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100 लोगों की भीड़ लेकर अरविंद केजरीवाल PM आवास तक करना चाहते थे मार्च, दिल्ली पुलिस ने नहीं दी परमिशन

    केजरीवाल PM Awas के बाहर धरना करना चाहता था, दिल्ली पुलिस ने सिखाया सबक (फोटो साभार : Video SS)
आज 
E20 पेट्रोल पर विपक्ष जनता को गुमराह कर रही है। ये पेट्रोल आज से नहीं पिछली सरकारों के समय से बिक रहा है। गौरतलब बात है कि यूपीए कार्यकाल में पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर ने 11 अगस्त 2005 को पार्लियामेंट में लोगों से शराब कम पीने के लिए कहा था क्योकि हमें E20 पेट्रोल बनाना है।

राजनीतिक रोटियाँ सेकने की अपनी फितरत से बाज न आते हुए आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने मंगलवार (4 अगस्त) को एक बार फिर सस्ता प्रोपेगेंडा फैलाने की घटिया कोशिश की। E20 पेट्रोल के झूठे मुद्दे पर केजरीवाल अपने 100 अंधभक्त समर्थकों की भीड़ लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास (PM Awas) के बाहर धरना-प्रदर्शन करने पहुँच रहे थे, लेकिन सतर्क दिल्ली पुलिस ने उनके इस ड्रामे पर पानी फेरते हुए परमिशन देने से साफ इनकार कर दिया। अरविंद केजरीवाल और उनके समर्थकों को दिल्ली पुलिस ने फिरोजशाह रोड पर ही रोक दिया था, जिसके बाद सभी प्रदर्शनकारी उसी रोड पर बैठ गए।

दिल्ली पुलिस ने नहीं दी इजाजत

प्रधानमंत्री आवास (PM Awas) और 7 लोक कल्याण मार्ग के आसपास का इलाका देश के सबसे सुरक्षित और संवेदनशील क्षेत्रों में आता है। यहाँ कोई भी सिरफिरा अपनी मनमानी नहीं कर सकता।
नो प्रोटेस्ट जोन- पीएम आवास (PM Awas) के 1 किलोमीटर के दायरे का पूरा इलाका सख्त रूप से ‘नो प्रोटेस्ट जोन’ है, जहाँ किसी भी प्रकार के प्रदर्शन या जुलूस के लिए दिल्ली पुलिस की अनुमति अनिवार्य होती है।
त्रि-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था- इस अति-सुरक्षित क्षेत्र में पीएम आवास (PM Awas) के बाहर हमेशा दिल्ली पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स का कड़ा पहरा रहता है, जबकि अंदर एसपीजी (SPG) का अचूक सुरक्षा कवच होता है।
धारा 163 का शिकंजा– यहाँ हमेशा धारा 163 लागू रहती है, जिसके तहत किसी भी तरह के अवैध जमावड़े की सख्त मनाही है। नियम तोड़ने या संदिग्ध हरकत करने पर पुलिस सीधे गिरफ्तार करने का अधिकार रखती है।
इन्हीं कड़े नियमों का हवाला देते हुए पुलिस ने साफ कर दिया कि कानून सबके लिए बराबर है। याद कीजिए, ठीक इसी तरह जब 21 जुलाई 2026 को बिना किसी पूर्व सूचना या अनुमति के राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी और मल्लिकार्जुन खरगे समेत कई काँग्रेसी नेता छात्रों की आड़ में ड्रामा करने पीएम आवास (PM Awas) पहुँचे थे, तो दिल्ली पुलिस ने उनकी हेकड़ी निकालते हुए सबको हिरासत में ले लिया था। अब बिल्कुल वैसा ही हाई-वोल्टेज और घटिया ड्रामा केजरीवाल अपने साथियों के साथ वहाँ रचने की फिराक में थे।

