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जिस राम सेतु को तोड़ना चाहती थी UPA सरकार, वो घोषित होगा ‘राष्ट्रीय धरोहर स्मारक’

सुप्रीम कोर्ट ने राम सेतु को ‘राष्ट्रीय धरोहर स्मारक (National Heritage Monument)’ घोषित करने की माँग सम्बंधित याचिका पर सुनवाई के लिए हामी भर दी है। 23 फरवरी, 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 9 मार्च को इस मामले की सुनवाई की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश (CJI) एनवी रमना, जस्टिस बोपन्ना और जस्टिस हिमा कोहली की तीन सदस्यीय पीठ ने भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा किए गए निवेदन के बाद ये निर्देश जारी किया।

सुब्रमण्यम स्वामी ने इस मामले में त्वरित सुनवाई की माँग की थी। याचिका में माँग की गई है कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि राम सेतु को ‘राष्ट्रीय धरोहर स्मारक’ घोषित किया जाए। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पेश होकर भाजपा सांसद ने कहा कि इस मामले को हटाया न जाए और इस पर त्वरित सुनवाई हो। सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद 9 मार्च को इसे लिस्ट किए जाने की तारीख़ मुकर्रर की और कहा कि इस पर आगे बढ़ना है या नहीं, इसे उसी दिन तय किया जाएगा।

CJI द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में डॉक्टर स्वामी ने कहा कि केंद्र सरकार ने इस मामले में काउंटर-एफिडेविट दायर की है और ये मामला काफी लंबे समय से पेंडिंग पड़ा हुआ है। अप्रैल 2021 में तत्कालीन CJI एसए बोबडे ने इस मामले को अगले CJI के समक्ष सुनवाई के लिए रखे जाने की बात कही थी, जिन्होंने उसी साल 24 अप्रैल से कार्यभार संभाला। बता दें कि राम सेतु ‘लाइमस्टोन शोल्स’ की एक श्रृंखला है, जो तमिलनाडु के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर स्थित है।

ये दक्षिण में रामेश्वरम के नजदीक स्थित पम्बन द्वीप से लेकर श्रीलंका के उत्तरी छोर पर स्थित मन्नार द्वीप तक फैला हुआ है। रामायण में इसका जिक्र है कि कैसे माँ सीता को वापस लाने के लिए भगवान श्रीराम की वानर-भालू सेना ने इस पुल का निर्माण किया था। जनवरी 2020 में ही सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई का आश्वासन दिया था, लेकिन कई लंबित मामलों के कारण इसे तीन महीने बाद लाने के लिए कहा गया था। स्वामी का कहना था कि 2017 में एक केंद्रीय मंत्री ने इस माँग को लेकर एक बैठक बुलाई तो थी, लेकिन हुआ कुछ नहीं।

2007 में यूपीए की सरकार के दौरान ही सुब्रमण्यम स्वामी ने ‘सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट’ के खिलाफ याचिका दायर करते हुए ये माँग की थी, जिसके बाद राम सेतु की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इस परियोजना पर रोक लगा दी थी। इसके तहत 83 किलोमीटर लंबे वॉटर चैनल का निर्माण किया जाना था, जिससे मन्नार और पाल्क स्ट्रेट को जोड़ा जाता। इसके तहत इस ‘राम सेतु’ को तोडना भी पड़ता। इसके बाद केंद्र सरकार ने वैकल्पिक व्यवस्था की बात कही थी।

1200 साल बाद 12 नवंबर को सबसे बड़े मुस्लिम देश में हिन्दुओं ने किया शिव का अभिषेक

प्रम्बानन मंदिर, इंडोनेशिया
प्रम्बानन मंदिर में 1163 वर्षों के बाद हिन्दुओं ने किया
भगवान शिव का अभिषेक
अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ़ होने और दक्षिण में सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भगवान अय्यप्पा के पक्ष में आने के बाद अब एक और प्राचीन मंदिर से हिन्दुओं के लिए शुभ समाचार आ रहा है। इंडोनेशिया के प्राचीन प्रम्बानन मंदिर में सैकड़ों हिन्दुओं ने 1163 वर्षों के बाद मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक किया। यहाँ यह जान लेना ज़रूरी है कि इंडोनेशिया केवल मुस्लिम बहुल देश ही नहीं है, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी (22.5 करोड़) का घर है।
इस आयोजन को इंडोनेशिया के अलावा पड़ोसी चीन की शिन्हुआ न्यूज़ एजेंसी की खबरों में भी कवर किया गया है।
मूलतः शिवगृह कहा जाने वाला प्रम्बानन मंदिर इंडोनेशिया के तीन प्रांतों स्लेमान, योग्यकर्ता, और मध्य जावा के क्लाटेन के बीच में स्थित है। यह पूजा विधि मंगलवार (12 नवंबर, 2019) को सम्पन्न हुई और हिन्दुओं ने इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। “बकौल अभिषेक का आयोजन करने वाली समिति के सदस्य मदे अस्त्र तनया, उन्हें एक शिलालेख मिला था, जिसमें इस मंदिर के उद्घाटन की तारीख 12 नवंबर, 856 ईस्वी दर्ज थी। उसमें यह भी उल्लिखित था कि मंदिर की स्थापना के समय भी ऐसा ही अभिषेक और पूजा पाठ हुआ था। उसके बाद हिन्दुओं ने इस पूजा की तैयारी शुरू की। इस अनुष्ठान का आयोजन रकाई पिकतन द्यः सेलाडु द्वारा इस भव्य मंदिर की स्थापना का उत्सव मनाने के लिए हुआ है।


अंतारा न्यूज़ डॉट कॉम नामक वेबसाइट का कहना है कि यह अभिषेक मातरम नामक हिन्दू साम्राज्य के स्वर्ण काल का भी परिचायक है। उस समय के हिन्दू तावुर अगुंग नामक एक अनुष्ठान करते थे, जिसके बारे में वे मानते थे कि इससे मनुष्यों के साथ समस्त ब्रह्माण्ड को ही पवित्र किया जाता है। प्रम्बानन मंदिर का जीर्णोद्धार इंडोनेशिया की सरकार ने 1953 में कराया था।
शनिवार, 9 नवंबर (संयोगवश भारत में श्री रामजन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिन) को शुरू हुए इस अनुष्ठान का उल्लेख मातरम साम्राज्य के 25 शिलालेखों में मिलने की बात स्थानीय मीडिया में कही गई है। इसमें पहली पूजा मातुर पिउनिंग नामक थी, जिसमें आगे के कर्मकांडों के लिए पूर्वजों से अनुमति माँगी जाती है। यह भारत में मृत पितरों के स्मरण जैसा है। इसके बाद म्रापेन नामक अग्नि प्रज्ज्वलित की गई और 11 पवित्र कुँओं का पानी लाकर पास के बोको मंदिर से प्रम्बानन देवालय तक छिड़काव हुआ। उसके बाद पूजा पाठ और भारत की ही तरह मंदिरों की प्रदक्षिणा भी की गई।
पूजा के बाद शिलालेख के अनुसार मनुसुक सिमा नामक एक और प्रथा के अनुसार शिवगृह देवालय के पारम्परिक नृत्य का भी आयोजन हुआ जिसमें प्रम्बानन मंदिर के पुनर्निर्माण से जुड़ी गाथाओं का वर्णन होता है।