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‘मियाँ’ का मतलब ‘अवैध बांग्लादेशी’… मुस्लिम विरोधी एजेंडा बताकर ‘द वायर’ का हिमंता के खिलाफ प्रोपेगेंडा

                    द वायर और असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा (साभार : The Wire & thecrossbill)
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के हाल के बयानों को लेकर मुख्यधारा के वामपंथी मीडिया और ‘द वायर’ जैसे पोर्टल्स ने एक सुनियोजित अभियान छेड़ दिया है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और ‘मियाँ’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर मुख्यमंत्री को ‘मुस्लिम विरोधी’ सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। हिमंता बिस्वा सरमा का संघर्ष किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उन ‘अवैध बांग्लादेशी’ के खिलाफ है जो असम की स्वदेशी संस्कृति, भूमि और लोकतांत्रिक अधिकारों को निगल रहे हैं।

द वायर का नैरेटिव: बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की साजिश

‘द वायर‘ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हिमंता बिस्वा सरमा जानबूझकर एक खास समुदाय (मियाँ) को डराने और उन्हें ‘परेशान’ करने की राजनीति कर रहे हैं। लेख में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ने 4 से 5 लाख मियाँ मतदाताओं के नाम हटाने की बात कहकर लोकतंत्र का अपमान किया है। ‘द वायर’ ने मुख्यमंत्री के उस बयान को भी हाइलाइट किया जिसमें उन्होंने लोगों से मियाँ समुदाय के लिए ‘मुश्किलें’ पैदा करने को कहा, ताकि वे असम छोड़ दें।

वामपंथियों को हिमंता ने दिया जवाब

 हिमंता बिस्वा सरमा ने वायर और उस जैसी वामपंथी खेमों के स्वघोषित मुस्लिम मसीहों को तीखा जवाब दिया है। उन्होंने X पर एक लंबे पोस्ट में लिखा, “जो लोग ‘मियाँ’ शब्द (यह असम में बांग्लादेशी मुस्लिमों की घुसपैठ के लिए इस्तेमाल होता है) पर मेरी टिप्पणी को लेकर मुझ पर हमला कर रहे हैं, उन्हें पहले यह पढ़ लेना चाहिए कि असम के बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने खुद क्या कहा है। यह मेरी भाषा नहीं है, न मेरी कल्पना, और न ही कोई राजनीतिक बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है।”

उन्होंने आगे लिखा, “ये शब्द खुद अदालत के हैं, ‘असम में चुपचाप और खतरनाक तरीके से जनसंख्या में बदलाव हो रहा है, जिससे लोअर असम के रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण जिलों के हाथ से निकल जाने का खतरा पैदा हो सकता है। अवैध प्रवासियों की वजह से ये इलाके धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल क्षेत्र बनते जा रहे हैं। इसके बाद यह केवल समय की बात होगी कि इन इलाकों को बांग्लादेश में मिलाने की माँग उठाई जाए। अगर लोअर असम हाथ से निकल गया, तो पूरा पूर्वोत्तर भारत देश के बाकी हिस्सों से कट जाएगा और उस क्षेत्र के समृद्ध प्राकृतिक संसाधन भी देश के हाथ से निकल सकते हैं’।”

हिमंता ने आगे लिखा, “जब देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत ‘जनसंख्या पर आक्रमण’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है और देश की एकता और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चेतावनी देती है, तो उस सच्चाई को स्वीकार करना न तो नफरत है, न सांप्रदायिकता, और न ही किसी समुदाय पर हमला। यह एक गंभीर और पुरानी समस्या को समझना है, जिसे असम दशकों से झेल रहा है।

उन्होंने लिखा, “हमारा प्रयास किसी मजहब या किसी भारतीय नागरिक के खिलाफ नहीं है। हमारा प्रयास असम की पहचान, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा करना है, ठीक वैसे ही जैसे सुप्रीम कोर्ट ने देश को चेतावनी दी थी। उस चेतावनी को नजरअंदाज करना ही असम और भारत के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा।”

वामपंथियों की आँखों में क्यो खटकते हैं हिमंता?

