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मोदी के दौरों पर जुबान खोलने से पहले ‘विचार’ करना सीखो, भगवंत मान ‘साहब’, विदेश नीति कॉमेडी का मंच नहीं ये बेहद गंभीर विषय: MEA ने भी दिखाया आईना; केजरीवाल की तरह उल्टा-पुल्टा बोलना छोड़ो

   मोदी के विदेश दौरे पर सीएम मान का शर्मनाक बयान ( फोटो साभार- X@narendramodi, @bhagwantmaan)
ये INDI गठबंधन को क्या हो गया है? क्या इसका मानसिक संतुलन ठीक है? इन अक्ल से पैदल लोगों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और संघ का जितना अपमान करना करो, जी-भरकर गालियां दो, लेकिन सोरोस के टुकड़ों पर पलने वाले देश का ही अपमान कर रहे हैं। जितना अधिक भारत के विरुद्ध बोलेंगे उससे ज्यादा इनको नुकसान होगा, फिर चीखेंगे EVM ठीक नहीं, 5 बजे के बाद इतने वोट कैसे डाले गए आदि। अपनी हरकतें तो देखो। मुस्लिम कट्टरपंथी और कालनेमि बने हिन्दू जरूर वोट देंगे लेकिन देश से लेशमात्र भी सेवा भाव रखने वाला चाहे वह किसी जाति धर्म या मजहब से क्यों न हो बीजेपी को वोट देगा तुम्हारे जैसे पाखंडियों को नहीं। विदेश नीति का मजाक बनाते शर्म नहीं।            

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर बेहद शर्मनाक बयान दिया है। ये बयान पीएम मोदी से ज्यादा देश की विदेश नीति पर है इसलिए विदेश मंत्रालय को भी इस पर संज्ञान लेना पड़ा है। विदेश मंत्रालय ने मान की टिप्पणी को गैर जिम्मेदाराना करार देते हुए कड़ी निंदा की है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “एक प्रदेश के मुख्यमंत्री का भारत के मित्र देशों के साथ भारत के संबंधों के बारे में की गई टिप्पणियाँ निराशाजनक और गैर जिम्मेदाराना है, ऐसे बयान किसी प्रदेश के मुखिया को शोभा नहीं देती। भारत सरकार ऐसे अनुचित बयानबाजी से खुद को अलग करती है।”

भगवंत मान ने कहा था, “पीएम कहाँ गए हैं? मुझे लगता है कि वह घाना गए हैं। वह वापस आएँगे, उनका स्वागत है। भगवान ही जानें वह किन-किन देशों में जाते रहते हैं, मैग्नेशिया, गैल्विसा, टार्विसिया। 140 करोड़ वाले देश के नेता वहाँ जा रहे हैं जहाँ 10 हजार लोग रहते हैं और वहाँ सर्वोच्च सम्मान पाते हैं। हमारे यहाँ तो 10 हजार लोग जेसीबी देखने इकट्ठा हो जाते हैं।”

भगवंत मान के बयान के बाद विदेश नीति के बारे थोड़ी समझ रखने वाला व्यक्ति भी आश्चर्यचकित रह गया है। क्योंकि अपने बयान से मान ने अपनी ‘समझ’ की पोल खोल दी है। राजनीति में आलोचना विपक्ष करता ही रहता है। लेकिन जब ये टिप्पणी देश की कूटनीति और प्रधानमंत्री के विदेशी यात्राओं से जुड़ी हो, तो ये राजनीति अंदरुनी नहीं आत्मघाती हो जाती है।

मोदी का दौरा वैश्विक स्थिति, रणनीतिक भागीदार, निवेश की संभावनाओं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसी तमाम पहलुओं से जुड़ी होती है। ये भारत के विदेश नीति का चेहरा बनती हैं और इसके दम पर देश की आन बान और शान की रक्षा होती है।

UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए भारत का समर्थन

भारत यूएनएससी में स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार है। पीएम मोदी के दौरे के दौरान सभी 5 देशों ने भारत की दावेदारी का समर्थन किया है। इसका काफी महत्व है। ब्राजील में हुई ब्रिक्स सम्मेलन में भी इस मुद्दे पर भारत को बड़ी सफलता मिली और सदस्य देशों ने यूएनएससी के विस्तार और भारत की दावेदारी का समर्थन किया। इससे पहले कई देशों ने भी यूएनएससी विस्तार का समर्थन किया।

पीएम मोदी ने हाल में जिन 5 देशों की यात्राएँ की हैं। उनमें दो दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील, अर्जेंटीना है वहीं तीन अफ्रीकी देश त्रिनिदाद एंड टोबैगो, नामीबिया और घाना है। इन पाँच देशों में से 4 देशों ने पीएम मोदी को अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा।

पीएम मोदी को मिल चुके हैं 27 देशों के सर्वोच्च सम्मान

अफ्रीकन देश घाना में ‘ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ घाना’ और त्रिनिदाद और टोबैगो में ‘ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद एंड टोबैगो’ से सम्मानित किया गया, जहाँ उन्होंने उनकी संसद को संबोधित किया। वे 20 से अधिक वर्षों में इन कैरेबियाई राष्ट्र की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। ये छोटे- छोटे देश ग्लोबल साउथ की रीढ़ हैं। भारत लगातार ग्लोबल साउथ के साथ संबंध मजबूत कर रहा है और इंटरनेशनल मंचों पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है।

पीएम मोदी को अब तक 27 देशों ने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा है। सिर्फ 2025 में ही अब तक पीएम मोदी को 7 देशों ने सम्मानित किया। 27 देशों में से 8 मुस्लिम देश हैं।

आर्थिक मोर्चे पर चीन से टक्कर के लिए जरूरी

पाँच देशों की यात्रा का महत्व आर्थिक दृष्टि से भी काफी अहम है। घाना, नामीबिया, त्रिनिदाद और टोबैगो, अर्जेंटीना और ब्राज़ील की यात्रा ने दुनिया का ध्यान खींचा। चीन से मुकाबला करने के एक रणनीतिक विकल्प, आतंकवाद के खिलाफ एक ज़िम्मेदार आवाज और ग्लोबल साउथ के एक विकास साझेदार के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत करना था।

नामीबिया के खनिज में भारत का निवेश

प्रधानमंत्री मोदी की सबसे हालिया यात्रा नामीबिया की थी। वह लगभग 30 वर्षों में वहाँ जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे। गौरतलब है कि भारत लाए गए आठ चीते नामीबिया के रेगिस्तान से आए थे। नामीबिया अफ्रीका में एक स्थिर लोकतंत्र है जहाँ प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। रेयर मिनर्ल्स, खनिज, यूरेनियम, कोबाल्ट, लिथियम और समुद्री हीरे शामिल हैं, और ये सभी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए खनन उद्योग में भारतीय कंपनियों ने यहाँ पहले ही 80 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। नामीबिया भारत की महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति करने में अहम भूमिका निभा सकता है, जिससे चीन पर भारत की निर्भरता कम होगी।

प्रधानमंत्री मोदी की घाना यात्रा पिछले 30 साल में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। साझा लोकतांत्रिक सिद्धांत और आतंकवाद की दोनों देशों को चिंता है। अफ्रीका में सोने का सबसे बड़ा उत्पादक देश घाना है जहाँ लिथियम का भी भंडार है। ऐसे में भारत की इलेक्ट्रिक वाहन की जरूरत यहाँ से पूरी हो सकती है। चीन ने हाल ही में इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है।

यूपीआई, रक्षा सहयोग, एआई में भारत करेगा मदद

भारत के यूपीआई को ये देश अपनाने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा भारत ने साइबर सुरक्षा सहायता, प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग की दिशा में अहम भागीदार साबित होगा।
प्रधानमंत्री मोदी की त्रिनिदाद और टोबैगो यात्रा में इतिहास याद आ गई जब गिरमिटिया के रूप भारतीय इस देश का विकास करने गए थे। यही वजह है कि बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय अभी यहाँ रहते हैं।
इस यात्रा से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक संबंधों को मजबूती मिली। त्रिनिदाद कैरेबियाई क्षेत्र में UPI लागू करने वाला पहला देश बन गया।

