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असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने वाले भाग गए और मांगने वाले रुके रहे भारत में

                                                                                    साभार: सोशल मीडिया  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले कुछ वर्षों से अपने भाषणों में लगातार एक बात कहते रहे हैं कि कांग्रेस अब एमएलसी यानी ‘मुस्लिम लीगी कांग्रेस’ बनती जा रही है। कांग्रेस के युवराज और अन्य नेता इसे चुनावी जुमला कहकर खारिज करता रहे हैं, लेकिन हाल ही में पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के आंकड़े कांग्रेस की राजनीति की ऐसी तस्वीर साफ-साफ पेश कर रहे हैं। जनता-जनार्दन द्वारा दिए गए जनादेश में अब कांग्रेस के लिए भी इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। 

याद करो, आज़ादी से पहले जब मुस्लिम लीग की मांग पर भारत खंडित हुआ था तब भारत को खंडित करने वाले पाकिस्तान नहीं गए, पाकिस्तान भागे पाकिस्तान नहीं मांगने वाले। दूसरे, भारत के खंडित होने पर मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था "पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों का नारा है 'हंस के लिया पाकिस्तान लड़के लेंगे हिंदुस्तान' तो मुस्लिम लीग को हिन्दुस्तान में बैन कर दो लेकिन मुस्लिम वोट की भूखी कांग्रेस ने बैन करने की बजाए सिर्फ केरल तक सीमित रखा लेकिन इंदिरा गाँधी उसी विभाजनकारी लीग को केरल से बाहर ले आयी। और आज कांग्रेस नेहरू और इन्दिरा की मुस्लिम वोटबैंक सियासत को अपना कर सनातन का अपमान करती आ रही है और गुलाम हिन्दू कांग्रेस की सेकुलरिज्म की शराब में डूबा है।  

भारत का संविधान बनाने में संविधान सभा में 23 सदस्य ऐसे थे जो 1946 में पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग की टिकट पर जीते थे,

लेकिन जब इन्होंने पाकिस्तान बना लिया तो उसके बाद यह बड़ी होशियारी से पाकिस्तान नहीं गए और फिर नेहरू गांधी ने इनको भारत का संविधान बनाने का जिम्मा भी दे दिया, इन सब ने भी अपना संविधान बनाया है।
इन लोगों ने पाकिस्तान के नाम पर पंजाब के टुकड़े कर दिए और जहां पंजाब के हिन्दू सिख बहुतायत में थे वहां पाकिस्तान बनने के बाद लाखों हिन्दू सिखों को तलवार के दम पर ज़बरदस्ती मुस्लिम बनाया गया। हिन्दुओं की हालत वहां सिखों से थोड़ी अच्छी थी, क्योंकि सिखों के साथ ऐसा व्यवहार करने का एक बहुत बड़ा कारण था जिसकी सजा आज भी सिखों को मिल रही है। कांग्रेस और इसके पाकिस्तानी साथियों ने सिखों का ही ज्यादा नरसंहार किया था पार्टीशन के वक्त।

अम्बेडकर भी ऐसे ही इन लोगों का विरोध नहीं करता था और इसी विरोध के कारण कांग्रेस ने उसको भी अपने रास्ते से हटा दिया और मुस्लिम समुदाय के तुष्टिकरण में जुट गई। कांगड़ी का वोट बैंक एकजुट माइनॉरिटी और बिखरा हुआ हिन्दू रहा है जिसके लिए सेक्युलर शब्द बनाया गया जो न हिन्दू था और न मुस्लिम। जो इनके बीच का (हिजड़ा) था वह सेक्युलर था।

यह सिर्फ भारत में मुल्ला नेहरू और गांधी ही कर सकते थे कि जिनको गद्दारी का चार्ज लगाकर जेल में सड़ाना था, उन जेहादियों को ही सीधे संविधान बनाने की जिम्मेदारी दे दी। इनमें से ये केवल कुछ नाम हैं...

इनमें से बाद में बहुत सारे लोग केंद्र और राज्यो में मंत्री और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चांसलर तक बने....

from Madras

१ Mohamed Ismail Sahib

२ K.T.M. Ahmed Ibrahim·

३ Mahboob Ali Baig Sahib Bahadur·

४ B Pocker Sahib Bahadur from mubai

५ Abdul Kadar Mohammad Shaikh

६ Abdul Kadir Abdul Aziz Khan from Asam

७ Muhammad Saadulla,

८ Abdur Rouf from Up

९ Begum Qudsia Aijaz Rasul nbab of hardoi

१० Syed Fazl-ul-Hasan harshat mohani of AMU

११ Nabab ismail khan of meerut who

became chancellor of AMU

१२ ZH LARI from Bihar

१३ Husaain imam from gaya

१४ Saiyid Jafar Imam·

१५ Latifur Rahman·

१६ Mohammad Tahir

आज इनके वंशज बड़े-बड़े नेता बनकर बोल रहे हैं कि हमारा भी खून शामिल है इस देश की मिट्टी में...


