बंगाल में मतदान केंद्रों पर भारी भीड़ की वजह थी अधिकांश लोगों द्वारा पहली बार वोट डालने का मौका मिलना। इस चुनाव से पहले लोगों के घर से निकलने की जरुरत ही नहीं पड़ती थी। क्योकि सत्तारूढ़ पार्टी के गुंडे पहले ही उनके वोट डाल दिया करते थे। पश्चिम बंगाल की 144-फाल्टा विधानसभा सीट पर मतदान के दौरान सामने आई गंभीर गड़बड़ियों के बाद चुनाव आयोग ने पूरे विधानसभा क्षेत्र में दोबारा मतदान कराने का आदेश दिया है। आयोग ने साफ किया है कि 21 मई 2026 को सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक सभी 285 मतदान केंद्रों और सहायक बूथों पर पुनर्मतदान कराया जाएगा।कितनी सीटों पर होगी दोबारा वोटिंग?
चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार, फाल्टा विधानसभा क्षेत्र के सभी 285 मतदान केंद्रों पर नए सिरे से मतदान कराया जाएगा। सभी सहायक मतदान केंद्रों पर भी नए सिरे से वोट डाले जाएंगे। नतीजतन, जहां बंगाल की 293 सीटों के चुनाव परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे, वहीं फाल्टा को इस घोषणा से अलग रखा जाएगा।
दोबारा हो रही थी मतदान की मांग
दरअसल फाल्टा विधानसभा क्षेत्र के लिए मतदान चुनाव के दूसरे चरण के दौरान विशेष रूप से 29 अप्रैल को हुआ था। उस दिन इस सीट के अलग-अलग बूथों पर मतदान प्रक्रिया में बाधा डालने के आरोप सामने आए थे। साथ ही यह शिकायत भी मिली थी कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVMs) पर स्टिकर चिपकाए गए थे। इसके अलावा यह आरोप भी लगाया गया था कि स्थानीय निवासियों के एक बड़े वर्ग को अपना वोट डालने से रोका गया था। तब से फाल्टा में दोबारा चुनाव कराने की मांग लगातार बढ़ रही थी। मतदान के अगले दिन फाल्टा के कई हिस्सों में सड़क जाम करने की घटनाएं सामने आईं, जो निवासियों को मतदान के अधिकार से वंचित किए जाने के विरोध में की गई थीं।
पूरे फाल्टा क्षेत्र में फिर से मतदान कराने का आदेश
शुक्रवार रात को राज्य के विशेष रोल पर्यवेक्षक सुब्रत गुप्ता ने पुष्टि की कि आयोग को फाल्टा की स्थिति के संबंध में कई शिकायतें मिली हैं। इन शिकायतों की सावधानीपूर्वक जांच की जा रही थी और CCTV कैमरे की फुटेज की भी गहनता से पड़ताल की जा रही थी। इसके बाद शनिवार रात को, आयोग ने एक निर्देश जारी किया जिसमें पूरे फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में फिर से मतदान कराने का आदेश दिया गया। गौरतलब है कि शनिवार को मगराहाट पश्चिम और डायमंड हार्बर विधानसभा क्षेत्रों के कई बूथों पर भी दोबारा चुनाव कराए गए थे।
फाल्टा में वोटरों को धमकाने का आरोप
इससे पहले चुनाव आयोग ने शनिवार को पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले की डायमंड हार्बर जिला पुलिस को निर्देश दिया कि वे फाल्टा विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान के करीबी सहयोगियों के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज करें। ग्रामीणों ने इन सहयोगियों पर आरोप लगाया है कि उन्होंने बीजेपी को वोट देने पर उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है।
सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी
पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के दफ्तर के सूत्रों ने बताया कि आयोग ने डायमंड हार्बर जिला पुलिस को चेतावनी दी है कि अगर वे उसके निर्देशों का पालन करने में नाकाम रहते हैं और एफआईआर दर्ज करके गांव वालों को धमकाने के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू नहीं करते हैं, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
वोटों की गिनती 4 मई को दरअसल 29 अप्रैल को मतदान से पहले ही फाल्टा ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा था। इसकी वजह जहांगीर खान और ईसीआई द्वारा नियुक्त विशेष पुलिस पर्यवेक्षक, अजय पाल शर्मा (उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी) के बीच हुई बातचीत थी। मतदान के दिन भी दक्षिण 24 परगना जिले के डायमंड हार्बर उप-मंडल के तहत आने वाले फाल्टा और आस-पास के विधानसभा क्षेत्रों से मतदान से जुड़ी छिटपुट हिंसा की खबरें मिली थीं। बता दें कि पश्चिम बंगाल में दो चरणों में विधानसभा चुनाव 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को हुए थे। वोटों की गिनती 4 मई को होगी और उसी दिन नतीजे घोषित किए जाएंगे।
SIR में 90 लाख मतदाताओं के नाम हटाने पर BBC ने ‘मुस्लिम-बहिष्कार’ का चलाया प्रोपेगेंडा
एक समय था जब भारतीय BBC द्वारा प्रसारित किसी समाचार पर आंख मीच कर विश्वास करते थे, लेकिन कालचक्र ऐसा घुमा वही BBC बन रहा है (बी)Bhramit (बी)Biased (सी)Campaigner, भारत विरोधी आज इसी BBC का इस्तेमाल कर रहे हैं और हमारा कहलाए जाने वाला राष्ट्रीय मीडिया खामोश रहता है। या यूँ समझा जाए कि "यार जो प्रकाशित/प्रसारित करना है करो हम चुप रहेंगे। तुम भी अपनी रोजी-रोटी कमाओ और हम भी।" यह आम नागरिक से लेकर राजनेताओं के चिंतन का विषय है।
चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। चुनाव आयोग ने भी पुष्टि की कि संशोधन प्रक्रिया के अंतिम चरण में 27,16,393 मतदाता अयोग्य पाए गए। इसके बाद इस मुद्दे को लेकर कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले राजनीतिक और मीडिया गुटों ने मुस्लिम-पीड़ित की कहानी को हवा देना शुरू कर दिया।
“Political turmoil in Indian border state as nine million lose voting rights” हेडलाइन के साथ इस आर्टिकल में स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने एक तरह का डर का माहौल बनाने की कोशिश की। उन्होंने नाम हटाए जाने को राजनीतिक साजिश के तौर पर पेश करते हुए इसे ‘वोटिंग अधिकार छिन जाने’ का मामला बताया, जो राज्य की नीतियों को प्रभावित कर सकता है। अपने इस एकतरफा लेख में कोलकाता के इस तथाकथित ‘स्वतंत्र पत्रकार’ ने खासतौर पर मुस्लिमों को निशाना बनाए जाने की एक काल्पनिक कहानी को ज्यादा उभारने की कोशिश की।
इस आर्टिकल में चालाकी से आँकड़े, भौगोलिक संदर्भ, राजनीतिक बयान और सहानुभूति जगाने वाली व्यक्तिगत कहानियों को इस तरह पेश किया गया है कि पाठक खुद ही इन बिंदुओं को जोड़कर एक कथित साजिश का अंदाजा लगाने लगें। मानो बंगाल के मुस्लिमों के वोटिंग अधिकार छीनने की कोशिश हो रही हो, जो आमतौर पर BJP के खिलाफ वोट करते हैं।
12 अप्रैल 2026 को प्रकाशित BBC के इस आर्टिकल में लिखा गया है, “भारत की बांग्लादेश के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है, जो काफी हद तक खुली और कुछ हिस्सों में नदी के किनारे-किनारे गुजरती है। इसका एक बड़ा हिस्सा बंगाल से होकर जाता है। यही वजह है कि राज्य में प्रवासन और मतदाता सूची को लेकर होने वाली बहस को एक संवेदनशील और राजनीतिक रूप दे दिया गया है।”
स्निगधेंदु भट्टाचार्य ने इशारों-इशारों में यह जताने की कोशिश की कि सुप्रीम कोर्ट ने सही फैसला नहीं लिया, जब उसने सभी ‘विवाद सुलझाए बिना ही इस अप्रैल में चुनाव कराने की अनुमति दे दी।’ उन्होंने यह भी लिखा की इस वजह से ‘करीब 27 लाख मतदाताओं का भविष्य अब भी अनिश्चित’ बना हुआ है।
बंगाल SIR में मतदाता हटाना पारदर्शी जाँच या मुस्लिमों का मत छीनने की कोशिश?