वामपंथी खेमे की राजनीति अक्सर इस सोच पर टिकी रही है कि धार्मिक पहचान को दबाकर रखा जाए और खास समुदायों को खुश करने की नीति अपनाई जाए। उन्हें ऐसे नेता पसंद आते हैं जो हर मुद्दे पर संतुलन के नाम पर चुप्पी साध लें या फिर वोट बैंक के दबाव में फैसले लें। जब कोई नेता खुलकर अपनी पहचान की बात करता है तुष्टीकरण की राजनीति को चुनौती देता है और स्पष्ट शब्दों में सच बोलता है, तो वही वामपंथियों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाता है।

हिमंता बिस्वा सरमा इसी वजह से वामपंथियों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं। वह बार-बार यह सवाल उठाते हैं कि आखिर हिंदू अपनी पहचान पर गर्व क्यों न करे। वामपंथी विचारधारा को यह बात स्वीकार नहीं होती क्योंकि उनकी राजनीति में हिंदू पहचान को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। उन्हें लगता है कि अगर कोई नेता हिंदुत्व की बात करेगा, तो उनकी वैचारिक जमीन कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए वामपंथी गुट ऐसे नेताओं को कट्टर, विभाजनकारी या असहिष्णु साबित करने की कोशिश करते हैं।

वामपंथियों को यह भी खलता है कि हिमंता सरमा मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक की तरह देखने के बजाय उन्हें शिक्षा और विकास की मुख्यधारा में लाने की बात करते हैं। जब वह घुसपैठ या अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाते हैं तो वामपंथी इसे मानवाधिकार या अल्पसंख्यक विरोध के रूप में पेश करने लगते हैं। असल में समस्या यह है कि वामपंथी हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखते हैं और कानून, सुरक्षा या सामाजिक संतुलन जैसी बातों को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते।

हिमंता सरमा का अपराध वामपंथियों की नजर में यही है कि वह डरकर नहीं बोलते। वह न तो किसी समुदाय के दबाव में आते हैं और न ही वैचारिक आलोचना से घबराते हैं। वह साफ कहते हैं कि देश और समाज का हित सबसे ऊपर है, चाहे इसके लिए कड़वी बात ही क्यों न कहनी पड़े। यही स्पष्टता वामपंथियों को असहज करती है।

कुल मिलाकर हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति उस सोच से अलग है जिसमें नेताओं को हर मुद्दे पर संतुलित या अस्पष्ट भाषा में बोलते देखा जाता है। वह अपनी बात सीधे और स्पष्ट शब्दों में रखते हैं, चाहे वह उनकी पहचान का सवाल हो, विकास का मुद्दा हो या घुसपैठ और कानून-व्यवस्था का मामला। यही वजह है कि एक वर्ग उन्हें मजबूती और स्पष्टता का प्रतीक मानता है, जबकि वामपंथी उन्हें अपने लिए चुनौती और असहजता का कारण समझता है।

हाथ में हिडमा के पोस्टर, जेब में चिली स्प्रे: दिल्ली में पर्यावरण के रखवाले नहीं, ‘अर्बन नक्सल’ उतरे प्रदर्शन पर, पुराने ‘वामपंथी पैटर्न’ पर बनाया पुलिस को निशाना

       वामपंथियों ने नक्सली कमांडर माडवी हिडमा के समर्थन में लगाए नारे (साभार: एक्स @Riccha Dwivedi)
राजधानी दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर बना हुआ है। इसी गंभीर स्थिति का हवाला देते हुए कुछ युवाओं ने इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। शुरुआत में वे ये दिखा रहे थे कि वे हवा की खराब गुणवत्ता को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद उनका असली रंग सामने आ गया। वामपंथी प्रदर्शनकारियों ने हाल ही में मारे गए खूंखार नक्सली हिडमा के समर्थन में नारेबाजी शुरू कर दी और ‘कॉमरेड हिडमा अमर रहे’ के नारे लगाए।

इन वापपंथी प्रदर्शनकारियों की तैयारी देखकर साफ समझा जा सकता है कि प्रदूषण तो एक बहाना था, इनका मुद्दा कुछ और था, क्योंकि प्रदर्शनकारी अपने साथ हिडमा के नाम लिखी तख्तियाँ और पोस्टर ही नहीं बल्कि पेपर स्प्रे भी लेकर आए थे। पुलिस ने जब इनसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की माँग की तो इन्होंने पुलिसकर्मियों पर इसका इस्तेमाल किया।

