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महिला विरोधी राहुल गांधी : मुस्लिम महिलाओं से गद्दारी, अनदेखी से फूटा गुस्सा! पूछा- हमारे हकों की बात कब करेंगे?

जो राहुल गाँधी 'मनुस्मृति' को लेकर मुस्लिम वोटबैंक को रिझाने हिन्दू महिलाओं को भड़काने का काम कर रहे थे, लेकिन वही दांव राहुल गाँधी पर उल्टा पड़ गया है। आज मुस्लिम महिलाएं उसी राहुल गाँधी से पूछ रही है कि हमारे हक़ की बात कब करोगे? जबकि हिन्दुओं से कहीं अधिक दिक्कतें मुस्लिम महिलाओं की हैं जिन्हें आज तक कांग्रेस ने नज़रअंदाज़ किया है।

     

पुणे में आयोजित ‘छात्राओं की गूंज’ कार्यक्रम में राहुल गांधी द्वारा मनुस्मृति और महिला अधिकारों पर दिए गए बयान को लेकर राजनीतिक विवाद छिड़ गया है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक राहुल गांधी के ‘झूठ की गूंंज’ सुनाई दे रही है। एक तरफ राहुल गांधी ने अपने संबोधन में हिन्दू महिलाओं को गलत तरीके से पेश किया, जिससे नाराज होकर सामाजिक संगठनों ने उन पर तीखे आरोप लगाए हैं, वहीं राहुल गांधी ने स्कूलों में हिजाब (स्कार्फ) पहनने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर चुप्पी साध रखी है। इससे नाराज मुस्लिम महिलाओं ने राहुल गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अपनी अनदेखी की वजह से उनका गुस्सा फूट पड़ा है। अब वो सड़क पर आकर राहुल गांधी के खिलाफ नारेबाजी कर रही हैं और सवाल कर रही हैं कि हमारे हकों की बात कब करोंगे?

 

मुस्लिम महिलाओं को लेकर राहुल गांधी का दोगलापन
दिल्ली की सड़क पर बैठकर नारेबाजी कर रहीं ये मुस्लिम महिलाएं राहुल गांधी के दोहरे चरित्र की पोल खोल रही हैं। वो दुनिया को बता रही हैं कि राहुल गांधी महिलाओं को वोट बैंक के नजरिए से देखते हैं और उनके हकों को लेकर दोहरे मापदंड अपनाते हैं। दरअसल, राहुल गांधी ने पुणे में आयोजित ‘छात्राओं की गूंज’ कार्यक्रम में आरोप लगाया था कि मनुस्मृति जैसे महान ग्रंथ से भारत में महिलाओं को दबाने का माइंडसेट आता है। उन्होंने हिन्दू महिलाओं से पितृसत्तात्मक सोच को खत्म करने (“Smash the Patriarchy”) और अपनी स्वतंत्रता व अधिकारों के लिए खुलकर आवाज उठाने का आह्वान किया। राहुल गांधी ने कहा, “माइंडसेट क्या है, लड़की की एक जगह है, वो पिजड़े में बंद होनी चाहिए। उसका कंट्रोल रहना चाहिए। उसको काम नहीं करना चाहिए। ऐसा हिन्दुस्तान हम नहीं चाहते हैं। हम न्याय चाहते हैं। सबकी रिस्पेक्ट होनी चाहिए। लड़कों की होनी चाहिए, लड़कियों की भी होनी चाहिए। ये जो आपके दिल में डर है। इसको जल्दी से जल्दी मिटाना देना चाहिए। हमेशा के लिए।”

राहुल गांधी के दोगलापन के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं की गूंज
राहुल गांधी के इस बयान के बाद मुस्लिम महिलाएं भी अब जाग उठी हैं। उनकी गूंज अब दिल्ली में कांग्रेस कार्यालय के बाहर सुनाई दे रही है। कुछ मुस्लिम महिलाओं ने राहुल गांधी के खिलाफ प्रदर्शन किया। उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ नारेबाजी करते हुए आरोप लगाया कि वे महिला अधिकारों की बात तो करते हैं, लेकिन जब धरातल पर कुछ करने या महिला आरक्षण का समर्थन करने की बात आती है, तो उनके कदम पीछे हट जाते हैं। प्रदर्शनकारी मुस्लिम महिलाओं ने नारेबाजी कर बता दिया कि वो अब आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार है। उनके साथ सदियों से हो रहे भेदभाव पर राहुल गांधी का दोहरा चरित्र दिखाई दे रहा है।

राहुल गांधी हम लोगों के बराबर सम्मान की बात करें- मुस्लिम महिला
राहुल गांधी केवल हिंदू महिलाओं की बात करते हैं, लेकिन मुस्लिम महिलाओं से जुड़े वास्तविक और गंभीर मुद्दों जैसे हलाला, तीन तलाक, हिजाब की अनिवार्यता और पर्सनल लॉ पर चुप्पी साध लेते हैं। एक मुस्लिम महिला ने कहा, “कांग्रेस मुख्यालय के सामने प्रदर्शन करने का एक ही मकसद है कि हम चाहते हैं कि राहुल गांधी हम लोगों के सम्मान की बात करें। उनसे पूछे कि कर्नाटक में आपकी सरकार है, लेकिन एक भी महिला मंत्री नहीं है। आप लेकर चलते हैं कि मैं सबके साथ हूं। हम लोग मुस्लिम समाज की महिलाएं हैं, देश से अलग नहीं है। हम भी देश में ही रहते हैं। हिन्दुस्तान हमारा भी है। सबका हिन्दुस्तान है। हम कहना चाहते हैं कि तीन तलाक का गलत मकसद नहीं लें। जब से तीन तलाक का कानून आया है, हम लोग मजबूत महसूस कर रहे हैं।”

एक बार मुस्लिम महिलाओं का दर्द सुनो राहुल गांधी- मुस्लिम महिला
अब मुस्लिम महिलाएं राहुल गांधी से 70 सालों का हिसाब मांग रही हैं। एक मुस्लिम महिला ने सवाल किया, “70 साल से महिलओं को आपने पूछा नहीं, 70 सालों से आपने क्या किया ? जब तीन तलाक देकर मुस्लिम महिलाओं को यू छोड़ दिया जाता था, तब राहुल गांधी कहां थे? आज हमें आरक्षण की बात चल रही हैं तो मुद्दा उठा रहे हों। आप कपड़ों की बात करते हों, मुस्लिम महिलाओं के बारे में सोचो। राजनीति में उनकी भागीदारी बढ़ेगी 33 प्रतिशत में…उसमें क्यों नहीं बोल रहे हैं। कर्नाटक में कोई मंत्री क्यों नहीं है ? क्यों नहीं इसके बारे में बात कर रहे हों? आप बात करते हो कपड़े की, आप बात करते हो आरक्षण की, क्यों बात करते हो भाई, आप हमारी भी बात करके देखो। एक बार हम महिलाओं का दर्द सुनो। हमारे अंदर है क्या है,नहीं है?”

