लड़ाई ममता बनाम भाजपा नहीं, लोकतंत्र बनाम अराजक सत्ता: ED के खिलाफ एक्शन से संवैधानिक संकट में तृणमूल सरकार, हाई कोर्ट का फैसला ममता बनर्जी के लिए भारी शर्मिंदगी


पश्चिम बंगाल आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वह किसी सामान्य राजनीतिक टकराव से कहीं आगे जा चुका है। ED की रेड, I-PAC से जुड़े दस्तावेज, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा जानबूझकर जांच एजेंसी के हाथों से फाइलें और लैपटॉप ले जाना ये सब मिलकर एक ऐसे संवैधानिक तूफान की भूमिका बना रहे हैं जिसमें राज्य सरकार की वैधता और पारदर्शिता दोनों कठघरे में हैं। चुनाव से ठीक पहले हुआ यह घटनाक्रम महज संयोग नहीं लगता; यह सत्ता की बेचैनी और सच्चाई से भागने की प्रवृत्ति का खुला प्रदर्शन है। दरअसल, यह सब जिस दिशा में इशारा करते हैं, वह साफ तौर पर खतरनाक है। क्योंकि फर्जी नौकरियों के घोटाले से निकला धन चुनावी रणनीति तक पहुंचा है। I-PAC जैसे प्रोफेशनल चुनावी संगठन का नाम इसमें आना अपने आप में विस्फोटक है। यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि 2022 के TMC चुनाव अभियान में संदिग्ध फंड का इस्तेमाल हुआ, तो यह लोकतंत्र के साथ सीधा छल होगा। चुनाव जीतने के लिए कानून को मोड़ना, धनशोधन को ढाल बनाना और संस्थानों को कठपुतली समझना—यह सब किसी भी सरकार को नैतिक रूप से अपात्र बना देता है। इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस फैसले को ‘भारी शर्मिंदगी’ वाला बताया, जिसके तहत सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की याचिका को खारिज कर दिया गया है।

I-PAC पर छापा और मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप: कानून से ऊपर कौन?

प्रवर्तन निदेशालय की टीम द्वारा आई-पैक पर छापे की कार्रवाई में सबसे गंभीर तथ्य यह है कि स्वयं मुख्यमंत्री ने जांच के दौरान जब्त दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत अपने हाथ में लिए। इसके लिए उन्होंने अपने पद का गलत इस्तेमाल किया। कोई भी संवैधानिक पद, चाहे वह कितना ही ऊंचा क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं होता। IPC की धारा 186 के तहत जांच में बाधा डालना अपराध है, और PMLA की धारा 67 ED को व्यापक शक्तियां देती है। ऐसे में ममता बनर्जी का यह कदम “राजनीतिक विरोध” नहीं, बल्कि कानून की खुली अवहेलना के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह नहीं कि वे नाराज़ थीं, सवाल यह है कि क्या उन्होंने सबूतों को छिपाने या नियंत्रित करने की सुनियोजित साजिश नहीं रची? क्या ममता बनर्जी ने प्रभाव और दबाव दिखाकर मुख्यमंत्री पद का बेजा इस्तेमाल नहीं किया?

‘नॉटी होम मिनिस्टर’ बोलकर खुद फंसी ‘नॉटी सीएम’

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सारी मान-मर्यादा और नैतिकता को ताक पर रखकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नागवार गुजरने वाली टिप्पणी की थी। केंद्रीय गृह मंत्री पर की गई अनैतिक टिप्पणी राजनीति का सामान्य शोर बन सकती थी, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने ही कृत्य ने उस शोर की आग में घी का काम किया है। यदि ED की टीम TMC के आंतरिक डेटा, कैंडिडेट लिस्ट और रणनीति तक पहुंची भी है तो इसका जवाब फाइलें उठाकर भाग जाना किसी भी सूरत में नहीं हो सकता। लोकतंत्र में पारदर्शिता का मतलब यह है कि आप जांच का सामना करें, न कि कैमरों के सामने नाटकीयता का प्रदर्शन करें। ममता बनर्जी ने मीडिया के कैमरों के सामने यही नौटंकी की। जिस तरह यह पूरा दृश्य सामने आया, उसने मुख्यमंत्री की विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुंचाया है। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में ममता बनर्जी ने नॉटी सीएम वाली हरकतें की हैं।

राज्य बनाम केंद्र: टकराव के चलते अनुच्छेद 356 की दस्तक?