पुलिस के अनुसार,रविवार (23 नवंबर 2025) को करीब 4:30 बजे ये प्रदर्शनकारी इंडिया गेट के सी-हेक्सागन क्षेत्र में जुटे। वहाँ मौजूद पुलिस ने उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से हटने को कहा, लेकिन वे लगातार हिडमा के पक्ष में नारे लगाते रहे और निर्देशों को नजरअंदाज करते रहे।

पुलिस पर किया पेपर स्प्रे, घायल सुरक्षाकर्मियों का अस्पताल में चल रहा इलाज

स्थिति तब बिगड़ गई जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाना शुरू किया। इसी दौरान प्रदर्शन कर रहे  कुछ लोगों ने पुलिस पर पेपर स्प्रे कर दिया, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। कई पुलिसकर्मियों की आँखों में तेज जलन हुई और तीन से चार कर्मियों को तुरंत आरएमएल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उनका इलाज जारी है।

नई दिल्ली के DCP देवेश कुमार ने बताया, “पहली बार, हमने पुलिसवालों पर मिर्च स्प्रे का इस्तेमाल होते देखा। हमारे कुछ अधिकारियों की आँखों में स्प्रे लग गया और अभी उनका RML हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है। इस बारे में कानूनी कार्रवाई की जा रही है।”

मामले की जानकारी देते उन्होंने आगे कहा, “कुछ प्रदर्शनकारी C-हेक्सागन के अंदर जमा हो गए और फिर उस बैरिकेड को पार करने की कोशिश की जिसे हमने आने-जाने पर रोक लगाने के लिए लगाया था। हालाँकि, वे नहीं माने, उन्होंने बैरिकेड तोड़ दिया, सड़क पर आ गए, और वहीं बैठ गए। हमने उनसे हटने की रिक्वेस्ट की, क्योंकि उनके पीछे कई एम्बुलेंस और मेडिकल कर्मचारी इंतजार कर रहे थे और उन्हें इमरजेंसी एक्सेस की जरूरत थी…हमने ट्रैफिक में रुकावट से बचने के लिए उन्हें C-हेक्सागन से हटा दिया। हटाने के दौरान, कई प्रदर्शनकारियों की पुलिस से हाथापाई हुई, और हमारे कई कर्मचारी घायल हो गए।”

हंगामे के कारण ट्रैफिक व्यवस्था भी प्रभावित हुई। सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि कुल 15 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है और उनके खिलाफ पुलिस पर हमला करने और हिंसक गतिविधियों में शामिल होने जैसी गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की जाएगी।

वामपंथी प्रदर्शनकारियों ने हिडमा को लेकर क्या बयान दिया?

असल में इन्हें दिल्ली में बढ़ रहे प्रदूषण से तो कोई लेना-देना ही नहीं था। इनका टार्गेट ही अशांति पैदा करना था। एक वामपंथी ने इस पर बयान देते हुए तो भारत के सबसे खूँखार और मोस्ट वांटेड माओवादी कमांडरों में शुमार माड़वी हिड़मा के तारीफ के पुल ही बाँध दिए।

उसने कहा, “हिडमा एक जनजातीय है जिसने अपने हक के लिए हथियार उठाए। इसे गलत कह सकते हैं, लेकिन वे इसके पीछे के कारण को नकार नहीं सकते। कॉर्पोरेटाइजेशन के खिलाफ लड़ाई जनजातीयों की लड़ाई है, यह पानी, जंगल और जमीन की लड़ाई है। इस वजह से नारायण कान्हा को देशद्रोही नहीं कहा जा सकता। अपने हक की रक्षा करने वाले लोगों पर ऐसा दबाव नहीं डाला जा सकता।”

शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को हिंसक बनाने की वापपंथियों की ये हरकते नई नहीं

यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को दूसरा रंग दे दिया। उस समय किसानों के हितों की माँग का दावा करने वाले प्रदर्शनकारी अचानक उमर खालिद और शरजील इमाम की तख्तियाँ लेकर बैठ गए थे। इतना ही नहीं, उस समय भी पुलिस को टार्गेट करके हिंसा के प्रयास हुए थे।

इसके अलावा, साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई। पुलिस को निशाना बनाया गया। उनके ऊपर कहीं गर्म पानी फेंका गया था तो कीं हथियार लेकर उन्हें दौड़ाया गया था। उन्हें टारगेट करने के लिए दिल्ली दंगों में आरोपित गुलफिशा फातिमा जैसे लोगों ने उमर खालिद के कहने पर लाल मिर्च पाउडर, एसिड, बोतलें, डंडे तक जमा किए थे।