दिसंबर 2025 में चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट मतदाता सूची से 58.25 लाख नाम हटाए थे। ये वे लोग थे जो या तो मृत पाए गए, कहीं और शिफ्ट हो चुके थे, लंबे समय से अनुपस्थित थे या जिनके नाम दोहराए गए थे। इसके बाद कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई। फिर 28 फरवरी को अंतिम सूची से करीब 5 लाख और नाम हटाए गए, जिससे कुल मिलाकर हटाए गए नामों की संख्या करीब 91 लाख के आसपास पहुँच गई।
शुरुआत में 60.06 लाख मतदाताओं को जाँच के दायरे में रखा गया था, जिनमें से लगभग आधे लोग अयोग्य पाए गए। सबसे ज्यादा नाम मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में हटाए गए, जहाँ 11 लाख संदिग्ध मतदाताओं में से 4.55 लाख से ज्यादा अयोग्य निकले। मुर्शिदाबाद की सीमा बांग्लादेश से लगती है। यहाँ बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ और भीड़ जुटाकर हिंसा जैसे मुद्दे लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में अयोग्य मतदाताओं का सामने आना इसी पृष्ठभूमि से जुड़ा माना जा रहा है। मालदा और अन्य सीमावर्ती जिलों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिली।
सीमावर्ती इलाकों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटना और बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ की बढ़ती संख्या जैसे संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इन जिलों की धार्मिक जनसंख्या संरचना को बदलने की एक सुनियोजित कोशिश हो सकती है। हालाँकि, इस पूरे मामले पर पर्दा डालने के लिए कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले गुट यह कहानी गढ़ रहें है कि चुनाव आयोग और BJP मिलकर मुस्लिमों को मनमाने तरीके से वोटिंग अधिकार से वंचित कर रहे हैं।
चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि हटाए गए ज्यादातर नाम सामान्य श्रेणियों में आते हैं। जैसे मृतक, लंबे समय से अनुपस्थित, स्थायी रूप से कहीं और शिफ्ट हो चुके लोग, दिए गए पते पर न मिलने वाले या फर्जी एंट्रीज। मतदाता सूची में इस तरह की गड़बड़ियाँ आम होती हैं और SIR अभियान का मकसद ही इन्हें ठीक करना था। यह प्रक्रिया सिर्फ बंगाल में ही नहीं, बल्कि अब तक शामिल 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी इसी उद्देश्य से चलाई गई। ताकि घोस्ट वोटर, पलायन और पुरानी एंट्रीज जैसी समस्याओं को दूर किया जा सके।
SIR में चुनाव आयोग ने तय प्रक्रिया का पालन किया, जबकि उसे राज्य की TMC सरकार के दबाव और विरोध का भी सामना करना पड़ा। लेकिन BBC के आर्टिकल में इस बात का जिक्र तक नहीं है कि चुनाव आयोग के अधिकारी लगातार दबाव में काम कर रहे थे और मालदा में तो न्यायिक अधिकारियों को अपने काम के दौरान इस्लामी भीड़ की हिंसा तक झेलनी पड़ी। जाहिर है, ये बातें उस ‘मुस्लिम पीड़ित’ वाली कहानी में फिट नहीं बैठतीं, जिसे पेश करने की कोशिश की गई है।
BBC के आर्टिकल में दावा किया गया है, “राजनीतिक दलों द्वारा जुटाए गए आँकड़ों के मुताबिक, जिन 27 लाख मामलों पर स्थिति स्पष्ट नहीं है, उनमें करीब 65 प्रतिशत मुस्लिम हैं। कुल मिलाकर हटाए गए 90 लाख नामों में से 31.1 लाख यानी लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी से ज्यादा है।”
हालाँकि, BBC की इस कहानी के उलट सच यह है कि जिन 27 लाख मामलों को ‘अभी तय नहीं’ बताया जा रहा है, या जिन 27,16,393 मतदाताओं के नाम हटाए गए। उन्हें बिना जाँच के बाहर नहीं किया गया। बल्कि हर मामले की न्यायिक समीक्षा हुई। इन नामों को कुछ गड़बड़ियों की वजह से चिन्हित किया गया था और करीब 705 न्यायिक अधिकारियों ने इनकी जाँच की। यह पूरी प्रक्रिया हाई कोर्ट की निगरानी में और सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में हुई। कुल 60.06 लाख मामलों में से 32.68 लाख लोगों को योग्य माना गया, जबकि 27.16 लाख को अयोग्य घोषित किया गया।
सबसे अहम बात यह है कि जिन लोगों को लगता है कि उनका नाम गलत तरीके से हटाया गया है, उनके लिए आपत्ति दर्ज कराने का रास्ता भी खुला है। इसके लिए 19 खास ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जहा वे अपील कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 23 और 29 अप्रैल 2026 को मतदान कराने की अनुमति जरूर दी है और यह भी कहा कि दूसरे राज्यों में SIR प्रक्रिया ‘सुचारू रूप’ से पूरी हुई, जबकि बंगाल में ‘कानूनी विवादों’ के चलते स्थिति अलग रही। साथ ही, शीर्ष अदालत ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि बिना SIR या चुनाव को रोके पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा और तय समय सीमा का ध्यान रखा जाए।
वहीं BBC के आर्टिकल में ‘राजनीतिक दलों’ के आँकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया, “हटाए गए 90 लाख नामों में से 3.11 लाख यानी करीब 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि राज्य की आबादी में उनकी 27 प्रतिशत हिस्सेदारी से ज्यादा हैं।”
लेकिन BBC ने इस बात को नजरअंदाज किया कि कुल संख्या के हिसाब से सबसे ज्यादा नाम हिंदुओं के ही हटाए गए, जो करीब 63 प्रतिशत हैं। यहाँ तक कि कुछ हिंदू बहुल इलाकों जैसे पश्चिम बर्धमान और उत्तर 24 परगना के मतुआ समुदाय वाले क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। इसके बावजूद BBC का आर्टिकल SIR प्रक्रिया को इस तरह पेश करता है मानो यह बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ और किसी ‘मुस्लिम-विरोधी साजिश’ से जुड़ा मामला हो, जिससे राज्य में डर और तनाव का माहौल बन सकता है।
चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी जाँच के बाद की गई है, न कि किसी खास समुदाय को निशाना बनाने के लिए। मुस्लिम मतदाताओं को जानबूझकर बाहर करने का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। इसके बावजूद BBC ने कमजोर दलीलों और अस्पष्ट वजहों के सहारे अपनी साजिश वाली कहानी को सही ठहराने की कोशिश की है।
अगर एक पल के लिए मान भी लें कि चुनाव आयोग और BJP ने मिलकर चुनावी सूची को अपने पक्ष में करने की कोशिश की, तो फिर सवाल उठता है कि खुद को हिंदू समर्थक बताने वाली पार्टी ऐसी प्रक्रिया क्यों होने देंगी, जिसमें हटाए गए नामों में 63 प्रतिशत हिंदू हों? और बंगाल में पहली बार जीत हासिल करने की कोशिश कर रही BJP आखिर ऐसा खुद को नुकसान पहुँचाने वाला कदम क्यों उठाएगी?
इसके बावजूद द वायर, न्यूजलॉन्ड्री, द क्विंट और आर्टिकल-14 जैसे प्लैटफॉर्म्स के लिए लिखने वाले स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने आधिकारिक आँकड़ों या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी को तवज्जो देने के बजाए कुछ चुनिंदा उदाहरणों और TMC जैसे दलों के सूत्रों पर ज्यादा भरोसा किया। यहाँ तक कि द क्विंट में अपने एक आर्टिकल में उन्होंने बंगाल के SIR अभियान को ‘घोषित किए बिना लागू किया NRC’ तक बता दिया।
वोटर लिस्ट फ्रीज होने के चलते हटाए गए मतदाता बंगाल चुनाव में नहीं कर सकते वोट
जिन मतदाताओं के नाम स्थायी रूप से हटा दिए गए हैं, उन्हें सिर्फ इस वजह से दोबारा वोट देने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम हैं। चुनाव आयोग पहले ही बंगाल की मतदाता सूची को फ्रीज कर चुका है यानी जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई निर्देश नहीं देता, तब तक इसमें नए नाम नहीं जोड़े जा सकते।
इस बात की पुष्टि 13 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी कर दी। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोमल्या बागची की बेंच ने साफ कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं और जिनकी दोबारा शामिल होने की अर्जी लंबित है, उन्हें आने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
यह टिप्पणी कोर्ट ने उस समय की जब 13 लोगों की याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिन्होंने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ कोर्ट से दखल देने की माँग की थी। हालाँकि, कोर्ट ने उनकी याचिका को ‘समय से पहले’ बताया और उन्हें पहले अपील ट्रिब्यूनल के पास जाने की सलाह दी।
TMC नेता कल्याण बनर्जी ने कोर्ट से कहा था कि करीब 16 लाख लोगों ने अपील की है और उन्हें चुनाव में वोट देने की इजाजत दी जाए। इस पर CJI सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा, “यह बिल्कुल संभव नहीं है। अगर ऐसा किया गया, तो इशसे जुड़े लोगों के वोटिंग अधिकारों को ही रोकना पड़ेगा।”
वहीं जस्टिस बागची ने बताया कि SIR प्रक्रिया के दौरान करीब 34 लाख अपीलें दायर की गई हैं। कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता (कुरैशा यासमीन और अन्य) पहले ही अपील ट्रिब्यूनल के पास जा चुके हैं… ऐसे में हमें लगता है कि उनकी चिंता अभी समय से पहले की है। अगर उनकी माँग मान ली जाती है, तो उसके जरूरी कानूनी परिणाम भी सामने आएँगे।”
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने का आवेदन 9 अप्रैल 2026 या उसके कुछ दिन बाद मंजूर हो जाता है, तो उसका नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा और वह वोट दे सकेगा। लेकिन कोर्ट ने यह भी बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि जिन लोगों के मामले अभी लंबित हैं, उन्हें चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
