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बांग्लादेश, नेपाल के बाद अब फ़्रांस जलना शुरू; नेपाल में GenZ प्रदर्शन के पीछे दो किरदार, सुदन गुरुंग- प्लानर, बालेन शाह- प्रमोटर: NGO की आड़ में बड़ा खेल तो नहीं हो गया?


फ्रांस के संसदीय चुनावों में वामपंथी गठबंधन की बढ़त का संकेत देने वाले एग्जिट पोल के बाद राजधानी पेरिस समेत पूरे देश में हिंसा भड़क उठी है। रविवार को हुए दूसरे दौर के चुनावों के बाद फ्रांस की पहली कट्टर-दक्षिणपंथी सरकार बनने की कोशिशों को झटका लगा, जब एग्जिट पोल में वामपंथी गठबंधन को सबसे ज्यादा सीटें जीतने का अनुमान लगाया गया। पहले दौर में बढ़त बनाने वाली मरीन ले पेन की मुस्लिम विरोधी नेशनल रैली पार्टी को रविवार को हुए चुनाव के बाद तीसरे नंबर पर बताया गया है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की पार्टी को एग्जिट पोल में दूसरे नंबर पर बताया गया है। एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए और हिंसा शुरू कर दी।

देशभर में भेजी गई दंगा विरोधी पुलिस

वीडियो फुटेज में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों को सड़कों पर आग जलाते और उपद्रव करते हुए देखा गया है। हिंसा को देखते हुए देश भर में दंगा पुलिस पुलिस को भेजा गया है। फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांसीसी चुनाव के बाद आए एग्जिट पोल में वामपंथी गठबंधन की जीत की संभावना के बाद पेरिस में जश्न और हिंसा दोनों का माहौल बन गया। धुर-वामपंथी गठबंधन के अप्रत्याशित रूप से आगे निकलने की खबर पर हजारों लोग जश्न मनाने के लिए पेरिस के प्लेस डे ला रिपप्लिक में जमा हो गए। वहीं, इस खबर से सत्ता हासिल करने की उम्मीद कर रहे मरीन ले पेन की नेशनल रैली के समर्थन हैरान रह गए।

पुलिस ने किया आंसू गैस का इस्तेमाल

इस बीच फ्रांस के विभिन्न शहरों से हिंसा की खबरें आने लगीं। जगह-जगह पर प्रदर्शनकारियों की हिंसा के वीडियो सामने आए हैं। वहीं, दंगा विरोधी पुलिस भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश करती नजर आई। झड़पों के बीच कई जगह पर पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया है। ब्रिटिश टैबलायड द सन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यह पता नहीं चल पाया है कि बढ़ते तनाव के बीच सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी किस दल के समर्थक है। इसके पहले यह आशंका जताई गई थी कि अगर दक्षिणपंथी जीत जाते हैं तो हिंसा भड़क सकती है।

पहले से तीसरे स्थान पर पहुंची नेशनल रैली

इसके पूर्व हुए पहले दौर के मतदान में एक तिहाई वोट के साथ जीत हासिल करने के बाद नेशनल रैली से संसदीय चुनाव में जीत की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन 7 जुलाई को हुए चुनाव के बाद एग्जिट पोल ने संकेत दिया कि न्यू पॉपुलर फ्रंट के बैनर तले वामपंथी दल 172 सीटें जीतेगा जबकि इमैनुएल मैक्रों की अगुवाई वाला एनसेंबल के 150 सीट जीतने का अनुमान लगाया गया। नेशनल रैली लगभग 132 के साथ तीसरे स्थान पर दिख रही थी।

प्रधानमंत्री ने दिया इस्तीफा

लेफ्ट फ्रंट की जीत की संभावना के बाद फ्रांस के प्रधानमंत्री गेब्रियल अटाल ने रविवार को खुलासा किया कि वह सोमवार सुबह राष्ट्रपि मैक्रों को अपना इस्तीफा सौंप देंगे। अटाल ने कहा, 'आज रात एनसेंबल ने अनुमानित सीटों की संख्या से तीन गुना सीटें जीती हैं, लेकिन हमारे पास बहुमत नहीं है। इसलिए मैं अपना इस्तीफा गणराज्य के राष्ट्रपति को सौंप दूंगा।'

नेपाल में GenZ प्रदर्शन के पीछे दो किरदार, सुदन गुरुंग- प्लानर, बालेन शाह- प्रमोटर

नेपाल में GenZ प्रदर्शन के दो किरदार बालेन शाह और सुदन गुरुंग
नेपाल में सबसे बड़े नागरिक आंदोलन ने सरकार को गिरा दिया है। देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति इस्तीफा दे चुके हैं। अब नेपाल को चलाने के लिए अपने अगले लीडर की जरूरत है। इस पूरे GenZ प्रदर्शन के पीछे दो किरदार सामने आ रहे हैं। पहला है काठमांडू का मेयर बालेन शाह, जिसे प्रदर्शनकारी अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। वहीं, दूसरा नाम प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले हामी नेपाल का फाउंडर सुदन गुरुंग का है।

ये दोनों नाम नेपाल में GenZ प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सामने आए हैं। सुदन गुरुंग, जिसने पूरे प्रदर्शन का आयोजित किया। वहीं बालेन शाह, जिसने इन प्रदर्शनकारियों को भड़काया। तो आइए जानते हैं आखिर कौन है बालेन शाह और सुदन गुरुंग।

बालेन शाह की GenZ प्रदर्शन में भूमिका

बालेन शाह एक रैपर और काठमांडू का मेयर है। शाह ने ही नेपाल के युवाओं को बरगलाया और देश में सरकार के विरोध में खड़ा करने का काम किया। यह उसकी सोशल मीडिया पर सक्रियता से साफ नजर आता है। जहाँ युवा उसे अगला प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं।

तो ये शुरू होता हे रविवार (07 सितंबर 2025) से जब बालेन शाह ने फेसबुक पर एक पोस्ट के जरिए GenZ प्रदर्शन का समर्थन किया। पोस्ट में लिखा, “कल स्पष्ट रूप से GenZ का स्वतःस्फूर्त आयोजन है, वे 28 वर्ष से कम आयु के हैं, जिसके कारण मैं अभी भी बड़ा दिखता हूँ। मैं उनकी इच्छाशक्ति, उद्देश्य और सोच को भी समझना चाहता हूँ।”

                                                          बालेन शाह के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

आगे लिखा, “कल होने वाली इस स्वतःस्फूर्त रैली में किसी भी दल, नेता, कार्यकर्ता, सांसद, बहुला, इंजीनियर को अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए होशियार नहीं होना चाहिए। मैं आयु सीमा के कारण नहीं जा सकता लेकिन उन्हें समझना जरूरी है, मेरा पूरा समर्थन है। प्रिय GenZ, मुझे बताइए कि आप कैसा देश देखना चाहते हैं?”

इसके बाद सोमवार (08 सितंबर 2025) को नेपाल की राजधानी काठमांडू समेत 7 से अधिक शहरों में 13 से 28 साल की उम्र के युवा सोशल मीडिया ऐप के बैन के खिलाफ सड़कों पर उतरते हैं। सोशल मीडिया ऐप के खिलाफ शुरू हुआ प्रदर्शन अब पीएम केपी ओली के इस्तीफे की माँग तक पहुँच जाता है। इस हिंसक प्रदर्शन में 19 लोगों की मौत और 300 से ज्यादा लोग घायल हो जाते हैं।

लेकिन यह प्रदर्शन तब भी नहीं थमता बल्कि और अधिक हिंसा की ओर बढ़ जाता है। प्रदर्शन के दूसरे दिन मंगलवार (09 सितंबर 2025) को प्रधानमंत्री केपी ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल तक इस्तीफा दे देते हैं। अब बारी आती है बालेन शाह की। अब बालेन को प्रधानमंत्री बनाने की माँग बढ़ती चली जाती है।

बालेन शाह के फेसबुक पोस्ट पर ‘We want you as PM’ और ‘Please take Lead Balen’ जैसे कमेंट बढ़ने लगते हैं।

