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फ्रांस : जीत के बाद भी नहीं थमे वामपंथी, देश को जलाकर कर रहे ‘शक्ति प्रदर्शन’: दक्षिणपंथ की बढ़त देख शुरू हुई पेट्रोल बम वाली वाम हिंसा

            फ्रांस में चुनाव के बाद लगातार दंगे जारी हैं (चित्र साभार: The Guardian & EssexPR/X)
फ्रांस के आम चुनावों में वामपंथी गठबंधन की जीत हुई है। वामपंथी गठबंधन की जीत के बाद फ्रांस में भीषण दंगे भड़क गए हैं और प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए हैं। यह प्रदर्शनकारी दंगे कर रहे हैं और पेट्रोल बम चला आगजनी कर रहे हैं। फ्रांस में इससे बचने के लिए भारी पुलिस बंदोबस्त किया गया है।

फ्रांस में वामपंथी गठबंधन की जीत अप्रत्याशित तरीके से हुई है। चुनाव से पहले लगातार यह माना जा रहा था कि इन चुनावों में दक्षिणपंथी गठबंधन की जीत होगी। दक्षिणपंथी गठबंधन की नेता मरीन ली पेन के प्रधानमंत्री बनने के आसार जताए जा रहे थे। लेकिन दूसरे चरण की वोटिंग के बाद पासा पलट गया और वामपथी गठबंधन सबसे अधिक सीटें लाने में सफल रहा।

फ्रांस के इन चुनावों में वामपंथी गठबंधन ने 577 सीटों में से लगभग 182 सीटों पर जीत हासिल कर ली है। वहीं दूसरी तरफ फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की रिनेसां पार्टी ने 163 सीटें जीती हैं। तीसरे नम्बर पर धुर दक्षिणपंथी गठबंधन है, जिसने 132 सीटें जीत ली है। अभी अंतिम परिणाम नहीं सामने आए हैं।

अंतिम परिणामों के सामने आने से पहले ही फ्रांस में भीषण हिंसा का माहौल है। प्रदर्शकारियों ने चुनाव नतीजों के रुझानों के साथ फ्रांस की सड़कों पर कब्जा कर लिया है। फ्रांस की राजधानी पेरिस में प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर गाड़ियों को इकट्ठा करके आग लगा दी और पुलिस से भी भिड़ गए।

दंगाइयों ने पुलिस पर पत्थर भी फेंके। कहीं कहीं कूड़ेदानों में भी आग लगा दी गई। फ्रांस के शहर नान्तेस में भी दंगाइयों ने कहर बरपाया है। अभी यह नहीं साफ है कि दंगाई किस समूह के हैं। पुलिस उन पर कब्जा करने में जुटी हुई है। दंगाइयों ने पेरिस के महत्वपूर्ण स्थानों पर तोड़फोड़ भी की है।

फ्रांस में दंगों के इतिहास को देखते हुए पहले से ही इस हिंसा का अंदाजा लगाया जा रहा था। वामपंथियों के इस हिंसा करने की आशंका जताई जा रही थी। इसके लिए फ्रांस में 30,000 पुलिसकर्मी लगाए गए थे। पेरिस समेत बड़े शहरों में महंगी दुकानों में बैरिकेड लगा दिए गए थे ताकि दंगे के दौरान उन्हें लूट से बचाया जा सके।

कुछ दुकानों के शीशों पर लकड़ी तक ठोंक दी गई ताकि प्रदर्शनकारी यहाँ से ना घुसें। गौरतलब है कि वामपंथियों ने पहले चरण की वोटिंग पूरी होने के बाद फ्रांस में कसके दंगे किए थे। 30 जून, 2024 को इन दंगाइयों ने फ़्रांस में कसके कहर बरपाया था।

वामपंथियों ने पहले चरण के चुनाव में दक्षिणपंथियो की बढ़त के बाद सार्वजनिक सम्पत्ति को जलाया था और पुलिस पर हमले किए थे। दूसरे चरण के बाद हिंसा किस समूह ने की है, यह स्पष्ट नहीं हो सका है। चुनाव नतीजों के बाद अब फ्रांस में वामपंथी प्रधानमंत्री बनने के कयास लगाए जा रहे हैं।

हल्द्वानी : दलित-दलित रोने वाली भीम आर्मी दलितों को पीटने वालों का केस वापस लेने की माँग पर अड़ी, वाल्मीकि-सोनकर परिवारों की बजाए मुस्लिमों के लिए माँगा मुआवजा

हल्द्वानी में दलितों को पीटने के आरोपित दंगाइयों का केस वापस लेने पर अड़ी 'भीम आर्मी' (चित्र साभार- X/@DrRituSingh_)
उत्तराखंड के हल्द्वानी में 8 फरवरी 2024 को हिंसा भड़क गई थी। पुलिस और नगर निगम स्टाफ के खिलाफ भड़की यह हिंसा अतिक्रमण हटाने के दौरान हुई थी। अब तक 58 दंगाइयों की गिरफ्तारी हो चुकी जबकि बाकियों की धरपकड़ के प्रयासों के साथ कुर्की जैसी कानूनी प्रक्रियाएँ जारी हैं। विगत 10 दिनों में प्रशासन के प्रयासों से हालात तेजी से सामान्य होते जा रहे हैं। हालाँकि इस बीच कुछ समूह और गिरोह अस्थिरता फ़ैलाने की फ़िराक में लगे हैं।

जहाँ 2 दिन पहले एक कथित फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने जा कर भ्रामक रिपोर्ट तैयार की तो वहीं अब ‘भीम आर्मी’ भी हिंसा पीड़ित मुस्लिमों से न मिलने देने पर प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जता रही है। सबसे खास बात तो यह है कि दलितों के हितों के नाम पर राजनीति कर रही भीम आर्मी नगर निगम के उन दलित स्टाफ के घर नहीं जा रही जिन्हे हिंसक भीड़ ने बेरहमी से मारा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शनिवार (17 फरवरी, 2024) को ‘भीम आर्मी’ का 60 सदस्यीय प्रतिनिध मंडल वनभूलपुरा के मुस्लिमों से मिलने निकला। इस प्रतिनिधि मंडल में राष्ट्रीय अध्यक्ष मनजीत नौटियाल के अलावा सोनू लाठी आदि मौजूद थे। प्रतिनिधि मंडल को उत्तराखंड पुलिस ने वनभूलपुरा क्षेत्र से काफी पहले ही हाईवे पर रोक दिया। प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्र में कर्फ्यू लागू होने की जानकारी दी और हालत सामान्य करने में उनसे सहयोग की अपील की। हालाँकि प्रतिनिधि मंडल ने प्रशासन की बात नहीं मानी। तब प्रशासन ने इस समूह को थोड़े समय तक एहतियातन थाने में रोका और बाद में वापस लौटा दिया।

भीम आर्मी के अन्य सदस्य इस बात को ले कर सोशल मीडिया पर काफी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। वापस लौटाए जाने से भड़के मनजीत नौटियाल ने अपनी माँगों के न माने जाने पर आंदोलन तक का ऐलान कर दिया। उनकी माँगों में बेगुनाह मुस्लिमों के मुकदमे वापस लेना और वनभूलपुरा के पीड़ितों को मुआवजे के तौर पर 60 लाख रुपए देना शामिल है। ‘भीम आर्मी’ राष्ट्रीय अध्यक्ष यह भी चाहते हैं कि नैनीताल प्रशासन ध्वस्त किए गए अवैध मदरसे और मस्जिद के लिए फिर से जमीन दिलाए।