आज स्थिति दोबारा वैसी ही देखने को मिली है। जिसका मतलब साफ है कि पर्यावरण जैसा मुद्दा भी इन वामपंथियों के लिए सिर्फ अपना प्रोपेगेंडा फैलाने का एक साधन मात्र है। अंत में इनका असली चेहरा कभी नक्सल समर्थक, कभी आतंक समर्थक के तौर पर उभर कर आता है। इन्हें समस्या देश, देश की सरकार और देश के कानून से होती है और इनकी संवेदना देश विरोधी तत्वों से।

आज जिस हिडमा के लिए इन्होंने दिल्ली में पुलिस पर हमला किया है। क्या उसकी लड़ाई सच में अपनी जमीन और अधिकार की थी? क्योंकि अगर ऐसा होता तो उसके हाथ मासूमों की हत्या से लाल नहीं होते।

कौन था 26 बड़े हमलों का मास्टरमाइंड हिडमा?

हकीकत यही है कि हिडमा बस्तर में नक्सलियों का वह सबसे बड़ा कमांडर था और सेंट्रल टीम को सँभाल रहा था। माना जाता है कि कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों पर जब नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था, तब माड़वी हिडमा भागने में कामयाब रहा था। लेकिन इस बार सुरक्षाबलों ने उसे खत्म कर दिया।

हिडमा 150 से अधिक जवानों की जान ले चुका था। साल 2004 से अब तक 26 से अधिक हमलों में वह शामिल था। इन हमलों में 2013 का झीरम अटैक और 2021 का बीजापुर अटैक शामिल है।

3 अप्रैल 2021 को सुरक्षाबलों ने माड़वी हिडमा को पकड़ने के लिए अभियान चलाया था। बीजापुर में नक्सलियों ने जवानों पर हमला बोल दिया और इस मुठभेड़ में 22 जवान बलिदान हो गए थे। दंतेवाड़ा हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की बलिदानी हुई थी, इसका नेतृत्व भी इसी ने किया था।

फ्रांस : वामपंथी गठबंधन सरकार द्वारा 90 प्रतिशत टैक्स लगाने की तैयारी, भारत में यही चाहता था इंडी गठबंधन


फ़्रांस में संसदीय चुनाव हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा सीटें वामपंथी गठबंधन को मिली हैं और अब उनके गठबंधन से ही सरकार बनेगी। लेफ्ट वालों को पता है कि अब सरकार में उनकी भगादारी होनी तय है इसके बाद वामपंथियों ने जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया और जगह-जगह आगजनी और दंगे हुए। इसके बाद उन्होंने अपना एजेंडा लागू करना शुरू कर दिया है। उनकी सबसे पहली योजना है कि 4 लाख यूरो सालाना से ज्यादा कमाने वाले लोगों पर 90 प्रतिशत wealth tax लगाने का प्रस्ताव। यह एक तरह का संपत्ति का फिर से बंटवारा यानी Wealth redistribution ही है जिसमें अमीरों पर मोटा टैक्स लगाकर उस पैसे को अपने वोट बैंक में बांटना है। पिछले दिनों भारत में भी चुनाव से पहले राहुल गांधी और इंडी गठबंधन ने इसी तरह के Wealth Redistrubution की बात कही थी। इंदिरा गांधी की सरकार ने 1973-74 में अमीरों और उद्योगपतियों पर 97.5 प्रतिशत वेल्थ टैक्स थोप दिया था, इससे उद्योग चरमरा गए थे। हाल में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता और राहुल गांधी ने जितनी आबादी उतना हक की बात कही थी। वहीं उनके करीबी सैम पित्रोदा ने विरासत टैक्स लगाने की बात कही थी। कुल मिलाकर जो आज फ्रांस में हो रहा है वही भारत में भी देखने को मिलता अगर इंडी गठबंधन चुनाव जीत जाता। यह सब विदेशी ताकतों के डीप स्टेट के इशारों पर हो रहा है।