राहुल के पास कांग्रेस मुख्यालय पहुंची महिलाओं से मिलने का वक्त नहीं
कांग्रेस मुख्यालय के बार राहुल गांधी ‘हाय-हाय’, ‘मुर्दाबाद- मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहीं ये महिलाएं कह रही हैं कि महिलाओं के हक की बात कीजिए। महिलाओं की हुंकार ये बता रही हैं कि अब उनके सब्र का बांध टूट चुका है। वो चाहती है कि राहुल गांधी मुस्लिम तुष्टीकरण छोड़कर उनके हक की बात करें। मुस्लिम समाज में उनके साथ हो रहे भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाएं। लेकिन राहुल गांधी मुस्लिम वोट बैंक की वजह से आंखों पर पर्दा डाले हुए हैं। उन्हें मुस्लिम महिलाओं की दर्द भरी आवाज सुनाई नहीं दे रही है। शहर दर शहर घूम कर राहुल गांधी छात्रों की आवाज सुन रहे हैं, लेकिन उनके पास इन महिलाओं की बात सुनने का वक्त नहीं है। यहां तक कि कांग्रेस मुख्यालय के सामने पहुंची महिलाओं से मिलने का वक्त नहीं है।

मोदी जी ने जितना हमें समर्थन दिया, उतना किसी ने नहीं दिया- मुस्लिम महिला
मुस्लिम महिलाओं में 70 साल से दबा हुआ आक्रोश ज्वालामुखी बनकर फूट रहा है। मोदी सरकार में तीन तलाक के डर से मिली मुक्ति ने उन्हें अपनी आवाज उठाने की हिम्मत दी है। मोदी सरकार के महिला सशक्तीकरण को लेकर किए जा रहे प्रयासों का परिणाम है कि आज मुस्लिम महिलाएं खुलकर अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं। मुस्लिम महिलाएं राहुल गांधी से सवाल कर रही हैं कि मुस्लिम समाज की पितृसत्तात्मक प्रथाओं पर चुप्पी क्यों? कांग्रेस ने तीन तलाक कानून का विरोध क्यों किया था, जबकि आज इसके कारण मुस्लिम महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस कर रही हैं? प्रदर्शन में आई महिलाओं ने बताया कि मोदी जी ने जितना हम लोगों को समर्थन दिया, उतना किसी ने नहीं दिया। हर लड़कियों को, हर औरतों को, उन्होंने बहुत ऊंचा मुकाम दिया है। हम जानना चाहते हैं कि राहुल गांधी ने क्या किया ? वहीं मोदी जी चाहते हैं कि सभी लड़कियों और औरतों को अच्छा मिले। वो आगे बढ़े। राहुल गांधी से नाराजगी है कि उन्होंने कुछ भी नहीं किया। उनकी सरकार ने कुछ भी नहीं किया।

”होते रहना चाहिए महिलाओं का खतना’’
10 जुलाई, 2018 को कांग्रेस नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में खतना के पक्ष में दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि ‘खतना’ शरिया का हिस्सा है, और इसे रोका जाना मजहब में दखल होगा। दरअसल कांग्रेस इसे धर्म से जोड़कर चंद वोटों के लिए करोड़ों महिलाओं के आत्मसम्मान से खिलवाड़ कर रही है। यह केवल विडंबना नहीं है कि सिंघवी ने इस बर्बर कुप्रथा का बचाव किया। बल्कि कांग्रेस ने फिर साबित किया कि वह मुसलमानों का वोट पाने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकती है। उसे इस बात की कतई चिंता नहीं कि मुस्लिम महिलाएं किस दंश से गुजरती हैं। हालांकि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में साफ कर दिया कि ‘खतना’ प्रथा पर बैन लगाने वाली याचिका का वह समर्थन करती है।

आजादी के बाद पिछले 80 सालों में कांग्रेस ने मुस्लिम वोट बैंक के लिए कब कब मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से समझौता किया

हिजाब पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर राहुल गांधी की चुप्पी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूलों में यूनिफॉर्म के साथ हिजाब (स्कार्फ) पहनने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक हिस्सा नहीं है और शिक्षण संस्थानों में अनुशासन व समानता के लिए ड्रेस कोड सर्वोपरि है। यह निर्णय 21 अगस्त 2026 को जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई ठोस सबूत या सामग्री पेश नहीं कर पाई जिससे यह साबित हो सके कि सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लामिक आस्था की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में महिलाओं की आजादी और रक्षाबंधन वाले विज्ञापन में अभिनेत्री कृति सेनन के कपड़े का समर्थन करने वाले राहुल गांधी इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर मौन है। हाई कोर्ट के फैसले का समर्थन नहीं करना बताता है कि राहुल गांधी मुस्लिम महिलाओं को पिजड़े में बंद देखना चाहते हैं। 

पवन खेड़ा- हिजाब पर मुस्लिम विद्वान करेंगे फैसला
कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने मंगलवार को कहा कि हर महिला अपनी पसंद के कपड़े पहनने के लिए स्वतंत्र है और उसे हिजाब, घूंघट या कोई अन्य परिधान चुनने का पूरा अधिकार है।खेड़ा ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि सामाजिक-राजनीतिक दृष्टिकोण से कांग्रेस महिलाओं के निर्णय लेने के अधिकार के लिए मजबूती से खड़ी है। उन्होंने कहा, ”हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है या नहीं, यह धार्मिक विद्वानों को तय करना है।” खेड़ा ने कहा कि हर महिला को, चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग या धर्म से हो, अपनी पसंद के अनुसार पहनावा चुनने का अधिकार है।

बहुविवाह और निकाह हलाला पर प्रतिबंध लगाने वाले UCC का विरोध
कांग्रेस मुस्लिम महिलाओं को परंपरागत कुरीतियों से मुक्ति दिलाने के प्रयासों का विरोध करती रही है। बहुविवाह और निकाह हलाला जैसी प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाने वाले कानूनों और समान नागरिक संहिता (UCC) का विरोध किया है। कांग्रेस ने हाल ही में राज्यों (जैसे मध्य प्रदेश) में लाए गए समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयकों का पाश कराने में अड़ंगा लगाया, जिसमें बहुविवाह और निकाह हलाला पर रोक का प्रावधान है। पार्टी ने इसे राजनीतिक एजेंडा करार दिया। जब बिल पेश किया जा रहा था तब कांग्रेस ने इसे लेकर तीखा विरोध दर्ज कराया। विधेयक का विरोध करने के लिए भोपाल मध्य से कांग्रेस विधायक आतिफ अकील सदन में काले कपड़े पहनकर पहुंचे थे। आलोचकों और राजनीतिक विरोधियों का आरोप है कि कांग्रेस तुष्टिकरण की राजनीति के तहत महिला अधिकारों से जुड़े ऐसे सुधारों का विरोध कर रही है।

वक्फ बोर्ड में मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी का कांग्रेस ने किया विरोध
वक्फ बोर्ड में महिलाओं और गैर-मुस्लिम सदस्यों की एंट्री को लेकर लाए गए संशोधनों और उनके प्रावधानों का कुछ मुस्लिम संगठनों और कांग्रेस ने विरोध किया था। लेकिन वक्फ बोर्ड की मनमानियों पर लगाम लगाने और उसमें महिलाओं की भागीदारी का मुस्लिम महिलाओं ने समर्थन किया था। हालांकि वक्फ बोर्ड में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पहले भी रहा है, लेकिन नए संशोधनों के तहत महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी और पारिवारिक वक्फ (वक्फ-अलल-औलाद) में उत्तराधिकार के प्रावधानों को लेकर कुछ हलकों में यह आशंका जताई जा रही है कि यह वक्फ की मूल अवधारणा को प्रभावित कर सकता है। सरकार ने संशोधन का समर्थन करते हुए कहा कि इससे बोर्ड में मुस्लिम महिलाओं, पसमांदा (पिछड़े) मुसलमानों और अन्य उपेक्षित वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा, जिससे जमीनी स्तर पर जरूरतमंदों तक योजनाओं का लाभ पहुंच सकेगा।

