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‘सोनिया-राहुल गाँधी ने बनाए 142 करोड़ रूपए’: नेशनल हेराल्ड केस में ED ने कोर्ट को बताया, 2 जुलाई से मनी लॉन्ड्रिंग मामले की होगी रोजाना सुनवाई

                      सोनिया-राहुल गाँधी नेशनल हेराल्ड केस में फँसे (फोटो साभार: OpIndia English)
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले की सुनवाई बुधवार (21 मई 2025) को हुई। इस हाई-प्रोफाइल मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कांग्रेस नेताओं सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, सैम पित्रोदा और सुमन दुबे पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ईडी ने कोर्ट को बताया कि आरोपितों ने अपराध की आय से 142 करोड़ रुपए का फायदा उठाया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह राशि यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड के जरिए नेशनल हेराल्ड अखबार चलाने वाली कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) से प्राप्त किराये की आय से जुड़ी है। ईडी के विशेष वकील जोहेब हुसैन ने कोर्ट में दावा किया कि यंग इंडियन के 76% मालिक सोनिया और राहुल गाँधी ने केवल 50 लाख रुपए का भुगतान करके 90.25 करोड़ रुपए की संपत्ति हासिल की।

ईडी ने जब तक संपत्तियाँ जब्त नहीं की, तब तक सोनिया-राहुल ने उठाया फायदा

ईडी ने कोर्ट में यह भी कहा कि गाँधी परिवार ने न सिर्फ मनी लॉन्ड्रिंग की, बल्कि अपराध की आय को अपने पास रखकर इस अपराध को और बढ़ाया। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कोर्ट को बताया कि यंग इंडियन ने एजेएल के शेयरों का दुरुपयोग किया, जिसके जरिए भारी मुनाफा कमाया गया।

नवंबर 2023 में ईडी ने नेशनल हेराल्ड से जुड़ी 751.9 करोड़ रुपए की संपत्तियों को जब्त किया था, जिसके बाद यह मामला और सुर्खियों में आ गया। राजू ने कोर्ट में यह भी स्पष्ट किया कि आरोपितों ने तब तक इस आय का लाभ उठाया, जब तक ईडी ने कार्रवाई नहीं की।

साल 2012 में सुब्रमण्यम स्वामी ने की थी शिकायत

यह मामला मूल रूप से 2012 में सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत से शुरू हुआ था। स्वामी ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि गाँधी परिवार ने यंग इंडियन के जरिए एजेएल को धोखाधड़ी, आपराधिक दुरुपयोग और विश्वासघात के जरिए हासिल किया। 2010 में एजेएल में 1,057 शेयरधारक थे, लेकिन स्वामी का दावा है कि यंग इंडियन ने गलत तरीके से कंपनी पर नियंत्रण हासिल कर लिया।
ईडी ने इस मामले की जाँच 2014 में मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत शुरू की थी, जब एक ट्रायल कोर्ट ने स्वामी की निजी आपराधिक शिकायत के आधार पर आयकर जाँच में अनियमितताओं का संज्ञान लिया।

राहुल-सोनिया के वकील ने समय माँग कर मामले को आगे बढ़वाया

कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वरिष्ठ वकीलों अभिषेक मनु सिंघवी और आरएस चीमा ने दस्तावेजों की जाँच के लिए और समय माँगा। उन्होंने कहा कि उन्हें हाल ही में करीब 5,000 पन्नों के दस्तावेज मिले हैं और मई का महीना कोर्ट और वकीलों के लिए व्यस्त रहता है। इसलिए उन्होंने जून के अंत या जुलाई के पहले सप्ताह तक का समय माँगा। कोर्ट ने उनकी माँग को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मामले को 2 जुलाई से 8 जुलाई तक रोजाना सुनवाई के लिए स्थगित कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला एमपी-एमएलए कोर्ट के दायरे में आता है, इसलिए नियमित सुनवाई जरूरी है।

सुब्रमण्यम स्वामी ने माँगी चार्जशीट और अन्य दस्तावेजों की कॉपी

इसके अलावा कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी की उस याचिका को भी मंजूरी दे दी, जिसमें उन्होंने नेशनल हेराल्ड केस की चार्जशीट और अन्य दस्तावेजों की कॉपी माँगी थी। ईडी ने सुनवाई के दौरान यह दलील दी कि सरकारी मँजूरी की जरूरत नहीं है, क्योंकि चार्जशीट एक अधिकृत अधिकारी के जरिए दायर की गई है, जो ईडी में सहायक निदेशक के पद पर है। राजू ने एक सरकारी आदेश का हवाला देते हुए कहा कि सरकार किसी अधिकारी को धारा 45 के तहत शिकायत दायर करने के लिए अधिकृत कर सकती है।

क्या भारतीय नहीं हैं राहुल गाँधी? क्या राहुल ब्रिटिश नागरिक है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गृह मंत्रालय से क्यों माँगा जवाब, कांग्रेस नेता की नागरिकता पर विवाद क्यों?

