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’43 रोहिंग्या औरतों-बच्चों-बुजुर्गों को समंदर में फेंक दिया’: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- किसने देखा, कहाँ है सबूत?

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (16 मई 2025) को रोहिंग्या शरणार्थियों के कथित तौर पर म्यांमार भेजे जाने की याचिका पर सुनवाई की। याचिका में दावा किया गया कि भारत सरकार ने बच्चे, औरतें, बुजुर्ग और कैंसर जैसे गंभीर बीमारियों से पीड़ित 41 रोहिंग्याओं को जबरदस्ती म्यांमार भेज दिया।

याचिका में दावा किया गया है कि इन लोगों को अंडमान ले जाकर समुद्र में फेंक दिया गया। जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने इस याचिका पर सवाल उठाए और इसे ‘बड़ी खूबसूरती से गढ़ी कहानी’ बताया। कोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई पक्का सबूत नहीं है, सिर्फ हवा-हवाई और बिना आधार वाले दावे किए गए हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोई राहत नहीं दी।

 रिपोर्ट्स के मुताबिक, जस्टिस सूर्या कांत ने याचिकाकर्ता के वकील से सख्त लहजे में कहा, “हर दिन आप नई-नई कहानी लेकर आते हैं। इस कहानी का आधार क्या है? बहुत खूबसूरती से बनाई गई कहानी! कोई सबूत तो दिखाइए।” कोर्ट ने पूछा कि क्या कोई वीडियो या गवाह है जो इन दावों को साबित कर सके। याचिकाकर्ता की तरफ से सीनियर वकील कॉलिन गोंसाल्वेस ने बताया कि दिल्ली में मौजूद याचिकाकर्ताओं को फोन कॉल से यह खबर मिली। उन्होंने कहा कि म्यांमार के तट से टेप रिकॉर्डिंग मौजूद है और सरकार इसकी जाँच कर सकती है। लेकिन जस्टिस कांत ने सवाल किया कि दिल्ली में बैठा याचिकाकर्ता अंडमान की घटना को कैसे सच साबित कर सकता है।

कोर्ट ने इस याचिका को 31 जुलाई 2025 को सुनवाई के लिए एक दूसरे रोहिंग्या मामले के साथ जोड़ दिया, जो तीन जजों की बेंच के सामने है। कोर्ट ने फौरन सुनवाई और निर्वासन रोकने की याचिकाकर्ता की माँग को खारिज कर दिया। गोंसाल्वेस ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय (UN-OHCHR) की एक रिपोर्ट का जिक्र किया, जिसमें इस मामले की जांच शुरू होने की बात थी। इस पर जस्टिस कांत ने कहा कि वे इस रिपोर्ट पर तीन जजों की बेंच में बात करेंगे और याचिकाकर्ता को यह रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने को कहा। उन्होंने आगे कहा, “बाहर बैठे लोग हमारे देश की संप्रभुता को चुनौती नहीं दे सकते।”

जस्टिस कांत ने यह भी बताया कि 8 मई को तीन जजों की बेंच ने ऐसी ही एक याचिका में निर्वासन (डिपोर्टिंग) रोकने से मना कर दिया था। उस सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि अगर रोहिंग्याओं को भारत में रहने का हक नहीं है, तो उन्हें कानून के मुताबिक निर्वासित किया जाएगा। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब देश मुश्किल वक्त से गुजर रहा है, तब ऐसी ‘काल्पनिक कहानियाँ’ सामने लाई जा रही हैं। गोंसाल्वेस ने कोर्ट से रोहिंग्याओं के मानवाधिकारों की रक्षा की गुहार लगाई और बताया कि देश में 8000 रोहिंग्या UNHCR कार्ड के साथ मौजूद हैं।

याचिका में दावा था कि दिल्ली पुलिस ने बायोमेट्रिक डेटा लेने के बहाने रोहिंग्याओं को हिरासत में लिया, उन्हें बसों और वैन में ले जाया गया, फिर पोर्ट ब्लेयर भेजकर नौसेना के जहाजों पर हाथ-पैर बाँधकर समुद्र में छोड़ दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने माँग की कि निर्वासित लोगों को वापस भारत लाया जाए, उन्हें रिहा किया जाए और आगे से UNHCR कार्ड वालों को गिरफ्तार न किया जाए।