तीन तलाक पर कांग्रेस ने लगाया था अड़ंगा, महिलाओं का भड़का गुस्सा
वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करने और 2019 में संसद द्वारा कानून बनने के दौरान, कांग्रेस ने राजनीतिक नफा-नुकसान के कारण इस बिल के कई प्रावधानों का विरोध किया था। ट्रिपल तलाक कांग्रेस के लिए किस कदर राजनीति का मुद्दा रही इसका सबूत ये है कि ट्रिपल तलाक के हक में कांग्रेस के नेता और दिग्गज वकील ने इसके पक्ष में अदालती लड़ाई लड़ी। मोदी सरकार का विरोध करने के नाम पर कपिल सिब्बल ने तीन तलाक और हलाला की तुलना भगवान श्रीराम के अयोध्या में जन्म से कर डाली। यानी मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा उन्हें नहीं दिखी और वे राजनीति करते रहे, लेकिन मोदी सरकार ने सख्त कदम उठाए और मुस्लिम महिलाओं के दुख दर्द के साथ खड़ी रही। 

शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा
कांग्रेस ने 1986 में शाहबानों प्रकरण में जो रुख अपनाया था वो मुस्लिम महिलाओं की तकलीफें बढ़ाने वाला था। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के फेवर में अपना फैसला देते हुए पति को गुजारा भत्ता देने की बात कही थी, लेकिन शाहबानो के पति ने कोर्ट के फैसले को मुस्लिम पर्सलन लॉ में दखल करार देते हुए भत्ता देने से मना कर दिया। जिसके बाद इस विवाद में मुस्लिम पर्सलन लॉ बोर्ड भी कूद गया। यह विवाद इतना बढ़ा कि मामले ने राजनैतिक रंग ले लिया। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने कांग्रेस के अपने परंपरागत अल्पसंख्यक वोट बैंक को बचाने के लिए पर्सलन लॉ में कोर्ट के दखल को न सिर्फ गलत ठहराया, बल्कि अपनी बहुमत वाली सरकार से इस बारे में संसद से एक कानून भी पास करा लिया।

सिलेक्टिव है RJ सायमा का नारीवाद… हिजाब पर करनी थी बात, करने लगी मजहब का बचाव: सोचिए क्या सच में इस्लाम में ‘मर्जी’ चला सकता है इंसान?

           RJ सायमा ने कहा इस्लाम में मर्जी चलती जबरदस्ती नहीं (साभार : X_@_sayema & Chatgpt)
इस्लाम में इंसान की मर्जी की महत्वता है, जबरदस्ती की कोई जगह नहीं- मजहब की ये परिभाषा हाल में आरजे सायमा ने दी है। उन्होंने बड़ी चालाकी से हिजाब-बुर्का मुद्दे पर इस्लाम को डिफेंड किया है कि दुनियाभर में घटना कोई भी हो जाए, लेकिन बात मजहब की आलोचना पर न आए।

ये तरीका ऑस्ट्रेलिया आतंकी हमले के समय अरफा खानम शेरवानी ने भी अपनाया था। हालाँकि, उनकी स्ट्रैटेजी चली नहीं और उनके अपने ही समुदाय के लोग उनपर सवाल खड़ा करने लगे। सायमा के साथ भी यही हुआ है लेकिन वो आँख मूंदकर रखेंगी क्योंकि उन्हें नैरेटिव ये बनाना है कि जो लोग हिजाब पहनने को मजबूर कर रहे हैं वो अच्छे से इस्लाम को नहीं जानते।

दिलचस्प बात है कि सायमा जैसे बुद्धिजीवियों की हिजाब पर राय मौका, घटना और स्थान देखकर बदलती रहती है। जैसे भारत की बात आती है तो ये हिजाब पहनने को सीधा मजहबी अधिकार से जोड़ती हैं, शैक्षणिक संस्थानों में उसे पहने जाने की पैरवी करती हैं और किसी बाहर मुल्क में ये मुद्दा बनता है तो नारीवादी पक्ष निकल आता है, तब ये क्रांतिकारी भी बनती हैं, हिजाब को च्वाइस भी बताती हैं और इस्लाम को डिफेंड करने का लिबरल वर्जन भी खोजती हैं।

मगर, अफसोस उनका ये वर्जन जमीनी हकीकत और मीडिया में मौजूद तमाम उदाहरणों से बिलकुल निकलता है। बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है। 2025 के दिसंबर माह में ही यूपी के शामली में एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी बीवी और दो नाबालिग बेटियों की हत्या कर दी। कारण? तीनों बिना बुर्का पहने घर से बाहर निकल गई थीं। 2021 में असम से खबर आई थी एक महिला को दुकान से सिर्फ इसलिए बाहर निकाल दिया गया क्योंकि उसने जींस पहनी थी, बुर्का नहीं। 2022 में कर्नाटक से रिपोर्ट आई थी कि एक संगठित समूह मुस्लिम महिलाओं पर नजर रखने के लिए बनाया गया था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी महिला सार्वजनिक स्थानों पर बिना हिजाब या बुर्का के न दिखें।

यह सब भारत की घटनाएँ हैं, किसी दूर-दराज के कट्टर इस्लामिक देश की नहीं। क्या इन पर कभी सायमा कि कोई प्रतिक्रिया या विरोध देखने को मिला? क्या ऐसी खबरों को सुनने के बाद कभी आरजे सायमा ये कहने गईं कि इस्लाम में तो मर्जी चलती है, जबरदस्ती नहीं।

इसी तरह विदेशों में महिलाओं के साथ हिजाब न पहनने पर क्या हुआ, इसके भी तमाम उदाहरण हैं। ईरान की महसा अमीनी याद है आपको? 22 साल की वह लड़की जिसे ‘ठीक से हिजाब न पहनने’ के आरोप में हिरासत में लिया गया और इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उसकी मौत हो गई।

2014 में ईरान के इस्फाहान में महिलाओं पर तेजाब हमलों की घटनाएँ सामने आईं। जाँच में पता चला कि निशाना वे महिलाएँ थीं जो ‘ढंग से’ हिजाब या बुर्का नहीं पहन रही थीं।
इसी तरह कनाडा की अक्सा परवेज, महज 16 साल की लड़की, जिसकी हत्या उसके अपने परिवार ने इसलिए कर दी क्योंकि वह खुद को ढककर बाहर नहीं जाती थी।

ये तो सिर्फ वे मामले हैं जो मीडिया में आ सके। कितनी घटनाएँ चार-दीवारी के भीतर दबा दी जाती होंगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। आरजे सायमा क्या इन सभी मामलों में पीड़ित महिलाओं और बच्चियों को यह समझाने जाएँगी कि इस्लाम मर्जी का मजहब है, जबरदस्ती का नहीं? या फिर हमेशा की तरह यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगी कि यह ‘असल इस्लाम’ नहीं है?

