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जिन्ना के कदमों पर भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण, दलितों के लिए माँगा ‘अलग निर्वाचक मंडल’: अंबेडकर ने खुद विरोध कर संविधान में लगाया था प्रतिबंध


भारत में हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बाद 500 साल मुगलों ने.. 200 साल अंग्रेजों ने और 70 साल कांग्रेस ने शासन किया फिर 770 साल दलितों का शोषण सवर्णों ने कैसे किया? हमारे देश में ऐसा नेता है जो महाज्ञानी रावण को बदनाम कर रहा है जिसके पीछे चन्द्रशेखर "रावण" लगता है। रावण एक ऐसा महाज्ञानी पंडित था जिसने माता सीता को छुआ तक नहीं और एक ये कलयुग का "रावण" है जिसने एक दलित बेटी का बार बार शोषण किया है। आज ये जिस प्रकार दलितों को बली का बकरा बना कर शांति दूतों से क*ट*वा रहा है। और एक शब्द तक नहीं बोलता क्योंकि कहीं इसके वोट बैंक को बुरा न लग जाए। 
भारत में जब मुग़ल आक्रांता और ब्रिटिश आये थे अपने साथ कोई फौज नहीं लेकर आए थे क्योकि उनको मालूम था कि भारत में बिकाऊ जयचन्दों और मीर ज़ाफरों की कोई कमी नहीं। एक ठूंठोंगे हज़ार मिल जाएंगे। वही भूमिका हमारे कुछ सांसद और पार्टियां निभा रही है। जो देश को जाति और मजहब के नाम पर तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। किसी में यह कहने की हिम्मत नहीं कि सभी भारतीय हैं और सबको समान अधिकार मिलने चाहिएं। 

दूसरे, आंबेडकर की माला जपने वाले देश को बताएं कि क्या आंबेडकर ने आरक्षण मांगने पर इसके दुरूपयोग होते देख ख़त्म करने के लिए नहीं बोला था? फिर उसी आरक्षण पर इतना बवाल क्यों? इसमें दोषी जनता भी है जो जाति आधारित पार्टियों को वोट देती है। इतना ही नहीं जितनी भी पार्टियां है सभी इस जहर को परोस रही हैं। देश में ऐसी कौन-सी पार्टी है जिसने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ नही बनाया हुआ। किसी भी पार्टी में इन प्रकोष्ठों को बंद करने की हिम्मत नहीं। जब हमाम में सभी नंगे है फिर एक-दूसरी पार्टी पर दोषारोपण क्यों? फिर कहते हैं कि हम भारतीय हैं। जब सभी भारतीय हैं तो इन प्रकोष्ठों की नौटंकी क्यों? आखिर इस नौटंकी की कब राम नाम सत्य होगी।        

भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण ने लोकसभा में विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर सरकार सचमुच में पिछड़ों, महिलाओं और दलितों को सशक्त बनाना चाहती है तो उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल लागू करे।

उन्होंने कहा कि आरक्षण इन लोगों को सशक्त बनाने में सफल नहीं हो पाया है और यह महज एक नारा बनकर रह गया है। उन्होंने तर्क दिया कि सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए, आधे-अधूरे नारों पर निर्भर रहने के बजाय, समस्याओं के पूर्ण, साहसिक और सीधे समाधान की ओर बढ़ना अनिवार्य है।  

नगीना से लोकसभा सांसद ने बीएसपी संस्थापक कांशी राम और उनकी पुस्तक ‘चमचा युग’ का हवाला देते हुए दावा किया कि आरक्षित सीटों से चुने गए प्रतिनिधि व्यवस्था के भीतर काम करने के लिए मजबूर होते हैं। ये लोग अपने समुदाय की तुलना में अपनी पार्टी के प्रति ज्यादा वफादार होते हैं।

उन्होंने कहा, “इसलिए एक अलग निर्वाचक मंडल ही एक मात्र व्यवहार्य समाधान है।”

दरअसल संसद में दिए गए चंद्रशेखर रावण के बयान न केवल गैरकानूनी हैं, बल्कि भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ भी है। इतना ही नहीं यह गणतंत्र के संस्थापकों की परिकल्पना ‘भारत के विचार’ के भी विपरीत है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 325 धर्म, जाति, लिंग या अन्य कारकों पर आधारित ऐसी सिफारिशों को सिरे से खारिज करता है।

संविधान के अनुच्छेद 325 में प्रावधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 325 में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “संसद के किसी भी सदन या राज्य के विधानमंडल के किसी भी सदन के चुनाव के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सामान्य मतदाता सूची होगी और कोई भी व्यक्ति केवल धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या इनमें से किसी भी आधार पर ऐसी किसी भी सूची में शामिल होने के लिए अयोग्य नहीं होगा या ऐसे किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए किसी विशेष मतदाता सूची में शामिल होने का दावा नहीं करेगा। ”

1948 के संविधान के मसौदे में अनुच्छेद 289ए शामिल नहीं था, जिसे बाद में अनुच्छेद 325 के रूप में अधिनियमित किया गया। 16 जून 1949 को, मसौदा समिति के अध्यक्ष ने यह प्रावधान पेश किया। इसमें निर्दिष्ट किया गया कि राज्य विधान सभाओं और संसद के चुनावों के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक ही मतदाता सूची होगी।

इसके अलावा, लिंग, जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को सूची से बाहर नहीं रखा जाएगा। इसका उद्देश्य अलग निर्वाचक मंडल की संभावना को पूरी तरह समाप्त करना था। इसे उसी दिन बिना किसी बहस के सर्वसम्मति से अनुमोदित कर दिया गया।

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने संविधान को प्रतिपादित किया था। उस संविधान के मूलभूत सिद्धांतों में से एक के लिए दिया गया यह निर्णायक समर्थन दर्शाता है कि देश ने हमेशा प्रत्येक नागरिक के लिए निष्पक्ष और न्यायपूर्ण चुनावी समानता का समर्थन किया है। अंग्रेजों ने सांप्रदायिकता और अलग-अलग निर्वाचक मंडल का जो बीज भारत में बोया, उसे अस्वीकार किया गया। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्तावित और उपनिवेशवादियों द्वारा समर्थित हिंसक भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में इस निर्णय का महत्व और भी बढ़ गया।