सबसे बड़ा आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब इन्टरनेट पर पूरा खोजा कि इनके नाम मिल जाएँ, तो किसी भी वेबसाइट पर किसी भी तथाकथित हिन्दूवादी पार्टी या संगठन ने इनका नाम तक गूगल पर नहीं डाला है। खोज खोज कर नाम ढूँढे हैं। हम राष्ट्रवादियों को विचारधारा और शत्रुबोध के स्तर पर अभी बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है। इस्लामिक जिहादी मुस्लिम हमसे इस मामले में हजार गुना आगे हैं कि इन सब करतूतों के बाद भी देश में अपनी इतने बड़े तथाकथित देशभक्त की इमेज बनाये हुए हैं।

आज जहां पूरी दुनियाँ की ऑंखें खुल रही हैं, वहीँ कट्टर सनातन तथा हिन्दू विरोधी और देशद्रोही कॉंग्रेस के दोगले, बिकाऊ, लालची, स्वार्थी, कायर, सेक्युलर, नपुंसक, चमचे सो रहे हैं.

इन तीन राज्यों की कुल 654 विधानसभा सीटों पर 433 उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से कांग्रेस केवल 35 सीटें जीत पाई, यानी कांग्रेस का जीत का प्रतिशत करीब 8 फीसदी ही रहा। लेकिन इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन 35 विधायकों में से 21 मुस्लिम समुदाय से हैं। यानी कांग्रेस के कुल विजयी विधायकों में लगभग 60 प्रतिशत तो मुस्लिम ही हैं। और यह संयोग नहीं है, क्योंकि कांग्रेस ने इन तीन राज्यों में करीब 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। अर्थात जिन मुस्लिम उम्मीदवारों को कांग्रेस ने उतारा, उनमें लगभग आधे चुनाव जीत गए। यह आंकड़ा किसी व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व वाली राष्ट्रीय पार्टी का कम और एक विशेष मुस्लिम समुदाय केंद्रित राजनीति करने वाली पार्टी का अधिक प्रतीत होता है।

तीन राज्यों के चुनावी आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल
भारतीय राजनीति में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे दलों की वैचारिक दिशा और सामाजिक स्वीकार्यता का भी आईना बनते हैं। असम, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के हालिया विधानसभा चुनावों ने कांग्रेस के सामने ऐसा ही असहज दर्पण खड़ा कर दिया है, जिसमें पार्टी का चेहरा अब “सर्वधर्म समभाव” वाली राष्ट्रीय पार्टी से अधिक एक सीमित वोट बैंक पर निर्भर संगठन जैसा दिखाई देने लगा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्षों से कांग्रेस पर “एमएलसी” यानी “मुस्लिम लीगी कांग्रेस” बताते रहे हैं। इन तीन राज्यों के चुनावी आंकड़ों ने ही पीएम मोदी की बात को सच साबित कर दिखाया है।

असम: कांग्रेस की असमिया अस्मिता की बजाए मुस्लिम राजनीति
असम के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकेत लेकर आए हैं। राज्य में कांग्रेस लंबे समय से खुद को “संतुलित” विकल्प दिखाने की कोशिश करती रही थी, लेकिन हालिया चुनावों में उसका टिकट वितरण और जीत का पैटर्न कुछ और ही कहानी कहता है। कांग्रेस ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे और पार्टी की जीत का बड़ा हिस्सा उन्हीं सीटों से आया जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि कांग्रेस अब व्यापक असमिया अस्मिता की राजनीति के बजाय विशेष समुदाय आधारित गणित पर निर्भर होती जा रही है। यही कारण है कि ऊपरी असम, चाय बागान क्षेत्रों और राष्ट्रवादी वोटरों में कांग्रेस का आधार तेजी से सिकुड़ता गया। भाजपा ने इसी “तुष्टिकरण बनाम विकास” की बहस को धार दी और कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। असम के परिणाम यह बताते हैं कि कांग्रेस की रणनीति उसे सीमित पॉकेट्स तक तो बचा सकती है, लेकिन पूरे राज्य की पार्टी नहीं बना सकती। यहां बीजेपी ने फिर से प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई है।

पश्चिम बंगाल: हिंदू मतदाता की दूरी और मुस्लिम निर्भरता
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की स्थिति और भी अधिक गंभीर दिखाई दी। कभी बंगाल की मुख्यधारा की राजनीति का केंद्रीय स्तंभ रही कांग्रेस अब मुस्लिम बहुल इलाकों तक सिमटती जा रही है। पार्टी जिन सीटों पर प्रभावी रही, वहां उसका सामाजिक आधार लगभग पूरी तरह अल्पसंख्यक वोटों पर निर्भर दिखाई दिया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर कांग्रेस को हिंदू समाज में स्वीकार्यता क्यों नहीं मिल रही? क्या कारण है कि पार्टी को टिकट वितरण में भी मुस्लिम चेहरे अधिक “सुरक्षित” लगते हैं? बंगाल में कांग्रेस का यह स्वरूप उसे तृणमूल कांग्रेस की “सॉफ्ट सेक्युलर” राजनीति और वामपंथ की पुरानी लाइन के बीच फंसा देता है। विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने कभी बंगाल में बंकिम, विवेकानंद और नेताजी की विरासत की बात की थी, आज वही पार्टी चुनावी अस्तित्व बचाने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले सीमित समीकरणों पर निर्भर दिखाई देती है। यही कारण है कि पार्टी की सीटें घटती गईं और उसका प्रभाव भी सिमटता गया।