विडंबना यह है कि जिस इस्लाम की परिभाषा सायमा गढ़ती हैं, उसे बार-बार गलत उन्हीं लोगों ने साबित किया है जो इस मजहब को सबसे ज्यादा कट्टरता से मानते हैं। अगर आम लोगों को ‘नासमझ’ मान भी लिया जाए, तो उन मुल्ला-मौलानाओं की तकरीरों का क्या जवाब है, जिनकी बातें सुनकर समाज दिशा तय करता है?

खुले मंचों से बार-बार कहा जाता है कि कुरान में हिजाब का जिक्र है और लड़कियों को इसे पहनना ही चाहिए। कई बार तो ये भी बताया जाता है कि महिलाओं को आजादी देना ही गलत बात है। उनके स्कूल जाने से लेकर उनके खुले सर घूमने की चाह तक को इस्लाम के खिलाफ बता दिया जाता है। तब सवाल उठता है- क्या समस्या कुछ ‘भटके हुए लोगों’ की है, या फिर उस विचारधारा की, जिसे हर बार बचाने के लिए कभी आरफा को और कभी आरजे सायमा को नया नैरेटिव गढ़ना पड़ता है?

‘मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देना शरिया कानून के खिलाफ’: AIMPLB सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और UCC को देगा चुनौती, NCW बोला- सभी महिलाओं के लिए हो एक कानून; डिबेट में तस्लीम रहमानी को मुंह काला करने के बोला,देखिए वीडियो

       मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने के निर्णय और UCC को चुनौती देगा AIMPLB (साभार: ऑपइंडिया अंग्रेजी)
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने रविवार (14 जुलाई 2024) को कहा कि मुस्लिम महिलाओं से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश को वह चुनौती देगा। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मुस्लिम तलाकशुदा महिलाओं को इद्दत की अवधि के बाद भी गुजारा भत्ता माँगने की अनुमति दी थी। बोर्ड उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता (UCC) को भी चुनौती देगा। वहीं, राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने कहा है कि महिलाओं से संबंधित सभी धर्मों में कानून एक समान होने चाहिए। चर्चा यह भी है कि अगर मुस्लिम महिला गुजारा भत्ते की हक़दार नहीं, फिर हज के लिए मिलने वाली सब्सिडी हलाल क्यों? हराम क्यों नहीं? 
दरअसल, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कट्टरपंथी इस मुगालते में थे, कि सरकार राजीव गाँधी की तरह सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बदल देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और न ही कोई सम्भावना है। यह भी शक हो रहा है कि तीन तलाक के मुद्दे पर भले ही मर्दों ने औरतों को दबा दिया हो, लेकिन गुजारा भत्ते का मामला इस तरह गर्माने से ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ही अस्तित्व पर सवाल उठने शुरू हो चुके हैं। यह भी कहा जा रहा कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक एनजीओ है, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा पाकिस्तान को तोड़ बांग्लादेश बनवाने पर मुस्लिम वोटबैंक को कांग्रेस से घिसकता देख इस एनजीओ को बनाया था। 

दरअसल, 14 जुलाई 2024 को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की कार्यसमिति की बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में इन दोनों मुद्दों सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की गई। बोर्ड के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने बताया कि बैठक में आठ प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है। इसमें पास पहला प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही है।

इलियास ने कहा, “पहला प्रस्ताव हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में था। यह फैसला शरिया कानून से टकराता है। इस्लाम में शादी को पवित्र बंधन माना जाता है। इस्लाम तलाक को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘महिलाओं के हित’ में बताया जा रहा है, लेकिन शादी के नजरिए से यह फैसला महिलाओं के लिए परेशानी का सबब बन सकता है।”

सैयद कासिम रसूल इलियास ने आगे कहा, “अगर तलाक के बाद भी पुरुष को गुजारा भत्ता देना है तो वह तलाक क्यों देगा? और अगर रिश्ते में कड़वाहट आ गई है तो इसका खामियाजा किसे भुगतना पड़ेगा? हम कानूनी समिति से सलाह-मशविरा करके इस फैसले को वापस लेने के बारे में विचार-विमर्श करेंगे।”

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई को फैसला सुनाया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 मुस्लिम विवाहित महिलाओं सहित सभी विवाहित महिलाओं पर लागू होती है और वे इन प्रावधानों के तहत अपने पतियों से भरण-पोषण का दावा कर सकती हैं। इसको लेकर मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 इस धर्मनिरपेक्ष कानून पर लागू नहीं होगा।

वहीं, यूसीसी को लेकर कासिम इलियास ने कहा कि उनकी कानूनी टीम इसको लेकर काम कर रही है। उन्होंने कहा, “विविधता हमारे देश की पहचान है, जिसे हमारे संविधान ने सुरक्षित रखा है। यूसीसी इस विविधता को खत्म करने का प्रयास करती है। यूसीसी न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि हमारी धार्मिक स्वतंत्रता के भी खिलाफ है।”

उधर, मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा कि महिलाओं के लिए सभी धर्मों को कानून समान होने चाहिए। शर्मा ने कहा, “महिलाओं के अधिकार सार्वभौमिक होने चाहिए, धर्म के आधार पर निर्धारित नहीं होने चाहिए। महिलाओं से संबंधित सभी धर्मों के कानून भी समान होने चाहिए।”

उन्होंने कहा, “हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक के बाद आपको गुजारा भत्ता मिलता है तो मुस्लिम महिला को यह क्यों नहीं मिलना चाहिए? मैं सुप्रीम कोर्ट द्वारा कही गई बात का स्वागत करती हूँ।” NCW प्रमुख ने कहा कि यह निर्णय इस सिद्धांत को पुष्ट करता है कि किसी भी महिला को कानून के तहत समर्थन और सुरक्षा के बिना नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

ट्रिपल तलाक़ से मुक्ति के बाद भी मोदी को वोट न देने वाली मुस्लिम औरतों को अब कुछ समझ आया ? सुप्रीम कोर्ट ने नए फैसले में मोदी के कानून में ही उन्हें गुजारा भत्ते के अधिकार दिए हैं

सुभाष चन्द्र

वर्ष 1985 में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ ने शाहबानो केस में CrPc के section 125 मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ के बाद अपने शौहर से गुजारा  भत्ता लेने का अधिकार दिया था। उस बेंच में जज थे - चीफ जस्टिस वाई वी चंद्रचूड़, जस्टिस रंगनाथ मिश्रा, जस्टिस डी ए देसाई, जस्टिस ओ चिनप्पा रेड्डी और जस्टिस E S Vekkataramaiah। इस फैसले में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के फैसले की पुष्टि की गई थी और मौहम्मद अहमद खान को अपनी पत्नी शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए गए थे। फैसले में कहा गया था मुस्लिम पर्सनल लॉ के रहते हुए भी तलाकशुदा औरत को CrPc के section 125 में गुजारा भाता लेने का अधिकार है।

लेखक 
चर्चित YouTuber 

लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मुस्लिम संगठनों के दबाव में और मुस्लिम तुष्टिकरण की खातिर संसद में बिल पास करा कर वह आदेश रद्द कर दिया और मुस्लिम औरतें फिर अपनी पतियों की रहमोकरम पर सड़कों पर आ गई। लेकिन 30 साल बाद नरेंद्र मोदी ने उन्हें ट्रिपल तलाक़ से मुक्ति दिलाई और रात के अंधेरे में छोटी छोटी बात पर बच्चों के साथ घर से निकाले जाने से छुटकारा दिलाया लेकिन वे औरतें सब भूल गई और मोदी को 2024 के इलेक्शन में तबियत से उसे हटाने के लिए वोट दिया।  

