत की पारंपरिक कला, रीतियों, सामूहिक उत्सव और सामाजिक जुड़ाव को और मजबूती मिलेगी। दीयों की रोशनी, रंगोली, पूजा-अर्चना, परिवारों का मिलन—इन सबमें समाई भारतीयता को अब दुनिया भर में एक खास पहचान मिल गई है। देश में भी इसे लेकर जबरदस्त उत्साह है। लोग इसे भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की एक बड़ी सफलता मान रहे हैं। विदेशों में बसे भारतीयों के लिए भी यह गर्व का बड़ा मौका बन गया है, क्योंकि उनका प्रिय त्योहार अब आधिकारिक रूप से वैश्विक धरोहर बन चुका है। विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने अपने एक्स पोस्ट में खुशी जताते हुए लिखा कि यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में ‘दीपावली’ का नाम शामिल होने के बारे में जानकर खुशी हुई। यह त्योहार के बहुत ज्यादा सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व और लोगों को एक साथ लाने में इसकी भूमिका को पहचान देता है।

दीपावली के जुड़ने के साथ ही, भारत की ओर से इस प्रतिष्ठित अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में कुल 16 तत्व शामिल हो गए हैं। यह संख्या वैश्विक मंच पर भारत की असाधारण सांस्कृतिक और पारंपरिक समृद्धि को दर्शाती है। इससे पहले भारत की 15 सांस्कृतिक परंपराएं, जिनमें कोलकाता की दुर्गा पूजा, गुजरात का गरबा, योग, कुंभ मेला, और वैदिक मंत्रोच्चारण की परंपरा शामिल हैं, इस वैश्विक सूची में अपनी जगह बना चुकी हैं।

उत्तर प्रदेश : वैश्विक मंच तक पहुँची अवधी व्यंजनों की महक, UNESCO की ‘क्रिएटिव सिटीज’ सूची में शामिल हुआ लखनऊ

नेस्को क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ की उपाधि पाने वाला भारत का दूसरा शहर बना लखनऊ (साभार: दैनिक भास्कर, अमृत विचार)
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को अपनी समृद्ध और विविध पाक कला परंपरा के लिए संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की ‘क्रिएटिव सिटीज’ सूची में शामिल किया गया है। UNESCO की महानिदेशक ऑड्रे अजोले ने इस साल 58 नए शहरों को ‘रचनात्मक शहरों’ के नेटवर्क का हिस्सा बनाया, जिनमें लखनऊ को ‘पाक कला’ श्रेणी में चुना गया है।

यह घोषणा शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को उज्बेकिस्तान के समरकंद में हुई यूनेस्को की 43वीं जनरल कॉन्फ्रेंस के दौरान ‘वर्ल्ड सिटीज डे 2025’ पर की गई। उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि लखनऊ की इस उपलब्धि के पीछे पर्यटन विभाग की मेहनत रही, जिसने शहर के नामांकन का प्रस्ताव तैयार कर जनवरी 2025 में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को भेजा था।

मंत्रालय द्वारा जरूरी समीक्षा किए जाने के बाद भारत सरकार ने मार्च में इसे UNESCO के पास भेजा, जिसके चलते शुक्रवार (31 अक्टूबर 2025) को लखनऊ को यह सम्मान मिला। भारत के यूनेस्को में स्थायी प्रतिनिधिमंडल ने इस उपलब्धि को देश के लिए गर्व का क्षण बताया और जानकारी दी कि ‘वर्ल्ड सिटीज डे’ के अवसर पर लखनऊ को ‘यूनेस्को क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ नामित किया गया है।

लखनऊ के स्वादिष्ट व्यंजनों को मिला वैश्विक सम्मान

यह सम्मान लखनऊ की समृद्ध अवधी पाक परंपरा, चाट, कबाब, बिरयानी और मिठाइयों जैसे स्वादिष्ट व्यंजनों की वैश्विक पहचान का प्रतीक है। इससे पहले भारत से केवल हैदराबाद को यह सम्मान प्राप्त था और अब लखनऊ इस प्रतिष्ठित सूची में शामिल होने वाला दूसरा भारतीय शहर बन गया है।

