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BBC की Gen-Z को जगाने की चाह या दंगे भड़काने की बेताबी? भारत भी नेपाल की तरह जले, ऐसा क्यों चाहता है पश्चिमी मीडिया?

     बीबीसी भारत में भी नेपाल की तरह फैलाना चाहता है जेन-जी में हिंसा (फोटो साभार: India Today/AI Dall-E)
2014 में जब से भारत में मोदी सरकार आयी है भारत से लेकर विदेशों में बैठे भारत विरोधियों की रोटी-पानी हराम हो गयी है। मोदी सरकार के आने से मुस्लिम कट्टरपंथी और क्रिस्चियन मिशनरीज सत्ताधारियों की छत्रसाया में अपना खेल खेल रहे थे। उनके खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त, शांति के दुश्मन और अंग्रेजों के दलाल आदि पता नहीं कितने नामों से बदनाम किया जाता था। लेकिन अब जनता खासतौर से हिन्दुओं में चेतना का संचार शुरू होने से भारत विरोधी गैंग बहुत बेचैन है। मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दुओं को डराने "सिर तन से जुदा" गैंग को सड़क पर निकाल देते हैं लेकिन भूल रहे हैं कि अब हिन्दुओं में ईंट का जवाब पत्थर देने के लिए तैयार हो रहा है। और जिस दिन हिन्दू सड़क पर आ गया कोई कट्टरपंथी तो क्या "सिर तन से जुदा" गैंग को पूरे भारत में कहीं छिपने की जगह नहीं मिलेगी। आखिर बर्दास्त की भी एक सीमा होती है। हिन्दू अदालतों के चक्कर में फंसने की बजाए कट्टरपंथियों की तरह सड़क पर ही ऐसा फैसला करेगा अदालतें तक देखती रहेंगी। क्योकि इसकी जिम्मेदार भी हमारी अदालतें होंगी। कन्हैया के कातिलों को क्या अब तक फांसी हुई? क्यों नहीं हुई?


 

खैर, जिस BBC इंडिया के समाचारों को मोदी सरकार के आने से पहले बड़ी प्रमाणिकता से सुना ही नहीं जाता था बल्कि विश्वास भी किया जाता था। अब उसी BBC इंडिया को बेनकाब कर रहा है OpIndia का प्रस्तुत लेख :-             

BBC इंडिया हर कुछ महीनों में कोई ऐसा लेख छापता है, जो पत्रकारिता और मनोवैज्ञानिक जंग के बीच की लकीर को धुंधला कर देता है। हाल ही में उसने एक लेख छापा, जिसका शीर्षक था “Gen Z उठ रहा है? भारत के नौजवान सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे?” ये लेख उसी पुरानी चाल का नया नमूना है, जिसमें छिपे-छिपे भारत को अस्थिर करने की कोशिश की जाती है।

पहली नजर में ये लेख एक साधारण सवाल उठाता है: भारत का Gen Z, जो इतना बड़ा, बेचैन और इंटरनेट से जुड़ा है, वो नेपाल या बांग्लादेश के नौजवानों की तरह क्रांति क्यों नहीं कर रहा? लेकिन जरा गौर से देखो, तो ये लेख विश्लेषण कम और उकसावा ज्यादा लगता है। ये भारतीय नौजवानों को खुलेआम बगावत करने और पड़ोस के देशों में हो रही अराजकता की नकल करने का न्योता देता है।

BBC की निष्पक्षता का दावा और दंगों की चाहत

खुद को निष्पक्ष बताने वाले BBC का हिंसक विद्रोहों को महिमामंडन करना हैरान करता है। लेख का लहजा ऐसा है, जैसे उसे दुख हो कि भारतीय छात्रों ने अभी तक आगजनी, तोड़फोड़ और सरकार बदलने की कोशिश नहीं की। ये सिर्फ औपनिवेशिक सोच का नतीजा नहीं, जो अपने पुराने गुलाम देश को बिखरते देखना चाहता है ताकि दूर बैठकर नैतिक उपदेश दे सके। ये कुछ ज्यादा सोचा-समझा, वैचारिक और गहरे राजनीतिक है।

उकसावे की कला में माहिर है बीबीसी

BBC का ये लेख प्रोपेगेंडा का उस्ताद है। ये शुरू होता है एशिया के ‘बेचैन’ Gen Z की तारीफ से, जो ’48 घंटों में सरकारें गिरा देते हैं’, जैसे कि संस्थानों का ढहना प्रगति का मेडल हो। फिर आता है भारत से तुलना – भारत के नौजवान ‘बिखरे हुए’, ‘डरे हुए’ और ‘अलग-थलग’ हैं। मतलब साफ है: वे अपने जेनरेशन के फर्ज को निभाने में नाकाम हैं, क्योंकि वे दंगे नहीं कर रहे।

                                                      बीबीसी के लेख का स्क्रीनशॉट

लहजा मनोवैज्ञानिक है, विश्लेषणात्मक नहीं। ‘राष्ट्र-विरोधी करार दिए जाने का डर’ और ‘सरकार का विरोध को बदनाम करना’ जैसे शब्द गहरे सोचने के लिए नहीं, बल्कि गिल्ट फील कराने के लिए डाले गए हैं। ये पत्रकारिता नहीं, जो भारतीय नौजवानों के शांत रहने की वजह समझना चाहे। ये विश्लेषण के भेष में उकसावा है, जो शांति को कायरता और संयम को दमन बताता है।

नेपाल का उदाहरण बना BBC का नया जुनून

लेख को प्रेरणा नेपाल से मिली है, जहाँ सितंबर 2025 में तथाकथित ‘Gen Z क्रांति’ ने केपी ओली की सरकार गिरा दी। BBC इसे फिल्मी अंदाज में बयान करता है, जैसे कोई ऐतिहासिक नौजवानी वीरता का पल हो।
लेकिन इस चमक के पीछे भयानक सच है। नेपाल के विद्रोह में करीब 20 लोग मरे, पूर्व प्रधानमंत्रियों के घर जला दिए गए, मंत्रियों पर हमले हुए और सिंह दरबार जैसे ऐतिहासिक स्थलों में तोड़फोड़ हुई। सेना को कर्फ्यू लगाना पड़ा और देश अब सैन्य शासन की कगार पर है।
लेकिन BBC इस अराजकता को ‘सफलता’ बताता है, एक ऐसा ‘उदाहरण’ जिसे भारत के नौजवानों को नकल करना चाहिए। लेख ये नहीं बताता कि नेपाल के प्रदर्शनकारी खुद हिंसा से अलग हो गए थे, कहते हुए कि उनके आंदोलन को बाहरी तत्वों ने हाईजैक कर लिया। लेकिन BBC ये क्यों बताएगा? क्योंकि उसका मकसद जानकारी देना नहीं, बल्कि ये विचार बोना है कि भारत का ‘बेचैन’ Gen Z नेपाल के दंगाइयों के ‘वीरतापूर्ण’ नक्शेकदम पर चले।

सेलेक्टिव तरीके से पुरानी बातों को नजरअंदाज करता है बीबीसी

BBC भारत के पुराने सड़क आंदोलनों को जैसे अन्ना हजारे आंदोलन से लेकर CAA विरोध तक, बड़े प्यार से याद करता है, जैसे कि वो असहमति का स्वर्ण युग हो। लेकिन इन विरोधों से हुई खून-खराबा, तबाही और सामुदायिक टकराव पर BBC चुप्पी साध लेता है।

CAA विरोध में भीड़ ने सार्वजनिक संपत्ति जलाई, सड़कें रोकीं, और दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़की, जिसमें 50 से ज्यादा लोग मरे। BBC जिन ‘छात्र नेताओं’ को अब रोमांटिक बनाता है, वे गाँधीवादी सत्याग्रही नहीं, बल्कि दंगे भड़काने के आरोपित कट्टरपंथी थे।

ऐसे आंदोलनों को ‘नोबल’ बताकर और आज के समय में ऐसे विद्रोहों की कमी पर अफसोस जताकर, BBC असल में अराजकता की कमी को मिस कर रहा है। उसे वो दौर याद आता है, जब भारत को ‘अस्थिर’ और ‘दमनकारी’ दिखाया जा सकता था- ऐसी हेडलाइंस जो लंदन के न्यूज़रूम में ज्यादा बिकती हैं, बनिस्पत ‘भारत 8% की दर से बढ़ रहा है।’

‘राष्ट्र-विरोधी’ का झाँसा

लेख में ‘राष्ट्र-विरोधी’ शब्द एक चालाक हथियार है। BBC के फ्रेम में, इस डर ने भारतीय नौजवानों को सड़कों पर उतरने से रोक रखा है। ये चतुराई है, जो राष्ट्रवाद को तानाशाही और असहमति को वीरता से जोड़ देती है।

लेकिन सच ये है कि भारतीय नौजवान समझदार हो गए हैं। उन्होंने देखा है कि ‘एक्टिविज्म’ को कैसे स्वार्थी ताकतें हथियार बना लेती हैं। शाहीन बाग की सुनियोजित नाकेबंदी से लेकर विदेशी फंडिंग वाले NGOs, जो छात्र आंदोलनों के भेष में काम करते हैं, Gen Z खामोश नहीं है क्योंकि वो डर गया है। वो खामोश है क्योंकि वो समझदार हो गया है।

उन्हें पता है कि बसें जलाने से नौकरियाँ नहीं मिलतीं, पत्थर फेंकने से भ्रष्टाचार नहीं रुकता, और सरकार गिराने से बेहतर कल की गारंटी नहीं मिलती। भारत का Gen Z स्टार्टअप बना रहा है, कोड लिख रहा है, फिल्में बना रहा है, दुनिया घूम रहा है, न कि बाहरी कठपुतलियों के इशारे पर सियासी ड्रामे में अपनी ताकत बर्बाद कर रहा है।

लोगों का सड़कों पर उतरना बीबीसी को पसंद

जब BBC उमर खालिद की जेल या जामिया टकराव का जिक्र करता है, तो ये कोई शैक्षिक संदर्भ नहीं, बल्कि भावनात्मक ट्रिगर है। वो ‘क्रूर सरकारी दमन’ की याद को फिर से जगाना चाहता है और 2019 को अधूरी कहानी के रूप में पेश करना चाहता है।

लेख का छिपा संदेश साफ है: “तुमने अपने सीनियर्स के साथ क्या हुआ देखा। क्या तुम वापस नहीं लड़ना चाहते?” ये पत्रकारिता नहीं, भावनात्मक छेड़छाड़ है।

BBC यूनिवर्सिटी प्रोटेस्ट कल्चर के ‘खोने’ का मातम मनाता है, लेकिन असल में वो इस बात का दुख मना रहा है कि मोदी सरकार ने कैंपस अनुशासन बहाल कर दिया और शिक्षण संस्थानों को सियासी संगठनों के हवाले होने से रोक दिया।

