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उत्तर प्रदेश : Love Jihad Law: राष्ट्रविरोधी ताकतों की संगठित साजिशों को रोकने के लिए हुआ बदलाव, लव जिहाद पर अब उम्रकैद, धर्म परिवर्तन-फंडिंग पर दोगुनी सजा


देशभर के कई राज्यों में चल रहा लव जिहाद भोली-भाली हिंदू युवतियों को प्रलोभन, लालच देकर प्रेम के जाल में फंसाने, मुस्लिम आबादी बढ़ाने और धर्मांतरण को बढ़ावा देने की सुनियोजित साजिश है। वास्तव में लव जिहाद आतंकवाद का ही दूसरा महीन चेहरा है। यह हिंदू बेटियों पर अंतहीन अत्याचार, उनके धर्मांतरण और जिहाद की जुगुत्सा का बेहद वीभत्स और जीवंत चेहरा है। इसी के चलते उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने ‘लव जिहाद’ के मामलों पर लगाम कसने के लिए बेहद सख्त कदम उठाया है। यूपी विधानसभा में ‘लव जिहाद रोकथाम’ का बिल पास कर दिया गया है। अब पूरे प्रदेश में धोखे से या बलपूर्वक कराए गए मतांतरण के मामलों में कानून और सख्त किया है। इस कानून के तहत दोषियों को कड़ी सजा का भी प्रावधान है। यूपी में अब लव जिहाद के दोषियों को पहली बार उम्रकैद तक की सजा होगी। यूपी विधानसभा में मानसून सत्र के पहले दिन उप्र विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक-2024 पेश किया गया था। अवैध मतांतरण की गंभीर घटनाओं की रोकथाम के लिए सरकार ने कानून का दायरा और सजा की अवधि बढ़ाई गई है। देशभर में 10 राज्यों में जबरन धर्मांतरण विरोधी कानून लागू हैं।

यूपी में अवैध धर्मांतरण और लव जिहाद की घटनाओं पर लगेगी रोक

यूपी विधानसभा में मानसून सत्र के पहले दिन पेश उप्र विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक-2024 को पास कर दिया गया है। इसके तहत उत्तर प्रदेश में रहने वाली किसी महिला को अपने जाल में फंसाकर धर्मांतरण कराकर उत्पीड़न की घटना यानी ‘लव जिहाद’ के दोषियों को पहली बार उम्रकैद तक की सजा होगी। अवैध मतांतरण की गंभीर घटनाओं की रोकथाम के लिए सरकार ने कानून का दायरा और सजा की अवधि बढ़ाई है। यूपी विधानसभा में एंटी लव जिहाद का बिल पास कर दिया गया है। अब पूरे प्रदेश में धोखे से या बलपूर्वक कराए गए धर्मांतरण के मामलों में कानून और सख्त हो गया है।

क्या है ‘लव जिहाद रोकथाम’ बिल और सजा का प्रावधान

इस बिल के तहत अब अगर कोई व्यक्ति धर्मांतरण कराने की नीयत से किसी व्यक्ति को उसके जीवन या संपत्ति के लिए धमकाता है, हमला करता है, विवाह या विवाह करने का वादा करता है अथवा षड्यंत्र करता है, नाबालिग, महिला या किसी व्यक्ति की तस्करी करता है तो उसके अपराध को सबसे गंभीर श्रेणी में रखा जाएगा। ऐसे मामले में आरोपित को कम से कम 20 वर्ष कारावास या आजीवन कारावास तक की सजा व जुर्माने से दंडित किया जाएगा। न्यायालय पीड़ित के इलाज के खर्च और पुनर्वास के लिए धनराशि जुर्माने के रूप में तय कर सकेगी। गंभीर अपराधों की भांति अब कोई भी व्यक्ति धर्मांतरण के मामले में भी एफआइआर दर्ज करा सकेगा। पहले धर्मांतरण से पीड़ित व्यक्ति, उसके स्वजन अथवा करीबी रिश्तेदार की ओर से ही एफआइआर दर्ज कराने की व्यवस्था की गई थी। यदि कोई धर्म परिवर्तन के लिए किसी व्यक्ति के जीवन या संपत्ति को भय में डालता है, हमला या बल प्रयोग करता है, शादी करने का झूठा वादा करता है, प्रलोभन देकर किसी नाबालिग, महिला या व्यक्ति की तस्करी करता है, तो उसे न्यूनतम 20 साल की सजा होगी। इसे ताउम्र तक बढ़ाया जा सकेगा।

