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बांग्लादेश, नेपाल के बाद अब फ़्रांस जलना शुरू; नेपाल में GenZ प्रदर्शन के पीछे दो किरदार, सुदन गुरुंग- प्लानर, बालेन शाह- प्रमोटर: NGO की आड़ में बड़ा खेल तो नहीं हो गया?


फ्रांस के संसदीय चुनावों में वामपंथी गठबंधन की बढ़त का संकेत देने वाले एग्जिट पोल के बाद राजधानी पेरिस समेत पूरे देश में हिंसा भड़क उठी है। रविवार को हुए दूसरे दौर के चुनावों के बाद फ्रांस की पहली कट्टर-दक्षिणपंथी सरकार बनने की कोशिशों को झटका लगा, जब एग्जिट पोल में वामपंथी गठबंधन को सबसे ज्यादा सीटें जीतने का अनुमान लगाया गया। पहले दौर में बढ़त बनाने वाली मरीन ले पेन की मुस्लिम विरोधी नेशनल रैली पार्टी को रविवार को हुए चुनाव के बाद तीसरे नंबर पर बताया गया है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की पार्टी को एग्जिट पोल में दूसरे नंबर पर बताया गया है। एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए और हिंसा शुरू कर दी।

देशभर में भेजी गई दंगा विरोधी पुलिस

वीडियो फुटेज में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों को सड़कों पर आग जलाते और उपद्रव करते हुए देखा गया है। हिंसा को देखते हुए देश भर में दंगा पुलिस पुलिस को भेजा गया है। फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांसीसी चुनाव के बाद आए एग्जिट पोल में वामपंथी गठबंधन की जीत की संभावना के बाद पेरिस में जश्न और हिंसा दोनों का माहौल बन गया। धुर-वामपंथी गठबंधन के अप्रत्याशित रूप से आगे निकलने की खबर पर हजारों लोग जश्न मनाने के लिए पेरिस के प्लेस डे ला रिपप्लिक में जमा हो गए। वहीं, इस खबर से सत्ता हासिल करने की उम्मीद कर रहे मरीन ले पेन की नेशनल रैली के समर्थन हैरान रह गए।

पुलिस ने किया आंसू गैस का इस्तेमाल

इस बीच फ्रांस के विभिन्न शहरों से हिंसा की खबरें आने लगीं। जगह-जगह पर प्रदर्शनकारियों की हिंसा के वीडियो सामने आए हैं। वहीं, दंगा विरोधी पुलिस भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश करती नजर आई। झड़पों के बीच कई जगह पर पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया है। ब्रिटिश टैबलायड द सन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यह पता नहीं चल पाया है कि बढ़ते तनाव के बीच सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारी किस दल के समर्थक है। इसके पहले यह आशंका जताई गई थी कि अगर दक्षिणपंथी जीत जाते हैं तो हिंसा भड़क सकती है।

पहले से तीसरे स्थान पर पहुंची नेशनल रैली

इसके पूर्व हुए पहले दौर के मतदान में एक तिहाई वोट के साथ जीत हासिल करने के बाद नेशनल रैली से संसदीय चुनाव में जीत की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन 7 जुलाई को हुए चुनाव के बाद एग्जिट पोल ने संकेत दिया कि न्यू पॉपुलर फ्रंट के बैनर तले वामपंथी दल 172 सीटें जीतेगा जबकि इमैनुएल मैक्रों की अगुवाई वाला एनसेंबल के 150 सीट जीतने का अनुमान लगाया गया। नेशनल रैली लगभग 132 के साथ तीसरे स्थान पर दिख रही थी।

प्रधानमंत्री ने दिया इस्तीफा

लेफ्ट फ्रंट की जीत की संभावना के बाद फ्रांस के प्रधानमंत्री गेब्रियल अटाल ने रविवार को खुलासा किया कि वह सोमवार सुबह राष्ट्रपि मैक्रों को अपना इस्तीफा सौंप देंगे। अटाल ने कहा, 'आज रात एनसेंबल ने अनुमानित सीटों की संख्या से तीन गुना सीटें जीती हैं, लेकिन हमारे पास बहुमत नहीं है। इसलिए मैं अपना इस्तीफा गणराज्य के राष्ट्रपति को सौंप दूंगा।'

नेपाल में GenZ प्रदर्शन के पीछे दो किरदार, सुदन गुरुंग- प्लानर, बालेन शाह- प्रमोटर

नेपाल में GenZ प्रदर्शन के दो किरदार बालेन शाह और सुदन गुरुंग
नेपाल में सबसे बड़े नागरिक आंदोलन ने सरकार को गिरा दिया है। देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति इस्तीफा दे चुके हैं। अब नेपाल को चलाने के लिए अपने अगले लीडर की जरूरत है। इस पूरे GenZ प्रदर्शन के पीछे दो किरदार सामने आ रहे हैं। पहला है काठमांडू का मेयर बालेन शाह, जिसे प्रदर्शनकारी अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। वहीं, दूसरा नाम प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले हामी नेपाल का फाउंडर सुदन गुरुंग का है।

ये दोनों नाम नेपाल में GenZ प्रदर्शनकारियों के समर्थन में सामने आए हैं। सुदन गुरुंग, जिसने पूरे प्रदर्शन का आयोजित किया। वहीं बालेन शाह, जिसने इन प्रदर्शनकारियों को भड़काया। तो आइए जानते हैं आखिर कौन है बालेन शाह और सुदन गुरुंग।

बालेन शाह की GenZ प्रदर्शन में भूमिका

बालेन शाह एक रैपर और काठमांडू का मेयर है। शाह ने ही नेपाल के युवाओं को बरगलाया और देश में सरकार के विरोध में खड़ा करने का काम किया। यह उसकी सोशल मीडिया पर सक्रियता से साफ नजर आता है। जहाँ युवा उसे अगला प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं।