भारत के कैंपस वैचारिक भटकाव के मैदान से बदलकर इनोवेशन के हब बन गए हैं। ये बदलाव, जाहिर है, BBC को बर्दाश्त नहीं, जो अपने भारतीय नौजवानों को गुस्सैल, बेकार और सिस्टम-विरोधी देखना पसंद करता है।

Gen Z बिखरा हुआ या आजाद? BBC का दोहरा रवैया

लेख में BBC भारत की विविधता को कमजोरी बताता है, कहता है कि नौजवान जाति, भाषा और क्षेत्र में बंटे होने की वजह से एकजुट नहीं हो पाते। लेकिन यही विविधता जब काम आए, तो इसे ‘जीवंत बहुसंस्कृतिवाद’ कहा जाता है।

नेपाल या बांग्लादेश में एकरूपता की वजह से बड़े पैमाने पर मूवमेंट आसान है। लेकिन भारत में विकेंद्रीकरण लोकतंत्र की आत्मा है। BBC इसे ‘बिखराव’ कहता है। भारतीय इसे संघवाद कहते हैं।

BBC का ‘राष्ट्रीय युवा विद्रोह’ की चाहत उसकी औपनिवेशिक सोच को दर्शाती है, जो एकरूपता, एकजुटता और अराजकता को संकट के रूप में दिखाना चाहती है।

भारत की स्थिरता है पश्चिम की समस्या

BBC का असली दुख भारत के नौजवानों से नहीं, भारत की स्थिरता से है। नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका पश्चिमी मीडिया के लिए इसलिए काम के हैं, क्योंकि वे अस्थिर हैं और ‘विदेशी लोकतंत्रों’ के रूप में पढ़े जा सकते हैं। लेकिन 37 करोड़ Gen Z वालों वाला भारत, जो बिना टूटे संवैधानिक व्यवस्था के साथ चल रहा है, उनकी कहानी को बिगाड़ देता है।

2024 समेत हर चुनाव दिखाता है कि भारतीय नौजवान निराश नहीं, बल्कि समझदार हैं। बीजेपी को युवाओं का मजबूत समर्थन मिलता है, न कि डर की वजह से, बल्कि कामकाज, इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याण, राष्ट्रवाद और डिजिटल सशक्तिकरण की वजह से। इसलिए BBC का ये दावा कि नौजवान ‘राजनीति से बचते हैं’ ये खोखला लगता है।

भारतीय नौजवान सड़क के आंदोलनों से डिजिटल और चुनावी एक्टिविज्म की ओर बढ़ गए हैं, जहाँ उनकी आवाज ज्यादा मायने रखती है और उनके विरोध को पेशेवर अराजकतावादी हाईजैक नहीं कर सकते।

मोदी फैक्टर है BBC के असली दुख की वजह

BBC के मातम का असली केंद्र समाजशास्त्र नहीं, बल्कि राजनीति है। BBC, The Guardian और The New York Times जैसे पश्चिमी संस्थान नरेंद्र मोदी को दो चीजों के लिए कभी माफ नहीं कर पाए: पहला, भारत की हिंदू सभ्यता की पहचान को बिना शर्मिंदगी के सामने लाने के लिए… और दूसरा- इसे लोकतांत्रिक तरीके से, वोट के जरिए करने के लिए।

जब मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन किया, तो ये सिर्फ धार्मिक समारोह नहीं था; ये सभ्यता का सुधार था। इसने दुनिया को बताया कि भारत अब अपनी आस्था के लिए माफी नहीं माँगेगा, न ही धर्मनिरपेक्षता को हिंदू पहचान की अनुपस्थिति के रूप में परिभाषित करेगा। BBC की नजर में ये पाप था।

उनका वैश्विक दृष्टिकोण बाइनरी पर चलता है: बहुसंख्यक यानी दमनकारी, राष्ट्रवाद यानी फासीवाद, स्थिरता यानी तानाशाही। तो जब भारत के नौजवान इन बाइनरी को ठुकराकर प्रगति को चुनते हैं, तो BBC का वैचारिक तंत्र घबरा जाता है।

पश्चिमी मीडिया का बगावतों से मोह

पश्चिमी मीडिया का ग्लोबल साउथ के विद्रोहों को कवर करने का तरीका कुछ परेशान करने वाला है। वे दूर से क्रांतियों की तारीफ करते हैं और जब धूल जम जाती है तो गायब हो जाते हैं।

अरब स्प्रिंग से लेकर श्रीलंका के विरोधों तक, पश्चिमी मीडिया ने ‘युवा-नेतृत्व वाले विद्रोहों’ को शेर की तरह पेश किया और जब ये देश अस्थिरता, महँगाई या गृहयुद्ध में फंस गए, तो वे खुद खिसक गए।

अब वे नया खेल का मैदान ढूँढ रहे हैं और अपनी विशाल युवा आबादी के साथ भारत उनके लिए सबसे बड़ा ईनाम है।

इसलिए BBC का लेख पत्रकारिता कम और भर्ती का पोस्टर ज्यादा लगता है- “अपने पड़ोसियों को देखो। क्या तुम उनके जैसे नहीं बनना चाहते?”

लेकिन भारतीय अब आसानी से बेवकूफ नहीं बनते। उन्होंने देखा है कि ये ‘नेताविहीन’ आंदोलन लोकतंत्र में नहीं, बल्कि अव्यवस्था में खत्म होते हैं।

असली Gen Z क्रांति: खामोश, डिजिटल और निर्णायक

भारत का Gen Z सड़कों पर उतरकर इतिहास रचने की जरूरत नहीं समझता। उनकी क्रांति शांत लेकिन गहरी है- स्टार्टअप्स में, सिविक टेक में, डिजिटल गवर्नेंस में और अपनी पहचान पर नए गर्व में। वे दिल्ली की सड़कों पर नारे लगाने की बजाय अगला आधार कोड कर रहे हैं। वे हाईवे पर टायर जलाने की बजाय टियर-3 शहरों से डॉलर कमा रहे हैं।

ये भारतीय असहमति का नया चेहरा है-रचनात्मक, जो विनाशकारी नहीं है। और यही वो चीज है, जो BBC को परेशान करती है- एक ऐसी पीढ़ी, जिसे कट्टरपंथी बनाया नहीं जा सकता, सिर्फ प्रेरित किया जा सकता है।

BBC क्यों चाहता है कि भारत में खून बहे

जब BBC लिखता है कि भारत का Gen Z ‘सतर्क लेकिन बगावती नहीं’ है, तो ये तारीफ नहीं, बल्कि शिकायत है। वो चाहता है टूटे शीशों, आँसू गैस और तिरंगे से रंगे अशांति के फुटेज, जो भारत को फिर से अस्थिरता का देश दिखा सकें।

क्योंकि BBC के लिए मोदी के नेतृत्व में शांत, आत्मविश्वास से भरा और आत्मनिर्भर भारत सबसे बड़ा दुःस्वप्न है। वो एक हिंदू-बहुसंख्यक लोकतंत्र को समझ नहीं पाता, जो अपनी आस्था के लिए माफी माँगे बिना फलता-फूलता है, सड़कों के वीटो को तोड़ता है और पश्चिमी नैतिक उपदेशों के सामने झुकने से इनकार करता है।

वही BBC जो काठमांडू में आगजनी की तारीफ करता है, उसे दिल्ली में ‘लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति’ कहेगा, जब तक कि आग उनके अपने दूतावासों के करीब न पहुँच जाए।

राहुल गाँधी और BBC का कनेक्शन

दिलचस्प बात ये है कि BBC का उकसावा अकेले नहीं गूँजा। नेपाल में केपी ओली की सरकार गिरने के कुछ ही दिनों बाद, राहुल गाँधी ने अचानक भारत के Gen Z के लिए नया प्यार जाहिर किया, जिसे सिर्फ सियासी मौकापरस्ती ही कहा जा सकता है।

X पर गाँधी ने ऐलान किया कि ‘Gen Z संविधान बचाएगा और वोटर फ्रॉड रोकेगा,’ और फिर उनकी पार्टी ने एक अजीब ‘Gen Z गान’ लॉन्च किया– एक रैप सॉन्ग, जो गुस्से और बगावत को रोमांटिक बनाता है और इसे “युवा भारत की आवाज” बताता है।

BBC की शिकायत और कॉन्ग्रेस की इस नई चाल के बीच सटीक तालमेल देखना मुश्किल नहीं। BBC भारतीय नौजवानों को डरे हुए पीड़ितों के रूप में दिखाता है; राहुल गाँधी उन्हें नारों, गानों और बनावटी गुस्से से ‘जगाने’ की कोशिश करते हैं। एक वैचारिक जमीन तैयार करता है, दूसरा सियासी स्क्रिप्ट देता है।

ये तालमेल इत्तेफाक नहीं बल्कि एक इकोसिस्टम का हिस्सा है। दोनों का मकसद एक है: भारत के नौजवानों को सुधार की बजाय विद्रोह करने, बहस की बजाय तोड़ने के लिए उकसाना। BBC कहानी लिखता है; कॉन्ग्रेस उसे बढ़ावा देती है, इस उम्मीद में कि सोशल मीडिया की चिंगारी सड़कों पर आग बन जाए।

भारत की शांति, उसके मौजूदा नेतृत्व में भरोसा

लेकिन अब तक भारतीय नौजवानों ने लोकतंत्र और मौजूदा नेतृत्व में भरोसा दिखाया है। ये सिर्फ भरोसा नहीं, उससे कहीं ज्यादा है।
भारत के लोकतंत्र की खूबी उसकी आवाज में नहीं, बल्कि उसके संयम में है। एक अरब लोगों का एक साथ रहना, बहस करना और अपनी राजधानी को जलाए बिना वोट करना कमजोरी नहीं, सभ्यता है।
BBC को शाहीन बाग जैसा कुछ और चाहिए, लेकिन भारत आगे बढ़ चुका है। मोदी सरकार ने भागीदारी के विचार को सड़क विद्रोहों से डिजिटल सशक्तिकरण और नीतिगत जुड़ाव तक बदल दिया है। और भारत का नौजवान ‘दबाया’ हुआ नहीं है, बल्कि उस देश को बनाने में व्यस्त है, जिस पर BBC को शक करना पसंद है।
तो… बीबीसी जी, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि Gen Z अपनी नियति हासिल करने में ‘नाकाम’ हो रहा। बाल्कि वो अपने लक्ष्यों की ओर खामोशी से बढ़ रहा है। यही खामोशी बीबीसी को हजम नहीं हो रही।
यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।(साभार) 

भारत विरोधी ताकतों के हाथ खिलौना राहुल और INDI गठबंधन; बेशर्म गुलाम मीडिया खामोश, क्यों? NYT, अल जजीरा, ABC…भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को बदनाम करने के लिए विदेशी मीडिया एकजुट; राहुल गाँधी का ‘वोट चोरी’ प्रोपेगेंडा फैलाने को सबने एक साथ बजाया भोंपू

राहुल गाँधी (फोटो साभार: PTI) (बाकी तस्वीरों का साभार: The Washington Post, New York Times और Al Jazeera)
राहुल गाँधी विदेशों में जाकर जो भारत के लोकतान्त्रिक मूल्यों को बचाने के लिए रोना रोता है उसका परिणाम सामने आने शुरू हो गए हैं। ये भारत का दुर्भाग्य है कि राहुल जैसा LoP और भारत विरोधी ताकतों के हाथ खिलौना बना INDI गठबंधन। जो नेता और पार्टियां भारत विरोधियों के इशारे पर नाचेंगी देश का किसी भी कीमत पर भला नहीं कर सकते। समय आ गया है जनता को कांग्रेस और 
INDI गठबंधन को चुनावों में या तो धूल चटाएं या गुलाम बनने, जिस तरह मुग़ल और ब्रिटिश सरकारों ने हमें गुलाम बनाया हुआ था उसी तरह गुलाम बनने के लिए तैयार रहना चाहिए। कांग्रेस और INDI गठबंधन की गुलाम मीडिया खामोश, क्यों? 