केजरीवाल की नौटंकी और उनका खोखला एजेंडा

आम आदमी पार्टी के मुखिया केजरीवाल का रोना है कि उन्होंने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर E20 पेट्रोल पर अपनी फर्जी चिंताएँ जताई थीं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसलिए वे 2 लाख लोगों के फर्जी हस्ताक्षर वाले कागजात लेकर खुद पीएम मोदी को सौंपने का ढोंग रचना चाहते थे।
वे जनता को यह मूर्खतापूर्ण ज्ञान दे रहे हैं कि E20 के साथ शुद्ध पेट्रोल का विकल्प भी मिलना चाहिए। लेकिन शुद्ध पेट्रोल का ढोंग रचने वाले केजरीवाल अच्छी तरह जानते हैं कि देश में 10 फीसदी इथेनॉल मिश्रित (E10) पेट्रोल साल 2022 से ही सफलतापूर्वक मिल रहा है।
इसे बढ़ाकर अप्रैल 2026 में E20 (यानी 20 फीसदी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) किया गया है। जहाँ तक शुद्ध पेट्रोल का सवाल है, तो ‘XP100’ जैसे प्रीमियम ब्रांड बाज़ार में पहले से मौजूद हैं, जिनकी कीमत उनकी प्रीमियम क्वालिटी के हिसाब से है।
सरकार पहले ही दूध का दूध और पानी का पानी करते हुए यह स्पष्ट कर चुकी है कि यदि अंतरराष्ट्रीय हालातों और संकट के समय इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का विकल्प न अपनाया जाता, तो देश में पेट्रोल की कीमतें आसमान छूते हुए 125 रुपए प्रति लीटर तक पहुँच जातीं। इन तथ्यों से पूरी तरह वाकिफ होने के बावजूद केजरीवाल सिर्फ जनता को भड़काने और आंदोलित करने के कुत्सित प्रयासों में जुटे हैं।

मीडिया की सुर्खियों में बने रहने की सस्ती भूख

असली सच्चाई तो यह है कि कुछ समय पहले जब राहुल गाँधी ने छात्र आंदोलन के नाम पर पीएम मोदी के घर (PM Awas) के बाहर नौटंकी की थी और देश भर का मीडिया उन्हें कवर कर रहा था, तब से केजरीवाल की बेचैनी बढ़ गई थी।
राहुल गाँधी की देखा-देखी अब अरविंद केजरीवाल भी वही सस्ती लोकप्रियता पाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि E20 जैसे झूठे मुद्दे पर वे पीएम आवास (PM Awas) के सामने पहुँचकर एक बार फिर ‘सीन क्रिएट’ कर लेंगे और मीडिया में लाइमलाइट बटोर लेंगे, लेकिन दिल्ली पुलिस ने उनकी इस गंदी चाल को पहले ही नाकाम कर दिया।

‘मियाँ’ का मतलब ‘अवैध बांग्लादेशी’… मुस्लिम विरोधी एजेंडा बताकर ‘द वायर’ का हिमंता के खिलाफ प्रोपेगेंडा

                    द वायर और असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा (साभार : The Wire & thecrossbill)
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के हाल के बयानों को लेकर मुख्यधारा के वामपंथी मीडिया और ‘द वायर’ जैसे पोर्टल्स ने एक सुनियोजित अभियान छेड़ दिया है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और ‘मियाँ’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर मुख्यमंत्री को ‘मुस्लिम विरोधी’ सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। हिमंता बिस्वा सरमा का संघर्ष किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उन ‘अवैध बांग्लादेशी’ के खिलाफ है जो असम की स्वदेशी संस्कृति, भूमि और लोकतांत्रिक अधिकारों को निगल रहे हैं।

द वायर का नैरेटिव: बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की साजिश

‘द वायर‘ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हिमंता बिस्वा सरमा जानबूझकर एक खास समुदाय (मियाँ) को डराने और उन्हें ‘परेशान’ करने की राजनीति कर रहे हैं। लेख में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ने 4 से 5 लाख मियाँ मतदाताओं के नाम हटाने की बात कहकर लोकतंत्र का अपमान किया है। ‘द वायर’ ने मुख्यमंत्री के उस बयान को भी हाइलाइट किया जिसमें उन्होंने लोगों से मियाँ समुदाय के लिए ‘मुश्किलें’ पैदा करने को कहा, ताकि वे असम छोड़ दें।

वामपंथियों को हिमंता ने दिया जवाब

 हिमंता बिस्वा सरमा ने वायर और उस जैसी वामपंथी खेमों के स्वघोषित मुस्लिम मसीहों को तीखा जवाब दिया है। उन्होंने X पर एक लंबे पोस्ट में लिखा, “जो लोग ‘मियाँ’ शब्द (यह असम में बांग्लादेशी मुस्लिमों की घुसपैठ के लिए इस्तेमाल होता है) पर मेरी टिप्पणी को लेकर मुझ पर हमला कर रहे हैं, उन्हें पहले यह पढ़ लेना चाहिए कि असम के बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने खुद क्या कहा है। यह मेरी भाषा नहीं है, न मेरी कल्पना, और न ही कोई राजनीतिक बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है।”