                                                        बालेन शाह की फेसबुक पोस्ट पर नेपाली युवाओं के कमेंट

इसके बाद नेपाल की स्थानीय मीडिया में भी बालेन शाह को नेपाल का अगला प्रधानमंत्री बनाने की माँग तेज होने लगती हैं। वहीं बालेन शाह भी GenZ प्रदर्शनकारियों को देश की संपत्ति को नुकसान ना पहुँचाने की अपील करते हैं।

                                          बालेन शाह के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

बालेन शाह ने लिखा, “प्लीज GenZ, देश तुम्हारे हाथ में है। तुम लोग इसे संभाल लोगे। अब, चाहे कितना भी नुकसान हो, तुम हमारे ही रहोगे। अब घर वापस जाओ।”

बालेन शाह के अमेरिका से कनेक्शन

बालेन शाह यूँ तो काठमांडू के मेयर हैं लेकिन अधिकांश मेयर से विपरीत उनकी पहुँच राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैली है। बालेन शाह के अमेरिका से सीधे कनेक्शन सामने आए हैं। टाइम मैगजीन 2023 के टॉप-100 लोगों में बालेन शाह का नाम है। इसके अलावा द न्यूयॉर्क टाइम्स में मीडिया कवरेज भी मिल चुकी है।

इतना ही नहीं बालेन का नेपाल में अमेरिकी दूतावास में आना-जाना लगा रहता है। साल 2022 में पहली बार अमेरिकी राजदूत आर थॉम्पसन से मुलाकात की, जिनकी तस्वीरें खुद राजदूत ने अपने एक्स अकाउंट पर शेयर की।

इसके बाद साल 2024 में भी बालेन शाह की अमेरिकी राजदूत आर थॉम्पसन से मिलने की खबरें सामने आईं। इस बैठक में अमेरिकी राजदूत ने बालेन शाह को अमेरिका आने का भी न्यौता दिया था।

ओली सरकार के विरोध में बालेन शाह के गाने

बालेन शाह को राजनीति में आने से पहले रैपर के तौर पर जाना जाता था। उनके गाने के बोल अक्सर नेपाल की ओली सरकार की आलोचना को लेकर लिखे जाते रहे हैं। बालेन शाह के ही एक गाने के बोल हैं- “देश की रक्षा करने वाले सब मूर्ख हैं। सारे नेता चोर हैं, देश को लूटकर खा रहे हैं।”

बालेन शाह के गानों ने ही नेपाल के GenZ को सरकार के खिलाफ खड़ा करने का काम किया। खासकर बालेन का गाना ‘बलिदान’ से नेपाल के युवा देश की राजनीति के विरोध में खड़े हुए है। हालिया GenZ प्रदर्शन में भी बालने ने इस गाने को फेसबुक पर शेयर किया।

इस गाने को फेसबुक पर शेयर करते हुए बालेन शाह ने लिखा, “सरकार मुझे बोलने दे।”

मेयर का चुनाव लड़ते हुए बालेन शाह का विवादों में रहा, जब शाह ने काले ब्लेजर पर नेपाल का झंडा लगाते हुए चुनावी अभियान शुरू किया। इस मामले में बालेन के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत की गई थी। इसके बावजूद शाह की लोकप्रियता युवाओं में बढ़ती गई। युवा भी शाह के सरकार विरोधी एजेंडे में फँसते चले गए, जिसका नतीजा आज नेपाल की सरकार गिराकर सामने आया है।

बालेन शाह भी भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने में आगे रहे हैं। याद हो कि आदिपुरुष फिल्म की रिलीज के समय बालेन शाह ने न सिर्फ इस फिल्म का विरोध किया, बल्कि काठमांडू के सिनेमाघरों में भारतीय फिल्मों की रिलीज तक पर रोक लगा दी थी। हालाँकि नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बालेन को पीछे हटना पड़ा था। अब इस समय GenZ के प्रदर्शनों को भी बालेन शाह खूब भुना रहे हैं।

‘हामी नेपाल’ के सुदन गुरुंग ने ही GenZ प्रदर्शन किया प्लान

नेपाल में GenZ प्रदर्शन में दूसरा नाम 36 साल के सुदन गुरुंग का है। इस पूरे प्रदर्शन का आयोजनकर्ता। खुद को NGO ‘हामी नेपाल’ का फाउंडर बताने वाले सुदन गुरुंग ने ही देश के 28 साल से कम उम्र के युवाओं को प्रदर्शन के लिए एकत्रित किया। यहाँ तक कि युवाओं को प्रदर्शन करना भी गुरुंग ने ही सिखाया।

इंस्टाग्राम पर ‘How to Protest’ वीडियो शेयर कर नेपाल के युवाओं को भड़काया। वीडियो में गुरुंग ‘शांतिप्रिय’ प्रदर्शन की बात कहता है लेकिन साथ में यह भी कहता है कि अगर जरूरत पड़े तो उग्र होना जरूरी है।  

नेपाल में प्रदर्शनकारियों ने जो पोस्टर लिए थे उनपर भी हामी नेपाल का ही नाम था। हामी नेपाल ने ही सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक मोबाइलाइजेशन करवाया। हामी नेपाल ने भीड़ इकट्ठा करने के लिए डिस्कोर्ड एप का इस्तेमाल किया जहाँ ग्रुप चैट में प्रदर्शन के सारे निर्देश दिए जा रहे थे। प्रदर्शनकारियों को स्कूल की यूनिफॉर्म पहनकर आने के लिए कहा गया।

इन ग्रुप चैट की छानबीन में पता लगा कि कहीं बांग्लादेश जैसे सत्ता उखाड़ फेंकने की बात की तो कोई हिंसा की ज्यादा से ज्यादा तस्वीरें इंटरनेशनल मीडिया को भेजने की बात कहता दिखा। ग्रुप में पेट्रोल बम बनाने के तरीके भी बताए गए। लोगों से अनुरोध किया जा रहा है कि वो हत्यारा सरकार लिखा हुआ डीपी लगाए।

इन ग्रुप में नेपाल पुलिस और सैन्य बल की तस्वीरों को शार्प शूटर बताकर शेयर किया गया। इस ग्रुप चैट में लगातार हिंसा और नरसंहार तक की बातें हुईं। कुछ-कुछ वैसी ही जैसा बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के समय देखा गया था।

प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाला ‘हामी नेपाल’ का रजिस्ट्रेशन साल 2020 में हुआ, जिसमें सुदन गुरुंग को सोशल एक्टिविस्ट बताया गया। नेपाल में GenZ प्रदर्शन से पहले भी ‘हामी नेपाल’ का नाम बाढ़ राहत कार्य में ही सामने आया है। लेकिन सरकार के खिलाफ इतना बड़ा प्रदर्शन करने में ‘हामी नेपाल’ का हाथ आना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

हामी नेपाल को विदेशी फंडिंग

सुदन गुरुंग के NGO ‘हामी नेपाल’ को कोका-कोला, वाइबर, गोल्डस्टार और मलबरी होटल्स जैसे ब्रांडों से 20 करोड़ नेपाली रुपए की वित्तीय सहायता मिली है। ये सभी विदेशी ब्रांड्स हैं। NGO ने अपनी वेबसाइट में इसकी जानकारी भी दी है।

ये वही NGO है, जिसने साल 2025 की शुरुआत में भारत के ओडिशा में एक इंजीनियरिंग कॉलेज में नेपाल की छात्रा की मौत के बाद जमकर बवाल काटा था। यहाँ तक कि नेपाल में भी भारत विरोधी भावनाओं को खूब भड़काया था। सुदन गुरुंग, जो खुद को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में दुनिया के सामने दिखाता है। वो इस पूरे GenZ प्रदर्शन में युवाओं को भड़काने में सबसे आगे रहता है। यहाँ तक की युवाओं को बांग्लादेश और श्रीलंका का उदाहरण देते हुए देश-विरोधी गाइडेंस भी दी जाती है।

नेपाल में क्या खेल खेलने वाले हैं बालेन शाह और सुदन गुरुंग

कुल मिलाकर देखा जाए तो सुदन गुरुंग और बालेन शाह नेपाल में छिड़े हिंसक प्रदर्शन और सरकार गिराने में प्रमुख जिम्मेदार व्यक्तियों के रूप में सामने आए हैं। लेकिन इनकी प्रवृत्ति न सिर्फ भारत विरोधी है, बल्कि मूल रूप से नेपाल विरोधी भी है। सुदन गुरुंग विदेशी पैसों के दम पर नेपाल की सरकार, नेपाल के लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर चुका है, तो अब उसका संगठन पश्चिमी संबंधों के हिमायती बालेन शाह का नाम देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री पद के लिए उछाल रहा है।