UNESCO ने बताया कि इस सम्मान का उद्देश्य उन शहरों को प्रोत्साहित करना है जो रचनात्मकता (क्रिएटिवीटी) और संस्कृति को सतत विकास का आधार बनाते हैं। संगठन की महानिदेशक अजोले ने कहा कि रचनात्मक शहर यह साबित करते हैं कि संस्कृति और क्रिएटिव उद्योग न केवल आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देते हैं बल्कि सामाजिक सामंजस्य और स्थानीय विकास के भी सशक्त माध्यम हैं।

UNESCO का क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क (UCCN) वर्ष 2004 में शुरू किया गया था, ताकि ऐसे शहरों को जोड़ा जा सके जो संस्कृति के माध्यम से समावेशी और सतत विकास को आगे बढ़ाते हैं। यह नेटवर्क उन पहलों को प्रोत्साहित करता है जो रोजगार के अवसर बढ़ाने, सांस्कृतिक जीवन्तता बनाए रखने और सामाजिक एकता को सशक्त करने में सहायक हैं।

सीएम योगी बोले- ऐतिहासिक उपलब्धि

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है। सीएम योगी ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के यशस्वी मार्गदर्शन में भारत की परंपरा, संस्कृति और मूल्यों को वैश्विक पटल पर निरंतर नई पहचान और प्रतिष्ठा प्राप्त हो रही है।” उन्होंने आगे लिखा, “इस ऐतिहासिक उपलब्धि की प्रदेश वासियों को हार्दिक बधाई!”

विश्वभर के शहरों ने रचनात्मकता से बढ़ाया अपनी सांस्कृतिक पहचान का मान

लखनऊ के अलावा इस साल संगीत, डिजाइन, फिल्म, पाककला और साहित्य जैसी विभिन्न श्रेणियों में कई अन्य शहर भी शामिल किए गए हैं, जिनमें संगीत के लिए केन्या का किसुमु और अमेरिका का न्यू ऑरलियंस, डिजाइन के लिए सऊदी अरब का रियाद, पाक कला के लिए पुर्तगाल का मातोसिन्होस और इक्वाडोर का कुएनका शामिल हैं।

वहीं फिल्म के लिए मिस्र के गीजा, वास्तुकला के लिए फिनलैंड के रोवेनेमी, मीडिया कला के लिए इंडोनेशिया के मलंग और साहित्य के लिए ब्रिटेन के एबरिस्टविथ को शामिल किया गया है। अगला वार्षिक सम्मेलन वर्ष 2026 में मोरक्को के एस्सौइरा शहर में आयोजित किया जाएगा, जिसे 2019 में संगीत श्रेणी में यूनेस्को की सूची में स्थान मिला था।

कौन थे राजेंद्र चोल, जिन्होंने कंबोडिया-इंडोनेशिया तक फहराई सनातन की विजय पताका: मोदी ने तमिलनाडु के जिस मंदिर में की पूजा, क्यों पड़ा गंगईकोंडा चोलपुरम उसका नाम

                               गंगईकोंडा चोलपुरम में पीएम मोदी (फोटो साभार: X_Narendra Modi)
तमिलनाडु के अरियालुर जिले में बसे छोटे से गाँव गंगईकोंडा चोलपुरम में रविवार (27 जुलाई 2025) को एक भव्य समारोह हुआ। इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चोल साम्राज्य के महान सम्राट राजेंद्र चोल-प्रथम की जयंती और उनकी दक्षिण-पूर्व एशिया की समुद्री यात्रा के 1,000 साल पूरे होने का उत्सव मनाया। इस अवसर पर पीएम मोदी ने गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर में पूजा-अर्चना की, एक स्मारक सिक्का जारी किया और चोल वास्तुकला व शैव धर्म पर आधारित प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।

यह आयोजन न केवल चोल साम्राज्य की समृद्ध विरासत को याद करने का मौका था, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक एकता और आधुनिक भारत के विकास के संकल्प को भी दर्शाता था। आइए, गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर, चोल वंश और राजेंद्र चोल की उपलब्धियों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