उन्होंने आगे लिखा, “ये शब्द खुद अदालत के हैं, ‘असम में चुपचाप और खतरनाक तरीके से जनसंख्या में बदलाव हो रहा है, जिससे लोअर असम के रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण जिलों के हाथ से निकल जाने का खतरा पैदा हो सकता है। अवैध प्रवासियों की वजह से ये इलाके धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल क्षेत्र बनते जा रहे हैं। इसके बाद यह केवल समय की बात होगी कि इन इलाकों को बांग्लादेश में मिलाने की माँग उठाई जाए। अगर लोअर असम हाथ से निकल गया, तो पूरा पूर्वोत्तर भारत देश के बाकी हिस्सों से कट जाएगा और उस क्षेत्र के समृद्ध प्राकृतिक संसाधन भी देश के हाथ से निकल सकते हैं’।”

हिमंता ने आगे लिखा, “जब देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत ‘जनसंख्या पर आक्रमण’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है और देश की एकता और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चेतावनी देती है, तो उस सच्चाई को स्वीकार करना न तो नफरत है, न सांप्रदायिकता, और न ही किसी समुदाय पर हमला। यह एक गंभीर और पुरानी समस्या को समझना है, जिसे असम दशकों से झेल रहा है।

उन्होंने लिखा, “हमारा प्रयास किसी मजहब या किसी भारतीय नागरिक के खिलाफ नहीं है। हमारा प्रयास असम की पहचान, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा करना है, ठीक वैसे ही जैसे सुप्रीम कोर्ट ने देश को चेतावनी दी थी। उस चेतावनी को नजरअंदाज करना ही असम और भारत के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा।”

वामपंथियों की आँखों में क्यो खटकते हैं हिमंता?

वामपंथी खेमे की राजनीति अक्सर इस सोच पर टिकी रही है कि धार्मिक पहचान को दबाकर रखा जाए और खास समुदायों को खुश करने की नीति अपनाई जाए। उन्हें ऐसे नेता पसंद आते हैं जो हर मुद्दे पर संतुलन के नाम पर चुप्पी साध लें या फिर वोट बैंक के दबाव में फैसले लें। जब कोई नेता खुलकर अपनी पहचान की बात करता है तुष्टीकरण की राजनीति को चुनौती देता है और स्पष्ट शब्दों में सच बोलता है, तो वही वामपंथियों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाता है।

हिमंता बिस्वा सरमा इसी वजह से वामपंथियों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं। वह बार-बार यह सवाल उठाते हैं कि आखिर हिंदू अपनी पहचान पर गर्व क्यों न करे। वामपंथी विचारधारा को यह बात स्वीकार नहीं होती क्योंकि उनकी राजनीति में हिंदू पहचान को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। उन्हें लगता है कि अगर कोई नेता हिंदुत्व की बात करेगा, तो उनकी वैचारिक जमीन कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए वामपंथी गुट ऐसे नेताओं को कट्टर, विभाजनकारी या असहिष्णु साबित करने की कोशिश करते हैं।

वामपंथियों को यह भी खलता है कि हिमंता सरमा मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक की तरह देखने के बजाय उन्हें शिक्षा और विकास की मुख्यधारा में लाने की बात करते हैं। जब वह घुसपैठ या अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाते हैं तो वामपंथी इसे मानवाधिकार या अल्पसंख्यक विरोध के रूप में पेश करने लगते हैं। असल में समस्या यह है कि वामपंथी हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखते हैं और कानून, सुरक्षा या सामाजिक संतुलन जैसी बातों को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते।

हिमंता सरमा का अपराध वामपंथियों की नजर में यही है कि वह डरकर नहीं बोलते। वह न तो किसी समुदाय के दबाव में आते हैं और न ही वैचारिक आलोचना से घबराते हैं। वह साफ कहते हैं कि देश और समाज का हित सबसे ऊपर है, चाहे इसके लिए कड़वी बात ही क्यों न कहनी पड़े। यही स्पष्टता वामपंथियों को असहज करती है।