‘रेप करना है तो गेट बंद करके कर लो… सबको मत दिखाओ’: बुरहान और मोहम्मद की लड़ाई में हजारों बच्चियाँ-औरतें शिकार, खतरे में पूरा सूडान

 

            सूडान में 40 लाख महिलाओं-लड़कियों पर रेप का खतरा (फोटो साभार: Human Rights Watch)
“तुम मेरे साथ रेप करने वाले हो, प्लीज दरवाजा बंद कर लो, दूसरे सैनिकों को मत देखने दो।”

“तुम मेरी बहन हो, तुम अरबी लड़की हो, तुम सुरक्षित हो… मैं तेरे साथ सोना चाहता हूँ। अपने बेडरूम में ले चलो।”

ऊपर दो अलग-अलग महिलाओं की आपबीती है। दोनों महिलाएँ सूडान की हैं। ऐसी आपबीती सिर्फ दो पीड़ित तक सीमित नहीं है बल्कि हजारों महिलाओं-बच्चियों की है। जिन लोगों ने इनके साथ रेप-गैंगरेप किया है, वो अरबी लड़ाके या सैनिक हैं। जिन पर यह सब बीत रही है, वो भी अरब से पैदा हुए मजहब इस्लाम को ही मानने वाले हैं। यह सब इतने व्यापक स्तर पर हो रहा है कि सूडान एक देश के तौर पर खत्म भी हो सकता है, ऐसा संयुक्त राष्ट्र का मानना है।

सूडान में जो मार-काट मची है, यह महीनों से चली आ रही। शुरुआती लड़ाई में एक पक्ष दूसरे पक्ष को मार रहा था, मर रहा था। कुछ ही दिनों के बाद लड़ने वाले ‘मर्दों’ ने इसका दायरा बढ़ा लिया है – महिलाएँ और बच्चियों का शिकार किया जाने लगा। सूडान में जिनके साथ यह हैवानियत हो रही, उनमें से कुछ ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की टीम को अपनी-अपनी आपबीती बताई है। भयावह रेप-गैंगरेप से गुजरने के बावजूद सिर्फ कुछ पीड़ित ही आपबीती सुना पा रहे। एक मानवाधिकार शोधार्थी ने इसके पीछे की वजह बताया – सूडान का इस्लामी समाज और इनकी रूढ़िवादी सोच। इस शोधार्थी ने बताया:

“यहाँ एक रूढ़िवादी मुस्लिम समुदाय है। ये महिलाओं के शरीर को कितनी ‘शुद्ध’, कितनी ‘स्वच्छ’ के नजरिये से देखते हैं। विपक्षी लड़ाकू सेना के लोग यौन हिंसा को एक हथियार के तौर पर देखते हैं, इसलिए नस्लीय हो या मजहबी, महिलाओं के साथ रेप करके वो पीड़ित पक्ष को दिखाना चाहते हैं कि तुम्हारी महिलाओं का स्थान सबसे निचले पायदान पर है।”