तो ये शुरू होता हे रविवार (07 सितंबर 2025) से जब बालेन शाह ने फेसबुक पर एक पोस्ट के जरिए GenZ प्रदर्शन का समर्थन किया। पोस्ट में लिखा, “कल स्पष्ट रूप से GenZ का स्वतःस्फूर्त आयोजन है, वे 28 वर्ष से कम आयु के हैं, जिसके कारण मैं अभी भी बड़ा दिखता हूँ। मैं उनकी इच्छाशक्ति, उद्देश्य और सोच को भी समझना चाहता हूँ।”

                                                          बालेन शाह के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

आगे लिखा, “कल होने वाली इस स्वतःस्फूर्त रैली में किसी भी दल, नेता, कार्यकर्ता, सांसद, बहुला, इंजीनियर को अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए होशियार नहीं होना चाहिए। मैं आयु सीमा के कारण नहीं जा सकता लेकिन उन्हें समझना जरूरी है, मेरा पूरा समर्थन है। प्रिय GenZ, मुझे बताइए कि आप कैसा देश देखना चाहते हैं?”

इसके बाद सोमवार (08 सितंबर 2025) को नेपाल की राजधानी काठमांडू समेत 7 से अधिक शहरों में 13 से 28 साल की उम्र के युवा सोशल मीडिया ऐप के बैन के खिलाफ सड़कों पर उतरते हैं। सोशल मीडिया ऐप के खिलाफ शुरू हुआ प्रदर्शन अब पीएम केपी ओली के इस्तीफे की माँग तक पहुँच जाता है। इस हिंसक प्रदर्शन में 19 लोगों की मौत और 300 से ज्यादा लोग घायल हो जाते हैं।

लेकिन यह प्रदर्शन तब भी नहीं थमता बल्कि और अधिक हिंसा की ओर बढ़ जाता है। प्रदर्शन के दूसरे दिन मंगलवार (09 सितंबर 2025) को प्रधानमंत्री केपी ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल तक इस्तीफा दे देते हैं। अब बारी आती है बालेन शाह की। अब बालेन को प्रधानमंत्री बनाने की माँग बढ़ती चली जाती है।

बालेन शाह के फेसबुक पोस्ट पर ‘We want you as PM’ और ‘Please take Lead Balen’ जैसे कमेंट बढ़ने लगते हैं।

                                                        बालेन शाह की फेसबुक पोस्ट पर नेपाली युवाओं के कमेंट

इसके बाद नेपाल की स्थानीय मीडिया में भी बालेन शाह को नेपाल का अगला प्रधानमंत्री बनाने की माँग तेज होने लगती हैं। वहीं बालेन शाह भी GenZ प्रदर्शनकारियों को देश की संपत्ति को नुकसान ना पहुँचाने की अपील करते हैं।

                                          बालेन शाह के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

बालेन शाह ने लिखा, “प्लीज GenZ, देश तुम्हारे हाथ में है। तुम लोग इसे संभाल लोगे। अब, चाहे कितना भी नुकसान हो, तुम हमारे ही रहोगे। अब घर वापस जाओ।”

बालेन शाह के अमेरिका से कनेक्शन

बालेन शाह यूँ तो काठमांडू के मेयर हैं लेकिन अधिकांश मेयर से विपरीत उनकी पहुँच राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैली है। बालेन शाह के अमेरिका से सीधे कनेक्शन सामने आए हैं। टाइम मैगजीन 2023 के टॉप-100 लोगों में बालेन शाह का नाम है। इसके अलावा द न्यूयॉर्क टाइम्स में मीडिया कवरेज भी मिल चुकी है।

इतना ही नहीं बालेन का नेपाल में अमेरिकी दूतावास में आना-जाना लगा रहता है। साल 2022 में पहली बार अमेरिकी राजदूत आर थॉम्पसन से मुलाकात की, जिनकी तस्वीरें खुद राजदूत ने अपने एक्स अकाउंट पर शेयर की।

इसके बाद साल 2024 में भी बालेन शाह की अमेरिकी राजदूत आर थॉम्पसन से मिलने की खबरें सामने आईं। इस बैठक में अमेरिकी राजदूत ने बालेन शाह को अमेरिका आने का भी न्यौता दिया था।

ओली सरकार के विरोध में बालेन शाह के गाने

बालेन शाह को राजनीति में आने से पहले रैपर के तौर पर जाना जाता था। उनके गाने के बोल अक्सर नेपाल की ओली सरकार की आलोचना को लेकर लिखे जाते रहे हैं। बालेन शाह के ही एक गाने के बोल हैं- “देश की रक्षा करने वाले सब मूर्ख हैं। सारे नेता चोर हैं, देश को लूटकर खा रहे हैं।”

बालेन शाह के गानों ने ही नेपाल के GenZ को सरकार के खिलाफ खड़ा करने का काम किया। खासकर बालेन का गाना ‘बलिदान’ से नेपाल के युवा देश की राजनीति के विरोध में खड़े हुए है। हालिया GenZ प्रदर्शन में भी बालने ने इस गाने को फेसबुक पर शेयर किया।

इस गाने को फेसबुक पर शेयर करते हुए बालेन शाह ने लिखा, “सरकार मुझे बोलने दे।”

मेयर का चुनाव लड़ते हुए बालेन शाह का विवादों में रहा, जब शाह ने काले ब्लेजर पर नेपाल का झंडा लगाते हुए चुनावी अभियान शुरू किया। इस मामले में बालेन के खिलाफ चुनाव आयोग से शिकायत की गई थी। इसके बावजूद शाह की लोकप्रियता युवाओं में बढ़ती गई। युवा भी शाह के सरकार विरोधी एजेंडे में फँसते चले गए, जिसका नतीजा आज नेपाल की सरकार गिराकर सामने आया है।

बालेन शाह भी भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने में आगे रहे हैं। याद हो कि आदिपुरुष फिल्म की रिलीज के समय बालेन शाह ने न सिर्फ इस फिल्म का विरोध किया, बल्कि काठमांडू के सिनेमाघरों में भारतीय फिल्मों की रिलीज तक पर रोक लगा दी थी। हालाँकि नेपाल के सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बालेन को पीछे हटना पड़ा था। अब इस समय GenZ के प्रदर्शनों को भी बालेन शाह खूब भुना रहे हैं।