सुप्रीम कोर्ट द्वारा तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने के निर्णय से मुस्लिम कट्टरपंथियों में बड़ी जबरदस्त खलबली मच गयी है। उनके द्वारा इसे इस्लाम पर हमला बताया जा रहा है। जुलाई 11 को टीवी परिचर्चाओं में सहभागी बने मौलानाओं को पहली बार जलील होते देखा। सबसे बड़ी बात News18 पर एंकर लुबिका लियाकत द्वारा उस तस्लीम रहमानी को, जिसके कारण निर्दोष नूपुर शर्मा को 'सर तन से जुदा' गैंग की वजह से गुमनामी जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ा, मुंह काला करने को बोल दिया। नीचे देखिए वीडियो। 

हो सकता है कि ये कट्टरपंथी जितना ज्यादा इस मुद्दे को उछलेंगे, उतना ही इस्लाम के लिए नुकसानदेह होने वाला है। इन परिचर्चाओं में एक बात मुखर हुई की निकाह एक contract है, लेकिन ये नहीं बता रहे कि contract for what? हलाला? आने वाले समय में यही contract for what गरमाने वाला है। दूसरे, इन परिचर्चाओं में एक बात और सामने आयी कि 'जब कोई पुरुष चोरी करता है, जेब काटता है, क़त्ल करता है आदि अपराध करने पर कोर्ट को क्यों जाते हैं, तब शरीयत कहाँ चली जाती है? औरतों के अधिकारों पर ही शरीयत क्यों जरुरी हो जाती है?  

    

जुलाई 10 को भी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस B V Nagarathna  और जस्टिस Augustine George Masih की पीठ ने एक बार फिर section 125 में मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ता पाने के अधिकार को सही कहा और यह भी कहा कि यदि किसी महिला की अर्जी Section 125 में लंबित है तो वह The Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 के अंतर्गत भी अपना अधिकार मांग सकती है।

इसी क़ानून में ट्रिपल तलाक़ देने वाले को 3 साल की सजा का प्रावधान किया गया था जिसके खिलाफ बड़े बड़े मौलाना लड़ते रहे हैं। 

जुलाई 10 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी तेलंगाना हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ एक मुस्लिम द्वारा लड़ा गया था और हाई कोर्ट ने उसे अपनी तलाकशुदा पत्नी को 10 हजार रूपए महीने गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है।  

ऐसे में अब सवाल उठता है कि जो नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम महिलाओं के लिए किया, वह उनके ही हित में था लेकिन कुल मिला कर औरतों समेत 98% मुसलमानों ने मोदी को हटाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया और कांग्रेस के तलुए चाटने लगे जिसने शाहबानो केस से लेकर अभी तक मुस्लिम महिलाओं का साथ नहीं दिया। 2024 लोक सभा चुनाव में कुछेक मुस्लिम महिलाओं को बीजेपी को वोट देने के कारण तलाक का सामना करना पड़ा। 

आज भी कांग्रेस जुलाई 10 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद से रद्द कराने के लिए हल्ला ठोकेगी। अब देखते हैं मुस्लिम संगठनों ने जिस तरह शाहबानो के फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, अब कितना उत्पात करते हैं। 

वैसे तो जो आचरण मुस्लिम महिलाओं ने मोदी के लिए दिखाया है, अब मोदी की तरफ से उनके लिए कुछ भी करना फिर से धोखा खाना होगा क्योंकि ये महिलाएं और मुस्लिम पुरुष किसी हाल में मोदी का समर्थन नहीं करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट : अब मुस्लिम महिलाएँ तलाक के बाद शौहर से ले सकेंगी गुजारा भत्ता : शाहबानो का हक छीन राजीव गाँधी लाए थे जो ‘तुष्टिकरण’ उस पर लगा फुलस्टॉप

सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई 2024 को एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने पूर्व पति के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा दायर कर सकती है। इसको लेकर मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 धर्मनिरपेक्ष कानून पर हावी नहीं होगा।

शीर्ष न्यायालय की न्यायामूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मुस्लिम महिला के अधिकार को बरकरार रखा। इसको लेकर पीठ ने अलग-अलग, लेकिन सहमति वाले फैसले सुनाए। दरअसल, एक मुस्लिम व्यक्ति ने तेलंगाना हाई कोर्ट के उस निर्देश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पूर्व पत्नी को 10,000 रुपए का अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने फैसला सुनाते हुए कहा, “सीआरपीसी की धारा 125 सभी महिलाओं पर लागू होगी, न कि केवल विवाहित महिलाओं पर।” पीठ ने कहा कि यदि धारा 125 के तहत आवेदन लंबित रहने के दौरान संबंधित मुस्लिम महिला तलाक ले लेती है तो वह मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 का सहारा ले सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अधिनियम सीआरपीसी की धारा 125 के तहत किए गए उपायों के अतिरिक्त उपाय भी प्रदान करता है। बताते चलें कि सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो मामले में एक ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि सीआरपीसी की धारा 125 एक धर्मनिरपेक्ष प्रावधान है, जो मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है।

हालाँकि, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 द्वारा सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को निरस्त कर दिया गया और 2001 में कानून की वैधता बरकरार रखी गई थी। इस अधिनियम के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की माँग नहीं कर सकती है।

सीआरपीसी की धारा 125 के अनुसार, एक व्यक्ति जिसके पास पर्याप्त साधन हैं वह अपनी पत्नी, बच्चों (वैध या नाजायज) और पिता या माता का भरण-पोषण करने के लिए उत्तरदायी है। इस धारा के अनुसार, ‘पत्नी’ में वह महिला शामिल है, जिसका अपने पति से तलाक हो चुका है और उसने दोबारा विवाह नहीं किया है।

यह मामला तेलंगाना के हैदराबाद के मुस्लिम परिवार का है। मार्च 2019 में एक मुस्लिम महिला ने हैदराबाद की एक पारिवारिक अदालत में एक याचिका दी कि उसका पति अब्दुल समद ने उसे तीन तलाक दिया है। इसलिए उसने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत 50,000 रुपए मासिक भरण-पोषण की माँग की। इसके बाद कोर्ट ने जून 2023 में 20,000 रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया।

अब्दुल समद ने पारिवारिक अदालत के आदेश को तेलंगाना हाई कोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि उसने साल 2017 में मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार तलाक लिया था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उसने अपनी पूर्व पत्नी को ‘इद्दत’ अवधि के दौरान भरण-पोषण के रूप में पहले ही 15,000 रुपए का भुगतान कर दिया है।

इसके बाद हाई कोर्ट ने दिसंबर 2023 में उच्च न्यायालय ने भरण-पोषण की राशि को संशोधित कर 10,000 प्रतिमाह कर दिया। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय को छह महीने के भीतर इस मामले का निपटारा करने का निर्देश दिया। हाई कोर्ट के इस फैसले से अब्दुल समद संतुष्ट नहीं हुआ। उसने सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दाखिल की।

याचिकाकर्ता मोहम्मद अब्दुल समद के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बताया कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 के अनुसार, तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत लाभ का दावा करने की हकदार नहीं है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया।