ऐसे में बालेन शाह और सुदन गुरुंग का ये गठबंधन कहीं न कहीं बड़े खतरे की ओर इशारा कर रहा है। आपको याद हो कि कुछ समय पहले बांग्लादेश में भी इसी तरह लोकतांत्रिक रूप से देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता को उखाड़ दिया गया था। उनकी जगह पर पश्चिमी देशों के पपेट मोहम्मद यूनुस को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया था। वहाँ भी युवा खून का इस्तेमाल पश्चिमी देशों ने बांग्लादेश को अपनी जकड़ में लेने के लिए किया था। ठीक ऐसा ही काम नेपाल में भी पश्चिमी देश कर रहे हैं, जो NGO की आड़ में अंधाधुंध पैसा झोंक कर नेपाल की सत्ता को गिरा चुके हैं।

आने वाले समय में बालेन-गुरुंग की ये जोड़ी नेपाल को किस दिशा में लेकर जाती है, ये देखने वाली बात होगी। इस पर भारत और नेपाल के लोगों की ही नहीं, चीन-रूस जैसी महाशक्तियों की भी नजर है। चूँकि नेपाल भारत और चीन से सटा हुआ देश है। इस तरह नेपाल में कुछ भी बदलाव होता है, तो इससे प्रभावित भारत और चीन भी होंगे। ऐसे में ये 2 क्षेत्रीय महाशक्तियाँ क्या कदम उठाती हैं, इस पर भी दुनिया की नजर बनी रहेगी।

नरेंद्र मोदी ने मार्सेल पहुँच दी श्रद्धांजलि; फ्रांस के लोगों ने वीर सावरकर के लिए क्यों लड़ी थी ‘लड़ाई’; भारत में सावरकर को अपमानित करने वालों शर्म करो

                    फ्रांसीसी शहर मार्सिले में सावरकर को नमन करते पीएम मोदी (साभार: हिन्दुस्तान)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी तीन दिवसीय यात्रा के दूसरे दिन 11 फरवरी को मार्सेली पहुँचे और वीर सावरकर को याद किया। इसकी जानकारी उन्होंने सोशल मीडिया साइट X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के जरिए दी। उनके साथ फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी थे। प्रधानमंत्री मोदी ने 10 से 12 फरवरी तक की अपनी यात्रा में उन्होंने AI सम्मेलन को भी संबोधित किया।

मोदी ने अपनी पोस्ट में कहा, “मार्सिले पहुँच गया। भारत की स्वतंत्रता की खोज में इस शहर का विशेष महत्व है। यहीं पर महान वीर सावरकर ने साहसपूर्वक भागने का प्रयास किया था। मैं मार्सिले के लोगों और उस समय के फ्रांसीसी कार्यकर्ताओं को भी धन्यवाद देना चाहता हूँ, जिन्होंने मांग की थी कि उन्हें ब्रिटिश हिरासत में ना सौंपा जाए। वीर सावरकर की बहादुरी पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी!”

 प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी बताया कि मार्सिले की यात्रा में भारत और फ्रांस के बीच संबंधों को और मजबूत करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे। यहाँ एक भारतीय वाणिज्य दूतावास का भी उद्घाटन किया जा रहा है। पीएम मोदी ने कहा, “इससे लोगों के बीच आपसी संपर्क और मजबूत होगा। मैं प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि भी अर्पित करूँगा।”

प्रधानमंत्री मोदी और इमैनुएल मैक्रों फ्रांसिसी शहर मार्सिले में इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सप्रेरिमेंटल रिएक्टर प्रोजेक्ट का दौरा करेंगे। यह प्रोजेक्ट न्यूक्लिर संलयन (फ्यूजन) रिसर्च में एक महत्वपूर्ण सहयोग है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री मजारगुएस युद्ध कब्रिस्तान जाएँगे। वहाँ वे प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अपना बलिदान देने वाले भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देंगे।

मार्सिले का वीर सावरकर से कनेक्शन

दरअसल, सन 1910 में नासिक षडयंत्र मामले में अंग्रेजों ने उन्हें लंदन से गिरफ्तार किया था। ब्रिटिश अधिकारी सावरकर को भारत ला रहे थे, ताकि उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सके। वे एसएस मोरिया जहाज से लाया जा रहा था। यह जहाज 8 जुलाई साल 1910 को फ्रांस के मार्सेिले बंदरगाह पर पहुँचा। सावरकर ने इसे भागने के एक अवसर के रूप में देखा।
उन्होंने यहाँ से निकल कर फ्रांस में शरण लेने की सोची। इसके लिए उन्हें सबसे पहले इस जहाज से निकलना था। उन्होंने एक पोर्टहोल के जरिए जहाज से बाहर निकलने की कोशिश की। वह तैर कर फ्रांस के तट की जाने लगे। इसी दौरान उन्हें फ्रांस के अधिकारियों ने पकड़ लिया और अंग्रेजों के हवाले कर दिया। सावरकर को लेकर फ्रांस और ब्रिटेन में कूटनीतिक तनाव भी रहा।
फ्रांस का आरोप था कि सावरकर की वापसी अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन था। ब्रिटेन ने इसका उचित रूप से पालन नहीं किया गया। साल 1911 में मामले को लेकर स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने फैसला सुनाया कि सावरकर की गिरफ्तारी में अनियमितता थी। हालाँकि, ब्रिटेन सावरकर को वापस फ्रांस को वापस देने के लिए बाध्य नहीं था।
फ्रांसीसी सरकार का तर्क था कि सावरकर को ब्रिटिश अधिकारियों को सौंपना अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करना था। अंग्रेजों ने मुकदमा चलाने के बाद सावरकर को अंडमान निकोबार द्वीप पर स्थित सेलुलर जेल, जिसे कालापानी कहा जाता था, भेज दिया गया था। फ्रांस के लोगों और कई नेताओं ने सावरकर को ब्रिटेन के हाथों सौंपने का विरोध किया था।

भारत और फ्रांस के चुनावों में समानता; दोनों ही देशों में देश-विरोधियों ने अरबों रूपए लुटाया

भारत में हुए लोकसभा चुनाव फ्रांस में हुए चुनाव से काफी मिलते जुलते हैं। लेकिन लोगों को भारत-फ्रांस के चुनाव में जॉर्ज सोरोस का क्या रोल रहा है, भलीभांति पता चलता है। चुनावों के दौरान चर्चा भी थी कि भारत विरोधी विदेशी ताकतें मोदी सरकार को हटाने अरबों रूपए खर्च कर रही हैं। मोदी सरकार के चलते CAA विरोध से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन तक सभी विदेशी चंदा या कहा जाए कि भीख पर हुए हैं। जिसने फिर यह साबित किया कि भारतीय लालची हैं, पैसा फेंको और देश को खतरा में डलवा दो। भारत विरोधियों ने भारतीयों की नब्ज अच्छी तरह पकड़ी हुई है। हिन्दु को जातपात और मुसलमानो को इस्लाम का डर दिखाकर भड़काते रहो। भारत में मुग़ल राज आया लालची जयचन्द और ब्रिटिश राज आया लालची मीर ज़ाफरों की वजह से। लेकिन क्या मिला इन्हे? जिस लालच में देश से बग़ावत की, उसका 0000000% भी नहीं। जब कालचक्र घुमेगा ठीक वही हालत विदेशी भीख पर नाचने वालों का होने वाला है। फिर भी विपक्ष इतिहास से शिक्षा नहीं लेता फिर तो भगवान ही मालिक है।  