अंबेडकर ने अलग निर्वाचक मंडल का किया था विरोध

संविधान सभा की बहस के दौरान संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने अलग- अलग निर्वाचक मंडल बनाए जाने को अस्वीकार कर दिया था।

आधुनिक भारत के निर्माताओं ने दिसंबर 1946 और जनवरी 1950 के बीच आयोजित संविधान सभा की बहसों के दौरान इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र सांप्रदायिक विभाजन के बजाय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की अवधारणा पर केंद्रित होना चाहिए।

संविधान के सूत्रधार अंबेडकर ने अनुच्छेद 289ए पर चर्चा के दौरान कहा, “इसका उद्देश्य केवल सदन के उस निर्णय को लागू करना है कि अब से कोई अलग निर्वाचक मंडल नहीं होगा। वास्तव में, यह खंड अनावश्यक है क्योंकि बाद के संशोधनों द्वारा हम मसौदा संविधान में निहित उन प्रावधानों को हटा देंगे जिनमें मुसलमानों, सिखों, एंग्लो-इंडियन आदि के प्रतिनिधित्व का प्रावधान है।”

साभार- संविधान सभा की बहसें (खंड 8) (स्रोत: constitutionofindia.net)

अंबेडकर ने आगे कहा, “इसलिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह भावना है कि चूँकि हमने एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जो व्यावहारिक रूप से अतीत को निरस्त कर देता है, इसलिए बेहतर है कि संविधान में इसे स्पष्ट रूप से बताया जाए। यही कारण है कि मैंने यह संशोधन पेश किया है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या उद्देश्य संशोधन को पारित कराना था, तो अंबेडकर ने उत्तर दिया कि वह अपने प्रस्ताव के पीछे के तर्क को व्यक्त करना चाहते थे, और यह बताना चाहते थे कि पृथक निर्वाचक मंडलों को अस्वीकार करने को लेकर वे कितने दृढ़ हैं।

इसके बाद, धर्म, जाति या नस्ल के आधार पर अलग-अलग चुनावी अभिलेखों को रोकने, सभी नागरिकों के लिए समान राजनीतिक अधिकारों की गारंटी देने और एक समान चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुच्छेद 325 को अपनाया गया।

पृथक निर्वाचक मंडल वाली बीज अंग्रेजों ने बोए

पृथक निर्वाचक मंडल की उत्पत्ति ब्रिटिश भारत में हुई। अंग्रेजों ने इस्लामी कट्टरपंथियों की सांप्रदायिक योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया। ब्रिटिश संसद के भारतीय परिषद अधिनियम 1909 में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव था। इसे मार्ले-मिंटो सुधार अधिनियम भी कहा जाता है।
इस व्यवस्था ने धार्मिक आधार पर ही अपने प्रतिनिधियों को चुनने की स्वतंत्रता देकर राजनीतिक परिदृश्य में सांप्रदायिक विभाजन को औपचारिक रूप दे दिया। कई दशकों तक कायम रही इस प्रणाली ने राष्ट्रीय पहचान के बजाय धार्मिक पहचान को बढ़ावा दिया। इसके चलते मुस्लिम लीग ने एक अलग राज्य बनाने की वकालत की। अंततः 1947 में देश का विभाजन हुआ और 1956 में इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान की स्थापना हुई।
भारतीय परिषद अधिनियम के तहत पहली बार विधायी निकायों में सीटों का वितरण पहचान के आधार पर किया गया। पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जातियों) को भी 1919 में कुछ सीटें मिलीं। इन सीटों को 1925 में बढ़ाई गई। यह मुद्दा बाद में मोहनदास करमचंद गाँधी और अंबेडकर के बीच विवाद का विषय बन गया। उन्होंने दलितों के लिए विशेष निर्वाचक मंडल की माँग की थी, हालाँकि बाद में इसे छोड़ दिया।

गाँधी और अंबेडकर के बीच मतभेद

महात्मा गाँधी ने दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया, जबकि दूसरे ग्रुप को लेकर उनके विचार अलग थे। उनका मानना ​​था कि यह अंग्रेजों की हिंदू आबादी को विभाजित करने, सामाजिक विभाजन को कायम रखने और सत्ता पर अपनी कमजोर पकड़ को मजबूत करने की एक चाल थी। उनके विचार में, यह निर्णय दर्शाता था कि दलित हिंदू समुदाय का हिस्सा नहीं हैं। पुणे की येरवडा सेंट्रल जेल में बंद गाँधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया।
दूसरी ओर, अंबेडकर दलित वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल चाहते थे। उन्होंने 1930 में ‘प्रथम गोलमेज सम्मेलन’ के दौरान आवाज उठाई थी। हालाँकि गाँधी और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस इसके खिलाफ थे। ये इसे भारतीय समाज को कमजोर और खंडित करने की एक योजना के रूप में देखते थे।
उन्होंने देखा कि ब्रिटिश सरकार अपने हितों की रक्षा करने और पुरस्कार के माध्यम से अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए अपनी कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का प्रयोग कर रही थी। उनके आमरण अनशन ने अंबेडकर पर हस्तक्षेप करने के लिए जन दबाव डाला और अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता होने पर भूख हड़ताल समाप्त हुई।

