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शोएब अख्तर ने ऑन कैमरा मोहसिन नकवी को लताड़ा : ‘जाहिल, अयोग्य और बेकार’: T-20 में भारत से मिली हार के बाद PAK टीम को पाकिस्तानियों ने ही रगड़ा


ICC टी-20 वर्ल्ड कप में भारत ने एक बार फिर बड़े मुकाबले में अपनी श्रेष्ठता साबित करते हुए पाकिस्तान को 61 रन से करारी शिकस्त दी और सुपर 8 में अपनी जगह पक्की कर ली। कोलंबो में खेले गए इस हाई-वोल्टेज मैच में भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवर में 7 विकेट के नुकसान पर 175 रन बनाए। जवाब में पाकिस्तान की पूरी टीम 18 ओवर में 114 रन पर सिमट गई।

मैन ऑफ द मैच ईशान किशन ने 40 गेंदों पर 77 रन की विस्फोटक पारी खेली। उनकी पारी में 10 चौके और 3 छक्के शामिल रहे। उन्होंने स्पिनरों के खिलाफ आक्रामक बल्लेबाज़ी की और रन गति को लगातार बढ़ाया। बाद में पाकिस्तान टीम जब पिच पर बैटिंग करने उतरी तो कुछ ही ओवरों में पता चल गया कि मैच के परिणाम क्या होने वाले हैं।

पाकिस्तान टीम की दुर्दशा के लिए खिलाडी नहीं पाकिस्तान सरकार जिम्मेदार है। U-19 में भारत के हाथों मिली हार के बाद प्रधानमंत्री शाहबाज़ द्वारा टूर्नामेंट का बहिष्कार करने ने टीम का मनोबल ही तोड़ दिया था। लेकिन ICC के सख्त रवैये की वजह से हाँ-ना में भारत के विरुद्ध खेलने के फैसले से टीम मझधार में रही। 

टी20 वर्ल्ड कप 2026 में भारत के हाथों पाकिस्तान की शर्मनाक हार के बीच कोलंबो के स्टेडियम से एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने सोशल मीडिया पर विवाद और मजाक का नया दौर शुरू कर दिया है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के अध्यक्ष और एशिया कप की ट्रॉफी चुराने वाले मोहसिन नकवी मैच खत्म होने से पहले ही स्टेडियम छोड़कर भाग निकले। उनसे पाकिस्तान की हार देखी नहीं गई।

जब भारतीय गेंदबाजों ने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी और 12वें ओवर में मोहम्मद नवाज का विकेट गिरा, तब पाकिस्तान का स्कोर 77/5 था। जीत की उम्मीद खत्म होते देख मोहसिन नकवी वीवीआईपी बॉक्स से उठकर सीधे अपनी गाड़ी की ओर भागते दिखे। पीटीआई द्वारा जारी वीडियो में उन्हें मैच खत्म होने से काफी पहले स्टेडियम के बाहर जाते देखा गया। सोशल मीडिया पर फैंस ने इसे हार के डर से भागना करार दिया है। 

पूर्व क्रिकेटरों ने दी बधाई, इरफान पठान ने डांस कर पूछा- पड़ोसियों, संडे कैसा रहा?

भारत की जीत के बाद देशभर में जश्न का माहौल रहा। सोशल मीडिया पर भी इस जीत को लेकर उत्साह देखने को मिला। भारतीय क्रिकेट जगत के पुराने खिलाड़ियों ने भी जीत के लिए टीम के खिलाड़ियों के बेहद अलग अंदाज में बधाई दी।

पूर्व भारतीय क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने टीम इंडिया को जीत की बधाई देते हुए X पर लिखा, “ईशान किशन असली धुरंधर की तरह खेले। सभी छोटी टीमों में से पाकिस्तान को हराना भारत के लिए सबसे आसान लग रहा था क्योंकि T-20 क्रिकेट में उनका 17वीं सदी का अप्रोच था और उन्हें हमेशा की तरह अच्छी हार मिली। पूरी कंबल कुट्टई।”

इसी तरह मास्टर-ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने लिखा, “पावरप्ले में भारत ने मैच अपने हाथ से छीन लिया। पहली इनिंग में ईशान किशन की बॉलिंग और दूसरी इनिंग में हमने जो जबरदस्त बॉलिंग देखी, उससे सारा फर्क पड़ा। हम हमेशा ड्राइवर सीट पर थे। आज रात भारत ने धमाल मचा दिया।”

पूर्व भारतीय ऑलराउंडर इरफान पठान का एक खास वीडियो तो इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान की हार पर चुटकी ली है। मैच खत्म होते ही इरफान पठान ने इंस्टाग्राम पर अपना एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें वह मशहूर गाने ‘अफगान जलेबी’ पर थिरकते नजर आ रहे हैं। वीडियो के कैप्शन में लिखा, “पड़ोसियों, संडे कैसा रहा?”  

क्रिकेटर युवराज सिंह ने X पर लिखा, “बड़े गेम में बड़े कैरेक्टर की जरूरत होती है और लड़कों ने आज रात वही दिखाया! शांत दिमाग और मजबूती से खत्म करने की भूख एक यूनिट के तौर पर हमने जिस तरह से परफॉर्म किया, उस पर गर्व है! आगे बढ़ते रहो और ऊपर उठते रहो।”

भारत के अलावा बलूचिस्तान में भी लोगों ने डांस करते हुए भारतीय टीम की जीत का जश्न मनाया। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है।

मोहसिन नकवी पर भड़के शोएब अख्तर

दूसरी ओर पाकिस्तान में निराशा स्पष्ट थी। पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर ने पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के चेयरमैन मोहसिन की आलोचना करते हुए प्रशासनिक ढाँचे पर सवाल उठाए। उनका मानना था कि क्रिकेट की समझ रखने वाले लोगों को शीर्ष पदों पर होना चाहिए, तभी टीम का प्रदर्शन सुधर सकता है।
गुस्से में शोएब अख्तर ने नकवी को जाहिल और पद के लिए अयोग्य तक बताया। उन्होंने भारतीय न्यूज चैनलों से बात करते हुए अपना रोष प्रकट किया। उन्होंने कप्तान बाबर आजम के प्रदर्शन पर भी टिप्पणी की और टीम चयन व नेतृत्व को लेकर नाराजगी जाहिर की।
एबीपी न्यूज पर बात करते हुए अख्तर ने माना है कि क्रिकेट नहीं जानते, PCB के चेयरमैन बन गए हैं, इस कारण पाकिस्तान टीम का यह हाल हो रहा है। शोएब अख्तर ने कहा, “एक आदमी जिसे कुछ नहीं पता, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का चेयरमैन (मोहसिन नकवी) बन गया है, आप क्या कर सकते हैं? टीम कैसे चलेगी? आपने एक ऐसे खिलाड़ी (बाबर आजम) को सुपरस्टार बना दिया है जो आपको एक भी मैच नहीं जिता सकता। दुनिया का सबसे बड़ा गुनाह है नाकाबिल और जाहील आदमी को बड़ा काम देना।”

पाकिस्तानी फैन्स की उम्मीदें टूटीं, विराट कोहली जैसे कप्तान की रखी माँग

पाकिस्तानी समर्थकों में भी गहरी निराशा दिखी। कई प्रशंसकों ने टीम की रणनीति, तैयारी और मानसिक मजबूती पर सवाल उठाए। कुछ ने भारतीय टीम की तारीफ करते हुए स्वीकार किया कि मौजूदा समय में भारत हर विभाग में बेहतर दिख रहा है।
फैन्स का मानना है कि टीम को राजनीति और आंतरिक विवादों से दूर रहकर पेशेवर तैयारी पर ध्यान देना होगा। तेज गेंदबाजी और ऑलराउंड प्रदर्शन के सामने पाकिस्तान के बल्लेबाजों की कमजोरी उजागर हुई।
एक ने कहा, “एकतरफा मैच था, अगर पाकिस्तान की अवाम बाबर आजम को किंग समझती है, तो उन्हें किंग की तरह बनना चाहिए, उन्हें विराट कोहली जैसा बनना चाहिए। विराट कोहली अगर आजम की जगह होते तो यह मैच इंडिया को आसानी से जिता देते। बाबर आजम किंग नहीं हैं और टीम में जगह पाने के लायक नहीं हैं। यह कोई टीम नहीं है, बस इधर-उधर से आए कुछ खिलाड़ियों का जमावड़ा है।”
एक मकबूल नाम के फैन ने कहा, “मुझे थोड़ी उम्मीद थी कि हम मैच जीतेंगे और कम से कम कड़ी टक्कर देंगे। लेकिन यह तो एक आम बात हो गई है। हमारे पास बुमराह का कोई जवाब नहीं है। हम हार्दिक का सामना नहीं कर सकते। यही हाल है। हमेशा की तरह, टीम इंडिया ने शानदार प्रदर्शन किया। अगर इसी तरह का प्रदर्शन जारी रहा, तो हम भारत को नहीं हरा सकते। भारतीय टीम बहुत अच्छी है। और हम इस बात को स्वीकार करते हैं।”

बुरी तरह हारने का पाकिस्तान का रहा है इतिहास

गौरतलब है कि T20 वर्ल्ड Cup के इतिहास में भारत और पाकिस्तान के मैच हमेशा खास रहे हैं, हर बार पाकिस्तान का दावा रहता है कि वो पूरी तैयारी के साथ हैं, लेकिन हर बार उन्हें फजीहत झेलनी पड़ती है। अब तक दोनों टीमों के बीच कुल 9 मुकाबले खेले गए हैं, जिनमें से भारत ने 8 में जीत दर्ज की है।
इनमें एक मुकाबला ऐसा भी रहा, जिसमें परिणाम सुपर ओवर से तय हुआ और वहाँ भी भारत ने दबाव में बेहतर प्रदर्शन करते हुए बाज़ी अपने नाम की। यह दर्शाता है कि करीबी परिस्थितियों में भी भारतीय टीम मानसिक मजबूती और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने में सफल रही है। दूसरी ओर, पाकिस्तान को इस टूर्नामेंट में भारत के खिलाफ केवल एक जीत हासिल हुई है-वह भी 2021 में।