‘हामी नेपाल’ के सुदन गुरुंग ने ही GenZ प्रदर्शन किया प्लान

नेपाल में GenZ प्रदर्शन में दूसरा नाम 36 साल के सुदन गुरुंग का है। इस पूरे प्रदर्शन का आयोजनकर्ता। खुद को NGO ‘हामी नेपाल’ का फाउंडर बताने वाले सुदन गुरुंग ने ही देश के 28 साल से कम उम्र के युवाओं को प्रदर्शन के लिए एकत्रित किया। यहाँ तक कि युवाओं को प्रदर्शन करना भी गुरुंग ने ही सिखाया।

इंस्टाग्राम पर ‘How to Protest’ वीडियो शेयर कर नेपाल के युवाओं को भड़काया। वीडियो में गुरुंग ‘शांतिप्रिय’ प्रदर्शन की बात कहता है लेकिन साथ में यह भी कहता है कि अगर जरूरत पड़े तो उग्र होना जरूरी है।  

नेपाल में प्रदर्शनकारियों ने जो पोस्टर लिए थे उनपर भी हामी नेपाल का ही नाम था। हामी नेपाल ने ही सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक मोबाइलाइजेशन करवाया। हामी नेपाल ने भीड़ इकट्ठा करने के लिए डिस्कोर्ड एप का इस्तेमाल किया जहाँ ग्रुप चैट में प्रदर्शन के सारे निर्देश दिए जा रहे थे। प्रदर्शनकारियों को स्कूल की यूनिफॉर्म पहनकर आने के लिए कहा गया।

इन ग्रुप चैट की छानबीन में पता लगा कि कहीं बांग्लादेश जैसे सत्ता उखाड़ फेंकने की बात की तो कोई हिंसा की ज्यादा से ज्यादा तस्वीरें इंटरनेशनल मीडिया को भेजने की बात कहता दिखा। ग्रुप में पेट्रोल बम बनाने के तरीके भी बताए गए। लोगों से अनुरोध किया जा रहा है कि वो हत्यारा सरकार लिखा हुआ डीपी लगाए।

इन ग्रुप में नेपाल पुलिस और सैन्य बल की तस्वीरों को शार्प शूटर बताकर शेयर किया गया। इस ग्रुप चैट में लगातार हिंसा और नरसंहार तक की बातें हुईं। कुछ-कुछ वैसी ही जैसा बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के समय देखा गया था।

प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाला ‘हामी नेपाल’ का रजिस्ट्रेशन साल 2020 में हुआ, जिसमें सुदन गुरुंग को सोशल एक्टिविस्ट बताया गया। नेपाल में GenZ प्रदर्शन से पहले भी ‘हामी नेपाल’ का नाम बाढ़ राहत कार्य में ही सामने आया है। लेकिन सरकार के खिलाफ इतना बड़ा प्रदर्शन करने में ‘हामी नेपाल’ का हाथ आना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

हामी नेपाल को विदेशी फंडिंग

सुदन गुरुंग के NGO ‘हामी नेपाल’ को कोका-कोला, वाइबर, गोल्डस्टार और मलबरी होटल्स जैसे ब्रांडों से 20 करोड़ नेपाली रुपए की वित्तीय सहायता मिली है। ये सभी विदेशी ब्रांड्स हैं। NGO ने अपनी वेबसाइट में इसकी जानकारी भी दी है।

ये वही NGO है, जिसने साल 2025 की शुरुआत में भारत के ओडिशा में एक इंजीनियरिंग कॉलेज में नेपाल की छात्रा की मौत के बाद जमकर बवाल काटा था। यहाँ तक कि नेपाल में भी भारत विरोधी भावनाओं को खूब भड़काया था। सुदन गुरुंग, जो खुद को सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में दुनिया के सामने दिखाता है। वो इस पूरे GenZ प्रदर्शन में युवाओं को भड़काने में सबसे आगे रहता है। यहाँ तक की युवाओं को बांग्लादेश और श्रीलंका का उदाहरण देते हुए देश-विरोधी गाइडेंस भी दी जाती है।

नेपाल में क्या खेल खेलने वाले हैं बालेन शाह और सुदन गुरुंग

कुल मिलाकर देखा जाए तो सुदन गुरुंग और बालेन शाह नेपाल में छिड़े हिंसक प्रदर्शन और सरकार गिराने में प्रमुख जिम्मेदार व्यक्तियों के रूप में सामने आए हैं। लेकिन इनकी प्रवृत्ति न सिर्फ भारत विरोधी है, बल्कि मूल रूप से नेपाल विरोधी भी है। सुदन गुरुंग विदेशी पैसों के दम पर नेपाल की सरकार, नेपाल के लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर चुका है, तो अब उसका संगठन पश्चिमी संबंधों के हिमायती बालेन शाह का नाम देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री पद के लिए उछाल रहा है।

ऐसे में बालेन शाह और सुदन गुरुंग का ये गठबंधन कहीं न कहीं बड़े खतरे की ओर इशारा कर रहा है। आपको याद हो कि कुछ समय पहले बांग्लादेश में भी इसी तरह लोकतांत्रिक रूप से देश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता को उखाड़ दिया गया था। उनकी जगह पर पश्चिमी देशों के पपेट मोहम्मद यूनुस को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया था। वहाँ भी युवा खून का इस्तेमाल पश्चिमी देशों ने बांग्लादेश को अपनी जकड़ में लेने के लिए किया था। ठीक ऐसा ही काम नेपाल में भी पश्चिमी देश कर रहे हैं, जो NGO की आड़ में अंधाधुंध पैसा झोंक कर नेपाल की सत्ता को गिरा चुके हैं।