गंगईकोंडा चोलपुरम एक ऐतिहासिक नगरी

 गंगईकोंडा चोलपुरम तमिलनाडु के अरियालुर जिले में जयकोंडम के पास एक छोटा सा गाँव है, जो कभी चोल साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। इसे 1025 ईस्वी में राजेंद्र चोल-प्रथम ने अपनी राजधानी बनाया और लगभग 250 वर्षों तक यह चोल साम्राज्य का केंद्र रहा।

इस नगरी का नाम गंगा नदी की विजय के प्रतीक के रूप में रखा गया, जिसका अर्थ है ‘गंगा को जीतने वाले चोल की नगरी’। आज यह गाँव अपनी प्राचीन भव्यता के लिए प्रसिद्ध है, खासकर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त बृहदेश्वर मंदिर के लिए।

चोल वास्तुकला का अनमोल रत्न है बृहदेश्वर मंदिर

गंगईकोंडा चोलपुरम के बृहदेश्वर मंदिर को गंगईकोंडा चोलेश्वरम मंदिर भी कहा जाता है। ये चोल वास्तुकला का एक शानदार उदाहरण है। इस मंदिर का निर्माण 1035 ईस्वी में राजेंद्र चोल-प्रथम ने करवाया था। यह मंदिर तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर से प्रेरित है, जिसे उनके पिता राजराजा चोल ने बनवाया था। हालाँकि गंगईकोंडा का मंदिर तंजावुर के मंदिर से छोटा है, लेकिन इसकी मूर्तिकला और बारीक नक्काशी इसे और भी खास बनाती है।

मंदिर की विशेषताएँ

वास्तुकला: मंदिर द्रविड़ शैली में निर्मित है और इसका आधार वर्गाकार है। इसका विमान (मंदिर का शिखर) 55 मीटर ऊँचा है, जो तंजावुर के मंदिर से 3 मीटर छोटा है। इतिहासकारों का मानना है कि राजेंद्र ने अपने पिता के मंदिर के प्रति सम्मान दिखाने के लिए इसे थोड़ा छोटा रखा। विमान का आकार थोड़ा अवतल (कर्व्ड) है, जो इसे तंजावुर के मंदिर से अलग बनाता है। इसमें आठ स्तर हैं, जिनमें पौराणिक कथाओं, शिव, विष्णु, और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और नक्काशी उकेरी गई हैं।
शिवलिंग: मंदिर का मुख्य गर्भगृह भगवान शिव को समर्पित है, जहाँ 4 मीटर ऊँचा और 18 मीटर परिधि वाला एक विशाल शिवलिंग स्थापित है, जो दुनिया के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है।
मूर्तिकला: मंदिर की दीवारों पर करीब 50 मूर्तियाँ और राहतें हैं, जिनमें नटराज, सरस्वती, और शिव द्वारा भक्त को माला पहनाने वाली मूर्ति सबसे प्रमुख हैं। एक विशेष मूर्ति में राजेंद्र चोल को छोटे रूप में दर्शाया गया है, जिसमें शिव और पार्वती उन्हें विजय की माला पहना रहे हैं।
नंदी मूर्ति: मंदिर के प्रांगण में एक विशाल नंदी (शिव का वाहन बैल) की मूर्ति है, जो गर्भगृह की ओर 200 मीटर की दूरी पर अक्षीय रूप से संरेखित है।
अन्य मंदिर और संरचनाएँ: मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिर, गोपुरम और नौ ग्रहों की एकाश्म (मोनोलिथिक) मूर्तियाँ हैं। एक शेर के आकार का कुआँ भी 19वीं सदी में जोड़ा गया।
चोल गंगा झील: राजेंद्र ने गंगा नदी का जल उत्तर भारत से लाकर इस मंदिर के पास एक कृत्रिम झील में डाला, जिसे चोल गंगा झील कहा जाता है। इसे ‘विजय का तरल स्तंभ’ भी कहा गया।