अर्जेंटीना के ऊर्जा से भारत की जरूरत होगी पूरी

अर्जेंटीना की यात्रा का समय इससे बेहतर नहीं हो सकता था। भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता के साथ-साथ सतत ऊर्जा की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव कर रहा है और यह दक्षिण अमेरिकी देश तांबा और लिथियम जैसे जरूरी खनिजों के लिए मशहूर है। दुनिया में दूसरे सबसे बड़े शेल गैस और चौथे सबसे बड़े शेल तेल भंडारों वाला अर्जेंटीना ऊर्जा के क्षेत्र में भारत का अहम साझीदार बन सकता है।
महत्वपूर्ण खनिज, यूपीआई का इस्तेमाल, रक्षा सहयोग और आतंकवाद विरोध, फार्मास्यूटिकल्स और प्रवासी भारतीयों से संपर्क, प्रधानमंत्री मोदी के दोनों महाद्वीपों के दौरे के प्रमुख विषय रहे। इस दौरान मिले राजकीय सम्मान ने वैश्विक मंच पर भारत को एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में पेश किया।

मान जी बोलें, लेकिन जरा जुबान संभाल के

प्रधानमंत्री मोदी का राजनयिक दौरा निश्चित रूप से देश को हर मोर्च में मजबूत बनाने वाला रहा। फिर भी, मान की कूटनीतिक नासमझी इसे पहचानने में विफल रही। आम आदमी पार्टी वैसे भी विदेश नीति के मामले में सिफर मानी जाती है। मान ने अपने बयान से इसे सच साबित कर दिया।
अरे भाई…राजनीति करो, लेकिन देश की कूटनीति पर हमला मत करो। तुम जैसे लोग सिर्फ वोट के लिए कुछ भी बोलते हो, लेकिन समझो कि पीएम के दौरे भारत को मजबूत बनाते हैं। अगली बार मुँह खोलने से पहले विदेश नीति पढ़ लो, समझ लो या फिर चुप ही रहो। ऐसे में पंजाब को संभालो, जहाँ किसान परेशान हैं, नशा फैला है, हर तरफ बर्बादी है। क्योंकि वैश्विक कूटनीति तुम्हारे बस की नहीं।

ब्राजील ने पकड़ी भारत की राह, चीन के BRI में शामिल होने से किया मना: जिनपिंग को बड़ा झटका

 ब्राजील ने चीन के BRI में शामिल होने से मना कर दिया है (चित्र साभार: The Telegraph & Narendra Modi/X)
विश्व की सबसे अर्थव्यवस्थाओं में से एक ब्राजील ने चीन को करारा झटका दिया है। ब्राजील ने चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) में ना शामिल होने का फैसला लिया है। ब्राजील के इस फैसले से भारत को और मजबूती मिली है। ब्राजील ने यह फैसला चीन राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यात्रा से ठीक पहले लिया है। ब्राजील का कहना है कि वह BRI में ना रह कर भी चीन के साथ सहयोग करेगा और विकास को आगे बढ़ाने के लिए काम करेगा। 

क्या है ब्राजील का फैसला?

ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा के एक विशेष सलाहकार सेल्सो अमोरिम ने सोमवार (28 अक्टूबर, 2024) को मीडिया से बताया कि ब्राजील आधिकारिक तौर पर BRI में शामिल नहीं होगा। उन्होंने कहा है कि ब्राजील इसके बजाय चीन के साथ दूसरे तरीकों से सहयोग करेगा।

ब्राजील ने कहा कि वह चीन के साथ काम करने को तैयार है लेकिन कोई संधि समझौते पर दस्तखत नहीं करेगा। अमोरिम ने कहा कि “चीन इसे बेल्ट एंड रोड का नाम देता है…वह जो भी नाम देना चाहते हैं दे सकते हैं। लेकिन जो बात मायने रखती है वह यह है कि इसमें ऐसे प्रोजेक्ट हैं जिन्हें ब्राजील ने प्राथमिकता समझता है लेकिन चीन इन्हें ऐसा समझ भी सकता है या नहीं भी।”

ब्राजील के कुछ बड़े राजनेता हाल ही में चीन गए भी थे जहाँ वह BRI को लेकर उत्साहित नहीं हुए और उनके वापस आने के बाद ब्राजील का यह फैसला सामने आया है। ब्राजील चाहता है कि उसे सारे प्रोजेक्ट का फायदा भी मिले लेकिन कोई डील ना करनी पड़े।

इस फैसले से ब्राजील को करारा झटका लगा है। चीन की आशा थी कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नवम्बर में होने वाली ब्राजील यात्रा में BRI पर सहमति बन जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चीन को अब ब्राजील से फायदा लेने के नए रास्ते खोजने होंगे। 

क्यों BRI में शामिल नहीं हुआ ब्राजील?

ब्राजील का BRI में शामिल ना होने का फैसला काफी सोच समझ कर लिया गया लगता है। ब्राजील, दक्षिणी अमेरिका का सबसे बड़ा देश और उसके अमेरिका के साथ अच्छे संबंध रहे हैं। वह चीन के साथ कोई आधिकारिक समझौता करके अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहता।
इसके अलावा ब्राजील खुद को महाशक्ति बनाने का विजन रखता है, ऐसे में चीन के झंडे तले चलना भी उसे रास नहीं आने वाला। वहीं चीन के BRI की भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई अच्छी छवि नहीं रही है। BRI को लेकर चीन पर लगातार कई आरोप लगते रहे हैं।
चीन पर आरोप है कि वह BRI में शामिल देशों को फालतू के प्रोजेक्ट के लिए कर्जे देता है और फिर जब यह देश कर्ज नहीं चुका पाते तो उन प्रोजेक्ट पर अधिकार जमा लेता है। इसका सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह है, जिसे चीन ने 99 साल की लीज पर लिया है। कर्ज के ब्याज को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं।
BRI को चीन जहाँ दुनिया जोड़ने का प्रोजेक्ट बताता है, वहीं रक्षा विशेषज्ञ इसमें छुपी सैन्य रणनीतियों पर भी प्रकाश डालते रहे हैं। कई देश यह भी कह चुके हैं कि आर्थिक विकास के बाहने चीन दुनिया भर में अपने सैन्य ठिकाने बना रहा है।
ब्राजील से अमेरिका BRI में शामिल होने को लेकर विचार करने को लेकर कहता रहा है। ब्राजील के अमेरिका साथ संबंध, चीन की विस्तारवादी छवि, कर्ज के जाल का डर और स्थानीय समस्याओं को ब्राजील के फैसले के पीछे के बड़े कारण माना जा सकता है।

भारत को क्या फायदा?

ब्राजील के इस कदम से भारत को भी फायदा होगा। अभी तक BRICS में भारत अकेला ऐसा देश था जिसने BRI के लिए हामी नहीं भरी थी। अब BRICS के दो संस्थापक सदस्य ही इसके खिलाफ होंगे। इससे BRICS में भारत का पक्ष और मजबूत होगा।
भारत, चीन इस प्रोजेक्ट का विरोध मूल रूप से इस लिए करता है क्योंकि इसका एक हिस्सा अक्साई चिन और POK से निकलता है। भारत लगातार कहता है कि चीन ने यहाँ BRI प्रोजेक्ट बना कर भारत की संप्रभुता में दखल दिया है। इसके अलावा भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, चीन का विस्तारवादी रवैया और उसके कर्जे के जरिए फंसाने वाली नीति से भी भारत असहमत है।
चीन BRI के जरिए अफ्रीका और एशिया के देशों में प्रभाव बढ़ा रहा है। भारत भी इन देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने को लेकर काम करता रहा है। ऐसे में दोनों के आपसी हित भी टकराते हैं। ब्राजील का BRI के अंतर्गत ना जाना भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ताकत देगा।

क्या है BRI?