आने वाले समय में बालेन-गुरुंग की ये जोड़ी नेपाल को किस दिशा में लेकर जाती है, ये देखने वाली बात होगी। इस पर भारत और नेपाल के लोगों की ही नहीं, चीन-रूस जैसी महाशक्तियों की भी नजर है। चूँकि नेपाल भारत और चीन से सटा हुआ देश है। इस तरह नेपाल में कुछ भी बदलाव होता है, तो इससे प्रभावित भारत और चीन भी होंगे। ऐसे में ये 2 क्षेत्रीय महाशक्तियाँ क्या कदम उठाती हैं, इस पर भी दुनिया की नजर बनी रहेगी।

राहुल जी नेहरू थे बूथ कैप्चरिंग(वोट चोरी) के मास्टरमाइंड; जिसे राहुल गाँधी बता रहे थे ‘एटम बम’, उसका ‘SIR’ ही उपचार… महाराष्ट्र की तरह ही कर्नाटक पर भी हुए फुस्स: चुनाव आयोग को ‘चोर’ दिखाने चले थे, खुद ‘पप्पू’ दिखे

                                         राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग पर फिर उठाए सवाल
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने कुछ दिनों पहले दावा किया था कि उनके पास चुनाव आयोग के खिलाफ सबूतों का ‘एटम बम’ है। इसी कथित बम को चलाने के लिए राहुल गाँधी ने गुरुवार (7 अगस्त 2025) को एक घंटा 11 मिनट लंबी प्रेस कॉन्फ्रेंस की। लेकिन यह एटम बम उनके पहले कई दावों की तरह फुस ही निकला। 

बिहार विधान सभा चुनाव होने से पहले ही हार की हताशा में डूबे राहुल गाँधी लगातार देश के चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं लेकिन तथ्यों और सबूतों से अक्सर दूर ही भागते नज़र आते हैं और इस बार भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने कई पुराने आरोप दोहराए और कई मनगढ़ंत दावे भी किए। लेकिन अपने कथित सबूतों के अंत तक आते-आते राहुल गाँधी खुद ही सवालों के घेरे में आ गए हैं।

राहुल को मालूम होना चाहिए कि तत्कालीन प्रधानमंत्री की हत्या के बाद हुए चुनाव में और राज्यों का कहता नहीं लेकिन दिल्ली में ही बीजेपी के लाखों वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से निकल दिए गए थे, मेरी रपट को Organiser Weekly शीर्षक Lakhs of BJP voters deleted from voter list के अलावा किसी भी अख़बार ने प्रकाशित करने के हिम्मत नहीं की थी। जिसका आज तक किसी ने खंडन नहीं किया। 

दूसरे, वोटों की चोरी कांग्रेस के समय में होती थी, जब हारे हुए मौलाना आज़ाद को विजयी करवा दिया जाता है, नीचे दिए लिंक का अवलोकन कर लो।       

अवलोकन करें:-

नेहरु थे भारत में पहली बूथ केप्चरिंग का मास्टर माइंड
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जवाहर लाल नेहरू देश में हुए प्रथम आम चुनाव में उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से

राहुल के मनगढ़ंत दावों की असलियत

बीजेपी को एंटी इनकंबेसी नहीं लगती: राहुल गाँधी

देश के चुनाव आयोग को पानी पी-पीकर कोसने वाले राहुल गाँधी की इस प्रेस कॉन्फ्रेस का पहला आरोपी एंटी इनकंबेसी को लेकर था। उन्होंने कहा कि बीजेपी को ऐंटी इनकंबेसी नहीं लगती है। यानी अगर देश के मतदाता बीजेपी को चुन रहे हैं तो इसमें गलती ना तो कॉन्ग्रेस के कर्मों की है, ना राहुल गाँधी की मेहनत में कमी है। बल्कि चुनाव आयोग ही सबसे बड़ी गड़बड़ी कर रहा है। वोट चोरी के गंभीर आरोपों के बीच इस तरह की हल्की बात करना राहुल गाँधी की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करता है।

बीजेपी को एन्टी इन्कम्बन्सी का असर राहुल के उल्टे-पुल्टे बयान बेअसर कर देते हैं। जिसका जीता-जागता उदाहरण अगस्त 7 को फिर दे दिया। जितनी उल्टी-पुल्टी बयानबाज़ी होती रहेगी बीजेपी को कोई सत्ता से नहीं हटा सकता। यही मुख्य कारण है कि इतने केसों में जमानत पर बाहर रहकर राहुल और गाँधी परिवार जितनी आधारहीन बयानबाज़ी करते रहेंगे लोग नहीं चाहते हुए भी बीजेपी को वोट देते रहेंगे।    

UPA के 10 वर्षों के दौरान गुजरात के चुनावों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने वापसी की थी, मध्य प्रदेश में भी इस दौर में लगातार बीजेपी जीतती रही। तो क्या तब भी एंटी इनकंबेसी ना होने का जिम्मेदार चुनाव आयोग था?

एग्जिट पोल्स पर राहुल गाँधी का दावा

राहुल गाँधी ने अपने दावे के दौरान कहा कि ओपिनियन पोल्स और एग्जिट पोल्स का डेटा अलग-अलग रहता था। एक पूरी विस्तृत करोड़ों वोटरों वाली चुनावी प्रक्रिया को ओपिनियन या एग्जिट पोल्स के आधार पर गलत ठहरा देना एक हास्यास्पद तर्क से ज्यादा क्या ही हो सकता है?

एग्जिट पोल्स पीछे 10 वर्षों से तो शुरू हुए नहीं है। माना जाता है कि 80 के दशक में यह प्रक्रिया शुरू हुई थी और सर्वे के आधार पर हार-जीत का अनुमान लगाया जाता रहा है। लोकसभा चुनाव की ही बात करें तो 2004, 2009 में अधिकतर एग्जिट पोल्स सही साबित नहीं हुए।

साल 2014 के एग्जिट पोल्स में बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिलने का दावा शायद एक भी बड़े एग्जिट पोल ने नहीं किया था और 2024 के एग्जिट पोल्स में जितनी सीटें एनडीए को मिलने का दावा किया गया था वो भी गलत ही साबित हुआ। तो क्या ये सभी चुनावों को गलत ठहरा दिया जाए?

