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क्रिकेट पर नासिर हुसैन की भारत से नफरत आई सामने, पाकिस्तान-बांग्लादेश के समर्थन में कर रही बैटिंग: ‘उम्माह’ के लिए BCCI-ICC को कोस रहा पूर्व ‘ब्रिटिश’ कैप्टन

                                            क्रिकेटर नासिर हुसैन (साभार-x@sarkarstix )
पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन का बयान क्रिकेट को जोड़ने के बजाय उसे और बाँटता हुआ दिख रहा है। ICC और BCCI पर सवाल उठाना एक बात है, लेकिन बहिष्कार और अव्यवस्था को पसंद करना क्रिकेट की भावना के खिलाफ है। नासिर हुसैन ने पाकिस्तान के 15 फरवरी को भारत के खिलाफ T20 वर्ल्ड कप मैच का बॉयकॉट करने के फैसले को सही कहा है, उसे वर्ल्ड क्रिकेट में ‘फेयरनेस’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्काई स्पोर्ट्स पॉडकास्ट के दौरान हुसैन ने सवाल किया कि अगर भारत ने सरकारी पाबंदियों या सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर कहीं खेलने से मना कर दिया होता, तो क्या ICC इतना ही सख्त रवैया अपनाता। उन्होंने टॉप बॉडी पर असरदार बोर्ड के आगे झुकने का आरोप लगाया, साथ ही बांग्लादेश और पाकिस्तान की ‘अपनी बात पर अड़े रहने’ की तारीफ की।

यह सब बयान बीसीसीआई और भारत को कटघड़े में खड़े करने के लिए थे, जबकि विवाद की जड़ में बांग्लादेश और पाकिस्तान का फैसला था।

हुसैन ने बांग्लादेश की भारत में नहीं खेलने के फैसले की तुलना चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान भारत के पाकिस्तान जाने से मना करने से कर दी। इससे भी उनकी मंशा समझ में आती है।

सबसे पहले, बात करते हैं बहस की अहम वजह बांग्लादेश की। बांग्लादेश को BCCI की मर्जी से T20 वर्ल्ड कप से बाहर नहीं किया गया था। ICC ने अपने सदस्यों की मीटिंग बुलाई थी। चौदह बोर्ड ने बांग्लादेश को शामिल करने के खिलाफ वोट किया। सिर्फ बांग्लादेश और पाकिस्तान की क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इसका समर्थन किया।

यह भारत का दबाव नहीं था, बल्कि यह दुनिया के ज़्यादातर क्रिकेट खेलने वाले देशों का बांग्लादेश को यह बताना था कि आप किसी ग्लोबल टूर्नामेंट से एक महीने पहले शेड्यूल और कॉन्ट्रैक्ट इस तरह नहीं तोड़ सकते। यह उम्मीद नहीं कर सकते कि बाकी सब इस गड़बड़ी को झेल लेंगे।

बांग्लादेश को अचानक भारत दौरे के दौरान सुरक्षा सताने लगी

जब KKR ने आम लोगों के विरोध को देखते हुए बांग्लादेशी बॉलर मुस्तफिजुर रहमान को अपनी टीम से बाहर निकाल दिया और उसका IPL कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया। इसके बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को अचानक भारत दौरे को लेकर ‘सिक्योरिटी की चिंता’ होने लगी। पहले ऐसा कोई डर नहीं था। टीम पहले भी भारत दौरे पर आ चुकी थी। कैलेंडर काफी पहले से पता था। घबराहट तभी सामने आई जब एक फ्रेंचाइजी का फैसला उन्हें पसंद नहीं आया।

नासिर हुसैन ने केकेआर के फैसले को बीसीसीआई का फैसला मान लिया। BCCI आईपीएल की KKR जैसी फ्रेंचाइजी नहीं चलाता। लीग ऑर्गनाइजर प्राइवेट मालिकों को खास खिलाड़ियों को साइन करने या बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं करते हैं, और न ही कर सकते हैं। फ्रेंचाइजी क्रिकेट का पूरा कमर्शियल लॉजिक यही है। अगर इन्वेस्टर्स को बताया जाए कि उन्हें किसे खरीदना है, तो मॉडल खत्म हो जाएगा। कोई भी सीरियस भारतीय बोली लगाने वाला ऐसी लीग में पैसा नहीं लगाएगा जहाँ खिलाड़ियों की पसंद नेशनैलिटी कोटा या पॉलिटिकल प्रेशर से तय होती हो। इसकी जानकारी तो नासिर हुसैन को होगी ही।