फ्रांस से संसदीय चुनाव के दूसरे व अंतिम चरण में वामपंथी गठबंधन ने आश्चर्यजनक जीत हासिल की ओपनियन पोल्स में दक्षिणपंथी गठबंधन की जीत का अनुमान लगाया गया था डेढ़ हफ्ते पहले हुए प्रथम चरण के चुनाव में दक्षिणपंथी गठबंधन सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरा था। फ्रांस की राजधानी पेरिस की जिन सड़कों पर चहल-पहल रहती थी, वहां एक मुर्दा-शांति छाई हुई थी दुकानों के शटर्स गिराए जा रहे थे अलग-अलग इलाकों में पुलिस और सुरक्षाबलों के दस्ते तैनात किए जा रहे थे आशंका थी कि फसाद हो सकता है 28 साल का दक्षिणपंथी नेता प्रधानमंत्री बनने की तैयारी कर रहा था. उसने विजय भाषण भी तैयार कर लिया था. फ्रांस में संसदीय चुनाव के परिणाम आने वाले थे फिर कुछ घंटे बीते उस 28 साल के धुर दक्षिणपंथी नेता का विजय भाषण धरा का धरा रह गया एग्जिट पोल्स के प्रोजेक्शन में वामपंथी गठबंधन को आगे बताया गया रिजल्ट भी इन्हीं प्रोजेक्शन के अनुरूप आया 

फ्रांस में धुर-वामपंथी गठबंधन को आश्चर्यजनक जीत हासिल हुई हफ्ते भर पहले ही उस 28 साल के नेता की पार्टी इन चुनावों के पहले चरण में देश के भीतर ही सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी थी और इसके भी 3 हफ्ते पहले हुए यूरोपीय संसद के चुनाव में भी इस पार्टी ने सबको पीछे छोड़ दिया था इस दक्षिणपंथी पार्टी का नाम है- नेशनल रैली आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस नेशनल रैली को ओपिनियन पोल्स में फ्रांस में सरकार बनाने का सबसे बड़ा दावेदार बताया जा रहा था, वो पिछड़कर तीसरे नंबर पर आ गई? एक हफ्ते के अंदर उसके विपक्षियों ने ऐसे क्या समीकरण बनाए? और अब आगे की राह क्या है? थोड़ा फ्रांस के संसदीय चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण के परिणाम जान लेते हैं, फ्रांस की संसद में कुल 577 सीटें हैं, बहुमत के लिए 289 सीटों की जरूरत होती है इन 577 सीटों में से वामपंथी गठबंधन को 182 सीटे मिलींमध्यमार्गी गठबंधन को 168 सीटें, दक्षिणपंथी गठबंधन को 143 सीटें मिलीं 

मतलब, इन चुनावों में किसी भी गठबंधन को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है हालांकि, वामपंथी गठबंधन के इस प्रदर्शन पर ना केवल फ्रांस के लोगों का एक बड़ा हिस्सा खुशियां मना रहा है, बल्कि दुनियाभर में वामपंथ की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल और प्रमुख नेता भी खुश हैं खुशी इस बात की भी है कि इस गठबंधन ने केवल एक हफ्ते के समय में एक नई राजनीतिक इबारत लिख दी वो भी उस देश में जो यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है वो भी उस यूरोप में जहां बीते कुछ सालों में दक्षिणपंथ का बहुत तेजी से उभार हो रहा था फ्रांस में दक्षिणपंथ को रोकने का श्रेय केवल वामपंथ को नहीं जाता, बल्कि एक बड़ा हिस्सा मध्यमार्गी गठबंधन का भी है जिसे हम पश्चिम बंगाल में मध्यमार्गी भद्रलोक हिन्दू कहते हैं इसमें बड़ा हिस्सा सिविल सोसाइटी के उन लोगों का भी है, जो लगातार डटे रहे इस पूरी कहानी को समझने के लिए दो चुनाव परिणामों की बात करते हैं। फ्रांस में दक्षिणपंथ का प्रभुत्व 30 जून को फ्रांस के संसदीय चुनाव 2024 के पहले चरण के परिणाम आए थे दक्षिणपंथी नेशनल रैली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी पार्टी ने अकेले ही लगभग 30 फीसदी वोट हासिल कर लिए थे उसने पहले ही राउंड में 37 सीटें जीत ली थीं उसके नेतृत्व वाले गठबंधन को लगभग 34 फीसदी वोट मिले थे वहीं वामपंथी गठबंधन न्यू पॉपुलर फ्रंट (NPF) लगभग 29 फीसदी वोट और 32 सीटें लाकर दूसरे नंबर पर रहा था इधर, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का सत्ताधारी मध्यमार्गी गठबंधन लगभग 22 फीसदी वोट और 2 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर आ गया था

अब 9 जून की तारीख, इस दिन यूरोपीय संसद के चुनाव नतीजे आए थे इन चुनावों में भी नेशनल रैली फ्रांस के भीतर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, पार्टी ने 30 सीटें हासिल कीं वहीं राष्ट्रपति मैक्रों का गठबंधन 13 सीटों पर सिमट गया इन्हीं नतीजों को देखते हुए फ्रांस के राष्ट्रपति ने देश में समय से पहले संसदीय चुनाव कराने की घोषणा कर दी थी, जो पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। सभी दल और गठबंधन तैयारियों में जुट गए इमैनुएल मैक्रों ने एक तरह से 9 जून को फ्रांस के लोगों से सवाल पूछा कि क्या वह चाहते हैं की दक्षिणपंथी गठबंधन देश की सरकार चलाए? 7 जुलाई को इसका जवाब 'ना' में मिला हालांकि, 30 जून को आए परिणामों ने दक्षिणपंथ विरोधियों को चिंता में डाल दिया था इसी के चलते कुछ बड़े कदम उठाए गए और दक्षिणपंथ को सत्ता तक पहुंचने से रोका गया 

दक्षिणपंथ को रोकने की ये कहानी शुरू हुई 30 जून को पहले चरण के चुनाव परिणाम आने के बाद से एक दूसरे के विरोधी रहे वामपंथी और मध्यमार्गी दलों ने गठजोड़ बनाने के प्रयास तेज कर दिए गए। गठजोड़ बना, जिसे नाम दिया गया रिपब्लिकन फ्रंट जिस तरह भारत में चुनाव से पहले I.N.D.I. गठबंधन बना। वैसे, फ्रांस की राजनीति में इस तरह के गठजोड़ पहले भी बन चुके थे इसलिए रिपब्लिकन फ्रंट को उम्मीद थी कि उनके गठजोड़ को सफलता मिलेगी इस गठजोड़ ने कैसे सफलता पाई, इसे समझने के लिए फ्रांस में संसदीय चुनाव होते कैसे हैं, ये जानना जरूरी है। फ्रांस में संसदीय चुनाव दो चरणों में होते हैं पहले चरण में अगर किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज्यादा मिल जाते हैं तो उसका चुनाव सीधे हो जाता है इस बार के पहले चरण में 76 उम्मीदवारों का चुनाव इसी तरह हुआ वहीं, पहले चरण में अगर किसी उम्मीदवार को 50 फीसदी से ज्यादा मत नहीं मिलते हैं तो फिर उस सीट के उम्मीदवार दूसरे चरण में पहुंचते हैं यहां पर वो सभी उम्मीदवार चुनाव में हिस्सा ले सकते हैं, जिन्हें पहले चरण में 12.5 फीसदी से ज्यादा मत हासिल हुए हैं ऐसे में दूसरे चरण में कई सीटों पर कई बार दो से ज्यादा उम्मीदवार भी चुनाव लड़ते हुए नजर आते हैं दूसरे चरण में इन उम्मीदवारों में से जिस किसी को भी सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, उसे संसद के लिए चुन लिया जाता है तो वामपंथी और मध्यमार्गी दलों ने इसी दूसरे चरण के लिए रणनीति बनाई थी इस गठजोड़ के नेताओं ने कहा कि नेशनल रैली लोगों में भेद करती है यह फ्रांसीसी क्रांति और देश के संविधान के बराबरी वाले सिद्धांत के खिलाफ है इन नेताओं ने नेशनल रैली को लोगों के बीच इस तरह से पेश किया कि यह उन मूल्यों और सिद्धातों के खिलाफ है, जिनकी बुनियाद पर फ्रांस का निर्माण हुआ हैचुनाव प्रचार के दौरान मध्यमार्गी गठबंधन के एक प्रमुख नेता और देश के प्रधानमंत्री गैब्रियल अटाल ने कहा, "हमें नेशनल रैली को बहुमत तक पहुंचने से रोकने की जरूरत है क्योंकि अगर ऐसा होता है तो मैं ये कह सकता हूं कि यह हमारे देश के लिए एक त्रासदी होगी" इसी तरह धुर-वामपंथी दल LFI के एक प्रमुख नेता फ्रांसोइस रुफिन ने कहा, "आज हमारा बस एक ही उद्देश्य है नेशनल रैली को पूर्ण बहुमत से रोकना