यूनेस्को विश्व धरोहर

2004 में यूनेस्को ने गंगईकोंडा चोलपुरम के बृहदेश्वर मंदिर को तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर और दारासुरम के ऐरावतेश्वर मंदिर के साथ ‘ग्रेट लिविंग चोल मंदिर’ के रूप में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। ये मंदिर आज भी सक्रिय हैं और इनमें पूजा-अर्चना होती है। मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित स्मारक के रूप में देखरेख की जाती है।

मंदिर में उत्सव और पूजा

मंदिर में चार बार दैनिक पूजा होती है: कालसंधि (सुबह 8:30 बजे), उचिकालम (दोपहर 12:30 बजे), सायरक्षाई (शाम 6:00 बजे), और अर्धजामम (रात 7:30-8:00 बजे)। प्रमुख त्योहारों में शिवरात्रि (मासी माह, फरवरी-मार्च), ऐप्पसी पूर्णिमा (ऐप्पसी माह, अक्टूबर-नवंबर) और तिरुवदिराई (मार्गझी माह, दिसंबर-जनवरी) शामिल हैं। ऐप्पसी उत्सव के दौरान भगवान शिव की मूर्ति का चावल से अभिषेक किया जाता है।

दक्षिण भारत का स्वर्णिम युग था चोल युग

चोल वंश दक्षिण भारत का एक शक्तिशाली तमिल राजवंश था, जिसने 9वीं से 13वीं सदी तक दक्षिण भारत, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी सैन्य, आर्थिक, और सांस्कृतिक शक्ति का परचम लहराया। चोलों का मूल क्षेत्र कावेरी नदी की उपजाऊ घाटी था, लेकिन उनके साम्राज्य ने तुंगभद्रा नदी तक और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों को शामिल किया। आज के कंबोडिया, थाईलैंड, जावा-सुमात्रा जैसे द्वीपीय इलाकों यानी इंडोनेशिया और मलेशिया तक चोलों का प्रभुत्व रहा, जिसका असर आज भी देखने को मिलता है।

चोल वंश का इतिहास

शुरुआती चोल वंश: चोलों का उल्लेख तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेखों में मिलता है। शुरुआती चोल छोटे क्षेत्रों तक सीमित थे, लेकिन 9वीं सदी में विजयालय चोल ने इसे पुनर्जीवित किया।
मध्यकालीन चोल: 9वीं सदी के मध्य से 13वीं सदी की शुरुआत तक चोल साम्राज्य अपने चरम पर था। इस दौरान राजराजा चोल प्रथम, राजेंद्र चोल प्रथम, राजाधिराज और कुलोत्तुंग चोल जैसे शासकों ने साम्राज्य का विस्तार किया।
साम्राज्य का विस्तार: चोलों ने पांड्य, चेर और श्रीलंका के अनुराधापुरम साम्राज्य को जीता। राजेंद्र चोल ने दक्षिण-पूर्व एशिया में श्रीविजय, केदाह और तम्रलिंगम पर विजय प्राप्त की।
प्रशासनिक सुधार: चोलों ने ‘कुडवोलाई अमैप्पु’ नामक लोकतांत्रिक प्रणाली शुरू की, जिसमें गाँव स्तर पर चुनाव होते थे। जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण में भी उनकी विशेषज्ञता थी।
सांस्कृतिक योगदान: चोलों ने कला, वास्तुकला और साहित्य को प्रोत्साहन दिया। तमिल साहित्य में तिरुमुरई, कंबन रामायण और मुवर उला जैसे कार्य इस युग की देन हैं।

चोलों की अद्वितीय नौसैनिक शक्ति

चोल साम्राज्य की सबसे बड़ी ताकत उनकी नौसेना थी। राजराजा चोल ने इसकी नींव रखी, जिसे राजेंद्र ने और मजबूत किया। चोल नौसेना ने श्रीलंका, मालदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक अभियान चलाए। उनकी नौसैनिक शक्ति ने व्यापार और कूटनीति को बढ़ावा दिया, जिससे चोल साम्राज्य वैश्विक मंच पर एक शक्ति बन गया।