अगर बांग्लादेश को लगता कि उसके साथ गलत बर्ताव हो रहा है, तो उसके पास कई ऑप्शन थे, IPL से बात करना, अपने खिलाड़ियों को हिस्सा लेने से रोकना, या बोर्ड के जरिए बातचीत करना। इसके बजाय उसने टूर्नामेंट से कुछ हफ़्ते पहले ही ‘सिक्योरिटी की चिंताएँ’ खड़ी कर दीं, जिससे बहुत ज़्यादा दिक्कतें पैदा हो गईं।

ICC ने उसी तरह जवाब दिया जैसा कोई भी रेगुलेटर देता, उन नियमों और टाइमलाइन को लागू करके जिन पर सब पहले ही राज़ी हो चुके थे और स्कॉर्टलैंड को बांग्लादेश की जगह मौका देकर ये बता दिया कि सबकुछ ठीक है।

हुसैन ने सबसे बड़ी गलती बांग्लादेश के आखिरी मिनट में हटने की तुलना भारत के 2025 चैंपियंस ट्रॉफी के लिए पाकिस्तान जाने से मना करने से करके की हैं। वह लोगों को यह नहीं बताते हैं कि भारत ने ICC और PCB दोनों को महीनों पहले ही बता दी थी। वह अपने पॉडकास्ट के दौरान ये नहीं कहते कि भारत में आतंकवाद फैलाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ रहा है। भारत ने इसलिए पाकिस्तान में जाने से इनकार किया था।

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुआ आतंकी हमला इसका जीता जागता सबूत है। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भारतीय टूरिस्ट को गैर-मुस्लिम बताकर उन पर गोलियाँ चलाईं। ये घटना चैंपियंस ट्रॉफी खत्म होने के कुछ हफ़्ते बाद हुआ था। यह कोई पुराना इतिहास या एब्स्ट्रैक्ट जियोपॉलिटिक्स नहीं है।

इसके बावजूद, भारत ने एशिया कप में पाकिस्तान के खिलाफ अपने मैच खेले। BCCI आसानी से टूर्नामेंट से हट सकता था, लेकिन उसने पूरी तरह से एसोसिएट देशों के कमर्शियल फायदे के लिए खेला। बदले में उसे क्या मिला? पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का एक सिरफिरा चीफ, जो ट्रॉफी लेकर भाग गया। भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ नहीं मिलाया था और टीम ने पाकिस्तान के किसी सियासी व्यक्ति से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया। भारतीय खिलाड़ी चाहते थे कि उन्हें कोई दूसरा व्यक्ति ट्रॉफी दे, लेकिन पीसीबी चीफ अड़े रहे। नतीजा महीनों तक ट्रॉफी पाकिस्तान में पड़ा रहा।

बांग्लादेश को भारत से बॉर्डर पार से आतंक का सामना नहीं करना पड़ता। पाकिस्तान भारत में आतंकियों को भेजता है, हथियार भेजता है और अब नशे का अवैध कारोबार भी करता है। ऐसे में यह दिखाना कि ये एक जैसे हालात हैं, बेईमानी है।

क्या नासिर हुसैन को कई महीनों पहले सुरक्षा कारणों से भारत द्वारा पाकिस्तान में नहीं खेलने और आखिरी मिनट में पॉलिटिकल गुस्से की वजह से बांग्लादेश का टी20 से बाहर जाने के बीच का फर्क नहीं पता।

फिर भावनाओं और भावुकता के क्षण आते हैं। वे कहते हैं, “किसी समय, किसी को कहना चाहिए, बहुत हो गई यह पॉलिटिक्स, क्या हम वापस क्रिकेट खेलना शुरू कर सकते हैं?”

यह PCB नहीं था, जिसने सबके सामने ऐलान किया था कि पाकिस्तान 15 फरवरी को भारत के साथ नहीं खेलेगा। यह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ थे, जिन्होंने भारत के साथ मैच नहीं खेलने की बात कही। जब कोई सरकार का मुखिया खेल का बॉयकॉट करने का ऐलान करता है, तो राजनीति उन्हें नहीं दिखाई देती है।

बल्कि BCCI को ही खेल का राजनीतिकरण करने का आरोप लगा रहे नासिर हुसैन की सोच एकतरफा नजर आती है।

नासिर हुसैन ने खुलकर कहा, ‘मुझे अच्छा लगता है कि बांग्लादेश अपने खिलाड़ियों के लिए डटा रहा। मुझे यह भी पसंद है कि पाकिस्तान ने बांग्लादेश का समर्थन किया।’ यह सोच क्रिकेट भावना के विरुद्ध है। कोई क्रिकेटर वैश्विक आयोजन के बहिष्कार की तारीफ कैसे कर सकता है?

