सिलेक्टिव है RJ सायमा का नारीवाद… हिजाब पर करनी थी बात, करने लगी मजहब का बचाव: सोचिए क्या सच में इस्लाम में ‘मर्जी’ चला सकता है इंसान?

           RJ सायमा ने कहा इस्लाम में मर्जी चलती जबरदस्ती नहीं (साभार : X_@_sayema & Chatgpt)
इस्लाम में इंसान की मर्जी की महत्वता है, जबरदस्ती की कोई जगह नहीं- मजहब की ये परिभाषा हाल में आरजे सायमा ने दी है। उन्होंने बड़ी चालाकी से हिजाब-बुर्का मुद्दे पर इस्लाम को डिफेंड किया है कि दुनियाभर में घटना कोई भी हो जाए, लेकिन बात मजहब की आलोचना पर न आए।

ये तरीका ऑस्ट्रेलिया आतंकी हमले के समय अरफा खानम शेरवानी ने भी अपनाया था। हालाँकि, उनकी स्ट्रैटेजी चली नहीं और उनके अपने ही समुदाय के लोग उनपर सवाल खड़ा करने लगे। सायमा के साथ भी यही हुआ है लेकिन वो आँख मूंदकर रखेंगी क्योंकि उन्हें नैरेटिव ये बनाना है कि जो लोग हिजाब पहनने को मजबूर कर रहे हैं वो अच्छे से इस्लाम को नहीं जानते।

दिलचस्प बात है कि सायमा जैसे बुद्धिजीवियों की हिजाब पर राय मौका, घटना और स्थान देखकर बदलती रहती है। जैसे भारत की बात आती है तो ये हिजाब पहनने को सीधा मजहबी अधिकार से जोड़ती हैं, शैक्षणिक संस्थानों में उसे पहने जाने की पैरवी करती हैं और किसी बाहर मुल्क में ये मुद्दा बनता है तो नारीवादी पक्ष निकल आता है, तब ये क्रांतिकारी भी बनती हैं, हिजाब को च्वाइस भी बताती हैं और इस्लाम को डिफेंड करने का लिबरल वर्जन भी खोजती हैं।

मगर, अफसोस उनका ये वर्जन जमीनी हकीकत और मीडिया में मौजूद तमाम उदाहरणों से बिलकुल निकलता है। बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है। 2025 के दिसंबर माह में ही यूपी के शामली में एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी बीवी और दो नाबालिग बेटियों की हत्या कर दी। कारण? तीनों बिना बुर्का पहने घर से बाहर निकल गई थीं। 2021 में असम से खबर आई थी एक महिला को दुकान से सिर्फ इसलिए बाहर निकाल दिया गया क्योंकि उसने जींस पहनी थी, बुर्का नहीं। 2022 में कर्नाटक से रिपोर्ट आई थी कि एक संगठित समूह मुस्लिम महिलाओं पर नजर रखने के लिए बनाया गया था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी महिला सार्वजनिक स्थानों पर बिना हिजाब या बुर्का के न दिखें।

यह सब भारत की घटनाएँ हैं, किसी दूर-दराज के कट्टर इस्लामिक देश की नहीं। क्या इन पर कभी सायमा कि कोई प्रतिक्रिया या विरोध देखने को मिला? क्या ऐसी खबरों को सुनने के बाद कभी आरजे सायमा ये कहने गईं कि इस्लाम में तो मर्जी चलती है, जबरदस्ती नहीं।

इसी तरह विदेशों में महिलाओं के साथ हिजाब न पहनने पर क्या हुआ, इसके भी तमाम उदाहरण हैं। ईरान की महसा अमीनी याद है आपको? 22 साल की वह लड़की जिसे ‘ठीक से हिजाब न पहनने’ के आरोप में हिरासत में लिया गया और इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उसकी मौत हो गई।

2014 में ईरान के इस्फाहान में महिलाओं पर तेजाब हमलों की घटनाएँ सामने आईं। जाँच में पता चला कि निशाना वे महिलाएँ थीं जो ‘ढंग से’ हिजाब या बुर्का नहीं पहन रही थीं।
इसी तरह कनाडा की अक्सा परवेज, महज 16 साल की लड़की, जिसकी हत्या उसके अपने परिवार ने इसलिए कर दी क्योंकि वह खुद को ढककर बाहर नहीं जाती थी।

ये तो सिर्फ वे मामले हैं जो मीडिया में आ सके। कितनी घटनाएँ चार-दीवारी के भीतर दबा दी जाती होंगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। आरजे सायमा क्या इन सभी मामलों में पीड़ित महिलाओं और बच्चियों को यह समझाने जाएँगी कि इस्लाम मर्जी का मजहब है, जबरदस्ती का नहीं? या फिर हमेशा की तरह यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगी कि यह ‘असल इस्लाम’ नहीं है?

विडंबना यह है कि जिस इस्लाम की परिभाषा सायमा गढ़ती हैं, उसे बार-बार गलत उन्हीं लोगों ने साबित किया है जो इस मजहब को सबसे ज्यादा कट्टरता से मानते हैं। अगर आम लोगों को ‘नासमझ’ मान भी लिया जाए, तो उन मुल्ला-मौलानाओं की तकरीरों का क्या जवाब है, जिनकी बातें सुनकर समाज दिशा तय करता है?

खुले मंचों से बार-बार कहा जाता है कि कुरान में हिजाब का जिक्र है और लड़कियों को इसे पहनना ही चाहिए। कई बार तो ये भी बताया जाता है कि महिलाओं को आजादी देना ही गलत बात है। उनके स्कूल जाने से लेकर उनके खुले सर घूमने की चाह तक को इस्लाम के खिलाफ बता दिया जाता है। तब सवाल उठता है- क्या समस्या कुछ ‘भटके हुए लोगों’ की है, या फिर उस विचारधारा की, जिसे हर बार बचाने के लिए कभी आरफा को और कभी आरजे सायमा को नया नैरेटिव गढ़ना पड़ता है?

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