अलग-अलग चरणों में चुनाव पर भी सवाल

राहुल गाँधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेस के दौरान कहा कि कागज से वोट एक दिन में पड़ते थे लेकिन ईवीएम से महीनों लग जाते हैं। चुनाव के शेड्यूल को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए हैं। इतनी बड़ी व्यवस्था, हजारों-लाखों ईवीएम को लाना ले जाना, हजारों जवानों का चुनाव की सुरक्षा के लिए पहुँचना, यकीनी तौर पर यह एक दिन में करना मौजूदा परिस्थितियों में लगभग नामुमकिन है। राहुल का दावे को लेकर भी कई सवाल हैं। देश के पहले आम चुनाव से ही बात करें तो पहले आम चुनाव दिसंबर 1951 से फरवरी 1952 के बीच हुए थे। जाहिर है ये एक दिन में नहीं हो गए।

अलग-अलग चरणों में चुनाव से बीजेपी को फायदा होता है तो ऐसा 2004 के आम चुनावों में भी होना चाहिए था तब भी आम चुनाव 4 चरणों में हुए थे। अगर चुनाव के चरणों के आधार पर ही कोई पार्टी हारती है तो कॉन्ग्रेस को 2009 का लोकसभा चुनाव हार जाना चाहिए था क्योंकि तब भी चुनाव 5 चरणों में हुए थे।

किसी भी पार्टी का इस आधार पर चुनाव हारना या जीतना कि कितने चरणों में चुनाव हो रहे हैं ये बेतुका तर्क ही लगता है। अलग-अलग चरणों में चुनाव कराए जाने की वजह लॉजिस्टिक की जरूरतें, सेना और अर्द्धसैनिक बलों को उपलब्धता के आधार पर तय होती आई है ना कि किसी पार्टी की हार और जीत के लिए।

‘लाडली बहना’ जैसी योजनाओं पर सवाल

राहुल गाँधी ने कहा, “चुनाव जीतने पर ऐसा माहौल बनाया जाता है कि लाडली बहना, पुलवामा, सिंदूर के कारण चुनाव जीते।” लाडली बहना जैसी योजनाओं को राहुल गाँधी सिर्फ नैरेटिव का हिस्सा बताकर खारिज कर देना चाहते हैं लेकिन तथ्य इसके खिलाफ हैं। जनकल्याणकारी योजनाओं के नाम पर वोट मिलना कोई नई बात नहीं है।

सबसे ताज़ा उदाहरण ही देखें तो आने वाले कुछ दिनों में बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस चुनाव के लिए खुद कॉन्ग्रेस ने ‘माई बहिन मान योजना’ का एलान किया है। इसमें कॉन्ग्रेस की सरकार बनने पर ज़रूरतमंद महिलाओं को 2500 रुपए महीना की सम्मान राशि दिए जाने की बात है। ऐसा ही वादा कॉन्ग्रेस ने दिल्ली के विधानसभा चुनावों में भी किया था।

राहुल गाँधी को अब लगता है कि ऐसी बीजेपी की किसी योजना के नाम पर वोट नहीं मिलते तो क्यों उनकी पार्टी ऐसी घोषणाएँ कर रही है, जाहिर है इसमें तथ्य कुछ भी नहीं है और राहुल गाँधी सिर्फ अपनी तरफ से फर्जी नैरेटिव गढ़ रहे हैं।

अंदरूनी सर्वे पर टिके हैं राहुल के दावे

राहुल गाँधी चुनाव में फर्जीवाड़े के जो सब दावे कर रहे हैं उनमें उनका आधार पार्टी के कुछ अंदरूनी सर्वे में हैं। कॉन्ग्रेस के अंदरूनी सर्वे ने राहुल गाँधी को बताया था कि कॉन्ग्रेस पार्टी कर्नाटक में 16 सीटें जीतने जा रही है लेकिन जब कॉन्ग्रेस 16 सीटें ना जीत पाई तो यह चुनावी धोखाधड़ी हो गई। अब यूँ तो बीजेपी भी चुनाव से पहले 400 पार की बात कर रही थी तो क्या ऐसे में बीजेपी को भी सड़क पर उतरकर हल्ला-हंगामा शुरू कर देना चाहिए कि उनका अनुमान या सर्वे गलत साबित हो गया तो पूरा इलेक्शन ही गड़बड़ है।

महाराष्ट्र को लेकर दोहराए आरोप

महाराष्ट्र को लेकर राहुल गाँधी ने फिर वही पुराने आरोप दोहराते हुए महाराष्ट्र में 40 लाख वोटर बढ़ने पर सवाल उठाए। राहुल गाँधी ने इस बीच एक महत्वपूर्ण बात कही कि उनके पास महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के बाद चुनाव में धाँधली से जुड़ा कोई सबूत नहीं था और बाद में उन्होंने इसकी पड़ताल की थी। हालाँकि, कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे, राहुल गाँधी की बात मानें तो ये सब आरोप और सवाल बिना किसी सबूत के उठाए जा रहे थे।

महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच वोटरों का बढ़ना कोई नई बात नहीं है और पहले भी ऐसा कई बार देखा जा चुका है। महाराष्ट्र को लेकर राहुल गाँधी के दावों का हम पहले भी फैक्ट चेक कर चुके हैं जिसे आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

राहुल गाँधी ने कहा कि लोगों को महाराष्ट्र के चुनाव में गड़बड़ नजर आई थी। महाराष्ट्र के चुनाव में अगर लोगों को गड़बड़ी लगती तो जाहिर तौर पर प्रदर्शन किए जाते, चुनाव आयोग के दफ्तर का लोग घेराव करते लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आया। जैसे राहुल गाँधी पहले बिना सबूतों के आरोप लगा रहे थे, वैसे ही इस बार लोगों के कँधे पर बंदूक रखकर अपनी बात सही साबित करने पर तुले हैं।

राहुल गाँधी के सबूत में कितना दम?