दंगाइयों के हमले में सबसे अधिक दलित ही पीड़ित

हल्द्वानी हिंसा में सबसे अधिक नुकसान पुलिस और नगर निगम के कर्मचारियों को उठाना पड़ा है। ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में यह बात निकल कर सामने आई थी कि हिंसा के शिकार नगर निगम के अधिकतर स्टाफ अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से हैं। इनमें से मनोज और मिथुन वाल्मीकि के अलावा सागर सोनकर ने तो ऑपइंडिया से बात करते हुए हिंसक भीड़ की करतूत बताई थी। मनोज, मिथुन और सागर के हाथों और पैरों में फैक्चर तब हैं जिसका इलाज सरकार करवा रही है। इन सभी ने बताया कि उस दिन दंगाइयों ने उन्हें मार कर जिन्दा जलाने के लिए रास्ते में कँटीले तार तक बिछा कर रखे हुए थे।
वहीं SC वर्ग से ही आने वाले कॉन्ग्रेस नेता गब्बर वाल्मीकि ने भी माना कि वनभूलपुरा की हिंसक भीड़ ने कानून को तोडा था। गब्बर वाल्मीकि ने दंगाइयों पर कड़ी कार्रवाई की भी माँग प्रशासन से की थी। इन सभी के अलावा वनभूलपुरा से निकली हिंसक भीड़ जिस रिहायशी बस्ती गांधीनगर में घुसना चाह रही थी, वहाँ भी अधिकतर परिवार दलित समुदाय के ही हैं। इन परिवारों के तमाम सदस्य दंगाइयों के हमले में पुलिसकर्मियों, नगर निगम स्टाफ और अपने खुद के परिवार की रक्षा करते हुए घायल हुए हैं।
घायलों में अनुसूचित जाति के अमरदीप सोनकर को गंभीर चोटें आईं हैं और वो अभी तक बिस्तर पर ही हैं। उनके अलावा मनीष सोनकर का सिर फट गया, ऋतिक सोनकर के चेहरे पर कई घाव लगे और आर्यन सोनकर का हाथ टूट गया है। इन सभी के अलावा गाँधीनगर की SC वर्ग की महिलाओं ने हमें बताया कि आज भी उनके मन में हिंसक भीड़ का उन्मादी रूप घूमता है। यह सारा मोहल्ला पुलिस के साथ अपनी खुद की रक्षा के लिए एकजुट हो गया था। इसी मोहल्ले पर न सिर्फ गोलियाँ चलाई गईं बल्कि पत्थरों के साथ पेट्रोल बम भी फेंके गए थे।
घायलों की जानकारी ऑपइंडिया सहित कई अन्य मीडिया संस्थानों पर प्रकाशित की गई है। हालाँकि भीम आर्मी का प्रतिनिधि मंडल वनभूलपुरा क्षेत्र में रहने वाले मुस्लिमों के लिए संघर्ष कर रहा है। अभी तक उनके माँग पत्र में दलित वर्ग से आने वाले नगर निगम के स्टाफ व इसी वर्ग के गाँधीनगर के घायलों के लिए कोई स्थान नहीं दिया गया है।

मुरादाबाद को मुस्लिम बहुल बनाने के लिए 30,000 बांग्लादेशी को घुसाया… फिर दंगों में 83 मौतें: केंद्र+राज्य की कांग्रेस सरकार का No Action – 496 पन्नों की रिपोर्ट

        मुरादाबाद के 1980 दंगों से पहले साजिशन बसाए गए थे अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए (चित्र साभार- ऑर्गेनाइजर)
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 8 अगस्त 2023 को साल 1980 में हुए मुरादाबाद दंगों की जाँच रिपोर्ट पेश की। इस दंगे में कम से कम 83 लोगों की हत्या हुई थी और 112 अन्य घायल हो गए थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश एमपी सक्सेना के एक सदस्यीय पैनल ने इन दंगों पर 496 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की है। जस्टिस सक्सेना की इस रिपोर्ट में दंगों के असल कारणों और उससे हुए नुकसान का जिक्र किया गया था।

तब केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों में ही कांग्रेस की सरकार थी। इस रिपोर्ट में हिंसा के दौरान वहाँ मौजूद न सिर्फ मुस्लिम और हिन्दुओं बल्कि तब तैनात पुलिस अधिकारियों का भी हवाला दिया गया है। दंगे के दौरान दर्ज हुए 6 हिंदुओं की गवाही का भी इस रिपोर्ट में उल्लेख है।

मुरादाबाद दंगों की रिपोर्ट के हर बयान में यह साफ़ है कि नरसंहार की योजना पहले से ही बनाई गई थी। 1980 में हुए इन दंगों के चश्मदीदों में से एक संतोष सरन ने अपनी लिखित गवाही में कहा है कि हिंसा की वजह वोट बैंक और मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति थी।

दंगे 13 अगस्त 1980 में भड़के थे। अपनी गवाही में संतोष सरन ने खुलासा किया है कि दंगे भड़कने से पहले 30,000 से अधिक अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को सोची समझी साजिश के तहत लाकर बसाया गया था। इन्हें मुरादाबाद के मुस्लिम बहुल गाँवों में रखा गया था।

दंगों की प्रमुख वजह संतोष सरन ने जिले की डेमोग्राफी बदलने की साजिश बताया। सरन के अनुसार 1947 में मिली आजादी के समय मुरादाबाद मुस्लिम बहुल था। तब शहर की आबादी में 52 प्रतिशत मुस्लिम और 48% हिन्दू थे। लेकिन स्वतंत्रता मिलने के बाद कई मुस्लिम पाकिस्तान चले गए थे, जिस वजह से आज़ादी के बाद मुरादाबाद हिन्दू बहुल हो गया था। तब यहाँ 52 हिन्दू और 48 प्रतिशत मुस्लिम हो गए थे।

चश्मदीद सरन ने बताया कि कांग्रेस शासन में धीरे-धीरे मुरादाबाद में अवैध बांग्लादेशी मुस्लिमों की लगातार घुसपैठ करवाई गई। इस वजह से एक बार फिर शहर की जनसांख्यिकी बदल गई। इन्हीं अवैध घुसपैठियों को स्थानीय मुस्लिमों ने हिंदुओं के खिलाफ भड़काया।

आरोप यह भी है कि तत्कालीन राज्य और केंद्र की कांग्रेस सरकार ने इन अवैध घुसपैठियों पर कोई एक्शन नहीं लिया। चश्मदीद के मुताबिक कालांतर में इन्हीं अवैध मुस्लिम घुसपैठियों का दबदबा बढ़ता गया और मुरादाबाद में सांप्रदायिक हिंसा होना बहुत आम बात हो गई।

पिछली रिपोर्ट में एक अन्य चश्मदीद दयानंद गुप्ता की गवाही का जिक्र किया गया था। दयानंद के मुताबिक हिंसा की शुरुआत 13 अगस्त 1980 को मुरादाबाद के ईदगाह से हुई थी। इस दौरान मुस्लिम भीड़ ने पुलिस अधिकारियों और दलित समुदाय के वाल्मीकि लोगों पर बेवजह हमला किया था। इसके अलावा न्यायमूर्ति सक्सेना के नेतृत्व में हुई जाँच की रिपोर्ट में भाजपा, RSS व अन्य हिन्दू संगठनों को क्लीन चिट दी गई है।

इसी रिपोर्ट में हिंसा के लिए मुस्लिम लीग के कुछ राजनैतिक लोगों की सांप्रदायिक राजनीति को जिम्मेदार ठहराया गया था और बताया गया कि दंगो की वजह बना सांप्रदायिक उन्माद मुस्लिम लीग और कांग्रेस नेताओं द्वारा रची गई साजिश का परिणाम था। ‘मुरादाबाद में ईद की नमाज के दौरान ईदगाह में सुअर घुसने’ के आरोपों को भी इस रिपोर्ट में पूरी तरह से खारिज किया गया है।

साल 1980 के मुरादाबाद दंगों पर जस्टिस सक्सेना की 496 पन्नों की रिपोर्ट मई 1983 में ही तैयार कर दी गई थी। हालाँकि इतने साल बीत जाने के बाद भी इस रिपोर्ट को एक विभाग से दूसरे सरकारी विभाग तक घुमाया जाता रहा। इसी के साथ पिछले लगभग 4 दशकों में इस जाँच रिपोर्ट को कोई न कोई बहाना बना कर कम से कम 14 बार दबाया गया था।

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उत्तर प्रदेश : 43 साल बाद सामने आई मुरादाबाद दंगों की सच्चाई: हिंदुओं का हो कत्लेआम इसलिए नमाज में

योगी सरकार से पहले पहले किसी भी सरकार ने इसे सार्वजानिक नहीं किया। आखिरकार योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में UP में चल रही भाजपा सरकार ने 43 साल पुराने इस मामले को खोलने का फैसला लिया है। इसी साल मई में राज्य कैबिनेट ने न्यायमूर्ति एमपी सक्सेना आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करने का फैसला किया और मंगलवार 8 अगस्त को यह रिपोर्ट यूपी विधानसभा में पेश हुई।

हिंसाग्रस्त फ्रांस में योगी मॉडल की मांग, जर्मनी के प्रो जॉन ने कहा 24 घंटे में बंद हो जाएंगे दंगे

भारत में मोदी-योगी का जितना विरोध हो रहा है, लेकिन विदेशों में इन दोनों का कहीं अधिक गुणगान हो रहा है।

उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल की चर्चा अब विदेशों में भी होने लगी है। फ्रांस में एक किशोर की हत्या के बाद से हिंसा का दौर जारी है। पेरिस में हजारों की संख्या में हिंसक प्रदर्शनकारी तोड़फोड़ और आगजनी कर रहे हैं। उपद्रवी मकानों, दुकानों, सरकारी दफ्तरों और गाड़ियों को आग के हवाले कर रहे हैं। ऐसे में अब यूरोप में भी योगी मॉडल को लाने की मांग उठने लगी है। लोग कहने लगे हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फ्रांस में भेज दिया जाए, वे 24 घंटे में दंगों को शांत कर देंगे। यूरोप के जाने माने डॉक्टर और प्रोफेसर एन.जॉन कैम ने ट्वीट करते हुए कहा है कि भारत को फ्रांस दंगे को नियंत्रित करने के लिए योगी आदित्यनाथ को वहां भेजना चाहिए। वो 24 घंटे के भीतर ऐसा कर देंगे।

इसके साथ ही जर्मनी के विख्यात ह्रदय रोग विशेषज्ञ प्रो. एन जॉन कैम ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बुलडोजर के साथ एक कार्टून वाली फोटो पोस्ट करते हुए लिखा कि भारत में शासन करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का एकमात्र तरीका यही है। बाकी सब बकवास है।

प्रो. एन जॉन कैम के यह ट्वीट करते ही सोशल मीडिया में योगी मॉडल की चर्चा शुरू हो गई। लोग फ्रांस हिंसा और योगी मॉडल को लेकर तरह-तरह के कमेंट्स कर रहे हैं।

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नालंदा के 830 साल बाद फ्रांस में धू-धू कर जली लाइब्रेरी, घुसपैठियों को गले लगा कर फँसा यूरोप?

बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को उसके विशाल पुस्तकालय समेत जला दिया था, अब फ्रांस में भड़के दंगों के बीच लाइब्रेरी जला दी गई 
पूरा फ्रांस दंगों की आग में जल रहा है। जिसे भारत में संविधान की शपथ लेने वाले कुर्सी के भूखे नेता और पार्टियों को ध्यान से देख, कुर्सी की खातिर घुसपैठियों को समर्थन देने पर गंभीरता से विचार करना होगा। देश सुरक्षा को संकट से बचाने के लिए घुसपैठियों-रोहिंग्या, पाकिस्तानी और बांग्लादेशियों- को देश से बाहर करने के लिए समस्त पार्टियों को एकजुट होना पड़ेगा, क्योकि संविधान किसी भी अवैध घुसपैठियों को संरक्षण देने की अनुमति नहीं देता। लेकिन यहाँ अपनी कुर्सी की खातिर अवैध घुसपैठियों को हर सरकारी सुविधा दी जा रही है। जिसे खुलेआम संविधान की धज्जियाँ उड़ाना नाम देना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। 
27 जून, 2023 को पुलिस की गोली लगने से नहेल नाम के एक 17 वर्षीय मुस्लिम युवक की मौत हो गई, जिसके बाद ये हिंसा शुरू हुई। नहेल मूल रूप से अल्जीरिया का रहने वाला था। पुलिस का कहना है कि वो कार से लोगों को कुचल सकता था, इसीलिए गोली चलाई गई। उक्त पुलिस अधिकारी को हिरासत में लेकर जाँच शुरू कर दी गई है। लेकिन, इधर दंगाइयों ने कई बसों और कारों समेत मार्सेय के सबसे बड़े पुस्तकालय को फूँक दिया।

17 वर्ष की उम्र में फ्रांस में ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं मिलता है और नहेल पर गलत तरीके से गाड़ी चलाने का भी आरोप है। वो बस लेन में मर्सिडीज ड्राइव कर रहा था। पुलिस बार-बार कहती रही कि वो कार को रोक कर पार्क करे, लेकिन वो कार को भगाने लगा। नहेल अफ़्रीकी मूल का था, ऐसे में फ्रांस में बसे प्रवासियों ने दंगे शुरू कर दिए। नियम तोड़ने वाले फ्रांस के उस लड़के की बात नहीं हो रही, लेकिन पुलिस की आलोचना हो रही है।

पूरे फ्रांस में सैकड़ों सरकारी इमारतों को नुकसान पहुँचाया गया है। 40,000 पुलिसकर्मियों को कानून-व्यवस्था काबू में करने के लिए लगाया गया है। 600 से भी अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। 2000 दंगाइयों को गिरफ्तार किया गया है। वहाँ के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों एक कंसर्ट में अपनी पत्नी के साथ डांस करते हुए देखे गए। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ को वहाँ भेज दिया जाए, वो 24 घंटे के भीतर दंगों को नियंत्रित कर सकते हैं।

बतौर राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल में उन्हें बड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है क्योंकि पेंशन योजना में बदलाव के कारण उनके खिलाफ देश भर में प्रदर्शन हुए थे। 2005 में फ्रांस ऐसी ही स्थिति को झेल चुका है, जब पुलिस से छिपते हुए दो किशोरों की मौत के बाद 21 दिनों तक दंगे होते रहे थे और पुलिस को ‘स्टेट ऑफ इमरजेंसी’ घोषित करनी पड़ी थी। फ्रांस में कई बड़े कार्यक्रमों को बैन कर दिया गया है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने लोगों को अपने बच्चों पर नजर रखने को कहा है, उन्हें घर में रखने को कहा है।

उन्होंने TikTok और स्नैपचैट को संवेदनशील कंटेंट्स हटाने के लिए भी कहा है। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठन फ्रांस में मुस्लिमों के साथ भेदभाव के आरोप लगा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र तक ने फ्रांस की पुलिस को कार्रवाई में भेदभाव न करने के आरोप लगा दिए। फ्रांस में हमने ये भी देखा था कि कैसे पैगंबर मुहम्मद का कार्टून छापने के कारण जनवरी 2015 में शार्ली-हेब्दो मैगजीन के 12 कर्मचारियों को मार डाला गया था। इस कार्टून की बात करने पर एक मुस्लिम छात्र ने शिक्षक सैमुएल पैटी का गला रेत दिया था।

विद्यालयों-पुस्तकालयों को फूँकने वाली वो कौन सी मानसिकता है?