उत्तर प्रदेश में पहली बार 2020 में बना था लव जिहाद कानून

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने साल 2020 में लव जिहाद के खिलाफ पहली बार कानून बनाया था। इसके बाद भी लव जिहाद के मामलों में कोई खास कमी नहीं आई। क्योंकि कट्टरपंथी और ट्रेंड युवक भोली-भाली हिंदू लड़कियों को प्रेमजाल में फंसाने का कुचक्र रच रहे थे। इसे देखते हुए कानून को और सख्त बनाने का फैसला हुआ। अब इस कानून को और सख्त करने के लिए विधानसभा में अध्यादेश पेश किया गया। अब तक इस कानून के तहत दोषी पाए जाने वाले को 10 साल की सजा का प्रावधान किया गया था। लव जिहाद के खिलाफ योगी सरकार के विधेयक के तहत सिर्फ शादी करने के लिए अगर धर्म बदला जाता है तो ये अमान्य माना जाएगा। इसके साथ ही इस मामले में धोखा में रखकर या फिर झूठ बोलकर धर्म परिवर्तन किया जाता है तो इसे अपराध माना जाएगा। अगर कोई स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है तो ऐसी स्थिति में उसे 2 महीने पहले मजिस्ट्रेट को इस बारे में सूचना देनी होगी। इसमें आजीवन कारावास और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। साथ ही, विदेशों से धर्म परिवर्तन के लिए होने वाली फंडिंग पर अंकुश लगाने के लिए भी सख्त प्रावधान किए गये हैं।

 यूपी के अलावा इन राज्यों में जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून हैं

उत्तर प्रदेश एकलौता राज्य नहीं है जहां जबरन धर्मांतरण विरोधी कानून है। जबरन धर्म परिवर्तन विरोधी कानून अभी तक देशभर में 10 राज्यों में लागू हो चुका है। उत्तर प्रदेश के साथ उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा, गुजरात, झारखंड, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और ओडिशा में ये कानून हैं। पिछले साल अगस्त में महाराष्ट्र जबरन धर्मांतरण के खिलाफ कानून लाने का एलान किया था। महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि राज्य अन्य राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों का अध्ययन कर रहा है और जल्द ही एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लेकर आएगा। यूपी सरकार ने इससे पहले नवंबर 2020 में इसके लिए अध्यादेश जारी किया था। इसके बाद फरवरी 2021 में उत्तर प्रदेश विधानमंडल के दोनों सदनों से विधेयक पारित किया गया और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम-2021 को कानूनी रूप में मान्यता मिली थी।
जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून में क्या नए बदलाव किए हैं?
योगी सरकार का मानना है कि गुमराह कर शादी करने और अनुसूचित जाति व जनजाति (एससी- एसटी) के जबरन धर्म परिवर्तन के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इन्हीं मामलों पर राज्य सरकार अंकुश लगाने जा रही है। बदलाव के लिए लाए गए इस विधेयक में जबरन धर्म परिवर्तन से जुड़े अपराधों में सजा की अवधि को बढ़ाने का प्रावधान है। नए प्रावधानों के अनुसार यदि किसी नाबालिग, दिव्यांग अथवा मानसिक रूप से दुर्बल व्यक्ति, महिला, एससी-एसटी का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जाता है, तो दोषी को आजीवन कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने से दंडित किया जा सकेगा। इसी तरह, सामूहिक रूप से जबरन धर्म परिवर्तन पर भी आजीवन कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा होगी। विदेशी या गैरकानूनी संस्थाओं से फंडिंग हासिल करने पर 14 वर्ष तक की सजा और 10 लाख जुर्माने का प्रावधान किया है।
राष्ट्रविरोधी ताकतों की संगठित साजिशों को रोकने के लिए हुआ बदलाव
सरकार के मुताबिक, यह संशोधन विधेयक जबरन धर्म परिर्वतन के अपराध की संवेदनशीलता और गंभीरता के मद्देनजर लाया गया है। इससे विदेशी एवं राष्ट्रविरोधी ताकतों की संगठित साजिश रोकी जा सकेगी। सजा और जुर्माने की राशि को बढ़ाने के साथ जमानत की कड़ी शर्तों के प्रावधान भी किए गए हैं। साथ ही, नाबालिग, दिव्यांग, मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों को भी अपराध का शिकार होने से बचाया जा सकेगा। आरोप सिद्ध होने पर दोषी को पीड़ित के इलाज और पुनर्वास के लिए भी जुर्माना देना होगा। इस नए कानून में कड़े प्रावधानों के चलते प्रदेश में लव जिहाद के मामलों पर अंकुश लगेगा और भोली-भाली लड़कियां ट्रेंड मुस्लिम युवाओं के चंगुल में फंसने से बच सकेंगी।
देशभर में लव जिहाद की श्रद्धा वालकर, साक्षी, सीमा गौतम, अनामिता, यशोदा, रबिता पहाड़िन, तनिष्का शर्मा और टिक-टॉक स्टार शिवानी जैसी सैकड़ों हिंदू लड़कियों की कहानियां हैं। आइए, आइए…अब जानते हैं देश भर से कुछ ऐसी डराने और हैरान कर देने वाली सच्ची कहानियां के बारे में, जिनमें मुस्लिम समुदाय के लोगों ने बहला-फुसलाकर, प्रलोभन देकर, अपने प्रेम जाल में हिंदू नाबालिग बेटियों को, युवतियों को और महिलाओं को फंसा लिया। इसके बाद वे अपने असली एजेंडे पर आए और हिंदू बेटियों का धर्मांतरण करने लगे। अपनी इन साजिशों में सफल न हो पाने पर कई बेटियों के साथ ज्यादती की और यहां तक की उनका निर्ममता से कत्ल तक कर दिया।

