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इराक क्यों ले जाया जा रहा है ईरान के अयातुल्लाह खामेनेई का जनाजा?

अयातुल्लाह खामेनेई को कई महीनों बाद किया जा रहा है सुपुर्द-ए-खाक (फोटो साभार: X/Government of Islamic Republic of Iran)
लंबे इंतजार के बाद ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा है। अब यह जनाजा सिर्फ एक मजहबी रस्म नहीं है बल्कि यह ईरान के साथ-साथ इराक, शिया राजनीति और पश्चिम एशिया की बदलती ताकतों से जुड़ा बड़ा संदेश भी बनने जा रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका जनाजा तेहरान और कोम से होते हुए 8 जुलाई को इराक के नजफ और करबला ले जाया जाएगा फिर ईरान के मशहद में गुरुवार (9 जुलाई 2026) को दफनाया जाएगा। इस जनाजे को इराक ले जाने के पीछे कई वजह हैं जिन्हें इस लेख में खोजने की कोशिश करेंगे।

नजफ और करबला की मजहबी अहमियत

शिया मुसलमानों के लिए इराक के नजफ और करबला शहर बेहद मुकद्दस माने जाते हैं। नजफ में हजरत अली की दरगाह है, जिन्हें शिया मुसलमान पहला इमाम मानते हैं। करबला में इमाम हुसैन और हजरत अब्बास की दरगाहें हैं। करबला की घटना शिया इतिहास में सब्र, कुर्बानी और जुल्म के खिलाफ खड़े होने की सबसे बड़ी निशानी मानी जाती है।

इसी वजह से खामेनेई का जनाजा इन शहरों में ले जाना उनके समर्थकों के लिए सिर्फ रस्म नहीं है बल्कि यह उन्हें अहले-बैत की विरासत और शहादत की परंपरा से जोड़ने की कोशिश है। ईरान में खामेनेई को लंबे समय तक इस्लामी क्रांति, शिया नेतृत्व और अमेरिका-इजरायल विरोधी रुख के चेहरे के रूप में देखा गया। अब उनके जनाजे को नजफ और करबला ले जाकर यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि उनका रिश्ता सिर्फ ईरानी सत्ता से नहीं बल्कि पूरी शिया उम्मत की मजहबी भावना से था।

खामेनेई के जनाजे को इन मुकद्दस शहरों में ले जाने का मतलब है कि ईरान उन्हें शिया इतिहास की उसी बड़ी कहानी में रखना चाहता है, जिसमें जुल्म के खिलाफ खड़े होने, बाहरी दबाव का मुकाबला करने और मजहबी पहचान बचाने की बात की जाती है। यही वजह है कि उनके समर्थक इस अंतिम यात्रा को सिर्फ एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि मुकद्दस सफर के रूप में पेश कर रहे हैं।

अंतिम यात्रा के जरिए ईरान का ‘ताकत’ का संदेश

खामेनेई के जनाजे को इराक ले जाना इसी संदेश का हिस्सा है। ईरान दिखाना चाहता है कि उसके सबसे बड़े नेता की मौत के बाद भी उसका असर खत्म नहीं हुआ है। जनाजा जब ईरान की सीमा से बाहर निकलकर इराक के मुकद्दस शहरों तक जाएगा, तो यह एक तरह से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव का प्रदर्शन भी होगा। संदेश साफ है कि खामेनेई का असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं था बल्कि नजफ, करबला और उन शिया समूहों तक भी था जो ईरान को अपना राजनीतिक और धार्मिक सहारा मानते हैं।

इराक के लिए यह जनाजा अकीदत भी है और सियासी इम्तिहान भी

इराक के लिए यह मामला बहुत संवेदनशील है। एक तरफ इराक में बड़ी शिया आबादी है, जिसके लिए नजफ और करबला में किसी बड़े शिया नेता के जनाजे का आना अकीदत का मामला है। दूसरी तरफ इराक एक स्वतंत्र देश है, जिसे अपने रिश्ते ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संभालने हैं। यह पूरा कार्यक्रम इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की संभावित अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हो रहा है। इसी वजह से इसे और अधिक राजनीतिक माना जा रहा है।

इराकी सरकार नहीं चाहती कि दुनिया को यह संदेश जाए कि बगदाद पूरी तरह तेहरान के प्रभाव में है। खासकर ऐसे समय में जब इराक अमेरिका से भी आर्थिक, सुरक्षा और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है। अगर इराक सरकार जनाजे में ज्यादा सक्रिय दिखती है तो अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह संकेत मिल सकता है कि इराक अब भी ईरान की लाइन पर चल रहा है। अगर सरकार दूरी बनाती है तो ईरान समर्थक शिया गुट नाराज हो सकते हैं।

यही वजह है कि खामेनेई का जनाजा इराकी सरकार के लिए एक तरह का सियासी इम्तिहान बन गया है। उसे धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी करना है और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि भी बचानी है।

इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMU) और शिया कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क से जुड़े गुट इस जनाजे को इराक में आयोजित कराने के पक्ष में हैं। ईरानी पक्ष का दावा है कि इराकी नेताओं और समूहों ने यह अनुरोध किया था। वहीं, कुछ इराकी सूत्रों के मुताबिक यह माँग सीधे सरकार से नहीं बल्कि शिया राजनीतिक गुटों से आई। इसका मतलब यह है कि इराक के भीतर भी इस आयोजन को लेकर एकराय नहीं है।

सुलेमानी, रईसी और अब खामेनेई

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कासिम सुलेमानी का जनाजा ईरान की सैन्य और क्षेत्रीय ताकत का प्रतीक था। इब्राहिम रईसी का जनाजा राज्य की निरंतरता दिखाने वाला आयोजन था। खामेनेई का जनाजा इन दोनों से बड़ा राजनीतिक अर्थ रखता है। यह ईरान की वैचारिक वैधता, शिया नेतृत्व की दावेदारी और क्षेत्रीय प्रभाव की परीक्षा है। इसलिए इराक की पवित्र धरती को इस यात्रा में शामिल करना ईरान के लिए बेहद सोचा-समझा कदम दिखता है।

खामेनेई का जनाजा इराक ले जाने के पीछे धार्मिक श्रद्धा, शिया प्रतीकवाद, ईरान की क्षेत्रीय राजनीति, इराकी सत्ता संतुलन और अमेरिका-ईरान तनाव, सब जुड़े हुए हैं। नजफ और करबला की यात्रा से ईरान यह दिखाना चाहता है कि खामेनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे बल्कि पूरे शिया राजनीतिक संसार में असर रखने वाली शख्सियत थे।

वहीं, इराक के लिए यह आयोजन सम्मान, दबाव और जोखिम तीनों का मिला-जुला मामला है। यही वजह है कि यह जनाजा एक अंतिम यात्रा से कहीं ज्यादा, पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति का बड़ा संकेत बन गया है।

इराक : 13 साल की बच्ची कौसर द्वारा निकाह से मना करने पर अब्बा-मंगेतर ने सीने में उतारी 10 गोलियाँ: बाद में हैवानों ने मनाया जश्न

                                              इराक में बच्ची की हत्या ( फोटो साभार-X@ndtv)
इराक की राजधानी बगदाद में एक 13 साल की मासूम बच्ची कौसर बशर अल हुसैजावी को उसके अब्बा, चचाजान और मंगेतर ने मिलकर हत्या कर दी। बच्ची का कसूर सिर्फ इतना था कि वह निकाह नहीं करना चाहती थी, क्योंकि मंगेतर शराबी और ड्रग्स डीलर था। इतना ही नहीं हत्यारों ने उसकी हत्या कर जश्न मनाया। ढोल-नगाड़े बजाए गए और पुरुषों की जमात उस पर ताल मिलाती नजर आई।

उसे मारने का तरीका भी विभत्स था। मृतक की एक रिश्तेदार के मुताबिक, मेरे कबीले के आदमियों ने मेरी रिश्तेदार 15 साल की कौसर बशर अल-हुसैजावी को एक गड्ढे में फेंक दिया और उसके शरीर पर मिट्टी डाल दी। उन्होंने कुल्हाड़ी से उसका सिर फोड़ दिया और फिर 10 गोलियाँ दाग दी। फिर मेरा परिवार भी दूसरों के साथ सड़कों पर आकर नाचने और उसकी मौत का जश्न मनाने लगा।

दरअसल कौसर की 13 साल की उम्र में पहला निकाह हुआ था। बगदाद के दक्षिण-पूर्व में कवथर जिले के अल-नहरावन में रहती थी। उसे स्कूल छुड़वाया गया और 13 साल की उम्र में उससे कई साल बड़े एक शराबी से निकाह कर दिया गया।

वह एक साल तक हिंसा का शिकार होती रही। मौका पाते ही वह अपने परिवार के पास वापस भाग गई। परिवारवालों ने उसे घर में नजरबंद रखा और उसे अपने पति के पास जाने के लिए मजबूर करता रहा। इस दौरान कौसर ने अपनी जान लेने की धमकी दी और आखिरकार 2025 के आखिर में कोर्ट में उसका तलाक हो गया।

इसके तुरंत बाद उसका कजिन जेल से रिहा हो गया और उसने कौसर के माता-पिता से निकाह करने की बात कही। कौसर ने मना कर दिया। परिजनों को भी पता था कि दूल्हा ड्रग्स और शराब का धंधा करता है। उसके परिवार ने फिर भी कौसर पर निकाह का दबाव डाला। कबीले की नीति के मुताबिक, ‘लड़की किसी आदमी की बात नहीं टाल सकती।’ घर पर उसकी माँ और महिला रिश्तेदार उसके पक्ष में खड़ी नहीं हो सकी। वह अकेली पड़ गई।