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग पर धांधली के बेबुनियाद आरोप लगाए हैं। इसमें विपक्ष के साथ-साथ विदेशी मीडिया भी उन्हें समर्थन दे रहा है। द वाशिंगटन पोस्ट, द न्यूयॉर्क टाइम्स, अल जजीरा सहित कई विदेशी मीडिया संस्थानों ने गुमराह करने वाले लेख प्रकाशित किए हैं ताकि ‘वोट चोरी’ के राहुल गाँधी के प्रोपेगेंडा को हवा दिया जा सके।

INDI गठबंधन के नेताओं ने 11 अगस्त 2025 को संसद से लेकर चुनाव आयोग मुख्यालय तक विरोध मार्च निकालकर हंगामा काटा। हालाँकि इस मार्च के लिए प्रशासनिक अनुमति नहीं ली गई थी। लिहाजा विपक्षी नेताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया। धक्का मुक्की की स्थिति पैदा हो गई।

इस दौरान विपक्षी नेताओं ने यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि बल प्रयोग से उनकी आवाज दबाई जा रही है। तृणमूल कांग्रेस की सांसद सांसद महुआ मोइत्रा और समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव जैसे कुछ नेता पुलिस बैरिकेड्स पर भी चढ़ गए थे।

इस घटना को द न्यूयॉर्क टाइम्स ने ‘चुनावी अनियमितताओं का विरोध करने पर भारतीय सांसदों को हिरासत में लिया’ शीर्षक के साथ प्रकाशित किया ताकि विपक्ष के बेबुनियाद आरोपों को बल मिल सके।

                                                  ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ वेब पोर्टल का स्क्रीनशॉट

इसी तरह वाशिंगटन पोस्ट ने बिहार में चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को शातिर तरीके से ‘विवादास्पद मतदाता सूची पुनरीक्षण’ बताया है।

                                                ‘वॉशिन्गटन पोस्ट’ वेब पोर्टल का स्क्रीनशॉट

अल जजीरा ने भी विरोध मार्च की रिपोर्टिंग में INDI गठबंधन के नेताओं के आरोपों को प्रमुखता दी है।

इनके सुर में सुर मिलाते हुए ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (ABC) ने भी बिहार में मतदाता सूची संशोधन को “विवादास्पद” बताया।

                                                       ABC वेब पोर्टल का स्क्रीनशॉट

गौरतलब है कि राहुल गाँधी ने 7 अगस्त 2025 को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें चुनाव आयोग पर बीजेपी के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया। कांग्रेस पार्टी की चुनावी हार के लिए चुनाव आयोग और सत्ताधारी बीजेपी को दोषी ठहराया। बिना किसी प्रमाण 2024 के लोकसभा चुनावों को ‘फिक्स’ बता दिया।

राहुल गाँधी की रायबरेली में ‘फर्जी मतदाता’

इस दौरान राहुल गाँधी ने कर्नाटक के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र का जिक्र किया। कहा कि उनकी पार्टी ने यहाँ एक ‘आंतरिक सर्वेक्षण’ कर 1,00,250 मतों की ‘वोट चोरी’ पकड़ी है। उनका कहना था कि कर्नाटक को कांग्रेस में 16 सीट मिलने की उम्मीद थी। लेकिन वह 9 सीट ही जीत पाई और ऐसा ‘वोट चोरी’ से ही संभव है।

उनका कहना था कि उनकी पार्टी ने इस अप्रत्याशित हार का विश्लेषण करने के बाद पाया कि ‘वोट चोरी’ हुई थी। राहुल गाँधी ने सत्ता में आने पर चुनाव आयोग के अधिकारियों को ‘परिणाम’ भुगतने की धमकी भी दी।

राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मतदाता सूचियों में ‘मकान नंबर 0’ जैसी विसंगतियों का हवाला देते हुए, चुनाव आयोग पर फर्जी मतदाता बनाने का आरोप लगाया। लेकिन बाद में कुछ मीडिया रिपोर्टों से पता चला कि राहुल गाँधी के खुद के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली में भी बड़े पैमाने पर मतदाता सूची में इस तरह की विसंगति है।

एक तरफ ‘फर्जी वोटरों’ का रोना, दूसरी तरफ SIR का विरोध

कांग्रेस पार्टी समेत पूरा INDI गठबंधन बिहार में SIR का विरोध कर रहा है। इस पर रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जा चुके हैं। हालाँकि शीर्ष अदालत ने मतदाता सूची संशोधन को नियमित प्रक्रिया और चुनाव आयोग का अधिकार बताते हुए रोक से इनकार कर दिया था।

दिलचस्प तथ्य यह भी है कि चुनाव आयोग राहुल गाँधी से उनके आरोपों पर शपथ देने को कह चुका है ताकि जाँच शुरू की जा सके। लेकिन कॉन्ग्रेस नेता ने यह कहते शपथ पत्र देने से इनकार कर दिया कि एक नेता होने के कारण उनके कहे को ही शपथ के तौर पर लिया जाना चाहिए। इससे उनके आरोपों की ‘गंभीरता’ का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अवलोकन करें:-

सुर्खियों में कर्नाटक के ‘शशि थरूर’: मंत्री राजन्ना ने Rahul Gandhi के वोट चोरी के दावों की पोल खोली, जो
सुर्खियों में कर्नाटक के ‘शशि थरूर’: मंत्री राजन्ना ने Rahul Gandhi के वोट चोरी के दावों की पोल खोली, जो
 

यही कारण है कि एक तरफ राहुल गाँधी मतदाता सूची में फर्जी लोगों का नाम जोड़ने का आरोप लगाते हैं, दूसरी तरफ मतदाता सूची से फर्जी, अयोग्य और मृत लोगों के नाम हटाए जाने का विरोध भी करते हैं। उल्लेखनीय है कि बिहार में चुनाव आयोग की मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया ने भारी विसंगतियाँ पकड़ी है।

आयोग ने पाया है कि सूची में 18 लाख मृत लोगों के नाम दर्ज थे। 7 लाख नाम डुप्लीकेट थे। इसके अलावा 26 लाख लोग ऐसे थे जो दूसरे जगहों पर जा चुके हैं।

भारत विरोधी ताकतों की कठपुतली बन रहा विपक्ष : कर्नाटक के कांग्रेसी विधायक ने दी धमकी, सिद्धारमैया को सत्ता से बेदखल करने की कोशिश हुई तो बांग्लादेश जैसा हाल होगा: कहा- PM मोदी के घर धावा बोलेंगे

                  कर्नाटक कांग्रेस विधायक जीएस पाटिल (फोटो साभार: Asianet Newsable)
देश विरोधी ताकतों के हाथ कठपुतली बन पाकिस्तान और बांग्लादेश की हो रही दुर्गति से भारतीय विपक्ष ने कुछ नहीं सीखा। 2024 लोकसभा चुनावों में इस बात की चर्चा थी कि नरेंद्र मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से 
रोकने के लिए भारत विरोधी ताकतें अरबों रूपए विपक्ष पर खर्च कर रही हैं। जो बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा सत्ता जाती देख देश में आग लगाने की बात बोलने के बाद कर्नाटक कांग्रेस के विधायक जीएस पाटिल ने कही है जिसका कांग्रेस तो क्या INDI गठबंधन की तरफ से भी खंडन नहीं किया जाना, साफ जाहिर कर रहा है कि विपक्ष लोकतंत्र और संविधान का बहाना कर देश विरोधी ताकतों के हाथ खेल रहा है। अब इस गठबंधन को वोट देने वालों को सोंचना चाहिए कि भारत विरोधी ताकतों के धन पर चुनाव लड़ने वालों को क्यों वोट दिया?   

बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से कांग्रेस और उसके सहयोगी पार्टियाँ ठीक वही सपना देख रही हैं, जिसमें बांग्लादेश में हिंसा के दम पर शेख हसीना को अलोकतांत्रित तरीके से अपना देश छोड़कर भागना पड़ा। कर्नाटक में कांग्रेस नेता और विधायक जीएस पाटिल भी ऐसा ही सपना देख रहे हैं। दरअसल, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर जाँच की तलवार लटकी है, ऐसे में जीएस पाटिल ने कहा कि अगर सिद्धारमैया की ताकत को कम करने की कोशिश हुई, या वो सत्ता से बेदखल हुए, तो भारत में भी बांग्लादेश जैसा हाल हो जाएगा।

गजेंद्रगढ़ में तालुक अहिंदा यूनियन द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन के दौरान जीएस पाटिल ने ये विवादित बयान दिया। पाटिल ने धमकी देते हुए कहा, “वह दिन दूर नहीं जब लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास पर धावा बोलेंगे, ठीक वैसे ही जैसे बांग्लादेश में हुआ था।”

विधायक ने दावा किया कि मोदी सरकार राज्यपाल के माध्यम से कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। पाटिल ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार द्वारा पूँजीपतियों के हितों को आम जनता के हितों से अधिक प्राथमिकता दे रही है, जबकि सिद्धारमैया का प्रशासन जनता के हित में है। पाटिल ने कहा, “सिद्धारमैया ऐसी योजनाएँ लागू कर रहे हैं जो राज्य में सभी समुदायों के विकास का समर्थन करती हैं।”

जीएस पाटिल ने आरोप लगाया कि राज्यपाल ने पहले बीजेपी और जेडीएस नेताओं के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन महज एक कार्यकर्ता की शिकायत के आधार पर सिद्धारमैया के खिलाफ़ मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी है। पाटिल ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर देश को ख़तरनाक रास्ते पर ले जाने और देश में राजनीतिक अशांति पैदा करने का आरोप लगाया।