पूना पैक्ट: संघर्ष का समाधान

24 सितंबर 1932 को उच्च जाति के हिंदुओं की ओर से डॉ. मदन मोहन मालवीय और दलित वर्गों की ओर से अंबेडकर के बीच ‘पुणे समझौता‘ हुआ। इसने साझा निर्वाचक मंडल के ढाँचे के भीतर आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी।
दिलचस्प बात यह है कि अंबेडकर ने 1918-1919 में मताधिकार (साउथबोरो) समिति के समक्ष अपनी उपस्थिति के बाद से ही सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए अभियान चलाया था। हालांकि, द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार , उन्होंने प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के साधन के रूप में सांप्रदायिक मतदाताओं की उपयुक्तता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया था।
अम्बेडकर ने ‘साइमन कमीशन’ के समक्ष अपनी उपस्थिति के दौरान वयस्क मताधिकार का समर्थन किया, जिसके तहत मतदान के अधिकार आय, प्रतिष्ठा या शिक्षा के बजाय आयु के आधार पर निर्धारित किए जाएँगे। जिरह के दौरान उन्होंने उल्लेख किया कि मिश्रित मतदाता प्रणाली होनी चाहिए जिसमें सीटें आवंटित हों, अन्यथा दलित वर्गों को मुसलमानों के समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों, रियासतों और अन्य लोगों ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विरोध किया। ब्रिटिश सरकार भी देश को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार देने में हिचकिचा रही थी। इसका कारण उनके रुख में बदलाव और अलग निर्वाचक मंडल पर उनका जोर हो सकता है।
हालाँकि डॉ. अंबेडकर का पूरा ध्यान अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा के बजाय देश की राजनीतिक संरचना के भीतर उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने पर था।
भारत पहले ही विभाजन का खामियाजा भुगत चुका है, जिसकी शुरुआत मुस्लिम समुदाय के लिए अलग निर्वाचक मंडल की माँग से हुई थी। इसकी जड़ें न्याय और प्रतिनिधित्व के भेष में छिपे कट्टरवाद और अतिवाद में हैं।
हालाँकि यह राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने के लिए भी हानिकारक है। इसका फायदा निहित स्वार्थ वाले लोग उठाएँगे और सामाजिक दरारों को और गहरा करेंगे। इससे भारत की विकास यात्रा पटरी से उतर जाएगी और अब तक हुई प्रगति व्यर्थ चली जाएगी।
समकालीन भारत में पृथक निर्वाचक मंडल का कोई महत्व नहीं है, न ही भविष्य में होगा और न ही अतीत में था। आक्रमणकारियों द्वारा देश पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए रची गई साजिश को ‘सशक्तिकरण’ के बहाने सुदृढ़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वास्तव में यह विभाजन का एक तंत्र मात्र है। यह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है। भारत और भारत के लोगों की प्रगति में एक बड़ी बाधा भी है।
बेशक, जनता की समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए, लेकिन यह देश के संविधान को तोड़-मरोड़ कर देश को नुकसान पहुँचाए बिना नहीं किया जा सकता। चंद्रशेखर रावण को सामान्य सी बात समझनी होगी कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य को खतरे में डालकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

कहाँ है दलित हमदर्द और आन्दोलनजीवी? भीम आर्मी वाले चन्द्रशेखर को बृजभूषण शरण सिंह ने याद दिलाया ‘घसीटकर ले जाऊँगा’ वाला बयान, पूछा- दलित बेटी पर चुप्पी क्यों: रोहिणी घावरी ने सांसद पर लगाए हैं शोषण के आरोप

                                               बृजभूषण शरण सिंह और चंद्रशेखर रावण
भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह ने सांसद चन्द्रशेखर रावण पर केस दर्ज किए जाने की माँग की है। उन्होंने चंद्रशेखर रावण पर लगे शोषण के आरोपों को लेकर जवाब माँगा है। चंद्रशेखर रावण के खिलाफ रोहिणी घावरी लगातार सोशल मीडिया पर लिख रही हैं।
क्या हमारी मीडिया भी DeepState और Toolkit का हिस्सा है? यदि नहीं फिर कल तक भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर लगे यौन शोषण के आरोप पर अपनी TRP के चक्कर में चौपालें(परिचर्चा) लगाकर मदारी की तरह डूबडूबी बजाने वाला भीम आर्मी के चंद्र शेखर रावण के विरुद्ध एक दलित बेटी द्वारा ठीक वैसा आरोप लगाने पर क्यों खामोश है? फिर से हमारे मीडिया ने साबित साबित कर दिया है कि मोदी मीडिया का चोला ओढ़ विपक्ष के आगोश में बैठ उसके इशारे पर अपनी चौपाल आयोजित करती है। कहाँ है दलित हमदर्द और आन्दोलनजीवी?       

मीडिया से बातचीत करते हुए पूर्व सांसद बृजभूषण ने कहा, “जब मेरे ऊपर इस तरह के आरोप लगे, तब इन्हीं सांसद महोदय ने कहा था कि अगर समाज मुझे यह अनुमति दे तो मैं इसे घसीटकर ले जाऊँ। आज मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि मेरे ऊपर तो FIR हो गई। मैं न्यायपालिका का सामना कर रहा हूँ। सब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। आरोप लगते ही मैंने कहा था कि जिस दिन आरोप सिद्ध हो जाएँगे उस दिन फाँसी पर लटक जाऊँगा।”

आगे उन्होंने कहा, “अगर यह लड़की दूसरे समुदाय से होती, तो अब तक सोशल मीडिया और तमाम मंचों पर तूफान मच चुका होता। मगर आज सब इसलिए चुप हैं क्योंकि वह दबे-कुचले समाज से आती है। आज एक दलित बेटी का सवाल है। उस वक्त जाट बेटी का सवाल था। क्या वो मीडिया के सामने मुँह खोलेंगे। जो लड़की आरोप लगा रही है उसका जवाब देना चाहिए।”

बृजभूषण शरण सिंह ने खुद को न्याय का ठेकेदार बताने वालों की चुप्पी पर भी प्रश्न उठाए। उन्होंने पूछा कि कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी, ममता बनर्जी और किसान संगठन क्यों मौन हैं।

चंद्रशेखर पर रोहिणी ने लगाए शोषण के आरोप

आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर रावण पर रोहिणी घावरी ने कई आरोप लगाए हैं। रोहिणी घावरी पहले ही खुलासा कर चुकी हैं वो कि वो चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ के साथ रिलेशनशिप में थीं और वहाँ उन्हें धोखा मिला।
रोहिणी घावरी ने बड़ा आरोप लगाया था कि चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ अपनी शादी के बारे में छिपा कर कई बहन-बेटियों की इज्जत के साथ खेल चुके हैं। रोहिणी ने हाल ही में बताया था कि कैसे चन्द्रशेखर (तब वो सांसद नहीं, एक्टिविस्ट हुआ करते थे) ने अपनी शादी की बात छिपाकर कई लड़कियों की इज्जत के साथ खेला।
ऑपइंडिया से बात करते हुए डॉ रोहिणी घावरी ने बताया था कि कैसे उन्हें दलित समाज के सामने झूठा साबित करने के लिए उन्हें बदनाम करने की तमाम तरह की कोशिशें हुईं और दबाव डलवाकर उनसे वो पोस्ट्स X से डिलीट करवाए गए। रोहिणी कुछ अन्य लड़कियों की आपबीती भी सोशल मीडिया पर साझा कर रही हैं, ताकि अपने आरोपों की पुष्टि कर सकें।
अवलोकन करें:-
चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' और रोहिणी घावरी के चैट्स हो गए थे वायरल
रोहिणी ने सांसद के कई वीडियो भी जारी किए हैं, जिनमें किसी में वो जमीन पर लेटकर माफ़ी माँगते हुए दिख रहे हैं तो किसी में रोते हुए दिखाई दे रहे हैं।