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन ने कहा, ‘सबको बस एक ही चीज चाहिए, निरंतरता। बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत के साथ एक जैसा व्यवहार होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘पावर के साथ जिम्मेदारी आती है।’ लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि अनुबंध तोड़ना, मैच न खेलना और अंतिम समय पर टूर्नामेंट में अमूक मैच नहीं खेलने का ऐलान करना किस तरह जिम्मेदारी है?

ICC पर यह आरोप लगाना कि यह BCCI का ही एक एक्सटेंशन है, पूरी सच्चाई से नजर फेरना है। फाइनेंशियल सच्चाई को नजरअंदाज करना है। दरअसल ICC के सबसे बड़े रेवेन्यू ड्राइवर इंडिया-सेंट्रिक ब्रॉडकास्ट डील हैं, खासकर इंडिया-पाकिस्तान मैच। उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा एसोसिएट और छोटे बोर्ड को रीडिस्ट्रिब्यूट किया जाता है।

जब पाकिस्तान मैचों का बॉयकॉट करता है या बांग्लादेश शेड्यूल बिगाड़ देता है, तो यह ‘इंडिया को नुकसान’ नहीं पहुँचा रहा है, यह उसी पूल को छोटा कर रहा है जो ग्लोबल क्रिकेट के कमज़ोर सदस्यों को सपोर्ट करता है। ठीक इसीलिए यह आइडिया कि ICC को लगातार कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने में शामिल होना चाहिए, बेतुका है। नियम किसी वजह से होते हैं। अगर आप हारते हैं, तो आपको पैसे देने पड़ते हैं। अगर आप एग्रीमेंट तोड़ते हैं, तो आपको नतीजे भुगतने पड़ते हैं। यह ‘BCCI कंट्रोल’ नहीं है, यह बेसिक गवर्नेंस है।

अगर पाकिस्तान को लगता है कि उसके पास इस सिस्टम के बाहर जिंदा रहने के लिए आर्थिक ताकत है, तो वह कोशिश करने के लिए आज़ाद है। वह एक पैरेलल बॉडी बना सकता है और दूसरों को भी इसमें शामिल होने के लिए मना सकता है। इसे मौजूदा स्ट्रक्चर को नुकसान पहुँचाने और खुद को पीड़ित दिखाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।

वर्ल्ड कप 2023, जब हुसैन की इंग्लिश टीम ने नहीं खेला था मैच

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन यह भी भूल गए कि उनके नेतृत्व में इंग्लैंड टीम ने राजनीतिक वजहों से जिम्बाब्वे में खेलने से मना कर दिया था। हालाँकि इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात हुसैन का अपना इतिहास है। 2003 के वर्ल्ड कप में, हुसैन की लीडरशिप वाली इंग्लैंड टीम ने जिम्बाब्वे के साथ खेलने से मना कर दिया था, क्योंकि वहाँ रॉबर्ट मुगाबे के शासन का विरोध हो रहा था। वहाँ इंग्लैंड की टीम को कोई सुरक्षा खतरा नहीं था। हुसैन ने उस फैसले का सपोर्ट किया।

उन्होंने ECB पर एक छोटे बोर्ड को धमकाने का आरोप नहीं लगाया। उन्होंने ICC की निरंतरता पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने यह शिकायत नहीं की कि क्रिकेट का राजनीतिकरण किया जा रहा है। इसके विपरीत उन्होंने बाद में कहा कि उन्हें अपने इस रवैये पर ‘गर्व’ है।

2009: हुसैन तब कहाँ थे, जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे को वीजा देने से मना कर दिया

साल 2009 में जिम्बाब्वे को T20 वर्ल्ड कप से आसानी से बाहर कर दिया गया और उसकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल कर लिया गया, जिसे ICC ने “विन-विन” सॉल्यूशन कहा। इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे के खिलाड़ियों को वीजा देने से मना कर दिया। फिर से, हुसैन ने ताकतवर बोर्ड्स के छोटी टीमों को कुचलने के बारे में कोई बात नहीं कही। ज़िम्मेदारी के बारे में कोई लेक्चर नहीं दिया। जिम्बाब्वे क्रिकेट को ‘कमजोर’ करने पर कोई आँसू नहीं बहाए। साफ़ है, खेल में पॉलिटिक्स तब ठीक है जब इंग्लैंड ऐसा करता है, लेकिन जब भारत नियमों का पालन करने पर जोर देता है, तो यह बहुत बुरा लगता है।