तमिलनाडु: द्रविड़ राजनीति में कांग्रेस की पहचान का संकट
तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके के सहारे चुनाव लड़ती है, इसलिए वहां उसकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान पहले ही कमजोर हो चुकी है। लेकिन इस चुनाव में भी कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का अनुपात और उनकी जीत दर ने बहस को जन्म दिया। कांग्रेस ने यहां भी ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों पर अधिक फोकस किया जहां धार्मिक ध्रुवीकरण उसके पक्ष में काम कर सके। समस्या केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने की नहीं है। किसी भी लोकतंत्र में हर समुदाय को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब अपने पारंपरिक हिंदू, दलित, पिछड़े और मध्यमवर्गीय वोटरों का भरोसा पूरी तरह खो चुकी है? तमिलनाडु के परिणाम यही संकेत देते हैं। कांग्रेस की राजनीति अब सहयोगी दलों के एजेंडे और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है, जबकि राज्य का बड़ा वर्ग उसे केवल “डीएमके की परछाई” मानने लगा है।

कांग्रेस की सर्व समाज से “विशेष समाज” तक की यात्रा
कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत कभी उसकी समावेशी छवि थी। पार्टी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, दलित, आदिवासी और मध्यम वर्ग सभी की राजनीतिक आकांक्षाओं का मंच मानी जाती थी। लेकिन अब उसकी राजनीति में संतुलन कम और तुष्टिकरण के प्रति झुकाव अधिक दिखाई देता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी का मुस्लिम लीगी कांग्रेस कहना केवल चुनावी नारा भर नहीं रह गया, बल्कि विपक्ष के भीतर भी चर्चा का विषय बन चुका है। इन चुनाव परिणामों ने तो इसे साबित भी किया है। इन चुनावों ने यह भी दिखाया कि कांग्रेस को टिकट देने के लिए कई बार हिंदू उम्मीदवारों से अधिक “बेहतर” मुस्लिम उम्मीदवार नजर आते हैं, जबकि दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस में उन्हीं चेहरों को प्राथमिकता देते दिखाई दे रहे हैं जो उनकी सामुदायिक पहचान का प्रतिनिधित्व करते हों। यह प्रवृत्ति किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए खतरनाक संकेत है, क्योंकि इससे पार्टी का सामाजिक संतुलन बिगड़ता है और वह धीरे-धीरे व्यापक जनाधार खोने लगती है।

अब जनता चाहती है विकास, सुशासन और स्थिरता
अगर कांग्रेस इसी दिशा में चलती रही, तो उसकी स्थिति भविष्य में और सीमित हो सकती है। वह कुछ विशेष क्षेत्रों और विशेष समुदायों तक सिमटकर रह जाएगी। तब “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस” का “राष्ट्रीय” स्वरूप केवल नाम तक सीमित रह जाएगा। तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के सामने कठोर प्रश्न रख दिए हैं। सवाल केवल सीटों की हार का नहीं है, बल्कि राजनीतिक चरित्र के बदलने का है। और शायद यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस को तय करना होगा कि वह फिर से “सर्व समाज” की पार्टी बनना चाहती है या “विशेष समाज” की राजनीति में खुद को स्थायी रूप से सीमित कर लेना चाहती है। केवल भाजपा विरोध को राजनीति का आधार बनाकर पार्टी लंबे समय तक नहीं चल सकती। उसे यह समझना होगा कि भारत की जनता अब केवल पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि विकास, स्थिरता, सुशासन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास चाहती है।

एक विशेष वोट बैंक तक सीमित राजनीति खतरे की घंटी
कांग्रेस की आज की तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। असम में कांग्रेस के 19 विधायकों में 18 मुस्लिम होना केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि पार्टी की बदलती सामाजिक संरचना का संकेत है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के दोनों विजेता मुस्लिम समुदाय से हैं। सवाल यह नहीं है कि मुस्लिम उम्मीदवार क्यों जीते। लोकतंत्र में हर नागरिक को समान अधिकार है। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस धीरे-धीरे अपनी राजनीति को एक विशेष वोट बैंक तक सीमित करती जा रही है? विडंबना यही है कि कांग्रेस स्वयं को “समावेशी” पार्टी कहती है, लेकिन उसके टिकट वितरण और चुनावी रणनीति के आंकड़े इसके उलट कहानी कह रहे हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि कांग्रेस को टिकट देने के लिए हिंदुओं से ज्यादा “बेहतर विकल्प” मुस्लिम उम्मीदवार दिखाई दे रहे हैं, और दूसरी ओर मुस्लिम मतदाताओं को वोट देने के लिए कांग्रेस में सबसे भरोसेमंद चेहरा केवल मुस्लिम प्रत्याशी ही नजर आ रहा है। यह प्रवृत्ति किसी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं कही जा सकती। राष्ट्रीय दल तब मजबूत बनते हैं जब वे समाज के हर वर्ग में समान स्वीकार्यता रखते हैं, न कि तब जब उनका सामाजिक आधार सिमटकर पहचान आधारित राजनीति में बदलने लगे।

उत्तर प्रदेश : नहीं थम रहा दबे मन्दिरों का मिलना ; शायद इसीलिए सनातन विरोधी संविधान और लोकतंत्र खतरे में का शोर मचा रहे हैं? दबी हुई मूर्तियां चीख-चीख कर अपना प्रभुत्व दर्शा रही है