जैसे-जैसे निकाह का दिन नजदीक आ रहा था, उसे लगता था कि रेप और हिंसा का एक नया दौर पास आ रहा है। डर के साए में जी रही कौसर ने अपना घर छोड़ दिया। उसने न तो पढ़ाई ठीक से की थी और न ही उसे पैसा कमाना आता था। वह अकेले अपने कुछ कपड़े लेकर घर से निकल गई।

घर से भागते हुए उसे एक पड़ोसी ने देख लिया, फिर क्या था मौके का फायदा उठाकर उसे 3 दिनों तक अपने कब्जे में रखा और उसके साथ ‘बहुत बुरा’ किया। कौसर की रिश्तेदार ने ये नहीं बताया कि उन तीन दिनों में उसके साथ क्या हुआ। परिवार को लगा कि वह उसके साथ जानबूझकर गई है। हालाँकि कौसर ये विश्वास दिलाती रही कि उसका किडनेप हुआ है और वह अपनी मर्जी से वहाँ नहीं थी।

सर्विलांस कैमरों में भी उसे जबरदस्ती घसीट कर ले जाते हुए वीडियो सामने आए, लेकिन परिवार ने लड़की को सजा दी। उसे गड्ढे में फेंक दिया गया और मिट्टी डाल दी गई। सभी वहाँ जमा होने लगे। थोड़ी देर बाद उसे निकाल कर पीटा। सिर फोड़ दिया और अंत में 10 गोलियाँ दाग दी।

कभी इजरायल से मिले हथियारों से युद्ध लड़ता था ईरान, मिलकर लड़ी थी इराक के सद्दाम से जंग

                 दोस्त से दुश्मन बन गए ईरान और इजरायल (साभार: Britannica, CNN और NBC News)
आज ईरान और इजरायल सीधे हमले कर रहे हैं और खुले युद्ध की मुहाने पर दोनों देश खड़े हैं। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हजारों मिसाइलें दागी हैं जिससे मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुँच गया है। 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इजरायल के हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है।

ऐसी खुली दुश्मनी के माहौल में यह बात अविश्वसनीय लग सकती है कि कभी इजरायल और ईरान गुप्त साझेदार हुआ करते थे। लेकिन अगर हम कुछ दशक पीछे जाएँ तो याद आता है कि दोनों देश एक समय गुप्त सहयोगी थे और उनका निशाना एक साझा दुश्मन था- इराक।

एक साझा दुश्मन: सद्दाम का इराक

1960 और 1970 के दशक में जब ईरान इस्लामिक रिपब्लिक नहीं बना था तब वहाँ शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। उस समय ईरान के पश्चिमी देशों से दोस्ताना संबंध थे और इजरायल के साथ भी उसके करीबी रिश्ते थे।

दोनों देशों के लिए इराक एक बड़ा खतरा था। इजरायल अपने चारों ओर दुश्मन अरब देशों से घिरा हुआ था। वहीं, शाह के शासन वाला ईरान, इराक के बढ़ते अरब राष्ट्रवादी नेतृत्व और उसके महत्वाकांक्षी रुख से चिंतित था। खासकर सद्दाम के दौर में इराक की क्षेत्रीय प्रभुत्व की कोशिशों ने ईरान और इजरायल दोनों को परेशान कर दिया था।

इसी साझा चिंता ने गहरे सहयोग की नींव रखी। इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद और ईरान की गुप्त पुलिस SAVAK ने मिलकर इराक के भीतर कुर्द विद्रोहियों का समर्थन किया। रणनीति साफ थी कि बगदाद को अंदर से कमजोर करना है।

1958 तक इजरायल, ईरान और तुर्की ने मिलकर एक गुप्त खुफिया गठबंधन बना लिया था जिसे ‘ट्राइडेंट’ कहा जाता था। विश्लेषक ट्रीटा पारसी के अनुसार इसकी सोच यह थी कि इजरायल को मध्य पूर्व के ‘किनारे’ पर मौजूद गैर-अरब देशों के साथ दोस्ती करनी चाहिए। ईरान इनमें सबसे महत्वपूर्ण था। इसकी वजह सिर्फ उसकी सैन्य ताकत नहीं थी बल्कि यह भी था कि उसके पास तेल था, जिसे अरब देश इजरायल को बेचने से मना कर रहे थे।

इस्लामिक क्रांति ने सब बदल दिया

1979 में रूहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में हुई इस्लामिक क्रांति के साथ ही सब कुछ बदल गया। शाह देश छोड़कर भाग गए और ईरान एक पश्चिम समर्थक राजशाही से बदलकर शरिया कानून पर आधारित इस्लामिक गणराज्य बन गया। खामेनेई ने खुले तौर पर अमेरिका को ‘ग्रेट सैटन’ (बड़ा शैतान) और इजरायल को ‘लिटिल सैटन’ (छोटा शैतान) कहा था।

