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INDI गठबंधन राहुल गाँधी को ढोने के लिए साथी नहीं तैयार, ममता बनर्जी बनना चाहती हैं ‘लीडर’; कांग्रेस को दिखाई जा रही उसकी औकात

                                                                  INDIगठबंधन में गहराती दरार 
महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में INDI गठबंधन की करारी हार के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस गठबंधन को संभालने की अपनी पुरानी इच्छा फिर से दोहराई है। उन्होंने कहा कि वह INDI गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। हालाँकि, ममता बनर्जी के बयान का कांग्रेस ने विरोध किया है, जबकि समाजवादी पार्टी और उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना ने इसका समर्थन किया है।

साझे की हांड़ी चौराहे के बीच फूट रही है। सत्ता के गलियारों में यह चर्चा बहुत गर्म है कि गठबंधन में शामिल लगभग सभी पार्टियां राहुल गाँधी को ज्यादा ढोने को तैयार नहीं। "खटाखट" के जुमले से 99 सीट लेकर उछलने वाले राहुल गठबंधन ही नहीं कांग्रेस को भी डुबो रहे हैं। अगर गठबंधन नहीं होता और "खटाखट" जुमला नहीं होता कांग्रेस को 30-35 सीट भी मुश्किल से आती। इस कड़वी सच्चाई राहुल ही नहीं पूरी कांग्रेस को समझना होगा।  उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ ने ऐसे ही नहीं कहा था कि 'जितने जल्दी हो राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाइए', जहाँ राहुल और प्रियंका रैली करते हैं गठबंधन को नुकसान ही हुआ है। राहुल गठबंधन के नेता नहीं। हर पार्टी गठबंधन से दूरी बना रहे हैं। यानि INDI गठबंधन राहुल गाँधी को ढोने के लिए साथी नहीं तैयार। दूसरे, अर्थों में कहा जाए गठबंधन में शामिल हर पार्टी कांग्रेस को उसकी औकात दिखा रही है। कांग्रेस खासकर गाँधी परिवार से अन्य पार्टियों को बहुत नुकसान हो रहा है। कांग्रेस तो डूब ही रही है अपने साथ दूसरी पार्टियों को भी डुबो रही है। 

राहुल के पास अडानी और अम्बानी के अलावा कोई और मुद्दा ही नहीं रहा, गाज़ा नज़र आता है बांग्लादेश में हिन्दुओं की हो रही हत्याओं पर चुप्पी, क्यों? हरियाणा और महाराष्ट्र में 182 मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों के आगे घुटने टेकना पूरे गठबंधन को खा गया। गालियां EVM को क्यों? क्या जनता को कांग्रेस पागल समझती है? 182 जेहादी संगठनों के आगे घुटने टेकने से हिन्दू भी सचेत हो गया और गठबंधन के विरुद्ध चला गया।                   

एक इंटरव्यू में तृणमूल कांग्रेस(TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कहा कि उन्होंने ने ही INDI गठबंधन को बनाया है। ममता बनर्जी ने कहा कि अगर इस गठबंधन का इसका नेतृत्व करने वाले इसे ठीक से नहीं चला सकते तो उन्हें (ममता को) मौका दें। ममता ने कहा कि वह बंगाल से इस गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। बता दें कि गठबंधन का नेतृत्व फिलहाल कांग्रेस कर रही है।

ममता बनर्जी के बयान के बाद विपक्षी गठबंधन में एक फिर से विवाद खड़ा हो गया है। इसके साथ ही ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा फिर से जाहिर हो गई है। ममता बनर्जी के बयान का समर्थन करते हुए शिवसेना (UBT) के संजय राउत ने कहा, “हम भी चाहते हैं कि वे विपक्षी INDIA गठबंधन की प्रमुख भागीदार बनें। चाहे वह ममता बनर्जी हों, अरविंद केजरीवाल हों या शिवसेना, हम सभी एक साथ हैं। हम जल्द ही कोलकाता में ममता बनर्जी से बात करने जाएँगे।”

वहीं, समाजवादी पार्टी के नेता उदयवीर सिंह ने भी ममता बनर्जी के बयान का समर्थन किया। उन्होंने शनिवार (7 दिसंबर 2024) को कहा, “इस बार के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से सपा ने 37 सीटें जीतीं। पश्चिम बंगाल में TMC ने 42 सीटों में से 29 सीटें जीतीं। भाजपा को इन दोनों राज्यों में 35 सीटों का नुकसान हुआ। सभी दल सहमत हों तो सपा ममता बनर्जी का समर्थन करेगी।”

उधर, लेफ्ट ने कांग्रेस पर निशाना साधा। वामपंथी नेता डी राजा ने कहा, “कांग्रेस को आत्मचिंतन करने की जरूरत है। हालात I.N.D.I. ब्लॉक की मीटिंग की माँग करते हैं। कांग्रेस ने हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों में गठबंधन के सहयोगियों को समायोजित नहीं किया। अगर कांग्रेस ने I.N.D.I. ब्लॉक के सहयोगियों की बात सुनी होती तो लोकसभा और हरियाणा-महाराष्ट्र चुनाव नतीजे अलग होते।”

ममता बनर्जी के बयान पर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कहा, “ममता जी बड़ी नेता हैं, लेकिन राहुल गाँधी के अलावा देश में कोई भी I.N.D.I. गठबंधन का नेतृत्व करने की स्थिति में नहीं है।” वहीं, कांग्रेस की सांसद वर्षा गायकवाड़ ने कहा कि ममता बनर्जी को ऐसा लगता होगा, लेकिन कांग्रेस को ऐसा नहीं लगता है। कांग्रेस के लोग अपनी पार्टी के हिसाब से चलते हैं।

उधर, लालू यादव की पार्टी RJD ने I.N.D.I. गठबंधन को ममता बनर्जी द्वारा बनाए जाने को खारिज कर दिया। RJD प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा, “बीजेपी के खिलाफ विपक्षी गठबंधन के असली आर्किटेक्ट लालू प्रसाद यादव हैं। उनकी पहल पर पटना में गठबंधन की पहली बैठक हुई थी। इसमें ममता बनर्जी भी शामिल हुई थीं। सभी अपने-अपने राज्यों में बीजेपी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।”

I.N.D.I. गठबंधन में उठ रहे विरोध के स्वर पर भाजपा ने हमला बोला है। भाजपा ने कहा कि विपक्ष के नेताओं को राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के नेतृत्व पर भरोसा नहीं है। वे अब भी राहुल गाँधी को राजनीति का कच्चा खिलाड़ी समझते हैं। भाजपा ने कहा कि विपक्ष में कई लोग ऐसे हैं, जो राहुल गाँधी को राजनीतिक तौर पर विफल मानते हैं।

भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा, “इंडी एलायंस में खानदान अनेक औऱ ख्वाहिश एक है। हर इंसान की अपनी ख्वाहिश है। वे गठबंधन के ही मुखिय़ा बनना चाहते है, क्योंकि उनको पता है कि सरकार में तो कभी आने वाले है नहीं हैं।” जदयू नेता नीरज कुमार ने कहा कि भ्रष्टाचार की बुनियाद पर जेल से रहकर सरकार चलाने वाले घटक दलों के बीच असहमति है।

INDI गठबंधन में चल रहा एक-दूसरे को निपटाने का खेल : हरियाणा का बदला उत्तर प्रदेश में और उत्तर प्रदेश का बदला महाराष्ट्र में… : जो सीटें माँग रही सपा उन पर MVA ने उतारे उम्मीदवार

