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ट्रम्प द्वारा मोदी से मुलाकात में Operation Sindoor के दौरान Cease fire का जिक्र नहीं करने को राष्ट्रीय मीडिया ने क्यों नहीं प्रमुखता दी? G7 में ट्रंप ने की प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ, बोले- जब तक मोदी PM हैं, दुनिया में भारत की बड़ी भूमिका तय


राहुल गाँधी और INDI गठबंधन में शामिल सारी पार्टियां Operation Sindoor के दौरान पाकिस्तान को घर में घुसकर मारने पर पाकिस्तान की ओर से सफ़ेद झंडा(फ़ोन या हॉटलाइन पर) दिखाए जाने पर बहुत शोर मचा ट्रम्प ने कहा 'मोदी सरेंडर' और मोदी ने सरेंडर कर दिया। 'मोदी ट्रम्प से डरता है' आदि आदि। लेकिन फ्रांस में प्रधानमंत्री नरेंद्र के सामने अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान पर हमले का जिक्र तक नहीं किया जिसे मीडिया तक ने प्रमुखता नहीं दी, क्यों? आखिर राष्ट्रीय मीडिया ने किसके दबाब में इस मुख्य समाचार को प्रमुखता क्यों नहीं दी? क्या इस समाचार को प्रमुखता नहीं देने के लिए कांग्रेस या INDI गठबंधन ने मीडिया को कोई लालच दिया था?         

फ्रांस के खूबसूरत शहर एवियन में जी7 शिखर सम्मेलन के इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात दुनिया भर में चर्चा का बड़ा विषय बन गई। दोनों नेताओं के बीच वैश्विक सुरक्षा, व्यापार, रणनीतिक सहयोग और पश्चिम एशिया की स्थिति समेत कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हुई। हालांकि इस मुलाकात की सबसे ज्यादा चर्चा राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की खुलकर की गई प्रशंसा को लेकर रही।

बैठक के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत छवि और नेतृत्व शैली की जमकर तारीफ की। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी के साथ हमारी बहुत अच्छी बातचीत हुई है। मोदी देखने में बहुत सुंदर और अच्छे लगते हैं, बिल्कुल फरिश्ते जैसे। लेकिन असल में वह अपने देश के हितों को लेकर बेहद कठोर हैं। वह एक असली ‘किलर’ हैं, जितने सख्त इंसान कोई हो सकता है, मोदी उनमें से एक हैं।”

राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान दिखाता है कि प्रधानमंत्री मोदी भले ही वैश्विक मंचों पर बेहद शालीन और मिलनसार दिखाई देते हों, लेकिन जब बात भारत के हितों की आती है तो वह अपने रुख पर मजबूती से कायम रहते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान के पीछे पीएम मोदी की दृढ़ नेतृत्व क्षमता और निर्णय लेने की शैली की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।

प्रेसिडेंट ट्रंप ने यह भी स्वीकार किया कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी शर्तें मनवाने में बेहद सख्त और एक टफ नेगोशिएटर हैं। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीएम मोदी भारत के हितों की रक्षा करने में किसी से पीछे नहीं हटते। राष्ट्रपति ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था और रणनीतिक मामलों में अपनी भूमिका लगातार मजबूत कर रहा है।

इस मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को लेकर भी बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा, “अगर भारत पर कभी भी कोई हमला हुआ या कोई संकट आया, तो हम पूरी ताकत से भारत की मदद करेंगे।” राष्ट्रपति ट्रंप के इस बयान को भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की मजबूती और दोनों देशों के बीच बढ़ते विश्वास के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

इसके साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के बढ़ते वैश्विक कद का जिक्र करते हुए कहा, “आज दुनिया के हर कोने में भारत की बहुत बड़ी भूमिका है। और मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि जब तक नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री रहेंगे, तब तक वैश्विक मंच पर भारत की यह बड़ी भूमिका रहना पूरी तरह तय है।”

अमेरिकी राष्ट्रपति का यह बयान भारत की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की अंतरराष्ट्रीय पहचान को दर्शाता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने वैश्विक मंचों पर अपनी सक्रिय भागीदारी और प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है, जिसका जिक्र राष्ट्रपति ट्रंप के बयान में भी देखने को मिला।

एक तरफ जहां राष्ट्रपति ट्रंप भारत की तारीफ कर रहे थे, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को मजबूती से उठाया। प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा राष्ट्रपति ट्रंप के सामने रखा और कहा कि दुनिया भर के समुद्री मार्गों पर बड़ी संख्या में भारतीय नाविक कार्यरत हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद महत्वपूर्ण है।

प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य का खुला और सुरक्षित रहना आवश्यक है। उन्होंने नौवहन की स्वतंत्रता तथा निर्बाध वाणिज्यिक गतिविधियों को बनाए रखने के महत्व पर बल दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता का भी महत्वपूर्ण विषय है।