सूडान में रेप किनके साथ, कैसी पाशविकता

सबसे ऊपर 2 रेप पीड़िता की जो आपबीती है, वही सबसे भयावह है, ऐसा नहीं है। मीडिया रिपोर्ट में जितनी भी घटनाएँ सामने आई हैं, वो ऊपर से कम भयावह नहीं है।
  • एक महिला और उनकी 3 बेटियों का बलात्कार किया गया, एक ही जगह पर, सबको एक-दूसरे के सामने।
  • 2 बच्चियों का रेप उनके पिता के सामने किया गया। इनमें एक की मौत आंतरिक रक्तस्राव से हो गई। दूसरी बच गई लेकिन पिता की मौत सदमे के कारण हो गई।
  • 15 साल की एक बच्ची के सामने उनके माँ-पिता को मार दिया गया। फिर 5 लोगों ने उसके और उसके एक दोस्त के साथ गैंग-रेप किया। गैंगरेप के बाद उस दोस्त को भी गोली मार दी गई।
  • एक महिला को उसके पूरे परिवार को मारने की धमकी दी गई, उसकी बेटी को सेक्स-गुलाम बनाने के लिए कहा गया। सबको बचाने के लिए उस महिला ‘हार’ मानते हुए खुद का बलात्कार करवाया।
  • 25 साल की एक मानवाधिकार कार्यकर्ता महिला के घर पर हमला किया गया, उसके छोटे भाई को मार डाला, बाप-बहन को घायल किया, 15 साल की छोटी बहन को अगवा कर लिया। मानवाधिकार कार्यकर्ता को कहा गया कि आकर अपना बलात्कार करवाओ, तब छोटी बहन को रिहा करेंगे। ‘हार’ मान कर अपनी बहन को बचाने के लिए वो खुद अपना गैंग-रेप करवाने अरबी लड़ाकों के पास गईं।
  • 24 साल की एक महिला का रेप उसके ही घर में किया गया, उसकी माँ से बस कुछ फीट की दूरी पर।
  • 19 साल की एक लड़की के सामने उसकी माँ को गोली मार दी गई। अफरा-तफरी में उसके 5 छोटे भाई-बहन बिछड़ गए। फिर इसके साथ 3 दिनों तक 4 लोगों के द्वारा गैंग-रेप किया गया।
  • अपने-अपने स्कूल/कॉलेज की टॉपर 3 लड़कियों का गैंगरेप सिर्फ इसलिए किया गया क्योंकि ये तीनों अरबी लोगों से अलग मसालित (Masalit) समुदाय से आते हैं।
  • 19 साल की एक लड़की का 4 लोगों ने 3 दिन तक गैंगरेप किया।
  • एक महिला का बलात्कार उसके पूरे परिवार के सामने किया गया।
  • 28 साल की एक मानवाधिकार कार्यकर्ता महिला को उसके घर से उठा लिया गया, घंटों तक उसका गैंगरेप किया गया।
  • एक वीडियो में सैनिक की वर्दी पहने लोग हवा में गोली चला रहे थे, कुछ निगरानी कर रहे और बाकी बचे खुलेआम रेप कर रहे थे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार सूडान की 40 लाख महिलाओं और लड़कियों पर यौन हिंसा और बलात्कार का खतरा है। अरबी प्रभुत्व वाला पैरामिलिट्री समूह और अरबी बंदूकधारी लोग मसालित (Masalit) समुदाय की महिलाओं-लड़कियों को निशाना बना रहे हैं। मसालित समुदाय के लोग सामान्यतः गहरे रंग के होते हैं। इस्लाम में जाति-रंग-लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है, इन वहशी घटनाओं से यह भ्रम भी टूटता है।
रेप के बाद महिलाएँ किस मानसिक तनाव से जीती हैं, वो एक पीड़ित की आपबीती से समझ सकते हैं। उसने अपने मासिक धर्म को लेकर कहा: “रेप के 4 दिन के बाद मुझे पीरियड आए। हर महीने आने वाला पीरियड दर्द के साथ आता था, उस दिन जो पीरियड आया, वो सबसे बड़ी राहत लेकर आया था।”
रेप के कारण गर्भवती होना पीड़ित महिलाओं या लड़कियों के लिए अभिशाप कैसे है, इसे 24 साल की रेप पीड़िता की आपबीती से समझा जा सकता है। इनका गैंग-रेप इनकी माँ के सामने किया गया। फिर मार कर भगा दिया गया। मेडिकल फैसिलिटी के अभाव में इन्होंने 2 महीने गुजार दिए। तब जाकर इनको पता चला कि वो गर्भवती हैं। अब इन्होंने रोते हुए बताया कि ऐसा बच्चा इनको नहीं चाहिए।