इस बीच, बीजेपी नेताओं ने उनके बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। विजयपुरा लोकसभा सीट से बीजेपी सांसद रमेश जिगाजिनागी ने उनके बयान की निंदा की और कहा कि कांग्रेस नेताओं में बुद्धि और समझ की कमी है। वो जनता को धोखा दे रहे हैं। सांसद ने कहा कि कांग्रेस प्रशासन राज्य के विकास में योगदान देने में विफल रहा है।

कुछ दिन पहले ही कांग्रेस के एमएलसी इवान डिसूजा ने राज्यपाल थावर चंद गहलोत को धमकी दी थी कि अगर उन्होंने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की जाँच के लिए दिए गए अपने निर्देश को वापस लेने से इनकार कर दिया तो उनका “बांग्लादेश जैसा हश्र” होगा। उन्होंने घोषणा की, “अगर राष्ट्रपति राज्यपाल को वापस भेजने में विफल रहते हैं, तो राज्यपाल के कार्यालय को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री जैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ेगा, जिन्हें रात के दौरान अचानक अपना पद छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। हमारी अगली लड़ाई ‘चलो राज्यपाल कार्यालय’ के नारे के साथ होगी।”

17 अगस्त को राज्यपाल थावर चंद गहलोत ने मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (MUDA) जमीन के आवंटन में अनियमितताओं के बारे में सिद्धारमैया के खिलाफ जाँच को अधिकृत मंजूरी दी। सिद्धारमैया ने राज्यपाल के आदेश को कर्नाटक उच्च न्यायालय में चुनौती देकर जवाब दिया। उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट को 29 अगस्त की सुनवाई तक मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई भी आगे की कार्रवाई करने से रोकने का आदेश दिया है।

भारत विरोधी दुष्प्रचार में ‘ यूनिसेफ’ की बढ़ती रुचि चिंता का विषय

मनोज ज्वाला, उगता भारत 

गाजियाबाद ( ब्यूरो डेस्क) विश्व भर की रिलीजियस-मजहबी शक्तियों के लिए चुनौती बना अकेला धर्मधारी देश भारत जब से अंग्रेजी उपनिवेशवादी कांग्रेसी शासन से मुक्त हो कर हिन्दुत्ववादी भाजपाई सत्ता से शासित हो रहा है तब से इसके विरुद्ध भिन्न-भिन्न वैश्विक दुष्प्रचारों की आंधी से चल पडी है । अभी हाल ही में सम्पन्न हुए भारतीय लोकतंत्र के सबसे बडे आम-चुनाव के दौरान ऐसे सुनियोजित दुष्प्रचारों की एक से एक बानगी देखने-सुनने को मिली । विभिन्न चर्च-मिशनरिज संस्थाओं से ले कर उनके पालक-पोषक रिलीजियस राज्यों एवं उन सबके सरगना संयुक्त राज्य अमेरिका तथा उसके विभिन्न आयोगों-एजेन्सियों और मीडिया संस्थानों द्वारा तब भाजपा-मोदी को भारत की केन्द्रीय सत्ता से बेदखल करने के बावत धार्मिक स्वतंत्रता  और अल्पसंख्यकों व मुसलमानों की सुरक्षा पर खतरा के एक से एक आख्यान (नैरेटिव) रच-गढ कर उन्हें प्रचारित करते हुए भारतीय लोकतंत्र की शुद्धता पर ही सवाल उठाये  जाते रहे । अंतर्राष्ट्रीय रिलीजियस-मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर धर्मोन्मूलन का गुप्त एजेण्डा क्रियान्वित करने हेतु कायम ‘यु एस कमिशन फॉर इण्टरनेशनल रिलीजियस फ्रिडम’ ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में भारत को धार्मिक स्वतंत्रता का हनन-कर्ता घोषित कर पाकिस्तान-अफगानिस्तान-मिस्र-सिरिया आदि सर्वाधिक चिन्ताजनक देशों की सूची में शामिल कर रखा है, तो उसके तुरंत बाद उसी आधार पर वहां के एक मीडिया संस्थान ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने ‘मोदी के भारत में मुसलमान असुरक्षित हैं’ ऐसा आख्यान गढ कर झूठी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी । फिर उन दोनों रिपोर्टों के आधार पर अमेरिका अपनी चौधराहट सिद्ध करने के लिए उपदेश बखारने लगा । इसी तरह से ‘हेनरी लुईस फाउण्डेशन’ एवं ‘जॉर्ज सोरोस ओपेन सोसाइटी फाउण्डेशन’ तथा ‘बर्कले सेंटर फॉर रिलिजन व पीस एंड वर्ल्ड अफेयर्स’ (Berkley Center for Religion, Peace and World Affairs) एवं ‘कार्नेगी इंडॉमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ (Carnegie Endowment for International Peace) और ‘ह्यूमन राइट्स वाच’ व  ‘साउथ एशिया एक्टिविस्ट कलेक्टिव’ (एसएएसएसी) नामक चर्च-मिशनरिज संस्थाओं ने अपने भारी-भरकम संसाधनों व भारतीय एजेण्टों के सहारे संविधान व आरक्षण विषयक झूठी-झूठी सूचनाओं-सम्भावनाओं का दुष्प्रचार कर चुनावी जनमत को भारत की राष्ट्रवादी धर्मधारी सत्ता के विरुद्ध नकारात्मक दिशा में उलझाने और उपनिवेशवादी रिलीजियस-मजहबी कांग्रेसी गिरोह के पक्ष में रिझाने का काम युद्ध-स्तर पर किया । इस कडी में अब एक नया नाम जुड गया है ।

खबर है कि भारत-विरोधी दुष्प्रचार की इस मुहिम में अब ‘युनिसेफ’ नामक उस अंतर्राष्ट्रीय संस्था का मिथ्याचार भी शामिल हो गया है , जो संयुक्त राष्ट्र संघ से सम्बद्ध है । मालूम हो कि ‘युनाइटेड स्टेट्स इण्टरनेशनल चिल्ड्रेन्स इमर्जेन्सी फण्ड’ (युनिसेफ) का काम विभिन्न देशों में उपेक्षित-पीडित असहाय कुपोषित बच्चों व माताओं को सहयोग-संरक्षण प्रदान करना है । किन्तु यह संस्था अपने इस घोषित कार्यक्रम की आड में तत्सम्बन्धी अध्ययन-सर्वेक्षण के नाम पर रिलीजन की वैश्विक ऑथोरिटी , अर्थात ‘वेटिकन सिटी’ एवं तमाम रिलीजियस-मजहबी शक्तियों के सरगना– अमेरिका और वेटिकन सिटी से निर्धारित-संचालित उनकी धर्म-विरोधी गतिविधियों को अनुकूलतायें प्रदान करता रहा है । दरअसल युएनओ जो है, वही अमेरिकी हाथों का खिलौना मात्र है, जिसका स्थाई पर्यवेक्षक हुआ करता है- ‘वेटिकन सिटी’ अर्थात क्रिश्चियनिटी की सर्वोच्च ऑथोरिटी । तो ऐसे में जाहिर है- जब ‘युएनओ’ ही निष्पक्षता व धार्मिकता से दूर है, तो युनिसेफ की क्या विसात है !

बहरहाल इस युनिसेफ द्वारा जारी की गई रिपोर्ट पर आप गौर करें तो पाएंगे कि युएनओ की यह संस्था भी ‘युएससीआईआरसी’ नामक अमेरिकी आयोग की राह अख्तियार कर ली है और भारत के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करती दिख रही है। बकौल युनिसेफ रिपोर्ट- “भारत में लोगों को खाने के लिए भोजन नहीं मिल रहा, लोग भूख से मर रहे हैं, कुपोषण के शिकार बच्‍चों की संख्‍या करोड़ों में है। बच्‍चे पौष्‍टिक आहार नहीं मिलने से कई तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं । यूनिसेफ की यह ‘‘चाइल्ड फूड पॉवर्टी’’ रिपोर्ट इसी माह जून 2024 में प्रकाशित हुई है, जिसमें कहा गया है कि “भारत में ‘बाल खाद्य गरीबी’ (बाल खाद्य गरीबी) की समस्या इतनी गम्भीर है कि वह दुनिया के सबसे खराब देशों में शामिल है, जबकि स्थिति पाकिस्‍तान, बांग्‍लादेश, नेपाल, श्रीलंका जैसे देशों की स्थिति भारत से बेहतर है । इससे पहले संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ (UNO) और फूड एंड एग्रीकल्‍चर ऑर्गनाइजेशन (FAO) आदि एजेंसियों के आंकडों के आधार पर जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स (वैश्विक भूखमरी सूचकांक)-२०२३ में भी भारत को107वें नंबर पर दिखाया गया था , जबकि आटा-दाल-अलू-प्याज के लिए भी तरस रहे पाकिस्तान को 102वें स्थान पर , बांग्लादेश को  (81वें स्थान पर तथा नेपाल को 69वें स्थान पर और श्रीलंका , जहां की जनता ने भूखमरी के सवाल पर विद्रोह कर दिया था और जिसकी अर्थव्यवस्था भारत सरकार के आर्थिक सहयोग से पुनर्जीवित हुई है , उसे (60वें) स्थान पर दिखाया गया है ।  

यूनिसेफ की इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि दक्षिण एशियाई देशों की सूची में भारत गंभीर ‘बाल खाद्य गरीबी’ से जूझ रहा है और यहां पांच वर्ष तक की उम्र वाले 76 प्रतिशत बच्‍चे  उचित पोषक आहार दे दूर हैं । दक्षिण एशियाई देशों की सूची में मुख्‍य तौर पर 07 देश शामिल किए गए हैं, जिनमें सिर्फ अफगानिस्‍तान को चाइल्ड फूड पॉवर्टी में भारत से पीछे रखा गया है, जबकि पाकिस्तान, बांग्‍लादेश, श्रीलंका, नेपाल की स्थिति भारत से बेहतर है ।

इस रिपोर्ट की वैश्विक सूची में भारत को विश्व के उन 10 देशों में शामिल किया गया है, जहां बच्चों को जरूरी पोषक आहार नहीं मिल पाता है । विश्व में सबसे ज्यादा खराब स्थिति सोमालिया की बतायी गई है, जहां 63 प्रतिशत बच्चों तक उचित आहार की पहुंच नहीं है । इस क्रम में सोमालिया के बाद नाम गिनी में 54 प्रतिशत, अफगानिस्तान में 49 प्रतिशत, सिएरा लियोन में 47 प्रतिशत, इथियोपिया में 46 प्रतिशत, लाइबेरिया में 43 प्रतिशत और भारत में 40 प्रतिशत बच्चों को उचित पोषक आहार से वंचित बताया गया है ; जबकि पाकिस्‍तान में मात्र 38 प्रतिशत और मॉरिटानिया में भी 38 प्रतिशत  बच्चों को ही कुपोषित दिखाया गया है । अब आप स्वयं समझ सकते हैं कि भारत के संदर्भ में युनिसेफ की यह सूची कितनी विश्वसनीय है ।