BRI, चीन की एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य चीन को पूरी दुनिया से अलग-अलग माध्यमों से जोड़ना है। यह विश्व की अब तक की सबसे महँगी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना है। इस परियोजना में अब तक 1 ट्रिलियन से अधिक का निवेश हो चुका है।
BRI के अंतर्गत चीन सड़क, रेल और समुद्र के जरिए पूरे विश्व को जोड़ना चाहता है, जिससे उसे खुद का व्यापार करने में आसानी हो। BRI का इतिहास चीन ‘रेशम मार्ग’ में बताता है जो कई सदियों पहले यूरोप और एशिया के बीच व्यापार का प्रमुख रूट था।
चीन इस परियोजना के अंतर्गत श्रीलंका, पाकिस्तान, कजाख्स्तान, समेत विश्व के 100 से अधिक देशों में बंदरगाह, रेल लाइन और एयरपोर्ट आदि का निर्माण कर रहा है। पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह इसी का एक उदाहरण है। इस परियोजना में एशिया,यूरोप समेत दक्षिणी अमेरिका के कई देश शामिल हैं।
यह परियोजना चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का एक ड्रीम प्रोजेक्ट है। चीन की यह परियोजना बीते कुछ सालों में संकट में भी फंसी है। सदस्य देशों पर बढ़ते कर्ज और निवेश से पैसा वापस ना आना लगातार चिंताएँ भी बढ़ा रहा है। ऐसे में कई देश इससे हाथ पीछे खींच रहे हैं।


अमेरिका, नाटो और EU के रूस को अलग थलग करने की साजिश का हिस्सा नहीं बने मोदी; रूस के एक सच्चे मित्र का कर्तव्य निभाया भारत ने

 सुभाष चन्द्र

स्विट्ज़रलैंड द्वारा अपने शहर बर्गेन्स्टाक में यूक्रेन में शांति स्थापना के लिए आयोजित शिखर सम्मेलन में NATO और EU समेत 80 देशों ने भाग लिया। लेकिन जो प्रताव यूक्रेन में शांति स्थापना के लिया लाया गया, उस पर भारत ने हस्ताक्षर करने से साफ़ मना कर दिया। इस सम्मेलन में रूस को निमंत्रण नहीं दिया गया और चीन ने इससे दूरी बनाई थी। 

दो दिनों की चर्चा के बाद शांति स्थापना के प्रस्ताव के अंतिम दस्तावेज़ में जो कुछ भी कहा गया उसमें क्षेत्रीय अखंडता के साथ ही (यूक्रेन की अखंडता) परमाणु सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और बन्दियों की अदलाबदली वाले बिंदु भी थे। ऐसा भी कहा गया है कि रूस को अपनी सेनाएं वापस ले जाने को कहा गया शिखर सम्मेलन में। अमेरिका और EU ने ऐसा जाल बिछाया था जिससे रूस पर स्वतः ही ऐसे प्रतिबंध लग जाएं जिससे उसका जीना ही कठिन हो जाए। ये 80 देश रूस से सभी संबंध विच्छेद करके उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग करना चाहते थे।

लेखक 
चर्चित YouTuber 
लेकिन सही समय पर भारत ने शांति स्थापना के दस्तावेज में कुछ बिंदुओं को अस्पष्ट और गैर जरूरी कहते हुए पर हस्ताक्षर करने से मना करके रूस के प्रति अपनी सच्ची मित्रता निभाने का काम किया। भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “हम शांति स्थापना के विरुद्ध नहीं हैं और न ही युद्ध को आगे चलता देखना चाहते हैं लेकिन यह प्रस्ताव एक पक्षीय लगता है क्योंकि रूस को इस सम्मेलन में अपनी बात रखने के लिए अवसर ही नहीं दिया गया। भारत के साथ ही सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, मैक्सिको, यूएई सहित 12 देशों ने भी हस्ताक्षर करने से मना कर दिया - पर्यवेक्षक के रूम में भाग लेने वाले ब्राजील ने भी हस्ताक्षर नहीं किए। 