फ्रांस में 90 प्रतिशत टैक्स लगाने की तैयारी
फ्रांस वामपंथी पार्टियों द्वारा 4 लाख यूरो सालाना से ज्यादा कमाने वाले लोगों पर 90 प्रतिशत wealth tax लगाने का प्रस्ताव है। यह एक तरह का संपत्ति का फिर से बंटवारा यानी Wealth redistribution ही है जिसमें अमीरों पर मोटा टैक्स लगाकर उस पैसे को अपने वोट बैंक में बांटना है। पिछले दिनों भारत में भी चुनाव से पहले राहुल गांधी और इंडी गठबंधन ने इसी तरह के Wealth Redistrubution की बात कही थी। फ़्रांस में आयकर की दर वर्तमान में 177,106 यूरो से अधिक आय पर 45 प्रतिशत टैक्स का प्रावधान है।

उल्टा पड़ा मैक्रों का दांव 
फ्रांस की संसद का कार्यकाल 2027 में खत्म होना था, लेकिन यूरोपीय संघ में नौ जून को बड़ी हार मिलने के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने समय से पहले संसद भंग कर बड़ा दांव खेला था। उन्होंने कहा था कि एक बार फिर मतदाताओं के बीच जाने से स्थिति ‘स्पष्ट’ होगी। हालांकि, उनका यह दांव लगभग हर पड़ाव पर उल्टा पड़ता दिखा है।

वामपंथी गठबंधन की जीत की जश्न में हुए दंगे
वामपंथी गठबंधन को संसदीय चुनाव में जीत की खबरें आने के बाद पेरिस में जश्न और अशांति दोनों का माहौल रहा। सर्वेक्षणों में कहा जा रहा था कि दक्षिणपंथी पार्टी चुनाव जीतने जा रही है वहीं अचानक वामपंथी गठबंधन के आगे निकलने की खबरों के बाद पूरे फ्रांस में हिंसा भड़क उठी। पेरिस की सड़कों पर उग्र दृश्य देखे गए, जिसमें दंगा नियंत्रण गियर में अधिकारी भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे, जबकि झड़पों के बीच आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया था। प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर मोलोटोव कॉकटेल फेंके और धुएं के बम फोड़ दिए। वीडियो फुटेज में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों को सड़कों पर भागते, आग जलाते और उपद्रव करते हुए देखा गया।

फिलिस्तीन को मान्यता देगा फ्रांस
अभी भले ही फ़्रांस में किसी एक गठबंधन के सरकार बनाने के आसार कम ही हैं। मगर वामपंथी नेता ज्यां ने बड़ा एलान कर दिया है। ज्यां ने कहा कि उनका गठबंधन फिलिस्तीन को मान्यता देने की दिशा में काम करेगा। हाल ही में यूरोप के चार देशों ने फिलिस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी थी। ये चार देश स्पेन, नॉर्वे, आयरलैंड और स्लोवेनिया हैं। ज्यां के सोशल मीडिया हैंडल से लिखा गया है, ”प्रधानमंत्री न्यू पॉपुलर फ्रंट से होगा। हम कई चीज़ों पर फ़ैसला कर सकेंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमें फिलिस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने पर सहमत होना होगा।”

अल्पसंख्यकों को उनका बकाया हक दिलाएंगेः राहुल गांधी
राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के दौरान 6 अप्रैल 2024 को हैदराबाद में कहा कि अगर वह सत्ता में आए, तो उनकी कांग्रेस पार्टी आर्थिक और संस्थागत सर्वेक्षण के साथ-साथ जाति जनगणना भी कराएगी ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि किसके पास क्या है और वह कितना कमाता है। उन्होंने कहा कि इसके बाद, मोदी सरकार द्वारा 22 बड़े व्यवसायियों को दिए गए 16 ट्रिलियन रुपये ($192 बिलियन) के लाभ का एक हिस्सा देश के 90 प्रतिशत लोगों को हस्तांतरित किया जाएगा, जो सामाजिक न्याय प्रदान करने के शुरुआती बिंदु के रूप में होगा। उन्होंने जाति जनगणना को भारतीय समाज में “एक्स-रे” करार दिया था। गांधी ने कहा, “यह मेरे लिए कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, यह मेरे जीवन का मिशन है।” “आप लिख सकते हैं; कोई भी ताकत जाति जनगणना को नहीं रोक सकती।”

जाति जनगणना में क्या मुस्लिमों और ईसाईयों की जातियों का उल्लेख किया जाएगा? जिस पर समस्त हिन्दुओं और हिन्दू संगठनों को सरकार पर दबाव बनाना होगा? 