केजरीवाल के खिलाफ सड़कों पर उतरीं महिलाएँ, बोलीं- वोट के बदले किया 1000 रूपए देने का वादा, अब तक नहीं दिए; झूठा, धोखेबाज, चोर…

चुनाव आयोग को उन पार्टियों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करनी चाहिए जिन्होंने धन का प्रलोभन देकर वोट लेने का काम किया है। कांग्रेस ने गारंटी कार्ड बांटे, तो अब आम आदमी पार्टी का पाखंड सामने आ गया। वैसे अभी तक अपने जीवन में कोई ऐसा चुनाव नहीं देखा जिसमे शराब और रूपए के लालच में वोट नहीं ख़रीदे जाते, लेकिन चुनाव आयोग के पास सबूत नहीं होते थे। अब तो सबूत भी आ गए।  देखना है चुनाव आयोग क्या कार्यवाही करता है? जब जनता लालच में आकर वोट देती है तो फिर किस आधार पर महंगाई, अपराधों में वृद्धि और दूसरे काम न होने पर क्यों रोती है? ये दोगलापन कब ख़त्म करेगी लालची जनता? 

दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ महिलाएँ सड़कों पर उतरीं हुई हैं। उनका कहना है कि सीएम केजरीवाल ने उन लोगों से हर महीने 1000 रुपए देने को कहा था, लेकिन वो पैसे अब तक उनके खातों में नहीं आए हैं। विरोध प्रदर्शन के दौरान महिलाएँ केजरीवाल से 1000-1000 रुपए माँगते दिखीं और सीएम पर दिल्ली की जनता को बेवकूफ बनाने का इल्जाम भी लगाया। महिलाओं का आरोप है चुनाव से पहले उन्होंने वोट पाने के लिए ये वादा किया था।

जानकारी के अनुसार, इस प्रदर्शन को ‘दिल्ली महिला मंच’ द्वारा किया जा रहा है। इसकी वीडियो भी सामने आई है। वीडियो में प्रदर्शनकारी महिलाओं में से एक बुर्काधारी महिला कहती है- “हम लोग महिला मंच से आए हैं और मैं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से यह सवाल करना चाहती हूँ कि जो फॉर्म अरविंद केजरीवाल ने हमसे भरवाए थे, उसे पूरा क्यों नहीं किया जा रहा है? आखिर क्यों केजरीवाल अपने वादों से मुकर रहे हैं? दूसरों को यह लोग शराब की बोतलें बाँट रहे हैं, लेकिन हमें एक हजार रुपए तक नहीं दे पा रहे हैं।”

महिलाएँ कहती सुनाई पड़ रही हैं- केजरीवाल ने हमसे वादा किया तो हमने ईमानदारी से उन्हें वोट दिया। उन्होंने फॉर्म भरवाने के बाद भी पैसे नहीं भेजे। ये झूठे हैं, धोखेबाज हैं और चोर हैं।

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मुख्य चुनाव आयुक्त के नाम वोटरों को लुभाने राहुल के हस्ताक्षर किया गारंटी कार्ड के विरुद्ध शिक

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मुख्य चुनाव आयुक्त के नाम वोटरों को लुभाने राहुल के हस्ताक्षर किया गारंटी कार्ड के विरुद्ध शिक
“मुख्य चुनाव आयुक्त, चुनाव आयोग निर्वाचन सदन नई दिल्ली विषय : वोटरों को लुभाने के लिए फायदा देने की गारंटी महोदय, लो...

एक अन्य महिला भी बताती है कि उन लोगों ने फॉर्म भरे थे ताकि उन्हें बाद में 1000 रुपए मिलें। महिला बोली- केजरीवाल ने हमसे वादा किया था कि 18 साल की आयु को पार कर चुकी प्रत्येक बहन-बेटियों को 1 हजार रुपए दिए जाएँगे। ये हमेशा झूठ बोलते हैं। कि दिल्ली में 200 यूनिट बिजली मुफ्त है, कहीं बिजली मुफ्त नहीं है और कहते हैं कि बस में यात्रा फ्री है, लेकिन बस वाले महिलाओं को देखकर बस रोकते ही नहीं हैं। यह सरकार हम लोगों को पागल बना रही है। इस सरकार का हमसे कोई लेना-देना नहीं है। यह सरकार सिर्फ झूठे वादे करती है। किसी से भी पूछ लो। मुख्यमंत्री ने सबसे झूठे वादे किए हैं।

दिल्ली : कांग्रेस के बाद मुस्लिम महिलाओं ने AAP के संजय सिंह और राघव चड्ढा की कार को घेरा, कहा – जो वादा किया था वो पैसे दो

           संजय सिंह और राघव चड्ढा की कार घेर कर मुस्लिम महिलाओं ने माँगे पैसे (फोटो साभार: रिपब्लिक भारत)
लोकसभा चुनाव आ गए, कल(जून 9) नरेंद्र मोदी लगातार  तीसरी बार 
प्रधानमंत्री की शपथ लेने पर लालची मतदाताओं को छाती पीटनी के लिए विवश कर दिया है। इन लालचियों ने साबित कर दिया है कि इन्हें किसी विकास और सुविधा से मतलब नहीं, इनके आगे पैसा फेंकों कुछ भी करवा लो। ब्रिटिशर्स और गाज़ी(मुग़ल) अपने साथ कोई लम्बी चौड़ी फौज लेकर नहीं आये थे, उनको मालूम था कि भारत जयचन्द और मीर ज़ाफ़र जैसे लालची मौजूद है। जयचन्द और मीर ज़ाफ़र के वंशज आज भी जीवित है, जो इस चुनाव में सामने आ गया है। भारत विरोधी विदेशी ताकतें पागल नहीं थीं, जो मोदी को सत्ता से हटाने अरबों रूपए जयचन्द और मीर ज़ाफ़र के वारिसों पर खर्च कर रहे थे। 

चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व वाले I.N.D.I. गठबंधन ने बड़े-बड़े वादे किए थे और लालच दिया था, जो अब उसकी ही गले की फाँस बन रहे हैं। मुस्लिम महिलाओं ने विपक्षी दलों के इन नेताओं से रुपयों की माँग करते हुए अब हंगामा शुरू कर दिया है। अब AAP (आम आदमी पार्टी) के राज्यसभा सांसदों संजय सिंह और राघव चड्ढा के कार को घेर कर महिलाओं ने पैसों की माँग की है। विपक्षी दलों ने मुस्लिमों से ‘खटाखट पैसे भेजने’ का वादा किया था।

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में संजय सिंह और राघव चड्ढा से महिलाओं ने चुनावी वादे के एक-एक लाख रुपए माँगे। इन महिलाओं का कहना था कि उन्हें जो खटाखट-खटाखट पैसे दिए जाने के वादे किए गए थे, अब वो पैसे कहाँ हैं? बता दें कि इस चुनाव में विपक्षी दलों ने जम कर मुफ्त रेवड़ियाँ बाँटने का लालच देने की योजना पर काम किया। कांग्रेस अपने ही घोषणा-पत्र और आम लोगों में बाँटे गए गारंटी कार्ड में फँस गई हैं। कांग्रेस दफ्तरों पर भी महिलाएँ पहुँच रही है।