भारत और फ्रांस के चुनावों में समानता; दोनों ही देशों में देश-विरोधियों ने अरबों रूपए लुटाया

भारत में हुए लोकसभा चुनाव फ्रांस में हुए चुनाव से काफी मिलते जुलते हैं। लेकिन लोगों को भारत-फ्रांस के चुनाव में जॉर्ज सोरोस का क्या रोल रहा है, भलीभांति पता चलता है। चुनावों के दौरान चर्चा भी थी कि भारत विरोधी विदेशी ताकतें मोदी सरकार को हटाने अरबों रूपए खर्च कर रही हैं। मोदी सरकार के चलते CAA विरोध से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन तक सभी विदेशी चंदा या कहा जाए कि भीख पर हुए हैं। जिसने फिर यह साबित किया कि भारतीय लालची हैं, पैसा फेंको और देश को खतरा में डलवा दो। भारत विरोधियों ने भारतीयों की नब्ज अच्छी तरह पकड़ी हुई है। हिन्दु को जातपात और मुसलमानो को इस्लाम का डर दिखाकर भड़काते रहो। भारत में मुग़ल राज आया लालची जयचन्द और ब्रिटिश राज आया लालची मीर ज़ाफरों की वजह से। लेकिन क्या मिला इन्हे? जिस लालच में देश से बग़ावत की, उसका 0000000% भी नहीं। जब कालचक्र घुमेगा ठीक वही हालत विदेशी भीख पर नाचने वालों का होने वाला है। फिर भी विपक्ष इतिहास से शिक्षा नहीं लेता फिर तो भगवान ही मालिक है।  

फ्रांस से संसदीय चुनाव के दूसरे व अंतिम चरण में वामपंथी गठबंधन ने आश्चर्यजनक जीत हासिल की। ओपनियन पोल्स में दक्षिणपंथी गठबंधन की जीत का अनुमान लगाया गया था। डेढ़ हफ्ते पहले हुए प्रथम चरण के चुनाव में दक्षिणपंथी गठबंधन सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरा था। फ्रांस की राजधानी पेरिस की जिन सड़कों पर चहल-पहल रहती थी, वहां एक मुर्दा-शांति छाई हुई थी। दुकानों के शटर्स गिराए जा रहे थे। अलग-अलग इलाकों में पुलिस और सुरक्षाबलों के दस्ते तैनात किए जा रहे थे। आशंका थी कि फसाद हो सकता है। 28 साल का दक्षिणपंथी नेता प्रधानमंत्री बनने की तैयारी कर रहा था. उसने विजय भाषण भी तैयार कर लिया था. फ्रांस में संसदीय चुनाव के परिणाम आने वाले थे। फिर कुछ घंटे बीते। उस 28 साल के धुर दक्षिणपंथी नेता का विजय भाषण धरा का धरा रह गया। एग्जिट पोल्स के प्रोजेक्शन में वामपंथी गठबंधन को आगे बताया गया। रिजल्ट भी इन्हीं प्रोजेक्शन के अनुरूप आया। 