                                                         अखिलेश यादव, अबू आजमी 
लोकसभा चुनावों में बने 
INDI गठबंधन को 'घमंडिया गठबंधन', 'परिवार बचाओ ठगबंधन' आदि कई नामों से पुकारने पर जनता भी बीजेपी और सोशल मीडिया पर हंसती थी, लेकिन कल हंसी उड़ाने वाले आज उस बात पर सच होते देख किसी कोने में बैठ आत्मचिंतन करे कि क्यों इस 'घमंडिया गठबंधन', 'परिवार बचाओ ठगबंधन' कहने वालों का मजाक बनाया? लेकिन किसी ने अपने दिमाग पर जरा-सा भी जोर नहीं दिया कि गठबंधन में सारी पारिवारिक पार्टियां है। इन्हे जनता से कहीं अधिक चिंता अपने परिवारों की है। जिस पार्टी में परिवार मुख्य मुद्दा होगा वह पार्टी देशहित नहीं कर सकती। इनका असली मकसद मोदी/बीजेपी को हटाकर खुद राज कर अपने परिवार का लालन-पालन करने का है।      

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, लेकिन महाविकास अघाड़ी (एमवीए) में सीट बंटवारे पर असहमति बढ़ती जा रही है। कांग्रेस की अगुवाई वाले इस गठबंधन में समाजवादी पार्टी (सपा) की माँगों को नजरअंदाज कर उसे ठेंगा दिखाया जा रहा है। सपा ने एमवीए से पाँच सीटों–धुले सिटी, भिवंडी पूर्व, भिवंडी पश्चिम, मालेगांव सेंट्रल और मानखुर्द– की माँग की थी।

हालाँकि, 26 अक्टूबर 2024 को एमवीए के प्रमुख दलों ने इन सीटों पर सपा की जगह अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी, जिससे सपा नेतृत्व में नाराजगी फैल गई है। वैसे, इंडी गठबंधन में अखिलेश यादव को हरियाणा से लेकर मध्य प्रदेश तक कांग्रेस ने ठेंगा ही दिखाया है। ऐसे में अखिलेश यादव ने भी बयान दिया है कि वो कोई राजनीतिक बलिदान नहीं देने वाले। सहमति बनी तो ठीक, वर्ना अपने संगठन वाले इलाकों में सपा अकेले चुनाव लड़ेगी।

सपा की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष अबू आसिम आजमी ने एमवीए को पहले ही अल्टीमेटम दिया था कि अगर उनकी माँग नहीं मानी गई, तो सपा 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। एमवीए के नेताओं से बातचीत के बाद भी जब सीटों पर सहमति नहीं बन पाई, तो आजमी ने अपना गुस्सा जाहिर किया और एमवीए पर “विश्वासघात” का आरोप लगाया। अब सवाल उठता है कि सपा का यह कड़ा रुख गठबंधन को कितना प्रभावित करेगा और क्या इससे महाविकास अघाड़ी के चुनावी समीकरण बिगड़ सकते हैं।

सपा ने एमवीए में अनदेखी के बाद बढ़ाया दबाव

एमवीए में शिवसेना (यूबीटी), कॉन्ग्रेस और एनसीपी (शरद पवार गुट) जैसी तीन बड़ी पार्टियाँ शामिल हैं, जिन्होंने महाराष्ट्र चुनाव के लिए 85-85 सीटों पर लड़ने का निर्णय लिया है, जबकि सहयोगी दलों के लिए 15 सीटें रिजर्व रखी हैं। सपा ने इस आरक्षित कोटे में से अपनी हिस्सेदारी की माँग की, लेकिन इस पर अब तक कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया है। एमवीए के शीर्ष नेताओं के साथ हुई बैठक में भी सपा को कोई आश्वासन नहीं दिया गया, जिसके बाद आजमी ने एमवीए से अलग चुनाव लड़ने का इरादा जाहिर किया।
अबू आजमी ने मीडिया से कहा, “हमने शरद पवार जी से बात की थी और अपनी माँग उनके सामने रखी थी। उन्होंने कहा था कि आज (26 अक्टूबर 2024) इस पर निर्णय लेंगे, लेकिन मुझे आज कोई फोन नहीं आया। एमवीए के सहयोगियों द्वारा हमारे माँग वाली सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा हो गई है। ऐसा लगता है कि एमवीए में शामिल दल सपा को सीटें नहीं देना चाहते।”

अखिलेश यादव बोले- गठबंधन हुआ तो ठीक, वर्ना ‘राजनीति में कोई बलिदान नहीं’

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “महाराष्ट्र में सपा का प्रदेश अध्यक्ष ही निर्णय करेगा – पहले हम गठबंधन में बने रहने की कोशिश करेंगे। लेकिन, अगर महाविकास अघाड़ी हमें गठबंधन में नहीं रखना चाहती, तो हम उन सीटों पर लड़ेंगे, जहाँ हमारा संगठन मजबूत है या हमें वोट मिल सकते हैं। हम उन सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, जिनसे गठबंधन को नुकसान न हो। पर राजनीति में बलिदान की कोई जगह नहीं है।”
यादव के इस बयान से सपा की रणनीति साफ हो गई है। पार्टी पहले एमवीए का हिस्सा बने रहना चाहती है, परंतु सीटों की अनदेखी होने पर अपने दम पर चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है। बता दें कि महाराष्ट्र में 20 नवंबर को वोटिंग होने वाली है, जिसमें अब बहुत कम समय बचा है। अधिकतर दलों ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है।

क्या एमवीए की चुनावी समीकरणों पर असर होगा?

अगर सपा एमवीए से अलग होकर अपने उम्मीदवार उतारती है, तो इससे गठबंधन के वोट बैंक पर असर पड़ सकता है। सपा का प्रभाव खासकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में है, जहाँ उसकी मजबूत पकड़ है। इसके अलावा, सपा का एमवीए से अलग होकर चुनाव लड़ना मुस्लिम वोटों के विभाजन का कारण बन सकता है, जिसका सीधा फायदा महायुति (बीजेपी और सहयोगी दलों) को हो सकता है। इससे महाविकास अघाड़ी के लिए चुनौती बढ़ सकती है, जो पहले से ही महायुति के खिलाफ संघर्ष में है।
एमवीए का नेतृत्व, विशेषकर कांग्रेस, अभी तक सपा की माँगों को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है, जो सपा के लिए निराशाजनक है। वहीं, एमवीए के शीर्ष नेताओं के बीच भी इस मामले को लेकर कोई स्पष्ट स्थिति नहीं बन पाई है। अगर गठबंधन में यह असहमति बढ़ती है, तो एमवीए को इस चुनाव में कई जगहों पर नुकसान झेलना पड़ सकता है। अखिलेश यादव और अबू आजमी का कड़ा रुख और अपने दम पर चुनाव लड़ने की चेतावनी इस बात का संकेत है कि सपा अब इस मुद्दे पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है।

हरियाणा हार से कांग्रेस चौराहे पर, चार महीने में ही खटाई में ‘I.N.D.I. Alliance', 'खटाखट' का फायदा लेकर अखिलेश यादव ने राहुल को दिखाया आइना


चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात या फिर मतलब और निजी स्वार्थ पर टिकी दोस्ती ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहती। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की 'खटाखट' नौटंकी का सबसे ज्यादा फायदा समाजवादी पार्टी को  मिला लेकिन हरियाणा में कांग्रेस को मिली हार ने 
‘I.N.D.I. Alliance' को ही चौराहे पर ला दिया। अगर कांग्रेस ने 'खटाखट' नौटंकी नहीं की होती कांग्रेस को 30 या 32 से ज्यादा सीटें नहीं भले ही कम हो गयी होती। यही वजह है कि आज हर पार्टी अपने आपको कांग्रेस से दूर रखने का प्रयास कर रही है। गठबंधन होने के बावजूद राहुल को अपनी रैलियों में राहुल को दूर रखने की कोशिश है। राजनीतिज्ञों का यह भी कहना कि वायनाड से प्रियंका वाड्रा को ही हराने का कांग्रेस में षड़यंत्र चल रहा है, क्योकि अगर प्रियंका जीतती है तो राहुल का महत्व कम हो जाएगा।  

