कोर्ट ने खोल दिए कांग्रेस के ‘भगवा आतंकवाद’ के धागे, कहा- मालेगाँव ब्लास्ट पर थ्योरी तो गढ़ ली, पर सबूत एक भी नहीं; अभिनव भारत, कर्नल ने दिए RDX, साध्वी प्रज्ञा की बाइक…

                                पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित - (फाइल, फोटो साभार: First Post)
मालेगाँव ब्लास्ट केस में आये फैसले ने कांग्रेस समर्थिक यूपीए के साथ-साथ मीडिया को भी बेनकाब कर दिया। आज जो मीडिया फैसले को लेकर कांग्रेस पर प्रहार कर रही है, ये वही मीडिया है जो उस समय कांग्रेस के इशारे पर "हिन्दू और भगवा आतंकवाद" को खूब प्रचारित कर रही थी। कोई खोजी पत्रकार सच्चाई सामने लाने की हिम्मत तक नहीं जुटा सका, जिस वजह से हिन्दू चुपचाप अपने आपको अपमानित होते बर्दाश्त करता रहा। समय बड़ा बलवान होता है। सारे पासे पलट गए। जो सबके सामने है। कल तक कांग्रेस के इशारे पर 
"हिन्दू और भगवा आतंकवाद" का शोर मचाने वाली मीडिया आज कांग्रेस को ही कटघरे में खड़ा कर रही है।   

मुंबई की स्पेशल एनआईए कोर्ट ने 31 जुलाई को 2008 के मालेगाँव ब्लास्ट केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी सात आरोपितों को बरी कर दिया। इनमें पूर्व बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित भी शामिल हैं।

स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश करने में नाकाम रहा और सबूतों में कई असंगतियाँ हैं। कोर्ट ने ‘हिंदू आतंकवाद’ की थ्योरी को सिरे से खारिज करते हुए जोर दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं, बल्कि ठोस सबूतों पर होनी चाहिए।

यह फैसला 17 साल पुराने केस में आया है, जो राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर काफी विवादास्पद रहा है। ब्लास्ट में छह लोगों की मौत हुई थी और 100 से ज्यादा घायल हुए थे। कोर्ट ने विक्टिम्स के लिए मुआवजे का भी ऐलान किया है।

मालेगाँव ब्लास्ट में कोई सबूत नहीं पेश कर पाया अभियोजन पक्ष

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेशल जज ए.के. लाहोटी ने 500 पेज से ज्यादा के अपने फैसले में विस्तार से बताया कि अभियोजन पक्ष ने केस को साबित करने में कई गलतियाँ कीं। उन्होंने कहा, “पूरी जाँच के बाद यह साफ है कि अभियोजन कोई ठोस सबूत लाने में विफल रहा है। सबूतों में कई असंगतियाँ हैं, इसलिए सभी आरोपितों को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।”

जज ने आगे जोड़ा, “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दोषसिद्धि नैतिक आधार पर नहीं की जा सकती। यहाँ सबूतों की कमी है, इसलिए बरी करना जरूरी है।”

कोर्ट ने विशेष रूप से ‘हिंदू आतंकवाद’ के आरोप को खारिज किया, जो अभियोजन की मुख्य थ्योरी थी। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि यह ब्लास्ट ‘अभिनव भारत’ नामक संगठन की साजिश थी और इसमें हिंदू आतंकवाद शामिल है। लेकिन कोई सबूत नहीं मिला कि आरोपित हिंदू आतंकवाद में लिप्त थे। आतंकवाद किसी धर्म से जुड़ा नहीं है। नैतिकता से फैसला नहीं लिया जा सकता; सबूत जरूरी हैं। यहाँ साजिश साबित नहीं हुई, इसलिए हिंदू आतंकवाद जैसी कोई अवधारणा यहाँ लागू नहीं होती।”

जज ने अभियोजन के दावों को एक-एक करके तोड़ा। उन्होंने कहा, “अभियोजन ने सात आरोपितों के बीच साजिश का आरोप लगाया, लेकिन कोई मीटिंग, कॉल रिकॉर्ड या प्लानिंग का सबूत नहीं पेश किया। सबूत असंगत हैं और पुलिस ने घटनास्थल को ठीक से सुरक्षित नहीं किया, जिससे फॉरेंसिक जाँच प्रभावित हुई।”

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर क्या कहा कोर्ट ने?