आखिर वो कौन सी मानसिकता है, जो विद्या के मंदिरों को भी फूँक देती है। विद्यालयों और पुस्तकालयों को जलाने वाले ये लोग कौन होते हैं? इसे जानने के लिए हमें 830 वर्ष पहले सन् 1193 में चलना पड़ेगा, जब इस्लामी आक्रांता बख्तियार खिलजी ने पूरे नालंदा विश्वविद्यालय को तबाह कर दिया था। साथ ही उसके 9 मंजिला पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया था। कहते हैं, वहाँ दुर्लभ प्राचीन पांडुलिपियों समेत लाखों पुस्तकें थीं जो धू-धू कर ऐसी जली कि महीनों तक जलती रही।
जब नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी, उसके अगले हजार वर्षों तक यूरोप में कोई यूनिवर्सिटी नहीं थी। संस्कृत व्याकरण से लेकर दर्शनशास्त्र और राजनीतिक शास्त्र की शिक्षा का गढ़ था नालंदा, जहाँ की कई इमारतें राजा-महाराजाओं और अमीर व्यापारियों ने अपने दान से बनवाई थी। दूर-दूर से छात्र यहाँ शिक्षा अर्जन के लिए आते थे। खुदाई में नालंदा को जलाए जाने के सबूत मिले, पता चला कि यहाँ कभी विशाल लाइब्रेरी हुआ करती थी। बौद्ध इतिहास का अध्ययन करने वालों ने भी इसे माना है।
दिल्ली सल्तनत के इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज ने अपनी फ़ारसी पुस्तक ‘तबकात-ए-नासिरी’ में लिखा है कि वहाँ पर कई ब्राह्मण थे, जिनके सिर मूँड़े हुए थे और फिर उनकी हत्या कर दी गई। उसने कई अन्य हिन्दुओं के नरसंहार की बात भी लिखी है। इस्लामी आक्रांताओं को कई पुस्तकें वहाँ मिली, इसका जिक्र भी इस किताब में है। नालंदा और इसके आसपास कई बौद्ध विहार थे, उन सबको भी बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया था।
सवाल ये है कि आखिर ये कौन सी मानसिकता है जो विद्या का सम्मान नहीं करती? सनातन धर्म में तो कहा गया है कि ‘अविद्यस्य कुतः धनम्’, अर्थात जिसके बाद विद्या नहीं है उसके पास धन कैसे आ सकता है। यानी, शिक्षा को सबसे ऊपर रखा गया है। तभी हमारे यहाँ राजा-महाराजाओं से भी ज्यादा ऋषि-मुनि लोकप्रिय हुए। विश्वामित्र-वशिष्ठ की धरती पर साधु-संतों को सबसे ज्यादा सम्मान मिला क्योंकि वो विद्वान थे, इन्होंने सिखाया कि कैसे शिक्षा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है और ये क्रम अनवरत ही चलता रहता है।
क्या यूरोप ने घुसपैठियों के लिए जो दरवाजे खोले हैं, उसके बाद इस तरह की समस्याएँ बढ़ गई हैं? 2021 में 23 लाख घुसपैठियों ने यूरोपियन यूनियन के देशों को अपना ठिकाना बनाया, वहीं 2022 में भी ये आँकड़ा इतना ही रहा। जर्मनी, फ्रांस और स्पेन वो तीन देश हैं, जो सबसे ज्यादा घुसपैठियों के ठिकाने बने। अब स्थिति ये है कि इतने कम समय में यूरोप की जनसंख्या का 6% हिस्सा प्रवासियों का हो गया है। उनकी जनसंख्या ढाई करोड़ के पार चली गई है।
समुद्री रास्तों से ये प्रवासी यहाँ आते हैं। यूरोपियन समुदाय हमेशा से खुले समाज के रूप में जाना जाता रहा है और वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता के अलावा औद्योगिक सफलता के कारण ये महाद्वीप खासा समृद्ध है। इंग्लैंड ने तो एक समय दुनिया के अधिकतर हिस्से पर राज किया। अब स्थिति ये है कि किसी वीडियो में देखने को मिलता है कि बीच का आनंद लेती महिलाओं के सामने ही समुद्र से सीधे घुसपैठियों की खेल पहुँचती है तो कभी घुसपैठियों द्वारा महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की खबरें आती हैं।
इटली में 2013 में एक रिपोर्ट में सामने आया था कि वहाँ हो रहे अधिकतर अपराधों में विदेशी घुसपैठिए ही शामिल थे। इसी तरह जर्मनी में 2017 में 27 घुसपैठियों ने हत्या या हत्या का प्रयास किया। स्थिति ये है कि फ़्रांस ने जब मोरक्को को FIFA वर्ल्ड कप 2022 के सेमीफाइनल में हरा दिया तो फ्रांस में दंगे शुरू हो गए। कारण साफ़ है, 99% सुन्नी मुस्लिमों वाला देश है मोरक्को और मुस्लिम जहाँ भी रहें, उनकी वफादारी अपने ‘उम्माह’ के प्रति रहती है, मातृभूमि नहीं इस्लाम के प्रति रहती है।

जब मुलायम सिंह यादव के भाषण के बाद बिजनौर में भड़के थे दंगे, हिन्दू महिलाएँ बनीं निशाना: 20+ मौतों का सरकारी आँकड़ा

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 10 अक्टूबर 2022 गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में अंतिम साँस ली। उनके बेटे अखिलेश यादव ने ट्वीट कर उनके निधन के बारे में बताया। मुलायम सिंह के निधन के बाद लोग उनके भाषण और उनसे जुड़ी घटनाओं को याद कर रहे हैं। इस क्रम में उनका 1990 में बिजनौर में दिया गया भाषण भी चर्चा में है। इसके बाद बिजनौर में दंगा भड़क गया था। यहाँ कर्फ्यू लगा दिया गया। दंगे में 20 से अधिक लोगों ने अपनी जान गँवा दी थी। वाहनों को फूँक डाला गया। कई दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। एक सप्ताह से ज्यादा का कर्फ्यू लगा रहा।

लेखक दिव्य कुमार सोती ने सपा नेता के निधन पर ट्विटर पर लिखा, “नेताजी चमत्कारी भाषण देते थे। 30 अक्टूबर 1990 को बिजनौर में भाषण दिया। सीएम नेताजी का हेलीकाप्टर उड़ा और रैली से उत्साहित होकर लौटी समुदाय विशेष की भीड़ ने पूरे जिले पर हमला कर दिया। राम मंदिर को लेकर यात्रा निकाल रही महिलाएँ उठा ली गईं। सरकारी आँकड़ा 20 मौतों का है, वैसे 200 प्लस। नमन।” इसके साथ ही उन्होंने ”अमर उजाला में प्रकाशित बिजनौर दंगों की उस रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट भी साझा किया है। यह रिपोर्ट अगस्त 2020 में प्रकाशित की गई थी।

32 साल (9 अक्टूबर 1990) पहले बिजनौर के प्रदर्शनी मैदान में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की सभा का आयोजन किया गया था। मुलायम सिंह की सभा में ट्रकों के अलावा अन्य वाहनों में लदकर एक संप्रदाय के लोग आए थे। मुख्यमंत्री ने सभा के दौरान भाषण दिया था कि अयोध्या में उनके रहते परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। उन्होंने पूरी अयोध्या की किलेबंदी कर दी थी। उस वक्त राम मंदिर को लेकर पहले से ही माहौल गरम था। ऐसे में मुलायम के हेलीकॉप्टर से उड़ते ही बिजनौर में तनाव व्याप्त हो गया। सभा के बाद दोनों संप्रदाय के लोग कई जगहों पर आमने-सामने आ गए थे। सभा से लौटते हुए वहाँ जमकर पथराव हुआ। यह तनाव कई दिनों तक चलता रहा।

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निहत्ते रामभक्तों से खून की होली खेलने वाले मुलायम सिंह की राम नाम सत्य होने पर महान कैसे ?
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निहत्ते रामभक्तों से खून की होली खेलने वाले मुलायम सिंह की राम नाम सत्य होने पर महान कैसे ?

30 अक्टूबर 1990 को बड़ी तादाद में लोग बिजनौर के एक स्कूल में राम मंदिर आंदोलन के मुद्दे को लेकर इकट्ठा हुए थे। उसके बाद कलक्ट्रेट में ज्ञापन देने के लिए निकले थे। जैसे ही लोग बाजार में घुसे उन पर पथराव और गोलीबारी शुरू हो गई। बिजनौर में दंगा भड़क गया। बताया जाता है कि इसमें 20 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। इस दंगे को याद करके आज भी लोग सिहर उठते हैं।

‘…भिंडरावाले मोदी को गले से पकड़ लेता’: सिंघू बॉर्डर पर खालिस्तानी आतंकियों का गुणगान करता बैनर

                                           किसान प्रदर्शन स्थल पर लगा खालिस्तानी पोस्टर
सितंबर 2020 में केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर लगभग 8 महीनों से कथित किसानों का प्रदर्शन जारी है। अगर यह आंदलोन वास्तव में कृषि कानूनों के खिलाफ होती तो इसका समाधान हो चुका होता और चीजें सुलझ गई होती, लेकिन अलगाववादी तत्वों और प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठनों के हस्तक्षेप ने चीजों को और अधिक अस्पष्ट बना दिया है।

कृषि कानूनों की आड़ में मोदी विरोधियों द्वारा तथाकथित किसान आंदोलन की नीयत उस समय ही स्पष्ट हो गयी थी, जब प्रदर्शन स्थलों पर खालिस्तान नारे और दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में गिरफ्तार दंगाइयों को रिहा करने की मांग होने के अलावा 26 जनवरी को लाल किला कांड ने हर बात एकदम खुलकर सामने ला दी है, जिस कारण वास्तविक किसान इस आंदोलन से पीछे हट गया है। वह समझ गया कि कृषि कानूनों की आड़ में देश अराजकता फैलाना है इन संगठनों का उद्देश्य है।  

अब तक देश ने इतने आंदोलन देखे, लेकिन किसी भी आंदोलन में बिरयानी, कोरमा, पिज्जा, ड्राई फ्रूट्स और अन्य स्वादिष्ट व्यंजनों के अलावा मसाज एवं भीड़ इकठ्ठा करने बार-बालाओं का नाच नहीं देखा, जो स्पष्ट रूप से प्रमाणित कर रहा है कि विरोध कृषि कानूनों का नहीं, बल्कि मोदी का हो रहा है। 

हाल ही में, ऑपइंडिया ने उन कारणों को सूचीबद्ध किया जिनके खिलाफ इन तथाकथित किसानों ने विरोध किया, जिसमें कट्टर अपराधियों और नक्सलियों को मुक्त करने की माँग शामिल थी।

विरोध प्रदर्शन के शुरुआती दिनों से ही एक बात स्पष्ट हो गई है कि खालिस्तानियों सहित अलगाववादी शक्तियों ने आंदोलन में घुसपैठ की है। पत्रकार स्वाति गोयल ने 18 जुलाई को सिंघू बॉर्डर पर बने पिंड अखाड़े की तस्वीर शेयर की। इन ‘अखाड़ों’ की स्थापना इसलिए की गई है ताकि किसान केंद्र सरकार के विरोध में रहकर व्यायाम कर सकें। सुनने में काफी दिलचस्प लगता है न?