भारत ने कहा - “भारत चाहता है कि किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले रूस और यूक्रेन का एक साथ एक मंच पर होना जरूरी है ताकि दुनिया दोनों देशों की बात सुनकर अपनी राय या सहमति बनाए। रिपोर्ट की मानें तो रूस को इस समिट में नहीं बुलाया गया। यूक्रेन में शांति के लिए रखी गई शर्त पर भारत सहमत नहीं है”।

चार दिन पहले ही इटली में प्रधानमंत्री मोदी से यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की  भेंट करके बहुत प्रसन्न थे और उसे आशा रही होगी कि भारत स्विट्ज़रलैंड में उसका साथ देगा लेकिन हुआ इसके विपरीत। सभी देशों को मोदी सरकार ने खुला संदेश दे दिया कि रूस को एकतरफा फैसला करके उसे बर्बाद नहीं किया जा सकता।

भारत विश्व के देशों को यह सख्त संदेश देने में इसलिए भी सक्षम है क्योंकि भारत एक बहुत बड़ा वैश्विक बाजार है और किसी भी देश के लिए भारत की अनदेखी करना संभव नहीं है और यही सफल विदेश नीति है और कूटनीति भी।

ब्राजील : मात्र 1.8% वोट के अंतर से 82825000 रूपए घूस लेने का आरोपी बना राष्ट्रपति

                लूला डी सिल्वा की रैलियों में भारी भीड़ उमड़ रही थी, अब तीसरी बार बने ब्राजील के राष्ट्रपति 
ब्राजील में हुए राष्ट्रपति चुनाव में दो बार राष्ट्रपति रह चुके लूला डी सिल्वा (Lula da Silva) ने जीत हासिल की है। उन्होंने मौजूदा राष्ट्रपति बोल्सोनारो को बेहद कड़े और करीबी मुकाबले में हराया है। राष्ट्रपति चुनाव में जहाँ बोल्सोनारो को 49.1% वोट मिले। वहीं, लूला डी सिल्वा को 50.9% वोट मिले हैं। वह, 1 जनवरी 2023 को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे। लूला डी सिल्वा की जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दुनिया भर के कई नेताओं ने उन्हें बधाई दी है।

लूला डी सिल्वा का राष्ट्रपति बनना न केवल ब्राजील के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के नजरिए से बहुत बड़ा उलटफेर माना जा रहा है। दरअसल, लूला डी सिल्वा पर साल 2018 में सरकारी तेल कंपनी पेट्रोब्रास के लिए भ्रष्टाचार और मनी लांड्रिंग का आरोप लगाया गया था। साथ ही, यह भी कहा गया था कि उन्होंने समुद्र तट पर अपार्टमेंट लेने के लिए 1 मिलियन डॉलर, यानी करीब 82825000 रुपए की घूस ली है।

जिसके बाद अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए करीब 10 साल की सजा सुनाई थी। साथ ही, उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई थी। इसके बाद वह साल 2018 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में भी भाग नहीं ले सके थे। हालाँकि, इसके बाद साल 2021 में वहाँ की सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि पीठासीन अदालत के जज ने पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाते हुए उन्हें दोषी ठहराया था।