फैसले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के खिलाफ लगे आरोपों को विस्तार से खारिज किया गया। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन का मुख्य दावा था कि ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई एलएमएल फ्रीडम मोटरसाइकिल साध्वी ठाकुर की थी, जिस पर बम बंधा था। लेकिन फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने बाइक के चेसिस का पूरा सीरियल नंबर रिकवर नहीं किया। इसलिए, यह साबित नहीं होता कि बाइक उनकी थी।”
जज ने आगे कहा, “इसके अलावा, साध्वी ठाकुर ने ब्लास्ट से दो साल पहले संन्यास ले लिया था और सभी भौतिक चीजें त्याग दी थीं। ऐसे में बाइक उनके पास कैसे हो सकती है? अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह फेल रहा।”
कोर्ट ने ठाकुर के संन्यासी जीवन पर भी टिप्पणी की, जिसमें कहा गया, “उन्होंने दो साल पहले सब छोड़ दिया था, इसलिए मटेरियल संपत्ति से उनका कोई लेना-देना नहीं था। आरोप बेबुनियाद हैं।”

कर्नल पुरोहित के खिलाफ आरोप भी हुए धराशाई

लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित पर लगे गंभीर आरोपों को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया। जज ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि पुरोहित ने कश्मीर से आरडीएक्स मँगवाया और बम असेंबल किया। लेकिन कोई सबूत नहीं – न गवाह, न डॉक्यूमेंट। यह आरोप निराधार है।”
फाइनेंशियल ट्रांजैक्शंस पर बात करते हुए जज लाहोटी ने बताया, “पुरोहित और आरोपित अजय रहीरकर के बीच पैसे के लेन-देन हुए थे, क्योंकि वे अभिनव भारत के पदाधिकारी थे। लेकिन यह पैसा पुरोहित ने अपने घर की निर्माण और एलआईसी पॉलिसी पर खर्च किया, न कि किसी आतंकी गतिविधि पर। अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि पैसा गलत काम में लगा। इसलिए, कोई केस नहीं बनता।”

अन्य आरोपितों पर कोर्ट का रुख

कोर्ट ने बाकी आरोपितों मेजर (रिटायर्ड) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहीरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी के खिलाफ भी सबूतों की कमी बताई। जज ने कहा, “इन सभी के बीच कोई साजिश साबित नहीं हुई। अभियोजन ने मीटिंग्स या प्लानिंग के सबूत नहीं दिए। एक आरोपित सुधाकर द्विवेदी ने तो दावा किया कि कोई ब्लास्ट हुआ ही नहीं, जिसके बाद अभियोजन ने 100 से ज्यादा विक्टिम्स की जाँच की, लेकिन फिर भी केस कमजोर रहा।”

विक्टिम्स और मुआवजे पर फैसला

कोर्ट ने ब्लास्ट के विक्टिम्स को न्याय देते हुए मुआवजे का ऐलान किया। जज लाहोटी ने कहा, “अभियोजन ने दावा किया कि छह लोग मारे गए, जो कोर्ट मानता है। लेकिन घायलों की संख्या 101 बताई गई, जबकि कुछ मेडिकल सर्टिफिकेट्स में हेराफेरी पाई गई। इसलिए सिर्फ 95 घायलों को मान्यता दी जाती है।”
मुआवजे पर उन्होंने आदेश दिया, “मारे गए छह लोगों के परिवारों को 2 लाख रुपये प्रत्येक और 95 घायलों को 50,000 रुपये प्रत्येक मुआवजा मिलेगा। यह राज्य सरकार देगी। विक्टिम्स को न्याय मिलना चाहिए, भले ही आरोपित बरी हों।”