जब ‘विदेशियों’ के साथ रेप, तब चुप था समाज

सुडान में जब गृहयुद्ध शुरू हुआ, तो उस समय ‘विदेशी महिला’ के साथ रेप की खबरें सामने आईं। लोगों ने इसको लेकर कानाफूसी की, चटखारे लिए। यह खबर लेकिन न तो मीडिया में उछली, न ही सामाजिक चेतना जगा पाई। क्यों? क्योंकि तब इसी देश के लोग और महिलाएँ आपस में बात कर रहे थे कि रेप या गैंगरेप सूडानी लड़कियों के साथ नहीं हो रहे, वो लोग सुरक्षित हैं।
जल्द ही इन सबका भ्रम टूट गया। सूडानी महिलाएँ, लड़कियों, बच्चियों तक को भी नहीं बख्शा गया। 50 साल से ऊपर तक की महिलाओं को भी शिकार बनाया गया। हिंसा प्रभावित इलाकों से निकल कर महिलाओं के प्रति हिंसा अन्य इलाकों तक में फैल गई।
संयुक्त राष्ट्र के दर्जन भर से ज्यादा एक्सपर्ट सूडान में हो रहे रेप, गैंगरेप को लेकर बड़ी चिंता जता चुके हैं। इस चिंता की कई वजह है। सबसे बड़ी वजह है – सूडान की 97% सुन्नी मुस्लिमों की आबादी। जिनका रेप या गैंगरेप किया जा रहा, वो भी इस्लाम को मानने वाले… जो रेप या गैंगरेप कर रहे, वो सब भी मुस्लिम। मतलब मसला मजहबी नहीं है, बल्कि नस्ली है, समुदाय-संबंधी है। आपसी वर्चस्व की लड़ाई है। यूएन की टीम का मानना है कि यह नस्लीय नरसंहार की ओर जा रहा है।
15 अप्रैल 2023 से सूडान में एक तरह का गृहयुद्ध चल रहा है। 10000 से ज्यादा लोग अब तक मारे जा चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार मौत के भय से 63 लाख लोग अपने-अपने घरों को छोड़ कर भाग गए हैं। महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा, यौन शोषण, बलात्कार, गुलामी, तस्करी, जबरन वेश्यावृत्ति, जबरन शादी आदि की भी कई रिपोर्ट हैं। इनमें से कई मामले नस्लीय, जातीय और राजनीति से प्रेरित भी हैं। संयुक्त राष्ट्र की टीम ने अपील करते हुए कहा: “सूडान में हो रहे अत्याचारों और बड़े पैमाने पर होने वाली यौन हिंसा पर दुनिया को चिंतित होने की जरूरत, न कि आँखें मूंदने की।”
आखिर कौन हैं जो सूडान में लड़ रहे हैं? एक तरफ से लड़ने वाले हैं – सूडान आर्मी चीफ अब्देल फताह अल-बुरहान (Abdel Fattah al-Burhan) के समर्थक और लड़ाके। दूसरी तरफ हैं वहाँ की पैरामिलिट्री रैपिड सपोर्ट फोर्सेज के कमांडर मोहम्मद हमदान दाग्लो के वफादार। मोहम्मद हमदान दाग्लो (Mohamed Hamdan Daglo) कभी आर्मी चीफ अब्देल फताह अल-बुरहान का डेप्यूटी भी रहा था।


चीन में लगे ‘राष्ट्रपति’ के खिलाफ नारे : शी जिनपिंग तानाशाह, उसको पद से हटाओ

                                   चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के विरोध में बैनर (फोटो साभार: इंडिया टुडे)
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) को तीसरे कार्यकाल के लिए चुने जाने से पहले एक शख्स ने राजधानी बीजिंग के एक पुल पर उनके विरोध में पोस्टर लगा दिया। पोस्टर में जिनपिंग की जीरो-कोविड पॉलिसी की आलोचना की गई थी। इसको लेकर अब चीन में और दुनिया भर में विरोध शुरू हो गया है। वहीं, चीन विरोध को दबाने के लिए दुनिया भर के देशों में स्थित अपने दूतावासों में पुलिस थाना और कोर्ट स्थापित कर रहा है। 