                                                                              ब्रिटिश नागरिक होने के दावे कई बार किए जा चुके हैं
राहुल गाँधी की नागरिकता का मामला बढ़ता चला जा रहा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले दायर की गई याचिका केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। हाई कोर्ट ने गृह मंत्रालय से राहुल गाँधी की नागरिकता पर उठे सवालों का जवाब देने को कहा है। राहुल गाँधी की नागरिकता पर पहले भी विवाद हो चुका है। इस मामले में अन्य लोगों ने भी देश की अलग-अलग कोर्ट में याचिकाएँ दायर की हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में याचिका पर सुनवाई कर चुकी है।

इलाहबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की बेंच ने बुधवार (25 सितम्बर, 2024) को एस विग्नेश शिशिर की याचिका पर सुनवाई की। शिशिर ने हाई कोर्ट के सामने दावा किया है कि राहुल गाँधी के पास ब्रिटेन की नागरिकता है। शिशिर ने इस मामले में CBI जाँच की माँग की है।
याचिकाकर्ता शिशिर ने हाई कोर्ट को बताया कि उन्होंने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के सामने राहुल गाँधी की याचिका को लेकर दो आवेदन दिए हैं। यह आवेदन नागरिकता कानूनों के तहत दिए गए हैं। याचिकाकर्ता शिशिर ने गृह मंत्रालय में दिए गए आवेदनों पर कार्रवाई के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट का रास्ता लिया है।
हाई कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए गृह मंत्रालय से पूछा है कि उसने इन आवेदनों पर क्या एक्शन लिया है। हाई कोर्ट ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल सूर्यभान पाण्डेय को आदेश दिया है कि वह गृह मंत्रालय की कार्रवाई का ब्यौरा कोर्ट के सामने रखें।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि वह अभी राहुल गाँधी की नागरिकता का परीक्षण नहीं कर रहा बल्कि वह यह जानना चाहता है कि आखिर गृह मंत्रालय इस मामले पर क्या कार्रवाई कर रहा है। हाई कोर्ट ने इससे पहले इसी मामले में डाली गई याचिका वापस लेने की अनुमति दी थी। यह याचिका भी शिशिर ने ही लगाई थी।
केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के पास नागरिकता कानून के तहत यह शक्ति है कि वह किसी भारतीय नागरिक की विदेशी नागरिकता अपनाने के कारण और समय की जानकारी जुटा सके। शिशिर का आवेदन गृह मंत्रालय से राहुल की नागरिकता रद्द करने की माँग करता है।
याचिकाकर्ता शिशिर का दावा है कि राहुल गाँधी ब्रिटिश नागरिक हैं और ब्रिटिश सरकार ने 2022 में भेजे गए इमेल में इस बात के संकेत दिए हैं। यह भी बताया गया है कि ब्रिटिश सरकार राहुल गाँधी की नागरिकता पर तब तक जानकारी सार्वजनिक रूप से नहीं देगी जब तक गाँधी स्वयं इस बात के लिए आवेदन पर हस्ताक्षर ना कर दें।

सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर भी सुनवाई

सुब्रमण्यम स्वामी ने राहुल गाँधी की नागरिकता को इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका डाली थी। 20 अगस्त, 2024 को दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई की थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस याचिका को जनहित याचिका (PIL) बेंच को स्थानांतरित कर दिया था।
सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी याचिका में दावा किया था कि राहुल गाँधी एक ब्रिटिश नागरिक हैं और इस संबंध में अपनी जानकारी छुपाई है। स्वामी का कहना है कि राहुल गाँधी ने इस संबंध में जानकारी छुपाई है। स्वामी ने इस संबंध में कहा था कि उन्होंने गृह मंत्रालय में आवेदन दिया है लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वह इस याचिका पर कार्रवाई की माँग कर रहे थे। इस याचिका पर गुरुवार (26 सितम्बर, 2024) को होनी है।

राहुल गाँधी की नागरिकता पर लगातार विवाद

राहुल गाँधी की नागरिकता को लेकर विवाद पहली बार नहीं हो रहा है। राहुल गाँधी की नागरिकता का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है। इससे पहले दिल्ली के दो लोगों ने राहुल गाँधी की नागरिकता पर प्रश्न उठाए थे। उन्होंने दावा किया था कि एक कम्पनी के 2005-06 के रिकॉर्ड में राहुल गाँधी को ब्रिटिश नागरिक बताया गया था। याचिका में दावा किया गया था कि राहुल गाँधी ने स्वेच्छा से ब्रिटिश नागरिकता ली है और इसकी जानकारी नहीं दी है। उन्होंने कहा था कि यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट में भी हो चुकी सुनवाई