यूनिसेफ का दावा है कि उसने वैश्विक स्तर पर इस्तेमाल किये जाने वाले मानक और डब्ल्यूएचओ आहार विविधता स्कोरिंग पद्धति का उपयोग करके 137 देशों और क्षेत्रों में किए गए 670 राष्ट्रीय प्रतिनिधि सर्वेक्षणों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है , जिसमें वैश्विक स्तर पर सभी छोटे बच्चों के 90 प्रतिशत से अधिक का प्रतिनिधित्व हुआ है । किंतु उसकी  इस रिपोर्ट का व्‍यवहारिक अध्‍ययन करने तथा भारत सरकार के राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) की रिपोर्ट से तुलना करने पर यह साफ हो जाता है कि युनिसेफ ने भारत की राष्ट्रवादी भाजपाई सरकार को बेदखल करने हेतु भारत की छवि खराब कर उसे बदनाम करने एवं राष्ट्रीयता-विरोधी कांग्रेस को सत्तारुढ करने का ठेका चला रही ‘हेनरी लुईस फाउण्डेशन’ एवं ‘जॉर्ज सोरोस ऑपेन सोसाइटी फॉउण्डेशन’ जैसी रिलीजियस-मजहबी संस्थाओं से हाथ मिला रखा है ।

दरअसल ये वो संस्थायें हैं, जिनकी पालक-पोषक-नियामक सत्ता को विश्व में भारतीय राष्ट्रवाद (हिन्दूत्ववाद) का उभार कतई वर्दास्त नहीं होता, क्योंकि इससे उनके रिलीजियस मजहबी विस्तारवाद और नव-उपनिवेशवाद का उनका एजेण्डा प्रभावित होता दिखने लगता है, जो कदाचित सच भी है । उनके विस्तारवादी मार्ग में भारत की राष्ट्रीयता अर्थात सनातन धर्म और राष्ट्रीयतावादी भाजपा-मोदी सरकार सर्वाधिक बाधक है, जिससे पार पाने के लिए उसकी छवि खराब करना और सनातन धर्म-विरोधी सरकार कायम करना उनकी आवश्यकता होती जा रही है । इसीलिए ये सब संस्थायें भिन्न-भिन्न सुरों में एक ही राग आलापने लगी हैं । 

एलन मस्क आपके देश में वोटिंग के लिए उपयोग होने वाली Electronic Machines पर सवाल उठ सकता है; भारत की EVM में कोई दोष नहीं निकाल सका ; हम अमेरिका से बहुत आगे हैं ; चुनाव आयोग को एलन मस्क पर 50 करोड़ का मानहानि मुकदमा ठोक देना चाहिए

सुभाष चन्द्र

बुजुर्गों की एक कहावत है कि जो परिवार अपने सदस्यों पर यकीन नहीं करने की बजाए परिवार से बाहर के लोगों पर ज्यादा यकीन करता है, उस परिवार में 24 घंटे कलेश रहता है जो एक सुखद परिवार के अच्छे लक्षण नहीं। वह परिवार आर्थिक और आत्म-सम्मान में किसी गिनती में नहीं रहता। ठीक वही हालत हमारे विपक्ष की है। जो अपने संसाधनों पर विश्वास करने की बजाए भारत विरोधी विदेशियों के हाथ कठपुतली बना हुआ है। 

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राहुल गाँधी ने एक बार कहा था कि देश में मिट्टी का तेल फैला हुआ है बस एक माजिस दिखाने की जरुरत है। गलत नहीं कहा था, बिल्कुल ठीक कहा था; क्योकि तेल फ़ैलाने वाला यही विदेशियों के हाथ की कठपुतली और माजिस दिखाने वाला भी यही। सबूत सबके सामने हैं, तरस आता है बुद्धिविहीन विपक्ष को वोट देने वालों पर। 

टेस्ला के CEO और अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क ने कहा है कि हम लोगों को EVM को हटा देना चाहिए क्योंकि इसे मानव के अलावा Artificial Intelligence (AI) से हैक किया जा सकता है। बस इतना सुन कर विपक्ष की तो बांछें खिल गईं। राहुल गांधी उछल पड़ा कि हमारे EVM में पारदर्शिता की कमी है, EVM हमारा Black Box है। अखिलेश यादव फ़ैल गया कि बैलट बॉक्स से चुनाव होने चाहियें।

विपक्ष बैलेट क्यों चाह रहा है, आज की युवा पीढ़ी को मालूम हो कि EVM से पहले विपक्ष बूथ कैप्चरिंग कर अंधाधुंध बैलेट पर अपने चुनाव चिन्ह पर मोहर लगाकर जीत जाते थे, इसीलिए विदेशी भीख पर आश्रित विपक्ष EVM का विरोध कर रहा है। राहुल से पूछा जाये कि नेहरू ने हारे हुए मौलाना आज़ाद को विजयी कैसे घोषित करवा, हिन्दू महासभा के विजयी उम्मीदवार विशन सेठ की वोटों को आज़ाद की मिलवाकर हारे हुए आज़ाद को विजयी घोषित करवा दिया। अगर उस समय EVM होती नेहरू को धूल ही चाटनी होती।   

कांग्रेस के राशिद अल्वी ने कहा कि एलन मस्क बड़े आदमी हैं, सबसे अमीर उद्योगपति हैं, उन्होंने EVM पर कुछ बोला है तो ठीक ही होगा। एक भाई ने कहा कि जिस system पर उंगली उठे, उसे बंद कर देना चाहिए। फिर तो गांधी परिवार के कांग्रेस पर कब्जे पर भी उंगली उठती है, उन्हें भी कांग्रेस से बाहर करो।

यानी अमेरिकी मस्क कहे तो ठीक है, BBC कहे मोदी के खिलाफ तो वो भी ठीक है और जो भी विदेशी भारत के खिलाफ बोलते हैं, उनका कहा तो पत्थर की लकीर मान लेते हैं।

अब चुनाव आयोग ने एलन मस्क को चुनौती दी है कि भारत में आकर हमारी EVM को हैक  करके दिखाइए। एक अख़बार के खिलाफ आयोग ने मुकदमा भी दर्ज किया है।

एलन मस्क, कांग्रेस और विपक्ष को इतना भी अहसास नहीं है कि कांग्रेस की सीटें करीब दोगुनी हो गई, सपा की सीट 5 से 37 हो गई और 10-12 दिन तक EVM पर किसी ने सवाल नहीं उठाया। अगर EVM में गड़बड़ होती तो भाजपा की सीट 400 ही होती, 303 से 240 नहीं रहती और कांग्रेस समेत विपक्ष की सीटें न बढ़ती। बस मुंह उठा कर EVM का चरित्र हनन करने से मतलब है।

एलन मस्क को पता नहीं भारत में अनेक लोगों ने EVM में छेड़छाड़ होने का दावा किया और जब चुनाव आयोग ने उन्हें आयोग में आकर छेड़छाड़ करके आरोप साबित करने को कहा तो कोई नहीं कर सका। केजरीवाल का सौरभ भारद्वाज आयोग में जाकर फेल होकर आया। एलन मस्क और कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष को पता है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में 40 याचिकाएं लगाईं थी EVM में दोष निकाल कर उसे हटाने के लिए लेकिन सभी याचिकाएं अदालत ने ख़ारिज की और EVM में किसी प्रकार की त्रुटि मानने से मना कर दिया। अब मस्क भारत आएं और चुनाव आयोग की चुनौती स्वीकार करें। चुनाव आयोग को मास्क पर कम से कम 50 करोड़ रूपए मानहानि का मुकदमा दर्ज करना चाहिए। 

एलन मस्क, यह हो सकता है कि अमेरिका में उपयोग होने वाली Electronic Machines सफल ना हो रही हों लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हमारी मशीन भी गलत है। भारत Technology में अमेरिका से कम नहीं है और कांग्रेस को याद रखना चाहिए कि EVM सबसे पहले इंदिरा गांधी के समय में 1982 में शुरू हुई थी।

हम अमेरिका से कितने आगे हैं, एलन मस्क को यह भी पता होना चाहिए। भारत में महिलाओं को वोट देने का अधिकार आज़ादी मिलते ही मिल गया था जबकि अमेरिका में 1776 में आज़ादी मिलने के बाद 1920 यह अधिकार पहले White Women को मिला यानी 144 वर्ष बाद और अश्वेत महिलाओं को यह अधिकार उसके भी 50 वर्ष के बाद मिला। इसलिए भारत आपसे कहीं पीछे है, तो कहीं बहुत आगे भी है।

मोदी को कांग्रेस की 100 गालियों से भद्दी है भागवत जी और इंद्रेश कुमार की गाली ; संघ की मर्यादाएं तोड़ कर बोले और विपक्ष को खुश कर दिया दोनों ने; अपने घर को आग लगाने से पड़ोसी ही खुश होते हैं

 सुभाष चन्द्र

दो दिन पहले संघ प्रमुख माननीय मोहन भागवत जी ने जो बयान दिया उसने हारी हुई कांग्रेस और विपक्ष को मोदी पर वार करने का हथियार दे दिया। सारे नेता मोदी पर बरस पड़े केवल इस बात पर कि भागवत जी ने कह दिया कि मणिपुर एक साल से शांति की राह देख रहा है।  जयराम रमेश, कपिल सिब्बल, तेजस्वी यादव, सुप्रिया सुले और भूपेश बघेल सबको खुजली हुई कि भागवत का तो मोदी को कहना मानना चाहिए और मणिपुर जाना चाहिए।

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राममंदिर के बाद बाद काशी पर हो रहे विवाद पर भी भागवत ने कहा कि 'हमें हर मस्जिद में शिवलिंग नहीं देखना चाहिए।' ये बात कहने का क्या मतलब था? भागवत क्या अपना प्रमुख साप्ताहिक Organiser नहीं पढ़ते? या इतिहासिक प्रवचन देने वाले भागवत लगभग 30+वर्ष पूर्व, संपादक प्रो वेद प्रकाश भाटिया के कार्यकाल में इस साप्ताहिक में प्रकाशित डॉ गणेशी लाल वर्मा लिखित श्रृंखला "Conversion of Hindu Temples" भूल गए? तब तो कोई विरोध नहीं किया, क्यों?