राजेंद्र चोल-प्रथम उर्फ गंगईकोंडा चोल

राजेंद्र चोल-प्रथम (971-1044 ईस्वी) चोल साम्राज्य के सबसे महान सम्राटों में से एक थे। उनके शासनकाल (1014-1044) में चोल साम्राज्य ने दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में अपने चरम को छुआ।

प्रारंभिक जीवन और सत्ता में आगमन

जन्म और परिवार: राजेंद्र का जन्म 971 ईस्वी में तंजावुर में हुआ था। उनके पिता राजराजा चोल प्रथम और माता वनति (तिरिपुवाना मादेवियार) थीं। उनकी जन्म नक्षत्र तिरुवदिराई (अर्द्रा) थी। उनके कई भाई-बहन थे, जिनमें उनकी बहन कुंदवाई, चालुक्य राजा विमलादित्य की रानी थीं।
सह-शासक (को-रीजेंट): 1012 में राजेंद्र को उनके पिता ने सह-शासक नियुक्त किया। 1014 में राजराजा की मृत्यु के बाद राजेंद्र पूर्ण सम्राट बने। 1018 में उन्होंने अपने बेटे राजाधिराज को सह-शासक बनाया।

सैन्य विजय

राजेंद्र की सैन्य उपलब्धियाँ चोल साम्राज्य की शक्ति का प्रतीक थीं। उनकी प्रमुख विजय इस प्रकार हैं-
दक्षिण भारत: राजेंद्र ने चेर, पांड्य और अनुराधापुरम (श्रीलंका) पर विजय प्राप्त की। 1017 में उन्होंने श्रीलंका के दक्षिणी भाग रुहुना को जीता और वहाँ के राजा महिंद V को बंदी बनाकर भारत लाए।
उत्तर भारत: 1019-1023 के बीच राजेंद्र ने गंगा नदी तक अभियान चलाया। उन्होंने कलिंग, बंगाल और पाल साम्राज्य को हराया। इस अभियान में उन्होंने पाल राजा महिपाल और चंद्र वंश के गोविंदचंद्र को परास्त किया। इस विजय के उपलक्ष्य में उन्होंने गंगईकोंडा चोलपुरम की स्थापना की और चोल गंगा झील बनवाई।
दक्षिण-पूर्व एशिया: 1023-1025 में राजेंद्र ने श्रीविजय (सुमात्रा), केदाह (मलेशिया), और तम्रलिंगम पर हमला किया। उन्होंने श्रीविजय के राजा संग्राम विजयतुंगवर्मन को बंदी बनाया। इस अभियान ने चोलों को दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापार और प्रभाव का केंद्र बनाया।
मालदीव और लक्षद्वीप: 1018 में राजेंद्र ने मालदीव और लक्षद्वीप पर कब्जा किया, जिसे उन्होंने ‘मुन्निर पलंतिवु पन्निरायिरम’ (12,000 द्वीपों का समुद्र) नाम दिया।

सांस्कृतिक और प्रशासनिक योगदान

गंगईकोंडा चोलपुरम: राजेंद्र ने इस नई राजधानी की स्थापना की, जिसमें बृहदेश्वर मंदिर, चोल गंगा झील और कई अन्य मंदिर बनवाए। यह शहर व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बन गया।
शैव धर्म का प्रचार: राजेंद्र शैव धर्म के अनुयायी थे, लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म को भी प्रोत्साहन दिया। उन्होंने श्रीविजय में चूडामणि विहार बनवाने में मदद की।
जल प्रबंधन: राजेंद्र ने चोल गंगा झील और अन्य जलाशय बनवाए, जो सिंचाई और जल प्रबंधन के लिए उपयोगी थे। मधुरंतक वडवरु नहर भी उनके समय की देन है।
साहित्य और कला: राजेंद्र के शासनकाल में तमिल साहित्य और कला फली-फूली। मूवर उला और कालिंगत्तुपरानी जैसे साहित्यिक कार्य उनके समय में लिखे गए।
मृत्यु : राजेंद्र की मृत्यु 1044 में ब्रह्मदेसम (वर्तमान तिरुवन्नमलई जिला, तमिलनाडु) में हुई। उनकी रानी वीरमहादेवी ने उनके साथ सती प्रथा का पालन किया। उनके भाई मधुरंतक परकेसरी वेलन ने उनकी स्मृति में एक जलाशय बनवाया।

