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मदरसाछाप सोच पर यूनेस्को की भी मुहर: रिपोर्ट में बताया- मदरसों में जिनकी तालीम, उनके लिए औरतें बच्चों की मशीन

                           यूनेस्को एवं मदरसा तालीम (फोटो साभार: euractiv & News Ocean)
देश में मदरसा में दी जाने तालीम (शिक्षा) को लेकर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं, लेकिन इसे धार्मिक शिक्षा का अंग बताकर किसी भी सवाल की संभावना को नकार दिया जाता रहा है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की संस्था यूनेस्को (UNESCO) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मदरसों में पढ़े लोगों में लैंगिक पूर्वाग्रह होता है।

यूनेस्को ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मदरसों में पढ़े बेहद कम लोगों में महिलाओं की उच्च शिक्षा और कामकाजी माताओं के प्रति सकारात्मक राय थी। इन लोगों का मानना ​​​​था कि बीवियों का मूल काम बच्चों की परवरिश करना है, क्योंकि अल्लाह को बच्चों की संख्या निर्धारित करनी है। ऐसे लोगों ने बड़े परिवार का समर्थन किया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मदरसा छात्र महिलाओं और उनकी क्षमताओं के बारे में कम अनुकूल रवैया रखते थे। पारंपरिक मदरसों में शिक्षकों के परिवार काफी बड़े पाए गए थे। हालाँकि, इसके असर को लेकर कहा गया है कि मदरसों के कारण सुदूर ग्रामीण इलाकों में लड़कियों की शिक्षा में बढ़ोत्तरी हुई है। इसमें प्रमुख भूमिका आस्था आधारित शिक्षा देने वाले संस्थानों का गैर सरकारी संस्थानों के साथ गठजोड़ की भूमिका महत्वपूर्ण है।

हालाँकि, इस संख्या में बढ़ोत्तरी पर आशंका जाहिर करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है, “मदरसा शिक्षा पहुँच में वृद्धि लैंगिक समानता पर हुए कुछ सकारात्मक प्रभाव को भी खत्म कर सकता है। पहला, मदरसा शिक्षा के पाठ्यक्रम और पाठ्य-पुस्तकें लिंग-समावेशी नहीं हो सकती हैं। इसके बजाय वे लिंग आधारित पारंपरिक भूमिकाओं पर जोर देती हैं। बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, पाकिस्तान और सऊदी अरब में अध्ययनों से यही पता चला है। दूसरा, उनके शिक्षण और सिखाने की प्रथाएँ जैसे कि सामाजिक मेलजोल के दौरान लैंगिक अलगाव और विशिष्ट लैंगिक प्रतिबंध यह धारणा बना सकते हैं कि इस तरह की लैंगिक असमानता सामाजिक रूप से स्वीकार्य हैं।”

रिपोर्ट में आशंका दर्ज की गई है कि मदरसों शिक्षकों के पास लैंगिक मुद्दों का समाधान करने के लिए प्रशिक्षण की कमी है और वे इसका नकारात्मक मॉडल के रूप में कार्य कर सकते हैं। जैसे कि वे प्रजनन क्षमता को लेकर छात्रों के दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मदरसे आमतौर पर एक ही तरह के पाठ्यक्रम अपनाते हैं, जो मजहब पर आधारित होते हैं। हालाँकि, हर देश में इनकी स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ देश मदरसों को सरकारी पाठ्यक्रमों जोड़ देते हैं, जबकि अन्य मुल्क पारंपरिक मॉडल से चिपके रहते हैं।”

रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि लैंगिक समानता की दिशा में प्रगति पर गैर-राज्य आस्था-आधारित स्कूलों के प्रभाव से मजहबी विश्वास एवं सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के प्रभाव को अलग करना बहुत मुश्किल है। मदरसा नामांकन में किसी के घर के मजहबी विश्वास की प्रगाढ़ता और मजहबी स्कूल से दूरी के बीच अंतरसंबंध है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मदरसों के मजहबी और संस्थागत इतिहास अक्सर राज्य और गैर-राज्य संस्थानों के बीच की सीमाओं को धुंधला करते हैं और विश्लेषण को और अधिक जटिल बनाते हैं। उनके बीच विचारधारा का पालन, मजहबी किताबों और इस्लामी शिक्षाओं पर जोर दिया जाता है। इसके साथ ही दैनिक मजहबी उपस्थिति और स्थानीय मस्जिदों से लगाव जैसे कई कारक हैं।

तस्लीमा नसरीन- औरतों को सेक्स का सामान बना देता है हिजाब ; ‘हिजाब फर्स्ट’ वालों के दादा पाकिस्तान क्यों नहीं गए: स्वामी ने पूछा

बुर्के पर जारी विवाद के बीच सांसद सुब्रमण्यम स्वामी और बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने बड़ी बात कही है। स्वामी ने पूछा है कि जो लोग पढ़ाई से पहले हिजाब की बात कर रहे हैं, उनके पुरखे पाकिस्तान क्यों नहीं गए। वहीं नसरीन ने समान नागरिक संहिता की वकालत करते हुए कहा है कि हिजाब, नकाब और बुर्का का एक ही मकसद है, औरतों को सेक्स के सामान के तौर पर बदलना। उन्होंने अपमानजनक बताते हुए इस चलन को बंद करने वकालत की।

सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट में कहा है, “हिजाब विवाद देखने के बाद, जो मुस्लिम छात्र कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे हैं और कह रहे हैं, पहले हिजाब फिर पढ़ाई। मैं ये सोच रहा हूँ कि उनके दादाओं ने पाकिस्तान जाने की बजाए भारत में रहना क्यों चुना। वहाँ उन्हें बिना किसी दिक्कत के ‘हिजाब पहले’ मिल जाता।”

वहीं वेबसाइट फर्स्टपोस्ट.कॉम को दिए इंटरव्यू में तस्लीमा नसरीन ने भी इस विवाद से जुड़े हर पहलुओं पर खुलकर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि एक सेकुलर देश को शिक्षण संस्थानों में ड्रेस कोड को अनिवार्य करने का अधिकार हैं। छात्रों से अपनी मजहबी पहचान घर पर रखने के लिए कहना गलत नहीं है। स्कूलों में मजहबी कट्टरता के लिए जगह नहीं हो सकती। वहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लैंगिक समानता, वैज्ञानिक सिद्धांतों के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए।

तस्लीमा नसरीन ने इस पूरे विवाद को इस्लाम का मसला मानने से भी इनकार किया। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में सातवीं सदी के लागू नहीं हो सकते हैं और होने भी नहीं चाहिए। साथ ही यह भी समझना होगा कि बुर्का और हिजाब कभी भी एक महिला की पसंद नहीं हो सकते। उन्हें इसके लिए मजबूर किया जाता है।

इस विवाद पर कर्नाटक हाई कोर्ट की फुल बेंच सुनवाई कर रही है। अंतरिम आदेश आने तक उसने शिक्षण संस्थानों में मजहबी पोशाक के इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। इसके खिलाफ 765 वकीलों, कानून के छात्रों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक खुला पत्र लिखा है। इसमें हिजाब पहनने से रोके जाने को मुस्लिमों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।