मोहन भागवत की मणिपुर पर कही बात तो बड़ी पसंद आ रही है विपक्ष को लेकिन वो तो बहुत कुछ कहते हैं, कभी आप भी तो उनकी बातें माना करो लेकिन कांग्रेस ने अगले दिन कह दिया कि RSS अब अप्रासंगिक हो गया है। भागवत जी ने कहा कि “जो मर्यादा का पालन करे, अहंकार न करे, वही सच्चा सेवक है। इस मानसिकता से छुटकारा पाना होगा कि सिर्फ हमारा विचार सही है, दूसरे का नहीं। चुनाव प्रचार में झूठ फैलाया गया, झूठ पर आधारित मुकाबला था।आपसी सहमति बनाएं, विपक्ष को विरोधी नहीं, प्रतिपक्ष कहें”। क्या इसका मतलब यह था कि मोदी प्रधान सेवक तो क्या “सेवक” भी नहीं है?

इसके बाद आज संघ के वरिष्ठ नेता जो “मुस्लिम राष्ट्रीय मंच” चलाते हैं, इंद्रेश कुमार ने आग में घी डालने का काम किया और कहा कि “जिस पार्टी ने भक्ति की और जिसे पूरी शक्ति मिलनी चाहिए थी, उसे अहंकार के कारण भगवान ने 241 पर रोक दिया और जिनकी श्रद्धा राम में नहीं थी उन्हें 234 पर रोका और बताया कि तुम सफल नहीं हो सकते”।

इंद्रेश कुमार 'हाँ' अहंकार टूटा है। नरेंद्र मोदी का नहीं तुम्हारा, संघ का, सनातन विरोधियों का, मोदी को हराने विदेशी भीख पर पलने वालों का, अहंकार टूटा है भारत विरोधी विदेशियों और एक मुश्त मोदी के विरुद्ध वोट करने वालों का। 

इंद्रेश कुमार "मुस्लिम राष्ट्रीय मंच" चलाकर अपनी दुकान चमकाते रहो, दुनिया को पागल बनांते रहो कि मुस्लिम संघ से जुड़ रहा है। लेकिन ये लोग संघ और बीजेपी दोनों को पागल बनाकर अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं, तिजोरी भर रहे हैं लेकिन बीजेपी को वोट नहीं दे रहे। इंद्रेश जिस दिन सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया था, उसी दिन मुस्लिम समाज ने बीजेपी को वोट नहीं देने का इरादा कर लिया था। चलाते मुस्लिम मंच और मुस्लिम में क्या चल रहा है, उससे बेखबर हुए बैठ, प्रधानमंत्री पर कटाक्ष कर रहे हैं।

इन दोनों महानुभावों की बातें सुनकर मैं सदमे में हूं क्योंकि उन्होंने बोलते हुए एक बार भी नहीं सोचा कि ये क्या कह रहे हैं और इसका मतलब क्या निकल सकता है। लगता है ये नड्डा जी के बयान से आहत थे जिसमें उन्होंने कह दिया था कि भाजपा अब सक्षम है और अपना कार्य स्वयं कर सकती है, संघ एक cultural और social organisation है। ये बात 18 मई को कही थी और शायद इसलिए ही मोदी जी नड्डा जी को मंत्री बना कर भाजपा के अध्यक्ष पद से हटने का तो इशारा कर दिया। फिर भी मोदी में “अहंकार” कह कर आप उसे कांग्रेस की 100 गालियों से भी बड़ी गाली दे गए। 

भागवत जी ने 2023 के विजयदशमी के संबोधन में खुलकर कहा था कि मोदी सरकार हर क्षेत्र में अच्छा काम कर रही है। मणिपुर के बारे में भी विस्तार से विचार रखे थे जब मणिपुर मामला जोरों से चल रहा था लेकिन सरकार पर कोई उंगली नहीं उठाई। आज उसी मणिपुर के लिए मोदी को दोष दे दिया। भागवत जी को शायद आभास भी नहीं है कि कांग्रेस मोदी को मणिपुर जाने के लिए क्यों जिद पकड़े हुए है। पंजाब में मोदी पर हमला होने को था और मणिपुर में शायद कांग्रेस और विदेशी ताकतों ने (जो मणिपुर कलेश को प्रायोजित किए हुए हैं कांग्रेस के साथ) मोदी की हत्या की कोई साजिश रच रखी हो। यदि मोदी को मार दिया गया तो कौन जिम्मेदार होगा?

इंद्रेश कुमार से मैं पूछना चाहता हूं कि उनके मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के 10,000 सदस्यों ने कितने मुस्लिम वोट मोदी को दिलवाए जो आज आप अहंकार की बातें छौंक रहे हो।

भागवत जी आप विपक्ष को विरोधी न कह कर प्रतिपक्ष कहने की वकालत कर रहे हो जबकि वे लोग “घोर विरोधी” हैं मोदी के ही नहीं, संघ के भी क्योंकि उनका बच्चा बच्चा संघ को केवल एक नज़र से देखता है कि “संघ ने गांधी की हत्या की” और आप उनका सम्मान करने को कह रहे हो। आपके घर में आग लगी हो तो बाहर वाले ही तापते हैं।

ऐतिहासिक जीत, क्यों? मोदी को रोकने मुस्लिमों द्वारा एकमुश्त विरोध में वोट, आरएसएस का विरोध और भारत विरोधी विदेशी ताकतों द्वारा अरबों खर्च करने के बावजूद जीत ; आखिर कब तक खतरों के खिलाडी मोदी को अग्नि-परीक्षा देनी होगी?

आज(जून 9) नरेंद्र मोदी पहली बार लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री की शपथ ले रहे हैं। मोदी को नेता चुने जाने पर अपने सम्बोधन में बीजेपी जीत को ऐतिहासिक बताया। क्यों? इस रहस्य को समझना होगा। स्पष्ट है जिस मोदी को सत्ता से हटाने मुस्लिम एकमुश्त विरोध में वोट, भारत विरोधी विदेशी ताकतों द्वारा विपक्ष पर अरबों खर्च करना आदि जीत को ऐतिहासिक बनाता है। इस सबसे अधिक जीत के ऐतिहासिक बनने का कारण है आरएसएस विरोध। 

आखिर क्यों संघ मोदी के विरोध में खड़ा हुआ? क्या मोदी देश और सनातन के विरुद्ध काम कर रहे थे? क्या डॉ हेडगवार ने आरएसएस का गठन सनातन और देशहित के विरुद्ध किया था? यदि नहीं, फिर संघ ने क्यों मोदी का विरोध किया? यह पहली बार नहीं हुआ है, यह विरोध तब से चल रहा है जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। मोदी और संघ के बीच मनमुटाव की कहानी से YouTube पर भरमार है। क्या संघ अपनी दादागिरी चलाता रहेगा? यदि संघ ने अपना रवैया नहीं बदला, फिर वह दिन भी अधिक दूर नहीं होगा जब जनता ही इसे उस स्थान पर पहुंचा देगी जहां जवाहरलाल नेहरू से लेकर वर्तमान विपक्ष तक पहुँचाना जा रहा है। आरएसएस को डॉ हेडगवार का सपना साकार करने मोदी विरोध त्याग मोदी के साथ खड़ा होना चाहिए। देखिए संघ विरोध का वीडियो, बहुत हैं ऐसे वीडियो :-

 

मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव है कि नरेंद्र मोदी हर पीड़ित के साथ है, चाहे वह किसी भी संस्था और समुदाय से हो। ऑफिस में मेरे एक वरिष्ठ सहयोगी को सेवानिर्वित होने पर ग्रेचुटी के नाम पर रूपए देने की बजाए 40,000 रूपए कंपनी को देने को कहा। क्या कभी किसी की ग्रेचुटी minus में हो सकती है? हम दो महीने पहले रिटायर हो गए थे। सब तरफ हाथ-पैर मारने के बाद कुछ नहीं होने पर जब मुझसे संपर्क किया, तुरन्त नरेंद्र मोदी को शिकायत भेजने को कहने पर जवाब मिला कि 'मोदी विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे।' मैंने कहा ऐसी बात नहीं, मोदी हर पीड़ित के साथ है। यह मेरा पत्रकारिता अनुभव कहता है। जो शत-प्रतिशत सही साबित भी हुआ। संक्षेप में, जो कंपनी कर्मचारी से 40,000 रूपए मांग रही थी, उल्टे उसी कंपनी को कर्मचारी को लगभग 3,50,000 रूपए का चैक दिया। केवल उसी कर्मचारी को ही नहीं, मुझ सहित पहले रिटायर हो चुके कर्मचारियों को बुला-बुलाकर बाकी राशि दी। कंपनी इतनी शर्मसार हुई कि किसी को ऑफिस के अंदर नहीं, बल्कि स्वागत कक्ष में रोक, लेखाधिकारी द्वारा नीचे आकर चैक दिए। क्योकि कार्यवाही होने के कारण ऑफिस में प्रवेश की अनुमति नहीं। और बाद में रिटायर होने वालों को उचित ग्रेचुटी दी गयी। ये है मोदी की नियत और नीति।  

लोकसभा चुनाव 2024 के परिणाम सबके सामने हैं। देश ने NDA की गठबंधन सरकार को जनमत दिया है और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। भाजपा को इन चुनावों में 240 सीटें हासिल हुई हैं। वह अकेले दम पर बहुमत नहीं पा सकी है। उसका वोट प्रतिशत भी देश में 37.3% से 36.6% हो गया है। भाजपा के वोट शेयर में तो मात्र 0.6% की गिरावट है लेकिन उसकी सीटों का आँकड़ा इससे गड़बड़ा गया है। भाजपा 2019 में 303 सीटें आईं थी जबकि 2024 में उसकी सीटें घट कर 240 हो गईं, यानि उसे 63 सीटों का नुकसान हुआ।