चीजें अपेक्षा से अधिक गंभीर हैं। अखाड़े के बैनर में पंजाबी में एक कोटेशन है, जिसमें लिखा गया है, “आज हुंदा भिंडरांवाला जे, मोदी नु गल टन फड़ लंदा” जिसका अर्थ है “अगर भिंडरावाले यहाँ होता, तो वह मोदी को गले से पकड़ लेता।”

पंजाब में भिंडरांवाले के लिए भावनाएँ कभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुईं और पिछले कुछ सालों से राजनीतिक तत्वों और विदेशी संगठनों द्वारा लगातार यही भावनाएँ भड़काई गई हैं। ये किसान विरोध पोस्टर, बैनर, भाषणों और भिंडरांवाले और अन्य की प्रशंसा करने वाले गीतों से भरे हुए हैं, जिन्हें उस समय भारतीय सेना और पंजाब पुलिस ने मार गिराया था।

बैनर पर लिखे लिरिक्स उसी एक गीत से प्रेरित हैं। गाना सितंबर 2020 के आसपास लॉन्च किया गया था जब पूरे पंजाब में विरोध प्रदर्शन बढ़ रहे थे। यूके के जगोवाला जत्था द्वारा रिलीज किए गए इस गाने में भिंडरांवाले की तारीफ की गई है। इसमें लिखा है, “वह राजसी नेता, जिसमें अकेले सिस्टम से लड़ने की हिम्मत थी, आज अगर वह जिंदा होता तो पीएम मोदी को गले से पकड़ लेता।”

गाने में आगे कहा गया है कि भिंडरांवाले निडर था और उसने भारत सरकार की बात पर ध्यान नहीं दिया। अगर वह वहाँ होता तो मोदी सरकार के साथ भी ऐसा ही करता। इसमें कहा गया है, ”उसने विरोध का रास्ता नहीं चुना होता। अगर उन्होंने हथियार उठाकर अपने अनुयायियों को बुलाया होता, तो सरकार कोठरी में छिप जाती।”

इसमें आगे दावा किया गया है कि हालाँकि किसान अपना सारा जीवन खेतों में बिता देते हैं, लेकिन उन्हें उपज का सही मूल्य नहीं मिलता है। जाहिर है, खालिस्तान आंदोलन भी किसानों के विरोध और उपज के सही मूल्य की माँग के कारण शुरू हुआ माना जाता है। ऐसा लगता है कि गोली चलाने के लिए किसानों के कंधों का इस्तेमाल करना भारत विरोधी ताकतों के लिए अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का सबसे आसान तरीका है।

विडंबना यह है कि तीन किसान कानून किसानों को अपनी उपज कहीं भी और किसी को भी बेचने का अधिकार देते हैं, उन्हें मंडियों के चंगुल से मुक्त करते हैं और उन्हें मूल्य निर्धारण और बातचीत के संबंध में शक्ति भी देते हैं।

भिंडरांवाले के गुणगान करने वाले गीतों की पहुँच

चौंकाने वाली बात यह है कि ये गाने सिर्फ Youtube या WhatsApp पर फॉरवर्ड करने तक ही सीमित नहीं हैं। ये Spotify, Amazon Music, Gaana, Hungama और Wynk जैसे कई म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर ‘कानूनी रूप से’ उपलब्ध हैं।

हाथरस : जातीय दंगा फैलाने के लिए मॉरीशस से भेजे गए ₹50 करोड़, पूरी फंडिंग ₹100 करोड़ से भी ज्यादा

                                    हाथरस के बहाने थी जातीय दंगा फ़ैलाने की साजिश (साभार: संजीवनी टुडे)
मोदी-योगी विरोधी बात-बात पर संविधान की दुहाई देते हैं, परन्तु खेलते भारत विरोधियों के हाथ हैं। CAA विरोध में भी यह बात सामने आयी और अब हाथरस कांड पर। मोदी सरकार को इन बिकाऊ लोगों के साथ साम, दाम, दंड, भेद अपनाकर सख्ती से पेश आने की जरुरत हैं, ताकि भारत पुनः गुलाम न बनने पाए। इन्हीं बिकाऊ जयचंदों के कारण हिन्दू साम्राज्य समाप्त हुआ था। ऐसा कानून बनाया जाए कि ऐसे लोग पंचायत से लेकर संसद तक कोई चुनाव न लड़ने पाएं। किसी भी प्रकार की सरकारी सुविधा न दी जाए। विदेशों से आये दान के पैसे पर अपनी ही जनता की खून की होली खेलने वालों पर सख्ती बहुत जरुरी है। इन बेशर्मों से पूछा जाए कि "संविधान को कौन बदनाम कर रहा है? क्या भारत का संविधान भारत विरोधियों के हाथ बिक भारत के विरुद्ध षड़यंत्र करने की इजाजत देता है?"
जनता को भी ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए। 

हाथरस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शुरुआती रिपोर्ट ने बड़ा खुलासा किया है। मीडिया खबरों में ईडी की रिपोर्ट का हवाला देकर बताया जा रहा है कि इस कांड के बहाने जातीय दंगा फैलाने के लिए पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के पास मॉरिशस से 50 करोड़ रुपए आए थे।

इसके अलावा ईडी ने दावा किया है कि पूरी फंडिंग 100 करोड़ रुपए से अधिक की थी। अब आगे पूरे मामले की पड़ताल की जा रही है। जानकारी के अनुसार, सोशल मीडिया से अफवाहों को फैला कर प्रदेश और देश की शांति व्यवस्था को बिगाड़ने की साजिश रची जा रही थी। हालाँकि, यूपी पुलिस की मुस्तैदी और खूफिया एजेंसियों के अलर्ट होने के कारण इस पूरी साजिश का पर्दाफाश हो गया।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली से उत्तर प्रदेश के हाथरस जाते हुए 4 संदिग्ध लोगों को मथुरा पुलिस ने 5 अक्टूबर को गिरफ्तार किया था। पड़ताल में पता चला था कि इनके लिंक पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) से हैं। टोल प्लाजा पर चेकिंग के दौरान इनकी गिरफ्तारी हुई थी। अब मथुरा पुलिस इनसे जुड़े हर पहलू पर जाँच कर रही है।

पुलिस ने इनकी पहचान उर रहमान पुत्र रौनक अली निवासी नगला थाना रतनपुरी जिला मुजफ्फरनगर; सिद्दीकी पुत्र मोहम्मद चैरूर निवासी बेंगारा थाना मल्लपुरम केरल; मसूद अहमद निवासी कस्बा व थाना जरवल जिला बहराइच व आलम पुत्र लईक पहलवान निवासी घेर फतेह खान थाना कोतवाली जिला रामपुर, के रूप में की थी।

इनमें से एक पीएफआई सदस्य जामिया का छात्र है। इसका नाम मसूद अहमद है। मसूद बहराइच जिले के जरवल रोड के मोहल्ला बैरा काजी का रहने वाला है और दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया में एलएलबी का छात्र है। वह 2 साल पहले पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया की स्टूडेंट विंग कैम्पस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) से जुड़ा था।

यहाँ बता दें कि इससे पहले इस मामले में खुलासा हुआ था कि विरोध प्रदर्शन की आड़ में ‘जस्टिस फार हाथरस’ नाम से रातों रात वेबसाइट तैयार हुई और वेबसाइट में फर्जी आईडी के जरिए हजारों लोग जोड़े गए। इसमें देश और प्रदेश में दंगे कराने और दंगों के बाद बचने का तरीका बताया गया। यहाँ मदद के बहाने दंगों के लिए फंडिंग की जा रही थी। जाँच एजेंसी को फंडिंग के जरिए अफवाहें फैलाने के लिए सोशल मीडिया के दुरूपयोग के भी सुराग मिले हैं।