नीले गमछे वाले ढोंगी दलित हितैषी सांसद जी पर FIR जल्द: स्विट्जरलैंड में रह रहीं वाल्मीकि समाज की PhD स्कॉलर ने ऑपइंडिया को बताया – मिल रही करियर बर्बाद करने की धमकियाँ

                        डॉ रोहिणी घावरी UN में भारत का कर चुकी हैं प्रतिनिधित्व, एक सांसद के ख़िलाफ़ हैं मुखर
भारत में अक्सर एक हिन्दू विरोधी गिरोह समाज को बाँटने की साजिश में लगा रहता है और इसके लिए उसका पहला हथियार होता है – दलितों को भड़काना। दलितों को बार-बार ये एहसास दिलाया जाता है कि वो हिन्दू समाज का हिस्सा नहीं हैं। जाति के नाम पर मुलायमसिंह, लालू यादव, पासवान, माझी और काशी राम आदि दलितों ने दलितों के नाम पार्टियां बनाकर जाति नहीं अपने परिवार और सगे-सम्बन्धियों का ही भला किया है। जाति के नाम पर हिन्दुओं को बांटने का काम कर किया जा रहा और हिन्दू इन ढोंगियों के छलावे में बँट रहा है। जब कभी किसी नेता का निधन होता है है जिस पार्टी को देखो उसे जाति का बहुत बड़ा हमदर्द बताया जाता है, जबकि जाति वहीँ की वहीँ की हैं। इस विषय पर सारी पार्टियां एक हैं।    
खैर, ऐसे में कोई दलित बेटी UN (संयुक्त राष्ट्र) में ‘जय श्री राम’ के साथ अपने उद्बोधन की शुरुआत करे, तो ख़ुद को दलितों का ठेकेदार बताकर पेश करने वालों को अपनी चूलें हिलने का डर लगने लग्न स्वाभाविक है। ऐसा हुआ भी। उस दलित बेटी का नाम है रोहिणी घावरी वाल्मीकि।

वो रोहिणी, जिनके पिता इंदौर में सफाईकर्मी थे लेकिन बेटी ने स्विट्जरलैंड में PhD के लिए 1 करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप प्राप्त की। ‘जनपॉवर फाउंडेशन’ चला रहीं डॉ रोहिणी घावरी वाल्मीकि सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। हालाँकि, उनके फ़िलहाल चर्चा में रहने का विषय कुछ और है। रोहिणी एक सांसद के ख़िलाफ़ ख़ासी मुखर हैं। उक्त सांसद नीले गमछे के लिए जाने जाते हैं, भारत के सबसे चर्चित दलित आइकॉन के नाम पर अपना राजनीतिक दल चलाते हैं और उन्हें Y+ सुरक्षा प्राप्त है। आप डॉ रोहिणी घावरी वाल्मीकि के सोशल मीडिया हैंडल पर जाएँगे तो आपको बख़ूबी पता चल जाएगा कि वो नए-नवेले सांसद कौन हैं।

रोहिणी ने सांसद के कई वीडियो भी जारी किए हैं, जिनमें किसी में वो जमीन पर लेटकर माफ़ी माँगते हुए दिख रहे हैं तो किसी में रोते हुए दिखाई दे रहे हैं। कई चैट्स भी वायरल हुए हैं, जिनमें वो रोहिणी की प्रशंसा करते नहीं थक रहे हैं।

नीले गमछे वाले सांसद जी पर FIR की तैयारी

ख़ैर, तो ताज़ा ख़बर ये है कि अब सांसद जी के विरुद्ध औपचारिक FIR दर्ज होने जा रही है। ये सूचना ख़ुद रोहिणी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए साझा की है। फ़िलहाल क़ानूनी सलाहों के कारण वो वीडियो के माध्यम से मीडिया संस्थानों से नहीं जुड़ पा रही हैं, लेकिन FIR दर्ज होने के बाद वो जल्द ही मुखर होकर कुछ नए खुलासे करेंगी। वो अदालत का दरवाजा भी खटखटाने जा रही हैं। डॉ रोहिणी घावरी इससे पहले भी उक्त सांसद के ख़िलाफ़ मुखर रही हैं और उनपर कई लड़कियों का जीवन बर्बाद करने का आरोप लगा चुकी हैं।

रोहिणी ने बताया था कि कैसे सांसद (तब वो सांसद नहीं, एक्टिविस्ट हुआ करते थे) ने अपनी शादी की बात छिपाकर कई लड़कियों की इज्जत के साथ खेला। ऑपइंडिया से बात करते हुए डॉ रोहिणी घावरी ने बताया कि कैसे उन्हें दलित समाज के सामने झूठा साबित करने के लिए उन्हें बदनाम करने की तमाम तरह की कोशिशें हुईं और दबाव डलवाकर उनसे वो पोस्ट्स X से डिलीट करवाए गए। उन्होंने बताया कि उन्हें अब भी धमकियाँ भिजवाई जा रही हैं, सांसद जी अपने लोगों से बातचीत में कह रहे हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा, लड़की अपना ही करियर बर्बाद करेगी।

हालाँकि, रोहिणी इतनी अडिग हैं कि उनका कहना है कि उन्हें जेल जाना पड़े तो भी ग़म नहीं, वो इस देश की तमाम महिलाओं के सामने एक उदाहरण बनना चाहती हैं कि आपको घबराए बिना अपने साथ हो रहे अत्याचार के विरुद्ध लड़ाई लड़नी है। रोहिणी का कहना है कि शुरुआत में उन्होंने सोचा कि इस मामले को अधिक तूल न दिया जाए क्योंकि उनके मन में दलित एकता की बात थी, उन्हें भय था कि इससे दलित एकता खंडित होगी। बता दें कि आरोपित सांसद जहाँ जाटव समाज से आते हैं वहीं रोहिणी वाल्मीकि समुदाय से।