ईरान सार्वजनिक रूप से इजरायल का कट्टर विरोधी बन गया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति अक्सर पर्दे के पीछे अलग तरह से काम करती है।

क्रांति के सिर्फ 18 महीने बाद सितंबर 1980 में इराक ने ईरान पर हमला कर दिया। ईरान-इराक युद्ध शुरू हो चुका था। सद्दाम ने सोचा कि वह ईरान की अंदरूनी अराजकता का फायदा उठाकर पुराने सीमा विवाद (खासकर शत्त-अल-अरब जलमार्ग से जुड़ा) निपटा सकता है। यह युद्ध 8 साल तक चला और इसमें लाखों लोगों की जान गई।

वैचारिक दुश्मनी के बावजूद, ईरान और इजरायल ने एक बार फिर खुद को एक ही दुश्मन ‘सद्दाम के इराक’ के सामने खड़ा पाया।

गुप्त हथियार, शांत सौदे

ईरान की सेना बहुत हद तक शाह के दौर में खरीदे गए अमेरिकी हथियारों और उपकरणों पर निर्भर थी। 1979 के बंधक संकट के बाद, जब ईरानी छात्रों ने 50 से अधिक अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा, तब अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इससे ईरान के सामने हथियारों और कल-पुर्जों की भारी कमी हो गई। ऐसे समय में इजरायल ने हस्तक्षेप किया।

1980 में इजरायल ने गुप्त रूप से ईरान को एफ-4 फैंटम लड़ाकू विमानों के लिए कल-पुर्जे उपलब्ध कराए। इनके बिना ईरान की वायुसेना का बड़ा हिस्सा जमीन पर ही खड़ा रह जाता। हथियारों की यह आपूर्ति यूरोप के रास्ते अक्सर तीसरे देशों के माध्यम से जारी रही।

इज़रायल के नजरिए से इराक की जीत को रोकना बेहद जरूरी था। सद्दाम हुसैन की सरकार को तत्काल और बड़ा खतरा माना जाता था। ईरान की मदद करके इराक को कमजोर करना रणनीतिक रूप से सही कदम समझा गया। एक और चिंता भी थी और वह थी, ईरान में रह रहे लगभग 60,000 यहूदियों की सुरक्षा।

ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण

1980 के दशक के मध्य में ‘ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण’ के दौरान यह गुप्त रिश्ता दुनिया के सामने आया। अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने गुप्त रूप से (आंशिक रूप से इजरायली रास्ते से) ईरान को हथियार बेचने में मदद की। बदले में लेबनान में हिज्बुल्लाह द्वारा बंधक बनाए गए अमेरिकी नागरिकों की रिहाई की कोशिश की गई।

इस धन का कुछ हिस्सा अवैध रूप से निकारागुआ के कॉन्ट्रा विद्रोहियों को दिया गया। इस घोटाले से रीगन सरकार की साख को नुकसान पहुँचा और वॉशिंगटन, यरुशलम और तेहरान के बीच गुप्त सौदों का खुलासा हुआ। विवाद के बावजूद ईरान-इराक युद्ध के दौरान हथियारों की आपूर्ति जारी रही।

रणनीतिक सहयोगी से कट्टर दुश्मन तक

1988 में ईरान-इराक युद्ध खत्म होने के बाद इजरायल और ईरान की गुप्त नज़दीकी कमजोर पड़ने लगी। 1989 में खुमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई ने सत्ता संभाली और इजरायल विरोधी कड़ा रुख जारी रखा।

1990 के दशक तक हालात बदल चुके थे। खाड़ी युद्ध के बाद इराक कमजोर हो गया और सोवियत संघ टूट गया। वे कारण खत्म हो गए जिन्होंने कभी इजरायल और ईरान को साथ लाया था।

इसके बाद ईरान ने खुद को इजरायल का दुश्मन बना लिया। उसने लेबनान में हिज्बुल्लाह और गाजा में हमास का समर्थन किया जिन्होंने 2006 और 2008 में इजरायल से सीधे युद्ध लड़े। ईरानी नेता अक्सर इजरायल के विनाश की बात करते रहे।