                                            मुरादाबाद का मंदिर और मूर्तियाँ (फोटो साभार: Jagran)
जिस तरह उत्तर प्रदेश में दबे या दबाए गए मन्दिरों का मिलना शुरू हुआ है सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सबको आंखें और दिमाग को खोलकर बोलना होगा कि किस तरह सनातन विरोधियों ने मुस्लिम तुष्टिकरण के आगे घुटने टेक सनातन को दबाने का दुस्साहस किया था। उन्हें नहीं मालूम था कि कभी समय चक्र भी घुमेगा और जब घुमेगा इनके कुकर्म सामने आएंगे। जनता को सच्चाई से मीलों दूर रख तुष्टिकरण कर अपनी तिजोरियां भर मालपुए खाते रहे। आज सच्चाई का सूर्य उदय होने से इन तुष्टिकरण करने वालों की नींद ही नहीं रोटी तो क्या पानी पीना भी मुश्किल हो रहा है। यही कारण है कि जनता को संविधान और लोकतंत्र खतरे में का डर बैठा अपनी बंद होती दुकानों को खुला रखने का प्रयास किया जा रहा है। 

सनातन विरोधियों को इतना ज्ञान होना चाहिए कि मूर्ति कोई पत्थर का टुकड़ा या रोड़ा नहीं होती। जब उसकी मन्त्रों से प्राणप्रतिष्ठा की जाती है वह एक मूर्ति बन जाती है, अगर तुष्टिकरण करते उस मूर्ति को किसी भी आकार में दबा दिया जाता है, कभी न कभी वही मूर्ति अपना प्रभाव दिखाने लगती है। वह मुर्दा नहीं बन जाती कि जमीन में दफ़न कर दिया, कुछ समय बाद मिट्टी में मिल जाएगा, मूर्खो वह भगवान/देवी की मूर्ति है कोई पत्थर का टुकड़ा/रोड़ा नहीं।       

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में एक मुस्लिम बहुल इलाके में हिन्दू मंदिर मिला है। यह मंदिर पिछले लगभग 4 दशक से बंद पड़ा था। इस मंदिर में शिवलिंग कई खंडित मूर्तियाँ भी मिली हैं। इसमें कोई जा ना पाए, इसके लिए दीवार भी बना दी गई थी। प्रशासन ने अब दीवाल तोड़कर मंदिर का जीर्णोद्धार चालू कर दिया है। मंदिर 1980 में हुए भीषण दंगों के बाद बंद कर दिया गया था। तब यहाँ के पुजारी की हत्या कर उन्हें आग में झोंक दिया गया था।

परदादा ने बनवाया, पोते ने हटवाया कब्जा

मुरादाबाद में यह मंदिर झब्बू का नाला इलाके में मिला है। यहाँ अधिकांश आबादी मुस्लिमों की है। इस मंदिर को लेकर पुजारी के परपोते सेवाराम ने डीएम से शिकायत की थी। उन्होंने शिकायत में बताया था कि मंदिर को उनके परदादा भीमसेन ने बनवाया था और इसके बाद उनका ही परिवार इसमें पूजा करता था। उन्होंने कहा था कि 1980 के दंगे में इस मंदिर को बंद करके प्रवेश द्वार पर दीवाल बनवा दी गई थी और अब यहाँ लोग नहीं जाते। उन्होंने मंदिर को खोलने की माँग करते हुए स्थानीय लोगों के साथ प्रदर्शन भी किया था।

खंडित मूर्तियाँ, बनवा दी पार्किंग

इसके बाद सोमवार (30 दिसम्बर, 2024) को यहाँ मुरादाबाद नगर निगम और प्रशासन की टीम दल-बल के साथ पहुँची। उसने मंदिर की दीवाल तोड़ी। इसके बाद यहाँ इकट्ठा हुई मिट्टी को हटाया गया। मंदिर का स्वरूप इसके बाद दिखा। यहाँ दीवाल पर बनाई हुई बजरंग बली की प्रतिमा मिली। यहाँ से शिवलिंग भी है जिसके पास लेकिन नंदी की मूर्ति थी। माँ दुर्गा और काली की प्रतिमाएँ खंडित थी। जो मूर्तियाँ दीवाल में बनवाई गई थीं उनको भी तोड़ दिया गया था। मंदिर में तीन फीट का पक्का फर्श बनवा दिया गया था। यहाँ की जमीन पर अब पार्किंग चलती थी।
प्रशासन ने मंदिर की खुदाई करवाई है और फर्श तुड़वाया है। अंदर से काफी बड़ा मंदिर सामने आया है। प्रशासन अब मंदिर का जीर्णोद्धार करवा रहा है। यहाँ जल्द ही काम पूरा कर पूजा चालू करवा दी जाएगी। स्थानीय हिन्दुओं को अपना मंदिर वापस पाकर प्रसन्नता है लेकिन इससे कड़वी यादें भी ताजा हो गई हैं। मंदिर के निर्माण को लेकर शिकायत देने वाले सेवाराम इसके वापस मिलने और बुरी हालत देख कर रो पड़े। उन्होंने बताया कि उनके परदादा भीमसेन ने इस मंदिर के निर्माण के जमीन दी थी।

