दोस्त से दुश्मन बन गए ईरान और इजरायल (साभार: Britannica, CNN और NBC News)
आज ईरान और इजरायल सीधे हमले कर रहे हैं और खुले युद्ध की मुहाने पर दोनों देश खड़े हैं। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हजारों मिसाइलें दागी हैं जिससे मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर पहुँच गया है। 28 फरवरी से शुरू हुए अमेरिका-इजरायल के हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है।
ऐसी खुली दुश्मनी के माहौल में यह बात अविश्वसनीय लग सकती है कि कभी इजरायल और ईरान गुप्त साझेदार हुआ करते थे। लेकिन अगर हम कुछ दशक पीछे जाएँ तो याद आता है कि दोनों देश एक समय गुप्त सहयोगी थे और उनका निशाना एक साझा दुश्मन था- इराक।
एक साझा दुश्मन: सद्दाम का इराक
1960 और 1970 के दशक में जब ईरान इस्लामिक रिपब्लिक नहीं बना था तब वहाँ शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। उस समय ईरान के पश्चिमी देशों से दोस्ताना संबंध थे और इजरायल के साथ भी उसके करीबी रिश्ते थे।
दोनों देशों के लिए इराक एक बड़ा खतरा था। इजरायल अपने चारों ओर दुश्मन अरब देशों से घिरा हुआ था। वहीं, शाह के शासन वाला ईरान, इराक के बढ़ते अरब राष्ट्रवादी नेतृत्व और उसके महत्वाकांक्षी रुख से चिंतित था। खासकर सद्दाम के दौर में इराक की क्षेत्रीय प्रभुत्व की कोशिशों ने ईरान और इजरायल दोनों को परेशान कर दिया था।
इसी साझा चिंता ने गहरे सहयोग की नींव रखी। इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद और ईरान की गुप्त पुलिस SAVAK ने मिलकर इराक के भीतर कुर्द विद्रोहियों का समर्थन किया। रणनीति साफ थी कि बगदाद को अंदर से कमजोर करना है।
1958 तक इजरायल, ईरान और तुर्की ने मिलकर एक गुप्त खुफिया गठबंधन बना लिया था जिसे ‘ट्राइडेंट’ कहा जाता था। विश्लेषक ट्रीटा पारसी के अनुसार इसकी सोच यह थी कि इजरायल को मध्य पूर्व के ‘किनारे’ पर मौजूद गैर-अरब देशों के साथ दोस्ती करनी चाहिए। ईरान इनमें सबसे महत्वपूर्ण था। इसकी वजह सिर्फ उसकी सैन्य ताकत नहीं थी बल्कि यह भी था कि उसके पास तेल था, जिसे अरब देश इजरायल को बेचने से मना कर रहे थे।
इस्लामिक क्रांति ने सब बदल दिया
1979 में रूहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में हुई इस्लामिक क्रांति के साथ ही सब कुछ बदल गया। शाह देश छोड़कर भाग गए और ईरान एक पश्चिम समर्थक राजशाही से बदलकर शरिया कानून पर आधारित इस्लामिक गणराज्य बन गया। खामेनेई ने खुले तौर पर अमेरिका को ‘ग्रेट सैटन’ (बड़ा शैतान) और इजरायल को ‘लिटिल सैटन’ (छोटा शैतान) कहा था।
ईरान सार्वजनिक रूप से इजरायल का कट्टर विरोधी बन गया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति अक्सर पर्दे के पीछे अलग तरह से काम करती है।
क्रांति के सिर्फ 18 महीने बाद सितंबर 1980 में इराक ने ईरान पर हमला कर दिया। ईरान-इराक युद्ध शुरू हो चुका था। सद्दाम ने सोचा कि वह ईरान की अंदरूनी अराजकता का फायदा उठाकर पुराने सीमा विवाद (खासकर शत्त-अल-अरब जलमार्ग से जुड़ा) निपटा सकता है। यह युद्ध 8 साल तक चला और इसमें लाखों लोगों की जान गई।
वैचारिक दुश्मनी के बावजूद, ईरान और इजरायल ने एक बार फिर खुद को एक ही दुश्मन ‘सद्दाम के इराक’ के सामने खड़ा पाया।
गुप्त हथियार, शांत सौदे
ईरान की सेना बहुत हद तक शाह के दौर में खरीदे गए अमेरिकी हथियारों और उपकरणों पर निर्भर थी। 1979 के बंधक संकट के बाद, जब ईरानी छात्रों ने 50 से अधिक अमेरिकियों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा, तब अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगा दिए। इससे ईरान के सामने हथियारों और कल-पुर्जों की भारी कमी हो गई। ऐसे समय में इजरायल ने हस्तक्षेप किया।
1980 में इजरायल ने गुप्त रूप से ईरान को एफ-4 फैंटम लड़ाकू विमानों के लिए कल-पुर्जे उपलब्ध कराए। इनके बिना ईरान की वायुसेना का बड़ा हिस्सा जमीन पर ही खड़ा रह जाता। हथियारों की यह आपूर्ति यूरोप के रास्ते अक्सर तीसरे देशों के माध्यम से जारी रही।
इज़रायल के नजरिए से इराक की जीत को रोकना बेहद जरूरी था। सद्दाम हुसैन की सरकार को तत्काल और बड़ा खतरा माना जाता था। ईरान की मदद करके इराक को कमजोर करना रणनीतिक रूप से सही कदम समझा गया। एक और चिंता भी थी और वह थी, ईरान में रह रहे लगभग 60,000 यहूदियों की सुरक्षा।
ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण
1980 के दशक के मध्य में ‘ईरान-कॉन्ट्रा प्रकरण’ के दौरान यह गुप्त रिश्ता दुनिया के सामने आया। अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने गुप्त रूप से (आंशिक रूप से इजरायली रास्ते से) ईरान को हथियार बेचने में मदद की। बदले में लेबनान में हिज्बुल्लाह द्वारा बंधक बनाए गए अमेरिकी नागरिकों की रिहाई की कोशिश की गई।
इस धन का कुछ हिस्सा अवैध रूप से निकारागुआ के कॉन्ट्रा विद्रोहियों को दिया गया। इस घोटाले से रीगन सरकार की साख को नुकसान पहुँचा और वॉशिंगटन, यरुशलम और तेहरान के बीच गुप्त सौदों का खुलासा हुआ। विवाद के बावजूद ईरान-इराक युद्ध के दौरान हथियारों की आपूर्ति जारी रही।
रणनीतिक सहयोगी से कट्टर दुश्मन तक
1988 में ईरान-इराक युद्ध खत्म होने के बाद इजरायल और ईरान की गुप्त नज़दीकी कमजोर पड़ने लगी। 1989 में खुमैनी की मृत्यु के बाद खामेनेई ने सत्ता संभाली और इजरायल विरोधी कड़ा रुख जारी रखा।
1990 के दशक तक हालात बदल चुके थे। खाड़ी युद्ध के बाद इराक कमजोर हो गया और सोवियत संघ टूट गया। वे कारण खत्म हो गए जिन्होंने कभी इजरायल और ईरान को साथ लाया था।
इसके बाद ईरान ने खुद को इजरायल का दुश्मन बना लिया। उसने लेबनान में हिज्बुल्लाह और गाजा में हमास का समर्थन किया जिन्होंने 2006 और 2008 में इजरायल से सीधे युद्ध लड़े। ईरानी नेता अक्सर इजरायल के विनाश की बात करते रहे।
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