फ्रांस में धुर-वामपंथी गठबंधन को आश्चर्यजनक जीत हासिल हुई। हफ्ते भर पहले ही उस 28 साल के नेता की पार्टी इन चुनावों के पहले चरण में देश के भीतर ही सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी थी। और इसके भी 3 हफ्ते पहले हुए यूरोपीय संसद के चुनाव में भी इस पार्टी ने सबको पीछे छोड़ दिया था। इस दक्षिणपंथी पार्टी का नाम है- नेशनल रैली। आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस नेशनल रैली को ओपिनियन पोल्स में फ्रांस में सरकार बनाने का सबसे बड़ा दावेदार बताया जा रहा था, वो पिछड़कर तीसरे नंबर पर आ गई? एक हफ्ते के अंदर उसके विपक्षियों ने ऐसे क्या समीकरण बनाए? और अब आगे की राह क्या है? थोड़ा फ्रांस के संसदीय चुनाव के दूसरे और अंतिम चरण के परिणाम जान लेते हैं, फ्रांस की संसद में कुल 577 सीटें हैं, बहुमत के लिए 289 सीटों की जरूरत होती है। इन 577 सीटों में से वामपंथी गठबंधन को 182 सीटे मिलीं।मध्यमार्गी गठबंधन को 168 सीटें, दक्षिणपंथी गठबंधन को 143 सीटें मिलीं। 

मतलब, इन चुनावों में किसी भी गठबंधन को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। हालांकि, वामपंथी गठबंधन के इस प्रदर्शन पर ना केवल फ्रांस के लोगों का एक बड़ा हिस्सा खुशियां मना रहा है, बल्कि दुनियाभर में वामपंथ की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल और प्रमुख नेता भी खुश हैं। खुशी इस बात की भी है कि इस गठबंधन ने केवल एक हफ्ते के समय में एक नई राजनीतिक इबारत लिख दी। वो भी उस देश में जो यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। वो भी उस यूरोप में जहां बीते कुछ सालों में दक्षिणपंथ का बहुत तेजी से उभार हो रहा था। फ्रांस में दक्षिणपंथ को रोकने का श्रेय केवल वामपंथ को नहीं जाता, बल्कि एक बड़ा हिस्सा मध्यमार्गी गठबंधन का भी है। जिसे हम पश्चिम बंगाल में मध्यमार्गी भद्रलोक हिन्दू कहते हैं। इसमें बड़ा हिस्सा सिविल सोसाइटी के उन लोगों का भी है, जो लगातार डटे रहे। इस पूरी कहानी को समझने के लिए दो चुनाव परिणामों की बात करते हैं। फ्रांस में दक्षिणपंथ का प्रभुत्व 30 जून को फ्रांस के संसदीय चुनाव 2024 के पहले चरण के परिणाम आए थे। दक्षिणपंथी नेशनल रैली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। पार्टी ने अकेले ही लगभग 30 फीसदी वोट हासिल कर लिए थे। उसने पहले ही राउंड में 37 सीटें जीत ली थीं। उसके नेतृत्व वाले गठबंधन को लगभग 34 फीसदी वोट मिले थे। वहीं वामपंथी गठबंधन न्यू पॉपुलर फ्रंट (NPF) लगभग 29 फीसदी वोट और 32 सीटें लाकर दूसरे नंबर पर रहा था। इधर, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का सत्ताधारी मध्यमार्गी गठबंधन लगभग 22 फीसदी वोट और 2 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर आ गया था।