अपने आरोपों को लेकर दोबारा आक्रामक हुईं डॉ रोहिणी घावरी

पिछले एक सप्ताह से रोहिणी कुछ अधिक ही आक्रामक हैं। धोखेबाज, गद्दार, कलंकित, नीच, नामर्द, नालायक… ऐसे तमाम शब्दों का इस्तेमाल वो सांसद जी के लिए कर चुकी हैं। आप इससे ये समझिए कि वो किस आक्रामकता के साथ अपनी लड़ाई लड़ रही हैं। ऑपइंडिया से बात करते हुए वो कहती हैं कि वो गुस्से में हैं, वाल्मीकि समाज उनके साथ खड़ा है। उन्होंने कहा कि जनता हर किसी को जज करती है, पहले उन्हें लगा कि समाज स्वयं ही न्याय करेगा इसीलिए उन्होंने कोई क़ानूनी प्रक्रिया नहीं अपना – लेकिन, अब नहीं। इस दौरान वो समाज और जनता से भी नाराज़ दिखाई देती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस संघर्ष में उन्हें अबतक बदनामी मिली है, लांछन मिले हैं और उन्हें लेकर तरह-तरह की बातें की गई हैं।

डॉ रोहिणी घावरी की विचारधारा क्या है? वो स्वयं को आंबेडकरवादी तो बताती हैं, लेकिन साथ ही कहती हैं कि वो भारत की जनता को विभिन्न जातियों में बाँटकर नहीं देखतीं। विदेश से जब वो देखती हैं तो उन्हें हर भारतवासी अपना लगता है। वो ‘मनुवादी’ जैसे शब्दों से चिढ़ती हैं और ब्राह्मणों को सम्मान की नज़र दे देखती हैं। वो एक बार बता भी चुकी हैं कि स्विट्जरलैंड वाली स्कॉलरशिप की जानकारी देने वाले उनके एक ब्राह्मण शिक्षक ही थे, वहाँ वो नई-नई थीं तो एक ब्राह्मण सहेली ने ही उन्हें सहज बनाया, उन्हें UN का रास्ता दिखाने वाले भी एक ब्राह्मण ही थे। वो कहती हैं कि उनके लिए समर्पण और एकता महत्वपूर्ण है, जब वो विदेश में विदेशी दोस्तों के साथ सहजता के साथ रह सकती हैं, खा-पी सकती हैं – तो फिर देशवासियों संग क्यों नहीं?

सांसद जी को किन ‘बड़ी पार्टियों’ का समर्थन?

डॉ रोहिणी घावरी को लगता है कि उक्त सांसद जी को कुछ बड़ी राजनीतिक पार्टियों का भी समर्थन है। लेकिन, उन्हें विश्वास है कि एक बार उनके असली चरित्र के बारे में खुलासे हुए तो ऐसे दागदार व्यक्ति के साथ ख़ुद को जोड़ने में इन राजनीतिक दलों को शर्म आएगी और वो स्वयं को इनसे अलग कर लेंगे। भारत से कई लोगों ने उन्हें फोन करके FIR दर्ज कराने के लिए कहा है, ताकि वो न्याय के लिए आवाज़ उठा सकें। नीले गमछे वाले सांसद पर FIR होते ही विरोध प्रदर्शन शुरू होंगे। ब्राह्मण समाज के कई एक्टिविस्ट्स ने भी उन्हें समर्थन का भरोसा दिया है। कभी UN के ‘विश्व संसद’ में 3 बार भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकीं रोहिणी ने राम मंदिर निर्माण का बचाव करते हुए कई तर्क दिए थे।

अब डॉ रोहिणी घावरी की FIR व उनके द्वारा न्यायालय का दरवाजा खटखटाए जाने के बाद क्या होता है, ये तो समय बताएगा। लेकिन, इतना साफ़ है कि नीले गमछे वाले नए-नवेले सांसद जी के दिन ठीक नहीं चल रहे। रोहिणी कुछ अन्य लड़कियों की आपबीती भी सोशल मीडिया पर साझा कर रही हैं, ताकि अपने आरोपों की पुष्टि कर सकें। वो अब पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। थोड़ी सी नाराज़गी उन्हें भारतीय क़ानूनों को लेकर भी है, क्योंकि उनका मानना है कि स्विट्जरलैंड में उन्हें किसी ने ग़लत तरीके से घूरा भी तो उसपर कार्रवाई होगी। लेकिन, अपने देश को लेकर नकारात्मक बातें न करने की बात कहकर रोहिणी इसपर चर्चा नहीं करना चाहतीं।

चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' और रोहिणी घावरी के चैट्स हो गए थे वायरल

‘भीम आर्मी’ के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ के साथ अपने पुराने रिश्ते को लेकर स्विट्जरलैंड में Ph.D कर रहीं वाल्मीकि समाज की रोहिणी घावरी चर्चा में हैं। अब उन्होंने उत्तर प्रदेश के नगीना लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ का एक वीडियो शेयर किया है, जो इन दोनों के वीडियो कॉल के दौरान का है। इसमें वो रोता हुआ दिख रहा है। मूल रूप से मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली रोहिणी का कहना है कि झूठे आँसू दिखा कर और अपनी शादी छिपा कर ‘रावण’ कई मासूम लड़कियों का जीवन बर्बाद कर चुका है।

रोहिणी घावरी और चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ के चैट्स हुए थे वायरल

चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ के कैरेक्टर को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। रोहिणी घावरी के साथ उसकी तस्वीरें भी सामने आई थीं, जिनमें दोनों मास्क लगाए दिख रहे हैं और एक-दूसरे के काफी करीब नजर आ रहे हैं। एक चैट स्क्रीनशॉट में चंद्रशेखर ने अपनी उदास तस्वीर भेजते हुए रोहिणी को लिखा था, “मुझे गर्व है आप पर। आप सम्मान की हकदार हो। आप इनका अधूरा सपना ज़रूर पूरा करोगे। मैं लगभग हार मान चुका हूँ।” एक अन्य स्क्रीनशॉट भी चैट का वायरल हुआ था।