राहुल गाँधी का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था तो उसने इस याचिका को रद्द कर दिया था। 2019 में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच सुनवाई करते हुए कहा था कि यदि कोई कम्पनी अपने कागजों में किसी को ब्रिटिश नागरिक बता देती है तो इससे वह वहाँ का नागरिक नहीं हो जाता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि याचिकाकर्ता समाजसेवा करने की राजनीति कर रहे हैं।
कोर्ट ने सवाल उठाए थे कि आखिर याचिकाकर्ताओं ने 2019 का इन्तजार राहुल गाँधी की नागरिकता पर याचिका डालने के लिए क्यों किया। इस दौरान गृह मंत्रालय ने भी राहुल गाँधी से उनकी नागरिकता पर स्थिति साफ़ करने को कहा था। गृह मंत्रालय ने राहुल गाँधी को नोटिस जारी करके तथ्य देने को कहा था। इसको लेकर काफी बवाल हुआ था।
सिर्फ 2019 में ही नहीं बल्कि 2015 में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी ही याचिका को ‘अजीब‘ करार दिया था। कोर्ट ने इस दौरान राहुल गाँधी को ब्रिटिश बताने के दावे के आधार वाले दस्तावेज पर भी प्रश्न उठाए थे। तब भी सुप्रीम कोर्ट के सामने यही दावे किए गए थे कि राहुल गाँधी ब्रिटिश नागरिक हैं और यह बात कम्पनी रिकॉर्ड से सामने आई है।
राहुल गाँधी की नागरिकता को लेकर लड़ाई मात्र कोर्ट में ही नहीं बल्कि संसद तक पहुँच चुकी है। भाजपा सांसद महेश गिरी ने ऐसे ही आरोप राहुल गाँधी के खिलाफ संसद की एथिक्स कमिटी के सामने लगाए थे। एथिक्स कमिटी ने भी राहुल गाँधी से जवाब माँगा था।

कांग्रेस का क्या है जवाब

राहुल गाँधी ने इस मामले में संसद कि एथिक्स कमिटी के नोटिस पर जवाब दिया था। राहुल ने एथिक्स कमिटी की नोटिस के सवाल पर बताया था कि उन्होंने कभी भी ब्रिटिश नागरिकता के लिए आवेदन ही नहीं दिया। उन्होंने कहा था कि नागरिकता को लेकर प्रश्न उनकी छवि धूमिल करने के उद्देश्य से उठाए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि वह एथिक्स कमिटी को अपने तरीके से निपट लेंगे। राहुल गाँधी की बहन और कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने इन दावों को हास्यास्पद करार दिया था।
प्रियंका गाँधी ने कहा था कि राहुल गाँधी इस देश में पैदा हुए और यहीं के लोगों के सामने पले बढ़े हैं। प्रियंका गाँधी ने कहा था कि उनके भाई की नागरिकता पर उठाए गए सवालों को आधारहीन करार दिया था। प्रियंका गाँधी ने कहा था कि नागरिकता के विषय में पूरा देश जानता है।

जिस राम सेतु को तोड़ना चाहती थी UPA सरकार, वो घोषित होगा ‘राष्ट्रीय धरोहर स्मारक’

सुप्रीम कोर्ट ने राम सेतु को ‘राष्ट्रीय धरोहर स्मारक (National Heritage Monument)’ घोषित करने की माँग सम्बंधित याचिका पर सुनवाई के लिए हामी भर दी है। 23 फरवरी, 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 9 मार्च को इस मामले की सुनवाई की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश (CJI) एनवी रमना, जस्टिस बोपन्ना और जस्टिस हिमा कोहली की तीन सदस्यीय पीठ ने भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा किए गए निवेदन के बाद ये निर्देश जारी किया।

सुब्रमण्यम स्वामी ने इस मामले में त्वरित सुनवाई की माँग की थी। याचिका में माँग की गई है कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि राम सेतु को ‘राष्ट्रीय धरोहर स्मारक’ घोषित किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पेश होकर भाजपा सांसद ने कहा कि इस मामले को हटाया न जाए और इस पर त्वरित सुनवाई हो। सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद 9 मार्च को इसे लिस्ट किए जाने की तारीख़ मुकर्रर की और कहा कि इस पर आगे बढ़ना है या नहीं, इसे उसी दिन तय किया जाएगा।