2026: युद्ध के कगार पर

आज हालात सीधे टकराव तक पहुँच चुके हैं। अमेरिकी चेतावनियों के बावजूद खामेनेई के नेतृत्व में आगे बढ़ाए गए ईरान के परमाणु कार्यक्रम ने तनाव बढ़ाया है। पिछले एक साल में आर्थिक संकट और राजनीतिक दमन के कारण 31 प्रांतों में सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों पर सख्ती से वैश्विक आलोचना बढ़ी और वॉशिंगटन का दबाव भी तेज हुआ।
घरेलू अशांति, परमाणु तनाव और क्षेत्रीय प्रॉक्सी संघर्षों के बीच हाल में US-इजरायल के हमलों में खामेनेई की मौत हुई। जवाब में ईरान ने इजरायल पर बड़े पैमाने पर मिसाइल हमले किए। इज़रायल पहले से ही ईरान समर्थित गुटों गाजा में हमास, लेबनान में हिज्बुल्लाह और यमन में हूती से लड़ रहा है। दोनों देश अब पूर्ण युद्ध के सबसे करीब हैं।
इतिहास बताता है कि भू-राजनीति स्थायी नहीं होती। कभी इजरायल और ईरान ने इराक के खिलाफ साथ काम किया था। वह साथ विचारधारा नहीं बल्कि रणनीतिक जरूरत पर आधारित था। आज मिसाइलों और धमकियों के बीच वह दौर अकल्पनीय लगता है। पर मध्य पूर्व में रिश्ते बदलते हैं कल के गुप्त साझेदार आज के कट्टर दुश्मन बन सकते हैं।

अमेरिका का दोगलापन: ‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर गिराई सरकारें, तानाशाहों को किया मजबूत


शनिवार (3 जनवरी) की सुबह, काराकास की नींद रात के आसमान में फाइटर जेट्स के उड़ने की आवाज़ से खुली। सुबह तक यह साफ हो चुका था कि वेनेज़ुएला एक जाने-पहचाने अमेरिकी ड्रामे का नया मंच बन चुका है। यहाँ अमेरिकी सेना की टुकड़ी को ‘डेमोक्रेसी वापस लाने’ के एक मिशन पर लगाया गया था।

US के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कन्फर्म किया कि अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला में कई हमले किए हैं और प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़कर यूनाइटेड स्टेट्स ले गए हैं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर ऑपरेशन की घोषणा की, और इसे ‘नारकोटिक टेररिज्म’ कहे जाने वाले सिस्टम के खिलाफ अभियान बताया।

                                                                  (साभार- ट्रंप/ ट्रूथ सोशल)

इसके तुरंत बाद, US अटॉर्नी जनरल पामेला बोंडी ने बताया कि मादुरो और फ्लोरेस पर न्यूयॉर्क में नार्को-टेररिज्म की साजिश में शामिल होने से लेकर लोकतंत्र को खत्म करने जैसे आरोप लगाए गए थे।

ट्रंप ने मादुरो सरकार पर प्रवासियों को US के दक्षिणी बॉर्डर की ओर धकेलने, जेलों और मेंटल इंस्टीट्यूशन को खाली करने और ड्रग कार्टेल और आतंकवादी ग्रुप्स के साथ मिलकर काम करने का आरोप लगाया। ट्रंप के मुताबिक, वेनेजुएला अमेरिका में कोकेन लाने का एक बड़ा रास्ता बन गया है, जहाँ कैरिबियन और पैसिफिक के रास्ते नशीले पदार्थों की तस्करी होती है।

यह वजह जानी-पहचानी लग रही थी क्योंकि पहले भी अमेरिका ऐसे आरोप लगाकर कई देशों के साथ ऐसा व्यवहार कर चुका है। कई सालों से अमेरिका अपने विरोधी देशों और उनकी सरकारों पर मानवाधिकार उल्लंघन करने, लोगों पर जुल्म करने और दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरा बताता रहा है।

वेनेज़ुएला के मामले में सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कई नावों पर हमला किया था और उसमें ड्रग्स होने की बात कही थी। यह एक संकेत था, जो अमेरिका ने दुनिया को दिया था।

हालाँकि मादुरो ने हमेशा ऐसे आरोपों से इनकार किया और उन्हें वेनेजुएला के बड़े तेल भंडार को कंट्रोल के लिए एक कवर बताया। हमलों से कुछ दिन पहले मादुरो ने प्रवासियों और ड्रग ट्रैफिकिंग पर US के साथ सहयोग की पेशकश की थी। लेकिन अमेरिका ने मादुरो के सामने देश छोड़ने की शर्त रख दी थी। इससे मादुरो उखड़ गए। इस पर अमेरिका ने मादुरो पर ‘गंभीर’ नहीं होने का आरोप लगाया।

इसका खामियाजा वेनेजुएला को उठाना पड़ा। अमेरिकी जेट बिना कॉन्ग्रेस की मंजूरी के उड़ गई। इसपर अमेरिका में भी सवाल किए जा रहे हैं। यूएन को बताना तो दूर की बात है।

वेनेज़ुएला में जो हुआ वह एक ऐसे पैटर्न से मेल खाता है, जिसे दुनिया ने पहले भी कई बार देखा है। डेमोक्रेसी, सिक्योरिटी और नैतिक जिम्मेदारी में लिपटा हुआ एक शासन बदलने का ऑपरेशन।