इसमें चंद्रशेखर ने लिखा है, “सच कहा आपने, इसीलिए मुझे छोड़ देना चाहिए आपको। ये ही तो कह रही हो आप। समाज भी मेरा साथ नहीं दे रहा, मुझे भी समाज को छोड़ देना चाहिए।” घावरी ने इस पर जवाब दिया था, “मैं बिना कमिटमेंट के नहीं रह सकती। मेरी भी सेल्फ-रेस्पेक्ट है। ख्याल रखना अपना, हेल्थ चेकअप कराते रहना। बाय।” इस पर ‘रावण’ ने लिखा था, “अब जो भी होगा उसके लिए आप भी जिम्मेदार होंगी – हार या जीत ज़िंदगी में।”
तब रोहिणी ने ये भी बताया था कि उनकी हँसती-खेलती ज़िंदगी में आकर एक व्यक्ति ने रात-रात भर अपने तकलीफ-संघर्ष की कहानियाँ सुनाई और ये एहसास कराया कि उसे कभी प्यार नहीं मिला, आंदोलन को सफल बनाने के लिए उसे रोहिणी जैसी बुद्धिजीवी महिला की आवश्यकता है। घावरी ने बताया था कि उसने हमेशा साथ रहने का वादा किया था, लोगों के मना करने के बावजूद उन्होंने सब दाँव पर लगा कर चंद्रशेखर का साथ दिया। हालाँकि, रोहिणी कहती हैं कि उन्हें धोखा मिला, बीच रास्ते में उन्हें छोड़ कर वो चला गया और विदेश में इस हादसे ने उन्हें तोड़ दिया।
रोहिणी घावरी इसे अपने जीवन का सबसे दर्दनाक हादसा बताते हुए कहती हैं कि इसने उन्हें बुरी तरह तोड़ कर रख दिया। उलटे लोग उन्हें भी गंदा बोलते रहे, और वो समाज का नेता बना रहा। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकीं रोहिणी घावरी और चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ पहले एक-दूसरे के ट्वीट्स को रीट्वीट भी करते थे, लेकिन 5 नवंबर, 2023 में अंतिम बार ऐसा हुआ था। उलटे रोहिणी घावरी को ही सोशल मीडिया पर ‘भीम आर्मी’ समर्थकों ने खरी-खोटी सुनाई थी।

अब रोहिणी घावरी ने जारी किया चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ का वीडियो

इस वीडियो को जारी करते हुए रोहिणी घावरी ने कहा कि उन्होंने झूठे आँसू दिखा-दिखा कर उन्हें उन पर विश्वास करने के लिए मजबूर कर दिया। बकौल रोहिणी, ये उनकी गलती है कि ‘रावण’ को उन्होंने सच्चा आंदोलनकारी इंसान मान कर उनके साथ खड़ी हो गईं। रोहिणी का आरोप है कि चंद्रशेखर ने उस समाज के सामने उन्हें झूठा साबित कर दिया, जिसके लिए वो विदेश में रह कर भी सोचती हैं। उनका कहना है कि उन्होंने सच्ची लड़की होने की सज़ा भुगती, अकेले रह कर जिस मानसिक पीड़ा से उन्होंने खुद को सँभाला उसके बारे में वो ही समझती हैं।
उन्होंने इस वीडियो के साथ लिखा, “अब कभी जीवन में किसी मर्द पर भरोसा नहीं कर पाऊँगी इसलिए शादी रिश्ते जैसी चीज़ो से बहुत दूर हो चुकी हूँ। अब मेरा बचा हुआ जीवन देश और समाज को समर्पित। मैं झूठे आरोप झेल झेल के थक गई हूँ अब जब भी कुछ अच्छा करती हूँ लोग मेरा चीरहरण करना शुरू कर देते है। एक लड़की होने की खूब सज़ा मिल रही है मुझे। जैसे पूरा समाज बेवक़ूफ़ बन रहा है में भी बन गई। मैंने तो पूरी ईमानदारी से दूसरे देश में रहकर भी साथ निभाया था यही सोच के त्याग था की समाज के लिए दोनों मिलकर कुछ अच्छा करेंगे।”

स्विट्जरलैंड में Ph.D कर रही दलित रोहिणी घावरी

रोहिणी घावरी वाल्मीकि समाज से आती हैं और खुद को दलितों का ठेकेदार बताने वाले कुछ नेताओं द्वारा ब्राह्मणों के प्रति घृणा फैलाए जाने से ताल्लुक नहीं रखती। उलटा उन्होंने बताया है कि वो वाल्मीकि समाज से आती हैं और ब्राह्मणों का उनके जीवन में बहुत योगदान है। उन्होंने बताया कि उनके शिक्षक शर्मा सर ने उन्हें 1 करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप की जानकारी दी। स्विट्जरलैंड में जिस आभा ने उनका साथ दिया, वहाँ रहना सिखाया वो भी ब्राह्मण हैं।
रोहिणी घावरी संयुक्त राष्ट्र (UN) में भी संबोधन दे चुकी हैं। उन्होंने बताया था कि वहाँ भी जाने के लिए उनके एक पंडित अंकल ने उनका मार्गदर्शन किया। इसीलिए, वो कहती हैं कि वो ब्राह्मणों को गाली देकर एहसानफरामोशी नहीं कर सकतीं। बता दें कि वो UN में राम मंदिर को लेकर पाकिस्तान को खरी-खरी सुना चुकी हैं। उन्होंने ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करते हुए कहा था कि दुनिया के हर हिन्दू के लिए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा वाला दिन ऐतिहासिक है।
अवलोकन करें:-
जेनेवा में रह रही रोहिणी घावरी शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने के साथ-साथ दलित समाज के लिए भी आवाज़ उठाती रहती हैं। वो बाबासाहब भीमराव आंबेडकर में श्रद्धा रखती हैं। भारत सरकार से उन्हें 1 करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप प्राप्त हुई। रोहिणी घावरी ने भारत के ठेकेदारों की पोल खोलते हुए UN में बताया था कि भारत के प्रधानमंत्री OBC समाज से आते हैं, वहाँ के दलित ऑक्सफ़ोर्ड-हार्वर्ड में सरकारी सहायता से पढ़ते हैं, इसके बावजूद विदेशी संस्थाएँ भारत को गलत रूप में पेश करती हैं।

उत्तर प्रदेश : UN में भाषण दे चुकीं रोहिणी घावरी का चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' पर बड़ा आरोप; ‘कई मासूम लड़कियों की ज़िंदगी बर्बाद कर चुका है चंद्रशेखर रावण’: वाल्मीकि समाज की लड़की ने जारी किया ‘भीम आर्मी’ संस्थापक का वीडियो

