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उत्तर प्रदेश : 43 साल बाद सामने आई मुरादाबाद दंगों की सच्चाई: हिंदुओं का हो कत्लेआम इसलिए नमाज में भेजा सूअर, मुस्लिम लीग के नेता थे साजिशकर्ता

                         योगी और मुरादाबाद दंगा (साभार: File Photo/Vartha Bharati)
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में साल 1980 में हुए दंगे में आयोग ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को क्लीन चिट दे दिया है और इसे मुस्लिम लीग की साजिश बताया है। बताते चलें कि यह वही मुस्लिम लीग (Muslim League) है, जिसे कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने सेक्युलर बताया था।

लगभग 43 साल पहले ईद की नमाज के बाद भड़के दंगों का असली गुनहगार मुस्लिम लीग का डॉ. शमीम अहमद खान था। चुनावों में लगातार हार मिलने के बाद उसने मुस्लिमों की सहानुभूति हासिल करने के लिए दंगे भड़काने की साजिश रची थी। हालाँकि, साल 1989 में वह जनता दल से विधायक बनने में कामयाब हो गया।

मुरादाबाद दंगे की जाँच करने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एमपी सक्सेना ने अपनी रिपोर्ट में दिए सुझाव दिया था कि मुस्लिमों को ‘वोट का खजाना’ समझने वालों को हतोत्साहित करना जरूरी है। इसके साथ ही यह भी कहा गया था कि पाकिस्तान से वीजा लेकर आए लोगों को समय सीमा पूरी होने पर तुरंत वापस भेजा जाए।

जाँच रिपोर्ट में यह सामने आई है कि शमीम अहमद खान ने वाल्मीकि, सिख और पंजाबी समाज को फँसाने के लिए 13 अगस्त 1980 को ईद की नमाज के बीच सुअरों को धकेल दिया गया था। इसके बाद यह अफवाह फैला दी गई कि बच्चे एवं महिलाओं सहित मुस्लिमों की हत्या की जा रही है।

इसके कारण ईदगाह समेत 20 जगहों पर दंगा भड़क गया था। इस दौरान हिंदुओं और पुलिस पर हमले किए गए थे। मुरादाबाद से होते हुए यह हिंसा जल्द ही जिले के ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ संभल, अलीगढ़, बरेली और इलाहाबाद (अब प्रयागराज) तक फैल गई। कांग्रेस शासित उत्तर प्रदेश में यह हिंसा 1981 की शुरुआत तक जारी रहीं।

इस दंगे की रिपोर्ट को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 43 साल बाद सार्वजनिक कर दिया है। इस रिपोर्ट को योगी आदित्यनाथ की सरकार ने 8 अगस्त 2023 को विधानसभा में पेश की थी। रिपोर्ट सामने आने के बाद सियासत का दौर शुरू हो गया है।

मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के मुख्यमंत्रित्व में कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने इसकी जाँच डीएम बीडी अग्रवाल को सौंपा था। बाद में न्यायिक आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने तीन साल बाद अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपी थी। उसके बाद किसी दल की सरकार ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की कोशिश नहीं की।

अलग-अलग सरकारों में इसे 14 बार मंत्रिमंडल के सामने रखकर इसे सदन में पेश करने की मंजूरी माँगी गई थी। हालाँकि, तुष्टिकरण की राजनीति के कारण इस माँग को खारिज कर दिया गया। इस बीच यह रिपोर्ट कुछ वर्षों के लिए गायब भी हो गई। इसे तमाम प्रयास के बाद रिकॉर्ड रूम से खोजा गया।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इस दंगे में कोई भी सरकारी अधिकारी, कर्मचारी या हिंदू उत्तरदायी नहीं था। इनमें भाजपा या संघ की भी संलिप्तता नहीं थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि दंगों में आम मुस्लिम के बजाय शमीम के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग और डॉक्टर हामिद हुसैन उर्फ डॉक्टर अज्जी के समर्थक और भाड़े पर बुलाए गए लोग ही शामिल थे।

आयोग ने दंगों के दौरान पीएसी, पुलिस और जिला प्रशासन पर लगे आरोप भी खारिज कर दिए। जाँच में यह भी पाया गया कि इस दौरान हुईं ज्यादातर मौतें पुलिस फायरिंग में नहीं, बल्कि भगदड़ से हुई थीं। बताते चलें कि इस दंगे में 84 लोग मारे गए थे और 112 लोग घायल हुए थे।