भारत का सबसे बड़ा घोटाला : SECULARISM का क़त्ल

India में Secular पार्टियों ने Secularism के ...
                                                                साभार : यूट्यूब 
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
शीर्षक देख आप सोंचगे कि भारत का सबसे बड़ा घोटाला SECULARISM का क़त्ल ये क्या विरोधाभास? SECULARISM में घोटाला कैसे, इसमें लेन-देन का तो कोई मतलब ही नहीं। इसमें वह गुप्त लेन-देन है, जिसे जनता से गुप्त रखा जाता है; और फिर SECULARISM का क़त्ल, इस शीर्षक की गूढ़ता को समझने के हमें कुछ दूर चलना होगा, इस शब्द के नाम पर हमारे छद्दम नेताओं और पार्टियों ने सेक्युलरिम और तुष्टिकरण कर अपनी कुर्सी को बचाते अपनी तिजोरियां भर जनता के मूल अधिकारों का हनन करते रहे, क्या इसे घोटाले का नाम देना गलत है। फिर सेकुलरिज्म के साथ-साथ तुष्टिकरण जनता में मतभेद पैदा करना सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं।  

हम आज जिस भारत में रहते हैं वहां एक विचित्र प्रकार की प्रजाति पायी जाती है, सेक्युलर। 
विचित्र इसलिए कहा कि आज ये मुक़द्दस शब्द एक गाली बन चूका है। आज सेकुलरिज्म का मतलब रह गया है तुष्टिकरण।
इन दोनों वीडियो को गंभीरता से सुनिए और निर्णय करिये कि क्या खुलेआम सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं हो रहा?
आज सब से ज्यादा सेक्युलर वो माना जाता है जो इफ्तार पार्टीज में सब से ज्यादा गोल टोपी पहन कर सब से सही तरीके से दुआ मांग सके भले ही उस के बाद वो अपने वोट बैंक की राजनीती के लिए इन्ही गोल टोपी वालों कि लाशें बिछाने का ही प्रबंध क्यों न करने लग जाये। आज सेक्युलर वो है जो इसराइल के विरोध में छाती कूटे और ISIS पर खामोश रहे। आज सेक्युलर वो है जो धर्म आधारित जनगणना करा के सेना में भी धर्म के नाम पर फुट डाले। आज सेक्युलर वो है जो भारत के प्रधानमंत्री को जितनी गन्दी गालियां दे या जितने गिरे हुए शब्दों से सम्बोधित करे। आज सेक्युलर वो है जो भारत के सनातन धर्म को अपमानित करे और इसे गलत ठहराने का प्रयास करे! आज सेक्युलर वो है जो गोधरा दंगों को कम्युनल बताये और आसाम दंगो एवं अन्य दंगों को बाहरी बनाम स्थानीय लोगों का संघर्ष। आज सेक्युलर वो है जो मुसलमानो के पक्ष में बोल कर, उनकी सहानुभूति बटोर कर सत्ता का सुख भोगे और फिर उन्हें हिन्दुओं से खतरा बता कर बेवकूफ बनाता रहे
देखिए मेरा स्तम्भ, जिसका आज तक
किसी ने खंडन नहीं किया 
ये सब करने से कोई समस्या नहीं है। आप अपना वोट बैंक बढ़ाओ, अपनी राजनीती चमकाओ, अपना फायदा बनाओ। लेकिन उसकी आड़ में समाज में वैमनस्यता मत फैलाओ, किसी समुदाय में दूसरे समुदाय के प्रति डर और विद्वेस कि भावना मत भड़काओ, एक समुदाय से दूसरे समुदाय के लोगो के सर न कटवाओ। आप का बोया हुआ ये विष किस हद तक प्रलयंकारी हो सकता है शायद आपको अंदाजा नहीं या है भी तो आप उसे अनदेखा कर रहे हैं अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए। आपने मुसलमानो कि इतनी तरफदारी की कि हिन्दुओं में उनके प्रति ईर्ष्या भड़कने लगी और जिसे कुछ संगठनो ने हवा दे कर द्वेष बना दिया। आपने उस द्वेष को भुनाने के लिए पुनः तरफदारी कि और इस तरह ये बढ़ता गया। और बढ़ते बढ़ते इतना बढ़ गया कि आज छोटी छोटी सी बात पर ये समुदाय एक दूसरे के खून के प्यासे हो उठते हैं। ये इतना बढ़ गया है कि आज किसी मंदिर में गाय का मांस या किसी मस्जिद में सुवर का मांस मिलने पर ये बाद में पता लगाया जाता है कि ये किसकी करतूत है जबकि और दो चार लाशें पहले बिछा दी जाती हैं। मुसलमान की बस्ती से दुर्गा पूजा का जुलुस या हिन्दू कि बस्ती से मुहर्रम का जुलुस निकलने पर आपस में मर पिट और दंगे हो जाते हैं। किसी मौलाना के एक बयां पर कारसेवकों को ट्रेन में जिन्दा जल दिया जाता है और फिर उस का बदला लेने के लिए निर्दोष बच्चों, औरतों और बूढ़ों तक का कत्लेआम कर दिया जाता है।