डेमोक्रेसी बहाल करने के नाम पर शासन बदलना

वेनेज़ुएला में US का दखल यूँ ही नहीं हुआ। यह दुनिया भर में अमेरिका की लीडरशिप में हुए तख्तापलट का एक और उदाहरण है। वियतनाम से लेकर इराक तक, अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक अमेरिका ने बार-बार मिलिट्री एक्शन को ‘खराब राज’ हटाने और उनकी जगह ‘डेमोक्रेटिक सिस्टम’ लाने के तौर पर इस्तेमाल किया। इसकी वजह से दुनिया में अस्थिरता का दौर आया और व्यापक हिंसा हुई।

2001 के आखिर में US के समर्थन वाली सेना काबुल में घुसी और कुछ ही हफ्तों में तालिबान सरकार को गिरा दिया। हामिद करजई को अमेरिकी समर्थन मिला और उन्हें अफगानिस्तान का लीडर बनाया गया। उस वक्त तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने सेंट्रल एशिया में डेमोक्रेसी की जड़ें जमने की बात कही। दो दशक बाद, US सैनिक वापस चले गए और तालिबान लगभग रातों-रात सत्ता में वापस आ गया। अमेरिका की बनाई सरकार गिर गई। इससे पता चलता है कि वह हमेशा से कितनी खोखली और परजीवी थी।

इराक ने भी ऐसा ही रास्ता अपनाया गया। 2003 में US सैनिकों ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से बाहर कर दिया। इराक को मिडिल ईस्ट में लोकतंत्र का अगुआ करार दिया। लेकिन इराक के सिक्योरिटी सिस्टम को खत्म करने से लाखों हथियारबंद लोग बेरोजगार हो गए। देश बगावत, सांप्रदायिक हिंसा और सिविल वॉर में डूब गया। ईरान के सपोर्ट वाले मिलिशिया का असर बढ़ा, और इस अफ़रा-तफ़री से आखिरकार इस्लामिक स्टेट बना, जिसने इलाके के सिक्योरिटी माहौल को इस तरह से बदल दिया जो आज भी उसे परेशान करता है।

सीरिया, लीबिया और पहले वियतनाम एक ही कहानी के अलग-अलग रूप हैं। US नैतिकता की दुहाई देते हुए मौजूदा सरकार को सत्ता से बाहर करता है। सिस्टम खत्म कर देता है और टूटे-फूटे समाज को पीछे छोड़ जाता है। जानकार इस पैटर्न को विदेशियों द्वारा थोपा गया शासन परिवर्तन कहते हैं।

पिछले 120 सालों में यूनाइटेड स्टेट्स ने करीब 35 देशों के नेताओं को सत्ता से जबरदस्ती बाहर किया है। ये आंकड़ा पूरी दुनिया में हुए ऐसे सभी दखलदांजी का लगभग एक-तिहाई है। चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग एक-तिहाई देशों में शासन परिवर्तनों के बाद एक दशक के अंदर सिविल वॉर हुआ।

यहाँ तक ​​कि ट्रंप, जिन्होंने अमेरिका में अपनी राजनीति ही दुनिया के युद्ध बंद करने के नाम पर शुरू की, वे भी इस परंपरा से बाहर नहीं निकल पा रहे। हालाँकि उन्होंने बार-बार इराक हमले की निंदा की है और नियोकंज़र्वेटिव विदेश नीति की आलोचना की है, उनका वेनेजुएला दखल उनके ‘शांतिदूत’ होने के अपने दावों से मेल नहीं खाता।

बांग्लादेश: बिना बम के US ने बदली सरकार

जहाँ वेनेज़ुएला में फाइटर जेट और मिसाइलें देखी गईं, वहीं बांग्लादेश में अमेरिकी दखल अलग तरीके से हुआ। बांग्लादेश में सैनिक नहीं भेजे गए, बल्कि पॉलिटिकल प्रेशर, इंटेलिजेंस नेटवर्क और सड़क पर विरोध प्रदर्शनों के जरिए लोकतांत्रिक सरकार को हटाया गया।

एक किताब, इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ़ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन के मुताबिक, शेख हसीना के पूर्व होम मिनिस्टर असदुज्जमां खान कमाल ने CIA पर उन्हें सत्ता से हटाने की साज़िश रचने का आरोप लगाया है। उन्होंने इन घटनाओं को ‘CIA की एक परफेक्ट साज़िश’ बताया।

                                                                (फोटो- Hindu e shop)

कमाल ने दावा किया कि देश के आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज़-ज़मान इस साज़िश के सेंटर में थे। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की टॉप इंटेलिजेंस एजेंसियों ने भी हसीना को चेतावनी नहीं दी, जिससे लगता है कि सीनियर अधिकारियों की मिलीभगत रही होगी। कमाल के मुताबिक, वाकर ने आर्मी चीफ का पद संभालने के कुछ ही हफ़्तों बाद 5 अगस्त, 2024 को हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया, यह एक ऐसा पद था जिस पर हसीना ने खुद उन्हें अपॉइंट किया था।