अपनी इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबूत के नाम पर राहुल गाँधी ने कर्नाटक की एक लोकसभा सीट (बेंगलौर सेंट्रल) के अंतर्गत आने वाली एक विधानसभा सीट (महादेवपुरा) का डेटा दिया। यानी जिस बम को फोड़ने की बात राहुल गाँधी कर रहे थे वो बिना बारूद वाला ही निकला। इस लोकसभा सीट पर बीजेपी ने 32,707 वोटों पर जीत दर्ज की थी। राहुल गाँधी ने दावा किया इस सीट पर 1,00,250 फर्जी वोटर थे, इनमें उन्होंने डुप्लिकेट वोटर, फेक एड्रेस और गलत फोटो जैसे चीजें बताई।

चुनाव में डेटा एंट्री में गड़बड़ियाँ होती हैं, मतदाता सूची में गलतियाँ रहती हैं और कई बार लोग एक जगह से दूसरी जगह जाने पर अपना नाम नहीं कटवा पाते या जानबूझकर एक से अधिक जगहों पर वोट डालते हैं।

ये ऐसी समस्याएँ हैं जिनके बारे में लोगों को पता है। चुनाव प्रक्रिया से जुड़े लोगों को इस बात का बखूबी अंदाजा है लेकिन ऐसे मुद्दों को राहुल गाँधी ने एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा बता दिया है। जो बचकाना आरोपी ही लगता है।

राहुल गाँधी ने वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों को लेकर जो सवाल उठाए हैं वो लंबे वक्त से चले आ रहे हैं। एक घर में कई वोटरों का होना, फोटो सही ना होना, कई जगहों पर एक ही व्यक्ति के वोट होना समस्याएँ हैं और इन्हीं के सुधार के लिए चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रिया शुरू की है। बिहार में मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया जा रहा है और इस पर भी राहुल गाँधी समेत अन्य विपक्षी दल हंगामा कर रहे हैं।

यह विशुद्ध हंगामा इसलिए हैं कि चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में कमियों पर आपत्ति माँगी हैं लेकिन कई दिनों बाद भी एक भी राजनीतिक दल की और से कोई भी आपत्ति नहीं दर्ज कराई गई है। जब राहुल गाँधी, कॉन्ग्रेस और अन्य दलों के पास अपनी बात सही साबित करने का मौका है तो वे खामोश हैं।

उल्टा अब सवाल राहुल गाँधी पर ही हैं कि अगर वोटिंग लिस्ट में असंगतियाँ होती हैं, जिनका एक लंबा इतिहास है तब भी क्यों वे SIR जैसी प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। राहुल गाँधी और अन्य दलों को ऐसी जाँच के बाद खुलकर चुनाव आयोग का समर्थन करना चाहिए।

कर्नाटक में भी नवंबर 2024 और जनवरी 2025 में कॉन्ग्रेस को वोटर लिस्ट दी गई थी लेकिन अब तक कांग्रेस ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई है। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने 7 अगस्त को राहुल गाँधी को पत्र लिखा है। आयोग ने राहुल से कहा कि अगर उनके पास वोटर लिस्ट में फर्जी नामों की जानकारी है, तो वे प्रक्रिया के तहत शपथ पत्र के साथ शिकायत दर्ज करें।

राहुल तो ठहरे राहुल, उन्होंने इसका जवाब बाहुबली फिल्म के अंदाज में देते हुए कहा, “मैं राजनेता हूँ, मैं झूठ नहीं बोलता। मेरे शब्द ही शपथ हैं।” इतने गंभीर विषय पर जवाब देने के बजाय फिल्मी अंदाज में बाद करना ये बताता है कि वो अपने ही आरोपों को लेकर कितने गंभीर हैं।

आम आदमी पार्टी अगर जीत गयी तो क्या केजरीवाल अपनी पत्नी सुनीता को मुख्यमंत्री बनाएंगे?


दिल्ली चुनाव के एग्जिट पोल के बाद सवाल उठने शुरू हो गए है कि अगर आम आदमी पार्टी सत्ता में नहीं आई तो क्या होगा। जैसाकि संभावनाएं है कि अरविन्द केजरीवाल ही अपनी सीट हार रहे हैं, और पार्टी की सरकार बन भी जाती है तो केजरीवाल क्या अपनी पत्नी सुनीता केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाएंगे? पार्टी में इस समय चर्चा हार या जीत पर नहीं बल्कि इस गंभीर मुद्दे पर हो रही है कि 
अगर जीत भी जाते है तो मुख्यमंत्री बन नहीं सकते। उस स्थिति में क्या पार्टी सुनीता केजरीवाल को मुख्यमंत्री मानने को तैयार है? कई गुट जैसे आतिशी-मनीष, राघव चड्डा, स्वाति मालीवाल और भगवंत सिंह मान आदि सक्रीय है। गोपाल राय को मध्यस्थ बताया जा रहा है। वैसे ये गुट उसी दिन से सक्रीय हो गए थे जिस दिन आतिशी को अस्थायी मुख्यमंत्री कह दिया था। बस लग गए चुनाव में अंदरखाने एक-दूसरे को हराने।  

अरविन्द केजरीवाल हकीकत में इंदिरा गाँधी की नीति पर चलते हैं कि जो तुम्हारे बराबर खड़ा होने की कोशिश करे उसे पार्टी से किसी न किसी आरोप में पार्टी से निकाल दो।    

खैर, दिल्ली में विधानसभा चुनाव को लेकर वोटिंग हो चुकी है। आठ फरवरी 2025 को रिजल्ट घोषित किए जाएंगे। 11 एग्जिट पोल्स में से 9 में बीजेपी को बहुमत और केवल 2 एग्जिट पोल में AAP की सरकार बनती हुई नजर आ रही हैं। हालांकि, रिजल्ट के आने के बाद ही दिल्ली की स्थिति साफ हो पाएगी। आइए जानते हैं कि अगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार नहीं बनीं तो इससे केजरीवाल के राजनीतिक करियर पर क्या फर्क पड़ेगा?

