15 जनवरी को ED की IPAC रेड के संबंध में सुनवाई में निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और ममता समेत उसके प्रशासन के अनेक अधिकारियों को नोटिस देकर 3 फरवरी को अगली सुनवाई तय की है। लेकिन फिर भी कुछ कमी रह गई। ED ने अपनी याचिका में जो मांग रखी थी उसमें दो थी।
-IPAC ऑफिस, उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के निवास और उसके आसपास के क्षेत्रों के CCTV फुटेज और अन्य storage devices containing footage from the search premises को सुरक्षित रखने के आदेश दिए जाएं; और
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पहले विषय पर तो सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दे दिए लेकिन दूसरे विषय पर कोई आदेश नहीं दिए। सुप्रीम कोर्ट ने CCTV और अन्य Devices को सुरक्षित रखने के आदेश दिए लेकिन जो दस्तावेज़ ममता ने और उसके अधिकारियों ने ED से छीने या IPAC ऑफिस से उठाए, उन्हें वापस करने के कोई आदेश नहीं दिए जा बहुत जरूरी थे। वो Green File अब भी ममता के कब्जे में है जिसकी वह tempering कर सकती है, फाइल से सूचनाएं गायब कर सकती है जिससे ED की जांच बर्बाद हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि -
“हम प्रथम दृष्टया इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि वर्तमान याचिका में ईडी या अन्य केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जा रही जाँच तथा राज्य एजेंसियों के हस्तक्षेप से संबंधित एक गंभीर मुद्दा उठाया गया है”।
2️⃣“हमारे अनुसार, देश में कानून के शासन का पालन सुनिश्चित करने और प्रत्येक अंग को स्वतंत्र रूप से कार्य करने देने के लिए इस मुद्दे की जांच करना आवश्यक है, ताकि किसी विशेष राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियों की आड़ में अपराधियों को संरक्षण न दिया जा सके” (लेकिन ED को स्वतंत्र रूप से ममता काम नहीं करने दे रही जबकि वह खुद स्वतंत्र रूप से “मनमानी” कर रही है)।
3️⃣“हमारे विचार में, वर्तमान मामले में बड़े और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए गए हैं, जो यदि अनिर्णीत छोड़ दिए गए, तो स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है तथा यह हालात पैदा हो सकते हैं कि किसी न किसी राज्य में अराजकता व्याप्त हो जाए, यह देखते हुए कि अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग संगठन शासन कर रहे हैं”।
पैरा 3 का मतलब साफ़ है सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जो ममता ने जो किया वह एक अराजकता फ़ैलाने वाला काम था जो अन्य राज्यों में भी फ़ैल सकता है। इसलिए इस मामले को सुप्रीम कोर्ट को “Law and Order Machinery” के राज्य में भंग होने के रूप में देखना चाहिए था।
इस अराजकता के बारे में सॉलिसिटर जनरल ने जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ से कहा कि ममता बनर्जी विगत में भी संवैधानिक संस्थाओं के कार्यों में बाधा डालती रही हैं।
उन्होंने कहा कि “डीजीपी, मुख्यमंत्री और पुलिस आयुक्त तथा क्षेत्र के डीसीपी सहित बड़ी मात्रा में पुलिस बल वहां पहुंचे … उन्होंने बिना अनुमति सामग्री उठा ली। यह चोरी का अपराध है। वह उसे अपने साथ ले गई। ईडी अधिकारी का मोबाइल भी ले लिया गया। फिर वह मीडिया के सामने भी गई।
इससे अधिकारियों को अपने कर्तव्य का निर्वहन न करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा और बलों का मनोबल गिरेगा। एक उदाहरण स्थापित किया जाना चाहिए। जो अधिकारी इस कार्रवाई के दौरान उपस्थित थे, उन्हें निलंबित कर विभागीय जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए। कृपया जो हो रहा है, उस पर संज्ञान लें”।
हो सकता है तुषार मेहता की अधिकारियों के निलंबन की मांग पर सुप्रीम कोर्ट नोटिस का जवाब मिलने के बाद फैसला ले। लेकिन विषय की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए अब सुप्रीम कोर्ट को ममता को नाप देना ही उचित होगा।

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