किन्नर ने उठा रखा था पूजा का बीड़ा

तब इस झब्बू का नाला इलाके में हिन्दू आबादी बसा करती थी। सेवाराम ने बताया कि उनके दादा गंगासरन यहाँ पूजा करते थे। 1980 में जब मुरादाबाद में ईद के बाद भीषण दंगा भड़का तो यह इलाका हिन्दुओं से खाली हो गया। सेवाराम ने आरोप लगाया कि दंगाइयों ने उनके दादा गंगासरन को मार दिया और उनकी लाश आग में झोंक दी। इससे उनका शव तक नहीं मिला। इसी के साथ मंदिर बंद हो गया और यहाँ दीवाल बना दी गई। इलाके से धीमे-धीमे सारे हिन्दू चले गए। तब से यह मंदिर बंद था।
यहाँ कुछ समय पहले एक हिन्दू किन्नर आकर बसी थीं। उनका नाम मोहिनी किन्नर है। मोहिनी किन्नर ने बताया कि उनसे मंदिर की यह हालत देखी नहीं गई और उन्होंने बाहर के हिस्से में रंगाई पुताई करवाई। इसके लिए भी पुलिस की मदद लेनी पड़ी थी। मोहिनी किन्नर ने बताया कि वह यहाँ रोज दिया बाती करती थीं और साथ ही दिवाली पर मंदिर की दीवाल कि सजावट करवाती थीं। अब वह और सेवाराम का परिवार अपने मंदिर को वापस पाकर काफी प्रसन्न हैं।

1980 के दंगे में मरे थे 83 लोग

यह मंदिर जिस 1980 के दंगे के बाद बंद किया गया था। उसमें 83 लोग मारे गए थे। 13 अगस्त 1980 को यह दंगा हुआ था। इसको लेकर 2023 में जाँच रिपोर्ट योगी सरकार ने सार्वजनिक की थी। इससे पहले तक दंगे की रिपोर्ट को इसलिए दबा कर रखा गया था क्योंकि इससे असल जिम्मेदार लोगों की पहचान हो जाती। मुरादाबाद में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दो बड़े खिलाड़ी थे। मुस्लिम लीग की जमात का नेतृत्व शमीम अहमद और हामिद हुसैन उर्फ अज्जी और उनके समर्थक कर रहे थे, जो उत्तर प्रदेश में मुस्लिम लीग को फिर से खड़ा करना चाहते थे।
वहीं, कांग्रेसी हाफिज मोहम्मद सिद्दीकी की अगुवाई में काम कर रहे थे। इस रिपोर्ट में हिंदू पक्ष के 6 लोगों के लिखित बयान दर्ज हैं, जिसमें साफ-साफ लिखा है कि ये हिंसा अचानक नहीं, बल्कि पूर्व-नियोजित थी। मुरादाबाद में भाजपा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष हरिओम शर्मा का भी बयान इस रिपोर्ट में दर्ज है, जिन्होंने कहा था कि ये हिंसा बहुत बड़ी साजिश का महज एक हिस्सा भर ही थी। इस हिंसा के लिए मुस्लिम पक्ष को बाहरी देशों, इस्लामी संगठनों जैसे मुस्लिम लीग, जमीयत उलेमा-ए-हिंसा और तबलीगी-ए-इस्लाम ने फंडिंग की थी।
इसके दंगे से तीन महीने पहले से ही कई हिंसक घटनाएँ हो रही थीं। गहराए तनाव का फायदा मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेताओं ने 13 अगस्त 1980 को ईद के दिन उठाया। उन्होंने अपने समर्थकों के माध्यम से सुअरों वाली घटना को अंजाम दिया और पूरे मुरादाबाद को दंगों की चपेट में धकेल दिया। भाजपा नेता हरिओम शर्मा ने उस दिन को याद करते हुए बयान में बताया है कि ईद के मौके पर ईदगाह के पास लगाए गए शिविरों में मुस्लिमों की भीड़ ने आग लगा दी।
इसमें उन 2 शिविरों को छोड़ दिया गया, जिन्हें मुस्लिम लीग चला रही थी। उस दौरान मुस्लिम लीग के नेता अपने शिविरों (कैंप) के पास ही थे, जबकि उन्हें नमाज में शामिल होना था। इस बात से साफ है कि वो दंगों के प्रति पहले से जानते थे और सारी साजिश उनकी रची हुई थी। हालाँकि, इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि ईदगाह में सुअर गए थे। इतना नहीं, इसके अलावा एक और अफवाह फैलाई गई कि पुलिस ने सैकड़ों मुस्लिमों को ईदगाह के अंदर मार दिया है।

केरल : बोगस वोटिंग दिखाने पर मुस्लिम लीग गुंडों ने पत्रकार को पीट दिया ; चुनाव आयोग ने क्या कार्यवाही की? क्या वहां का चुनाव रद्द होगा?

                              सीपीएम विधायक सीएच कुन्हाबु से धक्का मुक्की (साभार: onmanorama)
केरल के कासरगोड में शुक्रवार (26 अप्रैल 2024) को फर्जी मतदान की रिपोर्टिंग करने गए चार पत्रकारों पर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के संदिग्ध कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया। इस दौरान पत्रकारों से मारपीट की गई और उनके कपड़े तक फाड़ दिए गए। मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं ने पिटाई करने के बाद पत्रकारों को वहाँ से भगा दिया।
चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त स्टाफ और पुलिस ने उच्च अधिकारीयों को तुरंत सूचित किया? क्या  उन्होंने Returning Officer को सूचित किया? यदि नहीं, क्यों? अगर सूचित किया तो Returning Officer ने क्या कार्यवाही की? यह सिर्फ कासरगोड ही नहीं, भारत में शायद हो कोई ऐसा अनोखा पोलिंग बूथ होगा, जहां फर्जी वोटिंग न होता हो। लेकिन इसको रोकने में आज तक चुनाव आयोग पूरी तरफ से नकारा ही है। यह आरोप नहीं, कटु सत्य है। पोलिंग एजेंट से लेकर चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त स्टाफ तक कोई झूठला नहीं सकता। आधार कार्ड, चुनाव मतदान कार्ड सब बेकार। एक सुहागन को 500 रूपए के लिए अपना सिन्दूर पोंछ बुर्का पहनकर फर्जी वोट डालते देखा गया है। पार्टियों के प्रतिनिधियों को सुबह और शाम पोलिंग बूथ में EVM चैक करने और सील करने के लिए अंदर जाने की अनुमति होनी चाहिए। समाजसेवक के नाम पर किसी को बूथ में जाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। 