राज्य पुलिस द्वारा ED अधिकारियों पर FIR दर्ज करना इस संकट को और विस्फोटक बनाता है। यह सीधे-सीधे संघीय ढांचे को चुनौती है। कानून व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस यदि जांच एजेंसी पर ही हमला कर दे, तो सहज ही सवाल उठना लाजिमी है कि किसे बचाया जा रहा है? यह टकराव राजनीति का नहीं, बल्कि संवैधानिक अनुशासन का है। और जब अनुशासन टूटता है, तो अनुच्छेद 356 जैसी कठोर व्यवस्थाएं स्वतः चर्चा में आ जाती हैं। एस.आर. बोम्मई (1994) ने राष्ट्रपति शासन की राह को सीमित किया, लेकिन बंद नहीं किया। जब राज्य की संवैधानिक मशीनरी विफल हो, जब सरकार जांच में बाधा बने और जब पुलिस व एजेंसियां आमने-सामने खड़ी हों तो यह विफलता का प्रमाण बनता है। बंगाल में आज वही तस्वीर उभर रही है। राज्यपाल की रिपोर्ट यदि यही कहती है कि शासन चलाना असंभव हो रहा है, तो केंद्र के पास संवैधानिक हस्तक्षेप का आधार अनुच्छेद 356 के रूप में मौजूद है।

कानून की कसौटी पर ममता, बंगाल पहले भी देख चुका राष्ट्रपति शासन

ऐसा भी नहीं कि यदि पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगता है तो यह पहली बार होगा। इससे पहले भी पश्चिम बंगाल राष्ट्रपति 1968, 1970 और 1971 में शासन देख चुका है। फर्क यह है कि तब की अस्थिरता अब सत्ता की जिद में बदल चुकी है। 2011 के बाद TMC ने कथित रूप से जिस तरह संस्थाओं पर पकड़ बनाई, वही आज उसके गले की फांस बन रही है। संस्थाएं स्वतंत्र रहें तो सत्ता टिकती है; उन्हें बंधक बनाओ तो सत्ता ढहती है। ममता बनर्जी की शैली आज उसी ढलान पर फिसलती दिख रही है। कानूनी विशेषज्ञ साफ कहते हैं—मुख्यमंत्री होने से गिरफ्तारी पर कोई ढाल नहीं मिलती। यदि ED यह साबित कर दे कि सबूत हटाए गए या जांच रोकी गई, तो कार्रवाई अवश्यंभावी है। अदालतें इस पर राजनीतिक नहीं, विधिक दृष्टि से देखेंगी। और यदि यह साबित हो गया कि चुनावी फंडिंग में अवैध धन घुसा, तो पूरा चुनावी जनादेश ही सवालों के घेरे में आ जाएगा।

हाई कोर्ट का फैसला ममता बनर्जी के लिए ‘भारी शर्मिंदगी’

इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस फैसले को ‘भारी शर्मिंदगी’ वाला बताया है। इस फैसले के तहत सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की याचिका को खारिज कर दिया गया है। इस याचिका में अनुरोध किया गया है कि टीएमसी के उस डेटा की सुरक्षा की जाए जिसे हो सकता है कि ईडी ने प्रतीक जैन के कार्यालय और घर पर छापेमारी के दौरान जब्त कर लिया हो। पिछले सप्ताह आई-पैक निदेशक प्रतीक जैन के कार्यालय और घर पर ईडी ने छापेमारी की थी। भाजपा ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का ‘भ्रष्टाचार’ और निजी कंपनी के साथ उसका ‘भ्रष्ट संबंध’ जल्द ही उजागर होगा। भाजपा ने जोर देकर कहा कि संवैधानिक अधिकारियों को राजनीतिक हथकंडों से डराया नहीं जा सकता और उच्च न्यायालय ने इसे स्पष्ट कर दिया है।