लूला के राजनीतिक करियर की शुरुआत ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष बनने से हुई। इस दौरान उन्होंने 1970 के दशक में सैन्य तानाशाही के विरुद्ध की गई हड़तालों और आंदोलनों का नेतृत्व किया। इसी दौरान लूला डी सिल्वा की राजनीतिक इच्छा प्रबल हो गई थी। वह साल 1980 में बनी वर्कर्स पार्टी के संस्थापक भी सदस्य हैं। उन्होंने पहली बार 1982 में साओ पाउलो के राज्य इलेक्शन में भाग लिया था, लेकिन चुनाव हार गए थे। इसके बाद उन्होंने साल 1986 के चुनावों में सबसे अधिक वोटों के साथ कॉन्ग्रेस (ब्राजील की संसद) में सीट हासिल की थी। 

इस पार्टी से ही लूला ने 1989 से लेकर 1998 तक तीन बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ा। लगातार 3 हार के बाद अंततः साल 2002 में उन्हें सफलता मिली और वह ब्राजील के 35वें राष्ट्रपति बने। इसके बाद, 2006 में हुए चुनावों में भी उन्हें जीत मिली। इस तरह से वह लगातार दो बार ब्राजील के राष्ट्रपति रहे। इस बार यह उनका छठवाँ राष्ट्रपति चुनाव था। वह ब्राजील के 39वें राष्ट्रपति होंगे।

जुड़वा बच्चे, दोनों के पिता अलग-अलग


प्रतीकात्मक फोटो साभार: डेली मेल
ब्राजील की एक महिला के साथ हैरान कर देने वाला वाकया हुआ है। जुड़वा बच्चों को जन्म देने वाली 19 वर्षीय महिला का दावा कि उसके दोनों बच्चों के दो अलग-अलग पिता हैं। ‘
ग्लोबो’ की रिपोर्ट के मुताबिक, गोआस (Goias) के मिनेरियोस (Minerios) की रहने वाली अज्ञात महिला ने एक ही दिन में दो पुरुषों के साथ सेक्स किया और नौ महीने बाद उसने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। महिला को अपने जुड़वा बच्चों के पिता को लेकर संदेह हुआ, तो उसने इसकी पुष्टि के लिए डीएनए टेस्ट कराया।

महिला उस वक्त दंग रह गई, जिस वक्त DNA टेस्ट की रिपोर्ट आई, क्योंकि यह रिपोर्ट चौंकाने वाली थी। वह जिसे अपने बच्चों का पिता मान रही थी, उस व्यक्ति का डीएनए केवल एक बच्चे के साथ ही मैच हुआ। यानी, वह शख्स केवल एक ही बच्चे का पिता निकला। महिला ने बताया कि दो अलग-अलग पुरुषों द्वारा गर्भधारण करने के बावजूद दोनों बच्चे काफी हद तक एक जैसे दिखते हैं।

महिला ने दूसरे पुरुष को भी DNA टेस्ट के लिए बुलाया, जिसके साथ उसने सेक्स किया था। दूसरे बच्चे से उसका डीएनए मैच हो गया। महिला ने बताया कि वह इन परिणामों से बेहद हैरान थी, क्योंकि उसे नहीं पता था कि ऐसा भी हो सकता है। दो अलग-अलग पिता के बच्चे एक जैसे दिख सकते हैं।

यह एक दुर्लभ स्थिति है, लेकिन पूरी तरह से असंभव नहीं है। इसमें जुड़वा बच्चों में अलग-अलग पिता का DNA पाया जाता है। विज्ञान की भाषा में इसे ‘हेट्रोपैरेंटल सुपरफेक्यूंडेशन (Heteroparental Superfecundation)’ नाम दिया गया है। डॉक्टर टुलियो जॉर्ज फ्रेंको के मुताबिक, दस लाख में से किसी एक मामले में हेट्रोपैरेंटल सुपरफेक्यूंडेशन की स्थिति बनती है। उस वक्त माँ के शरीर में मौजूद अंडे दो अलग-अलग पुरुषों के जरिए फर्टिलाइज हो जाते हैं।

वहीं, महिला ने भी यह बात स्वीकार की है कि उसने दो अलग-अलग पुरुष के साथ सम्बंध बनाए थे। यही बच्चों में अलग-अलग डीएनए की वजह बने हैं।