इधर, सिविल सोसाइटी के लोगों ने भी नेशनल रैली के खिलाफ मोर्चा खोला। दुष्प्रचार किया कि ये पार्टी प्रवासियों के खिलाफ नफरत फैलाती है इसके नेता मुसलमानों और यहूदियों के खिलाफ हेट स्पीच देते हैं, नस्लवादी भाषण देते हैं वामपंथी और मध्यमार्गी गठबंधनों ने पहले चरण का चुनाव अलग-अलग लड़ा था वामपंथी गठबंधन में LFI के साथ-साथ फ्रांस की सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियां भी शामिल हैं फ्रांस की ग्रीन पार्टी भी इस गठबंधन का हिस्सा है इधर, मध्यमार्गी गठबंधन में फ्रांस की मध्यमार्गी और दक्षिणपंथी-मध्यमार्गी पार्टियां शामिल हैं इन दोनों गठबंधनों ने ऐतिहासिक तौर पर नीतिगत स्तर पर एक दूसरे का तीखा विरोध किया है। साल 2017 में इमैनुएल मैक्रों के राष्ट्रपति बनने के बाद से ये तीखा विरोध जारी रहा हालांकि, इस संसदीय चुनाव के पहले चरण के बाद यह तय हुआ कि इन विरोधों को किनारे रखा जाए और धुर दक्षिणपंथ का विरोध किया जाए क्योंकि पहले चरण में एक दूसरे के विरोध में चुनाव लड़ने के चलते वामपंथी मध्यमार्गी गठबंधनों के उम्मीदवार कई सीटों पर दूसरे और तीसरे नंबर पर रहे इन उम्मीदवारों ने धुर-दक्षिणपंथी विरोधी वोट बांट दिया ऐसे में तय हुआ कि दूसरे चरण में बची 501 सीटों पर उस गठबंधन के उम्मीदवार को ही चुनाव में उतारा जाएगा, जिसके नेशनल रैली के उम्मीदवार के खिलाफ जीतने की संभावना सबसे अधिक हो दूसरे चरण के चुनाव से पहले कुल 221 उम्मीदवारों ने अपना नाम वापस ले लिया इनमें से 83 उम्मीदवार मध्यमार्गी गठबंधन के थे और 132 वामपंथी गठबंधन के दोनों गठबंधनों ने नेशनल रैली विरोधी वोट को एक-दूसरे को ट्रांसफर कराने का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया मसलन, अगर पहले चरण में किसी सीट पर नेशनल रैली के उम्मीदवार को 40 फीसदी वोट मिले और वामपंथी एवं मध्यमार्गी गठबंधन के उम्मीदवारों को 35 और 25 फीसदी वोट, तो दूसरे चरण में मध्यमार्गी उम्मीदवार रेस से हट गया और अपने 25 फीसदी वोट वामपंथी उम्मीदवार को ट्रांसफर करने की अपील कर दी। इस रणनीतिक गठबंधन का ही रिजल्ट 7 जून को सामने आया पहले चरण में जिस धुर-दक्षिणपंथी गठबंधन को लगभग 34 फीसदी वोट मिले थे, वो लगभग 25 फीसदी पर आ गया. वहीं वामपंथी गठबंधन का मत प्रतिशत 29 से बढ़कर लगभग 33 हो गया इधर, राष्ट्रपति मैक्रों के मध्यमार्गी गठबंधन को भी फायदा हुआ पहले राउंड में इस गठबंधन को लगभग 22 फीसदी वोट मिले थे, जो दूसरे राउंड में बढ़कर लगभग 28 प्रतिशत हो गए. तो ये थी पूरी कहानी

फिलहाल फ्रांस के वामपंथी और मध्यमार्गी गठबंधनों ने धुर-दक्षिणपंथ को सत्ता तक तो पहुंचने से रोक लिया है लेकिन अब उनके सामने एक नई चुनौती खड़ी है गठबंधन एक दूसरे का तीखा विरोध करते रहे हैं नीतिगत मामलों पर इनकी सहमति नहीं बन पाई है ऐसे में, विशेषज्ञों का कहना है कि इनका मिलकर सरकार चलाना बहुत मुश्किल होगा फिलहाल इन दोनों गठबंधनों के नेता बयानबाजी कर रहे हैं कुछ बयानबाजियां ऐसी हैं जिनसे दूरी बढ़ सकती है, तो कुछ एक-दूसरे के साथ आने का आह्वान कर रही हैं इस बीच बात ये भी चल रही है कि ऐसी भी सरकार बनाई जा सकती है जो टेक्नोक्रैटिक हो, जिसमें इन गठबंधनों के खांटी नेता ना शामिल हों जो भी हो, फ्रांस की राजनीति के लिए अगले कुछ महीने बहुत उथल-पुथल भरे होने वाले हैं और इसी बीच वामपंथी फ्रांसीसी गठबंधन ने अमीरों पर 90% कर लगाने का आह्वान किया है धन कर के कारण अधिक कमाई करने वाले लोग देश छोड़कर भागने पर विचार कर रहे हैं, जिससे फ्रांस में आर्थिक मंदी का खतरा पैदा हो गया है फ्रांस के वामपंथी न्यू पॉपुलर फ्रंट NPF - जो अब संसद में सबसे बड़ा समूह है - ने एक ऐसे प्रधान मंत्री की मांग की है जो नए धन कर सहित उसके विचारों को लागू करेगा क्या भारत में भी ऐसा नहीं हुआ था?


बिल्कुल हुआ था लेकिन भारत में मोदी है इसलिए उनके इरादों को मोदी ने मुमकिन नहीं होने दिया इसीलिए तो कहते हैं कि मोदी है तो मुमकिन है

फ्रांस : वामपंथी गठबंधन सरकार द्वारा 90 प्रतिशत टैक्स लगाने की तैयारी, भारत में यही चाहता था इंडी गठबंधन


फ़्रांस में संसदीय चुनाव हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा सीटें वामपंथी गठबंधन को मिली हैं और अब उनके गठबंधन से ही सरकार बनेगी। लेफ्ट वालों को पता है कि अब सरकार में उनकी भगादारी होनी तय है इसके बाद वामपंथियों ने जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया और जगह-जगह आगजनी और दंगे हुए। इसके बाद उन्होंने अपना एजेंडा लागू करना शुरू कर दिया है। उनकी सबसे पहली योजना है कि 4 लाख यूरो सालाना से ज्यादा कमाने वाले लोगों पर 90 प्रतिशत wealth tax लगाने का प्रस्ताव। यह एक तरह का संपत्ति का फिर से बंटवारा यानी Wealth redistribution ही है जिसमें अमीरों पर मोटा टैक्स लगाकर उस पैसे को अपने वोट बैंक में बांटना है। पिछले दिनों भारत में भी चुनाव से पहले राहुल गांधी और इंडी गठबंधन ने इसी तरह के Wealth Redistrubution की बात कही थी। इंदिरा गांधी की सरकार ने 1973-74 में अमीरों और उद्योगपतियों पर 97.5 प्रतिशत वेल्थ टैक्स थोप दिया था, इससे उद्योग चरमरा गए थे। हाल में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता और राहुल गांधी ने जितनी आबादी उतना हक की बात कही थी। वहीं उनके करीबी सैम पित्रोदा ने विरासत टैक्स लगाने की बात कही थी। कुल मिलाकर जो आज फ्रांस में हो रहा है वही भारत में भी देखने को मिलता अगर इंडी गठबंधन चुनाव जीत जाता। यह सब विदेशी ताकतों के डीप स्टेट के इशारों पर हो रहा है।

फ्रांस में 90 प्रतिशत टैक्स लगाने की तैयारी
फ्रांस वामपंथी पार्टियों द्वारा 4 लाख यूरो सालाना से ज्यादा कमाने वाले लोगों पर 90 प्रतिशत wealth tax लगाने का प्रस्ताव है। यह एक तरह का संपत्ति का फिर से बंटवारा यानी Wealth redistribution ही है जिसमें अमीरों पर मोटा टैक्स लगाकर उस पैसे को अपने वोट बैंक में बांटना है। पिछले दिनों भारत में भी चुनाव से पहले राहुल गांधी और इंडी गठबंधन ने इसी तरह के Wealth Redistrubution की बात कही थी। फ़्रांस में आयकर की दर वर्तमान में 177,106 यूरो से अधिक आय पर 45 प्रतिशत टैक्स का प्रावधान है।