अब 9 जून की तारीख, इस दिन यूरोपीय संसद के चुनाव नतीजे आए थे। इन चुनावों में भी नेशनल रैली फ्रांस के भीतर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, पार्टी ने 30 सीटें हासिल कीं। वहीं राष्ट्रपति मैक्रों का गठबंधन 13 सीटों पर सिमट गया। इन्हीं नतीजों को देखते हुए फ्रांस के राष्ट्रपति ने देश में समय से पहले संसदीय चुनाव कराने की घोषणा कर दी थी, जो पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। सभी दल और गठबंधन तैयारियों में जुट गए। इमैनुएल मैक्रों ने एक तरह से 9 जून को फ्रांस के लोगों से सवाल पूछा कि क्या वह चाहते हैं की दक्षिणपंथी गठबंधन देश की सरकार चलाए? 7 जुलाई को इसका जवाब 'ना' में मिला। हालांकि, 30 जून को आए परिणामों ने दक्षिणपंथ विरोधियों को चिंता में डाल दिया था। इसी के चलते कुछ बड़े कदम उठाए गए और दक्षिणपंथ को सत्ता तक पहुंचने से रोका गया। 

दक्षिणपंथ को रोकने की ये कहानी शुरू हुई 30 जून को पहले चरण के चुनाव परिणाम आने के बाद से। एक दूसरे के विरोधी रहे वामपंथी और मध्यमार्गी दलों ने गठजोड़ बनाने के प्रयास तेज कर दिए गए। गठजोड़ बना, जिसे नाम दिया गया रिपब्लिकन फ्रंट। जिस तरह भारत में चुनाव से पहले I.N.D.I. गठबंधन बना। वैसे, फ्रांस की राजनीति में इस तरह के गठजोड़ पहले भी बन चुके थे। इसलिए रिपब्लिकन फ्रंट को उम्मीद थी कि उनके गठजोड़ को सफलता मिलेगी। इस गठजोड़ ने कैसे सफलता पाई, इसे समझने के लिए फ्रांस में संसदीय चुनाव होते कैसे हैं, ये जानना जरूरी है। फ्रांस में संसदीय चुनाव दो चरणों में होते हैं। पहले चरण में अगर किसी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से ज्यादा मिल जाते हैं तो उसका चुनाव सीधे हो जाता है। इस बार के पहले चरण में 76 उम्मीदवारों का चुनाव इसी तरह हुआ। वहीं, पहले चरण में अगर किसी उम्मीदवार को 50 फीसदी से ज्यादा मत नहीं मिलते हैं तो फिर उस सीट के उम्मीदवार दूसरे चरण में पहुंचते हैं। यहां पर वो सभी उम्मीदवार चुनाव में हिस्सा ले सकते हैं, जिन्हें पहले चरण में 12.5 फीसदी से ज्यादा मत हासिल हुए हैं। ऐसे में दूसरे चरण में कई सीटों पर कई बार दो से ज्यादा उम्मीदवार भी चुनाव लड़ते हुए नजर आते हैं। दूसरे चरण में इन उम्मीदवारों में से जिस किसी को भी सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, उसे संसद के लिए चुन लिया जाता है। तो वामपंथी और मध्यमार्गी दलों ने इसी दूसरे चरण के लिए रणनीति बनाई थी। इस गठजोड़ के नेताओं ने कहा कि नेशनल रैली लोगों में भेद करती है। यह फ्रांसीसी क्रांति और देश के संविधान के बराबरी वाले सिद्धांत के खिलाफ है। इन नेताओं ने नेशनल रैली को लोगों के बीच इस तरह से पेश किया कि यह उन मूल्यों और सिद्धातों के खिलाफ है, जिनकी बुनियाद पर फ्रांस का निर्माण हुआ है।चुनाव प्रचार के दौरान मध्यमार्गी गठबंधन के एक प्रमुख नेता और देश के प्रधानमंत्री गैब्रियल अटाल ने कहा, "हमें नेशनल रैली को बहुमत तक पहुंचने से रोकने की जरूरत है। क्योंकि अगर ऐसा होता है तो मैं ये कह सकता हूं कि यह हमारे देश के लिए एक त्रासदी होगी।" इसी तरह धुर-वामपंथी दल LFI के एक प्रमुख नेता फ्रांसोइस रुफिन ने कहा, "आज हमारा बस एक ही उद्देश्य है। नेशनल रैली को पूर्ण बहुमत से रोकना।" 