असल में कांग्रेस ने इन महिलाओं से वादा किया था कि 5 जून, 2024 से ही महिलाओं के खाते में पैसे पहुँचने शुरू हो जाएँगे। संजय सिंह और राघव चड्ढा को घेर कर ये महिलाएँ कह रही थीं आप हमसे दुआ लेकर ही जाना। हालाँकि, इस दौरान दोनों ही AAP नेता इन महिलाओं से बच कर निकलते हुए नज़र आए। कांग्रेस ने इन महिलाओं को हर साल एक लाख रुपए देने का वादा किया था। बेरोजगार युवाओं को भी नियमित वेतन देने का वादा किया गया था।

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उत्तर प्रदेश : राहुल और अखिलेश ने 1लाख रूपए का लॉलीपॉप दे मुसलमानों को किया ब्लैकमेल ; लिख दी अपने

इससे पहले उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित कांग्रेस मुख्यालय के बाहर मुस्लिम महिलाओं की लंबी कतार लग गई थी। ये सभी 1 लाख रुपए की माँग कर रही थीं, साथ ही कह रही थीं कि उन्हें वित्तीय लाभ दिया जाए। मुस्लिम महिलाएँ अपना-अपना पहचान-पत्र समेत अन्य दस्तावेज लेकर कांग्रेस के दफ्तर पहुँची थीं। इन महिलाओं ने अपने हाथों में कांग्रेस का ‘गारंटी कार्ड’ भी थाम रखा था, जिसमें एक लाख रुपए के वेतन के अलावा हर शिक्षित युवा को पक्की नौकरी देने का वादा किया गया है। ‘इस गारंटी कार्ड’ में कर्जमाफी का भी वादा है। मुस्लिम महिलाओं ने इन कार्ड्स को भर भी रखा था।

उत्तर प्रदेश : राहुल और अखिलेश ने 1लाख रूपए का लॉलीपॉप दे मुसलमानों को किया ब्लैकमेल ; लिख दी अपने पतन की पटकथा ; बीजेपी क्या करती रही? चुनाव आयोग को संज्ञान लेते हुए कार्यवाही करनी चाहिए!



आखिर मुसलमान कांग्रेस के हाथों कब तक ब्लैकमेल होता रहेगा? ये वही कांग्रेस है जिसने मुसलमानों को मुख्यधारा से जोड़ने की बजाए दोयम दर्जे का बना दिया है। लेकिन मुसलमान आज तक इस कटु सच्चाई को नहीं समझ पा रहा। जिस कारण हिन्दू -जिन्हे कट्टरपंथी, साम्प्रदायिक और फिरकापरस्त कहकर बदनाम करते हैं-इन्हे शक की निगाह से देखता है। इस आरोप के लिए मुसलमान खुद जिम्मेदार हैं। बीजेपी अपने कामों के कारण 400 पार करने में सक्षम थी, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ता से लेकर मंडल और जिला अधिकारी मोदी-योगी और अमित शाह पर ही निर्भर रहते हैं। यह बात सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं लगभग सभी राज्यों 
में है। कांग्रेस द्वारा जो गारंटी कार्ड वितरित किये हैं, जाँच करनी चाहिए कि किस प्रेस से प्रकाशित हुए और कितने प्रकाशित हुए हैं। 
कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर जिस तरह मुसलमानों को ब्लैकमेल किया, सारे मौलाना, मौलवी और मुस्लिम बुद्धिजीवी मुसलमानों की इतनी बड़ी बेइज्जती पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? अगर यही काम बीजेपी ने किया होता अब तक चील कौओं की तरह चीख-चीखकर आसमान सिर पर उठा लिया होता।  
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए कांग्रेस और इंडी गठबंधन ने क्या-क्या प्रपंच नहीं किए। ग्लोबल पावर्स की मदद से लेकर, संविधान और आरक्षण के खिलाफ अफवाह फैलाने तक हर हथकंडा अपनाया। यहां तक कि देश के भोलेभाले मतदाताओं को हर महीने 8500 रुपये के हिसाब से साल के 1 लाख रुपये देने का लालच दिया। कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी ने तो अपनी हर जनसभा में मंच से हर महीने 8500 और साल के 1 लाख रुपये देने की गारंटी देते नहीं थकते थे। उन्होंने तो अपने भाषण में महीने और तारीख तक बता दिए थे कि अमुक तारीख से रुपये बैंक खातों में खटाखट जादू की तरह गिरना शुरू हो जाएगा। यहां तक कि कांग्रेस के कार्यकर्ता गरीब लोगों को गारंटी कार्ड तक बांट दिए जिसमें एक फार्म भी छपा है और नाम-पता भरने का कॉलम है। राहुल गांधी ने अपने भाषण में गारंटी क्या दी, कांग्रेस के नेताओं ने यह कह कर घर-घर में फर्जी गारंटी कार्ड बांट दिए कि 5 जून को इसे पार्टी ऑफिस में जमा करा देना और खटाखट पैसे मिलने लगेंगे।

ये कोई आरोप नहीं कटु सच्चाई है 
वोटर खरीदे गए, गुमराह किए गए
वोटर खरीदे गए, गुमराह किए गए, धोखाधड़ी की गई, लोकतंत्र की सामूहिक हत्या हुई लेकिन कोई मीडिया इसको मुद्दा नहीं बनाएगा, कोर्ट भी संज्ञान नहीं लेगा। चुनाव आयोग को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए। कांग्रेस की इस गारंटी कार्ड पर 420 का मुकदमा होना चाहिए। पीएम मोदी को सत्ता में आने से रोकने के लिए और भारत को कमजोर देश बनाने के लिए विदेश से अरबों रुपए फंडिंग की गई। सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाए गए। सोशल मीडिया इन्फूएंशर खरीदे गए। इतना सब करने के बाद भी वे मोदी को रोक नहीं पाए।
उत्तर प्रदेश में इतने बड़े उलटफेर की सबसे  बड़ी वजह 1लाख का लॉलीपॉप था, इस बारे में उत्तर प्रदेश के कांग्रेस उपाध्यक्ष कहते है की उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले 43 लाख गारंटी कार्ड बांटे गए थे। और उनमे से अधिकतर भर कर कांग्रेस कार्यालय पर जमा भी किया जा चुका था। अगर 43 लाख परिवारों को कार्ड मिला और 1 परिवार पर 4  वोट भी जोड़ लो तो 1.5 करोड़ मतदाताओं को उत्तरप्रदेश में प्रभावित किया क्या, और यही एक लाख रूपया देने की गारंटी ही थी इतने बड़े उलटफेर की मुख्य वजह वो वाराणसी हो या फैजाबाद। इसलिए सारे विश्लेषण बेकार है ये नेरेगा और कर्ज माफी के बाद मतदाताओं को दिया गया सबसे बड़ा लॉलीपॉप है। जिसको मतदाताओं ने चुपचाप पकड़ लिए और किसी को हवा भी नही आने दी और जमीनी हवा किसी को समझ नही आई। इस पर चुनाव आयोग को संज्ञान लेते हुए कार्यवाही करनी चाहिए!