उल्टा पड़ा मैक्रों का दांव 
फ्रांस की संसद का कार्यकाल 2027 में खत्म होना था, लेकिन यूरोपीय संघ में नौ जून को बड़ी हार मिलने के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने समय से पहले संसद भंग कर बड़ा दांव खेला था। उन्होंने कहा था कि एक बार फिर मतदाताओं के बीच जाने से स्थिति ‘स्पष्ट’ होगी। हालांकि, उनका यह दांव लगभग हर पड़ाव पर उल्टा पड़ता दिखा है।

वामपंथी गठबंधन की जीत की जश्न में हुए दंगे
वामपंथी गठबंधन को संसदीय चुनाव में जीत की खबरें आने के बाद पेरिस में जश्न और अशांति दोनों का माहौल रहा। सर्वेक्षणों में कहा जा रहा था कि दक्षिणपंथी पार्टी चुनाव जीतने जा रही है वहीं अचानक वामपंथी गठबंधन के आगे निकलने की खबरों के बाद पूरे फ्रांस में हिंसा भड़क उठी। पेरिस की सड़कों पर उग्र दृश्य देखे गए, जिसमें दंगा नियंत्रण गियर में अधिकारी भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे, जबकि झड़पों के बीच आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया था। प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर मोलोटोव कॉकटेल फेंके और धुएं के बम फोड़ दिए। वीडियो फुटेज में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों को सड़कों पर भागते, आग जलाते और उपद्रव करते हुए देखा गया।

फिलिस्तीन को मान्यता देगा फ्रांस
अभी भले ही फ़्रांस में किसी एक गठबंधन के सरकार बनाने के आसार कम ही हैं। मगर वामपंथी नेता ज्यां ने बड़ा एलान कर दिया है। ज्यां ने कहा कि उनका गठबंधन फिलिस्तीन को मान्यता देने की दिशा में काम करेगा। हाल ही में यूरोप के चार देशों ने फिलिस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी थी। ये चार देश स्पेन, नॉर्वे, आयरलैंड और स्लोवेनिया हैं। ज्यां के सोशल मीडिया हैंडल से लिखा गया है, ”प्रधानमंत्री न्यू पॉपुलर फ्रंट से होगा। हम कई चीज़ों पर फ़ैसला कर सकेंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमें फिलिस्तीन को राष्ट्र के तौर पर मान्यता देने पर सहमत होना होगा।”

अल्पसंख्यकों को उनका बकाया हक दिलाएंगेः राहुल गांधी
राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के दौरान 6 अप्रैल 2024 को हैदराबाद में कहा कि अगर वह सत्ता में आए, तो उनकी कांग्रेस पार्टी आर्थिक और संस्थागत सर्वेक्षण के साथ-साथ जाति जनगणना भी कराएगी ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि किसके पास क्या है और वह कितना कमाता है। उन्होंने कहा कि इसके बाद, मोदी सरकार द्वारा 22 बड़े व्यवसायियों को दिए गए 16 ट्रिलियन रुपये ($192 बिलियन) के लाभ का एक हिस्सा देश के 90 प्रतिशत लोगों को हस्तांतरित किया जाएगा, जो सामाजिक न्याय प्रदान करने के शुरुआती बिंदु के रूप में होगा। उन्होंने जाति जनगणना को भारतीय समाज में “एक्स-रे” करार दिया था। गांधी ने कहा, “यह मेरे लिए कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है, यह मेरे जीवन का मिशन है।” “आप लिख सकते हैं; कोई भी ताकत जाति जनगणना को नहीं रोक सकती।”

जाति जनगणना में क्या मुस्लिमों और ईसाईयों की जातियों का उल्लेख किया जाएगा? जिस पर समस्त हिन्दुओं और हिन्दू संगठनों को सरकार पर दबाव बनाना होगा? 

भारत में कांग्रेस पहले ही 90 प्रतिशत से ज्यादा टैक्स लगा चुकी है अब एक बार फिर कांग्रेस उसी नीति पर चलने की बात कह रही है…

इंदिरा गांधी ने अमीरों पर थोपा था 97.5 प्रतिशत टैक्स
तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस का यह फार्मूला कोई नया नहीं है। इंदिरा गांधी की सरकार ने 1971-72 में 10 लाख से अधिक आय वाले किसी भी व्यक्ति को 85 प्रतिशत टैक्स और 10 प्रतिशत सरचार्ज का भुगतान करना होता था। यानी कुल मिलाकर उन्हें 95 प्रतिशत का भुगतान करना पड़ता था। 1973-74 में इंदिरा सरकार ने अमीरों और उद्योगपतियों के लिए 97.5 प्रतिशत टैक्स स्लैब बनाया था। यही कारण ही भारत में ब्लैक मनी, हवाला, तस्करी और समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी हुई थी।

भारत में 1976 में था 66 फीसदी टैक्स
1976 में भारत के वित्त मंत्री चिदंबरम सुब्रमण्यम थे। इस दौरान आयकर 60 फीसदी था और सरचार्ज 10 फीसदी। यानी भारत में कुल आयकर 66 फीसदी था। बेहतर कर अनुपालन के लिए उन्होंने टैक्स में कटौती की थी।

नेहरू ने 1958-59 में लगाया था गिफ्ट टैक्स
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1958-59 का बजट पेश किया था। इस बजट में जवाहरलाल नेहरू ने डायरेक्‍ट टैक्‍स के तहत पहली बार गिफ्ट पर टैक्‍स का प्रावधान पेश किया. इसे ‘गिफ्ट टैक्‍स’ कहा गया। इसमें 10 हजार रुपये से ज्‍यादा की संपत्ति के ट्रांसफर पर गिफ्ट टैक्‍स (Gift Tax) का प्रावधान किया गया।

नेहरू के समय वेल्थ टैक्स से गिफ्ट टैक्स तक
आजादी के बाद जब कांग्रेस की सरकार थी तब 1957 में वित्त मंत्री टी टी कृष्णमचारी ने पहली बार वेल्थ टैक्स और एक्सपेंडिचर टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा। फिर अगले ही साल प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हाथों आया वह बजट, जिसमें पहली बार गिफ्ट टैक्स (Gift Tax) का प्रावधान किया गया। वेल्थ टैक्स के बारे में कृष्णमचारी ने कहा था, ‘इससे आगे चलकर टैक्स चोरी की गुंजाइश घट जाएगी।’ एक्सपेंडिचर टैक्स के बारे में उन्होंने कहा था कि इससे लोगों की अनापशनाप खर्च करने की आदत पर लगाम लगेगी और उनमें बचत की आदत बनेगी।

फ्रांस : जीत के बाद भी नहीं थमे वामपंथी, देश को जलाकर कर रहे ‘शक्ति प्रदर्शन’: दक्षिणपंथ की बढ़त देख शुरू हुई पेट्रोल बम वाली वाम हिंसा

            फ्रांस में चुनाव के बाद लगातार दंगे जारी हैं (चित्र साभार: The Guardian & EssexPR/X)
फ्रांस के आम चुनावों में वामपंथी गठबंधन की जीत हुई है। वामपंथी गठबंधन की जीत के बाद फ्रांस में भीषण दंगे भड़क गए हैं और प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए हैं। यह प्रदर्शनकारी दंगे कर रहे हैं और पेट्रोल बम चला आगजनी कर रहे हैं। फ्रांस में इससे बचने के लिए भारी पुलिस बंदोबस्त किया गया है।

फ्रांस में वामपंथी गठबंधन की जीत अप्रत्याशित तरीके से हुई है। चुनाव से पहले लगातार यह माना जा रहा था कि इन चुनावों में दक्षिणपंथी गठबंधन की जीत होगी। दक्षिणपंथी गठबंधन की नेता मरीन ली पेन के प्रधानमंत्री बनने के आसार जताए जा रहे थे। लेकिन दूसरे चरण की वोटिंग के बाद पासा पलट गया और वामपथी गठबंधन सबसे अधिक सीटें लाने में सफल रहा।