चुनाव जैसे-जैसे बढ़ा, भाजपा को हुआ नुकसान

लोकसभा चुनाव में एक ट्रेंड देखने को मिला है, भाजपा को अधिकांश चुनाव के अंतिम चरणों में नुकसान हुआ है। इसके लिए बिहार और उत्तर प्रदेश का उदाहरण लिया जाना चाहिए। भाजपा को भी सबसे बड़ा नुकसान उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है। भाजपा को उत्तर प्रदेश में 33 सीट हासिल हुई हैं जबकि सपा यहाँ 38 और कॉन्ग्रेस 6 सीटें जीतने में सफल रही है। चुनाव के बढ़ने के साथ ही भाजपा और सपा की जीत का फासला भी उत्तर प्रदेश में बढ़ता गया है।
वोटिंग के चरणों के हिसाब से देखा जाए तो पहले चरण में हुए चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को 8 में से 3 जबकि दूसरे चरण में सभी 8 सीटों पर जीत मिली है। भाजपा पहले चरण में मुस्लिम बहुल सीटों पर ही पिछड़ी है। भाजपा को तीसरे चरण में भी काफी नुकसान हो गया। 10 में से 6 सीट तीसरे चरण में भाजपा हार गई, यह सीटें सपा ले गई। चौथे चरण में भाजपा को 13 में से 8 सीटों पर विजय श्री मिली। इसमें भी यादव परिवार की सीटों पर ही SP जीत हासिल कर सकी।
वहीं सबसे अधिक नुकसान भाजपा को पाँचवे और छठे चरण में हुआ। पाँचवे चरण में सपा-कॉन्ग्रेस गठबंधन ने 14 में से 10 सीट जीती। छठे चरण में सपा कॉन्ग्रेस गठबंधन ने 14 में से 11 सीट जीती। आखिरी सातवें चरण में 13 में से 6 सीट सपा जीत गई। ऐसे में उत्तर प्रदेश ने जहाँ चौथे चरण तक भाजपा का प्रदर्शन ठीक रहा, वहीं इसके बाद उसको बड़े झटके लगे। सपा-कॉन्ग्रेस गठबंधन की 60% से अधिक सीटें पाँचवे, छठे और सातवें चरण से आई हैं।

बिहार में भी यही कहानी

बिहार में NDA को भी सबसे बड़ा नुकसान अंतिम चरम में ही हुआ है। बिहार में NDA गठबंधन ने 40 में से 30 सीट जीती हैं। बाक़ी की 10 सीटों में 9 विपक्षी INDI गठबंधन को मिली हैं। बिहार में सातवें चरण में 8 सीटों पर चुनाव हुआ था जिसमें विपक्ष को 6 सीट मिलीं।
अंतिम चरण में राजद को पाटलिपुत्र, बक्सर और जहानाबाद की सीट मिली। कॉन्ग्रेस को अंतिम चरण में सासाराम और कम्युनिस्ट पार्टी को सीट मिली। INDI गठबंधन को मिलने वाली बाकी तीन सीटों में दो मुस्लिम प्रभाव वाले इलाकों में थी जबकि एक सीट उसे पहले चरण में ही मिल गई थी। तीसरे, चौथे और पाँचवे चरण में INDI गठबंधन का खाता तक बिहार में नहीं खुला।

देश में भी यही ट्रेंड

शुरूआती चरणों में अच्छा प्रदर्शन और अंतिम चरणों में खराब प्रदर्शन की यह कहानी मात्र उत्तर प्रदेश और बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश में भाजपा के साथ घटित होती दिखाई दे रही है। देश भर में भाजपा को पहले और दूसरे चरण में 189 में से 76 सीटें मिली हैं। तीसरे और चौथे चरण में भाजपा को सबसे अधिक फायदा देश में हुआ है। तीसरे और चौथे चरण में देश की 190 सीटों पर चुनाव हुआ था और इसमें भाजपा को 96 सीटों पर जीत मिली।
पाँचवे और छठे चरण से भाजपा को बड़ा नुकसान होना चालू हुआ। पाँचवे और छठे चरण में देश में 107 सीट पर चुनाव हुए, इसमें भाजपा 50 सीट जीत पाई। अंतिम चरण में भी भाजपा का प्रदर्शन कुछ खास अच्छा नहीं रहा। अंतिम चरण की 57 सीटों पर हुए मतदान में भी भाजपा को केवल 17 सीटें मिली। ऐसे में भाजपा को देशव्यापी नुकसान आखिरी तीन चरणों में हुआ।

क्या-क्या फैक्टर रहे?

पहले चरण से अंतिम चरण की तरफ जाते हुए भाजपा को यह चुनावी नुकसान क्यों हुआ, इसके कई कयास लगाए जा रहे हैं। एक कयास यह है कि शुरूआती चरणों में देश में गर्मी कम पड़ रही थी और तब वोटर बाहर निकल रहे थे जिससे भाजपा को फायदा हुआ। बाद के चरणों में देश में गर्मी बढ़ गई और वोटर निकलने से कतराने लगे जिससे भाजपा को नुकसान हुआ। इसके अलावा एक कयास यह है कि पहले चरण में भाजपा के पास फीडबैक पहुँचा और उसने अपना चुनावी अभियान दुरुस्त किया जिसका फायदा तीसरे और चौथे चरण में मिला।
यह सुधार की गति बाद के चरणों में नहीं बनी रही जिसके कारण इन चरणों में नुकसान हुआ। चुनाव प्रचार की दिशा और हर चरण में बदलते मुद्दे भी इसका एक कारण माने जा रहे हैं। हालाँकि, यह सभी केवल कयास हैं और इनको प्रमाणित करने वाले तथ्य अभी नहीं पुष्ट हो पाए हैं, ऐसे में अभी यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा को शुरूआती चरणों में फायदा और बाद के चरणों में फायदा क्यों हुआ।

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लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी-एनडीए को मिली विजय 2014 और 2019 से कहीं बड़ी है। इस बार लड़ाई कांग्रेस, सपा, टीएमसी और AAP से नहीं थी बल्कि इस बार लड़ाई वैश्विक शक्ति यानी ग्लोबल पावर्स से थी। आर्टिफीसियल असंतोष बढ़ाने के लिए, जातियों की खाई और चौड़ी करने के लिए विदेश में बैठकर सोशल मीडिया पर अभियान चलाए गए। बुद्धिजीवी बने पागल हिंदुओं को बांटने की हर प्रकार से साजिश रची गई। संविधान और आरक्षण जैसे मुद्दे बेवजह उठाए गए। जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गाँधी तक सोंचों कांग्रेस ने कितनी बार संविधान में बदलाव किये हैं, वो आज किस मुंह से संविधान की रक्षा की बात कर रही है? अमेरिका के एक अरबपति जार्ज सोरोस ने राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए 1 अरब डॉलर देने की बात कही थी वहीं जर्मनी में बैठे यूट्यूबर ध्रुव राठी देश को तोड़ने के लिए हर तरह का प्रोपेगेंडा फैलाने में जुटा था। जनहितैषी बने फिर नेता और उनकी पार्टियां भारत विरोधी विदेशी ताकतों की कठपुतली बन उनके इशारे पर नाच रही हैं। पीएम मोदी को सत्ता से हटाने, मजबूत होते भारत को कमजोर करने और देश को तोड़ने की तमाम साजिशें की गईं। मूर्ख जनता कांग्रेस की देश विरोधी को तब भी नहीं पहचान सकी जब दिल्ली से टुकड़े-टुकड़े गैंग के कन्हैया कुमार को उम्मीदवार बनाया। दूसरे, शराब और अन्य घोटालों में जेल गया अरविन्द केजरीवाल कह रहा है कि देश को तानाशाह से बचाने जेल जा रहा हूँ। जिस तरह मुसलमान भारतीय जनसंघ से लेकर वर्तमान भारतीय जनता पार्टी को हराने उस पार्टी को वोट देती है जो बीजेपी उम्मीदवार को हराने वाला होता और बुद्धिजीवी बना घूमता पागल/मूर्ख हिन्दू जात-पात में बंट वोट करता है। पागल हिन्दुओं को नहीं मालूम की हिन्दुओं से कहीं अधिक जातिवाद मुसलमानों में है, लेकिन मजहब के नाम पर सब एकजुट रहते हैं।

निवेशकों का भरोसा तोड़ने के लिए भारतीय उद्योगपतियों को निशाना बनाया गया। लेकिन इन तमाम साजिशों के सामने सबसे बड़ा रोड़ा बनकर नरेंद्र मोदी स्वयं खड़े हो गए। पीएम मोदी को अहसास था और इसलिए उन्होंने चुनाव अभियान में खुद को झोंक दिया और देश के लिए ढाल बन गए। उन्होंने 200 से ज्यादा जनसभाएं की, 80 से ज्यादा इंटरव्यू दिए, कई रोड शो किए। अथक मेहनत से ही वे भारत को अंतर्राष्ट्रीय साजिशों के कुचक्र से बचाने में कामयाब रहे। अभी यह जंग खत्म नहीं हुई है। देश के दुश्मन झूठ, छल, षड्यंत्रों का जाल बुनेंगे लेकिन यह देश का सौभाग्य है कि नेतृत्व नरेंद्र मोदी के हाथों में है।

मोदी ने 200 से अधिक रैलियां कर पसीने से सींचा मैदान
महासमर के ‘महारथी’ प्रधानमंत्री मोदी ने 30 मई को पंजाब के होशियारपुर में रैली करने के साथ अपने लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान का समापन किया। 16 मार्च को निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद से मोदी ने देशभर में 206 रैलियां और रोड शो किए। औसतन उन्होंने हर दिन चार से पांच रैलियां और रोड शो किए। नाव प्रचार अभियान के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने क्षेत्रीय व राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों को कुल 80 साक्षात्कार भी दिए। इस तरह उन्होंने मैराथन प्रचार का रिकार्ड कायम किया। प्रधानमंत्री ने 2019 के आम चुनाव के दौरान करीब 145 रैलियां-रोड शो किए थे।

मोदी ने प्रत्येक चुनावी रैली में औसतन 45 मिनट का भाषण दिया। इस तरह उन्होंने करीब 155 घंटे अपना संबोधन दिया। यही नहीं उन्होंने साक्षात्कारों के दौरान भी करीब एक हजार से अधिक सवालों के जवाब दिए। जब निर्वाचन आयोग ने चुनाव की घोषणा की तो उस वक्त मोदी दक्षिण भारत के राजनीतिक दौरे पर थे। 15 से 17 मार्च के बीच इन तीन दिनों में उन्होंने सभी पांच राज्यों को कवर किया।

मोदी की रणनीति और धुआंधार प्रचार अभियान की कामयाबी ही कही जाएगी कि लगातार तीसरे कार्यकाल में बीजेपी को 240 सीटें मिलीं वहीं एनडीए को 293 सीटें हासिल हुई। यह देश में 1964 के बाद पहली बार हुआ है कोई दल या गठबंधन लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए चुना गया हो। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद पीएम मोदी दूसरे व्यक्ति हैं जो लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनेंगे। 73 साल की उम्र में भी पीएम मोदी ने केवल रैलियों की संख्या बल्कि देशभर में तय की गई दूरी के मामले में भी प्रतिद्वंद्वी नेताओं को काफी पीछे छोड़ दिया। जहां पीएम मोदी ने एक दिन में चार-पांच चुनावी रैलियां और रोड शो किए वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी सिर्फ दो-तीन चुनावी कार्यक्रम ही करते दिखे। मोदी अपनी पार्टी के स्टार प्रचारक रहे और मतदाताओं के बीच लोकप्रिय बने रहे।