इधर, सिविल सोसाइटी के लोगों ने भी नेशनल रैली के खिलाफ मोर्चा खोला। दुष्प्रचार किया कि ये पार्टी प्रवासियों के खिलाफ नफरत फैलाती है। इसके नेता मुसलमानों और यहूदियों के खिलाफ हेट स्पीच देते हैं, नस्लवादी भाषण देते हैं। वामपंथी और मध्यमार्गी गठबंधनों ने पहले चरण का चुनाव अलग-अलग लड़ा था। वामपंथी गठबंधन में LFI के साथ-साथ फ्रांस की सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियां भी शामिल हैं। फ्रांस की ग्रीन पार्टी भी इस गठबंधन का हिस्सा है। इधर, मध्यमार्गी गठबंधन में फ्रांस की मध्यमार्गी और दक्षिणपंथी-मध्यमार्गी पार्टियां शामिल हैं। इन दोनों गठबंधनों ने ऐतिहासिक तौर पर नीतिगत स्तर पर एक दूसरे का तीखा विरोध किया है। साल 2017 में इमैनुएल मैक्रों के राष्ट्रपति बनने के बाद से ये तीखा विरोध जारी रहा। हालांकि, इस संसदीय चुनाव के पहले चरण के बाद यह तय हुआ कि इन विरोधों को किनारे रखा जाए और धुर दक्षिणपंथ का विरोध किया जाए। क्योंकि पहले चरण में एक दूसरे के विरोध में चुनाव लड़ने के चलते वामपंथी मध्यमार्गी गठबंधनों के उम्मीदवार कई सीटों पर दूसरे और तीसरे नंबर पर रहे। इन उम्मीदवारों ने धुर-दक्षिणपंथी विरोधी वोट बांट दिया। ऐसे में तय हुआ कि दूसरे चरण में बची 501 सीटों पर उस गठबंधन के उम्मीदवार को ही चुनाव में उतारा जाएगा, जिसके नेशनल रैली के उम्मीदवार के खिलाफ जीतने की संभावना सबसे अधिक हो। दूसरे चरण के चुनाव से पहले कुल 221 उम्मीदवारों ने अपना नाम वापस ले लिया। इनमें से 83 उम्मीदवार मध्यमार्गी गठबंधन के थे और 132 वामपंथी गठबंधन के। दोनों गठबंधनों ने नेशनल रैली विरोधी वोट को एक-दूसरे को ट्रांसफर कराने का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया। मसलन, अगर पहले चरण में किसी सीट पर नेशनल रैली के उम्मीदवार को 40 फीसदी वोट मिले और वामपंथी एवं मध्यमार्गी गठबंधन के उम्मीदवारों को 35 और 25 फीसदी वोट, तो दूसरे चरण में मध्यमार्गी उम्मीदवार रेस से हट गया और अपने 25 फीसदी वोट वामपंथी उम्मीदवार को ट्रांसफर करने की अपील कर दी। इस रणनीतिक गठबंधन का ही रिजल्ट 7 जून को सामने आया। पहले चरण में जिस धुर-दक्षिणपंथी गठबंधन को लगभग 34 फीसदी वोट मिले थे, वो लगभग 25 फीसदी पर आ गया. वहीं वामपंथी गठबंधन का मत प्रतिशत 29 से बढ़कर लगभग 33 हो गया। इधर, राष्ट्रपति मैक्रों के मध्यमार्गी गठबंधन को भी फायदा हुआ। पहले राउंड में इस गठबंधन को लगभग 22 फीसदी वोट मिले थे, जो दूसरे राउंड में बढ़कर लगभग 28 प्रतिशत हो गए. तो ये थी पूरी कहानी।