स्विट्जरलैंड में Ph.D कर रहीं रोहिणी घावरी ने उत्तर प्रदेश के नगीना से चुनाव लड़ रहे ‘भीम आर्मी’ के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ पर बड़ा आरोप लगाया है। रोहिणी घावरी पहले ही खुलासा कर चुकी हैं वो कि वो चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ के साथ रिलेशनशिप में थीं और वहाँ उन्हें धोखा मिला। मध्य प्रदेश के इंदौर के सफाई कर्मचारी की बेटी रोहिणी ने चंद्रशेखर का एक वीडियो भी जारी किया है, जिसमें वो उनके साथ वीडियो कॉल पर हैं और रोते हुए दिखाई दे रहे हैं।

इस महिलाओं की इज्जत से खिलवाड़ करने वाले ने अपने नाम तक की लाज नहीं रखी। पहले बात करते हैं रावण की, जिसने सीता माता का अपहरण जरूर किया, लेकिन अपने महल से बाहर अशोक वाटिका में सुरक्षित रखा। फिर स्वतंत्रता सैनानी चंद्रशेखर आज़ाद ने भी पार्टी में शामिल किसी भी महिला पर गन्दी निगाह नहीं डाली, किसी को बहन, किसी को भाभी तो किसी को माँ का सम्मान दिया। लेकिन इस कलयुगी चंद्र शेखर आज़ाद रावण ने भारत विरोधियों के हाथ कठपुतली बन उनके नाम को ही कलंकित कर दिया और ऐसे बदचलन को वोट एवं समर्थन देने वालों को क्या कहा जा सकता है।  

‘चंद्रशेखर आज़ाद रावण कई लड़कियों के साथ खेल चुका है’: रोहिणी घावरी

इस वीडियो को जारी करते हुए रोहिणी घावरी ने कहा कि उन्होंने झूठे आँसू दिखा-दिखा कर उन्हें उन पर विश्वास करने के लिए मजबूर कर दिया। बकौल रोहिणी, ये उनकी गलती है कि ‘रावण’ को उन्होंने सच्चा आंदोलनकारी इंसान मान कर उनके साथ खड़ी हो गईं। रोहिणी का आरोप है कि चंद्रशेखर ने उस समाज के सामने उन्हें झूठा साबित कर दिया, जिसके लिए वो विदेश में रह कर भी सोचती हैं। उनका कहना है कि उन्होंने सच्ची लड़की होने की सज़ा भुगती, अकेले रह कर जिस मानसिक पीड़ा से उन्होंने खुद को सँभाला उसके बारे में वो ही समझती हैं।
उन्होंने इस वीडियो के साथ लिखा, “अब कभी जीवन में किसी मर्द पर भरोसा नहीं कर पाऊँगी इसलिए शादी रिश्ते जैसी चीज़ो से बहुत दूर हो चुकी हूँ। अब मेरा बचा हुआ जीवन देश और समाज को समर्पित। मैं झूठे आरोप झेल झेल के थक गई हूँ अब जब भी कुछ अच्छा करती हूँ लोग मेरा चीरहरण करना शुरू कर देते है। एक लड़की होने की खूब सज़ा मिल रही है मुझे। जैसे पूरा समाज बेवक़ूफ़ बन रहा है में भी बन गई। मैंने तो पूरी ईमानदारी से दूसरे देश में रहकर भी साथ निभाया था यही सोच के त्याग था की समाज के लिए दोनों मिलकर कुछ अच्छा करेंगे।”
रोहिणी घावरी ने बड़ा आरोप लगाया है कि चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ अपनी शादी के बारे में छिपा कर कई बहन-बेटियों की इज्जत के साथ खेल चुके हैं। उन्होंने कहा कि ये ‘महिला’ भी इसमें उसका साथ देती रही, क्योंकि आंदोलन से करोड़ों रुपए आ रहे थे। उन्होंने कहा कि पहले पता होता तो कितनी मासूम लड़कियों की ज़िंदगी बर्बाद होने से बच जाती। उन्होंने ‘रावण’ को छल-कपट-षड्यंत्र वाला व्यक्ति करार देते हुए कहा कि वो कभी दलित समाज का नेता नहीं बन सकता।

कौन हैं स्विट्जरलैंड में Ph.D कर रही दलित रोहिणी घावरी

रोहिणी घावरी वाल्मीकि समाज से आती हैं और खुद को दलितों का ठेकेदार बताने वाले कुछ नेताओं द्वारा ब्राह्मणों के प्रति घृणा फैलाए जाने से ताल्लुक नहीं रखती। उलटा उन्होंने बताया है कि वो वाल्मीकि समाज से आती हैं और ब्राह्मणों का उनके जीवन में बहुत योगदान है। उन्होंने बताया कि उनके शिक्षक शर्मा सर ने उन्हें 1 करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप की जानकारी दी। स्विट्जरलैंड में जिस आभा ने उनका साथ दिया, वहाँ रहना सिखाया वो भी ब्राह्मण हैं।
रोहिणी घावरी संयुक्त राष्ट्र (UN) में भी संबोधन दे चुकी हैं। उन्होंने बताया था कि वहाँ भी जाने के लिए उनके एक पंडित अंकल ने उनका मार्गदर्शन किया। इसीलिए, वो कहती हैं कि वो ब्राह्मणों को गाली देकर एहसानफरामोशी नहीं कर सकतीं। बता दें कि वो UN में राम मंदिर को लेकर पाकिस्तान को खरी-खरी सुना चुकी हैं। उन्होंने ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करते हुए कहा था कि दुनिया के हर हिन्दू के लिए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा वाला दिन ऐतिहासिक है।
जेनेवा में रह रही रोहिणी घावरी शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने के साथ-साथ दलित समाज के लिए भी आवाज़ उठाती रहती हैं। वो बाबासाहब भीमराव आंबेडकर में श्रद्धा रखती हैं। भारत सरकार से उन्हें 1 करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप प्राप्त हुई। रोहिणी घावरी ने भारत के ठेकेदारों की पोल खोलते हुए UN में बताया था कि भारत के प्रधानमंत्री OBC समाज से आते हैं, वहाँ के दलित ऑक्सफ़ोर्ड-हार्वर्ड में सरकारी सहायता से पढ़ते हैं, इसके बावजूद विदेशी संस्थाएँ भारत को गलत रूप में पेश करती हैं।