दरअसल हुसैन ने जो बातें कही वह ‘निरंतरता’ के बारे में नहीं है। यह पावर में बदलाव के बारे में है। वर्ल्ड क्रिकेट में सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी अब लॉर्ड्स या ECB नहीं है। यह BCCI है। यह सच्चाई एंग्लो कमेंट्री के एक खास हिस्से को परेशान करती है, जो तब पूरी तरह से सहज था जब ‘सिद्धांत’ इंग्लिश हितों के साथ जुड़े होते थे और जब वे नहीं होते थे तो काफ़ी लचीला था।

क्रिकेट कभी भी पॉलिटिकल वैक्यूम में नहीं रहा। 2003 में भी नहीं था। 2009 में भी नहीं था। आज भी नहीं है। फ़र्क यह है कि अब, भारत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह दूसरे बोर्ड के पॉलिटिकल नाटकों का खर्च चुपचाप उठाए। ICC को अपने कॉन्ट्रैक्ट लागू करने चाहिए। BCCI को अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए। और पाकिस्तान और बांग्लादेश को यह तय करना चाहिए कि वे नियमों पर आधारित सिस्टम का हिस्सा बनना चाहते हैं या नहीं।

जहाँ तक ​​नासिर हुसैन की बात है, तो ‘कंसिस्टेंसी’ के लिए उनका अचानक आया जुनून ज़्यादा असरदार होगा अगर वे इसे अपने रिकॉर्ड पर लागू करें। जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे का बॉयकॉट किया, तो पॉलिटिक्स और खेल टकराए थे। जब पाकिस्तान अपनी सरकार के कहने पर भारत के साथ खेलने का बॉयकॉट करता है, तो अचानक उनकी भाषा बदल जाती है और सारा दोष BCCI पर डालते हैं कि है इसने क्रिकेट को खराब कर दिया है। यह सिद्धांत नहीं है, यह क्रिकेट पर कंट्रोल खोने का गुस्सा है।

नेपाल फिर से बनेगा हिंदू राष्ट्र? वामपंथी भी मिला रहे नेपाली कांग्रेस के सुर में सुर, राष्ट्रपति से लेकर PM तक इसके पक्षधर

          नेपाल को हिंदू राष्ट्र घोषित कराने के लिए पूर्व में भी हुए हैं प्रदर्शन (फोटो साभार: hinduexistence.org/)
अयोध्या में जीणोद्धार हुए राम मन्दिर के शिलान्यास होने पर लिखा था कि राम मन्दिर केवल अयोध्या अथवा भारत में बदलाव नहीं लाएगा, बल्कि समूचे विश्व के भूगोल को बदलने में मार्गदर्शक होगा। प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं, विश्व देख रहा है। राम मन्दिर उद्घाटन को लगभग समूचे विश्व ने लाइव देखा। और अब 
तो अबुधाबी में भी मन्दिर बनने से भारत ने विश्व गुरु बनने की ओर कदम बढ़ा दिया। जिसे नेपाल भी चरितार्थ करने को लालायित है। 

नेपाल को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की माँग एक बार फिर से जोरों पर है। इसके लिए वहाँ ललितपुर के गोदावरी में सोमवार (19 फरवरी 2024) को महासमिति की बैठक भी होना शुरू हो गई है। इस बैठक का नेतृत्व नेपाली कांग्रेस के सांसद व केंद्रीय समिति के सदस्य शंकर भंडारी द्वारा किया जा रहा है। बैठक में इस बात पर चर्चा हो रही है कि किस तरीके से नेपाल को दोबारा से ‘वैदिक सनातन हिंदू राष्ट्र’ का दर्जा दिलाया जा सकता है।

द काठमांडू की रिपोर्ट के अनुसार, इस संबंध में नेपाल की 22 केंद्रीय कार्य समितियों ने बीते शुक्रवार (16 फरवरी 2024) को हिंदू राष्ट्र बनाने की माँग को पार्टी के आगे उठाया था। इसके बाद 17 फरवरी को इस अभियान को 4 पृष्ठ डोजियर के साथ पब्लिक किया गया। भंडारी ने नेपाली कांग्रेस के नेताओं से इस मुद्दे को उठाने के लिए समर्थन माँगा।