क्या था पूरा मामला, जो 17 साल तक चला

यह केस 29 सितंबर 2008 को हुआ था, जब मालेगाँव के एक चौराहे पर रमजान के दौरान ब्लास्ट हुआ। मुस्लिम बहुल इलाके में मोटरसाइकिल पर रखे आईईडी से विस्फोट हुआ था। महाराष्ट्र एटीएस ने शुरुआती जाँच की और 12 लोगों को गिरफ्तार किया। एटीएस ने जिन 12 लोगों को गिरफ्तार किया था, उनमें प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, मेजर (सेवानिवृत्त) रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय रहिरकर, सुधाकर चतुर्वेदी और सुधाकर द्विवेदी शामिल थे। एटीएस ने दावा किया था कि यह विस्फोट अभिनव भारत संगठन की साजिश का हिस्सा था।
इस मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) और महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत आरोप लगाए गए थे।
साल 2010 में जाँच एनआईए को सौंपी गई। एनआईए ने 2016 में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की और एमसीओसीए हटाने की सिफारिश की। उन्होंने कहा कि कुछ आरोपितों के खिलाफ सबूत कम हैं। दिसंबर 2017 में कोर्ट ने सात आरोपितों पर ट्रायल का आदेश दिया, जबकि तीन को डिस्चार्ज कर दिया। ट्रायल दिसंबर 2018 में शुरू हुआ, जिसमें 323 गवाहों की जाँच हुई। 34 गवाह होस्टाइल हो गए और 30 से ज्यादा मर चुके थे। अप्रैल 2024 में अंतिम बहस खत्म हुई और 19 अप्रैल को फैसला रिजर्व किया गया।
अभियोजन की तरफ से स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अविनाश रसल थे, जबकि आरोपितों की तरफ से कई वकील, जैसे जेपी मिश्रा (ठाकुर और रहीरकर), पासबोला समेत अन्य (उपाध्याय), फड़के और बाबर (पुरोहित), रंजीत सांगले (द्विवेदी), और पुनालेकर समेत अन्य (चतुर्वेदी) ने अपनी दलीलें पेश की।

कोर्ट ने अभियोजन की कमियाँ की उजागर

जज ने पुलिस और अभियोजन की कई कमियों पर उँगली उठाई। उन्होंने कहा, “पुलिस ने घटनास्थल को सुरक्षित नहीं किया, जिससे सबूत खराब हुए। फॉरेंसिक जाँच में गड़बड़ियाँ हैं। गवाहों की मौत और होस्टाइल होना भी केस को कमजोर किया। कुल मिलाकर अभियोजन का केस असंगत है।”
फिर से हिंदू आतंकवाद पर जज साहब ने दोहराया। “टेररिज्म का कोई धर्म नहीं। लेकिन यहाँ प्रॉसीक्यूशन ने हिंदू आतंकवाद की थ्योरी बनाई, जो सबूतों पर नहीं टिकी। नैतिक आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सबूत जरूरी हैं, और यहाँ सबूत नहीं हैं। इसलिए, सभी आरोपितों को बरी किया जाता है।”
एनआईए कोर्ट के फैसले के बाद सुधाकर धर द्विवेदी के वकील रंजीत साँगले ने कहा, “ये साबित नहीं हुआ कि ब्लास्ट में इस्तेमाल मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की थी। घायलों के सर्टिफिकेट नकली थे। डीजी एटीएस को आदेश दिया गया है कि वो जाँच करें कि ये नकली सर्टिफिकेट किसने बनाए। सुधाकर चतुर्वेदी के घर पर रखा गया आरडीएक्स की भी जाँच डीजी एटीएस को करने को कहा गया है। सभी आरोपितों को यूएपीए और दूसरी धाराओं से बरी कर दिया गया है। अभियोजन यूएपीए के तहत आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा।”
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फैसला खत्म होने पर कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया। आरोपित खुश दिखे, प्रॉसीक्यूशन वाले निराश। यह पूरा फैसला दिखाता है कि कानून सबूतों पर चलता है, नैतिकता पर नहीं। जज साहब ने हर बयान को विस्तार से दिया, ताकि कोई शक न रहे।

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