BBC आर्टिकल के लेखक की हिंदू-विरोधी, BJP-विरोधी और कभी प्रो-TMC आर्टिकल लिखने की आदत
हालाँकि, स्निधेंदु भट्टाचार्य का बार-बार ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाना हैर करने वाला नहीं है, क्योंकि पहले भी वह हिंदू और हिंदुत्व के खिलाफ लिखे गए आर्टिकल को लेकर चर्चा में रहे हैं।
इतना ही नहीं चुनावों के दौरान उनके TMC के पक्ष में लिखे गए आर्टिकल का भी एक रिकॉर्ड रहा है, जिससे उनकी रिपोर्टिंग पर सवाल उठते रहे हैं।
जहाँ तक बंगाल का सवाल है, यह उन राज्यों में शामिल है जहाँ बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के मामले ज्यादा सामने आते हैं। पिछले तीन साल में 2600 से ज्यादा बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और वापस भेजा गया है। राज्य के कुल 10 जिले ऐसे हैं जो बांग्लादेश की सीमा से जुड़े हुए हैं। जैसे उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी। ऐसे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ और उससे जुड़े मुद्दे लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं।
सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों की जातीय और भाषा की समानता की वजह से आवाजाही को पकड़ना हमेशा मुश्किल रहा है। इसी का फायदा उठाकर कई बांग्लादेशी घुसपैठिए, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम बताए जाते हैं, यहाँ स्थानीय पहचान पत्र बनवाने और मतदाता सूची में अपने नाम जुड़वाने में सफल हो जाते हैं। ऐसे में SIR जैसे अभियान के जरिए उनकी पहचान करना और उन्हें मतदाता सूची से हटाना एक तरीका माना जा सकता है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या कुछ राजनीतिक दल और उनके समर्थक मीडिया समूह ऐसे लोगों को वोटबैंक के रूप में बनाए रखना चाहते हैं।
पिछले साल भी ऐसा देखा गया था कि जैसे ही नवंबर 2025 में SIR के दूसरे चरण के तहत घर-घर जाकर जाँच की घोषणा हुई, कई अवैध घुसपैठियों में घबराहट फैल गई। कुछ लोगों ने तो यह भी माना कि वे बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में आए थे। इसके बाद अचानक कई लोगों का वहाँ से चले जाना इस बात का संकेत था कि उन्हें पकड़े जाने का डर था।
वहीं, यह भी हैरानी की बात नहीं मानी जा रही कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे पत्रकार को मंच दिया, जिन्होंने इस मुद्दे पर ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाया। BBC पर पहले भी भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लगते रहे हैं। चाहे 2022 की लीसेस्टर हिंसा हो, 2020 के दिल्ली दंगे या फिर बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ घटनाों की कवरेज।
हैरानी की बात नहीं है कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे एक पक्षपाती ‘स्वतंत्र पत्रकार’ को मंच दिया, जिन्होंने बंगाल के SIR को लेकर मुस्लिम पीड़ित वाली कहानी पेश की। ब्रिटेन के इस मीडिया संस्थान पर पहले भी कई बार भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लग चुके हैं। चाहे 2022 में लीसेस्टर की हिंसा की कवरेज हो, 2020 के दिल्ली दंगों की रिपोर्टिंग या फिर हिंदू-घृणा वाले पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर जैसे लोगों को नरम छवि में दिखाना। इन सभी मामलों में उस पर सवाल उठे हैं।इसके अलावा ईरान युद्ध से पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान भारत के तेल भंडार को लेकर डर फैलाने वाली खबरें हो या 2024 में बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी नरसंहार को छिपाने का प्रयास करने जैसे उदाहरण हों।
पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर जिस तरह की अव्यवस्था, अनुचित राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक शिथिलता लगातार सामने आ रही है, उसने राज्य सरकार की नीयत और क्षमता दोनों पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट, कोलकाता हाईकोर्ट और चुनाव आयोग बार-बार पश्चिम बंगाल सरकार को डांट-फटकार लगा रहे हैं। राज्य सरकार को निर्देश दे रहे हैं कि मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरी हो। लेकिन ममता बनर्जी और उनकी सरकार के कान में जूं तक नहीं रेंग रही है। अदालत और संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों के नाफरमानी सरकार की आदत बनती जा रही है। न्यायिक अधिकारियों की तैनाती से लेकर अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाने तक हर स्तर पर अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा, क्योंकि राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन पर भरोसा लगातार कमजोर होता गया। लेकिन विधानसभा चुनावों में हार को लेकर डरी ममता सरकार की कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं दिख रहा। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में SIR से जुड़े 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बंधक बनाए जाने की घटना पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि उन्हें नौ घंटे भूखे बंधक बनाकर रखा गया। यह घटना सोची-समझी और भड़काऊ लगती है। इसका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और चुनावी प्रक्रिया को बाधित करना है।
बंगाल में कोर्ट से लेकर संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की अवमानना
दरअसल, हार की हताशा में पश्चिम बंगाल में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अदालत को “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” जैसी कठोर टिप्पणी करनी पड़ी। यह केवल SIR का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या पश्चिम बंगाल सरकार संवैधानिक संस्थाओं के आदेशों का पालन करने के लिए तैयार भी है या नहीं। नाम कटने, फर्जी आपत्तियों, तकनीकी गड़बड़ियों, न्यायिक अधिकारियों को घेरने और प्रशासनिक अराजकता जैसी घटनाएं यह साबित करती हैं कि राज्य सरकार संवैधानिक संस्थाओं की चेतावनियों को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। जब संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की लगातार अनदेखी होती है, तब यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बन जाता है। ममता बनर्जी और उनकी सरकार हर बार राजनीतिक साजिश और विक्टिम कार्ड का सहारा लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती दिखती हैं, जबकि सच्चाई यह है कि संवैधानिक संस्थाओं की अवमानना धीरे-धीरे उनकी सरकार की कार्यशैली का स्थायी हिस्सा बनती जा रही है।
सात न्यायिक अधिकारियों का कई घंटे तक घेराव और नारेबाजी
सर्वोच्च अदालत में सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था ढह गई है। बेंच ने राज्य के गृह सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों से उनकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा। दरअसल, 7 न्यायिक अधिकारी बुधवार को मालदा के बीडीओ ऑफिस पहुंचे थे। इनमें तीन महिलाएं थीं। तभी वोटर लिस्ट में कथित रूप से नाम कटने के विरोध में हजारों लोगों ने ऑफिस को घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारी नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन करते रहे। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई।
कोर्ट रूम LIVE-सीजेआई सूर्यकांत ने ममता सरकार को जमकर लगाई फटकार दरअसल सुप्रीम कोर्ट में SIR के खिलाफ लगाई गई याचिका पर सुनवाई हो रही थी। इस मामले में याचिकाकर्ताओं और राज्य की ओर से पेश वकील- वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, श्याम दीवान, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी। भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू भारत निर्वाचन आयोग की तरफ से थे। CJI: क्या आपने देखा है कि क्या हुआ है? कपिल सिब्बल: मुझे एक रिपोर्ट (मालदा वाली) मिली है… मैंने इसे पढ़ा है। मेनका गुरुस्वामी: ये एक गैरराजनीतिक विरोध प्रदर्शन था। CJI: हम इसे राजनीतिक नहीं बनाना चाहते। तुषार मेहता: यह पूरी तरह से अस्वीकार्य है! CJI: रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां मौजूद नहीं था। मुझे रात में मौखिक रूप से आदेश देने पड़े। खाना और पानी तक नहीं लेने दिया गया। जस्टिस बागची: जिन व्यक्तियों को अब कानून-व्यवस्था सौंपी गई है, उन्हें ज्यादा सतर्क रहना होगा। कृपया पूछताछ करें… राज्य के ऐसे नेता हैं जिन्हें एक स्वर में बोलना चाहिए… हम यहां विशेष अधिकारियों की सुरक्षा के लिए हैं। गोपाल एस: हम सुरक्षा बढ़ाएंगे। तुषार मेहता: न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए अब राज्य पर भरोसा करना बुद्धिमानी नहीं होगी। जस्टिस बागची: हम इसे चुनाव आयोग पर छोड़ते हैं। गोपाल एस: रिपोर्ट कहती है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने अब सुरक्षा सुनिश्चित कर ली है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीणों ने कहा है कि वे विरोध जारी रखेंगे। पश्चिम बंगाल के एडवोकेट जनरल: हम सभी जानते हैं कि न्यायिक अधिकारियों की रक्षा की जानी चाहिए। चुनाव आयोग को विरोधी के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए। CJI: मिस्टर एडवोकेट जनरल, अब आप हमें मजबूर कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, आपके राज्य में आप में से हर कोई राजनीतिक भाषा बोलता है। यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है। हमने कभी इतना ध्रुवीकृत राज्य नहीं देखा। यहां तक कि अदालती आदेशों के पालन में भी राजनीति झलकती है। क्या आपको लगता है कि हमें नहीं पता कि उपद्रवी कौन हैं? कम से कम मैं रात 2 बजे तक सब कुछ मॉनिटर कर रहा था! ‘अगर विरोध अराजनीतिक था, तो राजनीतिक नेता क्या कर रहे थे? क्या यह उनका कर्तव्य नहीं था कि वे मौके पर पहुंचें और देखें कि क्या हो रहा है? कि कोई कानून-व्यवस्था को अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है? 5 बजे इन लोगों ने अधिकारियों को घेर लिया। रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां नहीं था।’