हसीना के गिरने से पहले हुए विरोध प्रदर्शनों को इंटरनेशनल लेवल पर तथाकथित जेन जी लीड और डेमोक्रेटिक बताया गया, लेकिन कमाल ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टर इस्लामी ग्रुप, जो पहले से बँटे हुए थे, पहली बार विदेशी इंटेलिजेंस नेटवर्क के सपोर्ट से एक हो गए। उन्होंने आगे दावा किया कि पाकिस्तान की ISI ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इस दौरान विदेश में ट्रेंड आतंकवादी प्रदर्शनकारियों के साथ मिल गए और पुलिस पर हमला किया।
कमाल ने तर्क दिया कि इसका मोटिवेशन स्ट्रेटेजिक था। उन्होंने कहा कि अमेरिका एक ही समय में साउथ एशिया में बहुत सारे मजबूत लीडर नहीं चाहता। भारत में नरेंद्र मोदी और चीन में शी जिनपिंग के होने से, हसीना का इंडिपेंडेंट रुख उनके लिए असुविधाजनक हो गया। एक और मुख्य वजह बंगाल की खाड़ी में सेंट मार्टिन आइलैंड था, जो अमेरिका चाहता था। हिन्द महासागर में जियोपॉलिटिक्स के लिए ये बहुत जरूरी है।
हसीना ने खुद सार्वजनिक तौर पर कहा था कि US ने उन पर सत्ता में बने रहने के बदले आइलैंड का एक्सेस माँगा था। उन्होंने इसे बांग्लादेश की संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए मना कर दिया। शेख हसीना को हटाए जाने के बाद इकॉनमिस्ट मुहम्मद यूनुस को सत्ता की जिम्मेदारी सौंपी गई, जो अमेरिका के करीबी थे।

तानाशाह के दोस्त, लोकतंत्र के दुश्मन

अमेरिका ने ‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर कई देशों और उसके राष्ट्राध्यक्षों को बर्बाद किया। वहीं दूसरी ओर तानाशाही सरकारों के साथ उसके करीबी रिश्ते रहे, बशर्ते वे US के लिए फायदेमंद हों। सऊदी अरब इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
सऊदी में कोई चुनाव नहीं होता, कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं है और कोई राजनीतिक आजादी नहीं है। फिर भी अमेरिका उसे एक अहम साथी मानता है।
हाल ही में, US ने सऊदी अरब को $1.4 बिलियन की सैन्य साजोसामान की बिक्री को मंज़ूरी दी। इसमें उसकी आर्मी को ट्रेनिंग देने के लिए करोड़ों डॉलर शामिल हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के व्हाइट हाउस दौरे के नतीजे में F-35 फाइटर जेट की बिक्री और एक स्ट्रेटेजिक डिफेंस एग्रीमेंट को मंजूरी मिली। इस व्यापार से US और सऊदी अरब के रिश्ते और ‘मधुर’ हुए।
यह वही सऊदी लीडरशिप है, जिसे मानवाधिकार के उल्लंघन, यमन में युद्ध और पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या पर दुनिया भर में गुस्से का सामना करना पड़ा है। फिर भी, ऐसा नहीं लगता कि इनमें से कोई भी बात रियाद को अमेरिकी सपोर्ट के लिए अयोग्य ठहराती है।
सऊदी अरब के अलावा, US के मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और एशिया में दूसरे तानाशाही देशों के साथ मजबूत रिश्ते हैं। मिस्र, जहाँ मिलिट्री तख्तापलट के बाद प्रेसिडेंट अब्देल फत्ताह अल-सिसी का राज है, को US से अरबों की मिलिट्री मदद मिलती है।
यूनाइटेड अरब अमीरात, जहाँ पूरी तरह से राजशाही है, US का एक और करीबी पार्टनर है। इन रिश्तों को शायद ही कभी डेमोक्रेसी के लिए समस्या के तौर पर देखा जाता है। इसके बजाय, उन्हें ‘स्टेबिलिटी’, ‘सिक्योरिटी,’ और ‘रीजनल बैलेंस’ के तौर पर देखा जाता है।
जब ये सरकारें विरोध को दबाती हैं या विरोधियों को जेल में डालती हैं, तब भी अमेरिका चुप रहता है।

अमेरिका का दोगलापन

वेनेजुएला, अफगानिस्तान, इराक, बांग्लादेश के साथ और तानाशाही सरकारों के साथ अमेरिका के रिश्ते, उसके दोहरे चरित्र को उजागर करते हैं। डेमोक्रेसी का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया जाता है, दुश्मनों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और दोस्तों के साथ डील करते समय नजरअंदाज कर दिया जाता है।
जो सरकारें US के असर का विरोध करती हैं, उन्हें क्रिमिनल, गैर-कानूनी या खतरनाक करार दिया जाता है। जो लोग बात मानते हैं, भले ही वे बिना चुनाव के राज करें या तानाशाही रवैया अपनाएँ, उन्हें ‘इनाम’ दिया जाता है।
इस पैटर्न को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। सरकार बदलना डेमोक्रेसी के बारे में नहीं है, यह कंट्रोल के बारे में है। यह तेल, मिलिट्री बेस, शिपिंग रूट और जियोपॉलिटिकल फायदे के बारे में है। लैटिन अमेरिका से लेकर साउथ एशिया तक, यूनाइटेड स्टेट्स ने बार-बार दिखाया है कि उसका कमिटमेंट डेमोक्रेटिक वैल्यूज़ के लिए नहीं, बल्कि स्ट्रेटेजिक फायदे के लिए है।