क्रिकेट पर नासिर हुसैन की भारत से नफरत आई सामने, पाकिस्तान-बांग्लादेश के समर्थन में कर रही बैटिंग: ‘उम्माह’ के लिए BCCI-ICC को कोस रहा पूर्व ‘ब्रिटिश’ कैप्टन

                                            क्रिकेटर नासिर हुसैन (साभार-x@sarkarstix )
पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन का बयान क्रिकेट को जोड़ने के बजाय उसे और बाँटता हुआ दिख रहा है। ICC और BCCI पर सवाल उठाना एक बात है, लेकिन बहिष्कार और अव्यवस्था को पसंद करना क्रिकेट की भावना के खिलाफ है। नासिर हुसैन ने पाकिस्तान के 15 फरवरी को भारत के खिलाफ T20 वर्ल्ड कप मैच का बॉयकॉट करने के फैसले को सही कहा है, उसे वर्ल्ड क्रिकेट में ‘फेयरनेस’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्काई स्पोर्ट्स पॉडकास्ट के दौरान हुसैन ने सवाल किया कि अगर भारत ने सरकारी पाबंदियों या सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर कहीं खेलने से मना कर दिया होता, तो क्या ICC इतना ही सख्त रवैया अपनाता। उन्होंने टॉप बॉडी पर असरदार बोर्ड के आगे झुकने का आरोप लगाया, साथ ही बांग्लादेश और पाकिस्तान की ‘अपनी बात पर अड़े रहने’ की तारीफ की।

यह सब बयान बीसीसीआई और भारत को कटघड़े में खड़े करने के लिए थे, जबकि विवाद की जड़ में बांग्लादेश और पाकिस्तान का फैसला था।

हुसैन ने बांग्लादेश की भारत में नहीं खेलने के फैसले की तुलना चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान भारत के पाकिस्तान जाने से मना करने से कर दी। इससे भी उनकी मंशा समझ में आती है।

सबसे पहले, बात करते हैं बहस की अहम वजह बांग्लादेश की। बांग्लादेश को BCCI की मर्जी से T20 वर्ल्ड कप से बाहर नहीं किया गया था। ICC ने अपने सदस्यों की मीटिंग बुलाई थी। चौदह बोर्ड ने बांग्लादेश को शामिल करने के खिलाफ वोट किया। सिर्फ बांग्लादेश और पाकिस्तान की क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इसका समर्थन किया।

यह भारत का दबाव नहीं था, बल्कि यह दुनिया के ज़्यादातर क्रिकेट खेलने वाले देशों का बांग्लादेश को यह बताना था कि आप किसी ग्लोबल टूर्नामेंट से एक महीने पहले शेड्यूल और कॉन्ट्रैक्ट इस तरह नहीं तोड़ सकते। यह उम्मीद नहीं कर सकते कि बाकी सब इस गड़बड़ी को झेल लेंगे।

बांग्लादेश को अचानक भारत दौरे के दौरान सुरक्षा सताने लगी

जब KKR ने आम लोगों के विरोध को देखते हुए बांग्लादेशी बॉलर मुस्तफिजुर रहमान को अपनी टीम से बाहर निकाल दिया और उसका IPL कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया। इसके बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को अचानक भारत दौरे को लेकर ‘सिक्योरिटी की चिंता’ होने लगी। पहले ऐसा कोई डर नहीं था। टीम पहले भी भारत दौरे पर आ चुकी थी। कैलेंडर काफी पहले से पता था। घबराहट तभी सामने आई जब एक फ्रेंचाइजी का फैसला उन्हें पसंद नहीं आया।

नासिर हुसैन ने केकेआर के फैसले को बीसीसीआई का फैसला मान लिया। BCCI आईपीएल की KKR जैसी फ्रेंचाइजी नहीं चलाता। लीग ऑर्गनाइजर प्राइवेट मालिकों को खास खिलाड़ियों को साइन करने या बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं करते हैं, और न ही कर सकते हैं। फ्रेंचाइजी क्रिकेट का पूरा कमर्शियल लॉजिक यही है। अगर इन्वेस्टर्स को बताया जाए कि उन्हें किसे खरीदना है, तो मॉडल खत्म हो जाएगा। कोई भी सीरियस भारतीय बोली लगाने वाला ऐसी लीग में पैसा नहीं लगाएगा जहाँ खिलाड़ियों की पसंद नेशनैलिटी कोटा या पॉलिटिकल प्रेशर से तय होती हो। इसकी जानकारी तो नासिर हुसैन को होगी ही।

अगर बांग्लादेश को लगता कि उसके साथ गलत बर्ताव हो रहा है, तो उसके पास कई ऑप्शन थे, IPL से बात करना, अपने खिलाड़ियों को हिस्सा लेने से रोकना, या बोर्ड के जरिए बातचीत करना। इसके बजाय उसने टूर्नामेंट से कुछ हफ़्ते पहले ही ‘सिक्योरिटी की चिंताएँ’ खड़ी कर दीं, जिससे बहुत ज़्यादा दिक्कतें पैदा हो गईं।

ICC ने उसी तरह जवाब दिया जैसा कोई भी रेगुलेटर देता, उन नियमों और टाइमलाइन को लागू करके जिन पर सब पहले ही राज़ी हो चुके थे और स्कॉर्टलैंड को बांग्लादेश की जगह मौका देकर ये बता दिया कि सबकुछ ठीक है।

हुसैन ने सबसे बड़ी गलती बांग्लादेश के आखिरी मिनट में हटने की तुलना भारत के 2025 चैंपियंस ट्रॉफी के लिए पाकिस्तान जाने से मना करने से करके की हैं। वह लोगों को यह नहीं बताते हैं कि भारत ने ICC और PCB दोनों को महीनों पहले ही बता दी थी। वह अपने पॉडकास्ट के दौरान ये नहीं कहते कि भारत में आतंकवाद फैलाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ रहा है। भारत ने इसलिए पाकिस्तान में जाने से इनकार किया था।

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुआ आतंकी हमला इसका जीता जागता सबूत है। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भारतीय टूरिस्ट को गैर-मुस्लिम बताकर उन पर गोलियाँ चलाईं। ये घटना चैंपियंस ट्रॉफी खत्म होने के कुछ हफ़्ते बाद हुआ था। यह कोई पुराना इतिहास या एब्स्ट्रैक्ट जियोपॉलिटिक्स नहीं है।

इसके बावजूद, भारत ने एशिया कप में पाकिस्तान के खिलाफ अपने मैच खेले। BCCI आसानी से टूर्नामेंट से हट सकता था, लेकिन उसने पूरी तरह से एसोसिएट देशों के कमर्शियल फायदे के लिए खेला। बदले में उसे क्या मिला? पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का एक सिरफिरा चीफ, जो ट्रॉफी लेकर भाग गया। भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ नहीं मिलाया था और टीम ने पाकिस्तान के किसी सियासी व्यक्ति से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया। भारतीय खिलाड़ी चाहते थे कि उन्हें कोई दूसरा व्यक्ति ट्रॉफी दे, लेकिन पीसीबी चीफ अड़े रहे। नतीजा महीनों तक ट्रॉफी पाकिस्तान में पड़ा रहा।

बांग्लादेश को भारत से बॉर्डर पार से आतंक का सामना नहीं करना पड़ता। पाकिस्तान भारत में आतंकियों को भेजता है, हथियार भेजता है और अब नशे का अवैध कारोबार भी करता है। ऐसे में यह दिखाना कि ये एक जैसे हालात हैं, बेईमानी है।

क्या नासिर हुसैन को कई महीनों पहले सुरक्षा कारणों से भारत द्वारा पाकिस्तान में नहीं खेलने और आखिरी मिनट में पॉलिटिकल गुस्से की वजह से बांग्लादेश का टी20 से बाहर जाने के बीच का फर्क नहीं पता।

फिर भावनाओं और भावुकता के क्षण आते हैं। वे कहते हैं, “किसी समय, किसी को कहना चाहिए, बहुत हो गई यह पॉलिटिक्स, क्या हम वापस क्रिकेट खेलना शुरू कर सकते हैं?”

यह PCB नहीं था, जिसने सबके सामने ऐलान किया था कि पाकिस्तान 15 फरवरी को भारत के साथ नहीं खेलेगा। यह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ थे, जिन्होंने भारत के साथ मैच नहीं खेलने की बात कही। जब कोई सरकार का मुखिया खेल का बॉयकॉट करने का ऐलान करता है, तो राजनीति उन्हें नहीं दिखाई देती है।

बल्कि BCCI को ही खेल का राजनीतिकरण करने का आरोप लगा रहे नासिर हुसैन की सोच एकतरफा नजर आती है।

नासिर हुसैन ने खुलकर कहा, ‘मुझे अच्छा लगता है कि बांग्लादेश अपने खिलाड़ियों के लिए डटा रहा। मुझे यह भी पसंद है कि पाकिस्तान ने बांग्लादेश का समर्थन किया।’ यह सोच क्रिकेट भावना के विरुद्ध है। कोई क्रिकेटर वैश्विक आयोजन के बहिष्कार की तारीफ कैसे कर सकता है?

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन ने कहा, ‘सबको बस एक ही चीज चाहिए, निरंतरता। बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत के साथ एक जैसा व्यवहार होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘पावर के साथ जिम्मेदारी आती है।’ लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि अनुबंध तोड़ना, मैच न खेलना और अंतिम समय पर टूर्नामेंट में अमूक मैच नहीं खेलने का ऐलान करना किस तरह जिम्मेदारी है?