मालदा घटना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिए सात आदेश
CBI या NIA जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए। एजेंसी सीधे कोर्ट को रिपोर्ट देगी।
चीफ सेक्रेटरी, DGP, DM, SSP को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
सभी जिम्मेदार अधिकारियों को 6 अप्रैल को कोर्ट में पेश होने का आदेश।
चुनाव आयोग (ECI) को कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात करें।
जहां-जहां जज काम कर रहे हैं, वहां सुरक्षा बढ़ाएं।
जिस गेस्ट हाउस में जज रुके हैं, उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए।
जहां SIR का काम चल रहा है, वहां एक बार में सिर्फ 5 लोगों को ही जाने की अनुमति होगी।
7 अधिकारी, 9 घंटे रहे बंधक, 6 पॉइंट में जानिए सारा मामला
1. सुबह 10 बजे; प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में जुड़ते गए, विरोध प्रदर्शन किया। एक अप्रैल को सुबह 10 बजे प्रदर्शनकारी छोटे ग्रुप में इकठ्ठा होते गए। फिर वे BDO ऑफिस के करीब गए, यहां प्रदर्शन करने लगे। 2. दोपहर 2 बजे; न्यायिक अधिकारी मालदा के BDO ऑफिस पहुंचे। दोपहर 2 बजे के करीब 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर मालदा के माताबारी स्थित BDO ऑफिस पहुंचे। ये सभी अधिकारी SIR प्रोसेस से जुड़ा काम देख रहे थे। 3. शाम 6 बजे; वोटर लिस्ट में नाम कटने को लेकर हजारों प्रदर्शनकारी बाहर जमा। इलेक्शन ऑब्जर्वर के ऑफिस पहुंचने की सूचना मिलते ही हजारों स्थानीय लोग बाहर जमा हो गए। उन्होंने SIR में नाम कटने के विरोध में प्रदर्शन किया। 4. शाम 7 बजे; प्रदर्शनकारियों की ऑफिस के अंदर जाने की मांग। प्रदर्शनकारियों ने ऑफिस का घेराव कर लिया। सभी 7 इलेक्शन ऑब्जर्वर को बाहर निकलने नहीं दिया। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि वे अधिकारियों के सामने अपनी बात रखना चाहते हैं। जिससे इनकार कर दिया गया। 5. रात 11 बजे; पुलिस सुरक्षा में अधिकारी निकाले गए, गाड़ी रोकने की कोशिश। कई घंटों तक चले हंगामे के बाद प्रदर्शनकारी जब नहीं हटे तो पुलिस की मदद लेनी पड़ी। पुलिस सुरक्षा में अधिकारियों को बाहर ले जाया गया। इस दौरान भी रास्ते में बैरेकेडिंग कर उन्हें रोकने की कोशिश की गई। 6. रात 12 बजे; न्यायिक अधिकारी की गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई, ईंट से हमला। जिस गाड़ी से न्यायिक अधिकारियों को बाहर निकाला गया। उस गाड़ी पर प्रदर्शनकारियों ने ईंट से हमला किया। गाड़ी के शीशे तोड़ दिए गए।
अब 4 पॉइंट में मालदा में वोटर लिस्ट में जुड़ा पूरा विवाद
1. यह मामला क्या है? दस्तावेजों में गड़बड़ियां, काफी समय से अनुपस्थिति और तकनीकी त्रुटियों के चलते SIR के बाद मालदा सहित राज्य के कई सीमावर्ती जिलों में हजारों लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। तभी से स्थानीय लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। 2. यह कितने गांवों से जुड़ा है? मालदा जिले में 100 से ज्यादा गांवों की मतदाता सूची इस संशोधन से प्रभावित हुई है। 3. SIR में हर गांव से कितने लोगों के नाम काटे गए? यह आंकड़ा प्रशासन ने जारी नहीं किया है, लेकिन विभिन्न सूत्रों और ग्राम पंचायतों से मिली जानकारी के अनुसार शिलालमपुर कालियाचक-2 से 427 लोगों के नाम हटाए गए। कुछ अन्य गांवों में 50 से 200 तक मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबर है। हालांकि जिन नामों को हटाया गया है, उनकी समीक्षा जारी है। 4. नाम क्यों काटे गए? • दस्तावेजों में गड़बड़ी: SIR की सुनवाई के दौरान जमा किए गए दस्तावेजों को कई मामलों में ‘अप्रमाणित’ या ‘अपर्याप्त’ माना गया। • लंबे समय से अनुपस्थिति: कुछ मामलों में यह कहा गया कि संबंधित व्यक्ति उस पते पर स्थायी रूप से नहीं रहते (विशेषकर प्रवासी मजदूर)। • तकनीकी व प्रक्रियागत त्रुटियां: डिजिटल डाटाबेस अपडेट के दौरान एक ही व्यक्ति का नाम दो बार होना या जन्मतिथि में गलती जैसी वजहों से भी नाम हटे।
सीजेआई भड़के और कहा कि फिजूल की आपत्तियां ना उठाएं इससे पपहले पश्चिम बंगाल एसआईआर मामले में बुधवार को भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। पश्चिम बंगाल में SIR यानी विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने ऐसी दलील दी, जिस पर सीजेआई सूर्यकांत भड़क गए। टीएमस सांसद कल्याण बनर्जी की दलीलों पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि फिजूल की आपत्तियां न उठाएं यह सिर्फ ओरिएंटेशन है। दरअसल, टीएमसी सांसद ने अपीलीय ट्रिब्यूनल के गठन पर सवाल उठाया था। पश्चिम बंगाल में एसआईआर मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल और TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने दलीलें रखीं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि अब तक करीब 47 लाख आपत्तियों का निपटारा किया जा चुका है। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने सुप्रीम कोर्ट को जानकारी दी कि हर दिन लगभग 2 लाख आपत्तियों पर कार्रवाई की जा रही है। कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने अपने पत्र में CJI को बताया कि सात अप्रैल तक सभी आपत्तियों का निपटारा कर दिया जाएगा। वहीं, चुनाव आयोग (ECI) ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं।
ममता ने ‘खेला होबे’ से किया इशारा, राज्य में डर का राज – भाजपा राज्य के अंदर की बिगड़ी स्थिति को संभाल पाने में विफल रहने पर टीएमसी मालदा की घटना की जिम्मेदारी गृह मंत्री अमित शाह पर डालने की बेशर्मी भी कर रही है। टीएमसी के मुताबिक शाह लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने में बार-बार विफल रहे। इससे कानून-व्यवस्था कमजोर हुई। दूसरी ओर भाजपा ने कहा कि तृणमूल सरकार ने बंगाल में डर का राज कायम कर रखा है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने ‘एक्स’ पर लिखा-‘मालदा के कालियाचक में हिंसक भीड़ ने 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लिया। राष्ट्रीय राजमार्ग जाम कर दिए गए। आवाजाही ठप हो गई और सत्ता की जगह डर का राज छा गया। ममता बनर्जी ने एक दिन पहले कहा था- खेला होबे। क्या उनका इशारा इसी ओर था?’ बता दें कि पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत 28 फरवरी को फाइनल वोटर लिस्ट जारी हुई थी। इसमें 7.04 करोड़ वोटर के नाम थे। लगभग 60 लाख नाम न्यायिक जांच के दायरे में रखे गए। इन्हें वोटर लिस्ट में रखने या हटाने पर फैसले के लिए 705 न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया था।
THIS IS SHOCKING & UNPRECEDENTED ON SO MANY LEVELS!
7 JUDICIAL OFFICERS ( including women ) TRAPPED, BLOCKED AND HELD HOSTAGE BY A VIOLENT MOB IN KALIACHAK, MALDA!
A public institution turned into a site of siege, National highways choked, movement paralysed, and fear… pic.twitter.com/fVZPTZRsNU
— Pradeep Bhandari(प्रदीप भंडारी)🇮🇳 (@pradip103) April 2, 2026
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े प्रमुख घटनाक्रम की टाइमलाइन • 2 अप्रैल 2026: Supreme Court of India ने मालदा में सात न्यायिक अधिकारियों को कई घंटों तक बंधक बनाए जाने की घटना पर स्वतः संज्ञान लिया। अदालत ने इसे “कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन” बताया और राज्य के मुख्य सचिव, DGP, मालदा DM और SP को नोटिस जारी किया। • 1 अप्रैल 2026: मालदा के कालियाचक में SIR मामलों की सुनवाई कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों, जिनमें तीन महिला अधिकारी भी थीं, को दोपहर से रात तक BDO कार्यालय में घेरकर रखा गया। पुलिस और CAPF की मदद से देर रात अधिकारियों को निकाला गया। • 31 मार्च 2026: Supreme Court of India ने कहा कि लगभग 60 लाख दावे और आपत्तियां SIR प्रक्रिया में आई हैं, जिनमें से 47.3 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है। अदालत ने बाकी मामलों को 7 अप्रैल तक पूरा करने का निर्देश देने के साथ ही कहा की फालतू की आपत्तियां ना लगाएं। • 30 मार्च 2026: TMC ने मांग की कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उनके लिए कारण सार्वजनिक किए जाएं और अपील की प्रक्रिया को जिला स्तर से नीचे BDO स्तर तक ले जाया जाए। • 28 मार्च 2026: Election Commission of India ने SIR मामलों के खिलाफ अपील सुनने के लिए 24 जिलों में अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए। बाद में Supreme Court of India ने इन ट्रिब्यूनलों को ताजा दस्तावेज स्वीकार करने की अनुमति भी दी। • मार्च 2026 के दूसरे और तीसरे सप्ताह: Murshidabad, Malda, Nadia और सीमावर्ती जिलों में कथित रूप से मतदाता सूची से नाम कटने के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन, सड़क जाम, धरना और राजनीतिक टकराव बढ़े।