घटना कासरगोड के चेंगला स्थित सरकारी हाई स्कूल के बूथ की है। यहाँ पर फर्जी मतदान की खबर मिलते ही कैराली न्यूज के रिपोर्टर शिजू कन्नन, चैनल के कैमरामैन शैजू पिलाथारा, मातृभूमि न्यूज के रिपोर्टर सारंग और मातृभूमि अखबार के रिपोर्टर प्रदीप जीएन बूथ पर पहुँचे और रिपोर्टिंग की कोशिश की। इसी दौरान IUML कार्यकर्ताओं ने उनके साथ मारपीट की।

दरअसल, मतदान के दिन दोपहर में मार्क्सवादी पार्टी के एजेंटों ने स्कूल में बूथ संख्या 113, 114 और 115 में बड़े पैमाने पर फर्जी मतदान की सूचना अपने पार्टी के अधिकारियों को दी। उन्होंने यह भी बताया कि IUML के कार्यकर्ता उन्हें मतदान केंद्र पर बैठने नहीं दे रहे हैं। इसके बाद CPM चुनाव प्रबंधक कासरगोड विधानसभा क्षेत्र में IUML के गढ़ चेंगला के स्कूल पहुँचे।

एलडीएफ चुनाव समिति के संयोजक केपी सतीश चंद्रम ने आरोप लगाया कि मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता उन लोगों के वोट डाल रहे थे, जो केरल में मौजूद नहीं थे। उन्होंने कहा, “हमने जिला निर्वाचन अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराई है।” सतीश चंद्रम ने इसकी जानकारी मीडिया को भी दी। इसके साथ ही उदमा के विधायक और सीपीएम के जिला सचिव को भी इसके बारे में बताया।

जब मीडिया घटना की रिपोर्टिंग के लिए पहुँची तो IUML के कार्यकर्ताओं ने रिपोर्टिंग नहीं करने के लिए कहा और वहाँ से तुरंत भागने के लिए धमकाया। उसी समय उदमा विधायक और कार्यवाहक सीपीएम जिला सचिव कुन्हाम्बु स्कूल पहुँचे। उन्होंने कहा, “IUML कार्यकर्ताओं ने विधायक के साथ मारपीट करने की कोशिश की, लेकिन कासरगोड विधायक एनए नेल्लिकुन्नु ने हस्तक्षेप कर मामले को सुलझाया।”

इधर, हमले के शिकार पत्रकारों ने इसकी शिकायत पुलिस और जिला कलेक्टर से की है। कलेक्टर इनबासेकर ने एक बयान में कहा कि उन्होंने बूथ संख्या 115 पर फर्जी मतदान पर कार्रवाई की है। हालाँकि, उन्होंने की गई कार्रवाई के बारे में विस्तार से नहीं बताया।

अवलोकन करें:-

केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग UDF (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) गठबंधन में कॉन्ग्रेस की सहयोगी दल है। इस गठबंधन में और भी कई छोटे-छोटे दल हैं। वहीं, दूसरी तरफ CPM की अगुवाई वाली LDF (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) गठबंधन है। इसमें सीपीएम और सीपीआई सहित कई दल हैं। फिलहाल मुख्यमंत्री विजयन पिनराई के नेतृत्व में केरल में LDF की सरकार है।

139 साल बूढ़ी कांग्रेस की दुर्दशा; नक्सलियों की जयकार करे, मुस्लिम लीग की गुलामी करती, भगवान राम कृष्ण से बैर करे, अल्लाह को क्या मुंह दिखाएगी? पहला यात्री विमान हाईजैक संजय गाँधी ने किया था

सुभाष चन्द्र

यह सत्य है कि 139 साल की बूढ़ी कांग्रेस की कब्र में दफ़न होने से पहले आज ऐसी दुर्दशा हो गई है कि हर राज्य में लोकसभा चुनाव के क्षेत्रीय दलों पर निर्भर हो गई सीटों के लिए यानी उन दलों से जो कुछ रुखा सूखा बचा खुचा मिलेगा, उससे काम चलाना पड़ रहा है। आतंक से प्यार का तो पुराना नाता है जिसे अब नक्सलियों की जयकार करके और उन्हें शहीद बता कर जताना पड़ रहा है।