उन्होंने कहा, “हम पार्टी के नेतृत्व पर इस मुद्दे को उठाने का दबाव बनाएँगे। पार्टी अध्यक्ष शेर बहादुर देबा ने इस मुद्दे को सकारात्मक ढंग से लिया है। उनके अलावा सीपीएम-यूएमएल और सीपीएन के नेता भी इस अभियान में साथ देने को तैयार हैं।” नेपाली कांग्रेस सांसद ने कहा कि ये सिर्फ एक अभियान नहीं है। ये राष्ट्र निर्माण के लिए अहम अभियान है।

एक तरफ जहाँ कहा जा रहा है कि नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए कई राजनेता एक साथ खड़े हो रहे हैं। वहीं ये भी जानकारी है कि कुछ कांग्रेस नेता इस मुद्दे से सहमत नहीं है। शुक्रवार को पार्टी की कार्यकारी समिति की बैठक में इस मुद्दे को नकार दिया गया था।

नेपाली कांग्रेस नेता भंडारी ने कहा कि वो अन्य पार्टियों और समुदायों के साथ मिलकर भी इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे। वहीं पूर्व मंत्री व नेपाली कांग्रेस नेता देवेंद्र राज कादेल ने कहा कि हिंदू राष्ट्र की बहाली के लिए नेपाली कांग्रेस को अभियान चलाना चाहिए। उनकी सहमति के बिना ये नहीं हो पाएगा। नेपाली कांग्रेस ो अपना संयम नहीं खोना चाहिए, क्योकि अड़चन उन नेताओं के कारण से नेपाल सनातन से विमुख हुआ था, उन्हें कुछ समस्या तो जरूर आएगी। 

कादेल ने कहा कि अगर नेपाली कांग्रेस माँग मानने को तैयार होती है तो अन्य पार्टियों से भी बात की जाएगी। अगर ज्यादातर सभी इस पर राजी होंगे तो फिर संविधान में संशोधन का मार्ग प्रशस्त होगा। एक बार जब हम आधारशिला रख दी गई तो अच्छे राष्ट्र का निर्माण तो होगा ही।

जानकारी के लिए बता दें कि इससे पूर्व एक महासमिति की बैठक दिसंबर 2018 में हुई थी। उस समय 700 महासमिति के सदस्यों ने हिंदू राष्ट्र के लिए सहमति दी थी। लेकिन फिर भी कुछ नहीं हुआ। इस बार नेपाली कॉन्ग्रेस के नियुक्त प्रतिनिधि महासमिति बैठक में भाग ले रहे हैं और देश की राजनीति, नीति, पार्टी संगठन समेत कई समसामायिक मुद्दों पर चर्चा होगी और हिंदू राष्ट्र का मुद्दा उठेगा।

भंडारी का कहना है कि आज के समय में जनता वर्तमान स्थिति से त्रस्त है, इसलिए हिंदू राष्ट्र का जो मुद्दा उठा है उस पर विचार होना जरूरी है। उनके मुताबिक वामपंथी नेता तो धर्म आदि पर बात ही नहीं करते लेकिन बात राष्ट्र की है तो वो भी साथ देने को तैयार हैं।

28 मई, 2008 को नेपाल आधिकारिक तौर पर एक गणतंत्र बनाया गया था। उस दिन नेपाल की संविधान सभा की पहली बैठक हुई थी। उसके बाद बाद राजाओं को शासन खत्म हो गया। हालाँकि अब एक बार फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश की जा रही है और इसे राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी कदम भी बताया जा रहा है।

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में तो सूत्रों के हवाले से कहा गया कि भले ही नेपाल एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है, फिर भी उसे अपने हिंदू वंश पर गर्व है। वास्तव में, नेपाल में वर्तमान नेतृत्व – प्रधान मंत्रीपुष्पा कमला दहल और राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल भी चाहते हैं कि हिंदू राज्य की इस बहाली पर बहस हो।

भारत में इस्लामी शासन लाओ: PFI एजेंडा-कैसे कर रहा काम, रिपोर्ट में दावा- एजेंसियों ने सरकार को सब कुछ बताया

                                                                       साभार HT 
पिछले दिनों खबर आई थी कि केंद्र की मोदी सरकार विवादास्पद संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है। अब एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि विभिन्न खुफिया एवं जाँच एजेंसियों ने इस संगठन की गतिविधियों का ब्यौरा सरकार को दिया है। इसमें कट्टरपंथी संगठन के एजेंडे और काम करने के तरीकों के बारे में विस्तार से बताया गया है।