फ्रांस के इन चुनावों में वामपंथी गठबंधन ने 577 सीटों में से लगभग 182 सीटों पर जीत हासिल कर ली है। वहीं दूसरी तरफ फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की रिनेसां पार्टी ने 163 सीटें जीती हैं। तीसरे नम्बर पर धुर दक्षिणपंथी गठबंधन है, जिसने 132 सीटें जीत ली है। अभी अंतिम परिणाम नहीं सामने आए हैं।

अंतिम परिणामों के सामने आने से पहले ही फ्रांस में भीषण हिंसा का माहौल है। प्रदर्शकारियों ने चुनाव नतीजों के रुझानों के साथ फ्रांस की सड़कों पर कब्जा कर लिया है। फ्रांस की राजधानी पेरिस में प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर गाड़ियों को इकट्ठा करके आग लगा दी और पुलिस से भी भिड़ गए।

दंगाइयों ने पुलिस पर पत्थर भी फेंके। कहीं कहीं कूड़ेदानों में भी आग लगा दी गई। फ्रांस के शहर नान्तेस में भी दंगाइयों ने कहर बरपाया है। अभी यह नहीं साफ है कि दंगाई किस समूह के हैं। पुलिस उन पर कब्जा करने में जुटी हुई है। दंगाइयों ने पेरिस के महत्वपूर्ण स्थानों पर तोड़फोड़ भी की है।

फ्रांस में दंगों के इतिहास को देखते हुए पहले से ही इस हिंसा का अंदाजा लगाया जा रहा था। वामपंथियों के इस हिंसा करने की आशंका जताई जा रही थी। इसके लिए फ्रांस में 30,000 पुलिसकर्मी लगाए गए थे। पेरिस समेत बड़े शहरों में महंगी दुकानों में बैरिकेड लगा दिए गए थे ताकि दंगे के दौरान उन्हें लूट से बचाया जा सके।

कुछ दुकानों के शीशों पर लकड़ी तक ठोंक दी गई ताकि प्रदर्शनकारी यहाँ से ना घुसें। गौरतलब है कि वामपंथियों ने पहले चरण की वोटिंग पूरी होने के बाद फ्रांस में कसके दंगे किए थे। 30 जून, 2024 को इन दंगाइयों ने फ़्रांस में कसके कहर बरपाया था।

वामपंथियों ने पहले चरण के चुनाव में दक्षिणपंथियो की बढ़त के बाद सार्वजनिक सम्पत्ति को जलाया था और पुलिस पर हमले किए थे। दूसरे चरण के बाद हिंसा किस समूह ने की है, यह स्पष्ट नहीं हो सका है। चुनाव नतीजों के बाद अब फ्रांस में वामपंथी प्रधानमंत्री बनने के कयास लगाए जा रहे हैं।

पेरिस : योगा टीचर योग कैंप में करवाता था हस्तमैथुन, 1000 कुँवारी लड़कियों से सेक्स का था टारगेट

                                    योग के नाम सेक्स करने वाला टीचर (तस्वीर साभार: द सन)
फ्रांस में ग्रेगोरियन बिवोलारू नाम का एक सनकी योगा टीचर गिरफ्तार हुआ है। उसका मकसद 1000 वर्जिन महिलाओं के साथ सेक्स करना था। फ्रांस पुलिस ने उसे बलात्कार, मानव तस्करी और अपहरण के मामले में गिरफ्तार किया। कथिततौर पर ग्रेगोरियन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध योग शिक्षक और लेखक है।

द सन की रिपोर्ट्स के मुताबिक, फ्रांसीसी न्यायिक अधिकारी ने उसे पकड़ने के लिए उसकी संस्था ‘मूवमेंट फॉर स्पिरिचुअल इंटीग्रेशन इनटू द एब्सोल्यूट (MISA)’ के खिलाफ छापा मारा और बड़े पैमाने पर अभियान चलाकर इस योग टीचर समेत 41 लोगों को गिरफ्तार किया।

इसके बारे में कहा जाता है कि अध्यात्म की इंतेहा तक पहुँचने के लिए 1000 वर्जिन लड़कियों के साथ सेक्स करने की इच्छा रखता था। महिलाओं ने इसके खिलाफ इल्जाम लगाया था कि ये उनकी इच्छा के बिना उन्हें बंदी बनाता था। इसके अलावा आरोप थे कि ये लोगों से जबरन सेक्स करवाता था और पोर्न फिल्म में परफॉर्म करने के लिए उनके ऊपर दबाव बनाता था। फिनलैंड में इस पर मानव तस्करी के आरोप लगे थे जबकि भारत में और अर्जेंटिनिया में इस पर पोर्नोयोगा का आरोप लगा था।

इससे पहले इस योग टीचर के ऊपर 2013 में नाबालिग से सेक्स करने का आरोप लगा था। सजा के वक्त वह फ्रांस में था। हालाँकि बाद में उसे उसके गृह देश में प्रत्यर्पित कर दिया गया। मौजूद जानकारी बताती है कि ये योग टीचर 17 साल की उम्र से योग टीचिंग करने लगा था। वह तांत्रिक ज्ञान देने के बदले 15 साल से कम उम्र की वर्जिन लड़कियों संग सेक्स की माँग करता था। अब उसके योग सेंटर 30 से ज्यादा देशों में हो गए हैं। भारत में उसके योग संस्थान का नाम ‘सत्या’ है।

15 साल की उम्र में इस कथित योग गुरु के साथ सेक्स करने वाली एक लड़की ने बताया कि तांत्रिक ज्ञान के उच्चतम स्तर को पाने के लिए उसने योग टीचर के साथ सेक्स किया था। उसी लड़की ने यह भी बताया कि अपार्टमेंट में लगातर लड़कियाँ आती हैं। उसका (योग गुरु) मानना है कि अगर वो 1000 वर्जिन लड़कियों के साथ सोएगा तो उसे मोक्ष प्राप्त हो जाएगा।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस योग गुरु की संस्था MISA गर्मियों में समर कैंप आयोजित करता था। इसमें मिस शक्ति कंपीटिशन कराया जाता था जिसकी एक एक्टिविटी वीडियो कैमरे के सामने खड़े होकर हस्तमैथुन करने की थी। रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया कि इस योग गुरु के कैंप में जाने से पहले सिफलिस और एचआईवी का टेस्ट अनिवाकर्य होता है।

G-20 समिट : IIT की दिव्या द्विवेदी ने की हिन्दू धर्म को खत्म करने की बात, वामपंथी कविता कृष्णन की मंशा–फिर से गुलाम हो जाए भारत; सरकार और न्यायालय कब होंगे इनके विरुद्ध सख्त

IIT दिल्ली की प्रोफेसर ने विदेशी मीडिया के सामने उगला जहर, कविता कृष्णन ने की भारत पर अमेरिकी प्रतिबन्ध की वकालत (साभार-France-24)
भारत जहाँ 9 और 10 सितंबर, 2023 को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आयोजित होने वाले प्रतिष्ठित G-20 शिखर सम्मेलन में विश्व के नेताओं और गणमान्य व्यक्तियों का स्वागत कर रहा है वहीं लेफ्ट-लिबरल ब्रिगेड इस अवसर का भी लाभ उठाकर अपने हिंदू विरोधी और पूर्वाग्रह से ग्रसित सोच को आगे बढ़ाने में लगा है। आईआईटी दिल्ली की प्रोफेसर दिव्या द्विवेदी और कविता कृष्णन इसी गुट की ऐसी महिलाएँ हैं, जो PM मोदी और हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत को छिपा नहीं सकीं और हिंदू धर्म और भारत के खिलाफ जहर उगलने के लिए जी-20 के मंच का भी बड़ी बेशर्मी से इस्तेमाल करने लगीं।

फ्रांसीसी मीडिया आउटलेट फ्रांस-24 से बात करते हुए प्रोफेसर दिव्या द्विवेदी, जो द कारवाँ, वायर और स्क्रॉल जैसे कई वामपंथी मीडिया पोर्टलों से जुड़ी एक स्तंभकार भी हैं, ने कहा कि वह हिंदू धर्म के बिना भारत के भविष्य को देखती हैं। दिव्या द्विवेदी ने विदेशी मीडिया के सामने आर्यन थ्योरी की बात करते हुए भारत से हिन्दू धर्म को मिटाने की वकालत की।