लोकसभा चुनाव में केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए जो इंडी गठबंधन बनाया गया था, वो चार माह बाद ही दो राज्यों में तो छिन्न-भिन्न होने लगा है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान के उप चुनाव में इंडी गठबंधन के दल अपनी ढपली, अपने राग पर उतर आए हैं। उप चुनाव की सीटों पर एकजुट होकर लड़ने के लिए इंडिया गठबंधन में सहमति नहीं बन पाई है। इसके चलते गठबंधन की कुछ पार्टियों ने तो एक-दूसरे के खिलाफ ही प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतार दिए हैं। इन दोनों राज्यों की 16 विधानसभा सीटों पर अगले माह होने जा रहे उप चुनाव में कांग्रेस को इंडी गठबंधन के प्रत्याशियों से भी कड़ी टक्कर मिलेगी। 

हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की खराब स्थिति के साथ सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने गठबंधन को आंखें दिखा दी हैं। अब उपचुनाव को लेकर उन्होंने बड़ा ऐलान कर दिया है कि उनकी पार्टी अकेले ही सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े करेगी। दूसरी ओर कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ बनाया इंडिया गठबंधन राजस्थान में विधानसभा उपचुनाव में टूट गया है। प्रदेश में 7 सीटों पर हो रहे उपचुनाव में कांग्रेस ने अपने सहयोगी आरएलपी और बीएपी के साथ सीटों का बंटवारा नहीं किया है। बीएपी पहले दो सीटों पर उम्मीदवार उतार कर आमने-सामने की लड़ाई का ऐलान कर दिया है।

उत्तर प्रदेश की सभी 9 सीटों पर समाजवादी पार्टी से प्रत्याशी उतारे
उत्तर प्रदेश की 9 विधानसभा सीटों पर 13 नवंबर को उपचुनाव का मतदान होने वाला है। अखिलेश यादव ने एक बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि सभी 9 सीटों पर गठबंधन के उम्मीदवार सपा के पार्टी सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबी पोस्ट के जरिए अखिलेश यादव ने उपचुनाव को लेकर अपनी तरफ से उम्मीदवारों के खड़े करने को लेकर ऐलान किया। सपा प्रमुख को इस कारण अहम माना जा रहा है क्योंकि सीट शेयरिंग को लेकर कांग्रेस और सपा में लंबे समय से खींचतान देखी जा रही है। इस बीच अखिलेश यादव का ऐलान यूपी की राजनीति इंडिया गठबंधन की टायं-टायं फिस्स हो गई है। यूपी विधानसभा चुनाव 2027 के पहले प्रदेश में हो रहे इस बड़े चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपने-अपने दावे करते दिख रही है। कांग्रेस जहां इंडिया गठबंधन में बराबरी की हिस्सेदारी की मांग और उम्मीद कर रही थी। वहीं, हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की खराब स्थिति के बाद सपा ने गठबंधन में अपनी स्थिति को मजबूत कर दिया।

लोकसभा चुनाव में हार-जीत के प्रतिशत ने बदल दिया माहौल
लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी इंडिया एलायंस के तहत साथ-साथ आए थे। हालांकि, दोनों दलों के बीच इससे ठीक पहले हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान खींचतान चरम पर दिखी थी। ऐसे में लोकसभा चुनाव के दौरान सपा ने 63 और कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा। सपा ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं, कांग्रेस को मात्र 6 सीटों पर जीत मिली। समाजवादी पार्टी की जीत का प्रतिशत लगभग 59 फीसदी रहा। वहीं, कांग्रेस ने दी गई सीटों के 35 फीसदी पर जीत दर्ज करने में सफलता हासिल की। यूपी विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने 5 सीटों की मांग शुरू कर दी थी, लेकिन सपा इस पर तैयार होती नहीं दिखी।

उत्तर प्रदेश में हार के डर से कांग्रेस ने कदम पहले ही पीछे खींचे
यूपी विधानसभा उपचुनाव के साथ महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव भी हो रहे हैं। वहां पर महा विकास अघाड़ी में सीटों के बंटवारे पर आखिरी समय में सहमति बनती दिख रही है। अखिलेश यादव वहां 12 सीटों की डिमांड कर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस ने यूपी में मिल रही सीटों पर अपनी कमजोर स्थिति को देखते हुए कदम पीछे खींचने का निर्णय लिया। सपा पहले से महाराष्ट्र में पांच सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान कर चुकी है। एमवीए के तीनों सहयोगी दलों कांग्रेस, शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट और एनसीपी शरद पवार गुट के बीच 85-85 सीटों पर समझौता हुआ है। ऐसे में सपा के पाले में कितनी सीटें जाएंगी, यह कांग्रेस तय करेगी। राष्ट्रीय स्तर पर सपा से गठबंधन के बावजूद यूपी में कांग्रेस की स्थिति बदतर हो रही है। इसके पीछे यूपी में लोकसभा चुनाव में अपेक्षाकृत कम सीटें, हरियाणा में हार और जम्मू-कश्मीर में कमजोर प्रदर्शन को जिम्मेवार ठहराया जा रहा है।

अखिलेश यादव ने राजनीति की शतरंज की बिसात पर राहुल गांधी को दी मात
दरअसल, अखिलेश यादव ने राजनीति की शतरंज की बिसात पर राहुल गांधी को मात दे दी। सपा ने कांग्रेस के लिए गाजियाबाद सदर और अलीगढ़ की खैर विधानसभा सीट छोड़ी थी। तमाम राजनीतिक रणनीतिकार और कांग्रेस पार्टी भी दोनों को ऐसी सीट मान रही थी, जिसे कांग्रेस के लिए जीतना लगभग नामुमकिन है। भाजपा इन सीटों पर लगातार जीत दर्ज करती रही है। इसलिए कांग्रेस ने इन सीटों से चुनाव लड़ने के लिए हाथ खड़े कर दिए। कांग्रेस ने इस प्रकार की स्थिति को देखते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए। पिछले दिनों खबर आई कि अखिलेश यादव और राहुल गांधी के बीच सीट शेयरिंग को लेकर बातचीत हुई। इसमें कांग्रेस को एक और सीट दिए जाने की भी बात कही गई। लेकिन, दोनों दलों के बीच बात नहीं बनी। इसका असर यूपी चुनाव 2027 में दिखेगा। अगर गठबंधन चलता है तो कांग्रेस उसमें भी आधी सीटों पर दावा कर देगी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उपचुनाव में कांग्रेस का कदम पीछे खींचना अखिलेश यादव के गठबंधन पॉलिटिक्स पर असर डाल सकती है।