भारत में कांग्रेस पहले ही 90 प्रतिशत से ज्यादा टैक्स लगा चुकी है अब एक बार फिर कांग्रेस उसी नीति पर चलने की बात कह रही है…

इंदिरा गांधी ने अमीरों पर थोपा था 97.5 प्रतिशत टैक्स
तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस का यह फार्मूला कोई नया नहीं है। इंदिरा गांधी की सरकार ने 1971-72 में 10 लाख से अधिक आय वाले किसी भी व्यक्ति को 85 प्रतिशत टैक्स और 10 प्रतिशत सरचार्ज का भुगतान करना होता था। यानी कुल मिलाकर उन्हें 95 प्रतिशत का भुगतान करना पड़ता था। 1973-74 में इंदिरा सरकार ने अमीरों और उद्योगपतियों के लिए 97.5 प्रतिशत टैक्स स्लैब बनाया था। यही कारण ही भारत में ब्लैक मनी, हवाला, तस्करी और समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हुई थी।

भारत में 1976 में था 66 फीसदी टैक्स
1976 में भारत के वित्त मंत्री चिदंबरम सुब्रमण्यम थे। इस दौरान आयकर 60 फीसदी था और सरचार्ज 10 फीसदी। यानी भारत में कुल आयकर 66 फीसदी था। बेहतर कर अनुपालन के लिए उन्होंने टैक्स में कटौती की थी।

नेहरू ने 1958-59 में लगाया था गिफ्ट टैक्स
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1958-59 का बजट पेश किया था। इस बजट में जवाहरलाल नेहरू ने डायरेक्‍ट टैक्‍स के तहत पहली बार गिफ्ट पर टैक्‍स का प्रावधान पेश किया. इसे ‘गिफ्ट टैक्‍स’ कहा गया। इसमें 10 हजार रुपये से ज्‍यादा की संपत्ति के ट्रांसफर पर गिफ्ट टैक्‍स (Gift Tax) का प्रावधान किया गया।

नेहरू के समय वेल्थ टैक्स से गिफ्ट टैक्स तक
आजादी के बाद जब कांग्रेस की सरकार थी तब 1957 में वित्त मंत्री टी टी कृष्णमचारी ने पहली बार वेल्थ टैक्स और एक्सपेंडिचर टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा। फिर अगले ही साल प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हाथों आया वह बजट, जिसमें पहली बार गिफ्ट टैक्स (Gift Tax) का प्रावधान किया गया। वेल्थ टैक्स के बारे में कृष्णमचारी ने कहा था, ‘इससे आगे चलकर टैक्स चोरी की गुंजाइश घट जाएगी।’ एक्सपेंडिचर टैक्स के बारे में उन्होंने कहा था कि इससे लोगों की अनापशनाप खर्च करने की आदत पर लगाम लगेगी और उनमें बचत की आदत बनेगी।

फ्रांस : जीत के बाद भी नहीं थमे वामपंथी, देश को जलाकर कर रहे ‘शक्ति प्रदर्शन’: दक्षिणपंथ की बढ़त देख शुरू हुई पेट्रोल बम वाली वाम हिंसा

            फ्रांस में चुनाव के बाद लगातार दंगे जारी हैं (चित्र साभार: The Guardian & EssexPR/X)
फ्रांस के आम चुनावों में वामपंथी गठबंधन की जीत हुई है। वामपंथी गठबंधन की जीत के बाद फ्रांस में भीषण दंगे भड़क गए हैं और प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए हैं। यह प्रदर्शनकारी दंगे कर रहे हैं और पेट्रोल बम चला आगजनी कर रहे हैं। फ्रांस में इससे बचने के लिए भारी पुलिस बंदोबस्त किया गया है।

फ्रांस में वामपंथी गठबंधन की जीत अप्रत्याशित तरीके से हुई है। चुनाव से पहले लगातार यह माना जा रहा था कि इन चुनावों में दक्षिणपंथी गठबंधन की जीत होगी। दक्षिणपंथी गठबंधन की नेता मरीन ली पेन के प्रधानमंत्री बनने के आसार जताए जा रहे थे। लेकिन दूसरे चरण की वोटिंग के बाद पासा पलट गया और वामपथी गठबंधन सबसे अधिक सीटें लाने में सफल रहा।