चोल साम्राज्य का पतन

13वीं सदी के अंत तक चोल साम्राज्य कमजोर होने लगा। पांड्यों ने चोलों को हराया और गंगईकोंडा चोलपुरम को नष्ट कर दिया। इसके अलावा, 1311 में दिल्ली सल्तनत के मलिक काफूर, 1314 में खुसरो खान और 1327 में मुहम्मद बिन तुगलक के आक्रमणों ने शहर को और नुकसान पहुँचाया। हालाँकि बृहदेश्वर मंदिर किसी तरह बच गया। 1378 में विजयनगर साम्राज्य ने इस क्षेत्र को पुनः हिंदू शासकों के अधीन लाया और मंदिरों की मरम्मत की।

चोल विरासत का आधुनिक महत्व

चोल साम्राज्य की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत आज भी जीवित है। गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर और तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर चोलों की स्थापत्य कला और धार्मिक सहिष्णुता के प्रतीक हैं। पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि चोलों ने भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बाँधा था। उनकी सरकार भी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के विजन पर काम कर रही है।

चोलों से प्रेरणा लेता आधुनिक भारत

सांस्कृतिक संरक्षण: पिछले एक दशक में भारत ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। विदेशों से 600 से अधिक प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ वापस लाई गई हैं, जिनमें 36 तमिलनाडु की हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा: पीएम ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का जिक्र करते हुए कहा कि यह भारत की संप्रभुता की रक्षा के लिए उठाया गया कदम है, जो चोलों की सैन्य शक्ति की याद दिलाता है।
मूर्तियाँ और स्मारक: तमिलनाडु में जल्द ही राजराजा चोल और राजेंद्र चोल की भव्य मूर्तियाँ स्थापित की जाएँगी।
गंगईकोंडा चोलपुरम और राजेंद्र चोल की गाथा भारत के गौरवशाली इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। चोल साम्राज्य ने न केवल सैन्य और प्रशासनिक क्षेत्र में बल्कि कला, वास्तुकला, और साहित्य में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। गंगईकोंडा चोलपुरम का बृहदेश्वर मंदिर आज भी उस युग की भव्यता और शिल्प कौशल का प्रतीक है।
पीएम मोदी का यह दौरा न केवल चोल विरासत को सम्मान देने का अवसर था, बल्कि यह भारत की एकता और आधुनिक विकास के संकल्प को भी दर्शाता है। यह समारोह ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र को साकार करता है और हमें अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य की ओर बढ़ने का संदेश देता है।

जिस रामचरितमानस का भारत में सनातन विरोधियों ने किया अपमान, उसे UNESCO ने अपनी सूची में दिया स्थान

राम चरित मानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोकन को 'यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर' में जगह (फोटो साभार : PIB)
भारत में राजनीती नहीं बल्कि सियासत(क्योकि हिन्दू शास्त्र राजनीती सिखाते हैं, सियासत नहीं) कहना चाहिए कि कुर्सी की लालसा में तुष्टिकरण के आगे घुटने टेक अपने धार्मिक ग्रंथों का अपमान करने से नहीं चूकते, जबकि भारत से बाहर उसी सनातन को सिर का मुकुट बनाया जा रहा है, जो सनातन विरोधियों के लिए डूब मरने की बात है। 

भारत की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत को यूनेस्को की ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में जगह मिली है। भारत के राम चरित मानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोकन को इस खास रजिस्टर में शामिल किया गया है। रामचरितमानस’, ‘पंचतंत्र’ और ‘सहृदयलोक-लोकन’ ने भारत के सामाजिक, धार्मिक एवं जीवन दर्शन पर गहरा असर डाला है और भारतीय साहित्य और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है, देश के नैतिक ताने-बाने और कलात्मक अभिव्यक्तियों को आकार दिया है।