अखिलेश का मंत्र- गठबंधन नहीं, उप चुनाव में जीतता है ज्यादा जरूरी
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए साफ किया कि बात सीट की नहीं जीत की है। इसके मायने साफ हैं कि उन्हें भी यकीन है कि कांग्रेस यूपी में उप चुनाव जीत नहीं पाएगी। इस रणनीति के तहत ‘इंडिया गठबंधन’ के सभी 9 सीटों पर समाजवादी पार्टी के चुनाव चिन्ह ‘साइकिल’ के निशान पर चुनाव लड़ेंगे। अखिलेश के बयानों को कांग्रेस अन्य राज्यों में आधार बना सकती है, जहां पर पार्टी का कैडर कुछ खास नहीं है। साथ ही, अखिलेश की चुनौती विधानसभा चुनाव 2027 के दौरान भी बढ़नी तय है। दरअसल, यूपी की 10 सीटों पर उपचुनाव होना है । इसमें मैनपुरी की करहल, कानपुर की सीसामऊ, प्रयागराज की फूलपुर, अंबेडकरनगर की कटेहरी, मिर्जापुर की मझवां, अयोध्या की मिल्कीपुर, गाजियाबाद सदर, अलीगढ़ की खैर, मुजफ्फरनगर की मीरापुर और मुरादाबाद की कुंदरकी सीट शामिल हैं। अयोध्या की मिल्कीपुर सीट को छोड़कर सभी 9 सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं।

उपचुनाव में राजस्थान में इंडिया गठबंधन टूटने से प्रत्याशी आमने-सामने
उत्तर प्रदेश की तरह ही राजस्थान के उपचुनाव में भी इंडिया गठबंधन टूट गया है। लोकसभा चुनाव में साथ रहे कांग्रेस और सहयोगी दलों के उम्मीदवार अब उप चुनाव में आमने-सामने आ गए हैं। कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ बनाया इंडिया गठबंधन राजस्थान में विधानसभा उपचुनाव में टूट गया है। प्रदेश में 7 सीटों पर हो रहे उपचुनाव में कांग्रेस ने अपने सहयोगी आरएलपी और बीएपी के साथ सीटों का बंटवारा नहीं कर पाई। आरएलपी ने कांग्रेस के टिकटों की घोषणा होने के बाद गुरुवार को खींवसर में प्रत्याशी की घोषणा कर दी। सींवसर में अब भाजपा, कांग्रेस और बेनीवाल की पत्नी के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होगा।

कांग्रेस से नाता तोड़ बीएपी ने भी उप चुनाव में दो प्रत्याशी उतारे
उधर, भारतीय आदिवासी पार्टी (बीएपी) पहले दो सीटों पर उम्मीदवार उतार चुकी थी। लोकसभा चुनाव में यह कांग्रेस गठबंधन के साथ थी, लेकिन अब राह बदल ली है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बने इंडिया गठबंधन के तहत कांग्रेस ने नागौर लोकसभा सीट आरएलपी के लिए छोड़ी थी। वहीं, बांसवाड़ा सीट पर बीएपी को समर्थन का ऐलान किया था। इसी तरह बागीदौरा विधानसभा सीट पर बीएपी को समर्थन दिया था। इस उपचुनाव में सीट गठबंधन पर बात नहीं बनी। कांग्रेस ने टिकट वितरण में सांसदों वाली सीट पर उन्हें उम्मीदवार उतारने के लिए अधिकृत किया था। रामगढ़ में दिवंगत विधायक पुत्र को टिकट देना तय था। शेष तीन सीटों सलूंबर, चौरासी और खींवसर पर राज्य के नेताओं को चयन की कमान सौंपी गई थी। खींवसर में प्रदेशाध्यक्ष गोविंद डोटासरा मुख्य भूमिका में रहे। वहीं सलूंबर और चौरासी में नए चेहरों पर दांव खेला गया है।

फ्रांस : वामपंथी गठबंधन सरकार द्वारा 90 प्रतिशत टैक्स लगाने की तैयारी, भारत में यही चाहता था इंडी गठबंधन


फ़्रांस में संसदीय चुनाव हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा सीटें वामपंथी गठबंधन को मिली हैं और अब उनके गठबंधन से ही सरकार बनेगी। लेफ्ट वालों को पता है कि अब सरकार में उनकी भगादारी होनी तय है इसके बाद वामपंथियों ने जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया और जगह-जगह आगजनी और दंगे हुए। इसके बाद उन्होंने अपना एजेंडा लागू करना शुरू कर दिया है। उनकी सबसे पहली योजना है कि 4 लाख यूरो सालाना से ज्यादा कमाने वाले लोगों पर 90 प्रतिशत wealth tax लगाने का प्रस्ताव। यह एक तरह का संपत्ति का फिर से बंटवारा यानी Wealth redistribution ही है जिसमें अमीरों पर मोटा टैक्स लगाकर उस पैसे को अपने वोट बैंक में बांटना है। पिछले दिनों भारत में भी चुनाव से पहले राहुल गांधी और इंडी गठबंधन ने इसी तरह के Wealth Redistrubution की बात कही थी। इंदिरा गांधी की सरकार ने 1973-74 में अमीरों और उद्योगपतियों पर 97.5 प्रतिशत वेल्थ टैक्स थोप दिया था, इससे उद्योग चरमरा गए थे। हाल में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता और राहुल गांधी ने जितनी आबादी उतना हक की बात कही थी। वहीं उनके करीबी सैम पित्रोदा ने विरासत टैक्स लगाने की बात कही थी। कुल मिलाकर जो आज फ्रांस में हो रहा है वही भारत में भी देखने को मिलता अगर इंडी गठबंधन चुनाव जीत जाता। यह सब विदेशी ताकतों के डीप स्टेट के इशारों पर हो रहा है।

फ्रांस में 90 प्रतिशत टैक्स लगाने की तैयारी
फ्रांस वामपंथी पार्टियों द्वारा 4 लाख यूरो सालाना से ज्यादा कमाने वाले लोगों पर 90 प्रतिशत wealth tax लगाने का प्रस्ताव है। यह एक तरह का संपत्ति का फिर से बंटवारा यानी Wealth redistribution ही है जिसमें अमीरों पर मोटा टैक्स लगाकर उस पैसे को अपने वोट बैंक में बांटना है। पिछले दिनों भारत में भी चुनाव से पहले राहुल गांधी और इंडी गठबंधन ने इसी तरह के Wealth Redistrubution की बात कही थी। फ़्रांस में आयकर की दर वर्तमान में 177,106 यूरो से अधिक आय पर 45 प्रतिशत टैक्स का प्रावधान है।

उल्टा पड़ा मैक्रों का दांव 
फ्रांस की संसद का कार्यकाल 2027 में खत्म होना था, लेकिन यूरोपीय संघ में नौ जून को बड़ी हार मिलने के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने समय से पहले संसद भंग कर बड़ा दांव खेला था। उन्होंने कहा था कि एक बार फिर मतदाताओं के बीच जाने से स्थिति ‘स्पष्ट’ होगी। हालांकि, उनका यह दांव लगभग हर पड़ाव पर उल्टा पड़ता दिखा है।

वामपंथी गठबंधन की जीत की जश्न में हुए दंगे
वामपंथी गठबंधन को संसदीय चुनाव में जीत की खबरें आने के बाद पेरिस में जश्न और अशांति दोनों का माहौल रहा। सर्वेक्षणों में कहा जा रहा था कि दक्षिणपंथी पार्टी चुनाव जीतने जा रही है वहीं अचानक वामपंथी गठबंधन के आगे निकलने की खबरों के बाद पूरे फ्रांस में हिंसा भड़क उठी। पेरिस की सड़कों पर उग्र दृश्य देखे गए, जिसमें दंगा नियंत्रण गियर में अधिकारी भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे, जबकि झड़पों के बीच आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया था। प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर मोलोटोव कॉकटेल फेंके और धुएं के बम फोड़ दिए। वीडियो फुटेज में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों को सड़कों पर भागते, आग जलाते और उपद्रव करते हुए देखा गया।

