तुर्की ने दो दिन पहले इज़रायल को धमकी दी है कि वह फिलिस्तीन के समर्थन में इजराइल में घुस कर हमला करेगा जैसे वह लीबिया और Nagorno-Karabakh में घुसा
था। इस पर इजराइल के विदेश मंत्री Israel Katz ने अपने सभी diplomats को निर्देश दिया है कि वे NATO सदस्यों से तुर्की की निंदा करने को कहें और तुर्की को NATO से बाहर करने की मांग की है।
अब सवाल यह पैदा होता है कि आखिर तुर्की का NATO में रहने का क्या औचित्य है जब अमेरिका और यूरोप के अधिकांश देश हमास के मामले में इजराइल के साथ खड़े हैं। तुर्की को 1951 में NATO में शामिल किया गया उसकी ही मांग पर। तुर्की ने सोवियत संघ से मिलिट्री टकराव में बचाव के लिए NATO से सुरक्षा की गारंटी मांगी थी और तब मई, 1951 में CIA और US Military के गहन विचार के बाद तुर्की को NATO में शामिल किया गया था।
अब सोवियत संघ 25 दिसंबर 1991 में ख़त्म होने के बाद तुर्की का NATO में शामिल होने का कारण समाप्त हो गया क्योंकि सोविएत संघ के बाद उसमे से निकले सबसे देश रूस के साथ तुर्की के गहरे संबंध हैं और तुर्की के विकास के लिए रूस और तुर्की के बीच समझौते भी हो रखे हैं और रूस अमेरिका का दुश्मन देश है।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
NATO का article 5 कहता है कि किसी सदस्य देश पर आक्रमण सभी सदस्यों पर आक्रमण समझा जाएगा और सभी NATO देश पीड़ित देश का साथ देंगे। लेकिन जहां तक मैंने पढ़ा है NATO का कोई Article यह नहीं कहता कि यदि कोई सदस्य देश किसी अन्य सदस्य देश या किसी और गैर NATO देश पर हमला करता है तो भी सभी NATO सदस्य देश उसका साथ देने के लिए बाध्य होंगे।
तुर्की का ईरान के साथ भी कोई सौहार्दपूर्ण संबंध नहीं है बल्कि इस्लामिक देशों पर अपना प्रभुत्व कायम करने का Proxy Conflict है और शायद इसलिए तुर्की अब इजराइल से पंगा लेना चाहता है क्योंकि ईरान के पोषित हमास के अलावा हिज़्बुल्लाह और हूतियों को भी इज़राइल ने ठोका है और तुर्की इस बहाने ईरान का वर्चस्व इस युद्ध में ख़त्म करना चाहता है। ईरान अमेरिका से सीधा टकराव से बचता है और तुर्की तो अमेरिका से उलझने की हिम्मत ही नहीं कर सकता।
तुर्की इजरायल पर पहले हमला करने की धमकी दे रहा है और NATO के Article 5 को ध्यान में रख ही इजरायल तुर्की पर Self Defence में भी पहले हमला नहीं करेगा, हालांकि मुझे शंका है कि तुर्की। इज़रायल संभावित युद्ध में NATO देश तुर्की का साथ देंगे और NATO में विभाजन हो सकता है।
तुर्की भी इज़रायल में सोच समझ कर घुसेगा क्योंकि इजराइल को अमेरिकी कानून के अनुसार अमेरिका का प्रमुख गैर NATO मित्र का दर्जा दिया गया है। इसके अनुसार इजराइल जैसे मित्र देश defence और security cooperation के लिए विशेष लाभ के अधिकारी हैं। इसलिए तुर्की ने यदि इजराइल में घुसने की कोशिश की तो बुरी बीतेंगी और यह कदम उसके लिए ट्रंप के आने के बाद तो बहुत भारी पड़ेगा। अबकी बार ट्रंप के कार्यकाल में तुर्की NATO से बाहर हो सकता है और पूरा इस्लामिक विश्व पर खतरा पैदा होगा।


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