जॉर्ज सोरोस ने राष्ट्रवाद से लड़ने के लिए 1 अरब डॉलर दिए
अमेरिकी अरबपति-परोपकारी जॉर्ज सोरोस पर आरोप लगाया जाता है कि वे राजनीति को आकार देने और सत्ता परिवर्तन के लिए अपने धन और प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने 2020 में राष्ट्रवाद के प्रसार से निपटने के लिए एक नए विश्वविद्यालय नेटवर्क को एक बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद देने का एलान किया था। जॉर्ज सोरोस को बैंक ऑफ इंग्लैंड को बर्बाद करने वाले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। जिस तरह से भारत में रिजर्व बैंक (आरबीआई) काम करता है उसी तरह ब्रिटेन में बैंक ऑफ इंग्लैंड काम करता है। सोरोस पर आरोप लगते हैं कि हेज फंड मैनेजर ने एक समय पर ब्रिटिश मुद्रा (पाउंड) को शॉर्ट कर एक बिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया था। यही नहीं जार्ज सोरोस ने यूरोप में प्रवासियों के लिए 500 बिलियन डॉलर देने की बात कही। इसके साथ ही अश्वेतों के नेतृत्व वाले ब्लैक लाइव्स मैटर जैसे आंदोलन के लिए उसने 220 बिलियन डॉलर देने की बात कही थी। कुल मिलाकर जार्ज सोरोस दुनिया के देशों में अस्थिरता पैदा कर अपना बिजनेस हित साधने में जुटा रहता है।

सोरोस ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में उठाया था अडानी मुद्दा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सोरोस ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अडानी मुद्दा क्यों उठाया? सोरोस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर क्रोनी कैपटलिज्म को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि मोदी और अडानी करीबी सहयोगी हैं। उनका भाग्य आपस में जुड़ा हुआ है। सोरोस ने यह टिप्पणी 16 फरवरी 2023 को जर्मनी में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन से पहले टेक्निकल यूनिवर्सिटी आफ म्यूनिख में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए की। सोरोस ने कहा कि अडानी एंटरप्राइजेज ने शेयर बाजार में धन जुटाने की कोशिश की, लेकिन वह असफल रहा। सोरोस का यह बयान हिंडनबर्ग रिपोर्ट के करीब तीन हफ्ते बाद आया है। इससे आप समझ सकते हैं कि बीबीसी डॉक्यूमेंट्री और हिंडनबर्ग रिपोर्ट के पीछे कौन लोग हैं। ये वही लोग हैं जो भारत को कमजोर करना चाहते हैं।

जार्ज सोरोस की सहयोगी सुनीता विश्वनाथ से मिले थे राहुल गांधी

एक तरफ जार्ज सोरोस भारत में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को हटाना चाहता है। सोरोस के इरादे हर भारतवासी को पता है लेकिन इसके बाद भी राहुल गांधी ने जार्ज सोरोस की प्रतिनिधि सुनीता विश्वनाथ के साथ बैठक की थी। राहुल गांधी 4 जून 2024 को अमेरिका दौरे पर गए थे और जमाते इस्लामी से संबंधित एक इस्लामी संगठन से मिले थे। इस दौरान सोरोस के संगठन ओपन सोसायटी के मेंबर सलिल सेठी भी राहुल गांधी के साथ दिखाई दिए थे। सलिल सेठी राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा में भी दिखाई दिए थे। सवाल यह उठता है कि जो भारत की सरकार को गिराना चाहता है उसके साथ राहुल गांधी आखिर क्या कर रहे थे। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राहुल गांधी सत्ता पाने के लिए इस हद तक समझौता कर रहे हैं। अमेरिकी एक्टिविस्ट सुनीता विश्वनाथ वही हैं जिन्हें तीन साल पहले अयोध्या में एंट्री से रोक दिया गया था।

भारत को आत्मनिर्भर नहीं होने देना चाहती अंतर्राष्ट्रीय लॉबी
आत्मनिर्भर होते भारत को तोड़ने के लिए अंतर्राष्ट्रीय डिफेंस और फार्मा लॉबी से लेकर तमाम एजेंसियां प्रधानमंत्री मोदी को हटाने में जुटी थी। प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में भारत ने आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम उठाया है। इससे इस बात से समझा जा सकता है कि रक्षा निर्यात 6 सालों में 10 गुना बढ़ा है। वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारत ने 16 हजार करोड़ के स्वदेशी हथियार व पार्ट्स करीब 80 देशों को निर्यात किए। सरकार ने 2025 तक 1.75 लाख करोड़ रक्षा उत्पादन का लक्ष्य तय किया है। जबकि पांच साल में 35 हजार करोड़ के निर्यात की तैयारी चल रही है। इसी तरह भारत दुनिया की दवाखाना बनता जा रहा है। देश से दवाओं का निर्यात 2023-24 में सालाना आधार पर 9.67 फीसदी बढ़कर 27.9 अरब डॉलर पहुंच गया। इसी तरह अन्य उत्पादों में भारत आत्मनिर्भर होकर निर्यात भी करने लगा है जो कि वैश्विक शक्तियों को पसंद नहीं आ रहा है। वे मजबूत भारत नहीं चाहते। वे चाहते हैं भारत कमजोर बना रहे और उनसे सामान खरीदता रहे। यही वजह है कि वैश्विक शक्तियां पीएम मोदी हटाने के कमर कसी हुई थी लेकिन पीएम मोदी भारत की ढाल बनकर खड़े थे और वैश्विक शक्तियों को भारत को कमजोर करने से रोक दिया।

मोदी को हराने की सुपारी दी गई थी? ध्रुव राठी का पर्दाफाश
स्वामी योगेश्वरानंद गिरी ने पीएम मोदी का हराने के लिए किस तरह सुपारी दी गई उसका एक उदाहरण यूट्वूबर ध्रुव राठी का पर्दाफाश करके दिया। योगेश्वरानंद गिरी ने कहा कि मैं युवाओं से एक आग्रह करना चाहूंगा कि आप ध्रुव राठी के उन्हीं वीडियो को आप एक बार फिर से देखो और उसको गूगल से रिकन्फर्म कर लो। उसमें जितने भी डेटा दिए गए हैं वो विवादास्पद हैं। जितनी फिगर्स दी हुई हैं वो ब्रेनवाशिंग है। आप अगर उनके वीडियो को देखेंगे तो सिर्फ युवाओं के मनोबल को गिराने के सिवाय उसने कुछ भी नहीं किया।

मोदी दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता है। दुनियाभर में उनके नाम का डंका बज रहा है। प्रधानमंत्री मोदी सबसे अधिक लोकप्रिय और विश्वसनीय नेता की रेटिंग में एक बार फिर सबसे आगे हैं। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले उनकी अप्रूवल रेटिंग में जबरदस्त तेजी देखने को मिली है। फरवरी 2024 में उन्हें 75 प्रतिशत की अप्रूवल रेटिंग मिली है। अप्रूवल रेटिंग सर्वे करने वाली एजेंसी इप्सोस इंडियाबस के अनुसार यह पिछले साल सितंबर 2023 की 65 प्रतिशत की अप्रूवल रेटिंग से 10 प्रतिशत अधिक है।

भारत में विकास की रफ्तार को रोकने का षडयंत्र हिंडनबर्ग रिपोर्ट
अमेरिकी शॉर्ट सेलिंग फर्म हिंडनबर्ग ने 24 जनवरी को 2023 को रिपोर्ट जारी कर अडानी ग्रुप की कंपनियों को ओवरवैल्यूड बताया था और अकाउंट्स में हेरफेर का आरोप लगाया था। और अब देश में हो रहे जी-20 से पहले हिंडनबर्ग का दूसरा संस्करण 31 अगस्त 2023 को ‘ऑर्गेनाइजड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट’ (OCCRP) द्वारा लाया गया। इसके वर्तमान संपादक आनंद मंगनाले हैं जो चीनी प्रचार आउटलेट न्यूज़क्लिक से जुड़े रहे हैं। इससे इसकी साजिश को समझा जा सकता है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट केवल मोदी सरकार की छवि खराब करने के लिए नहीं लाई गई थी बल्कि भारत में विकास की रफ्तार को रोकने का एक षडयंत्र था। OCCRP की रिपोर्ट भी उसी षडयंत्र का एक हिस्सा है। वे भारत में उद्योगों को ध्वस्त करना चाहते हैं, वे देश के छोटे निवेशकों के विश्वास को तोड़ना चाहते हैं, वे विदेशी निवेशकों के भारत में विश्वास को डिगाना चाहते हैं।

देश को बदनाम करने के लिए जी-20 से पहले OCCRP रिपोर्ट
अडानी के खिलाफ OCCRP की रिपोर्ट देश में जी-20 की बैठक से करीब एक हफ्ते पहले 31 अगस्त 2023 को जारी की गई और मीडिया की सुर्खियां बनीं। ओसीसीआरपी की रिपोर्ट में दावा किया गया कि कि गौतम अडानी ग्रुप द्वारा शेयरों के साथ गड़बड़ी का मामला हुआ है। OCCRP की रिपोर्ट के मुताबिक, अडानी ग्रुप ने गुपचुप तरीकों से खुद अपने शेयर्स खरीद कर के स्टॉक एक्सचेंज में लाखों डॉलर का निवेश कर रखा है। OCCRP के वर्तमान संपादक आनंद मंगनाले हैं जो चीनी प्रचार आउटलेट न्यूज़क्लिक से जुड़े रहे हैं। OCCRP को जार्ज सोरोस के OSF और फोर्ड फाउंडेशन द्वारा वित्त पोषित किया जाता है। ऐसे आरोपों का अडानी ग्रुप द्वारा अपने मीडिया स्टेटमेंट में खंडन किया गया है।

मोदी के सामने बेवश पश्चिमी देश और अमेरिका बौखलाया
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और पश्चिमी देश अपना हित साधने के लिए सरकार भी खरीद लेती थी और तमाम तरह की साजिश रचने में सफल हो जाती थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 90 के दशक में हुए इसरो जासूसी कांड है। उस वक्त भारतीय वैज्ञानिक नंबी नारायण के नेतृत्व में भारत लिक्विड प्रोपेलेंट इंजन बनाने में सफल होने के करीब पहुंच गया था लेकिन CIA ने कांग्रेस सरकार और नेताओं को खरीद कर नंबी नारायण को जेल में डलवा दिया और भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम 20-30 साल पीछे चला गया। इसरो जासूसी कांड में जब नंबी नारायण को गिरफ्तार किया गया था तो उस वक्त केरल में कांग्रेस की सरकार थी। सीबीआई की जांच में सामने आया है कि नंबी नारायण की अवैध गिरफ्तारी में केरल सरकार के तत्कालीन बड़े अधिकारी भी शामिल थे। हाईकोर्ट में सीबीआई ने कहा कि नंबी नारायण की गिरफ्तारी संदिग्ध अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा थी।