फिलिस्तीन को मान्यता देगा फ्रांस
अभी भले ही फ़्रांस में किसी एक गठबंधन के सरकार बनाने के आसार कम ही हैं। मगर वामपंथी नेता ज्यां ने बड़ा एलान कर दिया है। ज्यां ने कहा कि उनका गठबंधन फिलिस्तीन को मान्यता देने की दिशा में काम करेगा। हाल ही में यूरोप के चार देशों ने फिलिस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी थी। ये चार देश स्पेन, नॉर्वे, आयरलैंड और स्लोवेनिया हैं। ज्यां के सोशल मीडिया हैंडल से लिखा गया है, ”प्रधानमंत्री न्यू पॉपुलर फ्रंट से होगा। हम कई चीज़ों पर फ़ैसला कर सकेंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमें फिलिस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने पर सहमत होना होगा।”

अल्पसंख्यकों को उनका बकाया हक दिलाएंगेः राहुल गांधी
राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के दौरान 6 अप्रैल 2024 को हैदराबाद में कहा कि अगर वह सत्ता में आए, तो उनकी कांग्रेस पार्टी आर्थिक और संस्थागत सर्वेक्षण के साथ-साथ जाति जनगणना भी कराएगी ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि किसके पास क्या है और वह कितना कमाता है। उन्होंने कहा कि इसके बाद, मोदी सरकार द्वारा 22 बड़े व्यवसायियों को दिए गए 16 ट्रिलियन रुपये ($192 बिलियन) के लाभ का एक हिस्सा देश के 90 प्रतिशत लोगों को हस्तांतरित किया जाएगा, जो सामाजिक न्याय प्रदान करने के शुरुआती बिंदु के रूप में होगा। उन्होंने जाति जनगणना को भारतीय समाज में “एक्स-रे” करार दिया था। गांधी ने कहा, “यह मेरे लिए कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, यह मेरे जीवन का मिशन है।” “आप लिख सकते हैं; कोई भी ताकत जाति जनगणना को नहीं रोक सकती।”

जाति जनगणना में क्या मुस्लिमों और ईसाईयों की जातियों का उल्लेख किया जाएगा? जिस पर समस्त हिन्दुओं और हिन्दू संगठनों को सरकार पर दबाव बनाना होगा? 

भारत में कांग्रेस पहले ही 90 प्रतिशत से ज्यादा टैक्स लगा चुकी है अब एक बार फिर कांग्रेस उसी नीति पर चलने की बात कह रही है…

इंदिरा गांधी ने अमीरों पर थोपा था 97.5 प्रतिशत टैक्स
तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस का यह फार्मूला कोई नया नहीं है। इंदिरा गांधी की सरकार ने 1971-72 में 10 लाख से अधिक आय वाले किसी भी व्यक्ति को 85 प्रतिशत टैक्स और 10 प्रतिशत सरचार्ज का भुगतान करना होता था। यानी कुल मिलाकर उन्हें 95 प्रतिशत का भुगतान करना पड़ता था। 1973-74 में इंदिरा सरकार ने अमीरों और उद्योगपतियों के लिए 97.5 प्रतिशत टैक्स स्लैब बनाया था। यही कारण ही भारत में ब्लैक मनी, हवाला, तस्करी और समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हुई थी।

भारत में 1976 में था 66 फीसदी टैक्स
1976 में भारत के वित्त मंत्री चिदंबरम सुब्रमण्यम थे। इस दौरान आयकर 60 फीसदी था और सरचार्ज 10 फीसदी। यानी भारत में कुल आयकर 66 फीसदी था। बेहतर कर अनुपालन के लिए उन्होंने टैक्स में कटौती की थी।

नेहरू ने 1958-59 में लगाया था गिफ्ट टैक्स
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1958-59 का बजट पेश किया था। इस बजट में जवाहरलाल नेहरू ने डायरेक्‍ट टैक्‍स के तहत पहली बार गिफ्ट पर टैक्‍स का प्रावधान पेश किया. इसे ‘गिफ्ट टैक्‍स’ कहा गया। इसमें 10 हजार रुपये से ज्‍यादा की संपत्ति के ट्रांसफर पर गिफ्ट टैक्‍स (Gift Tax) का प्रावधान किया गया।

नेहरू के समय वेल्थ टैक्स से गिफ्ट टैक्स तक
आजादी के बाद जब कांग्रेस की सरकार थी तब 1957 में वित्त मंत्री टी टी कृष्णमचारी ने पहली बार वेल्थ टैक्स और एक्सपेंडिचर टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा। फिर अगले ही साल प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हाथों आया वह बजट, जिसमें पहली बार गिफ्ट टैक्स (Gift Tax) का प्रावधान किया गया। वेल्थ टैक्स के बारे में कृष्णमचारी ने कहा था, ‘इससे आगे चलकर टैक्स चोरी की गुंजाइश घट जाएगी।’ एक्सपेंडिचर टैक्स के बारे में उन्होंने कहा था कि इससे लोगों की अनापशनाप खर्च करने की आदत पर लगाम लगेगी और उनमें बचत की आदत बनेगी।

99सीट आने पर कांग्रेस घमंड में media censorship कर Emergency का माहौल बना रही है ; क्यों अजीत भारती पर FIR दर्ज की? लालच में वोट देने वालों की नाज़िया खान ने लगा दी class; देखिए वीडियो

कहते हैं "भगवान ने गंजे को नाख़ून नहीं दिए, वरना पागलपन में अपना सिर जख्मी कर लेता'', ठीक वही हालत सिर्फ 99 सीट लाने वाली कांग्रेस का सामने आ रहा है। कांग्रेस और गठबंधन की हरकतों से याद आती है 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा देश में आपातकाल लगाकर प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी थी, उसी इंदिरा के कदमों कांग्रेस और इसके समर्थक दलों ने चलना शुरू कर दिया है। ये तो बिल्ली भागों छीका टूट गया कि दुष्प्रचार की मेहरबानी से कांग्रेस की 99 सीटें आ गयीं, अन्यथा 30 भी नहीं आतीं। हाँ, अगर गलती से कांग्रेस और I.N.D.I. गठबंधन सत्ता में आ गया होता, निश्चितरूप से देश में 1975 से 1977 वाला इंदिरा गाँधी युग वापस आ गया होता। अगर चुनाव आयोग गंभीरता से 'वोट के बदले नोट' पर कार्यवाही करे, कांग्रेस और I.N.D.I. गठबंधन द्वारा जीती सीटों पर घोर संकट के घोर काले बादल छा जाएंगे। जिस तरह बैंकों में हर महीने खटाखट 8500 रूपए आने का लालच दिया था, उसी तरह कांग्रेस और I.N.D.I. गठबंधन की सीटें खटाखट औंधे मुंह गिरनी शुरू हो जाएँगी। लालच में आकर वोट देने वाली जनता को अपनी इस खिनौनी हरकत पर शर्म आनी चाहिए, जो सच को जाने बिना वोट दे आते हैं। 

जिस तरह सोशल मीडिया को कुचलने की कोशिश हो रही है, सोशल मीडिया अब कहीं अधिक उग्र हो रहा है। और जिस तरह EVM पर कीजड़ फेंकनी शुरू हो चुकी है, चुनाव आयोग कांग्रेस द्वारा हर महीने 8500 रूपए खटाखट पर जनता द्वारा दर्ज शिकायतों पर fast track court में केस दर्ज करना चाहिए।

      