 
 20 दिसंबर 1978 को इंदिरा गांधी संजय गांधी ने खुद प्लेन को हाईजैक कराया था। भारत में विमान हाईजैक की यही पहली दुर्घटना थी। समय निकालकर जरूर वीडियो देखें और कांग्रेस की सच्चाई जाने, इसीलिए कहते हैं कांग्रेस आतंकवादियों के साथ है। रोज नए नए तथ्य और कथ्य आ रहे है। कांग्रेस द्वारा दिखाए रास्ते पर ही चल कर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में आतंकवादियों द्वारा यात्री विमान हाईजैक किया गया था। 
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1990 ये कोई पुरानी बात नही है कांग्रेस की मानसिकता मुगलो वाली सोच थी उसे समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार थी। राम की भक्ति के  नाम लेने पर भगवा पहनने पर माथे पे तिलक  लगा लेने पर उसे व्यक्ति के खिलाफ चालान काटे जाते थे। ये दौर मुलायम खानदान और मुगलों के विचारों में कोई अंतर नहीं था। 
मुस्लिम लीग की ऐसी गुलामी करनी पड़ रही है कांग्रेस को कि वायनाड में राहुल गांधी के लिए चुनाव प्रचार में कांग्रेस का ध्वज इस्तेमाल न करने की मुस्लिम लीग की शर्त माननी पड़ी
। राहुल के नामांकन में पाकिस्तान जिंदाबाद और पाकिस्तान झंडे तो खूब चले लेकिन अब चुनाव प्रचार में कांग्रेस का झंडा नहीं चलेगा। यह घोषणा केरल कांग्रेस अध्यक्ष MM Hasan ने खुद की। यह वही मुस्लिम लीग है जिसे 1950 में नेहरू ने केरल की अपनी यात्रा के दौरान Dead Horse कहा था लेकिन कांग्रेस वर्षों से उसके साथ “गठबंधन” में है। 

सुप्रिया श्रीनेत ने छत्तीसगढ़ में मारे गए 29 आतंकी नक्सलियों को शहीद बता कर भारतीय जवानों का घोर अपमान किया है।

सुप्रिया का मतलब है नक्सली जैसे आज़ादी की लड़ाई लड़ते हुए “शहीद” हो गए और भारत उनके आज़ादी के आंदोलन को कुछ रहा है।

आतंकवाद  और आतंकियों से कांग्रेस का रिश्ता कोई नई बात नहीं है। कांग्रेस बिन लादेन को “ओसामा जी” कहती है और हाफिज सईद को “हाफिज साहब” कहती है। आतंकी पाकिस्तान से मदद मांगती है कांग्रेस मोदी को हटाने के लिए। इसका मुख्य कारण सोशल मीडिया पर संलग्न फोटो बहुत वायरल हो रही है कि कांग्रेस का इस्लाम से कितना गहरा सम्बन्ध है, लेकिन इस्लाम के ही मानने वाले कांग्रेस को नकार रहा है। जबकि राहुल गांधी RSS को  मिस्र के Islamic Brotherhood जैसे आतंकी संगठन जैसा बताता है जबकि उस संगठन को इस्लामिक देशों ने ही बैन किया हुआ है जिनमे शामिल है।

Bahrain, Egypt, Russia, Syria, Saudi Arabia and the UAE - हमास के साथ खड़ी है कांग्रेस वर्षों से।यही वजह की कांग्रेस अपने कार्यकाल में जिस पाकिस्तान से भारतीयों को डराती रहती थी, 2014 के बाद वही पाकिस्तान आज भीगी बिल्ली बना हुआ है। इस्लामिक आतंकवादियों को संरक्षण देने अरबों वर्ष पुराने सनातन धर्म को 'हिन्दू आतंकवाद' और 'भगवा आतंकवाद' के नाम से कलंकित करती रही।  

RSS को किसी देश ने बैन नहीं किया, उसे केवल कांग्रेस सरकार ने 3 बार बैन किया लेकिन अदालत ने बैन को गैर कानूनी बता कर कांग्रेस के मुंह पर थप्पड़ मारा हर बार।

याद कीजिए कश्मीर में आतंकियों को मरने पर 1 करोड़ मुआवजा देने की घोषणा भी कांग्रेस ने की थी। पाकिस्तान के आतंक पर ढील देती रही कांग्रेस और देश भर भी पाकिस्तान खुनी खेल खेलता रहा मगर कांग्रेस ने हिन्दू आतंकवाद की नई परिभाषा गढ़ दी। 

आज मिलिंद देवड़ा ने कहा है कि कांग्रेस काफी हद तक “वामपंथी” हो गई है।

कांग्रेस में सबसे ज्यादा तो “अंग्रेजियत” घुसी हुई है विदेशी हुकूमत अंग्रेजों की अभी भी कांग्रेस पर राज कर रही है। अभी भी कांग्रेस अंग्रेज़ों की गुलाम है और देश को भी गुलाम बनाना चाहती है लेकिन अब कांग्रेस चाहती है चीन का भारत पर राज।

कांग्रेस में केवल “वामपंथी” ही नहीं है, कांग्रेस में इस्लामिक genes हावी हैं। इसके अलावा original mughals के भी अंश कूट कूट कर भरे हैं।

इस्लाम और Mughals दोनों अलग अलग हैं। मुग़ल वो हैं जो विदेश से आए हिन्दू महिलाओं के साथ जबरन औलादें पैदा की। कांग्रेस और विपक्षी दलों में अनेक लोग उन्हीं के वंशज है और ये ही मुग़ल हैं। कांग्रेस जवाब दे कि गयासुद्दीन, मुग़ल समय में दिल्ली कोतवाल, और मोती लाल नेहरू परिवार से क्या सम्बन्ध है? क्या फिरोज जहांगीर खान राहुल और प्रियंका का दादा नहीं? जब फिरोज सोनिया गाँधी का ससुर और राहुल-प्रियंका का दादा है, फिर किस आधार पर हिन्दू हो गए? मैमुना बेगम(इंदिरा गाँधी का निकाहनामा में नाम) कब हिन्दू बन गयी?  