साभार सोशल मीडिया (बहुत वायरल
हो रहा है )
आप जब तक किसी समुदाय विशेष कि तरफदारी करेंगे, अलग समुदायों के लिए अलग कानून बनाएंगे, समुदाय विशेष को कोई विशेष सुविधा देंगे तब तक ये चलता ही रहेगा। आप अलगाववादियों के नाम पर रोना रोते हैं जबकि आपकी इसी व्यवस्था ने उन अलगाववादियों को उनका बारूद मुहैया कराया है और कराता रहेगा। ये लकीर खींचने का काम आपने किया है। आपने सरकारी प्रतिवेदनों में धर्म के लिए एक कॉलम दिया।क्या भारतीय होना काफी नहीं था? आपने धर्म के आधार पर देश बांटा और दिल भी बांटे। क्या सारे धर्म के लोग एक साथ नहीं रह सकते थे? आपने हिन्दू को हिन्दू और मुसलमान को मुसलमान बताया। क्या वो इंसान नहीं हो सकते थे? आप ने धर्म आधारित राजनीती शुरू की। क्या वो मुद्दे आधारित नहीं हो सकते थे? आपने मुसलमानो को वोट बैंक बनाया। क्या वो मुख्यधारा का हिस्सा नहीं हो सकते थे? और इतना सब कुछ कर के भी आपने मुसलमानो का क्या भला किया? कुछ भी नहीं, बस दो चार मुसलमान नेता पैदा कर दिए जो आपके ही अजेंडे को हवा दे रहे हैं बजाये कि मुसलमानो के लिए कुछ करते। आप सेक्युलर बनते हैं जबकि आप तो आज तक इसका अर्थ ही नहीं समझ पाये
धर्म के मुद्दे बड़े संवेदनशील होते हैं, उनमें तर्क-वितर्क करना (तथाकथित धर्म गुरुओं के अनुसार) अपराध माना जाता है फिर उनमें अपने अनुसार नीतियां बना ली जाती हैं, जिनका पालन उस धर्म के मानने वालों द्वारा किया जाता है मगर सवाल खड़ा तब हो जाता है जब आज के मॉडर्न धार्मिक ठेकेदार अपने हिसाब से मान्यताओं को सेट करने लग जाता है
यहाँ सवाल खड़ा होता है कि हर दूसरे दिन ऐसी स्थितियों को देखकर इस देश में ‘सेकुलरिज्म’ शब्द के लिए जगह कहाँ बचती है? अगर एक दूसरे के धर्म से इतनी नफरत की जा रही है तो आपस में मेल जोल बढ़ाने की गुंजाईश कहाँ बचती है? फिर किसी की व्यक्तिगत आजादी और स्वतंत्रता की जगह कहाँ बचती है? सेकुलरिज्म की आड़ में अपने अजेंडे सेट करने वालों के लिये यही सवाल खड़ा होता है कि क्या अब सभी को एक दूसरे के धार्मिक त्योहारों पर बधाई देना, उनकी ख़ुशी में शामिल होना, उनमे भाग लेना बंद कर देना चाहिए?
Hindu 2.0 - Power hungry Congress never thought about... | Facebookआपके अपने धर्म में अपनी सुविधा के हिसाब से काम न होते ही उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं तो आपको सीधा सिद्धांत बना देना चाहिए कि न हम किसी के घर में जाएंगे और न किसी को आने देंगे हर दूसरे दिन मज़ारों पर जाकर माथा टेकने वालों, चादर चढाने वालों पर बैन लगा देना चाहिए
सोशल मीडिया पर आज सेकुलरिज्म स्कैम वायरल हो रहा है। इसमें उन सेकुलर, लिबरल, वामपंथियों, अवार्ड वापसी और टुकड़े-टुकड़े गैंग के लोगों को फटकार लगाई गई है जो हर मुद्दे पर सेलेक्टिव अप्रोच रखते हैं। हिन्दुओं की आस्था की बात हो, हिन्दुओं के देवी-देवाताओं के अपमान का मामला हो तो सेकुलर-लिबरल गैंग के लोग फ्रीडम ऑफ स्पीच का राग अलापने लगते हैं। हिन्दुओं की भावनाओं से खेलने वाले लेख और फिल्मों का बचाव करने लगते हैं। लेकिन जब मामला मुस्लिम समुदाय से जुड़ा हो तो यही लोग चुप्पी साध लेते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जब कोई व्यक्ति बेंगलुरु में पैगंबर पर कोई टिप्पणी करता है तो हजारों की संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग घर से बाहर निकल जमकर आगजनी करते हैं और कथित सेकुलर-लिबरल अवार्ड वापसी गैंग के लोग कुछ नहीं बोलते हैं। 
*अयोध्या मुद्दे को लीजिए: कौन नहीं जानता कि मुगलों ने हिन्दू मंदिरों को मस्जिद और दरगाहों में परिवर्तित नहीं किया? लेकिन चंद चांदी के टुकड़ों के लालच में कांग्रेस और वामपंथियों ने भारतीय इतिहास को ही बदल दिया। मुग़ल आक्रांताओं को महान बता दिया। क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
*जब कोर्ट के आदेश पर अयोध्या में राममंदिर परिसर में खुदाई कर मंदिर और मस्जिद के सबूत निकालने  पर जब मंदिर के हज़ारों अवशेष मिलने पर उन्हें कोर्ट से छुपाए पर उस समय कितने मीडिया ने अवशेषों को छुपा कर कोर्ट को धोखा देने की बात कही? उस समय हिन्दू संगठनों को सांप्रदायिक करार देने में लगभग सारा मीडिया लामबंद था, क्यों? क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं था?
*कहाँ था सेकुलरिज्म जब पुरुषोत्तम श्रीराम को काल्पनिक कहा जा रहा था? क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
*कहाँ था सेकुलरिज्म जब निहत्ते रामभक्तों से उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह गोलियों से मरवा रहे थे? क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
*कहाँ था सेकुलरिज्म जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार ने 84 कोसी यात्रा को प्रतिबंधित करने का दुस्साहस किया था? क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
*कहाँ था सेकुलरिज्म जब पेंटर एम.एफ.हुसैन हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्र बना रहा था, और उसका विरोध करना अभिव्यक्ति आज़ादी कह हिन्दू संगठनों को साम्प्रदायिकता फ़ैलाने का आरोप लगा रहे थे? इतना ही नहीं हिन्दू धर्म को हीनभावना से देखने वाले इस पेंटर को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित करना क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
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       क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
Anti Hindu Communal Violence Bill will be challenged by BJP in ...सोनिया गांधी के नेतृत्व में बनाया गया  "Communal violence bill"
कांग्रेस के लिये जान फूंकने वाले हिन्दुओं देखो सोनिया गाँधी की भयानक खतरनाक साजिश। जिसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जायेगा।
अगर लागू हो गया होता तो आज मरना भी दूभर हो जाता। मुग़ल युग से बदतर ज़िन्दगी जी रहे होते। 
तुम्हारे विनाश वाला बिल जिसे काँग्रेस हिंदुओ के खिलाफ ऐसा बिल लेकर आई थी जिसको सुनकर आप कांप उठेंगे । परन्तु भाजपा के जबरदस्त विरोध के कारण वह पास नहीं करवा सकी । मुझे यकीन है कि 90% हिन्दुओ को  तो अपने खिलाफ आये इस बिल के बारे में कुछ पता भी नहीं होगा जिसमें शिक्षित हिंदू भी शामिल है क्योंकि हिंदू सम्पत्ति जुटाने में लगा है उसको इस सब बातों को जानने के लिए समय नहीं है। जबकि मुसलमान के अनपढ़ भी इतने जागरूक है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में धर्म के आधार पर प्रताड़ित किये गए हिन्दू व अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को नागरिकता देने वाले CAA क़ानून के खिलाफ मुसलमान का बच्चा बच्चा उठ खड़ा हुआ। 
क्या है "दंगा नियंत्रण कानून"
हिंदू समाज के लिए फांसी का फंदा, कुछ एक लोगों को इस बिल के बारे में पता होगा, 2011 में इस बिल की रुप रेखा को सोनिया गाँधी की विशेष टीम ने बनाया था जिसे NAC भी कहते थे, इस टीम में दर्जन भर से ज्यादा सदस्य थे और सब वही थे जिन्हें आजकल अर्बन नक्सली कहा जाता है.. कांग्रेस का कहना था की इस बिल के जरिये वो देश में होने वाले दंगों को रोकेंगे। अब इस बिल में कई प्रावधानो पर जरा नजर डालिए :--
इस बिल में प्रावधान था कि दंगों के दौरान दर्ज अल्पसंख्यक से सम्बंधित किसी भी मामले में सुनवाई कोई हिंदू जज नहीं कर सकता था ।
अगर कोई अल्पसंख्यक सिर्फ यह आरोप लगा दे कि मुझसे भेदभाव किया गया है तो पुलिस को अधिकार था कि आपके पक्ष को सुने बिना आपको जेल में डालने का हक होगा और इन केसों में जज भी अल्पसंख्यक ही होगा..
इस बिल में ये प्रावधान किया गया था कि कोई भी हिन्दू दंगों के दौरान हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ 
के लिये अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध केस दर्ज नहीं करवा सकता ।
इस बिल में प्रावधान किया गया था कि अगर कोई अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति हिन्दू पर हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़, हत्या का आरोप लगाता है तो कोर्ट में साक्ष्य पेश करने की जिम्मेदारी उसकी नहीं है केवल मुकदमा दर्ज करवा देना ही काफ़ी है । बल्कि कोर्ट में निर्दोष साबित होने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की है जिस पर आरोप लगाया गया है ।
इस बिल में ये प्रावधान किया गया था कि दंगों के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय को हुए किसी भी प्रकार के नुकसान के लिए बहुसंख्यक को जिम्मेदार मानते हुए अल्पसंख्यक समुदाय के नुकसान की भरपाई हिंदू से की जाए । जबकि बहुसंख्यक के नुकसान के लिए अल्पसंख्यक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता था ।
अगर आपके घर में कोई कमरा खाली है और कोई मुस्लिम आपके घर आता है उसे किराए पर मांगने के लिए तो तो आप उसे कमरा देने से इंकार नहीं कर सकते थे क्योंकि उसे बस इतना ही कहना था कि आपने उसे मुसलमान होने की वजह से कमरा देने से मना कर दिया यानि आपकी बहन बेटी को छेड़ने वाले किसी अल्पसंख्यक के खिलाफ भी हम कुछ नहीं कर सकते थे। मतलब कि अगर कोई छेड़े तो छेड़ते रहने दो वर्ना वो आपके खिलाफ कुछ भी आरोप लगा देता….. आपकी सीधी गिरफ़्तारी और ऊपर से जज भी अल्पसंख्यक..
देश के किसी भी हिस्से में दंगा होता, चाहे वो मुस्लिम बहुल इलाका ही क्यों न हो, दंगा चाहे कोई भी शुरू करता पर दंगे के लिए उस इलाके के वयस्क हिन्दू पुरुषों को ही दोषी माना जाता और उनके खिलाफ केस दर्ज कर जांचें शुरू होती। और इस स्थिति में भी जज केवल अल्पसंख्यक ही होता ऐसे किसी भी दंगे में चाहे किसी ने भी शुरू किया हो..
अगर दंगों वाले इलाके में किसी भी हिन्दू बच्ची या हिन्दू महिला का रेप होता तो उसे रेप ही नहीं माना जाता । बहुसंख्यक है हिन्दू इसलिए उसकी महिला का रेप रेप नहीं माना जायेगा और इतना ही नहीं कोई हिन्दू महिला बलात्कार की पीड़ित हो जाती और वो शिकायत करने जाती तो अल्पसंख्यक के खिलाफ नफरत फ़ैलाने का केस उस पर अलग से डाला जाता..
इस एक्ट में एक और प्रस्ताव था जिसके तहत आपको पुलिस पकड़ कर ले जाती अगर आप पूछते की आपने अपराध क्या किया है तो पुलिस कहती की तुमने अल्पसंख्यक के खिलाफ अपराध किया है, तो आप पूछते की उस अल्पसंख्यक का नाम तो बताओ, तो पुलिस कहती – नहीं शिकायतकर्ता का नाम गुप्त रखा जायेगा..
कांग्रेस के दंगा नियंत्रण कानून में ये भी प्रावधान था की कोई भी इलाका हो बहुसंख्यको को अपने किसी भी धार्मिक कार्यक्रम से पहले वहां के अल्पसंख्यकों का NOC लेना जरुरी होता यानि उन्हें कार्यक्रम से कोई समस्या तो नहीं है । ऐसे हालात में अल्पसंख्यक बैठे बैठे जजिया कमाते क्यूंकि आपको कोई भी धार्मिक काम से पहले उनकी NOC लेनी होती, और वो आपसे पैसे की वसूली करते और आप शिकायत करते तो भेदभाव का केस आप पर और ऐसे हालात में जज भी अल्पसंख्यक..और भी अनेको प्रावधान थे कांग्रेस के इस दंगा नियंत्रण कानून में जिसे अंग्रेजी में # Communal Violence Bill भी कहते है..
सुब्रमण्यम स्वामी ने इस बिल का सबसे पहले विरोध शुरू किया था और उन्होंने इस बिल के बारे में लोगों को जब बताया था तो 2012 में हिन्दू काँप उठे थे तभी से कांग्रेस के खिलाफ हिन्दुओं ने एकजुट होना शुरू कर दिया था। सुब्रमण्यम स्वामी का इस "Communal Violence Bill" पर विरोध सुनिए : .