प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप के उन प्रयासों की भी सराहना की, जिनके परिणामस्वरूप पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को समाप्त करने और व्यापक क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता बहाल करने को लेकर सहमति बनी है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में शांति और स्थिरता वैश्विक विकास के लिए आवश्यक है।

दोनों नेताओं ने फरवरी 2025 में वॉशिंगटन डीसी में हुई अपनी पिछली बैठक के बाद से भारत-अमेरिका कॉम्पैक्ट के तहत हुई प्रगति की समीक्षा भी की। दोनों देशों ने रक्षा, रणनीतिक तकनीकों, ऊर्जा और द्विपक्षीय व्यापार के क्षेत्रों में हुई महत्वपूर्ण प्रगति का स्वागत किया।

व्यापार संबंधों को लेकर भी दोनों नेताओं ने सकारात्मक संकेत दिए। उन्होंने एक अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में चल रही वार्ता में हुई प्रगति पर संतोष व्यक्त किया और अधिकारियों को जल्द से जल्द एक संतुलित, पारस्परिक रूप से लाभकारी और व्यावसायिक रूप से सार्थक समझौते को अंतिम रूप देने के निर्देश दिए। इसी सिलसिले में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर अगले सप्ताह भारत का दौरा करेंगे।

मुलाकात के अंत में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत-अमेरिका व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। दोनों नेताओं ने रक्षा, तकनीक, ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को और आगे बढ़ाने पर सहमति जताई।

जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई यह मुलाकात कई मायनों में महत्वपूर्ण रही। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की खुलकर सराहना की, वहीं दूसरी तरफ भारत ने वैश्विक शांति, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी जिम्मेदार भूमिका को मजबूती से रखा।

बलूचिस्तान में ‘अमेरिकी खुदाई’ का बनाया जा रहा रास्ता, सोना निकालने वाली कनाडाई कंपनी ने G7 देशों से माँगे 29050 करोड़ रूपए: सऊदी अरब ने फंडिंग से कर दिया है इनकार

                                                                                                                   साभार - एक्सप्रेस ट्रिब्यून
बलूचिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। इस बार कारण है इसके प्राकृतिक संसाधनों को लेकर बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी। कनाडा की कंपनी बैरिक माइनिंग ने विवादित रेको दिक तांबा-सोना परियोजना के लिए 3.5 अरब डॉलर (29,050 करोड़ रुपए) की फंडिंग की माँग की है।

सऊदी अरब ने इस परियोजना में निवेश से इनकार कर दिया है। अब कंपनी अमेरिकी नेतृत्व में G7 फाइनेंसिंग पैकेज तैयार कर रही है, जिससे 2028 तक खदान से उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।

बैरिक माइनिंग के सीईओ मार्क ब्रिस्टो के अनुसार, अमेरिकी सरकार, एशियाई विकास बैंक, अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (IFC), अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय विकास वित्त निगम, कनाडा, जापान और जर्मनी के वित्तीय संस्थान इस परियोजना में गहरी रुचि दिखा रहे हैं।

उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि अमेरिका के समर्थन से पाकिस्तान को कॉपर कॉन्सन्ट्रेट (तांबे का कच्चा रूप) तक पहुँच मिलेगी, हालाँकि इसके लिए अभी और प्रोसेसिंग की आवश्यकता है। यह परियोजना न केवल पाकिस्तान के आर्थिक भविष्य के लिए अहम मानी जा रही है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे वैश्विक ताकतें बलूचिस्तान जैसे संवेदनशील क्षेत्र में संसाधनों को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

बलूचिस्तान की सबसे बड़ी खनिज परियोजना

रेको दिक खदान को दुनिया की सबसे बड़ी और अब तक अविकसित तांबा-सोना परियोजनाओं में से एक माना जाता है। अनुमान है कि अगले 37 वर्षों के खनन काल में यह परियोजना लगभग 70 अरब डॉलर (5.81 लाख करोड़ रुपए) का फ्री कैश फ्लो (Free Cash Flow) और करीब 90 अरब डॉलर (7.47 लाख करोड़ रुपए) का कुल ऑपरेटिंग कैश फ्लो (Operating Cash Flow) उत्पन्न कर सकती है।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना की मालिकाना हिस्सेदारी तीन पक्षों के बीच साझा है। जिसमें कनाडा की बैरिक गोल्ड कंपनी, पाकिस्तान की संघीय सरकार और बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार शामिल है।
इसकी फंडिंग के लिए कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बातचीत चल रही है। इस साल की शुरुआत में टिम क्रिब ने बताया था कि रेको दिक परियोजना को अंतरराष्ट्रीय विकास संघ (IDA) और अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (IFC) से लगभग 650 मिलियन डॉलर (5,395 करोड़ रुपए) की सहायता मिलने की उम्मीद है।