कुल मिलाकर हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति उस सोच से अलग है जिसमें नेताओं को हर मुद्दे पर संतुलित या अस्पष्ट भाषा में बोलते देखा जाता है। वह अपनी बात सीधे और स्पष्ट शब्दों में रखते हैं, चाहे वह उनकी पहचान का सवाल हो, विकास का मुद्दा हो या घुसपैठ और कानून-व्यवस्था का मामला। यही वजह है कि एक वर्ग उन्हें मजबूती और स्पष्टता का प्रतीक मानता है, जबकि वामपंथी उन्हें अपने लिए चुनौती और असहजता का कारण समझता है।

कांग्रेस ही कर रही असली ‘वोट चोरी’: पहले पवन खेड़ा, अब पत्नी कोटा नीलिमा के मिले दो वोटर कार्ड

                            पवन खेड़ा और उनकी पत्नी कोटा नीलिमा की तस्वीर (साभार : moneycontrol)
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा पर दो वोटर आईडी रखने का मामला अभी थमा भी नहीं था कि अब उनकी पत्नी को लेकर भी ऐसा ही आरोप सामने आया है। पवन खेड़ा को चुनाव आयोग ने नोटिस भी भेजा था। पवन खेड़ा की पत्नी कोटा नीलिमा के पास भी दो वोटर ID हैं, एक तेलंगाना की खैरताबाद सीट से और दूसरी काका नगर नई दिल्ली सीट से।
सोनिया जी पर अपराधिक मामला दिल्ली में दर्ज हुआ है जिसकी सुनवाई 10 सितंबर को है..मामला है कि जब नागरिकता 1983 में ली तो 1980 में वोटर लिस्ट में नाम किन दस्तावेजों के आधार पर पंजीकृत करवाया..भारतीय संविधान में किसी भी गैर भारतीय नागरिक को वोटर लिस्ट में नामांकन का अधिकार ही नहीं तो फिर मताधिकार का प्रश्न ही नहीं है....

यह आरोप बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने सार्वजनिक किया है। उनका कहना है कि कांग्रेस नेता राहुल गाँधी दूसरों पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाते हैं, लेकिन उनके करीबी सहयोगी खुद इस गड़बड़ी में लिप्त हैं।

पवन खेड़ा की पत्नी कोटा नीलिमा पर भी दो वोटर ID

बीजेपी का आरोप है कि कोटा नीलिमा के नाम से भी दो एक्टिव वोटर ID हैं। एक ID तेलंगाना के खैरताबाद विधानसभा क्षेत्र में है। यह ID उनके चुनावी हलफनामे में भी दर्ज है।

लेकिन दूसरा EPIC नंबर दिल्ली की काका नगर नई दिल्ली विधानसभा में भी एक्टिव है। यहीं पवन खेड़ा का नाम भी दर्ज है। यानी दोनों पति-पत्नी के नाम दो-दो जगहों पर वोटर लिस्ट में मौजूद हैं।

बीजेपी नेता अमित मालवीय का कहना है कि यह अकेला मामला नहीं है। उन्होंने इसे कॉन्ग्रेस की ‘वोट बैंक’ राजनीति का हिस्सा बताया है।

पवन खेड़ा पर दो वोटर ID

पवन खेड़ा का नाम दिल्ली की दो विधानसभा सीटों ‘जंगपुरा और काका नगर नई दिल्ली’ की वोटर लिस्ट में पाया गया। दोनों जगहों पर उनके नाम से अलग-अलग EPIC नंबर एक्टिव हैं।

इस आधार पर चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा। आयोग ने कहा है कि एक व्यक्ति दो जगहों पर वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो सकता। इसलिए पवन खेड़ा से 8 सितंबर 2025 तक जवाब माँगा गया है।

वहीं, पवन खेड़ा का कहना है कि उन्होंने 2016 में एक जगह से नाम हटाने के लिए आवेदन किया था। लेकिन चुनाव आयोग ने उसे समय पर हटाया नहीं। उन्होंने जाँच की माँग की है और कहा है कि अगर उन्होंने दो बार वोट डाला है तो CCTV फुटेज पेश किया जाए।

मामले पर बीजेपी का रुख

बीजेपी ने इस मुद्दे को कॉन्ग्रेस के ‘दोहरे रवैये’ से जोड़ा है। बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस पार्टी खुद ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाती है, लेकिन उसके अपने नेता ऐसे कृत्यों में शामिल हैं। बीजेपी ने राहुल गाँधी से सवाल किया है कि वे अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ लगे इन आरोपों पर क्यों चुप हैं।