दरअसल, अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई थी। जिसके बाद आम आदमी पार्टी साल 2013 में दिल्ली की सत्ता में आई थी और सत्ता में आने पर अरविंद केजरीवाल ने दावा किया था कि वह दिल्ली से पूरी तरह से भ्रष्टाचार खत्म कर देंगे। इसी उम्मीद के साथ दिल्ली की जनता ने AAP पर भरोसा जताया और 2015 और 2020 के चुनावों में आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिया। हालांकि, 2025 तक आते-आते उनकी पार्टी के कई नेताओं और खुद अरविंद केजरीवाल पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। इस बार जनता के सामने शराब घोटाला और शीशमहल का मुद्दा प्रमुख रहा है। ये ही नहीं अरविंद केजरीवाल पिछले 11 सालों में न दिल्ली को साफ पानी दे सकें और न ही यमुना की सफाई करा पाएं। वहीं यमुना के गंदे पानी का मुद्दा के चुनाव प्रचार के आखिरी दिन तक छाया रहा।

 अगर आप जीती तो चौथी बार सीएम बनेंगे अरविंद केजरीवाल

दिल्ली में अगर आम आदमी पार्टी फिर से चुनाव जीतती है, तो अरविंद केजरीवाल दिल्ली के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने वाले पहले नेता होंगे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने वाली बीजेपी को लगातार तीसरी बार विधानसभा का चुनाव हराएंगे। अगर अबकी बार बीजेपी नहीं जीती आगे कई साल बीजेपी सत्ता से दूर रहेगी। लेकिन आप के जीतते ही अरविंद केजरीवाल बीजेपी पर हमला बोलेंगे और कहेंगे कि घोटाले के आरोप जो उन पर लगे हैं वो सियासी साजिश हैं और जनता की अदालत ने उन भी आरोपों को खारिज करके फैसला सुनाया है। जिसके बाद वह फिर से दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने जा रहे हैं। इसके अलावा AAP को राष्ट्रीय स्तर पर और व्यापक बनाने के प्लान में मजबूती मिलेगी। आम आदमी पार्टी दिल्ली, पंजाब और गुजरात दूसरे राज्यों में विस्तार पर काम करने का प्रयास करेगी। वहीं INDI गठबंधन के भीतर गैर कांग्रेसी दल फिर केजरीवाल के पक्ष में और मजबूती से जुड़ें सकेंगे।

अगर आप हारी तो केजरीवाल के लिए होगा बड़ा झटका

तमाम एजेंसियों के एग्जिट पोल के हिसाब से अगर आप की सरकार नहीं बनी तो यह अरविंद केजरीवाल के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। क्योंकि दिल्ली से आम आदमी पार्टी निकली है। अरविंद AAP सरकार के म़ॉडल को पूरे देश में सर्वश्रेष्ठ बताते रहे हैं, उसी दिल्ली में अगर आम आदमी पार्टी की हार होगी तो ये केजरीवाल के लिए एक बड़ा व्यक्तिगत झटका होगा, जिससे उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं। वहीं अरविंद केजरीवाल पर बीजेपी पर फर्जी वोटिंग कराने, चुनाव के दौरान पैसे बंटवाने और ईवीएम में गड़बड़ी जैसे आरोप भी लगा सकते हैं। हालांकि, आप नेताओं ने दावा किया है कि एक्जिट पोल में भले ही बीजेपी आगे हो, लेकिन, सत्ता में आम आदमी पार्टी ही आएगी। 

पिछले तीन विधानसभा चुनावों में आप का प्रदर्शन

साल    आम आदमी पार्टी   
2013  -28  सीटें
2015 - 67  सीटें
2020 -62 सीटें

दिल्ली में हुई 60.42 प्रतिशत वोटिंग

दिल्ली में फरवरी 5 को 70 विधानसभा सीटों पर वोटिंग हुई है। जिसमें 60.42 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया है। जबकि, 2020 के विधानसभा चुनाव में 62.55 फीसदी वोटिंग हुई थी। इसके अलावा 2015 में 67.47 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था। वहीं साल 2013 के विधानसभा चुनाव में 65.63 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था। 

मुफ्तखोर नाम से मशहूर दिल्ली में क्या 10 में से 8 बीजेपी को और 2 केजरीवाल को बहुमत दिखाने वाले Exit Poll पिछले चुनावों की तरह 8 फरवरी को फेल होंगे या पास? लेकिन जीत रेवड़ियों की होगी


दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों के लिए 5 फरवरी 2025 को वोट डाले गए। नतीजे 8 फरवरी को आने हैं। उससे पहले ज्यादातर एग्जिट पोल्स बता रहे हैं कि दिल्ली की सत्ता में 27 साल बाद बीजेपी की वापसी होने जा रही है। आम आदमी पार्टी (AAP) की जीत के आसार नहीं हैं। वहीं कांग्रेस का खाता मुश्किल से ही खुलता दिख रहा है।
अगर केजरीवाल को घोटालों के विरोध में वोट दिया जाता है तो देश में इतने घोटाले हुए क्यों उन पार्टियों को वोट दिया? इस कटु सच्चाई का जवाब कौन देगा?  