हल्द्वानी : दलित-दलित रोने वाली भीम आर्मी दलितों को पीटने वालों का केस वापस लेने की माँग पर अड़ी, वाल्मीकि-सोनकर परिवारों की बजाए मुस्लिमों के लिए माँगा मुआवजा

हल्द्वानी में दलितों को पीटने के आरोपित दंगाइयों का केस वापस लेने पर अड़ी 'भीम आर्मी' (चित्र साभार- X/@DrRituSingh_)
उत्तराखंड के हल्द्वानी में 8 फरवरी 2024 को हिंसा भड़क गई थी। पुलिस और नगर निगम स्टाफ के खिलाफ भड़की यह हिंसा अतिक्रमण हटाने के दौरान हुई थी। अब तक 58 दंगाइयों की गिरफ्तारी हो चुकी जबकि बाकियों की धरपकड़ के प्रयासों के साथ कुर्की जैसी कानूनी प्रक्रियाएँ जारी हैं। विगत 10 दिनों में प्रशासन के प्रयासों से हालात तेजी से सामान्य होते जा रहे हैं। हालाँकि इस बीच कुछ समूह और गिरोह अस्थिरता फ़ैलाने की फ़िराक में लगे हैं।

जहाँ 2 दिन पहले एक कथित फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने जा कर भ्रामक रिपोर्ट तैयार की तो वहीं अब ‘भीम आर्मी’ भी हिंसा पीड़ित मुस्लिमों से न मिलने देने पर प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जता रही है। सबसे खास बात तो यह है कि दलितों के हितों के नाम पर राजनीति कर रही भीम आर्मी नगर निगम के उन दलित स्टाफ के घर नहीं जा रही जिन्हे हिंसक भीड़ ने बेरहमी से मारा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शनिवार (17 फरवरी, 2024) को ‘भीम आर्मी’ का 60 सदस्यीय प्रतिनिध मंडल वनभूलपुरा के मुस्लिमों से मिलने निकला। इस प्रतिनिधि मंडल में राष्ट्रीय अध्यक्ष मनजीत नौटियाल के अलावा सोनू लाठी आदि मौजूद थे। प्रतिनिधि मंडल को उत्तराखंड पुलिस ने वनभूलपुरा क्षेत्र से काफी पहले ही हाईवे पर रोक दिया। प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्र में कर्फ्यू लागू होने की जानकारी दी और हालत सामान्य करने में उनसे सहयोग की अपील की। हालाँकि प्रतिनिधि मंडल ने प्रशासन की बात नहीं मानी। तब प्रशासन ने इस समूह को थोड़े समय तक एहतियातन थाने में रोका और बाद में वापस लौटा दिया।

भीम आर्मी के अन्य सदस्य इस बात को ले कर सोशल मीडिया पर काफी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। वापस लौटाए जाने से भड़के मनजीत नौटियाल ने अपनी माँगों के न माने जाने पर आंदोलन तक का ऐलान कर दिया। उनकी माँगों में बेगुनाह मुस्लिमों के मुकदमे वापस लेना और वनभूलपुरा के पीड़ितों को मुआवजे के तौर पर 60 लाख रुपए देना शामिल है। ‘भीम आर्मी’ राष्ट्रीय अध्यक्ष यह भी चाहते हैं कि नैनीताल प्रशासन ध्वस्त किए गए अवैध मदरसे और मस्जिद के लिए फिर से जमीन दिलाए।

दंगाइयों के हमले में सबसे अधिक दलित ही पीड़ित

हल्द्वानी हिंसा में सबसे अधिक नुकसान पुलिस और नगर निगम के कर्मचारियों को उठाना पड़ा है। ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में यह बात निकल कर सामने आई थी कि हिंसा के शिकार नगर निगम के अधिकतर स्टाफ अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से हैं। इनमें से मनोज और मिथुन वाल्मीकि के अलावा सागर सोनकर ने तो ऑपइंडिया से बात करते हुए हिंसक भीड़ की करतूत बताई थी। मनोज, मिथुन और सागर के हाथों और पैरों में फैक्चर तब हैं जिसका इलाज सरकार करवा रही है। इन सभी ने बताया कि उस दिन दंगाइयों ने उन्हें मार कर जिन्दा जलाने के लिए रास्ते में कँटीले तार तक बिछा कर रखे हुए थे।
वहीं SC वर्ग से ही आने वाले कॉन्ग्रेस नेता गब्बर वाल्मीकि ने भी माना कि वनभूलपुरा की हिंसक भीड़ ने कानून को तोडा था। गब्बर वाल्मीकि ने दंगाइयों पर कड़ी कार्रवाई की भी माँग प्रशासन से की थी। इन सभी के अलावा वनभूलपुरा से निकली हिंसक भीड़ जिस रिहायशी बस्ती गांधीनगर में घुसना चाह रही थी, वहाँ भी अधिकतर परिवार दलित समुदाय के ही हैं। इन परिवारों के तमाम सदस्य दंगाइयों के हमले में पुलिसकर्मियों, नगर निगम स्टाफ और अपने खुद के परिवार की रक्षा करते हुए घायल हुए हैं।
घायलों में अनुसूचित जाति के अमरदीप सोनकर को गंभीर चोटें आईं हैं और वो अभी तक बिस्तर पर ही हैं। उनके अलावा मनीष सोनकर का सिर फट गया, ऋतिक सोनकर के चेहरे पर कई घाव लगे और आर्यन सोनकर का हाथ टूट गया है। इन सभी के अलावा गाँधीनगर की SC वर्ग की महिलाओं ने हमें बताया कि आज भी उनके मन में हिंसक भीड़ का उन्मादी रूप घूमता है। यह सारा मोहल्ला पुलिस के साथ अपनी खुद की रक्षा के लिए एकजुट हो गया था। इसी मोहल्ले पर न सिर्फ गोलियाँ चलाई गईं बल्कि पत्थरों के साथ पेट्रोल बम भी फेंके गए थे।
घायलों की जानकारी ऑपइंडिया सहित कई अन्य मीडिया संस्थानों पर प्रकाशित की गई है। हालाँकि भीम आर्मी का प्रतिनिधि मंडल वनभूलपुरा क्षेत्र में रहने वाले मुस्लिमों के लिए संघर्ष कर रहा है। अभी तक उनके माँग पत्र में दलित वर्ग से आने वाले नगर निगम के स्टाफ व इसी वर्ग के गाँधीनगर के घायलों के लिए कोई स्थान नहीं दिया गया है।