10 मार्च 2026: Supreme Court of India ने SIR में लगे न्यायिक अधिकारियों की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों को फटकार लगाई और कहा कि सरकार को न्यायिक अधिकारियों की ईमानदारी पर संदेह करना उचित नहीं है। • मार्च 2026 की शुरुआत: टीएमसी के लोगों ने आरोप लगाया कि मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए जा रहे हैं। Murshidabad, Malda और सीमावर्ती जिलों में सबसे ज्यादा दावे और आपत्तियां दर्ज हुईं। • 27 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने TMC की उस आपत्ति को खारिज कर दिया जिसमें न्यायिक अधिकारियों को दिए जा रहे ECI के प्रशिक्षण मॉड्यूल पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारी किसी दबाव में नहीं आएंगे। • 26 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 530 न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की। इन्हें विभिन्न जिलों में दावे, आपत्तियां और मतदाता सूची की जांच की जिम्मेदारी दी गई। • 22 फरवरी 2026: SIR में “logical discrepancy” वाले मामलों की संख्या को लेकर नया विवाद सामने आया। यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि कितने मामलों को न्यायिक अधिकारियों के पास भेजा जाएगा। • 20 फरवरी 2026: Supreme Court of India ने Calcutta High Court को सेवा में कार्यरत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को SIR कार्य में लगाने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार और Election Commission of India के बीच “trust deficit” है। • 17 फरवरी 2026: Election Commission of India ने राज्य सरकार को SIR में हुई कथित गड़बड़ियों पर कार्रवाई और FIR दर्ज करने के निर्देशों के पालन के लिए अंतिम समयसीमा दी।
16 फरवरी 2026: Election Commission of India ने SIR प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही, कर्तव्य में चूक और अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप में सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया। • 10 फरवरी 2026: Election Commission of India ने घोषणा की कि SIR से जुड़े दावे और आपत्तियों की सुनवाई 21 फरवरी तक पूरी होगी और अंतिम मतदाता सूची 28 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी। • 3 फरवरी 2026: Mamata Banerjee ने Supreme Court of India और चुनाव आयोग के सामने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। हालांकि इसको लेकर वह कोई ठोस तथ्य नहीं दे पाईं। • 12 जनवरी 2026: Mamata Banerjee ने Election Commission of India को अपना पांचवां पत्र भेजा और आरोप लगाया कि AI आधारित डिजिटाइजेशन और सॉफ्टवेयर त्रुटियों की वजह से मतदाताओं के नाम गलत तरीके से चिह्नित किए जा रहे हैं। • जनवरी 2026 के पहले सप्ताह: पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर मतदाता सत्यापन, नाम जोड़ने, हटाने और दस्तावेज जांच का काम बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। सीमावर्ती जिलों, विशेषकर Murshidabad, Malda और Nadia में शुरुआत से ही सबसे ज्यादा विवाद सामने आए।
जो ममता बनर्जी विपक्ष में रहते घुसपैठियों को बाहर निकालने का शोर मचाती थी आज वही ममता घुसपैठियों को बचाने अपनी संवैधानिक सीमाओं को तोड़ने में आमादा है। आखिर क्यों आज घुसपैठियों की हिमायत कर रही हैं। बंगाल में जितने भी दंगे-फसाद हो रहे हैं क्या ममता की शै पर हो रहे हैं। दूसरे, जब से ममता बंगाल की मुख्यमंत्री बनी है तभी से हिन्दुओं पर कितने-कितने भयंकर हमले हुए हैं कितने दंगाइयों को गिरफ्तार जेलों में डाला? चुनावों में पैरों तले जमीन निकलते देख चोटिल होने का ड्रामा कर सिम्पथी वोट बटोरने का जाल बिछा देती है। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने एसआईआर की शुरुआत के पहले दिन से विरोध शुरू कर दिया है। राज्य में बड़े पैमाने पर फर्जी वोटरों को बचाने के लिए अभी से सारी हदें पार की जा रही है। प्रदेश के बीएलओ यूनाइटेड फोरम का कहना है कि राजनीतिक संरक्षण वाले अपराधी तत्व बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) को धमका रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि यदि ममता के मुताबिक राज्य में कोई बोगस वोटर नहीं है, तो उन्हें एसआईआर से एतराज क्यों है? भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पश्चिम बंगाल यूनिट ने राज्य के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (सीईओ) को एक चिट्ठी लिखकर आरोप लगाया है कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कूचबिहार ज़िला अध्यक्ष गिरिंद्रनाथ बर्मन ने एक बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को सरेआम धमकी दी। चिट्ठी में तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाया गया है कि वह वोटर लिस्ट से “भूतों, घुसपैठियों और फर्जी वोटर्स” के नामों को हटाने का विरोध कर रही है। एसआईआर की शुरुआत के दिन ही पश्चिम बंगाल में सियासी गर्मी बढ़ गई!
टीएमसी के इशारे पर गुंडा तत्व बीएलओ को धमकाने में लगे पश्चिम बंगाल बंगाल समेत देश के 12 राज्यों में चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के लिए शनिवार को BLO का ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू कर दिया है। राजस्थान समेत कई राज्यों में बीएलओ को ट्रेनिंग दी गई। लेकिन पश्चिम बंगाल में इस दौरान कई BLO ने प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्थाओं का विरोध किया। दरअसल, इसके पीछे वहां की तृणमूल सरकार ही है, जो एसआईआर का विरोध कर रही है। इसलिए पार्टी के इशारे पर गुंडा तत्व बीएलओज को धमकाने में लगे हैं। बीएलओ ने उचित दस्तावेज और सुरक्षा देने की मांग की है। BLO का कहना है कि ट्रेनिंग के दौरान उनके स्कूलों में उपस्थिति दर्ज नहीं की जा रही है और BLO के रूप में उनकी ड्यूटी को ऑन ड्यूटी नहीं माना जा रहा है।
भाजपा ने ममता बनर्जी के मार्च को जमात की रैली बताया पश्चिम बंगाल में मंगलवार को CM ममता बनर्जी ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के खिलाफ कोलकाता में विरोध मार्च निकाला। 3.8 km लंबी रैली में उनके साथ पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी और बड़ी संख्या में पार्टी वर्कर्स मौजूद रहे। इस दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि जैसे हर उर्दू बोलने वाला पाकिस्तानी नहीं, वैसे ही हर बांग्लाभाषी बांग्लादेशी नहीं होता। इधर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने ममता के मार्च को जमात की रैली बताया। उन्होंने कहा- यह भारतीय संविधान की नैतिकता के खिलाफ है। वहीं, बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा- ममता जी को अगर कुछ कहना है, तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
टीएमसी नेता चाहते हैं किसी भी फर्जी वोटर का नाम ना कटे इसी बीच, पश्चिम बंगाल के 94 हजार बूथ लेवल ऑफिसर्स (बीएलओ) खौफ में हैं। बीएलओ यूनाइटेड फोरम के महासचिव स्वप्न मंडल ने कहा कि राजनीतिक संरक्षण वाले अपराधी बीएलओ को धमका रहे हैं। मुख्य चुनाव अधिकारी से पिछले हफ्ते सुरक्षा मांगी थी। पूर्व बर्दवान जिले के एक बीएलओ ने कहा, ‘ टीएमसी वाले चाहते हैं कि कोई नाम न कटे। हम हर पल खतरे में काम कर रहे हैं।’ हालात यह है कि नेता धमकाते हैं कि कोई गड़बड़ी मिली तो बीएलओ को जेल भेज देंगे। वहीं, ममता के भतीजे और टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने वर्कर्स को बीएलओ संग साए जैसे रहने को कहा था। चुनाव आयोग के सूत्रों ने कहा कि बीएलओ की सुरक्षा का जिम्मा संबंधित थाने का है। सभी पुलिस अधीक्षकों को इस बाबत निर्देश दिए हैं।
सुरक्षा ना मिलने से बीएलओ ने सामूहिक असंतोष जताया BLO ने मांग की है कि आयोग में उनकी ट्रेनिंग और फील्ड वर्क को ड्यूटी मानने, पर्याप्त सुरक्षा देने और इसके लिए जरूरी कागजात जारी करने की मांग की है। बीएलओ ने आरोप लगाया है कि ट्रेनिंग का कोई वैध प्रमाण-पत्र या दस्तावेज नहीं दिया, जिससे वे अपने विभाग में उपस्थिति सिद्ध नहीं कर पा रहे हैं। दुर्गापुर के उप-मंडलीय कार्यालय (SDO) में भी इसी तरह के विरोध प्रदर्शन किए गए। वहां BLO ने सामूहिक रूप से असंतोष जताया। दरअसल, राज्य में SIR 4 नवम्बर से 4 दिसम्बर किया जाना है। इस दौरान बूथ स्तर अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर वोटर्स का सत्यापन और फॉर्म भरने का काम करेंगे। BLO की ट्रेनिंग 3 नवम्बर तक चलेगी।