इन साहित्यिक कृतियों ने समय और स्थान से परे जाकर भारत के भीतर और बाहर दोनों जगह पाठकों और कलाकारों पर एक अमिट छाप छोड़ी है। उल्लेखनीय है कि ‘सहृदयालोक-लोकन’, ‘पंचतंत्र’ और ‘रामचरितमानस’ की रचना क्रमशः पं. आचार्य आनंदवर्धन, विष्णु शर्मा और गोस्वामी तुलसीदास ने की थी।

रामचरितमानस : भगवान राम के जीवन चरित- रामचरितमानस को तुलसीदास ने 16वीं शताब्दी में हिंदी भाषा की अवधी बोली में लिखा था। यह रामायण से भिन्न है जिसे ऋषि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में लिखा था। रामचरितमानस चौपाई रूप में लिखा गया ग्रंथ है। रामकथा को देश दुनिया में प्रसारित करने में रामचरितमानस को सबसे अहम माना जाता है। आज भी रामचरितमानस का पाठ सामूहिक रूप से किया जाता है।

पंचतंत्र की कथाएँ: पंचतंत्र दुनिया की दंतकथाओं के सबसे पुराने संग्रहों में से एक है जो संस्कृत में लिखा गया था। विष्णु शर्मा जो महिलारोप्य के राजा अमर शक्ति के दरबारी विद्वान थे, उन्हें पंचतंत्र का श्रेय दिया जाता है। इसकी रचना संभवतः 300 ईसा पूर्व के आसपास हुई थी। इसका अनुवाद 550 ईसा पूर्व में पहलवी (ईरानी भाषा) में किया गया था।

‘सहृदयालोक-लोकन: ‘सहृदयालोक-लोकन’ की रचना आचार्य आनंदवर्धन ने संस्कृत में की थी। आचार्य आनंदवर्धन,10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 11वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के दौरान कश्मीर में रहते थे।

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) ने मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (एमओडब्ल्यूसीएपी) की 10वीं बैठक के दौरान एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उलानबटार में हुई इस सभा में, सदस्य देशों के 38 प्रतिनिधि, 40 पर्यवेक्षकों और नामांकित व्यक्तियों के साथ एकत्र हुए। तीन भारतीय नामांकनों की वकालत करते हुए, आईजीएनसीए ने ‘यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में उनका स्थान सुनिश्चित किया।

आईजीएनसीए में कला निधि प्रभाग के डीन (प्रशासन) और विभाग प्रमुख प्रोफेसर रमेश चंद्र गौड़ ने भारत से इन तीन प्रविष्टियों- राम चरित मानस, पंचतंत्र और सहृदयालोक-लोकन को सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया। प्रो. गौर ने उलानबटार सम्मेलन में नामाँकनों का प्रभावी ढंग से समर्थन किया। यह उपलब्धि भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए आईजीएनसीए के समर्पण को प्रदर्शित करती है, साथ ही वैश्विक सांस्कृतिक संरक्षण और भारत की साहित्यिक विरासत की उन्नति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करती है।

यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर के बारे में 2008 में ही सहमति बना ली गई थी, लेकिन पहली बार इसके लिए नामाँकन जमा किए गए। गहन विचार-विमर्श से गुजरने और रजिस्टर उपसमिति (आरएससी) से सिफारिशें प्राप्त करने और बाद में सदस्य देशों के प्रतिनिधियों द्वारा मतदान के बाद, सभी तीन नामांकनों को शामिल किया गया, जिससे 2008 में रजिस्टर की स्थापना से पहले की महत्वपूर्ण भारतीय प्रविष्टियों को चिह्नित किया गया


मदरसाछाप सोच पर यूनेस्को की भी मुहर: रिपोर्ट में बताया- मदरसों में जिनकी तालीम, उनके लिए औरतें बच्चों की मशीन