सोशल मीडिया पर चर्चित पत्रकारों में से एक अजीत भारती के खिलाफ कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में एफआईआर दर्ज हुई है। ये एफआईआर कांग्रेस कर्नाटक के कॉग्रेस कमेटी के लीगल सेल सचिव और सचिव बेके बोपन्ना ने कराई है। बोपन्ना ने दावा किया है कि अजीत भारती ने राहुल गाँधी को लेकर झूठा दावा किया है कि राहुल गाँधी अयोध्या में राम मंदिर की जगह पर बाबरी मस्जिद बनाने की बात कह रहे हैं।

अजीत भारती के खिलाफ बेंगलुरु के हाई ग्राउंड पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज कराई गई है। ये एफआईआर सेक्शन 153ए और आईपीसी की धारा 505(2) के तहत दर्ज कराई गई है। कांग्रेस से जुड़े शांतनु ने कहा कि ऐसे ही एफआईआर तेलंगाना समेत अन्य कई राज्यों में कराए जा रहे हैं।

अजीत भारती के खिलाफ जुबैर ने बनाया माहौल

ध्यान देने वाली बात यह है कि फेक न्यूज फैक्ट्री ऑल्ट न्यूज़ के मोहम्मद जुबैर ने ही सबसे पहले अजीत भारती पर इस वीडियो को लेकर निशाना साधा। जुबैर नैरेटिव सेट करने के लिए क्लिपकटुए की भूमिका में हमेशा रहा है। उसने अजीत भारती के लंबे वीडियो से महज 40 सेकंड का वीडियो काटा और शेयर किया। इसमें जुबैर ने लिखा, “राहुल गाँधी ने अपने किसी भाषण में कब कहा कि राम मंदिर को हटाया जाएगा और वे बाबरी मस्जिद को वापस लाएँगे? वे बार-बार गलत सूचना फैलाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि वे बीजेपी द्वारा संरक्षित हैं और विपक्ष उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगा।”
कांग्रेसऔर इंडी गठबंधन की सरकारें लगातार पत्रकारों को प्रताड़ित करने की कोशिश करती रही हैं। पंजाब से लेकर तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक तक इंडी गठबंधन की सरकारों का यही रवैया है।

अमन चोपड़ा के खिलाफ राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार की कार्रवाई

राजस्थान में कांग्रेस की सरकार के रहते पत्रकारों के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हुए। इसमें से एक मामला अमन चोपड़ा के खिलाफ दर्ज किया गया था। अमन चोपड़ा न्यूज18 इंडिया चैनल में पत्रकार हैं। उनसे ‘देश झुकने नहीं देंगे’ नामक शो प्रसारित करने और बाद में ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट के लिए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

तमिलनाडु में सोशल मीडिया एक्टिविस्ट के खिलाफ क्रैकडाउन

इंडी गठबंधन में कॉन्ग्रेस के बाद सबसे अहम पार्टी डीएमके द्वारा शाषित तमिलनाडु में पत्रकारों और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट के खिलाफ लगातार कार्रवाई होती रही है। बिहार के यूट्यूबर मनीष कश्यप का मामला काफी चर्चित रहा था। उनके खिलाफ एनएसए जैसे मामले में भी केस दर्द किया गया था। कई महीनों तक मनीष कश्यप को जेल में रहना पड़ा था। बाद में उन्हें कोर्ट ने सभी मामलों में बरी कर दिया था।

तमिलनाडु में यूट्यूबर पर ढाया गया जुल्म

तमिलनाडु के कोयम्बटूर स्थित जेल में YouTuber सुवुक्कु शंकर की पिटाई का मामला सामने आया था। उन्हें शनिवार (4 मई, 2024) को साइबर अपराध के मामले में तमिलनाडु पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उनके वकील गोपालकृष्ण ने बताया कि उनके मुवक्किल को कोयम्बटूर सेन्ट्रल जेल के कर्मचारियों ने पीटा। बताया जा रहा है कि न्यायिक हिरासत में जेल भेजे जाने के बाद उनके दाएँ हाथ में फ्रैक्चर हुआ और उनके लिए सही इलाज तक की व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई गई। उन्हें थेनि से गिरफ्तार किया गया था और महिला कॉन्स्टेबलों पर आपत्तिजनक टिप्पणी का मामला दर्ज किया गया था।

रेड पिक्स यूट्यूब के संपादक फेलिक्स गेराल्ड की दिल्ली से गिरफ्तारी

रेड पिक्स यूट्यूब के संपादक फेलिक्स गेराल्ड को नई दिल्ली में तमिलनाडु पुलिस ने गिरफ्तार किया था। इसके बाद नाम तमिलर काची (NTK) प्रमुख सीमन ने 11 मई 2024 को पूछा कि क्या तमिलनाडु अभी भी एक लोकतांत्रिक राज्य है या यह फासीवादी राज्य बन गया है। सीमन ने कहा कि गेराल्ड के खिलाफ मामला और ‘सवुक्कू’ शंकर पर थोपे गए झूठे मामले तुरंत वापस लिए जाने चाहिए। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के नेतृत्व वाली DMK सरकार पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा, “जिस कार्यक्रम में शंकर ने आपत्तिजनक बयान दिए, उस कार्यक्रम के एंकर (फेलिक्स गेराल्ड) को गिरफ्तार करना कानून के खिलाफ है। गेस्ट द्वारा की गई टिप्पणी के लिए एंकर को गिरफ्तार करना अस्वीकार्य है। यह मीडिया की बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ख़त्म करने जैसा है।” उन्हीं के शो में थुवक्कू ने तमिलनाडु सरकार को घेरा था, जिसके बाद दोनों को गिरफ्तार किया गया था।

तजिंदर बग्गा को दिल्ली से गिरफ्तार करके ले गई थी पंजाब पुलिस

 बीजेपी नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा के खिलाफ पंजाब पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी। पंजाब पुलिस ने उन्हें पकड़ने के लिए दिल्ली में छापेमारी भी की थी। पंजाब पुलिस ने बग्गा के खिलाफ 2 बार कार्रवाई की। साल 2022 और 2023 में पंजाब पुलिस ने बग्गा को पकड़ने की कोशिश की और एक मामले में उन्हें दिल्ली से गिरफ्तार करके पंजाब ले गई थी।

दिल्ली : कांग्रेस के बाद मुस्लिम महिलाओं ने AAP के संजय सिंह और राघव चड्ढा की कार को घेरा, कहा – जो वादा किया था वो पैसे दो

           संजय सिंह और राघव चड्ढा की कार घेर कर मुस्लिम महिलाओं ने माँगे पैसे (फोटो साभार: रिपब्लिक भारत)
लोकसभा चुनाव आ गए, कल(जून 9) नरेंद्र मोदी लगातार  तीसरी बार 
प्रधानमंत्री की शपथ लेने पर लालची मतदाताओं को छाती पीटनी के लिए विवश कर दिया है। इन लालचियों ने साबित कर दिया है कि इन्हें किसी विकास और सुविधा से मतलब नहीं, इनके आगे पैसा फेंकों कुछ भी करवा लो। ब्रिटिशर्स और गाज़ी(मुग़ल) अपने साथ कोई लम्बी चौड़ी फौज लेकर नहीं आये थे, उनको मालूम था कि भारत जयचन्द और मीर ज़ाफ़र जैसे लालची मौजूद है। जयचन्द और मीर ज़ाफ़र के वंशज आज भी जीवित है, जो इस चुनाव में सामने आ गया है। भारत विरोधी विदेशी ताकतें पागल नहीं थीं, जो मोदी को सत्ता से हटाने अरबों रूपए जयचन्द और मीर ज़ाफ़र के वारिसों पर खर्च कर रहे थे। 

चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाले I.N.D.I. गठबंधन ने बड़े-बड़े वादे किए थे और लालच दिया था, जो अब उसकी ही गले की फाँस बन रहे हैं। मुस्लिम महिलाओं ने विपक्षी दलों के इन नेताओं से रुपयों की माँग करते हुए अब हंगामा शुरू कर दिया है। अब AAP (आम आदमी पार्टी) के राज्यसभा सांसदों संजय सिंह और राघव चड्ढा के कार को घेर कर महिलाओं ने पैसों की माँग की है। विपक्षी दलों ने मुस्लिमों से ‘खटाखट पैसे भेजने’ का वादा किया था।

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में संजय सिंह और राघव चड्ढा से महिलाओं ने चुनावी वादे के एक-एक लाख रुपए माँगे। इन महिलाओं का कहना था कि उन्हें जो खटाखट-खटाखट पैसे दिए जाने के वादे किए गए थे, अब वो पैसे कहाँ हैं? बता दें कि इस चुनाव में विपक्षी दलों ने जम कर मुफ्त रेवड़ियाँ बाँटने का लालच देने की योजना पर काम किया। कांग्रेस अपने ही घोषणा-पत्र और आम लोगों में बाँटे गए गारंटी कार्ड में फँस गई हैं। कांग्रेस दफ्तरों पर भी महिलाएँ पहुँच रही है।

असल में कांग्रेस ने इन महिलाओं से वादा किया था कि 5 जून, 2024 से ही महिलाओं के खाते में पैसे पहुँचने शुरू हो जाएँगे। संजय सिंह और राघव चड्ढा को घेर कर ये महिलाएँ कह रही थीं आप हमसे दुआ लेकर ही जाना। हालाँकि, इस दौरान दोनों ही AAP नेता इन महिलाओं से बच कर निकलते हुए नज़र आए। कांग्रेस ने इन महिलाओं को हर साल एक लाख रुपए देने का वादा किया था। बेरोजगार युवाओं को भी नियमित वेतन देने का वादा किया गया था।

अवलोकन करें:-

उत्तर प्रदेश : राहुल और अखिलेश ने 1लाख रूपए का लॉलीपॉप दे मुसलमानों को किया ब्लैकमेल ; लिख दी अपने

इससे पहले उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित कांग्रेस मुख्यालय के बाहर मुस्लिम महिलाओं की लंबी कतार लग गई थी। ये सभी 1 लाख रुपए की माँग कर रही थीं, साथ ही कह रही थीं कि उन्हें वित्तीय लाभ दिया जाए। मुस्लिम महिलाएँ अपना-अपना पहचान-पत्र समेत अन्य दस्तावेज लेकर कांग्रेस के दफ्तर पहुँची थीं। इन महिलाओं ने अपने हाथों में कांग्रेस का ‘गारंटी कार्ड’ भी थाम रखा था, जिसमें एक लाख रुपए के वेतन के अलावा हर शिक्षित युवा को पक्की नौकरी देने का वादा किया गया है। ‘इस गारंटी कार्ड’ में कर्जमाफी का भी वादा है। मुस्लिम महिलाओं ने इन कार्ड्स को भर भी रखा था।

सिर पर कफन बांधकर आना… महाभारत होगी: नतीजों से पहले इंडी गठबंधन के नेताओं ने कार्यकर्ताओं को भड़काया, कर रहे भीड़ इकट्ठा

                                            अखिलेश यादव, राहुल गाँधी और पप्पू यादव
कल तक EVM के विरुद्ध लामबंद हो रहा विपक्ष 11 बजे तक के रुझानों को देखते हुए शायद EVM को दोष देने की बजाए आत्ममंथन करेंगे। 
 

लोकसभा चुनाव के नतीजे साफ होने से पहले विपक्षियों ने अपने कार्यकर्ताओं को भड़काना शुरू कर दिया है। मतगणना वाले दिन से पहले मद्देनजर विरोधी दलों के नेताओं के अलग-अलग बयान सामने आए हैं जिसमें उकसाने का काम हो रहा है। किसी ने कार्यकर्ताओं से मतगणना वाले दिन सिर पर कफन बाँध कर आने को कहा है तो कोई बड़ी तादाद पर लोगों को मतगणना सेंटर के बाहर खड़े होने को बोल रहा है।

ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमेटी ने मतगणना से एक दिन पहले प्रेस रिलीज जारी करके अपने कार्यकर्ताओं से गिनती वाले दिन सतर्क रहने को कहा। उन्होंने कहा है कि कार्यकर्ता घर में बैठकर न्यूज चैनलों पर रिजल्ट न देखें बल्कि कॉन्ग्रेस के सभी कार्यकर्ता जिला कॉन्ग्रेस के दफ्तों और राज्यों में सुबह से पहुँचे। वहाँ देखते रहें कि अगर कुछ गड़बड़ हो तो रिकॉर्ड करके उसे तुरंत पार्टी द्वारा जारी नंबर पर भेजें। इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओ को ये आइडिया भी दिया कि गड़बड़ी होगी तो उन्हें उसे रोकना होगा।


मतगणना सेंटर के बाहर कार्यकर्ताओं की भीड़ खड़ी करके कॉन्ग्रेस कैसे हालात बदलना चाहते हैं ये समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। कॉन्ग्रेस के साथ इंडी गठबंधन का हिस्सा सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भी अपने भाषण में कार्यकर्ताओं को भड़काने का काम किया।

अखिलेश यादव का एक बयान वायरल हो रहा है जिसमें वह कहते सुनाई पड़ते हैं- जनता इस बार गाँधीजी को याद करते हुए करो या मरो की तरह आंदोलित हो गई है और अपने और अपने देश को बचाने के लिए नया स्वतंत्रता आंदोलन लड़ने को तैयार बैठी हुई है। जनता स्वतंत्रता सेनानियों की तरह तैयार है क्योंकि भाजपा काल में उनका जीवन तो वैसे ही दूभर हो गया है। देश का युवा फिर से सिर पर कफन बाँधकर कह रहा है- “मेरा रंग दे बसंती चोला।”

इसी प्रकार से बिहार के पूर्णिया से चुनावी मैदान में खड़े पप्पू यादव ने अपने समर्थकों से कहा- “मतगणना के लिए पूरी तैयारी से आना, कफन बाँध कर आना, मरने के लिए आना… कल पूर्णिया सीट पर लोकतंत्र की हत्‍या हुई तो महाभारत का संग्राम होगा। पूर्णिया के जिलाधिकारी और एसपी मतगणना प्रक्रिया को पूरी पारदर्शिता के साथ करें, हम उन्हें पूरा सहयोग करेंगे, लेकिन लोकतंत्र को बचाने के लिए हमारा एक-एक कार्यकर्ता कफन बाँधकर तैयार है।”

उल्लेखनीय है कि मतगणना से पहले जिस तरह से इंडी गठबंधन के नेता इस तरह के बयान देते दिखे उससे साफ पता चलता है कि वो अपने कार्यकर्ताओं को एक तरह से उकसा रहे हैं कि अगर नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए तो वो हिंसा करें और हिंसा में जो भी अंजाम हो वो इसके लिए तैयार रहें। हम सब जानते हैं कि भीड़ को इकट्ठा करके उनसे हल्ला करवाने के कितने गंभीर परिणाम हो सकते हैं मगर कॉन्ग्रेस ऐसा कर रही है। उसने टीवी पर नतीजे देखने से अपने कार्यकर्ताओं को मना कर दिया है और मतगणना सेंटर पर बुलाया है ताकि कोई उपद्रव हो या कोई गुस्सा जाहिर करे तो सेंटर के बाहर सबके आगे करे। वे ये नहीं सोच रहे कि कार्यकर्ता हिंसक होने से गणना की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। वहीं पप्पू यादव ने खुलेआम महाभारत की बात कही है। अखिलेश ने देश के युवाओं को इस चुनाव में सिर पर कफन बाँधकर बलिदान होने के लिए कह दिया है।