बीएलओ की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य प्रशासन की होगी – आयोग चुनाव आयोग ने बताया कि ट्रेनिंग के दौरान केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती नहीं की जाएगी। आयोग ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य प्रशासन की होगी। आयोग ने बड़े बूथों के लिए दो BLO नियुक्त करने के प्रस्ताव को भी नहीं माना। चुनाव आयोग ने BLO के लिए 16 प्वाइंट वाली गाइडलाइन जारी की है और फील्ड कार्य को सरल बनाने के लिए एक नया मोबाइल एप भी शुरू किया है। ट्रेनिंग के दौरान BLO को विशेष किट और प्रोसेस की विस्तार से जानकारी दी जा रही है। एक बीएलओ ने कहा, “हम काम करने को तैयार हैं, लेकिन राज्य सरकार को हमें सुरक्षा और उचित प्रमाण-पत्र देना चाहिए। इनके बिना हम ड्यूटी जारी नहीं रख सकते।”
पूरी वोटर लिस्ट के बिना आए तो बीएलओ को बांधने की धमकी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की पश्चिम बंगाल यूनिट ने राज्य के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (सीईओ) को एक चिट्ठी लिखकर आरोप लगाया है कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कूचबिहार ज़िला अध्यक्ष गिरिंद्रनाथ बर्मन ने एक बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को सरेआम धमकी दी। शिकायत के मुताबिक, बर्मन ने कथित तौर पर अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि अगर बीएलओ 2000 लोगों की पूरी वोटर लिस्ट के बिना आता है, तो उसे बांध देना, यह कहते हुए कि “हम उसे बांध देंगे.” इस घटना का एक वीडियो लिंक भी चिट्ठी के साथ अटैच किया गया है।
लिस्ट से “भूतों, घुसपैठियों, फर्जी वोटर” के नाम हटाने का विरोध बीजेपी ने इसे खुलेआम डराने-धमकाने वाला काम बताया और दावा किया कि यह BLOs को स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रोसेस के तहत अपनी ड्यूटी करने से रोकने के लिए दी जा रही धमकियों का एक बड़ा हिस्सा है। चिट्ठी में तृणमूल पर आरोप लगाया गया है कि वह वोटर लिस्ट से “भूतों, घुसपैठियों और नकली लोगों” के नाम हटाने का विरोध कर रही है। बीजेपी ने CEO से गिरिंद्रनाथ बर्मन के खिलाफ ड्यूटी पर मौजूद सरकारी कर्मचारी को धमकी देने के लिए FIR दर्ज करने की अपील की है और चेतावनी दी है कि अगर कार्रवाई नहीं की गई तो ऐसी और भी घटनाएं हो सकती हैं और अधिकारियों पर शारीरिक हमले भी हो सकते हैं।
12 राज्यों में 51 करोड़ वोटर्स के लिए 5.33 लाख बीएलओ देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR शुरू हो गया। इनमें से तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल और पश्चिम बंगाल में 2026 में चुनाव हैं। असम में भी अगले साल चुनाव हैं, लेकिन अभी वहां SIR का शेड्यूल तय नहीं है। जिन 12 राज्यों में SIR होना है, उनमें पश्चिम बंगाल, अंडमान निकोबार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, लक्षद्वीप, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश शामिल हैं। SIR वाले 12 राज्यों में करीब 51 करोड़ वोटर्स हैं। इस काम में 5.33 लाख बीएलओ (BLO) और 7 लाख से ज्यादा बीएलए (BLA) राजनीतिक दलों की ओर से लगाए जाएंगे। SIR के दौरान BLO/BLA वोटर को फॉर्म देंगे। वोटर को उन्हें जानकारी मैच करवानी है। अगर दो जगह वोटर लिस्ट में नाम है तो उसे एक जगह से कटवाना होगा। अगर नाम वोटर लिस्ट में नहीं है तो जुड़वाने के लिए फॉर्म भरना होगा और संबंधित डॉक्यूमेंट्स देने होंगे।
पूर्व चुनाव आयुक्त T N Sheshan अनेक विरोधों के बीच चुनाव आयोग के जिस संविधान को खोलकर गए है बंद होने का नाम ले रहा। भारत में इतनी ज्यादा पार्टियां हैं जिनकी कोई गिनती नहीं, दूसरे अगर सारी दुनियां में पार्टियों को मिला लिया जाए, सभी भारत में पार्टियों की भरमार की पासंग भी नहीं होंगी। वैसे राजनीतिक पार्टी बनाना सफेदपोश धंधा है। जिन्हे कोई कामधाम नहीं मिलता या करना चाहते पार्टी बना लो और मालपुए खाते रहो। चुनाव में सौदेबाज़ी कर तिजोरी भरो जनता जाए भाड़ में। चुनाव आयोग द्वारा बहुत ज्यादा देर से कदम उठाया है। भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने देश की चुनावी व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। शुक्रवार (19 सितंबर 2025) को चुनाव आयोग ने 474 पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों (RUPPs) को डीलिस्ट कर दिया क्योंकि ये पिछले 6 सालों से कोई चुनाव नहीं लड़ रहे थे।
इससे पहले 9 अगस्त 2025 को ऐसे ही 334 दल हटाए गए थे। यानी सिर्फ दो महीनों में कुल 808 दलों को बाहर किया गया है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत राजनीतिक दलों को अपना पंजीकरण बनाए रखने के लिए चुनावों में सक्रिय रूप से भाग लेना आवश्यक है।
चुनाव आयोग का कहना है कि जो पार्टियाँ लगातार 6 साल तक कोई चुनाव नहीं लड़तीं, उन्हें एक्ट के मुताबिक हटाया जा सकता है। इसके पीछे मकसद यह है कि सिर्फ नाम की पार्टियाँ जो चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लेतीं, लेकिन चुनाव चिन्ह और टैक्स जैसी सुविधाएँ लेती हैं, उन्हें हटाया जाए।
इस बार सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश पर पड़ा जहाँ 121 पार्टियाँ हटाई गईं जबकि महाराष्ट्र में 44, तमिलनाडु में 42, दिल्ली में 40, पंजाब में 21 और राजस्थान में 17 पार्टियों को हटाया गया।
ECI यहीं नहीं रुका। अब तीसरे चरण में 359 और पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई है। ये वे पार्टियाँ हैं, जिन्होंने भले ही पिछले 6 सालों में चुनाव लड़ा है लेकिन उन्होंने अपने ऑडिटेड अकाउंट्स और चुनाव खर्च की रिपोर्ट तीन सालों (2021-22, 2022-23 और 2023-24) से नहीं दी है।
इन सभी को अब शो-कॉज नोटिस भेजा गया है और जवाब मिलने के बाद उन पर भी फैसला लिया जाएगा। यहाँ भी उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, जहाँ 127 पार्टियाँ इस जाँच के घेरे में हैं, इसके बाद दिल्ली (41), तमिलनाडु (39) और बिहार (30) हैं। फिलहाल भारत में 6 राष्ट्रीय पार्टियाँ, 67 राज्य पार्टियाँ और आज की कार्रवाई के बाद 2046 RUPPs बाकी हैं।
इस पूरी मुहिम का मकसद है कि जो पार्टियाँ न तो चुनाव लड़ती हैं और न ही पारदर्शिता बरतती हैं, उन्हें हटाकर भारत की चुनावी लिस्ट को साफ किया जाए, ताकि लोकतंत्र मजबूत हो और चुनावी प्रक्रिया में गंभीर पार्टियाँ ही बनी रहें।
चुनाव आयोग की यह सख्त कार्रवाई भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में एक अहम कदम है। इससे चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी।
सनातन के गुरु स्वामी विवेकानन्द का कहना था कि हर बुराई में अच्छाई छिपी होती है। इस कड़वे सच को कोई झुठला नहीं सकता। "विनाश काले विपरीत बुद्धि"। LoP बने राहुल गाँधी जिस तरह Newslaundry और जॉर्ज सोरोस के पटकथा पर काम कर रहे हैं, निश्चितरूप से कांग्रेस की पतन की बहुत तेजी से बढ़ रही है। वैसे कांग्रेस के पतन की भविष्यवाणी 7 नवम्बर 1966 को पार्लियामेंट स्ट्रीट पर आचार्य कृपालु महाराज कर दी गयी थी। जब गो-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु समाज से खून की होली खेलते हुए पूरी पार्लियामेंट स्ट्रीट साधुओं की लाशों और लहू से पट गयी थी। तब आचार्य कृपालु जी ने हुंकार भरी थी कि "इन्दिरा तेरी पार्टी को बर्बाद करने हिमालय से आधुनिक ड्रेस में एक तपस्वी आएगा", इस बात को मेरी आयु के सियासत से लेकर पत्रकारिता से जुड़े लोग भूले नहीं होंगे। परिणाम सामने है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में कांग्रेस और विपक्ष देश विरोध कर अपने पतन की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
इतना ही नहीं, तब एक महान आत्मा यानि श्रद्धेय साधु ने पार्लियामेंट स्ट्रीट पर ही भूख हड़ताल कर अपने प्राण दे दिए, लेकिन कांग्रेस गुलाम किसी भी मीडिया ने इस दुखद समाचार को प्रकाशित नहीं किया। खैर, कांग्रेस के पतन की पटकथा 1966 में ही पार्लियामेंट स्ट्रीट पर लिख दी गयी थी।
कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग पर बेबुनियाद ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाकर उसे ‘मुद्दा’ बनाने की कोशिश करती है, जबकि उसके समर्थक प्रोपेगेंडा चैनल अपने राजनीतिक आकाओं के दावों को ‘विश्वसनीय’ बताते हुए झूठे तथ्यों का प्रचार-प्रसार करते हैं।
पत्रकार विजय पटेल ने इस सांठगांठ को उजागर करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हाल ही में पोस्ट डाला है। इसमें बताया गया है कि कैसे राहुल गाँधी और कांग्रेस का ‘वोट चोरी‘ प्रचार अभियान भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रहा है और हिन्दू विरोधियों के हाथों में इसकी डोर है।
The biggest exposé on Rahul Gandhi’s 'Vote Chori' PPT.
The entire PPT is a hoax created from conspiracy theory and based on the articles and analysis of an extremist and mentaly ill person.
कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी की 7 अगस्त को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई गई ‘वोट चोरी’ पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन पहले ही सवालों के घेरे में आ चुकी है, लेकिन हालिया खुलासे चुनावी धोखाधड़ी के उनके दावों को और कमजोर कर देते हैं। गाँधी को न केवल ‘वोट चोरी’ प्रेजेंटेशन के कारण, बल्कि वामपंथी प्रचारक न्यूज़लॉन्ड्री में प्रकाशित हिटजॉब्स पर उनकी निर्भरता के कारण भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
ये प्रोपेगैंडा लेख कट्टर हिंदू-विरोधी लोगों द्वारा लिखे गए हैं। इनमें से एक की पहचान विशाल वैभव के रूप में हुई है। ये लोग चुनाव आयोग के खिलाफ साजिश कर रहे हैं।
विवादास्पद पीपीटी के चौथे पेज पर, राहुल गाँधी ने दावा किया, “महाराष्ट्र के नतीजों ने बड़े पैमाने पर वोट चोरी के हमारे संदेह की पुष्टि की है।” पीपीटी में न्यूज़लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। विशाल वैभव और सुमेधा मित्तल द्वारा लिखी गई इस रिपोर्ट का शीर्षक है, “नए मतदाताओं की बाढ़? कामठी का अजीबोगरीब मामला, जहाँ महाराष्ट्र भाजपा प्रमुख जीते।”
चुनाव आयोग की ईमानदारी पर सवाल उठाने के लिए न्यूज़लॉन्ड्री के प्रचार लेखों का सहारा लेना, उनके ‘वोट चोरी’ के दावों की विश्वसनीयता को दर्शाता है। हालाँकि यह बात सामने आई है कि न्यूज़लॉन्ड्री के पत्रकार विशाल वैभव हिंदू विरोधी हैं, जो वैचारिक मतभेदों को लेकर हिंदू समर्थक सोशल मीडिया यूजर्स पर ‘गौमूत्र’, ‘cowf&kers’ और ‘D%kless Hindutva’ जैसे तंज कसते हैं।
न्यूज़लॉन्ड्री पर ऑथर पेज के अनुसार, विशाल वैभव आईआईटी-दिल्ली में भौतिकी के पूर्व प्रोफेसर हैं। हालाँकि एक्स अकाउंट ‘@panchagavyag’, जो पहले ‘@vvaibhav_iid’ था, अब मौजूद नहीं है। इसमें हिंदू-विरोधी पोस्ट के स्क्रीनशॉट ऑनलाइन दिख जाएँगे।
शायद, न्यूज़लॉन्ड्री के प्रोपेगैंडा फैक्ट्री का हिस्सा बनने के लिए हिंदुओं को ‘गाली देना’ अनिवार्य पात्रता है। राहुल गाँधी ने अपनी वोट चोरी वाले पीपीटी में जिस न्यूज़लॉन्ड्री रिपोर्टर की सह-लेखिका सुमेधा मित्तल की बात की, अब उसके बारे में बात करते हैं। उसका कांग्रेस पार्टी से पुराना नाता रहा है। सुमेधा मित्तल के लिंक्डइन पेज के अनुसार, उन्होंने कुछ समय के लिए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) नामक एक थिंक टैंक में काम किया था। इस थिंक टैंक की ऑनर और संचालक विवादास्पद कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की बेटी यामिनी अय्यर है।
ऑपइंडिया ने पहले बताया था कि कैसे सीपीआर विदेशी फंडिंग मानदंडों के उल्लंघन के लिए जाँच के घेरे में रहा है और केंद्र सरकार ने इसका लाइसेंस निलंबित कर दिया था। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च पर सितंबर 2022 में आयकर छापे पड़े थे। जुलाई 2023 में अय्यर के सीपीआर को टैक्स छूट मिलना भी बंद हो गया।
मित्तल इंडियास्पेंड (IndiaSpend) पोर्टल के साथ काम कर चुके हैं। इंडियास्पेंड कांग्रेस पार्टी की वैचारिक विचारधारा से सबसे ज़्यादा जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, कांग्रेस पार्टी के डेटा एनालिटिक्स विभाग के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती इंडियास्पेंड के संस्थापक ट्रस्टी हैं। हालाँकि, इंडियास्पेंड की वेबसाइट में उनका नाम नहीं है। ऑपइंडिया ने कई मौकों पर इंडियास्पेंड के हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी झूठों का पर्दाफ़ाश किया है। इंडियास्पेंड ने पहले भी अपने डेटाबेस में मुस्लिम पीड़ितों की संख्या बढ़ाने के लिए तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया। कई मामलों में ऐसा देखा गया है।
न्यूज़लॉन्ड्री की वरिष्ठ रिपोर्टर सुमेधा मित्तल ने द वायर और द कारवां जैसे भाजपा-विरोधी और इस्लाम-समर्थक प्रोपोगेंडा आउटलेट्स में भी काम किया है।
दिलचस्प बात यह है कि नवंबर 2021 से सितंबर 2022 के बीच, सुमेधा मित्तल ने मोदी विरोधी और कुख्यात शासन विरोधी जॉर्ज सोरोस की क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) में काम किया। OCCRP को अमेरिकी विदेश विभाग और अब भंग हो चुकी अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (USAID) से भारी मात्रा में धन प्राप्त हुआ। OCCRP को जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन (OSF), फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन और रॉकफ़ेलर ब्रदर्स फ़ाउंडेशन जैसी संस्थाओं से आर्थिक मदद मिलती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि OCCRP ने व्यवसायी गौतम अडानी और सेबी के खिलाफ़ हिटजॉब्स प्रकाशित किए थे। OCCRP भारतीय लोकतंत्र को कमज़ोर करने के लिए बार-बार दुष्प्रचार भी करता रहा है। भारत में ‘वोट चोरी’, म्यांमार में डेटा संकलन, झूठ और भ्रामक सूचनाओं को ‘ज़बरदस्त’ खुलासे के रूप में प्रस्तुत किया गया
कांग्रेस पार्टी राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ पीपीटी के साथ एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा करने की कोशिश कर रही थी। इस बीच से बात सामने आयी कि ये दस्तावेज म्यांमार में तैयार किए गए थे। ‘वोट चोरी’ वेबसाइट पर अपलोड की गई पीडीएफ फाइलों के मेटाडेटा विश्लेषण से पता चला कि राहुल गाँधी की प्रस्तुति के तीनों संस्करण म्यांमार मानक समय (एमएमटी) में बनाए गए हैं। कांग्रेस नेताओं और आईटी सेल ने इन आरोपों को हालाँकि खारिज किया, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए।
चुनाव आयोग की ईमानदारी पर संदेह जताने के लिए कांग्रेस ने न्यूज़लॉन्ड्री के लेखों का सहारा लेना, अपने आप में उनके ‘वोट चोरी’ के दावों की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करता है। हालाँकि, यह सामने आया है कि न्यूज़लॉन्ड्री के लेखक, विशाल वैभव, एक कट्टर हिंदू विरोधी रहे हैं, जो वैचारिक मतभेदों को लेकर हिंदू समर्थक सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं पर ‘गौमूत्र’, ‘गाय-बकरियों’ और ‘गधा हिंदुत्व’ जैसे व्यंग्य करते रहते हैं। न्यूज़लॉन्ड्री पर उनके लेखक पृष्ठ के अनुसार, विशाल वैभव आईआईटी-दिल्ली में भौतिकी के पूर्व प्रोफेसर हैं। हालाँकि X अकाउंट ‘@panchagavyag’, जो पहले ‘@vvaibhav_iid’ था, अब “मौजूद नहीं है”, लेकिन उनके बेहद विक्षिप्त और हिंदू-विरोधी पोस्ट के स्क्रीनशॉट ऑनलाइन सामने आए हैं।
राहुल गाँधी द्वारा अपने वोट चोरी पीपीटी में उद्धृत न्यूज़लॉन्ड्री रिपोर्ट्स की सह-लेखिका सुमेधा मित्तल की बात करें तो उनका न केवल एक वैचारिक पूर्वाग्रह है, बल्कि कांग्रेस पार्टी से उनका पुराना संबंध भी है।
सुमेधा मित्तल के लिंक्डइन पेज के अनुसार, उन्होंने कुछ समय के लिए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) नामक एक थिंक टैंक में काम किया था। इस थिंक टैंक का स्वामित्व और संचालन विवादास्पद कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की बेटी यामिनी अय्यर के पास है। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च सितंबर 2022 में आयकर छापों का विषय रहा है। जुलाई 2023 में अय्यर के थिंक टैंक की कर छूट की स्थिति भी रद्द कर दी गई थी। मित्तल ने द वायर और द कारवां जैसे भाजपा विरोधी और इस्लाम समर्थक प्रचार आउटलेट में भी योगदान दिया है।
राहुल गाँधी की वोट चोरी के दस्तावेजों का म्यांमार में तैयार किया जाना आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि उनका करियर विदेशी ताकतों की संलिप्तता से जुड़े विवादों में घिरा रहा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर, रहस्यमयी विदेश यात्राएँ, विदेशी अधिकारियों के साथ गुप्त बैठकें, कज़ाकिस्तान, रूस और इंडोनेशिया के रोबोट द्वारा संचालित सोशल मीडिया प्रभाव अभियान, और भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप का आह्वान किया जाना, इसकी पुष्टि करते हैं।
22 पेज वाली वोट चोरी की इस पीपीटी में कांग्रेस पार्टी ‘हम हारे नहीं हैं, हमें हरा दिया गया है’ साबित करने की कोशिश करती रही। हालाँकि ऑपइंडिया ने बताया है कि कैसे चुनाव आयोग ने हर आरोप का खंडन किया, चाहे वह मतदाता पंजीकरण और मतदान प्रतिशत में वृद्धि हो, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में गड़बड़ी हो, मतदान प्रक्रिया के सीसीटीवी फुटेज को नष्ट करना हो या राहुल गाँधी द्वारा लगाए गए डिजिटल मतदाता सूची को साझा करने से चुनाव आयोग का साफ इनकार हो।
दस्तावेज़ के पेज 8 पर, गाँधी ने यह आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र के आँकड़ों को छिपा रहा है ताकि ‘वोट चोरी’ का पता नहीं चल पाए, लेकिन उनकी टीम ने बड़ी मेहनत से इसकी जाँच की है। हालाँकि, चुनाव आयोग के इस पेज में 30 एंट्री हैं और महादेवपुरा में मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 6 लाख है। इसका सीधा अर्थ यह है कि गाँधी के दावों के विपरीत, लाखों नहीं, बल्कि केवल 20,000 पेज की जाँच की आवश्यकता थी। जाहिर है, आँकड़ों पर आधारित प्रचार में भी, कांग्रेस मेलोड्रामा का तड़का लगाना नहीं भूली।
यह दस्तावेज चुनिंदा मामलों से जुड़ा है, जिसमें प्रबंधन या तकनीकी समस्याएँ शामिल थीं और उन्हें ‘वोट चोरी’ के सबूत के रूप में पेश किया गया। कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुओं की उपेक्षा का इतिहास रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी अब सरासर झूठ और वैचारिक रूप से पक्षपातपूर्ण प्रचार करने वालों पर निर्भर है और तुच्छ राजनीतिक फायदे के लिए भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।
क्या भारत में नेपाल-बांग्लादेश की तरह उपद्रव करने का जाल बिछाया जा रहा है?