यह कांग्रेस का गारंटी कार्ड है, जो करोड़ों की संख्या में यह कह कर भरवाया गया कि यह गारंटी कार्ड भर दो तुम्हें 100000 रूपए मिलेगा।

इस गारंटी कार्ड में कहीं नहीं लिखा है कि सरकार बनने पर ही 100000 रूपए दिए जाएंगे।

इस गारंटी कार्ड के अनुसार कानूनन कांग्रेस 100000 रूपए देने के लिए बाध्य है। अब वह मुकर नहीं सकती। बीजेपी को भी चाहिए कि इस मुद्दे को सड़कों तक लाकर बड़ा आंदोलन करे। 

मुंगेरी लाल के सपने देखने पर कोई रोक नहीं। राहुल और प्रियंका को परिवारभक्त प्रधानमंत्री बनाने का सपना देख रहे हैं, वह भी जानते हैं कि परिवार को कोई सदस्य प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। अगर बनना होता 2004 में सोनिया गाँधी बन गयी होती। सबसे अधिक मूल्यवान होता है विशेषकर राष्ट्र के महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए, बच्चा बच्चा जानता है कि ग़ज़वाये हिन्द में उतनी ही देरी है जितनी भारत के विकसित होने में। 

अब ऐसे में पहले क्या ज़रूरी था और है विकास या किराएदारों जिहादियो को बाहर निकालना या उनका सामूहिक सनातनी करण करना। 

दशकों के कांग्रेस के फिरकापरस्त शासन के बाद 1998 में अटल सरकार आई। हम सनातनियो में आस जगी की अब जायेगे वापिस किरायेदार पाकिस्तान भारत बनेगा हिन्दुराष्ट्र। मगर गठबंधन की बैसाखियों के बहाने के कारण उन्होंने कुछ न किया। 

फिर दस साल शून्य में रहने के बाद सबसे पहले हम भक्तो की छाती 56" हुई कि अब तो निश्चित ही खाली होगा हिंदुस्तान घुसपैठियों से(2014) मगर नेता जी तो उन्ही का विश्वास जीतने में लग गए। पूर्ण बहुमत के दृष्टिगत कई कट्टर हिन्दू संगठन मैदान में आये(आरएसएस,विहिप नही) खूब धरने बड़े आंदोलन किये जनसंख्या कानून तुरंत बनवाने को लेकर। जिसकी नितांत,शीघ्रतम आवश्यकता भी थी। 2018 में हमारे मोदी जी ने लाल किले से इसके बनने की समय की मांग भी बताई थी मगर किया क्या कुछ नही। 2019 में तो ताकत बढ़ी कट्टर हिंदूवादियों में आशा उत्साह बढ़ी फिर प्रयास हुए। सोशल मीडिया से भी खूब आवाज उठाई गयी। 

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उत्तर प्रदेश : कांग्रेस दफ्तर के बाहर लगी मुस्लिम महिलाओं की लंबी लाइन, हाथ में ‘गारंटी कार्ड’ ल

मगर सभी जिम्मेदार कानो में रुई डाल,निगाहें दूसरे ग्रह पे गाढ़ समय को पास करते रहे। हिंदूवादियों में अब भी आस थी। राष्ट्रभक्त,अंधभक्त दोनों को पूरी उम्मीद थी उनपर दवाब भी था कि कुछ तो सोचेंगे करेंगे। डूबते सनातन को उभार ग़ज़वाये हिन्द को चीर करेंगे। 

अधिकतम धर्म प्रेमी तो 2024 बाद इस संविधान को ही खत्म करने की भीषण आस लगाए थे। जिसपे ये नेता निगाहे तो गड़ाए थे मगर व्यस्त होने का नाटक दिखाए थे। तभी ये नारा दिए थे अबकी बार 400 पार। 

मगर दुखद हृदय -पूर्ण बहुमत का स्वर्णिम अध्याय खत्म हो चुका है नेताओ को  गठबंधन का बहाना अटल जी की तरह मिल चुका है। 

अब क्या अध्यादेश का उपयोग कर बनेगा सख्त जनसंख्या कानून,बनेगा भारत हिन्दु राष्ट्र या nrc लागू कर देश से बीस करोड़ घुसपैठियों को बाहर किया जाएगा। घुसपैठियों के निकल जाने के बाद भारतीय मुसलमानों की स्थिति में बड़ी तेजी से बदलाव आएगा। 

विचारणीय है अगर इस इलेक्शन में सरकार पलट जाती तो इन हिन्दू नेताओ की बातें बदल जाती फिर ये कहते भारत बनाओ हिन्दु राष्ट्र।

निराश होने की जरूरत नही है भाजपा अकेली 241 सीट जब इंडी ठगबंधन ने दुनियाभर के भ्रम फैलाकर भी 233 सीट हासिल की है।

प्रधानमंत्री मोदी की सरकार फिर से बन रही हैकुछ पॉज़िटिव बातों को ध्यान में लेकर चुनावों के परिणाम का आनंद ले।

370  के विरोधी महबूबा मुफ्ती और ओमर अब्दुल्ला हार गये है अब उधर भाजपा का मजबूत ग्राउंड तैयार हो गया है।

आंध्र राज्य में लोकसभा की अतिरिक्त राज्य सरकार चंद्र बाबू के साथ बन गई है।

ओडिशा में इतिहास में पहली बार भाजपा की सरकार बन गई है। अरुणाचल और सिक्किम में राज्य सरकार बन गई है।

पंजाब में 18 से 19 प्रतिशत वोट पाकर आनेवाले समय मे पंजाब में भी अच्छा होने की उम्मीद हो गई हैं

केरल में 1 सीट खोलकर और वोट प्रतिशत बढ़ाकर आने वाले अक्टूबर में  केरल राज्य के चुनाव में एक आशा का निर्माण किया है

तमिलनाडु में वोट प्रतिशत बढ़ गया है तमिलनाडु राज्य के चुनावों में अनहोनी के अनुमान लगा सकते हैं

कुल मिलाकर केंद्र में तीसरी बार सरकार बनाने के अलावा चार राज्यो में सरकार बना दी है

हिमाचल में 4 में से 4

उत्तराखंड में 5 में से 5

दिल्ही में 7 में से 7

अंडमान निकोबार द्वीप समूह में 1

अरुणाचल प्रदेश में 2 में से 2

छत्तीसगढ़ में 11 में से 10

ओडिसा में 21 में से 19

यह आंकड़े भी उत्साह वर्धक ही है

न प्रधानमंत्री की महेनत में कमी थीं ना कार्यकर्ताओं के जोश और उत्साह में कमी थी स्वामी विवेकानंद जी का यह अजर अमर वाक्य था उठो जागो ध्येय प्राप्त न हो तब तक लगे रहो

चुनावों में थोड़ा बहुत उलट फेर होता ही है विपक्षी दल भाजपा NDA हार गई है मोदी लहर खत्म हो गई है की नैरेटिव गढ़ने की कोशिशें कर रहा है। देश की जनता रुकने वाली नही है न देश रुकने वाला है देश तेजी से आगे बढ़ रहा है।

पिछले दस साल में जो काम हुवा है वो काबिले दाद है ही पर जो काम नही हुवा है वो अब होगा वैसे यह बात प्रधानमंत्री ने अपने वक्तव्यों में बार बार की है जो पूरी होगी।

प्रधानमंत्री कृत निश्चयी है आप ने जो भरोसा जताया है वो पूरी करने में कल् से लग जाएंगे आंकड़ों की बात करके भ्रम फैलाने वाले ठगबंधन की बात न सुनते हुवे काम पर लग जाना है।