फिलहाल फ्रांस के वामपंथी और मध्यमार्गी गठबंधनों ने धुर-दक्षिणपंथ को सत्ता तक तो पहुंचने से रोक लिया है। लेकिन अब उनके सामने एक नई चुनौती खड़ी है। गठबंधन एक दूसरे का तीखा विरोध करते रहे हैं। नीतिगत मामलों पर इनकी सहमति नहीं बन पाई है। ऐसे में, विशेषज्ञों का कहना है कि इनका मिलकर सरकार चलाना बहुत मुश्किल होगा। फिलहाल इन दोनों गठबंधनों के नेता बयानबाजी कर रहे हैं। कुछ बयानबाजियां ऐसी हैं जिनसे दूरी बढ़ सकती है, तो कुछ एक-दूसरे के साथ आने का आह्वान कर रही हैं। इस बीच बात ये भी चल रही है कि ऐसी भी सरकार बनाई जा सकती है जो टेक्नोक्रैटिक हो, जिसमें इन गठबंधनों के खांटी नेता ना शामिल हों। जो भी हो, फ्रांस की राजनीति के लिए अगले कुछ महीने बहुत उथल-पुथल भरे होने वाले हैं। और इसी बीच वामपंथी फ्रांसीसी गठबंधन ने अमीरों पर 90% कर लगाने का आह्वान किया है। धन कर के कारण अधिक कमाई करने वाले लोग देश छोड़कर भागने पर विचार कर रहे हैं, जिससे फ्रांस में आर्थिक मंदी का खतरा पैदा हो गया है। फ्रांस के वामपंथी न्यू पॉपुलर फ्रंट NPF - जो अब संसद में सबसे बड़ा समूह है - ने एक ऐसे प्रधान मंत्री की मांग की है जो नए धन कर सहित उसके विचारों को लागू करेगा। क्या भारत में भी ऐसा नहीं हुआ था?


बिल्कुल हुआ था लेकिन भारत में मोदी है इसलिए उनके इरादों को मोदी ने मुमकिन नहीं होने दिया इसीलिए तो कहते हैं कि मोदी है तो मुमकिन है

कोर्ट में “राजनीतिक प्रवचन” नहीं चलते, अभिषेक मनु सिंघवी के सभी दाव औंधे पड़े; मोटी खाल वाले केजरीवाल को सुरक्षा एजेंसियों को भी रिमांड पर लेना चाहिए

सुभाष चन्द्र

दिल्ली हाई कोर्ट के केजरीवाल की गिरफ़्तारी को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते ही अभिषेक मनु सिंघवी दौड़े सुप्रीम कोर्ट CJI चंद्रचूड़ जी की शरण में कि तुरंत सुनवाई कीजिए लेकिन उन्होंने उसे याचिका दायर करने का तरीका समझा दिया और आज सुनवाई के लिए बेंच तय कर दी जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की। 

जिस हाई कोर्ट ने केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था, उसी कोर्ट के सामने ED द्वारा की गई गिरफ़्तारी को चुनौती देना सिंघवी की कोई समझदारी नहीं थी। उसे समझ नहीं आया कि अपने फैसले में जो बिंदुवार टिप्पणियां हाई कोर्ट ने की, वो बहुत Damaging थीं जिससे केजरीवाल का केस और कमजोर हो गया।

फिर भी कमजोर पड़े केस को न जाने क्या सोच कर सिंघवी सुप्रीम कोर्ट ले गए और वहां भी वही घिसी पिटी दलील रखी कि चुनाव में हमें प्रचार से रोका जा रहा है, हमारी याचिका तुरंत सुनी जाए। जस्टिस खन्ना ने सिंघवी की एक नहीं सुनी और बड़े कायदे से उसकी ऐसी तैसी कर दी कि जो याचिका में आपकी दलीले हैं हमने पढ़ ली हैं लेकिन उस पर ED का जवाब भी लेना होगा जिसके बिना सुनवाई हो ही नहीं सकती। 

ED को 24 अप्रैल तक का समय दिया जवाब देने के लिए और सिंघवी को 26 अप्रैल तक अगर कोई rejoinder देने हो। फिर 29 को सुनवाई करेंगे। यानी एक तरह सिंघवी को बता दिया गया कानून में सब बराबर हैं चाहे “दिल्ली का राजा” हो या कोई रंक हो।

Kejriwal is the 3rd most dangerous implant by a foreign agency on Indian soil  Explore the Deep Web of an IITian hand in glove with CIA and its Foundations Network....                    THIS POST IS DIABOLIC.... HOW DO WE MAKE EVERY CITIZEN OF DELHI AND PUNJAB REALIZE HOW DANGEROUS THIS MAN IS.... THIS VIDEO MUST BE MADE VIRAL.....