ICC पर यह आरोप लगाना कि यह BCCI का ही एक एक्सटेंशन है, पूरी सच्चाई से नजर फेरना है। फाइनेंशियल सच्चाई को नजरअंदाज करना है। दरअसल ICC के सबसे बड़े रेवेन्यू ड्राइवर इंडिया-सेंट्रिक ब्रॉडकास्ट डील हैं, खासकर इंडिया-पाकिस्तान मैच। उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा एसोसिएट और छोटे बोर्ड को रीडिस्ट्रिब्यूट किया जाता है।

जब पाकिस्तान मैचों का बॉयकॉट करता है या बांग्लादेश शेड्यूल बिगाड़ देता है, तो यह ‘इंडिया को नुकसान’ नहीं पहुँचा रहा है, यह उसी पूल को छोटा कर रहा है जो ग्लोबल क्रिकेट के कमज़ोर सदस्यों को सपोर्ट करता है। ठीक इसीलिए यह आइडिया कि ICC को लगातार कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने में शामिल होना चाहिए, बेतुका है। नियम किसी वजह से होते हैं। अगर आप हारते हैं, तो आपको पैसे देने पड़ते हैं। अगर आप एग्रीमेंट तोड़ते हैं, तो आपको नतीजे भुगतने पड़ते हैं। यह ‘BCCI कंट्रोल’ नहीं है, यह बेसिक गवर्नेंस है।

अगर पाकिस्तान को लगता है कि उसके पास इस सिस्टम के बाहर जिंदा रहने के लिए आर्थिक ताकत है, तो वह कोशिश करने के लिए आज़ाद है। वह एक पैरेलल बॉडी बना सकता है और दूसरों को भी इसमें शामिल होने के लिए मना सकता है। इसे मौजूदा स्ट्रक्चर को नुकसान पहुँचाने और खुद को पीड़ित दिखाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।

वर्ल्ड कप 2023, जब हुसैन की इंग्लिश टीम ने नहीं खेला था मैच

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन यह भी भूल गए कि उनके नेतृत्व में इंग्लैंड टीम ने राजनीतिक वजहों से जिम्बाब्वे में खेलने से मना कर दिया था। हालाँकि इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात हुसैन का अपना इतिहास है। 2003 के वर्ल्ड कप में, हुसैन की लीडरशिप वाली इंग्लैंड टीम ने जिम्बाब्वे के साथ खेलने से मना कर दिया था, क्योंकि वहाँ रॉबर्ट मुगाबे के शासन का विरोध हो रहा था। वहाँ इंग्लैंड की टीम को कोई सुरक्षा खतरा नहीं था। हुसैन ने उस फैसले का सपोर्ट किया।

उन्होंने ECB पर एक छोटे बोर्ड को धमकाने का आरोप नहीं लगाया। उन्होंने ICC की निरंतरता पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने यह शिकायत नहीं की कि क्रिकेट का राजनीतिकरण किया जा रहा है। इसके विपरीत उन्होंने बाद में कहा कि उन्हें अपने इस रवैये पर ‘गर्व’ है।

2009: हुसैन तब कहाँ थे, जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे को वीजा देने से मना कर दिया

साल 2009 में जिम्बाब्वे को T20 वर्ल्ड कप से आसानी से बाहर कर दिया गया और उसकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल कर लिया गया, जिसे ICC ने “विन-विन” सॉल्यूशन कहा। इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे के खिलाड़ियों को वीजा देने से मना कर दिया। फिर से, हुसैन ने ताकतवर बोर्ड्स के छोटी टीमों को कुचलने के बारे में कोई बात नहीं कही। ज़िम्मेदारी के बारे में कोई लेक्चर नहीं दिया। जिम्बाब्वे क्रिकेट को ‘कमजोर’ करने पर कोई आँसू नहीं बहाए। साफ़ है, खेल में पॉलिटिक्स तब ठीक है जब इंग्लैंड ऐसा करता है, लेकिन जब भारत नियमों का पालन करने पर जोर देता है, तो यह बहुत बुरा लगता है।

दरअसल हुसैन ने जो बातें कही वह ‘निरंतरता’ के बारे में नहीं है। यह पावर में बदलाव के बारे में है। वर्ल्ड क्रिकेट में सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी अब लॉर्ड्स या ECB नहीं है। यह BCCI है। यह सच्चाई एंग्लो कमेंट्री के एक खास हिस्से को परेशान करती है, जो तब पूरी तरह से सहज था जब ‘सिद्धांत’ इंग्लिश हितों के साथ जुड़े होते थे और जब वे नहीं होते थे तो काफ़ी लचीला था।

क्रिकेट कभी भी पॉलिटिकल वैक्यूम में नहीं रहा। 2003 में भी नहीं था। 2009 में भी नहीं था। आज भी नहीं है। फ़र्क यह है कि अब, भारत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह दूसरे बोर्ड के पॉलिटिकल नाटकों का खर्च चुपचाप उठाए। ICC को अपने कॉन्ट्रैक्ट लागू करने चाहिए। BCCI को अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए। और पाकिस्तान और बांग्लादेश को यह तय करना चाहिए कि वे नियमों पर आधारित सिस्टम का हिस्सा बनना चाहते हैं या नहीं।

जहाँ तक ​​नासिर हुसैन की बात है, तो ‘कंसिस्टेंसी’ के लिए उनका अचानक आया जुनून ज़्यादा असरदार होगा अगर वे इसे अपने रिकॉर्ड पर लागू करें। जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे का बॉयकॉट किया, तो पॉलिटिक्स और खेल टकराए थे। जब पाकिस्तान अपनी सरकार के कहने पर भारत के साथ खेलने का बॉयकॉट करता है, तो अचानक उनकी भाषा बदल जाती है और सारा दोष BCCI पर डालते हैं कि है इसने क्रिकेट को खराब कर दिया है। यह सिद्धांत नहीं है, यह क्रिकेट पर कंट्रोल खोने का गुस्सा है।

पाकिस्तान को सबक सिखाने का वक्त, IND-PAK मैच छोड़ने पर बांग्लादेश से कड़ी सजा जरूरी: PCB का निकलना चाहिए दिवाला

                       पाकिस्तान को सबक सिखाने का वक्त, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)
T20 विश्वकप 2026 में भारत-पाकिस्तान मैच क्रिकेट का सबसे बड़ा त्योहार होता है। कोलंबो में 15 फरवरी को होने वाला यह मुकाबला अरबों दर्शकों की नजरों में होता, ब्रॉडकास्टर्स के लिए सोने की खान। लेकिन पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) ने आधिकारिक घोषणा कर दी कि वह इस मैच को नहीं खेलेगा। तटस्थ स्थल पर खेलने का बाध्यकारी अनुबंध होने के बावजूद पाकिस्तान सरकार और PCB ने राजनीतिक ड्रामा शुरू कर दिया।

पाकिस्तान द्वारा यह सिर्फ एक मैच का बहिष्कार नहीं, बल्कि ICC की पूरी व्यवस्था पर हमला है। बांग्लादेश के साथ जो हुआ- सुरक्षा कारणों का हवाला देकर भारत में मैच न खेलने पर उन्हें पूरे टूर्नामेंट से बाहर कर स्कॉटलैंड को जगह दे दी गई, ठीक वही या उससे कड़ी सजा पाकिस्तान को मिलनी चाहिए। अगर पाकिस्तान आखिरी समय पर यह नाटक करता है, तो उसे न सिर्फ विश्वकप से बाहर करना चाहिए, बल्कि आर्थिक रूप से ऐसा कुचलना चाहिए कि PCB कटोरा लेकर ICC के दरवाजे पर भीख माँगने लायक न रहे।

पहले भी मैच खेलने से मना कर चुकी हैं टीमें, लेकिन इस बार…

क्रिकेट इतिहास में कई बार टीमें सुरक्षा या अन्य गंभीर कारणों से मैच छोड़ चुकी हैं। सामान्य नियम यही रहा कि विरोधी टीम को दो पॉइंट्स दे दिए जाते हैं। जैसे- 1996 विश्वकप में ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज ने श्रीलंका में सुरक्षा कारणों से इनकार किया, श्रीलंका को पॉइंट्स मिले। साल 2003 में न्यूजीलैंड ने केन्या में, इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे में राजनीतिक-सुरक्षा कारणों से मना किया। लेकिन यहाँ सिर्फ पॉइंट्स कटे। कुल 6-7 ऐसे बड़े मौके आए, जहाँ वजहें पहले से स्पष्ट थीं और टीमें पहले बता चुकी थीं।

लेकिन पाकिस्तान का मामला अलग है। यहाँ कोई ठोस सुरक्षा खतरा नहीं बल्कि सिर्फ राजनीतिक अडंगेबाजी है। ओलंपिक खेलों में ऐसी अडंगेबाजी में सीधे-सीधे देश को ही ब्लैकलिस्ट कर दिया जाता है। लेकिन आईसीसी ने अभी तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया।

दरअसल, ओलंपिक कमेटी अक्सर ऐसे देशों को ओलंपिक से बाहर कर देती है, जिनके खेल संघों में सरकारी दखल हो और वो निश्चित प्रक्रिया या मापदंडों को पूरा नहीं कर पाते हो। आपको याद न हो तो बता दें कि भारत की हॉकी कमेटी पहले लालफीताशाही के दौर पर ब्लैकलिस्ट हो चुकी है। ऐसे में इस बार पाकिस्तान को लेकर भी आईसीसी को यही कदम उठाना होगा। बता दें कि पीसीबी का चीफ मोहसिन नकवी खुद पाकिस्तान का गृहमंत्री है, तो ऐसे में यहाँ सीधे-सीधे राजनीतिक दखल ही है। आईसीसी इसे एक मुद्दा बनाकर भी कदम उठा सकती है।

चूँकि भारत-पाक मैच ICC का सबसे बड़ा रेवेन्यू जनरेटर है। इसमें विज्ञापन दरें 25-40 लाख रुपये प्रति 10 सेकंड की होती है। सिर्फ इसी मैच से 200 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हो सकता है। ऐसे में आईसीसी को न सिर्फ कड़े फैसले लेने होंगे, बल्कि नुकसान की भरपाई भी करानी चाहिए। इसकी वजह ये है कि पहले के मामलों में टीमों के मना करने की वजहें वैध होती थी, इसलिए ढील दी जाती थी। लेकिन यहाँ सिर्फ ड्रामा है, जो क्रिकेट को राजनीति का शिकार बना रहा है।

बहरहाल, इसके लिए आईसीसी अब एक बैठक भी करने वाला है। इसी में तय किया जाएगा कि पाकिस्तान को टूर्नामेंट में खेलने की इजाजत मिलेगी या नहीं। अगर मिलती है तो भी कड़ी सजा होगी। लेकिन सवाल यह है कि पाकिस्तान को टी-20 विश्वकप में खेलने की इजाजत दी ही क्यों जाए?

