पिछले महीने 23 फरवरी को चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी ने वरिष्ठ वकील Mathews J Nedumpara को उनके द्वारा कॉलेजियम को ख़त्म करके NJAC बहाल करने की याचिका की लिस्टिंग को लेकर जबरदस्त फटकार लगाई। उनकी याचिका पहले 17 नवंबर, 2022 को दायर हुई थी और CJI चंद्रचूड़ ने उस पर सुनवाई का आश्वासन भी दिया था। इसका मतलब था याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार हो गई थी, लेकिन याचिका लिस्ट नहीं हुई।
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“कॉलेजियम को पहले ही Upheld किया जा चुका है और NJAC को, जिसमे जजों की नियुक्ति के मामले में सरकार को बराबर के अधिकार दिए गए थे, संविधान पीठ ने October, 2015 में ख़ारिज कर दिया था। review petition भी 2018 में ख़ारिज हो गई थी। इसलिए Repeat litigation न्यायपालिका के समय और energy की बर्बादी करना है”।
पुनीत सहगल ने 2013 के सुप्रीम कोर्ट के Rules का सहारा लेते हुए कहा कि -
“I hold that the registration of the present case was not proper and by virtue of order XV Rule 5 of the Supreme Court Rules, 2013 I hereby decline to receive the same”.
2013 के rule के अनुसार रजिस्ट्रार याचिका को Receive करने से मना कर सकता है अगर याचिकाकर्ता ने कोई reasonable cause नहीं बताया या यह याचिका तुच्छ है या इसमें scandalous matter है।
CJI सूर्यकांत ने भी आश्वासन दिया था कि वो कॉलेजियम को ख़त्म करने पर विचार करेंगे और उनकी याचिका सुनेंगे। वकील Nedumpara 23 फरवरी को अपनी याचिका की लिस्टिंग की मांग करने की जिद की और लगता है वे Out of Desperation कह गए कि अंबानी/अडानी के मामलों के लिए संविधान पीठ बन जाती हैं लेकिन आम आदमी के विषयों की सुनवाई नहीं होती।
इस बात पर सूर्यकांत जी को घोर आपत्ति हुई और उन्होंने Nedumpara को कहा “Mr Nedumpara, be careful with what you submit in my court, you have seen me in Chandigarh, in Delhi ... I am warning you, be careful. Don’t think you will be able to continue misbehaving as you have been doing with other benches, I am warning you”. Nedumpara को यह भी कहा गया कि उनकी याचिका रजिस्ट्री के पास नहीं है। उनकी 3 लंबित याचिकाओं में एक तो 27 जनवरी, 2026 को दायर हुई थी।
आप चीफ जस्टिस हैं और किसी भी वकील के बर्ताव पर आपको नाराज़ होने का पूरा अधिकार हैं लेकिन एक बार Nedumpara का दर्द भी समझाना जरूरी था। क्या यह सत्य नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में वकीलों की चांडाल चौकड़ी अपने मामलों की लिस्टिंग अपनी मर्जी से करवाते रहे हैं और इसलिए ही उन्हें 30-35 लाख रूपए फीस एक दिन की मिलती है।
ठीक है आपको Nedumpara के शब्द बुरे लगे लेकिन इसी सुप्रीम कोर्ट में CJI रंजन गोगोई की पीठ के सामने वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने 16 अक्टूबर, 2019 को Official Documents फाड़ कर बेंच की तरफ फ़ेंक दिए थे लेकिन उन्हें ऐसे नहीं धमकाया गया जैसे Nedumpara की बात को Misbehaviour समझ कर फटकार मारी गई।
इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के दो जजों ने राष्ट्रपति को आदेश दे दिए जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं था। दो जज राष्ट्रपति को आदेश दे सकते थे लेकिन दो जज केजरीवाल की गिरफ़्तारी की वैधता पर फैसला नहीं कर सकते थे जो उन्होंने संविधान पीठ को फैसला करने को छोड़ दिया लेकिन वह पीठ आज 2 साल में भी नहीं बनी।
कॉलेजियम पर फैसला तो करना होगा। जो फैसला 2015 में दिया वह गलत था क्योंकि उसने 125 करोड़ जनता की भावनाओं की अनदेखी की थी क्योंकि वह क़ानून संसद ने सर्वसम्मति से पास किया था और 16 राज्यों ने अनुमोदन किया था। उसे 4 जज कैसे ख़ारिज कर सकते थे जिनकी जवाबदेही जनता के प्रति नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट इस कॉलेजियम के मामले में stakeholder और interested party है, इसलिए वह सही निर्णय नहीं ले सकता। इसके निर्णय के लिए कोई और मार्ग ढूंढना होगा।

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