 दिव्या ने कहा, “दो भारत हैं। बहुसंख्यक आबादी पर अत्याचार करने वाले नस्लीय जाति व्यवस्था का अतीत का भारत और फिर भविष्य का भारत है, जो जाति उत्पीड़न और हिंदू धर्म के बिना एक समतावादी भारत है। यह वह भारत है जिसका अभी तक प्रतिनिधित्व नहीं आया है, लेकिन वह इंतजार कर रहा है, दुनिया को अपना चेहरा दिखाने के लिए तरस रहा है।”

इस बिंदु पर, फ्रांस 24 के पत्रकार ने उनसे सवाल करते हुए भारतीय रिक्शा चालक की कहानी बताते हुए उनसे उनकी राय पूछी कि भारत द्वारा किए गए डिजिटलीकरण और वैश्वीकरण जैसे उपायों से देश के नागरिकों को कैसे लाभ हो रहा है। उन्होंने दिव्या द्विवेदी को बताया कि कैसे रिक्शा चालक ने उन्हें समझाया कि पीएम मोदी की डिजिटल इंडिया पहल ने उन्हें न केवल अपने ग्राहकों, बल्कि पूरी दुनिया से जुड़ने और अपना व्यवसाय बढ़ाने में मदद की।

उन्होंने आईआईटी प्रोफेसर से पूछा की कि क्या रिक्शा चालक का व्यक्तिगत अनुभव यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है कि भारत का भविष्य उज्जवल है। हालाँकि, मोदी के प्रति गहरी घृणा से भरी प्रोफेसर ने फ्रांसीसी पत्रकार की बात को खारिज कर दिया, और ऐसी कहानियों को मीडिया द्वारा गढ़ी कहानी कह कर ख़ारिज कर दिया। 

कविता कृष्णन ने भी उगला भारत के खिलाफ जहर 

फ्रांस-24 से बातचीत करते हुए वामपंथी कविता कृष्णन तो कदम और आगे जाते हुए भारत पर अमेरिका द्वारा प्रतिबन्ध लगाने की वकालत करने लगीं। एक तरफ जहाँ आज पूरा विश्व भारत की मेधा और डेमोक्रेसी का लोहा मान रहा है। यहाँ तक कि विश्व बैंक ने भी मोदी सरकार के UPI, DPI और जन-धन योजना की मदद से वित्तीय समावेशन के 47 साल के लक्ष्य को मात्र 6 साल में तय कर लेने पर जहाँ G-20 शिखर सम्मलेन से पहले ही एक रिपोर्ट शेयर कर तारीफ की है वहीं कविता कृष्णन जैसी वामपंथी मोदी सरकार के प्रति अपनी घृणा को दबा नहीं पा रहीं हैं।  
फ़्रांसिसी मीडिया से बात करते हुए रूस से तेल आयात करने को लेकर अमेरिका द्वारा प्रतिबन्ध लगाने की बात की। इसमें सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि वह इस इंटरव्यू में डेमोक्रेसी को लेकर बातचीत कर रहीं थीं। 

भारत को नीचा दिखाने का हर समय वामपंथी गिरोह ने किया पूरा प्रयास 

लेफ्ट लिबरल गिरोह और उससे जुड़े राजनेता, जैसे कि कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी, जो वैश्विक मंचों पर भारत को अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं, के नक्शेकदम पर चलते हुए, दिव्या द्विवेदी ने भी भारत के खिलाफ जहर उगलना जारी रखा और दावा किया कि भारत में भयंकर जातिवाद और भेदभाव है और आज भी भारत में उच्च वर्ग का दबदबा कायम है।
इतना ही नहीं अभी तक विदेशी मीडिया के सामने जो उन्होंने हिंदू धर्म और मोदी के खिलाफ जो जहर उगला वह पर्याप्त नहीं था। आईआईटी प्रोफेसर दिव्या यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने वैश्विक मीडिया के सामने भारत को और नीचा दिखाने के लिए कहा कि भारत में केवल मुट्ठी भर ऊँची जाति के लोग ही आकर्षक और शक्तिशाली पदों पर बने हुए हैं। उन्होंने मूल रूप से यह बताने की कोशिश की कि मोदी के भारत में न केवल अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया जा रहा है, बल्कि दलित, आदिवासी और निचली जाति के समुदायों जैसे अन्य समुदायों के साथ भी भेदभाव किया जा रहा है। 
उन्होंने आगे कहा कि ऊँची जाति के 10% लोग देश के 90% संसाधनों और पदों पर काबिज हैं और यह सिलसिला अभी भी जारी है।
जब फ़्रांस 24 के पत्रकार ने हस्तक्षेप करते हुए प्रोफ़ेसर दिव्या द्विवेदी से पूछा कि भारत ही एकमात्र स्थान नहीं है जहाँ भेदभाव मौजूद है। इस पर प्रोफ़ेसर दिव्या ने कहा, “भारतीय आबादी का 90 प्रतिशत हिस्सा पिछले 3000 वर्षों से नस्लीय उत्पीड़न, बहिष्कार और यहाँ तक ​​कि हिंदू धर्म के रूप में झूठे वर्चस्व का सामना कर रहा है और यही वह भारत है जिसे हम अब कलंकित होते हुए देख रहे हैं… यहाँ तक ​​कि आगे भी यही हाल रहने वाला है। इस सम्मेलन में लोगो के रंग में भी सत्तारूढ़ दल के रंगों का वर्चस्व है।”
द्विवेदी ने भाजपा और आरएसएस के प्रति अपनी घृणा का प्रदर्शन करते हुए कहा, “आरएसएस, जो कि भाजपा का मूल संगठन है, न केवल एक फासीवादी संगठन है बल्कि देश के उच्च जाति वर्चस्ववादी हितों को संरक्षण देता है।”

दिव्या द्विवेदी और उनकी हिंदू विरोधी कट्टरता

दिव्या द्विवेदी एक सहायक प्रोफेसर हैं जो आईआईटी-दिल्ली में दर्शन और साहित्य पढ़ाती हैं। उन्होंने मोहनदास करमचंद गाँधी पर एक किताब का सह-लेखन भी किया है। हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति उनकी गहरी नफरत पिछले कई मौकों पर प्रदर्शित हुई है।

हिंसाग्रस्त फ्रांस में योगी मॉडल की मांग, जर्मनी के प्रो जॉन ने कहा 24 घंटे में बंद हो जाएंगे दंगे

भारत में मोदी-योगी का जितना विरोध हो रहा है, लेकिन विदेशों में इन दोनों का कहीं अधिक गुणगान हो रहा है।

उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल की चर्चा अब विदेशों में भी होने लगी है। फ्रांस में एक किशोर की हत्या के बाद से हिंसा का दौर जारी है। पेरिस में हजारों की संख्या में हिंसक प्रदर्शनकारी तोड़फोड़ और आगजनी कर रहे हैं। उपद्रवी मकानों, दुकानों, सरकारी दफ्तरों और गाड़ियों को आग के हवाले कर रहे हैं। ऐसे में अब यूरोप में भी योगी मॉडल को लाने की मांग उठने लगी है। लोग कहने लगे हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को फ्रांस में भेज दिया जाए, वे 24 घंटे में दंगों को शांत कर देंगे। यूरोप के जाने माने डॉक्टर और प्रोफेसर एन.जॉन कैम ने ट्वीट करते हुए कहा है कि भारत को फ्रांस दंगे को नियंत्रित करने के लिए योगी आदित्यनाथ को वहां भेजना चाहिए। वो 24 घंटे के भीतर ऐसा कर देंगे।

इसके साथ ही जर्मनी के विख्यात ह्रदय रोग विशेषज्ञ प्रो. एन जॉन कैम ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बुलडोजर के साथ एक कार्टून वाली फोटो पोस्ट करते हुए लिखा कि भारत में शासन करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का एकमात्र तरीका यही है। बाकी सब बकवास है।

प्रो. एन जॉन कैम के यह ट्वीट करते ही सोशल मीडिया में योगी मॉडल की चर्चा शुरू हो गई। लोग फ्रांस हिंसा और योगी मॉडल को लेकर तरह-तरह के कमेंट्स कर रहे हैं।

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