चुनावी मशीनरी और संदिग्ध धन के जाल पर पूरे विपक्ष का हमला

भारतीय जनता पार्टी ही नहीं CPI(M) और कांग्रेस भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आड़े हाथों ले रही है। सीपीआई (एम) और कांग्रेस की मांगें राजनीतिक होने के साथ-साथ नैतिक दबाव का प्रतीक भी हैं। इन दलों का कहना है कि यदि भ्रष्टाचार के दस्तावेज मुख्यमंत्री के पास हैं, तो वे उन्हें सार्वजनिक क्यों नहीं करतीं? भाजपा का यह सवाल कि “अगर कुछ छिपाना नहीं था तो फाइलें क्यों उठाईं?” यह एकदम सीधा-सपाट मगर घातक है। यह प्रश्न सीधे उस दरवाज़े पर दस्तक देता है जिसके पीछे सत्ता की सबसे काली परछाइयाँ छिपी हो सकती हैं। और जब विपक्ष एक सुर में गिरफ्तारी की मांग करे, तो यह संकेत होता है कि मामला हल्का नहीं रहा है, बल्कि तृणमूल सरकार कानून, नैतिकता और जनता तीनों की कसौटी पर कठघरे में आ चुकी है।

लड़ाई ममता बनाम भाजपा नहीं, लोकतंत्र बनाम अराजक सत्ता है

अदालत के आदेश, छापे की कार्रवाई, ममता बनर्जी की घबराहट भरी बैचेनी और मीडिया रिपोर्ट्स के आलोक में तस्वीर साफ होती जा रही है कि ममता बनर्जी की सरकार गहरे संकट में है। सबूतों पर हाथ, एजेंसियों से टकराव, पुलिस का राजनीतिक इस्तेमाल और विपक्ष की एकजुट मांग, ये सब मिलकर राष्ट्रपति शासन की जमीन तैयार कर रहे हैं। यदि कानून अपने रास्ते पर चलता है, तो बंगाल में सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि शासन सुधार की शुरुआत हो सकती है। और यदि ममता बनर्जी की राजनीति ने कानून को फिर दबा दिया, तो यह लोकतंत्र के लिए एक और काला अध्याय होगा। यह लड़ाई ममता बनर्जी बनाम भाजपा नहीं है; यह लोकतंत्र बनाम अराजक सत्ता है। यदि एक मुख्यमंत्री कानून को अपने हाथ में ले सकती है, तो कल कोई भी ले सकेगा। यही कारण है कि राष्ट्रपति शासन की संभावना केवल राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि संवैधानिक सुरक्षा कवच बनकर उभर रही है। बंगाल को बचाने के लिए अस्थायी सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। भले ही वह कितनी ही कठोर क्यों न लगे। 

प्रवर्तन निदेशालय ने सीधे मुख्यमंत्री से जुड़े 17 गंभीर अपराध तय किए
पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे यहां पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक जमीन खिसकती दिखाई दे रही है। एक के बाद एक घटनाएं अब केवल आरोप नहीं रहीं, बल्कि कानूनी और संस्थागत शिकंजे का रूप लेती जा रही हैं। बीएलओ आत्महत्या मामले में टीएमसी कार्यकर्ता की गिरफ्तारी, एसआईआर सत्यापन पर भाजपा की मांग को चुनाव आयोग की स्वीकृति, 50 लाख से ज्यादा फर्जी वोटर के नाम कटना और बाबरी मस्जिद विवाद के उभरने के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय द्वारा सीधे मुख्यमंत्री से जुड़े 17 गंभीर अपराध तय किया जाना—ये सारी घटनाएं मिलकर पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार के लिए एक अभूतपूर्व संकट रच रही हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि ममता बनर्जी को कुछ झटके तो उनकी खुद की पार्टी से मिल रहे हैं, जिनका कुछ भी जवाव उन्हें और उनके नेताओं को नहीं सूझ रहा है।

सत्ता, संस्था और संवैधानिक जवाबदेही ममता बनर्जी के आमने-सामने खड़ी

बीएलओ आत्महत्या से नैतिकता पर सवाल, SIR फैसले से राजनीतिक रणनीति की हार और ईडी के 17 अपराधों से कानूनी संकट—ये तीनों झटके अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही कहानी के अध्याय हैं। यह कहानी है उस सत्ता की, जो वर्षों से हर सवाल को साज़िश बताकर टालती रही, लेकिन अब सवाल सीधे कानून, संस्थाओं और अदालतों के सामने खड़े हैं। यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी का दौर नहीं है। यह वह मोड़ है, जहां सत्ता, संस्था और संवैधानिक जवाबदेही आमने-सामने खड़ी दिखती हैं। ईडी कोई साधारण जांच एजेंसी नहीं है, और जब वह दस्तावेज़ छीने जाने जैसे मामले में सीधे 17 अपराध चिन्हित करती है, तो यह संकेत साफ है कि लड़ाई अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक तय है।


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