News18 ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि इस इस्लामी संगठन को लेकर एक रिपोर्ट मार्च में सरकार के साथ एजेंसियों ने साझा की है। इसमें बताया गया है कि PFI का एक छिपा हुआ एजेंडा है। उसका मकसद भारत में इस्लामी शासन स्थापित करना है। वह मुस्लिमों को कट्टरपंथी बना रहा है। साथ है ऐसे मामले जो मुस्लिमों एवं अन्य समुदायों से जुड़े हों उनको सांप्रदायिक रंग देता है। 

विभिन्न खुफिया और जाँच एजेंसियों ने 2017 से 2022 तक विभिन्न राज्यों और एजेंसियों द्वारा दायर की गई खुफिया रिपोर्टों, अदालती फैसलों, पीएफआई के खिलाफ राज्य के निष्कर्षों और डोजियर का विश्लेषण करने के बाद कई रिपोर्ट तैयार की हैं जो हाल ही में भारत सरकार को भेजी गई हैं। हाल ही में प्रस्तुत एक विस्तृत रिपोर्ट को 11 भागों में बाँटा गया है, जिसमें PFI की विचारधारा, लीडरशिप, वैश्विक आतंकी संगठनों के साथ संबंध, कट्टरपंथी गतिविधि, संगठन, फंडिंग और इसके कैडरों के खिलाफ अदालती आदेश शामिल हैं।

News18 ने दस्तावेजों के हवाले से कहा है कि सरकार को बताया गया है कि PFI का कट्टर सांप्रदायिक और राष्ट्र विरोधी एजेंडा है। संगठन के हिंसक/कट्टरपंथी गतिविधियों में शामिल होने के कई मामले सामने आए हैं। PFI कार्यकर्ता हिंदुवादियों की हत्या और उन पर हमलों में शामिल रहे हैं। एक जाँच एजेंसी ने बताया कि इस संगठन की विचारधारा का लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद की अवधारणाओं को कमजोर करने वाला है। एजेंसियों का कहना है कि PFI की राजनीतिक शाखा का तौर पर सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) काम कर रही है। उसने चुनाव लड़ने के लिए रजिस्ट्रेशन भी करवाया है। इसके अलावा PFI द्वारा नियंत्रित कई अन्य ईकाई हैं जो धर्मांतरण, फंड कलेक्शन आदि में सक्रिय हैं।

एक खुफिया एजेंसी ने पीएफआई की गतिविधि के बारे में विवरण देते हुए बताया है , “कुछ PFI कार्यकर्ता ISIS/ISKP जैसे आतंकवादी समूहों में शामिल होने के लिए जाने जाते हैं। संगठन ‘जकात’ के नाम पर प्रवासी मुस्लिमों से फंड लेता है और इसका इस्तेमाल मस्जिदों के निर्माण, मदरसों को चलाने और अन्य कट्टरपंथी एवं आपराधिक गतिविधियों के वित्तपोषण के लिए किया जाता है।”

इसके अलावा एजेंसी ने सितंबर 2021 में अतिक्रमणकारियों के खिलाफ अभियान के दौरान असम के दरांग जिले में हिंसा भड़काने में संगठन की भूमिका के साथ ही नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध और उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों में इसकी संभावित भूमिका का भी जिक्र किया है। इसके अलावा दस्तावेज में PFI द्वारा की गई आपराधिक गतिविधियों या हत्याओं के लगभग 30 उदाहरण दिए गए हैं, जिसमें पिछले साल नवंबर में RSS कार्यकर्ता संजीत की हत्या और पिछले साल दिसंबर में केरल में BJP कार्यकर्ता रंजीत श्रीनिवासन की हत्या भी शामिल है।

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सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार ऐसा लगता है मानो जैसे-जैसे समय बीत रहा है, CAA-NRC का विरोध अब शाहीन बाग़ से होते हुए अपने असल....

इससे पहले खबर आई थी कि केंद्र सरकार जल्द ही पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया पर प्रतिबंध लगा सकती है। बताया गया था कि प्रतिबंध की तैयारी पूरी कर ली गई है और जल्द ही इसको लेकर एक नोटिफिकेशन जारी किया जा सकता है। हालाँकि उसके बाद 18 अप्रैल 2022 को गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि इस इस्लामी संगठन प्रतिबंध लगाने के बैठक किए जाने की मीडिया रिपोर्ट सही नहीं है। मंत्रालय ने इस तरह की किसी भी बैठक से इनकार किया था।