वैसे पिछले कुछ चुनावों से तमाम Exit Poll फेल होते देखे गए है। इसलिए 10 में से 8 Exit Poll द्वारा बीजेपी को बहुमत दिखाने पर शंका होती है। असलियत तो EVM में कैद हो चुकी जो फरवरी 8 को बाहर आएगी। महाराष्ट्र और हरियाणा में Exit Poll फेल होने का मुख्य कारण था, महाराष्ट्र में बीजेपी विरोधियों का मुस्लिम कट्टरपंथियों के पैरों में माथा टेकना और हरियाणा में भूपेंद्र हुड्डा का पहलवान फ़ोकट का स्वागत करते ही सारे पासे पलट गए थे। 

आम आदमी पार्टी के सत्ता से बाहर होने के कारण है कि केजरीवाल की ईमानदार नेता की छवि धूमिल होना, शिक्षा मंत्री रहे मनीष सिसोदिया का शराब घोटाले में जेल जाना, फ्री पानी की आड़ में पानी माफिया का सक्रीय होना आदि। वैसे तो दिल्ली मुफ्तखोर दिल्ली नाम से मशहूर हो चुकी है और बीजेपी का केजरीवाल को सत्ता से बाहर केजरीवाल पार्टी के घोटाले नहीं बल्कि केजरीवाल से ज्यादा बीजेपी द्वारा घोषित रेवड़ियां जितवाएंगी। यानि एक रेवड़ी दूसरी रेवड़ी को हराएगी। स्पष्ट शब्दों में मुफ्तखोर दिल्लीवासियों ने आत्मसम्मान रेवड़ियों के हाथ बेच एक बाजारू माल बना दिया है। आज तक पूरे देश ने अपनी जागरूकता का परिचय नहीं दिया। किसी ने यह नहीं कहा कि हमारा वोट लेने से पहले निगम पार्षद से लेकर सांसद को मिलने वाली पेंशन क्यों नहीं बंद होती। मूर्ख जनता को नहीं मालूम कि इस पेंशन पर हर महीने करोडो रूपए बर्बाद हो रहे हैं। जितनी पेंशन इन लोगों को मिलती है किसी मजदूर को छोड़ो एक सरकारी बाबू तक को अपना कार्यकाल पूरा करने पर नहीं मिलती। 

राजनीतिक गरियारों में यह चर्चा बहुत गरमा रही है कि दिल्ली चुनाव परिणाम एक नए राजनीतिक इतिहास की ओर जाएगा। बीजेपी नहीं चाहेगी कांग्रेस के ख़त्म होने से पहले आम आदमी पार्टी की दिल्ली से बिदाई हो। दूसरे, अगर दिल्ली का मुसलमान कांग्रेस के पाले में वापस जाकर 5 से 10 सीट दिलवा देता है वह कांग्रेस को ऑक्सीजन का काम करेगा उसका सारा गाँधी परिवार को नहीं संदीप दीक्षित दीक्षित, अजय माकन और अलका लाम्बा को जाएगा।    

अगर आम आदमी पार्टी को पूर्ण बहुमत दिखाने वाले 2 Exit Poll सच हो गए और अरविन्द केजरीवाल अपनी नई दिल्ली सीट हार जाता है तो पार्टी का टूटना निश्चित है। जेल जाने पर जिस तरह केजरीवाल अपनी पत्नी सुनीता के हाथ पार्टी सौंपने तैयार थे, उस कदम/सोंच ने पार्टी ने कई गुट बना दिए। मनीष-आतिशी, राघव चड्डा, भगवंत सिंह मान और स्वाति मालीवाल आदि  गुट बन गए हैं। केजरीवाल के हारने पर भगवंत सिंह द्वारा बिभव कुमार को पंजाब से भगाया जाएगा। पार्टी में गुटबाज़ी तो उसी दिन से शुरू हो गयी थी जिस दिन सरकारी अधिकारी को घर बुलाकर पिटाई की थी। लेकिन वह गुटबाज़ी ज्यादा नहीं चली, स्वाति मालीवाल की पिटाई ने उस गुटबाज़ी में नयी ऊर्जा का काम कर दिया। चर्चा यह भी है कि केजरीवाल के हारते के बाद आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बावजूद केजरीवाल को जेल जाने से कोई नहीं रोक पाएगा।            

MATRIZE के एग्जिट पोल में बीजेपी और आप के बीच कड़ी टक्कर दिख रही है। बीजेपी 35-40 तो AAP को 32-37 सीटें मिलने के आसार जताए गए हैं। कॉन्ग्रेस को एक भी सीट मिलने के आसार नहीं हैं। चाणक्य स्ट्रैटजी के एग्जिट पोल में बीजेपी की स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बन रही है। इसके मुताबिक बीजेपी को 39-44 सीटें मिल सकती है। आप 25-28 सीटों पर सिमट सकती है। कॉन्ग्रेस को 2-3 सीटों पर जीत मिलने की संभावना दिख रही है।

पोल डायरी के एग्जिट पोल में भी AAP हार रही है। उसे 18-25 सीटें मिल सकती है। बीजेपी 42-50 सीटें हासिल कर सरकार बनाती दिख रही है। कॉन्ग्रेस को 0-2 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। पीपुल्स इनसाट के अनुसार बीजेपी को 40 से 44 सीटें मिल सकती हैं। आप को 25 से 29 सीटें मिलने का अनुमान है।

 पी-मार्क के पोल में बीजेपी को 39-49 तो आप को 21-31 सीटों का अनुमान लगाया गया है। वहीं WeePreside के एग्जिट पोल में AAP की सत्ता कायम रहने का अनुमान लगाया गया है। इसके अनुसार उसे 46 से 52 सीटें तो बीजेपी को 18 से 23 सीटें मिल सकती है।

ज्यादातर एग्जिट पोल बता रहे हैं कि इस बार केंद्र शासित प्रदेश में लोगों ने डबल इंजन सरकार के लिए मतदान किया है। वहीं 15 साल तक लगातार दिल्ली पर शासन करने वाली कॉन्ग्रेस के दिन बदलने के आसार नहीं हैं, जबकि 12 साल सत्ता में रहने के बाद AAP की विदाई होती दिख रही है।

एग्जिट पोल्स के बाद बीजेपी में उत्साह देखा जा रहा है। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और मालवीय नगर से प्रत्याशी सतीश उपाध्याय ने कहा है कि झाड़ू के तिनके बिखर गए हैं और कमल खिल रहा है। उन्होंने कहा कि बीजेपी स्पष्ट बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। वहीं AAP ने एग्जिट पोल्स को खारिज कर दिया है। पार्टी नेता सौरव भारद्वाज ने कहा है कि इससे पहले के चुनावों में भी आप की हार दिखाई गई थी, लेकिन पार्टी बड़ी बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब रही थी।