बांग्लादेश को तो पूरी तरह बाहर कर दिया गया क्योंकि उसने आखिरी समय में भारत से मैच शिफ्ट करने की माँग की और ICC ने मना किया। लेकिन पाकिस्तान तटस्थ स्थल कोलंबो में भी नहीं खेलना चाहता। यह दोहरा मापदंड क्यों? ICC अगर ढील देता है, तो कल कोई और टीम भी यही करेगी। जैसे को तैसे का जवाब ही सही रास्ता है।

आईसीसी के पास पाकिस्तान को सबक सिखाने के कई हथियार

पहला: ICC के पास पाकिस्तान को सबक सिखाने के कई हथियार हैं। पहला और सबसे सख्त है- पाकिस्तान को पूरे टूर्नामेंट से प्रतिबंधित कर देगा। पाकिस्तान को बाहर कर युगांडा को जगह दी जा सकती है, जैसा बोर्ड बैठक के बाद तय होगा।

दूसरा: ICC का सालाना रेवेन्यू शेयर रोकना। चूँकि PCB पहले से आर्थिक संकट में है, यह राशि बंद होने से वे दिवालिया हो जाएँगे।

तीसरा: जियो-स्टार जैसे ब्रॉडकास्टर्स को हुए नुकसान की भरपाई PCB से कराना। जिसमें पाकिस्तान को लाखों डॉलर की रकम भरनी पड़ेगी और वो पूरी तरह से भिखारी बन कर हाथ में कटोरा थामने की नौबत में आ जाएगा।

चौथा: द्विपक्षीय सीरीज पर पूरी रोक, WTC अंकों में कटौती और ICC रैंकिंग गिराना।

पाँचवाँ और सबसे घातक: PSL में विदेशी खिलाड़ियों के लिए एनओसी पर ही रोक। यानी पाकिस्तान की लीग पर बाहरी खिलाड़ियों के लिए सीधे-सीधे बैन, हालाँकि सन्न्यास ले चुके या फ्री एजेंट्स पर ये रोक लागू नहीं होगी, लेकिन ऐसे कितने ही खिलाड़ी हैं? चूँकि ऐसे खिलाड़ियों पर आईसीसी से मान्यताप्राप्त सभी टूर्नामेंट्स से बाहर होने का डर रहेगा, तो वो भी पीएसएल से किनारा कर लेंगे।

PSL पाकिस्तान क्रिकेट की लाइफलाइन है। विदेशी स्टार न आएँ तो लीग फ्लॉप हो जाएगी। चूँकि स्पॉन्सर ही नहीं रहेंगे, तो PCB पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा और वो इसका आयोजन भी नहीं करना पाएगा।

ये सजाएँ सिर्फ दंड नहीं बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी भी होगी। क्योंकि भारत-पाकिस्तान मैच न होने से सिर्फ आर्थिक नुकसान ही नहीं, बल्कि क्रिकेट की गरिमा को भी ठेस पहुँची है। ऐसे में ICC अगर सख्त नहीं हुआ, तो उसकी विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाएगी। बांग्लादेश के साथ जो हुआ, पाकिस्तान के साथ उससे कड़ा होना चाहिए। यानी उसे सीधे टूर्नामेंट से बाहर करना और दंडात्मक कार्रवाई करना। अगर तब भी पाकिस्तान अकड़ दिखाए, तो सीधे पीसीबी को आईसीसी से बैन कर देना।

क्रिकेट या दावत-ए-जिहाद? मैदान में इस्लामी विक्टिमहुड घुसाने की साजिश


क्रिकेट मूलतः बल्ला और गेंद का खेल है। टाइमिंग, लाइन-लेंथ और अनुशासन का अनुशासित संघर्ष। यह खेल टीमों की प्रतिस्पर्धा और खेल भावना से गढ़ा जाता है, न कि व्यक्तिगत आस्था के प्रदर्शन से।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से क्रिकेट के इसी मैदान को मजहबी अखाड़े में बदलने के सुनियोजित प्रयास दिखाई दे रहे हैं। पिच से लेकर ड्रेसिंग रूम तक इस्लामी एजेंडा और मुस्लिम विक्टिम कार्ड की घुसपैठ कराई जा रही है। यह बदलाव संयोग नहीं, एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा प्रतीत होते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा का संन्यास की घोषणा करते हुए यह कहना कि ‘पाकिस्तानी मुस्लिम होने के कारण उनके साथ दोहरा बर्ताव हुआ’, या जम्मू-कश्मीर चैंपियंस लीग में फुरकान भट का हेलमेट पर फिलिस्तीन का झंडा लगाकर मैदान में उतरना- ये घटनाएँ किसी निजी ‘स्टेटमेंट’ की श्रेणी में नहीं आतीं। ये क्रिकेट के मंच का उपयोग कर इस्लामी विक्टिमहुड, राजनीतिक इस्लाम और मजहबी एजेंडे को सामान्य बनाने की कोशिशें हैं। यहाँ खेल माध्यम है, संदेश कुछ और।

जिन्हें क्रिकेट की बुनियादी समझ है, वे जानते हैं कि उस्मान ख्वाजा कोई साधारण खिलाड़ी नहीं रहे। एक दशक से अधिक का अंतरराष्ट्रीय करियर, ऑस्ट्रेलिया के लिए 87 टेस्ट, कप्तानी की चर्चाएँ- इस पूरी यात्रा में न उनका मुस्लिम होना बाधक बना, न इस्लामाबाद में जन्म लेना।

डॉन ब्रैडमैन इसलिए महान नहीं हुए कि वे चर्च में प्रार्थना करते थे। सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के भगवान इसलिए नहीं बने कि वे संत ​सत्य साईं बाबा के भक्त थे। वसीम अकरम की प्रतिष्ठा नमाज से नहीं, स्विंग से बनी। विराट कोहली की पहचान प्रेमानंद महाराज के आश्रम में जाने से नहीं, कवर ड्राइव से है।

दुनिया इन सबको उनके क्रिकेटीय कौशल के लिए जानती है, उनकी निजी आस्था के लिए नहीं। इन सबकी आस्था व्यक्तिगत है, मैदान से बाहर है। लेकिन जाते-जाते उस्मान ख्वाजा ने क्रिकेट को पीछे धकेलकर पाकिस्तान और इस्लाम को आगे कर दिया। यह केवल खेल भावना का अपमान नहीं है, उस खेल की हत्या है जिसने उन्हें वह मंच दिया, जहाँ से वे यह बयान दे सके।

उस्मान ख्वाजा और फुरकान भट उस प्रवृत्ति की कड़ियाँ हैं जिसे सबसे पहले, सबसे खुलकर पाकिस्तानी क्रिकेट ने बढ़ावा दिया। मैच के दौरान नमाज, कैमरे के सामने मजहबी संकेत, जीत को ‘अल्लाह की देन’ बताने की अनिवार्यता- हर बार इसे ‘व्यक्तिगत आस्था’ कहकर बचाने की कोशिश की गई।

लेकिन जब यह बार-बार, योजनाबद्ध और कैमरा-फ्रेंडली ढंग से हो, तो वह निजी नहीं रह जाता। वह संदेश बन जाता है। वही संदेश फुरकान भट जैसे नवोदित खिलाड़ियों को प्रेरित करता है कि क्रिकेटीय पहचान से पहले मजहबी पहचान स्थापित की जाए।

हमने जर्सी पर ‘Victory belongs to Allah’ जैसे संदेश देखे हैं। यह खेल की भाषा को एक विशेष मजहब की शब्दावली में ढालने का प्रयास है। यही भाषा पाकिस्तानी खिलाड़ियों की मैच के बाद प्रस्तुतियों में सुनाई देती है, टीवी स्टूडियो में दोहराई जाती है। याद करिए क्रिकेट विश्लेषण के बीच आपने कितनी बार यूसुफ योहाना के मोहम्मद यूसुफ बनने को ‘टर्निंग पॉइंट’ के रूप में सुना है? सईद अनवर के कवर ड्राइव से अधिक उनके मौलवी बनने के बाद आए कथित ‘चमत्कारों’ पर चर्चाएँ सुनी हैं?