संभव है इन सब नेताओं के बयानों पर चुनाव आयोग बाद में संज्ञान भी ले, लेकिन उससे पहले जो ये लोग करने की सोचे बैठे हैं वो किस तरह से लोकतंत्र को बचाने की दिशा में है ये विचार करने का विषय है। हमने बंगाल में कार्यकर्ताओं को भड़काने के नतीजे देखे हैं कि वहाँ कितने बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। अब भी उस हिंसा का असर लोगों में देखने को मिलता है।

विपक्ष से नहीं पच रहे Exit Poll के आँकड़े, बोले- इंडी गठबंधन जीतेगी 300+ सीट

वर्षो से एक चलन रहा है कि लोक सभा चुनाव संपन्न होने के बाद Exit Poll आने शुरू हो जाते हैं। बरहाल, इन Exit Poll में तीसरी बार नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से मोदी विरोधियों में इतनी बेचैनी हो गयी कि आम आदमी पार्टी के सोमनाथ भारती ने तो मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो 'मै सिर मुंडवा लूंगा' बात बोलने पर केंद्रीय मंत्री बाल्यान ने जवाब में कहा दिया कि बता दें कब करवाना है 'मै नाइ भेज दूंगा'।

साल 2024 लोकसभा चुनावों का मतदान खत्म होने के बाद एक्जिट पोल जारी हो गए हैं। लगभग सभी Exit Poll में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत से सरकार बनती दिख रही है। Exit Poll के बाद जहाँ NDA गठबंधन के सभी घटक दलों और उनके समर्थकों में ख़ुशी की लहर है तो वहीं विपक्ष के तमाम नेता इसे पचा नहीं पा रहे हैं। इंडी गठबंधन के तमाम नेताओं के बयान भी सामने आने लगे हैं जिसमें उन्होंने एक्जिट पोल को सिरे से नकार दिया है।

कॉन्ग्रेस नेत्री और प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इसे जनता नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी का एक्जिट पोल करार दे डाला है। उन्होंने कहा कि इंडी गठबंधन ने इस बार वैज्ञानिक विधि से अनुमान लगाया है। उन्होंने दावा किया है कि INDI गठबंधन इस बार कम से कम 295 लोकसभा सीटें जीतने जा रहा है। आज जारी हुए एक्जिट पोल को सुप्रिया ने टीवी पर बज रहा झुनझुना बताया है।

पंजाब के कॉन्ग्रेस नेता और गुरुदासपुर से लोकसभा प्रत्याशी सुखजिंदर सिंह रंधवा ने भी इंडी गठबंधन के ही जीतने का दावा किया है। उन्होंने कहा, “एग्जिट पोल कुछ भी हों लेकिन सरकार इंडी गठबंधन की ही बनेगी।”

महाराष्ट्र से कॉन्ग्रेस नेता नाना पटोले का दावा है कि इस बार के चुनावों में इंडी गठबंधन 300 से अधिक सीटें जीतेगा। उन्होंने कहा कि चुनाव भाजपा और जनता के बीच में था। नाना पटोले ने 4 जून को हर हाल में इंडी गठबंधन की जीत का भरोसा जताया है।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एग्जिट पोल के आंकड़ों से इत्तेफाक नहीं रखते। उन्होंने दावा किया कि भाजपा से जनता मुँह मोड़ चुकी है और आने वाले 4 जून को इंडी गठबंधन ही सरकार बनाएगा। NDA को अखिलेश यादव अधिकतम 140 सीटों पर सिमटता हुआ बता रहे हैं। अखिलेश यादव ने एग्जिट पोल जारी करने वाली मीडिया पर ही आरोप जड़ दिया और कहा कि ये सब अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है।

1 जून को तमाम मीडिया व सर्वे संस्थानों ने अपने-अपने एक्जिट पोल जारी कर दिए हैं। लगभग सभी संस्थानों के पोल के अनुसार भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ लगातार तीसरी बार सत्ता में आ रही है। अधिकतर अनुमानों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 350 से अधिक सीटें मिलती दिख रहीं हैं। इंडी गठबंधन को इन सभी आंकड़ों में 150 सीटों के आसपास सिमटता दिखाया गया है।


Exit Polls : 2024 में NDA की ही बनेगी सरकार, टूटेगा 2019 का रिकॉर्ड भी ; मोदी PM बने तो सिर मुंडवा लूंगा: सोमनाथ भारती, आप नेता

लोकसभा चुनाव 2024 के सातवें चरण के मतदान के साथ 1 जून को सम्पन्न होने के बाद अब मीडिया संस्थानों ने एक्जिट पोल देना शुरू कर दिया है। ज्यादातर एग्जिट पोल्स में एक बार फिर भाजपा के नेतृत्व में की सरकार बनती नजर आ रही है। वहीं पूरा विपक्ष इकट्ठा होने के बाद भी हारता दिख रहा है। 

केजरीवाल पार्टी ने नेता जबरदस्त घोषणा की है कि "अगर मोदी तीसरी बार PM बने तो सिर मुंडवा लूंगा", जबकि Exit Polls नरेंद्र मोदी को ही PM बनने के स्पष्ट संकेत दे रहे हैं।    

अलग-अलग एग्जिट पोल्स के अनुमान अलग हैं लेकिन सबमें कॉमन बात एनडीए की जीत है। जैसे-

इंडिया न्यूज के डी डायनामिक्स में एनडीए को 371 सीटें मिलती दिखाई गई हैं, INDI ब्लॉक को 125 और अन्य को 47।

इसी तरह जन की बात के एग्जिट पोल ने एनडीए को 362-392 सीटें मिलती हुई दिखाई हैं, INDI ब्लॉक को 141-161 सीट मिली है और अन्य को 10-20।

रिपब्लिक भारत के मैटरिज ने एनडीए को 353-368, INDI ब्लॉक के 118-133 और अन्य को 43-48।

रिपब्लिक टीवी-पी के MARQ ने एनडीए को 359 सीट दी है, INDI गठबंध को 154 और अन्य को 30।

एग्जिट पोल मतदान केंद्रों से बाहर निकलने के तुरंत बाद मतदाताओं के सर्वेक्षण पर आधारित होता है। आमतौर पर, समाचार पत्रों और TV चैनलों के लिए काम करने वाली निजी सर्वेक्षण फर्म या संस्थाएँ मतदाताओं से पूछती हैं कि उन्होंने वास्तव में किसे वोट दिया और यह मानते हुए कि उन्हें सही उत्तर मिले हैं, वे परिणाम के रुझान की भविष्यवाणी करते हैं।

एग्जिट पोल पर आधारित चुनावी भविष्यवाणियों ने पिछले एक दशक में टेलीविजन की पहुँच को भारत में डिजिटल समाचार पोर्टलों के बढ़ने के साथ काफी बढ़ा दिया है। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ऐसे एग्जिट पोल अक्सर फेल होते हैं, जिसकी बड़ी वजह है सैंपल साइज का छोटा होना और दूसरा जिनसे पूछा गया – उन्होंने कितना सही जवाब दिया।

पिछले साल एग्जिट पोलों में भाजपा के नेतृत्व में जीत दिखाई गई थी। उस समय भाजपा ने अकेले 300 का आँकड़ा पार करते हुए 303 सीटें पर कब्जा कर लिया था जबकि एनडीए की सीटें 352 थी। वहीं कॉन्ग्रेस के कुल 52 सीट मिली थी।