                           यूनेस्को एवं मदरसा तालीम (फोटो साभार: euractiv & News Ocean)
देश में मदरसा में दी जाने तालीम (शिक्षा) को लेकर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं, लेकिन इसे धार्मिक शिक्षा का अंग बताकर किसी भी सवाल की संभावना को नकार दिया जाता रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की संस्था यूनेस्को (UNESCO) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मदरसों में पढ़े लोगों में लैंगिक पूर्वाग्रह होता है।

यूनेस्को ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मदरसों में पढ़े बेहद कम लोगों में महिलाओं की उच्च शिक्षा और कामकाजी माताओं के प्रति सकारात्मक राय थी। इन लोगों का मानना ​​​​था कि बीवियों का मूल काम बच्चों की परवरिश करना है, क्योंकि अल्लाह को बच्चों की संख्या निर्धारित करनी है। ऐसे लोगों ने बड़े परिवार का समर्थन किया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मदरसा छात्र महिलाओं और उनकी क्षमताओं के बारे में कम अनुकूल रवैया रखते थे। पारंपरिक मदरसों में शिक्षकों के परिवार काफी बड़े पाए गए थे। हालाँकि, इसके असर को लेकर कहा गया है कि मदरसों के कारण सुदूर ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की शिक्षा में बढ़ोत्तरी हुई है। इसमें प्रमुख भूमिका आस्था आधारित शिक्षा देने वाले संस्थानों का गैर सरकारी संस्थानों के साथ गठजोड़ की भूमिका महत्वपूर्ण है।

हालाँकि, इस संख्या में बढ़ोत्तरी पर आशंका जाहिर करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है, “मदरसा शिक्षा पहुँच में वृद्धि लैंगिक समानता पर हुए कुछ सकारात्मक प्रभाव को भी खत्म कर सकता है। पहला, मदरसा शिक्षा के पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकें लिंग-समावेशी नहीं हो सकती हैं। इसके बजाय वे लिंग आधारित पारंपरिक भूमिकाओं पर जोर देती हैं। बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, पाकिस्तान और सऊदी अरब में अध्ययनों से यही पता चला है। दूसरा, उनके शिक्षण और सिखाने की प्रथाएँ जैसे कि सामाजिक मेलजोल के दौरान लैंगिक अलगाव और विशिष्ट लैंगिक प्रतिबंध यह धारणा बना सकते हैं कि इस तरह की लैंगिक असमानता सामाजिक रूप से स्वीकार्य हैं।”

रिपोर्ट में आशंका दर्ज की गई है कि मदरसों शिक्षकों के पास लैंगिक मुद्दों का समाधान करने के लिए प्रशिक्षण की कमी है और वे इसका नकारात्मक मॉडल के रूप में कार्य कर सकते हैं। जैसे कि वे प्रजनन क्षमता को लेकर छात्रों के दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मदरसे आमतौर पर एक ही तरह के पाठ्यक्रम अपनाते हैं, जो मजहब पर आधारित होते हैं। हालाँकि, हर देश में इनकी स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ देश मदरसों को सरकारी पाठ्यक्रमों जोड़ देते हैं, जबकि अन्य मुल्क पारंपरिक मॉडल से चिपके रहते हैं।”

रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि लैंगिक समानता की दिशा में प्रगति पर गैर-राज्य आस्था-आधारित स्कूलों के प्रभाव से मजहबी विश्वास एवं सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के प्रभाव को अलग करना बहुत मुश्किल है। मदरसा नामांकन में किसी के घर के मजहबी विश्वास की प्रगाढ़ता और मजहबी स्कूल से दूरी के बीच अंतरसंबंध है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मदरसों के मजहबी और संस्थागत इतिहास अक्सर राज्य और गैर-राज्य संस्थानों के बीच की सीमाओं को धुंधला करते हैं और विश्लेषण को और अधिक जटिल बनाते हैं। उनके बीच विचारधारा का पालन, मजहबी किताबों और इस्लामी शिक्षाओं पर जोर दिया जाता है। इसके साथ ही दैनिक मजहबी उपस्थिति और स्थानीय मस्जिदों से लगाव जैसे कई कारक हैं।