2014 का वह वीडियो भी याद कीजिए, जब पाकिस्तानी क्रिकेटर अहमद शहजाद श्रीलंकाई खिलाड़ी तिलकरत्ने दिलशान से यह कहते पाए गए कि अगर आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो जीवन में कुछ भी करें, अंततः जन्नत तय है। यह साथी क्रिकेटर से संवाद नहीं था। यह एक मजहबी दखल था।

ICC ने कुछ मामलों में चेतावनियाँ दीं, लेकिन वह घुसपैठ रोकने में विफल रही है। दानिश कनेरिया का प्रकरण बताता है कि यह जहर मैदान से बाहर निकलकर ड्रेसिंग रूम तक पहुँच चुका है। उन्होंने खुलकर बताया कि कैसे धार्मिक पहचान के आधार पर उन्हें अलग-थलग किया गया, धर्मांतरण का दबाव डाला गया। यह किसी एक खिलाड़ी की पीड़ा नहीं, उस मानसिकता का प्रमाण है जहाँ ‘टीम’ से पहले ‘मजहब’ आता है।

यहाँ प्रश्न आस्था का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या क्रिकेट टीम किसी मजहबी एजेंडे का विस्तार है? यदि नहीं, तो यह दबाव क्यों?

उस्मान ख्वाजा का बयान इसी प्रवृत्ति का अगला चरण है। जब उम्र, फिटनेस और अनुशासन पर सवाल उठें, तो मजहब को ढाल बना लो। पाकिस्तान इस कला में पारंगत है। वर्षों से वह अपनी असफलताओं को ‘साज़िश’, आलोचना को ‘ईमान-विरोध’ और अनुशासन को ‘आस्था का दमन’ बताकर टालता आया है।

ऐसा नहीं है कि क्रिकेट विशुद्ध जेंटलमैन गेम है। उसने कई विवाद देखे हैं। जैसे केरी पैकर सीरीज, मैच-फिक्सिंग, मंकीगेट…। लेकिन मजहब कभी एजेंडा नहीं बना। जब मजहब एजेंडा बन जाता है, तब खेल की तटस्थता समाप्त हो जाती है। टीम-स्पिरिट टूटती है। साझा लक्ष्य की जगह साझा मजहब हावी हो जाता है। अनुशासन ढीला पड़ता है और दर्शकों का भरोसा गिरता है।

इसका समाधान स्पष्ट और कठोर होना चाहिए। मैदान पर किसी भी राजनीतिक-मजहबी प्रदर्शन को पूर्णतः अस्वीकार्य घोषित किया जाए। ड्रेसिंग रूम में मजहबी दबाव पाए जाने पर पूरी टीम को दंडित किया जाए। आवश्यकता पड़े तो उस देश को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से प्रतिबंधित किया जाए।

स्मरण रहे क्रिकेट सभ्यताओं को जोड़ने का खेल है। उन्हें विभाजित करने का मैदान नहीं। जब खिलाड़ी जर्सी से पहले एजेंडा पहनने लगें, तो खेल हारता है। दर्शक हारते हैं।

आवश्यक है कि क्रिकेट को क्रिकेट रहने दिया जाए। इस्लाम के बोझ से मुक्त। ऐसा नहीं हुआ तो वह दिन दूर नहीं, जब मैदान पर बल्ला–गेंद नहीं, विचारधाराएँ टकराएँगी।

पहले ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वक्त रोया रोना, अब मैच का हल्ला देख उगल रही जहर: प्रोपेगेंडा ‘बीबी’ आरफा खानम शेरवानी की ‘मौकापरस्ती’ फिर हुई एक्सपोज; कट्टरपंथियों सिन्दूर की चीख तुम सबको कहीं का नहीं छोड़ेगी

                       भारत-पाक मैच, अरफा खानम शेरवानी (फोटो साभार: Cricinfo/IndiaToday)
पहलगाम में धर्म पूछकर हिन्दू महिलाओं का सिन्दूर पोछा गया, उसी सिन्दूर ने आतंकवाद के सिरमौर बने पाकिस्तान को जरुरत से ज्यादा महँगी पड़ रही है। पहले चीन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेइज्जती और अब दुबई में इंडो-पाक के बीच हुए T-20 में। जिसने भारत ही नहीं दुनिया में पाकिस्तान की बेइज्जती कर दी, जिससे परेशान होकर इस टूर्नामेंट से बाहर होने का इरादा किया जा रहा है। यानि एक करेला दूसरा नीम चढ़ा।

जिससे भारत से लेकर पाकिस्तान तक कट्टरपंथियों की चीखा-चिल्ली शुरू हो गयी है। Victim card खेलने का ड्रामा शुरू। Victim card खेलने वालों से पूछो कि जब निदोर्षों के खून की होली खेल हिन्दू महिलाओं को विधवा किया जा रहा था, क्यों नहीं छिपे हुए आतंकवादियों, उनके समर्थकों और पनाह देने वालों को कानून के हवाले कर हमदर्दी दिखाई? तब तो गैर-मुस्लिम के साथ हुई खून की होली का मजा लिया जा रहा था। कट्टरपंथियों सिन्दूर की चीख तुम सबको कहीं का नहीं छोड़ेगी।           

आज के दौर में सोशल मीडिया और मीडिया के कुछ हिस्से ऐसे हो गए हैं, जहाँ राष्ट्र विरोधी तत्वों को खुला मैदान मिला हुआ है। इनमें से एक प्रमुख नाम है आरफा खानम शेरवानी का। खुद को अवॉर्ड-विनिंग जर्नलिस्ट बताने वाली यह महिला ‘द वायर’ नामक वामपंथी प्रोपेगैंडा पोर्टल की सीनियर एडिटर है। लेकिन असलियत में वह इस्लामी कट्टरपंथ और वामपंथी विचारधारा के मिश्रण से भारत को कमजोर करने का काम करती नजर आती है।

आरफा खानम शेरवानी की मिक्स्ड विचारधारा हमेशा से राष्ट्र विरोधी रही है, जो देश की एकता, हिंदू संस्कृति और राष्ट्रीय सुरक्षा को निशाना बनाती है। इसी तरह इसकी इस्लामी कट्टरपंथ भी भारत की संप्रभुता के खिलाफ काम करता है।

आरफा खानम शेरवानी इन दोनों का ऐसा कॉकटेल है, जो हर मौके पर भारत विरोधी ट्वीट्स से सुर्खियाँ बटोरती है। शेरवानी की प्रोफाइल से साफ दिखता है कि वह भारत सरकार, हिंदू समुदाय और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ लगातार जहर उगलती रहती है।

आरफा खानम शेरवानी ने रविवार (14 सितंबर 2025) को एक्स पर लिखा, “ध्यान से सुनिए, उन दो गुजरातियों के लिए हर भावना, हर धर्म से बड़ा धंधा है। अब समझना और सहना आसान होगा।” यह ट्वीट भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के संदर्भ में है, जहाँ वह क्रिकेट प्रशासकों की आड़ में देश के शीर्ष नेताओं पर हमला बोल रही है।

पहले वह मैच न खेलने पर खेल भावना की दुहाई दे रही थीं, लेकिन मैच होने पर गुजरातियों को निशाना बनाया। कमेंट बॉक्स में उनके पुराने ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट्स हैं, जो पाकिस्तान समर्थन और युद्ध विरोधी हैं। यह ट्वीट न सिर्फ भारत विरोधी है, बल्कि गुजराती समुदाय को टारगेट करके हिंदू विभाजन की कोशिश है।

आरफा की एक्स प्रोफाइल (@khanumarfa) को स्कैन करें तो दर्जनों ऐसे ट्वीट्स मिलते हैं, जो भारत सरकार और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ हैं। ऐसा ही विवाद 24 अप्रैल 2021 का है, जब उसने सीधे ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ लिखा। यह ट्वीट भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच आया, जब पूरा देश पाकिस्तान को दुश्मन मान रहा था। राष्ट्रवादी विचार से यह खुला तौर पर देशद्रोह है, क्योंकि पाकिस्तान ने हमेशा भारत पर आतंकी हमले करवाए हैं। आरफा का यह स्टैंड साफ करता है कि वह पाकिस्तान की तरफदारी करती हैं।

                                               आरफा के ट्वीट का वायरल हो रहा स्क्रीनशॉट

फिर आया 2025 का ऑपरेशन सिंदूर। यह भारतीय सेना का एक सफल मिशन था, जिसमें जम्मू-कश्मीर के पहलगाम हमले का बदला लेते हुए पाकिस्तान में 9 आतंकी ठिकानों को तबाह किया गया। 28 निर्दोषों की मौत, जिनमें 24 हिंदू थे, का बदला लिया गया। लेकिन आरफा ने एक्स पर विलाप शुरू कर दिया: “Peace is Patriotism. War is destruction. Borders don’t bleed – people do. Stop the war. Deescalate Now.” यह ट्वीट पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा का आईना है।

यही नहीं, एक पैनल डिस्कशन में आरफा ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मारे गए लोग आतंकी नहीं, बल्कि आम नागरिक थे। उसने ऑपरेशन के नाम ‘सिंदूर’ पर भी उंगली उठाई, जो हिंदू परंपरा का प्रतीक है। पाकिस्तान के लोगों को ‘परेशान’ बताकर उसने दुश्मन देश का एजेंडा चलाया।

शिवलिंग को डस्टबिन बताने से गौमूत्र पर तंज तक, हिंदू विरोध से भरी है X टाइम लाइन

आरफा की प्रोफाइल में हिंदू विरोधी कंटेंट भरा पड़ा है। 1 अगस्त 2024 को उन्होंने ‘बाहुबली’ फिल्म का आइकॉनिक पोस्टर शेयर किया, जहां प्रभास शिवलिंग उठा रहा है, लेकिन उन्होंने शिवलिंग को डस्टबिन से रिप्लेस कर दिया। कैप्शन था ‘विजन 2047’। यह हिंदू धर्म का अपमान है, जिसके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज हुई। राष्ट्रवादी नजरिए से, यह हिंदुत्व को कुचलने की कोशिश है। पहले भी उन्होंने भगवान राम को दलितों पर अत्याचार करने वाला कार्टून शेयर किया। ‘गौमूत्र’ और ‘गोबर’ पर तंज कसते हुए ट्वीट्स किए, जो पुलवामा हमलावर आदिल डार के शब्दों से प्रेरित हैं।

ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, 9 जून 2024 को रियासी में 2 साल के हिंदू बच्चे टीटू की हत्या पर आरफा चुप रहीं। लेकिन 2015 में सीरिया के मुस्लिम बच्चे एलन कुर्दी और 2016 में रोहिंग्या बच्चे की मौत पर मातम मचाया। दो दिन बाद भी टीटू पर कोई ट्वीट नहीं, बल्कि उसने पूछा कि संसद में एक भी मुस्लिम सांसद या मंत्री क्यों नहीं? यह ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की थ्योरी है, जहाँ हिंदू पीड़ितों की अनदेखी होती है।

इसने 2022 में PFI जैसे इस्लामी संगठनों के इवेंट्स में स्पीच दी, जहाँ हिंदुत्व को खतरा बताया। 2023 में सिद्दीक कप्पन की रिहाई पर मुस्लिम विक्टिम कार्ड खेला था।

इन सब से साफ है कि आरफा हिंदू संस्कृति को नीचा दिखाती हैं, जबकि इस्लामी कट्टरता को बचाती हैं। राष्ट्रवादी विचार से, यह हिंदू फोबिया है, जो देश की सांस्कृतिक एकता को तोड़ता है।

इस्लामी प्रोपेगैंडा की प्रोपेगेंडा मशीनरी का हिस्सा है आरफा

आरफा खानम शेरवानी का जन्म उत्तर प्रदेश के एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) की पूर्व छात्रा हैं, जो खुद एक ऐसा संस्थान है जहाँ से कई बार कट्टरपंथी विचारधारा को बढ़ावा मिलता देखा गया है।

एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद खान को याद करते हुए आरफा ने कई बार ट्वीट किया है कि मुस्लिम समुदाय को उनके जैसे लीडर की जरूरत है। लेकिन सर सैयद अहमद खान वही शख्स थे, जिसने ‘टू नेशन थ्योरी’ का विचार दिया था, जिसके चलते भारत का बँटवारा हुआ। आरफा का यह स्टैंड साफ दिखाता है कि वह भारत की एकता से ज्यादा इस्लामी अलगाववाद को महत्व देती हैं।

आरफा खानम शेरवानी की प्रोफाइल स्कैन करने पर साफ है कि वह मौका परस्त हैं। कभी पाकिस्तान जिंदाबाद, कभी ऑपरेशन सिंदूर पर शांति की दुहाई, कभी हिंदू प्रतीकों का अपमान।

ऑपइंडिया ने उसके कई प्रोपेगैंडा को एक्सपोज किया है, जो अभी भी जारी है। राष्ट्रवादी भारत को ऐसे तत्वों से सावधान रहना चाहिए। सरकार को ऐसे लोगों पर कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि देश की एकता बनी रहे। आरफा जैसे लोग ‘पोस्टर गर्ल’ नहीं, बल्कि प्रोपेगैंडा मशीन हैं, जो वामपंथी विचारधारा और इस्लामी कट्टरपंथ के जरिए भारत को कमजोर करना चाहती हैं। समय है कि सच्चाई सामने आए और राष्ट्रहित सर्वोपरि हो।

सेलिब्रिटी के लिए अलग नियम नहीं हो सकते: गुजरात हाई कोर्ट ने यूसुफ पठान के सरकारी जमीन पर कब्जे को बताया ‘अवैध’, वडोदरा में TMC सांसद के प्लॉट हड़पने का मामला

                      गुजरात हाई कोर्ट ने यूसुफ पठान की याचिका खारिज कर दी (फोटोः आजतक/भास्कर)
गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में पूर्व क्रिकेटर और टीएमसी सांसद यूसुफ पठान की जमीन विवाद से जुड़ी याचिका खारिज कर दी। जस्टिस मौना भट्ट की सिंगल बेंच ने पठान को सरकारी जमीन पर अतिक्रमणकारी घोषित किया।

दरअसल, वडोदरा नगर निगम ने यूसुफ पठान को सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करने के आरोप में नोटिस भेजा था। इसके बाद पठान ने नगर निगम के नोटिस और राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

ऑपइंडिया के पास मौजूद आदेश की कॉपी में कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यूसुफ पठान द्वारा सरकारी जमीन पर कब्जा करना अवैध और जबरदस्ती है और इसे किसी भी हालत में वैध नहीं माना जा सकता।

मामले का इतिहास

यह मामला 2012 से शुरू हुआ। यूसुफ पठान ने अपने बंगले के पास 978 वर्ग मीटर का प्लॉट नंबर 90 को 99 साल की लीज पर लेने के लिए वडोदरा नगर निगम में आवेदन दिया। नगर आयुक्त और निगम की स्थायी समिति ने इसे मंजूरी दी। 8 जून 2012 को निगम की आम सभा ने भी प्रस्ताव मंजूर कर लिया।

चूँकि यह जमीन बिना सार्वजनिक नीलामी के दी जानी थी, इसलिए इसे राज्य सरकार के पास भेजा गया। सरकार ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया। इसके बावजूद यूसुफ पठान ने जमीन पर कब्जा कर लिया।

वीएमसी ने तुरंत कार्रवाई नहीं की लेकिन 2024 में विवाद फिर चर्चा में आया और निगम ने पठान को नोटिस भेजकर जमीन खाली करने को कहा। इसके बाद यूसुफ पठान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

यूसुफ पठान के क्या हैं तर्क?

पठान के वकील ने कहा कि नगर निगम एक स्वतंत्र निकाय है और अधिनियम 1949 के तहत निगम आयुक्त को जमीन पट्टे पर देने का अधिकार है। राज्य सरकार की मंजूरी लेना आवश्यक नहीं है। उन्होंने संविधान के 74वें संशोधन का हवाला देते हुए कहा कि नगर निगम जैसे स्थानीय निकायों में राज्य का हस्तक्षेप उचित नहीं है।
यूसुफ पठान ने यह भी कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर और सांसद हैं, जमीन का मौजूदा बाजार मूल्य चुकाने को तैयार हैं और निगम ने 12 साल तक कोई आपत्ति नहीं जताई, इसलिए उनका कब्जा वैध मानना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि विवादित जमीन उनके बंगले के पास है, इसलिए सुरक्षा का मामला भी है।

सरकार और निगम का तर्क

नगर निगम और सरकार के वकील ने कहा कि किसी को भी सरकारी या निगम की जमीन पर कब्जा करने का अधिकार नहीं है। जमीन बिना नीलामी के दी जानी थी, इसलिए राज्य सरकार की मंजूरी जरूरी थी। पठान ने चारदीवारी बनाकर कब्जा कर लिया जबकि कोई औपचारिक आदेश नहीं था।
सरकार ने यह भी कहा कि पठान ने निगम को एक भी रुपया नहीं दिया और सुरक्षा का कोई सबूत भी नहीं पेश किया। निगम ने अदालत से कहा कि अगर पठान सचमुच जमीन चाहते हैं, तो उन्हें सार्वजनिक नीलामी में हिस्सा लेना चाहिए, जैसा हर नागरिक करता है।

हाई कोर्ट का फैसला

जस्टिस मौना भट्ट ने कहा कि 9 जून 2014 को राज्य सरकार ने जमीन का प्रस्ताव खारिज कर दिया था। इसके बाद यूसुफ पठान का कोई कानूनी अधिकार नहीं बचा। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से किसी को भी जमीन पर अधिकार नहीं मिल जाता।
कोर्ट ने पठान के बाजार मूल्य चुकाने की दलील भी खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि यूसुफ पठान जैसी हस्तियाँ और सांसद समाज के आदर्श होते हैं और उनसे आम नागरिकों से अधिक कानून का पालन करने की उम्मीद होती है। कानून तोड़ने के बाद भी विशेष सुविधाएँ मिलें, तो समाज को गलत संदेश जाएगा।
अदालत ने यह भी कहा कि निगम की लापरवाही यूसुफ पठान को लाभ नहीं पहुँचा सकती। अंतिम आदेश में याचिका खारिज कर दी गई और कहा गया कि जमीन पर अवैध कब्जा तुरंत हटाना चाहिए। नगर निगम को आदेश दिया गया कि कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाए। यूसुफ पठान का कब्जा अवैध था और इसे कोई भी विशेष दलील वैध नहीं बना सकती। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रसिद्धि या पद से कानून पर अलग नियम नहीं हो सकते हैं।

मोहम्मद शमी की बेटी ने खेली होली, रंग-गुलाल वाली तस्वीर देख गाली देने लगे इस्लामी कट्टरपंथी: कहा- जाहिल-बेशर्म… रमजान का महीना है शर्म करो

                                           मोहम्मद शमी की बेटी को होली खेलने पर ट्रोल किया गया
भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद शमी लगातार इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं। इस बार कट्टरपंथियों ने उनकी बेटी को अपना निशाना बनाया है। मोहम्मद शमी की बेटी के होली खेलने को लेकर कट्टरपंथी भड़क गए हैं रमजान, इस्लाम, इल्म आदि का ज्ञान दे रहे हैं। शमी की बेटी से जुमे की नमाज का समय पूछा जा रहा है, उनकी परवरिश पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।

इस्लामी कट्टरपंथियों का यह गुस्सा मोहम्मद शमी की पूर्व पत्नी हसीन जहाँ की एक पोस्ट पर निकला है। हसीन जहाँ ने शुक्रवार (14 मार्च, 2025) को अपनी बेटी आयरा शमी की एक फोटो अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर साझा की थी। इसमें दिखता है कि आयरा रंग खेल कर आई हैं। 

आयरा के कपड़ों और चेहरे आदि पर रंग-गुलाल लगा हुआ था। हसीन जहाँ ने इसी फोटो के साथ होली की शुभकामनाएँ भी दी। इसी फोटो को देखने के बाद इस्लामी कट्टरपंथी भड़क गए और हसीन जहाँ तथा उनकी बेटी को लेकर बुरा भला कहने लगे।

 जुनैद नाम के एक व्यक्ति ने शमी की बेटी की फोटो पर लिखा, “जुमे की नमाज पहले पढ़ी है या बाद में?”