CJI द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में डॉक्टर स्वामी ने कहा कि केंद्र सरकार ने इस मामले में काउंटर-एफिडेविट दायर की है और ये मामला काफी लंबे समय से पेंडिंग पड़ा हुआ है। अप्रैल 2021 में तत्कालीन CJI एसए बोबडे ने इस मामले को अगले CJI के समक्ष सुनवाई के लिए रखे जाने की बात कही थी, जिन्होंने उसी साल 24 अप्रैल से कार्यभार संभाला। बता दें कि राम सेतु ‘लाइमस्टोन शोल्स’ की एक श्रृंखला है, जो तमिलनाडु के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर स्थित है।

ये दक्षिण में रामेश्वरम के नजदीक स्थित पम्बन द्वीप से लेकर श्रीलंका के उत्तरी छोर पर स्थित मन्नार द्वीप तक फैला हुआ है। रामायण में इसका जिक्र है कि कैसे माँ सीता को वापस लाने के लिए भगवान श्रीराम की वानर-भालू सेना ने इस पुल का निर्माण किया था। जनवरी 2020 में ही सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई का आश्वासन दिया था, लेकिन कई लंबित मामलों के कारण इसे तीन महीने बाद लाने के लिए कहा गया था। स्वामी का कहना था कि 2017 में एक केंद्रीय मंत्री ने इस माँग को लेकर एक बैठक बुलाई तो थी, लेकिन हुआ कुछ नहीं।

2007 में यूपीए की सरकार के दौरान ही सुब्रमण्यम स्वामी ने ‘सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट’ के खिलाफ याचिका दायर करते हुए ये माँग की थी, जिसके बाद राम सेतु की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इस परियोजना पर रोक लगा दी थी। इसके तहत 83 किलोमीटर लंबे वॉटर चैनल का निर्माण किया जाना था, जिससे मन्नार और पाल्क स्ट्रेट को जोड़ा जाता। इसके तहत इस ‘राम सेतु’ को तोडना भी पड़ता। इसके बाद केंद्र सरकार ने वैकल्पिक व्यवस्था की बात कही थी।

तस्लीमा नसरीन- औरतों को सेक्स का सामान बना देता है हिजाब ; ‘हिजाब फर्स्ट’ वालों के दादा पाकिस्तान क्यों नहीं गए: स्वामी ने पूछा

बुर्के पर जारी विवाद के बीच सांसद सुब्रमण्यम स्वामी और बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने बड़ी बात कही है। स्वामी ने पूछा है कि जो लोग पढ़ाई से पहले हिजाब की बात कर रहे हैं, उनके पुरखे पाकिस्तान क्यों नहीं गए। वहीं नसरीन ने समान नागरिक संहिता की वकालत करते हुए कहा है कि हिजाब, नकाब और बुर्का का एक ही मकसद है, औरतों को सेक्स के सामान के तौर पर बदलना। उन्होंने अपमानजनक बताते हुए इस चलन को बंद करने वकालत की।

सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट में कहा है, “हिजाब विवाद देखने के बाद, जो मुस्लिम छात्र कक्षाओं का बहिष्कार कर रहे हैं और कह रहे हैं, पहले हिजाब फिर पढ़ाई। मैं ये सोच रहा हूँ कि उनके दादाओं ने पाकिस्तान जाने की बजाए भारत में रहना क्यों चुना। वहाँ उन्हें बिना किसी दिक्कत के ‘हिजाब पहले’ मिल जाता।”

वहीं वेबसाइट फर्स्टपोस्ट.कॉम को दिए इंटरव्यू में तस्लीमा नसरीन ने भी इस विवाद से जुड़े हर पहलुओं पर खुलकर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि एक सेकुलर देश को शिक्षण संस्थानों में ड्रेस कोड को अनिवार्य करने का अधिकार हैं। छात्रों से अपनी मजहबी पहचान घर पर रखने के लिए कहना गलत नहीं है। स्कूलों में मजहबी कट्टरता के लिए जगह नहीं हो सकती। वहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, लैंगिक समानता, वैज्ञानिक सिद्धांतों के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए।

तस्लीमा नसरीन ने इस पूरे विवाद को इस्लाम का मसला मानने से भी इनकार किया। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी में सातवीं सदी के लागू नहीं हो सकते हैं और होने भी नहीं चाहिए। साथ ही यह भी समझना होगा कि बुर्का और हिजाब कभी भी एक महिला की पसंद नहीं हो सकते। उन्हें इसके लिए मजबूर किया जाता है।

इस विवाद पर कर्नाटक हाई कोर्ट की फुल बेंच सुनवाई कर रही है। अंतरिम आदेश आने तक उसने शिक्षण संस्थानों में मजहबी पोशाक के इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। इसके खिलाफ 765 वकीलों, कानून के छात्रों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक खुला पत्र लिखा है। इसमें हिजाब पहनने से रोके जाने को मुस्लिमों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है।