राहुल गाँधी अपने चाचा संजय गाँधी की राह चल कह रहे हैं कि "जो बोल दिया वही ठीक है", लेकिन बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं कि उस समय देश में आपातकाल था और प्रधानमंत्री उसकी माँ इंदिरा गाँधी थी, लेकिन आज सरकार किसी इंदिरा गाँधी की नहीं मोदी की सरकार है। आखिर झूठे आरोपों का शोर मचाकर राहुल गाँधी क्या जहर फ़ैलाने की कोशिश कर रहे हैं? अगर राहुल के आरोपों में दम है तो लिखित में चुनाव आयोग को क्यों नहीं देते? राहुल को मालूम है कि जिस दिन लिख कर दे दिया कांग्रेस समर्थक वकीलों की भीड़ और कोई कोर्ट राहुल को जेल जाने से नहीं रोक सकता। दूसरे, अगर जिस तरह अपने ट्विटर पर Gen Z का जिक्र कर जिस ओर इशारा किया है, अगर उपद्रव हुआ तो राहुल को इस बात को भी ध्यान रखना होगा कि INDI गठबंधन में शामिल कोई पार्टी संभावित उपद्रव में शामिल नहीं होगी। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि INDI गठबंधन में शामिल पार्टियां भी उपद्रव होने की स्थिति में कांग्रेस के खिलाफ सरकार के साथ खड़ा होने पर गंभीरता से विचार कर रही है।
साभार सोशल मीडिया
साभार सोशल मीडिया कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने एक बार फिर देश की संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। 18 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने दावा किया कि कर्नाटक के अलंद विधानसभा क्षेत्र में 6018 वोटर डिलीट किए गए, और यह कार्य सॉफ्टवेयर के जरिए ऑटोमेटेड प्रक्रिया में किया गया, जिसमें कांग्रेस समर्थकों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ही उनके बयानों में बार-बार विरोधाभास सामने आए, जिससे उनकी बातों की गंभीरता और सच्चाई दोनों पर सवाल उठने लगे हैं।
जनता को गुमराह करने की राजनीति? राहुल गांधी के इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो यह साफ झलकता है कि यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है जिसमें तथ्यों की जगह भावनाओं का सहारा लिया गया, संस्थाओं को बदनाम किया गया और वोटबैंक को भड़काने का प्रयास किया गया। साफ है कि जब एक राष्ट्रीय नेता बार-बार बिना सबूत के संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करता है, तो वह न केवल लोकतंत्र की नींव को हिला रहा होता है, बल्कि जनता के भरोसे के साथ भी खिलवाड़ कर रहा होता है।
पहले दावा, फिर पलटी: राहुल गांधी के विरोधाभासी बयान प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में राहुल गांधी ने कहा कि 6018 वोट डिलीट किए गए हैं, लेकिन थोड़ी ही देर में उन्होंने यह भी कहा कि “हमें यह नहीं पता कि अलंद में कुल कितने वोट हटाए गए।” ऐसे परस्पर विरोधी बयानों ने एक बार फिर यह साबित किया कि राहुल गांधी बिना तथ्यात्मक आधार के सनसनीखेज बयान देने के आदी हो चुके हैं।
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार, तो जिम्मेदार कौन? यह बात भी हैरान करने वाली है कि राहुल गांधी जिस अलंद क्षेत्र में वोटर लिस्ट से नाम हटाने की बात कर रहे हैं, वह कर्नाटक राज्य में है, जहां कांग्रेस की सरकार है। यानी जिन पर वह आरोप लगा रहे हैं, वे उनकी अपनी पार्टी की सरकार की जिम्मेदारी में आते हैं।
In this video, Pappu is alleging Vote chori on the Aland constituency (Karnataka).
राहुल गांधी के आरोपों पर सबसे करारा जवाब खुद कांग्रेस सरकार में मंत्री केएन राजन्ना ने दिया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि मतदाता सूची में अनियमितताओं को दूर करने में कांग्रेस विफल रही। मतदाता सूची में संशोधन उस समय हुआ जब हमारी ही सरकार सत्ता में थी। ऐसे में यह हमारी जिम्मेदारी है कि हमने इस पर समय रहते ध्यान क्यों नहीं दिया? इस बयान के लिए राजन्ना को मंत्री पद से हटा दिया गया।
"वोटर लिस्ट कांग्रेस शासन में तैयार की गई थी अगर इसमें गड़बड़ियाँ थीं तो हम अब तक चुप क्यों थे?" - कर्नाटक सरकार में मंत्री केएन राजन्ना
यही बात सत्य भी है। आजतक कभी भी सभी वोटर्स का प्रॉपर स्क्रीनिंग और वेरिफिकेशन हुआ ही नहीं, अभी बिहार से SIR के माध्यम से शुरुआत हुई लेकिन… pic.twitter.com/rJ5qUgDXHX
इस स्वीकारोक्ति से साफ है कि अगर कोई गड़बड़ी हुई भी है, तो वह कांग्रेस सरकार की नाक के नीचे, और शायद उसकी निष्क्रियता की वजह से हुई। ऐसे में कांग्रेस एक तरह से खुद पर आरोप लगा रही है।
Rahul Gandhi: "This (Vote Chori) has been going on for 10-15 years. Democracy has been HIJACKED."🤡
~ 15 years back, his own party was in power. No matter how good the SCRIPT is, RaGa never fails to EXPOSE himself 😹 pic.twitter.com/YNo5kbfB1h
वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने का काम करता है BLO राहुल गांधी के आरोपों की सच्चाई को और भी कमजोर करता है वह तथ्य जो हर जागरूक नागरिक जानता है कि वोटर लिस्ट से नाम जोड़ने या हटाने का कार्य Booth Level Officer (BLO) द्वारा किया जाता है। BLO आमतौर पर स्थानीय लोग होते हैं, जो राजनीतिक दलों से जुड़े होते हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार होने के कारण तो वहां के BLO पार्टी पदाधिकारियों के काफी करीबी भी होंगे। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर 6018 वोट गलत तरीके से हटाए गए, तो कांग्रेस ने उसी वक्त अपने स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं की? कांग्रेस ने अपने स्तर पर ब्लॉक या जिला प्रशासन से इसकी तत्काल जांच क्यों नहीं करवाई? चुनाव आयोग या अदालत में सबूतों के साथ शिकायत क्यों नहीं की गई?
आपको एक और बात जानने की है कि 2023 में ही अलंद विधानसभा में नाम काटने की खबर सामने आने के तुरंत बाद चुनाव आयोग ने ही FIR दर्ज कराई थी। इतना ही नहीं चुनाव आयोग ने मोबाइल नंबर और आईपी एड्रेस भी उपलब्ध करा दिए थे।
Fake News alert:
ECI has already shared mobile numbers and other data with the Karnataka CID.
हाइड्रोजन बम की धमकी निकली सियासी स्टंट? प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले कई दिनों से राहुल गांधी द्वारा जिस ‘हाइड्रोजन बम’ की बात की जा रही थी, वह मंच पर पहुंचते ही निराशा में बदल गई। राहुल ने कहा कि यह हाइड्रोजन बम नहीं है, असली तो अभी आना बाकी है। ध्यान देने वाली बात है कि राहुल गांधी ने 1 सितंबर को पटना में ‘वोट अधिकार यात्रा’ के समापन पर पहली बार ‘हाइड्रोजन बम’ शब्द का इस्तेमाल किया था। फिर रायबरेली में भी उन्होंने यह दोहराया था। लेकिन जब सबकी निगाहें इस तथाकथित बड़े खुलासे पर टिकी थीं, तब उन्होंने खुद ही अपनी बात को कमजोर कर दिया। क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक ड्रामा था, जिसका उद्देश्य मीडिया की सुर्खियां बटोरना भर था?
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी ने ऐसे दावे पहले भी किए हैं- राफेल डील, ‘चौकीदार चोर है’, ईवीएम पर सवाल- जो बाद में पूरी तरह से फुस्स साबित हुए। और अब ‘हाइड्रोजन बम’ का यह नया बयान भी उसी श्रेणी में जाता दिख रहा है।
संवैधानिक संस्थाओं पर बार-बार हमला, लोकतंत्र पर चोट राहुल गांधी का यह व्यवहार नया नहीं है। इससे पहले भी उन्होंने चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, ईडी, सीबीआई जैसी संस्थाओं पर सवाल उठाए हैं। ये वही संस्थाएं हैं जो लोकतंत्र की रीढ़ हैं और सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करती हैं। चौंकाने वाली बात यह रही कि उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना नहीं है, यह भारत की संस्थाओं का काम है।
जब एक वरिष्ठ सांसद, जो लोकसभा में विपक्ष का नेता भी हो, यह मानता है कि लोकतंत्र को बचाना उसकी जिम्मेदारी नहीं है, तो सवाल उठता है कि फिर बार-बार संस्थाओं पर आरोप क्यों क्या यह रणनीति जानबूझकर देश में अराजकता फैलाने और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने की है?
Rahul Gandhi’s allegations of electoral malpractice, or Vote Chori, as he keeps calling it have been dismissed by the Supreme Court in the case of Maharashtra, while the Tamil Nadu High Court rejected a plea seeking intervention on the fake charges he levelled in Karnataka.… https://t.co/949T6baegT