वहीं एक और अकाउंट ने लिखा, “रमजान मंथ है यार शर्म करो।”

इमरान शेख ने हसीन जहाँ पर प्रश्न उठाए और कहा, “वाह क्या तालीम दी है बेटी को!”

कुछ कट्टरपंथियों ने गालियाँ तक लिखीं और चाकू-बन्दूक वाले इमोजी कमेन्ट किए।

शमी की बेटी को इस्लाम सिखाने वालों ने उनकी माँ हसीन जहाँ को भी इसमें घसीट लिया। उनको बेशर्म और जाहिल करार दिया गया।

अब्दुल कलाम ने लिखा, “जाहिल औरत को रमजान महीने में भी शर्म नहीं आई, मैं इसे अभी ब्लॉक कर रहा हूँ।”

साकिब आलम ने लिखा, “बेशर्म औरत *सी।’ रहेब नाम के एक शख्स ने यह पूछ लिया कि आखिर वह मुस्लिम हैं भी या नहीं।

यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब मोहम्मद शमी इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर आए हों। हाल ही में चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान उन्होंने ग्राउंड पर जूस पी लिया था। इसके बाद इस्लामी कट्टरपंथी भड़क गए थे। उनकी यह तस्वीर सामने आने के बाद ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने उन्हें गुनहगार बताया था।

मौलाना ने कहा था, “इस्लाम ने रोज़े को फर्ज़ करार दिया है। सभी पर रोज़ा फर्ज़ है। अगर कोई जानबूझकर रोज़ा नहीं रखता, तो वह गुनहगार है। ऐसा ही क्रिकेटर मोहम्मद शमी ने किया। उन्होंने रोज़ा न रखकर बहुत बड़ा गुनाह किया है। शरिया की नज़र में यह कटघरे में खड़े हैं और मुजरिम हैं…।”

क्या बांग्लादेशी अंपायर ने ऑस्ट्रेलिया को जितवा दिया मेलबर्न टेस्ट? बैट पर नहीं लगी बॉल, स्निको मीटर में हरकत नहीं… यशस्वी जायसवाल को दिया आउट

                            यशस्वी जायसवाल को आउट देने पर विवाद (फोटो साभार: X_7Cricket)
ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम ने मेलबर्न में खेले गए चौथे टेस्ट मैच में भारत को 184 रनों से हराकर बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी में 2-1 की बढ़त बना ली। हालाँकि, इस हार के केंद्र में एक बड़ा विवाद रहा-यशस्वी जायसवाल का विवादास्पद तरीके से आउट होना। पाँचवें दिन शानदार तरीके से भारतीय बल्लेबाजी को संभाल रहे जायसवाल को तीसरे अंपायर ने एक संदिग्ध कैच के बाद आउट करार दिया। इस फैसले को लेकर क्रिकेट विशेषज्ञों और फैन्स के बीच बहस लंबी चलने वाली है।
BCCI को तीसरे अंपायर के विरुद्ध कार्यवाही की मांग करनी चाहिए 
क्रिकेट विशेषज्ञों का कहना है कि इस मसले को सख्ती के साथ BCCI को ICC में उठाकर तीसरे अंपायर पर कार्यवाही करने की मांग करनी चाहिए। ऐसे विवादित अंपायर कभी भी किसी भी मैच का रुख बदल सकते हैं। हालाँकि ऑस्ट्रेलिया जायसवाल के आउट होने से खुश जरूर है लेकिन तीसरे अंपायर के फैसले पर संदेह कर रहे हैं।  

क्या हुआ था यशस्वी जायसवाल के आउट होने पर?

मेलबर्न टेस्ट के पाँचवें दिन 84 रन बनाकर क्रीज पर जमे हुए यशस्वी जायसवाल ने पैट कमिंस की एक गेंद पर हुक शॉट लगाने की कोशिश की। गेंद यशस्वी जायसवाल के बल्ले और ग्लव्स के पास से निकली, लेकिन कोई स्पष्ट सबूत नहीं था कि गेंद ने बल्ले या ग्लव्स को छुआ हो। ऑन-फील्ड अंपायर ने उन्हें नॉट-आउट करार दिया था, लेकिन कमिंस ने तुरंत डीआरएस का सहारा लिया और ऑन फील्ड अंपायर के फैसले को चुनौती दी।
तीसरे अंपायर बांग्लादेश के शरफुद्दौला सैकत ने वीडियो रीप्ले की कई बार जाँच की। स्निको मीटर ने कोई स्पष्ट आवाज रिकॉर्ड नहीं की थी, जिससे यह पता चलता कि गेंद बल्ले या ग्लव्स से टकराई थी। इसके बावजूद बांग्लादेशी अंपायर शरफुद्दौला सैकत ने पैट कमिंस और ऑस्ट्रेलिया के पक्ष में फैसला सुना दिया।
जायसवाल इस फैसले से हैरान रह गए। उन्होंने ऑन-फील्ड अंपायरों से बातचीत की, लेकिन फैसले को पलट नहीं सके। निराश जायसवाल को मजबूरी में पवेलियन लौटना पड़ा। भारत उस समय 140 पर सात विकेट गँवा चुका था और जायसवाल के आउट होने से टीम की बची-खुची उम्मीदें भी टूट गईं।

क्यों हो रहा है विवाद?

इस मामले में तकनीकी विफलता और तीसरे अंपायर द्वारा बल्लेबाज को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) न देने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। आमतौर पर ऐसे मामलों में जब कोई ठोस सबूत नहीं होता, तो बल्लेबाज के पक्ष में फैसला दिया जाता है। ऐसे में स्निको मीटर और हॉटस्पॉट जैसे उपकरणों की मदद के बावजूद अगर अंपायर पूरी तरह सुनिश्चित नहीं हो सकते, तो उन्हें नॉट-आउट का फैसला देना चाहिए था।
हालाँकि पूर्व इंटरनेशनल अंपायर साइमन टफेल ने तीसरे अंपायर के फैसले का समर्थन किया है। उन्होंने इसके पक्ष में तर्क भी रखा। ये अलग बात है कि अगर जायसवाल को इस मामले में संदेह का लाभ दिया जाता, तो मैच के नतीजे पर भी फर्क पड़ सकता था।

यशस्वी जायसवाल के आउट होते ही बुरी तरह सिमटी भारतीय टीम

जायसवाल ने पहली पारी में भी 82 रनों की शानदार पारी खेली थी और दूसरी पारी में उनके 84 रनों ने भारत को हार से बचाने की उम्मीदें जिंदा रखी थीं। उनकी और ऋषभ पंत की 88 रनों की साझेदारी भारत को जीत की तरफ ले जा रही थी। लेकिन पंत के जल्दी आउट होने के बाद, भारत के बल्लेबाजों ने निराश किया। भारत ने अपने आखिरी सात विकेट केवल 34 रन के भीतर खो दिए। ऑस्ट्रेलिया के गेंदबाजों पैट कमिंस, मिचेल स्टार्क, नाथन लायन और स्कॉट बोलैंड ने घातक प्रदर्शन किया और भारत की पारी को 155 रन पर समेट दिया।
मेलबर्न टेस्ट में भारत की हार ने श्रृंखला में वापसी के उनके प्रयासों को बड़ा झटका दिया है। अब भारत को सिडनी में अंतिम टेस्ट जीतने के अलावा ट्रॉफी बचाने का कोई विकल्प नहीं बचा।

ड्रेसिंग रूम में मोदी ने ऐसा क्या कह दिया कि मुस्कुराने लगे रोहित शर्मा और विराट कोहली: प्रधानमंत्री ने दिया न्योता, वीडियो

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खिलाड़ियों से ड्रेसिंग रूम में जाकर मिले और उनका हौसला बढ़ाया। पीएम मोदी द्वारा खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाने का वीडियो अब सामने आया है, जिसमें वो खिलाड़ियों की हौसला-अफजाई करते हुए कहते हैं कि पूरा देश आपके साथ खड़ा है। उन्होंने भारतीय टीम के खिलाड़ियों से एक-एक कर मुलाकात की और सभी का हौसला बढ़ाया। इस दौरान भारतीय क्रिकेट टीम के कोच राहुल द्रविड से भी वो गले मिले और उनसे हौसला बनाए रखने को कहा।

मोदी का टीम इंडिया के खिलाड़ियों से ड्रेसिंग रूम में मुलाकात का वीडियो सामने आया है। इसमें देखा जा सकता है कि पीएम मोदी टीम के सभी खिलाड़ियों से मुलाकात कर रहे हैं। वह सबसे पहले कप्तान रोहित शर्मा और विराट कोहली से मिलते हैं। वो रोहित शर्मा ने बोलते हैं, “आप लोग 10 मैच जीतकर यहाँ तक आए हैं। ये तो होता रहता है। मुस्कुराइए भाई, देश आप लोगों को देख रहा है।” वीडियों में पीएम मोदी रोहित और विराट के कंधे को थपथपाते हुए भी दिख रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी खिलाड़ियों को दिल्ली आने का भी न्यौता दिया है और उनसे संपर्क करने के लिए कहा है। उन्होंने कहा कि मैं यहाँ बस हौसला बढ़ाने आ गया था, आप लोग दिल्ली आइए, तो जरूर मिलिए। आपसे मुलाकात के लिए समय निकालेंगे।