वहीं, अमेरिकी निर्यात-आयात बैंक (US EXIM Bank) से 500 मिलियन से 1 अरब डॉलर (4,150 करोड़ रुपए से 8,300 करोड़ रुपए) तक की फंडिंग की संभावना जताई गई है। इसके अलावा, परियोजना जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल को ऑपरेशन, एक्सपोर्ट डेवलपमेंट कनाडा और एशियाई विकास बैंक जैसे अन्य वित्तीय संगठनों से भी 500 मिलियन डॉलर (4,150 करोड़ रुपए) की अतिरिक्त राशि जुटाने का प्रयास कर रही है।

यह परियोजना पाकिस्तान के आर्थिक विकास के लिए एक बड़ा अवसर मानी जा रही है और इसमें वैश्विक स्तर पर बढ़ती दिलचस्पी बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों की अहमियत को भी दिखाती है।

भारत के साथ टैरिफ युद्ध के बीच ट्रंप के करीब आने की कोशिश कर रहा पाक

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर टैरिफ वॉर छेड़ दिया है। इससे भारत-अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया है। इसी दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका और ट्रंप से नजदीकियाँ बढ़ा ली हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और असली ताकत रखने वाले सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने ट्रंप की खुलकर चमचागिरी की है, जिससे अमेरिका से उनके रिश्ते मजबूत हुए हैं।

पाकिस्तानी फौज समर्थित सरकार ने कई बार ट्रंप को इस ‘दावे’ के लिए धन्यवाद दिया है कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम (सीजफायर) समझौते में कोई भूमिका निभाई। हालाँकि, असलियत यह है कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान को सैन्य रूप से करारी हार दी थी। यह ऑपरेशन पाकिस्तान-प्रायोजित पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद किया गया था, जिसमें 26 लोग मारे गए थे।

इस शर्मनाक हार के बाद पाकिस्तान ने खुद भारत से संघर्षविराम की अपील की थी, जिसे भारत ने रणनीतिक रूप से मान लिया। इसके बाद से पाकिस्तान की फौज के प्रमुख असीम मुनीर दो बार अमेरिका का दौरा कर चुके हैं।

पाकिस्तान की खुशामदी नीति से प्रभावित होकर ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए लड़ रही बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और उसकी मजीद ब्रिगेड को ‘विदेशी आतंकी संगठन’ घोषित कर दिया है। इससे बलूच स्वतंत्रता सेनानियों को अब अमेरिका की नजर में आतंकवादी बताया गया है।

बलूचिस्तान में पाकिस्तान का विरोध

बलूचिस्तान, जो पाकिस्तान का सबसे उपेक्षित और शोषित प्रांत माना जाता है, लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और स्थानीय लोगों के दमन का शिकार रहा है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने वर्षों से पाकिस्तानी फौज, चीनी कर्मियों और चीन की उन परियोजनाओं पर हमले किए हैं, जो बलूच संसाधनों का दोहन करती हैं।
बलूच समुदाय का आरोप है कि पाकिस्तान और चीन मिलकर उनके खनिज और ऊर्जा संसाधनों का फायदा उठा रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों को उसका कोई लाभ नहीं मिलता। इस बीच, अमेरिका की भूमिका भी इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में पाकिस्तान के कथित विशाल तेल भंडार को संयुक्त रूप से विकसित करने के लिए एक नया व्यापार समझौता पेश किया था। यह ऐलान उस समय हुआ जब अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले सामान पर भारी टैरिफ और दंडात्मक शुल्क लगाने की घोषणा की थी।
ट्रम्प ने यहाँ तक कह दिया कि एक दिन पाकिस्तान भारत को तेल बेच सकता है। इसी दौरान अमेरिका ने BLA को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया, जो ट्रम्प के पाकिस्तान समर्थक रुख और बलूचिस्तान के खनिज संसाधनों में बढ़ती अमेरिकी दिलचस्पी को और भी संदिग्ध बना देता है। बलूच स्वतंत्रता सेनानियों ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत ग्वादर बंदरगाह में चीनी प्रभाव का लगातार विरोध किया है।
अब कनाडा की कंपनी बैरिक माइनिंग रेको डिक तांबा-सोना परियोजना के लिए 3.5 अरब डॉलर की फंडिंग जुटाने में लगी है, जिसमें अमेरिकी संस्थानों की भी भागीदारी है। इससे यह साफ झलकता है कि पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान के बहुमूल्य संसाधनों को डॉलर के बदले विदेशी कंपनियों को सौंप रही है, जबकि बलूच जनता दमन और हिंसा का शिकार बनी हुई है।
इतिहास गवाह है कि बलूचिस्तान से मिलने वाली गैस और बिजली हमेशा पंजाब और पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को दी जाती रही है, जबकि बलूच लोग खुद मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। अब विदेशी कंपनियाँ, जिनमें अमेरिकी समर्थन वाली कंपनियाँ भी शामिल हैं, बलूचिस्तान के खनिजों से अरबों का मुनाफा कमाएँगी। यह स्थिति इस ओर इशारा करती है कि बलूचिस्तान आने वाले समय में अमेरिका के लिए एक नया तेल युद्ध स्थल बन सकता है।