16 अक्टूबर को चीन के राष्ट्रपति के रूप में जिनपिंग को तीसरे कार्यकाल के चुना गया था। इसके शुरू होने से पहले 13-14 अक्टूबर को बीजिंग के सिटॉन्ग ब्रिज पर एक बैनर लगाया गया था, जिसमें उन्हें तानाशाह बताते हुए उन्हें राष्ट्रपति पद से हटाने की बात कही गई थी। अब यह बैनर चीन के सोशल मीडिया ग्रुप पर वायरल हो रहा है।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, VoiceofCN नाम से गुमनाम चीनी नागरिकों का एक समूह लोकतंत्र समर्थक इंस्टाग्राम अकाउंट चलाता है। इस ग्रुप ने कहा कि जिनपिंग को हटाने के वाले नारे चीन के कम-से-कम आठ शहरों में सामने आए हैं। इन आठ शहरों में शेन्ज़ेन, शंघाई, बीजिंग, ग्वांगझू के साथ-साथ हॉन्गकॉन्ग भी शामिल है।

दिलचस्प बात यह है कि ये नारे ज्यादातर सार्वजनिक बाथरूम में या स्कूलों के नोटिस बोर्ड पर लिखे देखे गए हैं। ऐसा ही एक नारा बीजिंग में चाइना फिल्म आर्काइव आर्ट सिनेमा के बाथरूम में लिखा मिला। उस पर लिखा था ‘तानाशाही को खारिज करे’।

इसके अलावा, विदेशों में रहने वाले चीनी नागरिक भी इस बैनर को खूब शेयर कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक शी जिनपिंग के खिलाफ ये नारे अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान के 200 से अधिक विश्वविद्यालयों में भी देखे गए। एक अमेरिकी विश्वविद्यालय में हाथ से लिखे नारे में कहा गया ‘हम चीन के लोग बिना किसी सेंसरशिप के अपनी मन की बात कहना चाहते हैं’।

उधर चीन ने लोगों की आवाज दबाने के लिए अपने दूतावासों एवं वाणिज्य दूतावासों में पुलिस चौकी खोला है। इसके साथ ही वहाँ कोर्ट भी संचालित करने का आदेश दिया गया, ताकि सरकार के खिलाफ किसी भी तरह की असहमति को दबाया जा सके।

इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म रिपोर्टिका की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन विदेशी धरती पर चीन की कॉम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की सरकार के खिलाफ आवाज को दबाकर वहाँ की लोकतांत्रिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा है।

जिस दिन जिनपिंग तीसरे कार्यकाल के लिए चुने गए, उसी दिन ब्रिटेन के मैनचेस्टर में हॉन्गकॉन्ग के लोकतंत्र समर्थक एक व्यक्ति को चीनी दूतावास में खींच लिया गया और उसे बुरी तरह पीटा गया। ब्रिटेन की संसद ने इस घटना को बेहद चिंताजनक बताया था। इस मामले को लेकर मैनचेस्टर पुलिस ने जाँच शुरू की है।

कंसुलेट ने अपने बचाव में कहा कि वह शख्स चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के खिलाफ अपमानजनक बैनर लहरा रहा था। बता दें कि बेल्ट एंड रोड इंनीशिएटिव (BRI) के तहत चीन ने कई देशों में लीगल सर्विस या कोर्ट स्थापित किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, यूके, स्पेन और इटली में ये कोर्ट है।

इसके पहले चीन यूक्रेन, फ्रांस, जर्मनी, यूके, स्पेन, कनाडा और आयरलैंड जैसे विकसित देशों सहित विभिन्न देशों में पुलिस स्टेशन खोल चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन स्टेशनों के जरिए चीन उन देशों के चुनावी प्रक्रिया को भी प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।

बांग्लादेश में हिन्दुओं और उनके मंदिरों पर आखिर कब तक हमले होते रहेंगे? क्या वहां की सरकार की इन हमलों पर गंभीर है?