फ्रांस के इन चुनावों में वामपंथी गठबंधन ने 577 सीटों में से लगभग 182 सीटों पर जीत हासिल कर ली है। वहीं दूसरी तरफ फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की रिनेसां पार्टी ने 163 सीटें जीती हैं। तीसरे नम्बर पर धुर दक्षिणपंथी गठबंधन है, जिसने 132 सीटें जीत ली है। अभी अंतिम परिणाम नहीं सामने आए हैं।

अंतिम परिणामों के सामने आने से पहले ही फ्रांस में भीषण हिंसा का माहौल है। प्रदर्शकारियों ने चुनाव नतीजों के रुझानों के साथ फ्रांस की सड़कों पर कब्जा कर लिया है। फ्रांस की राजधानी पेरिस में प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर गाड़ियों को इकट्ठा करके आग लगा दी और पुलिस से भी भिड़ गए।

दंगाइयों ने पुलिस पर पत्थर भी फेंके। कहीं कहीं कूड़ेदानों में भी आग लगा दी गई। फ्रांस के शहर नान्तेस में भी दंगाइयों ने कहर बरपाया है। अभी यह नहीं साफ है कि दंगाई किस समूह के हैं। पुलिस उन पर कब्जा करने में जुटी हुई है। दंगाइयों ने पेरिस के महत्वपूर्ण स्थानों पर तोड़फोड़ भी की है।

फ्रांस में दंगों के इतिहास को देखते हुए पहले से ही इस हिंसा का अंदाजा लगाया जा रहा था। वामपंथियों के इस हिंसा करने की आशंका जताई जा रही थी। इसके लिए फ्रांस में 30,000 पुलिसकर्मी लगाए गए थे। पेरिस समेत बड़े शहरों में महंगी दुकानों में बैरिकेड लगा दिए गए थे ताकि दंगे के दौरान उन्हें लूट से बचाया जा सके।

कुछ दुकानों के शीशों पर लकड़ी तक ठोंक दी गई ताकि प्रदर्शनकारी यहाँ से ना घुसें। गौरतलब है कि वामपंथियों ने पहले चरण की वोटिंग पूरी होने के बाद फ्रांस में कसके दंगे किए थे। 30 जून, 2024 को इन दंगाइयों ने फ़्रांस में कसके कहर बरपाया था।

वामपंथियों ने पहले चरण के चुनाव में दक्षिणपंथियो की बढ़त के बाद सार्वजनिक सम्पत्ति को जलाया था और पुलिस पर हमले किए थे। दूसरे चरण के बाद हिंसा किस समूह ने की है, यह स्पष्ट नहीं हो सका है। चुनाव नतीजों के बाद अब फ्रांस में वामपंथी प्रधानमंत्री बनने के कयास लगाए जा रहे हैं।

प्रकाश राज और RJ सायमा सहित पूरा गिरोह उतरा कानून का उल्लंघन करने वाले मोहम्मद ज़ुबैर के समर्थन में: मासूम बच्चों का वीडियो वायरल कर किया था

                     आरजे सायमा, मोहम्मद जुबैर और प्रकाश राज (दाएँ से बाएँ) (फोटो साभार :                                                                                                                        ट्विटर__sayema/starsunfolded/IMBD)
फेक न्यूज की फैक्ट्री चलाने वाले कथित फैक्ट चेकर जुबैर अहमद के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद से उसकी गिरफ्तारी की माँग तेज हो गई है। आम लोग जहां एक पीड़ित बच्चे का वीडियो शेयर कर उसकी पहचान उजागर करने वाले और वीडियो को एडिट कर समाज में जहर घोलने वाले जुबैर की गिरफ्तारी की माँग कर रहे हैं, तो पूरा वामपंथी गिरोह उसके बचाव में खुलकर उतर आया है। इस लिस्ट में प्रकाश राज, आरजे सायमा, सीमा चिश्ती जैसे नाम हैं।

सबसे पहले पढ़िए सायमा का ट्वीट, जिसने कौशिक राज के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए यूपी पुलिस को गलत ठहरा दिया। सायमा ने लिखा, “क्या समय आ गया है, तृप्ति त्यागी नाबालिग के साथ अपराध करने के बाद भी खूब सपोर्ट पा रही है, तो इस खबर को सामने लाने वाले पर ही पुलिस ‘अटैक’ कर रही है।” सायमा ने ‘आई स्टैंड विद जुबैर’ का हैशटैग भी आगे बढ़ाया है।