इराक : बाइक रेस देखने पहुँची लड़की पर टूटे इस्लामी कट्टरपंथी, घेरकर लात-घूँसों से मारा

इराक में बाइक रेस देखने गई लड़की पर कट्टरपंथी मुस्लिमों ने किया हमला (साभार: वायरल वीडियो का स्क्रीनशॉट)
इराक में हुए बाइक रेस इवेंट की एक वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है। दावा है कि यहाँ छोटे कपड़े पहनकर पहुँची एक लड़की को देख कट्टरपंथी मुस्लिमों ने उस पर हमला किया। लड़की की उम्र सिर्फ 17 साल है। भीड़ ने उसे लात-घूँसों से मारा है। यह घटना 30 दिसंबर 2022 की है। इस मामले में पुलिस ने 16 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है।

जानकारी के अनुसार, लड़की पर यह हमला इराक के कुर्दिस्तान (Iraqi Kurdistan) में सुलेमानियाह (Sulaymaniyah) शहर में हुआ। बताया जा रहा है कि लड़की बाइक रेस देखने गई थी, जहाँ महिलाओं के न आने की माँग गई थी। वीडियो देखने के बाद लोगों में काफी आक्रोश है। वायरल वीडियो में आप देख सकते हैं कि लड़की ने ब्राउन कलर का एक टॉप, कार्डिगन और एक स्कर्ट पहनी हुई है। वह तेज कदमों से भीड़ से दूर भागती नजर आ रही है। लेकिन बाइक रेस इवेंट में सैकड़ों कट्टरपंथी मुस्लिम इराकी लड़की को देखकर जोर-जोर से चिल्ला रहे हैं। उसका पीछा कर रहे हैं। इस दौरान लड़की काफी डरी हुई लग रही है। वह वहाँ से भागने की कोशिश कर रही है, लेकिन उन लोगों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। एक शख्स उसे पीछे से लात मारते हुए भी दिख रहा है। इस बीच उसे बचाने के लिए बाइक से एक लड़का आता है और अपनी जान पर खेलकर उसे उन दरिंदों से बचा कर ले जाता है।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन लोगों ने लड़की का अपमान किया, उसको पीटा, जिससे उसे थोड़ी बहुत चोटें भी आईं। वहीं, उसकी ओर से बीच-बचाव करने वाले एक व्यक्ति को चाकू मार दिया गया।

सुलेमानियाह के पुलिस प्रमुख सरकावत अहमद ने कहा कि हमले में शामिल 16 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। कुर्दिस्तान क्षेत्रीय सरकार ने एक बयान जारी कर इस हमले की निंदा की और इसे घृणित बताया। उन्होंने कहा कि इस सप्ताह सुलेमानियाह प्रांत में एक और हमला हुआ। वहीं, प्रवक्ता जोतियार आदिल ने कहा, “ये घटनाएँ अस्वीकार्य हैं।”

कुर्दिस्तान के ड्रॉ मीडिया के अनुसार, पुरुषों ने माँग की थी कि बाइक रेस कार्यक्रम से महिलाओं को बाहर रखा जाए। लड़की पर हमला करने वालों का कहना है कि उसके कपड़ों की वजह से उनका और बाइकर्स का ध्यान भटक रहा था। लड़कियों को इस तरह के शो में नहीं आना चाहिए, क्योंकि उनके होने से लोगों का ध्यान शो की बजाए उन पर होता है।

सोशल मीडिया पर कई यूजर्स द्वारा शेयर की गई इस वीडियो पर देश के वरिष्ठ नेताओं ने भी कमेंट किया है। कुर्दिस्तान संसद की स्पीकर रेवाज फाक ने इसे मूर्खतापूर्ण हमला बताया। उन्होंने कहा कि यह हमला हमारे देश की महिलाओं के खिलाफ हो रहे बर्बर हमलों की कहानी बयाँ कर रहा है।

रेवाज ने ट्वीट किया, “किसी सामान्य व्यक्ति की तरह केवल एक रेस देखने की इच्छा रखने वाली लड़की पर इन पुरुष दरिंदों द्वारा किया गया बेहूदा हमला हमारी महिलाओं के खिलाफ व्यवस्थित रूप से इस्तेमाल किए गए एक बर्बर नरैटिव का परिणाम है। इस बर्बरता से जो समाज या सत्ता नहीं जागी, उसे शीघ्र मृत्यु की प्रतीक्षा करनी होगी।”