बांग्लादेश में हिंदू मंदिरों में लगाई आग (साभार: इंडिया टुडे)
बांग्लादेश के मगुर जिले के मोहम्मदपुर उपजिला में 400 साल पुराने परुर्कुल अष्टग्राम महा श्मशान (Paruarkul Ashtagram Maha crematorium) और राधा गोबिंद आश्रम में अज्ञात व्यक्तियों द्वारा आग लगाने की घटना सामने आई है। आग से तीन कमरों के हिस्से, रथ और मूर्तियाँ जलकर खाक हो गईं।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश जाने को विरोधियों ने एक तीर से दो निशाने साधने का नाम दिया था, जिसमे दम भी दिखाई पड़ता है। पाकिस्तान हो या बांग्लादेश दोनों ही देशों में हिन्दू अत्यन्त ही दयनीय स्थिति में हैं। मोदी के बांग्लादेश से लौटने के बाद कट्टरपंथी समूह हिफाजत-ए-इस्लाम ने चटगाँव स्थित ब्राम्हनबरिया में हिंसा की थी। हिफाजत समर्थकों ने यहाँ मंदिर में रखी माँ काली और भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियों को तोड़ दिया था। श्री श्री आनंदमयी काली मंदिर कमेटी के अध्यक्ष आशीष पॉल ने बताया कि हम डोल पूर्णिमा के अवसर पर मंदिर में पूजा कर रहे थे। इसी दौरान हिफाजत-ए-इस्लाम के करीब 200 से 300 हथियारबंद लोग मंदिर का गेट तोड़कर अंदर घुस आए। हमने काली माँ की मूर्ति को बचाने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने हमें ढकेलकर काली माँ की मूर्ति को तोड़ दिया।

मोदी की यात्रा के विरोध में कट्टरपंथी इस्लामिक गुटों ने विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ हिंसक झड़प की, जिसमें कम से कम 10 लोगों की मौत हुई। इसके बाद पूर्वी बांग्लादेश में एक ट्रेन को हिफाजत-ए-इस्लाम ने निशाना बनाया था। राजशाही के पश्चिम जिले में दो बसों में आग लगाई। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थरबाजी भी की।

मोहम्मदपुर उपजिला परिषद की पूर्व उपाध्यक्ष और हिंदू-बौद्ध क्रिश्चियन ओइक्या परिषद (Hindu-Buddhist Christian Oikya Parishad) की आयोजन समिति की पूर्व सचिव स्वप्न रानी बिस्वास ने घटना की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कुछ सफाई कर्मचारी गुरुदास मंदिर में आए, जहाँ उन्होंने आग को देखा। बाद में प्रशासन और दमकल को सूचना दी गई। हालाँकि, मोहम्मदपुर से फायर ब्रिगेड के पहुँचने से पहले आग बुझा दी गई।

इस बीच मोहम्मदपुर उपजिला निरभाही अधिकारी रामानंद पाल, सहायक आयुक्त भूमि हरकृष्ण अधिकारी, मोहम्मदपुर पुलिस स्टेशन के ओसी तारक नाथ विश्वास और स्थानीय बाबूखाली संघ के अध्यक्ष मीर शहजाद अली घटना की जानकारी होते ही मौके पर पहुँचे। बाद में मगुरा के डिप्टी कमिश्नर अशरफुल आलम और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जहीरुल इस्लाम सहित वरिष्ठ प्रशासन के अधिकारी भी घटनास्थल पर गए।

स्वप्न रानी ने घटना को सांप्रदायिक झड़पों को उकसाने और राजनीतिक अशांति पैदा करने वाला करार दिया। वहीं सहायक आयुक्त भूमि हरकृष्ण अधिकारी ने बताया कि घटना में आश्रम के दो कमरे क्षतिग्रस्त हुए हैं। मूर्ति भी टूटी हैं। आग लगने से रथ भी जल गए हैं। उन्होंने कहा कि जाँच के बाद ही घटना के लेकर यकीनी तौर पर कुछ कहा जा सकता है।

 पुलिस अधिकारी जहीरुल इस्लाम ने घटनास्थल का मुआयना करने के बाद आश्वासन दिलाया कि तोड़फोड़ के सबूत मिलने के बाद आरोपितों के विरुद्ध सख्त से सख्त कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक सौहार्द वाले जिले मगुरा में किसी भी सांप्रदायिक ताकत को बख्शा नहीं जाएगा।