वहीं, वामपंथी मीडिया संस्थान द वायर की संपादक सीमा चिश्ती को जुबैर इसलिए बेचारे लगने लगे, क्योंकि जुबैर ने आग लगाकर पानी डाल दिया था। उसका एडिट किया हुआ वीडियो सारी दुनिया में घूमने के बाद। अब सीमा चिश्ती यूपी पुलिस पर ही सवाल उठा रही हैं, पढ़िए ट्वीट…

हालाँकि प्रकाश राज के ट्वीट करते ही लोगों ने जम कर लताड़ लगाई। प्रकाश राज ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा कि वो जुबैर का समर्थन करने के लिए इस हैशटैग को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने लोगों से भी आई स्टैंड विद जुबैर हैशटैग के साथ ट्वीट करने की अपील की।

प्रकाश राज कई मामलों में बुरी तरह से एक्सपोज हो चुके हैं, जो एक्स (पूर्व में ट्विटर) की आम जनता भी उन्हें उसी तरह आड़े हाथों लेती है। प्रकाश राज के ट्वीट के बाद एक्स (पूर्व में ट्विटर) यूजर्स ने प्रकाश राज को उसकी असल औकात याद दिला ली। देखिए कुछ ट्वीट्स…

दिनेश भट्ट नाम के एक यूजर ने प्रकाश राज पर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने प्रकाश राज को रिप्लाई देते हुए लिखा, “एक ऐसा मूर्ख जो अपनी मक्कारी भरी हरकतों से आज तक एक निम्न स्तरीय जंतु की तरह रेंग रहा है, जिसका मन मस्तिष्क घटियापन से भरा हुआ है, वो एक ऐसे बेयर रूपी मक्कार को सहारा देकर खड़े होने की बात कर रहा है, पहले तुम मेरे खड़े हुए कड़क जंतु का सहारा लेकर अपने पृष्ठ भाग को रख कर बैठ जाओ, तुम्हारे पृष्ठ भाग की खुजली के साथ साथ तुम्हारी मानसिक खुजली भी दूर हो जाएगी।।”

अनूप रावत लिखते हैं, “फॉर्म भरते वक्त फादर वाली जगह पर अब्दुल तो नहीं लिखते हो?”

जॉन कबीर एक तस्वीर के माध्यम से बोल रहे हैं कि तुम कुछ भी करो, हमें क्या मतलब है।

योगी आदित्यनाथ नाम से बने एक पेरोडी अकाउंट से अलग ही वीडियो शेयर किया गया है। कैप्शन में उस वीडियो में दिख रहे व्यक्ति की हालत की तुलना प्रकाश राज और जुबैर से की गई है।

मोहम्मद ज़ुबैर ने वीडियो के जरिए फैलाया था प्रोपेगंडा

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के मंसूरपुर पुलिस थाने में AltNews के सह-संस्थापक मोहम्मद ज़ुबैर पर FIR दर्ज की है। ये मामला खुब्बापुर गाँव स्थित ‘नेहा पब्लिक स्कूल’ के वायरल वीडियो से जुड़ा है। वीडियो में शिक्षिका तृप्ता त्यागी बैठी हुई दिख रही है। साथ ही एक मुस्लिम बच्चे को दूसरे बच्चों से पिटवाया जाता है। वीडियो उस मुस्लिम बच्चे के चचेरे बड़े भाई ने ही बनाया था। वीडियो में वो हँसता हुआ सुनाई दे रहा है। वही शिक्षा के पास अपने भाई की शिकायत लेकर आया था।

वहीं मोहम्मद ज़ुबैर ने इस मामले में वीडियो वायरल किया था, लेकिन बच्चों के चेहरों को ब्लर नहीं किया था। इस FIR में बताया गया है कि AltNews के पत्रकार मोहम्मद ज़ुबैर द्वारा ‘किशोर न्याय अधिनियम’ का उल्लंघन करते हुए बच्चे की पहचान उजागर की गई है। इसके लिए उसके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करने की माँग की गई है। ये FIR सोमवार (28 अगस्त, 2023) को दर्ज की गई है। मोहम्मद ज़ुबैर ने बाद में इस वीडियो को डिलीट कर लिया था, लेकिन माफ़ी तक नहीं माँगी थी।