लेखक 
उधर Rouse Avenue कोर्ट में “दिल्ली के राजा” को वीडियो के जरिए पेश किया गया और कोर्ट ने न्यायिक हिरासत 23 अप्रैल तक के लिए बढ़ा दी।

“आप” के लोगों का दुष्प्रचार जम कर चल रहा है कि हमारी पार्टी के खिलाफ साजिश हो रही है, केजरीवाल को गिरफ्तार ही पार्टी को ख़त्म करने के लिए किया गया है। कोर्ट के फैसले आते ही शोर मचाते हैं भाजपा साजिश कर रही है। ईमानदार लोगों को जेल में डाला जा रहा है तो कौन राजनीति में आएगा।

आज भगवंत मान ने और शिगूफा छेड़ा है, उसने केजरीवाल से तिहाड़ में मिलने के बाद कहा है कि केजरीवाल के साथ Criminals की तरह बर्ताव किया जा रहा है, जो भी सुविधाएं Hard Core Criminals को मिलती हैं, वो भी केजरीवाल को नहीं दी जा रही। कुछ दिन पहले आपियों ने शोर मचाया था कि केजरीवाल का वजन 4 किलो कम हो गया। अब कोई पूछे कि तुमने वजन कैसे नाप लिया जेल में जा कर जबकि यह काम जेल कर्मचारी कर सकते हैं और उन्होंने पाया है कि उसका वजन एक किलो बढ़ा है।

एक ढोल और पीटते हैं “आप” वाले, केजरीवाल सरकार जेल से चलाएंगे। कानूनी पहलू छोड़िए, जो काम Practically होना नामुमकिन है, उस पर भी कोर्ट ध्यान नहीं दे रहा ये बात समझ से परे है। कोर्ट कहता है कि आज तक कोर्ट ने कोई मुख्यमंत्री को नहीं हटाया लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हटा ही नहीं सकता। कभी तो इस काम को शुरू किया जा सकता है।

अब तक मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा न देने के पीछे बहुत गहरा षड़यंत्र है। जिसका पर्दाफाश सिर्फ सुरक्षा जाँच एजेंसियां ही कर सकती है। आखिर जिस कांग्रेस की शिकायत पर घोटाले की जाँच हो रही है, उसी पार्टी का वरिष्ठ नेता केस की पैरवी करे बहुत कुछ चीख-चीख कर कह रही है। जिस पर गंभीरता से कोर्ट, ED, सीबीआई और राष्ट्रीय सुरक्षा जाँच एजेंसियों के अलावा अजित डोवाल को संज्ञान लेना होगा। केजरीवाल बहुत मोटी खाल का बना दिया गया है, आसानी से नहीं कबूलेगा। शराब घोटाले से ज्यादा संगीन मुद्दा देश की  सुरक्षा का है।   

आज तो केजरीवाल घोटाले के आरोप में जेल में है जो सरकार जेल से चलाने की जिद कर रहा है, कल को कोई मुख्यमंत्री “हत्या” के आरोप में जेल में हो, तो क्या वह भी जेल से सरकार चला सकता है, इसका जवाब भी अदालत को ढूंढना चाहिए। केजरीवाल को न हटा कर अदालत अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रही है (shirking from responsibility)।

पार्टी भी अच्छी तरह जानती है कि केजरीवाल तो बाहर नहीं आने वाला, लेकिन तिहाड़ जाने से पहले आतिशी मार्लेना, सौरभ भारद्वाज का नाम ले दिया, और कितने लोग गिरोह में शामिल है थर्ड डिग्री में ही कबूलेगा। आसानी से नहीं कबूलने वाला। आतिशी और सौरभ तो केवल प्यादा है। लेकिन हैं राजदार।  

केजरीवाल राम मंदिर का विरोध करता रहा पर हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ भी कराता रहा, राम मंदिर भी चले गए  लेकिन उसे पता नहीं समय के अनुसार राम की लाठी चलती है, प्रभु  सब नाटक समझते हैं। वो भूल गया उसने ही कहा था कि जो राम मंदिर किसी मस्जिद को गिरा कर बना हो तो उसमे नहीं जाना चाहिए। फिर भगवान को तुम्हारा वहां जाना कैसे स्वीकार होगा।