(इस भाषण में सुब्रमण्यम सोनिया गाँधी की जिस समिति का नाम ले रहे हैं, अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, योगेंद्र यादव इसी समिति के देन है, जिसके विषय में विस्तार से आम आदमी पार्टी बनने पर  लिख चूका हूँ। (देखिए ऊपर पृष्ठ) कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों सिक्के के एक ही पहलु हैं।)
अब इस के बाद भी जो हिन्दू कांग्रेस को support करता है वे जाने अनजाने अपने ही लोगो के लिए नरक का द्वार खोल रहे है। 
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वीडियो से लिए गए स्क्रीनशॉट राम मंदिर भूमि पूजन के बाद 5 अगस्त का दिन पूरे देश में दीपावली की तरह मनाया गया। हर हिंद.....
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  • जब इसी हिंदुस्तान में हिन्दू देवी-देवताओं पर अश्लील फब्तियॉं कसी जाती है। उनके अश्लील चित्र बनाए जाते हैं। क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
  • कॉमेडी शो में हिन्दू संस्कृति, हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाया जाता है। माँ दुर्गा को वेश्या तक कहा गया। क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
  • सीता माता एवं रावण के सम्बंध बताना एवं जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण के चरित्र पर सवाल उठाना क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
  • हाल ही में असम में एक प्रोफेसर ने भगवान राम पर अश्लील टिप्पणी की थी। लेकिन देश में कहीं भी न हिन्दू धर्म खतरे में आया, न ही कहीं दंगे हुए। क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
  • केरल में माँ दुर्गा की नग्न तस्वीर का पोस्टर वामपंथी कई बार लगा चुके हैं। क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
  • दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने माँ दुर्गा को वेश्या तक कह दिया था। अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बकायदा अकाउंट हैं, जिनका काम ही हिन्दू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक पोस्ट करना है।क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं? 
  • जब इस्लामिक आतंकवादियों को बचाने "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" बेकसूर हिन्दू साधु-संत और अन्य हिन्दुओं(साध्वी प्रज्ञा, स्वामी असीमानंद और कर्नल पुरोहित आदि) को जेलों में डाला जा रहा था, क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
  • जब पकडे गए आतंकवादियों को कोरमा और बिरयानी खिलाई जा रही थी, तो दूसरी तरफ इन बेकसूर साधु-संतों की सात्विकता का हनन किया जा रहा था, क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
  • जब नागरिकता संशोधक कानून के विरोध में सरकार के विरुद्ध नारेबाजी करना समझ आता है, लेकिन "fuck Hindutva", "हिन्दुत्व तेरी कब्र खुदेगी" आदि नारे लगाए जाना क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?
  • नागरिकता संशोधक कानून प्रदर्शनों के आड़ में दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगा क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं? 
  • अल्पसंख्यक आयोग का गठन करना क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं? क्या अल्पसंख्यक भारत के नागरिक नहीं?
  • घुसपैठियों के आधार कार्ड, राशन कार्ड और मतदाता पहचान-पत्र बनवाना क्या यह सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं? 
  • इसी साल फरवरी में भयानक हिंदू विरोधी दंगे हुए थे। दंगों के एक आरोपित ताहिर हुसैन ने  कबूल किया है दंगों की योजना कई महीने पहले ही बना ली गई थी। इन्हें विदेशी ताकतों का समर्थन और पैसा भी हासिल था। विदेशियों के हाथ की कठपुतली बन देश में साम्प्रदायिकता फैलाना क्या सेकुलरिज्म का क़त्ल नहीं?

सेकुलर, लिबरल, वामपंथियों, अवार्ड वापसी और टुकड़े-टुकड़े गैंग के लोगों के इसी दोगलेपन को देखते हुए सोशल मीडिया पर सेकुलरिज्म स्कैम वायरल हो रहा हैं।










Ambedkar on Islamबेंगलुरु में दलित विधायक के घर कट्टरपंथी मुसलमानों के हमले के बीच वायरल हो रहा है जेएनयू के प्रोफेसर का ट्वीट
समस्या क्या है कि सब कुछ आपके हिसाब से सेट होना चाहिए हलाला के नाम पर महिला का रेप सकते हैं मस्जिद में बच्ची का बलात्कार कर सकते हैं आतंकियों का समर्थन कर सकते हैं मस्जिद में हथियार रख सकते हैं टीवी देखने का विरोध कर टीवी पर डिबेट में बैठ सकते हैं आप आजादी का झंडा बुलंद कर तीन तलाक का विरोध कर सकते हैं आप अफजल के लिए शर्मिंदा हो सकते हैं, आप भारत के टुकड़े टुकड़े करने के लिए तैयार हो सकते हैं,आप पत्थरबाजों को मासूम बता सकते है, आर्मी को रेपिस्ट और सड़क का गुंडा बता सकते हैं आप ‘ भगवा आतंकवाद’ जैसे शब्द गढ़ सकते हैं इन सब कर्मों को वालों का जब सजा भुगतने का वक्त आता है तो आप मानवाधिकार और आजादी का रोना रो सकते हैं मगर ऐसा करने वालों के खिलाफ न आप नाराजगी जाहिर कर सकते हैं न फतवा जारी कर सकते हैं
बेंगलुरू में हजारों कट्टरपंथी मुसलमानों की भीड़ एक दलित विधायक श्रीनिवास मूर्ति के घर पर हमला और आगजनी की। इतना ही नहीं इन कट्टरपंथियों ने शहर के कई इलाकों में जमकर हिंसा और आगजनी की। पूरे देश में इस घटना की चर्चा है। इस बीच जेएनयू के प्रोफेसर आनंद रंगनाथन का एक ट्वीट सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। प्रोफेसर रंगनाथन ने यह ट्वीट अक्टूबर, 2019 में किया था, जिसमें उन्होंने मुसलमानों के बारे में डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों को साझा किया था और लिखा था कि यदि उन्होंने आज के वक्त में यह बात कही होती तो कट्टरपंथी मुसलमान उनका भी सिर काट देते।



उन्होंने डॉ. अम्बेडकर के जिस वक्तब्य का जिक्र किया था, उसमें उन्होंने कहा था कि इस्लाम एक करीबी कार्पोरेशन है और मुसलमानों एवं गैर-मुस्लिमों के बीच जो अंतर है, वह एक बहुत ही वास्तविक, बहुत सकारात्मक और बहुत अलग-थलग करने वाला भेद है। इस्लाम का भाईचारा मनुष्य का सार्वभौमिक भाईचारा नहीं है। यह केवल मुसलमानों के लिए मुसलमानों का भाईचारा है। एक बिरादरी है, लेकिन इसका लाभ उसके भीतर तक ही सीमित है। जो लोग उससे बाहर हैं, उनके लिए अवमानना और दुश्मनी के अलावा कुछ नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि जहां भी इस्लाम का शासन है, वहां उसका अपना देश है। दूसरे शब्दों में, इस्लाम कभी भी एक सच्चे मुसलमान को अपनी मातृभूमि के रूप में भारत को अपनाने और एक हिंदू को अपने परिजनों और रिश्तेदारों के रूप में अपनाने की अनुमति नहीं दे सकता है।