पीएम मोदी टीम इंडिया के कोच राहुल द्रविड़ से कहते हैं, “आप लोगों ने बहुत मेहनत की है।” इस दौरान पीएम मोदी ने रविंद्र जडेजा से गुजराती में बातचीत की, तो जसप्रीत बुमराह से भी पूछा कि क्या वो गुजराती में बात करते हैं, इसके जवाब में बुमराह कहते हैं “थोड़ो-थोड़ो (थोड़ा-थोड़ा)।” फिर वो श्रेयस अय्यर, सूर्य कुमार यादव, कुलदीप यादव से भी मिलते हैं।

पीएम मोदी ने मोहम्मद शमी को गले से लगा लिया और कहा कि आपने इस बार बहुत अच्छा किया है। वहीं, KL राहुल का नाम लेकर उनका हौसला भी पीएम मोदी बढ़ाते दिखे। समाचार एजेंसी ANI ने पीएमओ के हवाले से ये वीडियो जारी किया है और लिखा है, “19 नवंबर को गुजरात के अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में आईसीसी विश्व कप फाइनल के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीम इंडिया से उनके ड्रेसिंग रूम में मुलाकात की। पीएम ने खिलाड़ियों से बात की और पूरे टूर्नामेंट में उनके प्रदर्शन के लिए उनका हौसला बढ़ाया।”

भारतीय क्रिकेट टीम विश्व कप के फाइनल मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया से 6 विकेट से हार गई। पिछले 10 सालों में भारतीय टीम एक भी आईसीसी ट्रॉफी नहीं जीत पाया है। इस हार के बाद सभी खिलाड़ियों के चेहरे मायूसी से भरे नजर आए थे। खुद पीएम मोदी इस मौके पर स्टेडियम में मौजूद थे और उन्होंने विजेता कप्तान पैट कंमिस को ट्रॉफी भी सौंपी और इसके बाद रात में भारतीय ड्रेसिंग रूप में जाकर उन्होंने फाइनल मुकाबला हारने वाले खिलाड़ियों से मुलाकात की।


वर्ल्ड कप की ट्रॉफी पर रखी लात, जूते में भर के शराब: ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के जश्न के तौर-तरीके

जश्न मनाते ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी (चित्र साभार: Mufaddal Vohra/X & DNA)
हर देश के अपने संस्कार और संस्कृति होती है। वर्ल्ड कप जीतने के बाद ट्रॉफी को सम्मान देने ऑस्ट्रेलिया की शायद यही संस्कृति होगी, जैसाकि सोशल मीडिया पर दिख रहा है। दूसरे, जूतों में दाल बांटेगी, यह तो सुना था, लेकिन जूतों में शराब पीने का तरीका ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम ने दिखा दिया। अहमदाबाद में भारत के खिलाफ वर्ल्ड कप 2023 जीतने के बाद अब ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ियों के जश्न तस्वीरें वायरल हो रही हैं। ऑस्ट्रेलिया के बैटिंग आलराउंडर मिचेल मार्श की एक ऐसी ही तस्वीर वायरल हुई है जिसमें वह वर्ल्ड कप ट्रॉफी पर पैर रखे हुए दिख रहे हैं।

मिचेल के इस ट्रॉफी पर पैर रखने को कुछ लोग उनका आत्मविश्वास बता रहे हैं तो कुछ इसे ट्रॉफी का अपमान कह रहे हैं। कुछ लोग इसे मिचेल मार्श का खराब रवैया बता रहे हैं तो कुछ लोग सलाह दे रहे हैं कि उन्हें ट्रॉफी का सम्मान करना चाहिए।

माधव शर्मा नाम के एक शख्स से मिचेल मार्श के इस फोटो पर लिखा, “मुझे मिचेल की यह फोटो काफी अपमानजनक लगी है। यह एक ऐसी ट्रॉफी है जिसके लिए क्रिकेटर पूरी जिन्दगी लगा देते हैं और मिचेल ने कूल दिखने के लिए इसके ऊपर पैर रख दिए। यह चौंकाने वाला और भद्दा है।”

एक अन्य व्यक्ति रुद्रा शर्मा ने लिखा, “मिचेल मार्श यह एक पेशेवर खिलाड़ियों का रवैया नहीं है। क्या एक पेशेवर खिलाड़ी एक बड़े पुरस्कार के साथ ऐसे पेश आएगा?”

एक व्यक्ति ने लिखा, “किसी को इतना मत दो कि वह उसका सम्मान ना करे।”

एक अन्य व्यक्ति अमित थाडानी ने लिखा, “सांस्कृतिक अंतर है। इन लोगों को किताबों पर पैर रखने में भी कोई समस्या नहीं है जिसके बारे में हम सपने में नहीं सोच सकते।”

हालाँकि, यह कोई नई बात नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया ने अपनी जीत का जश्न अलग तरीके से मनाया हो। इससे पहले भी उनके अजीब जश्न सामने आए हैं। वर्ष 2021 में टी20 विश्व कप जीतने के बाद भी ऑस्ट्रेलिया ने कुछ ऐसा ही किया था जो कि चर्चा का विषय बना था।

2021 में टी20 वर्ल्ड कप में न्यूजीलैंड को हराने के बाद ऑस्ट्रलिया के खिलाड़ियों ने जूते में भर बियर पी था। ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी मार्कस स्टोनिस और मैथ्यू वेड ने जूते से बियर पी था। इसका वीडियो भी वायरल हुआ था और कुछ लोगों ने इसे गन्दा बताया था।


जिस फिलिस्तीन समर्थक ने वर्ल्ड कप फाइनल में घुस कर कोहली को पकड़ा, उसे कानूनी सहायता देगा मुस्लिम वकील: समर्थन में उतरा लिबरल गिरोह, की वाहवाही

मैदान पर घुसा फिलिस्तीन समर्थक अतिक्रमणकारी (फोटो साभार : X_Siddharth)
अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में खेले गए क्रिकेट विश्वकप के फाइनल मुकाबले में एक व्यक्ति मैदान में घुस आया। वो फिलिस्तीन समर्थक है और ऑस्ट्रेलियाई नागरिक है। उसने भारतीय पारी के 14वें ओवर में मैदान में घुसने का साहस किया और विराट कोहली से जाकर मैदान पर ही बात करने लगा। उसने विराट कोहली को छुआ भी। इस दौरान सुरक्षा कर्मियों ने उसे पकड़ लिया और हिरासत में ले लिया।

हिरासत में लिए जाने के बाद उसकी पहचान का खुलासा हुआ, जब उसने पत्रकारों से अपनी इस हरकात के बारे में बातचीत की। एक तरफ उसने कानून तोड़ा और अफरा-तफरी का माहौल पैदा किया, तो दूसरी तरफ भारत के लिबरल्स उसकी वाहवाही करने लगे। यहाँ तक कि भारतीय इस्लामवादियों ने इसे कानूनी सहायता तक देने की पेशकश कर दी।

ऑस्ट्रेलियाई नागरिक है आरोपित

क्रिकेट विश्वकप के फाइनल मुकाबले में राजनीतिक संदेश देने के लिए मैदान में घुसने वाले युवक की पहचान वेन जानसन के रूप में हुई है। वो स्टेडियम में भारतीय टीम की जर्सी पहनकर घुसा था और बाद में उसने टी-शर्ट बदल लिया। उसने पत्रकारों से बताया कि वो इस मौके का इस्तेमाल फिलिस्तीन समस्या की तरफ ध्यान दिलाने के लिए करना चाहता था। उसने खुद को ऑस्ट्रेलियाई नागरिक बताया और कहा कि वो विराट कोहली से मिलना चाहता था। इस दौरान उसके फिलिस्तीन के समर्थन के बारे में पूछा गया, तो उसने कहा कि मैं फिलिस्तीन को समर्थन करता हूँ।
इस घटना के तुरंत बाद सुरक्षा कर्मियों ने मोर्चा संभाला और मैदान में घुसने वाले व्यक्ति को हिरासत में ले लिया गया। उसे चाँदखेड़ा पुलिस स्टेशन ले जाया गया है, जहाँ उससे पूछताछ की जा रही है।

भारत के लिबरल और इस्लामिक कट्टरपंथी करने लगे समर्थन

मैदान में घुसने वाले व्यक्ति की गिरफ्तारी की जानकारी जब मुफद्दल वोहरा नाम के व्यक्ति ने दी, तो अनस तनवीर नाम के व्यक्ति ने आरोपित को कानूनी सहायता देने की पेशकश की।
आरजेडी की सोशल मीडिया टीम से जुड़ा प्रियाँशु तो फिलिस्तीन के लिए एक्स पर ही नारेबाजी करने लगा।
लेफ्ट लिबरल गिरोह का सदस्य और कॉन्ग्रेसियों का प्रिय अशोक पाण्डेय भी ‘फ्री फिलिस्तीन’ के नारे लगाने लगा।
वहीं सुजाता नामक उपन्यासकार ने लिखा, “वे चाहेंगे आप भूल जाएँ लेकिन आप याद दिलाते रहना।”
लेफ्ट लिबरल गिरोह की सदस्य आरफा ने सिद्धार्थ के पोस्ट को री-ट्वीट करते हुए आगे बढ़ाया।
                                      आरफा खानम शेरवानी ने इस पोस्ट को री-ट्वीट किया है।
बता दें कि मैदान पर 13 ओवर और 3 गेंदे फेंकी जा चुकी थी, जब ये घटना हुई। मैच का 14वाँ ओवर एडम जैम्पा फेंक रहे थे, उन्होंने तीन गेंदे डाली थी, जिसपर 3 सिंगल रन बने थे। विराट कोहली 29 रन बनाकर खेल रहे थे, तब ये व्यक्ति मैदान के बीचो-बीच घुस गया।