इसके अलावा कांग्रेस में सनातन और हिन्दू विरोध की कीड़े भरे पड़े हैं और हाथ मिलाया हुआ है। अब DMK के साथ और बाकी इंडी ठगबंधन के दलों को भी इस घ्रणित सोच में मिला लिया है। 

राहुल गांधी ने आज भगवान कृष्ण के अस्तित्व को भी नकार दिया और मोदी के समुद्र में द्वारका नगरी की पूजा करने को भी बेकार कह दिया तो दूसरी तरफ जयराम रमेश ने प्रतिज्ञा करी कि हम लोग कभी राम मंदिर नहीं जाएंगे। यह बात तो घोषणा पत्र में की चाहिए थी मूर्खों।

उत्तर प्रदेश : 43 साल बाद सामने आई मुरादाबाद दंगों की सच्चाई: हिंदुओं का हो कत्लेआम इसलिए नमाज में भेजा सूअर, मुस्लिम लीग के नेता थे साजिशकर्ता

                         योगी और मुरादाबाद दंगा (साभार: File Photo/Vartha Bharati)
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में साल 1980 में हुए दंगे में आयोग ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को क्लीन चिट दे दिया है और इसे मुस्लिम लीग की साजिश बताया है। बताते चलें कि यह वही मुस्लिम लीग (Muslim League) है, जिसे कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने सेक्युलर बताया था।

लगभग 43 साल पहले ईद की नमाज के बाद भड़के दंगों का असली गुनहगार मुस्लिम लीग का डॉ. शमीम अहमद खान था। चुनावों में लगातार हार मिलने के बाद उसने मुस्लिमों की सहानुभूति हासिल करने के लिए दंगे भड़काने की साजिश रची थी। हालाँकि, साल 1989 में वह जनता दल से विधायक बनने में कामयाब हो गया।

मुरादाबाद दंगे की जाँच करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एमपी सक्सेना ने अपनी रिपोर्ट में दिए सुझाव दिया था कि मुस्लिमों को ‘वोट का खजाना’ समझने वालों को हतोत्साहित करना जरूरी है। इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि पाकिस्तान से वीजा लेकर आए लोगों को समय सीमा पूरी होने पर तुरंत वापस भेजा जाए।

जाँच रिपोर्ट में यह सामने आई है कि शमीम अहमद खान ने वाल्मीकि, सिख और पंजाबी समाज को फँसाने के लिए 13 अगस्त 1980 को ईद की नमाज के बीच सुअरों को धकेल दिया गया था। इसके बाद यह अफवाह फैला दी गई कि बच्चे एवं महिलाओं सहित मुस्लिमों की हत्या की जा रही है।

इसके कारण ईदगाह समेत 20 जगहों पर दंगा भड़क गया था। इस दौरान हिंदुओं और पुलिस पर हमले किए गए थे। मुरादाबाद से होते हुए यह हिंसा जल्द ही जिले के ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ संभल, अलीगढ़, बरेली और इलाहाबाद (अब प्रयागराज) तक फैल गई। कांग्रेस शासित उत्तर प्रदेश में यह हिंसा 1981 की शुरुआत तक जारी रहीं।

इस दंगे की रिपोर्ट को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 43 साल बाद सार्वजनिक कर दिया है। इस रिपोर्ट को योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 8 अगस्त 2023 को विधानसभा में पेश की थी। रिपोर्ट सामने आने के बाद सियासत का दौर शुरू हो गया है।

मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के मुख्यमंत्रित्व में कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने इसकी जाँच डीएम बीडी अग्रवाल को सौंपा था। बाद में न्यायिक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने तीन साल बाद अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी। उसके बाद किसी दल की सरकार ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की कोशिश नहीं की।

अलग-अलग सरकारों में इसे 14 बार मंत्रिमंडल के सामने रखकर इसे सदन में पेश करने की मंजूरी माँगी गई थी। हालाँकि, तुष्टिकरण की राजनीति के कारण इस माँग को खारिज कर दिया गया। इस बीच यह रिपोर्ट कुछ वर्षों के लिए गायब भी हो गई। इसे तमाम प्रयास के बाद रिकॉर्ड रूम से खोजा गया।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस दंगे में कोई भी सरकारी अधिकारी, कर्मचारी या हिंदू उत्तरदायी नहीं था। इनमें भाजपा या संघ की भी संलिप्तता नहीं थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि दंगों में आम मुस्लिम के बजाय शमीम के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग और डॉक्टर हामिद हुसैन उर्फ डॉक्टर अज्जी के समर्थक और भाड़े पर बुलाए गए लोग ही शामिल थे।

आयोग ने दंगों के दौरान पीएसी, पुलिस और जिला प्रशासन पर लगे आरोप भी खारिज कर दिए। जाँच में यह भी पाया गया कि इस दौरान हुईं ज्यादातर मौतें पुलिस फायरिंग में नहीं, बल्कि भगदड़ से हुई थीं। बताते चलें कि इस दंगे में 84 लोग मारे गए थे और 112 लोग घायल हुए थे।