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बिना कानून बाजार पर हलाल सर्टिफिकेट का कब्जा: केन्या में कोर्ट तक पहुँची सर्टिफिकेशन की लड़ाई, समझें- कैसे पिस रहे व्यापारी


केन्या में हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है। 16 अप्रैल 2026 को डेनिस नथुम्बी, डेनिस ओवुओर ओचांडा और हेनरी बरासा टॉम ने नैरोबी हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। उनका आरोप है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी निजी व्यवस्थाएँ किसी स्पष्ट कानून के बिना ही खाद्य और मांस उद्योग में बाजार तक पहुँचने, सरकारी खरीद में भाग लेने और व्यापार करने की व्यावहारिक शर्त बनती जा रही हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से सरकारी संस्थाओं को किसी निजी सर्टिफिकेट को लाइसेंस, व्यापार या सार्वजनिक खरीद की अनिवार्य शर्त मानने से रोकने की माँग की है।

जून 2026 में केन्या हलाल सर्टिफिकेशन ब्यूरो (KBHC) ने इस मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की माँग की। संस्था का तर्क है कि मुस्लिम उपभोक्ताओं को यह जानने का संवैधानिक अधिकार है कि कोई खाद्य पदार्थ उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तैयार किया गया है या नहीं।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति क्या है?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे मुसलमानों के हलाल भोजन खाने के अधिकार का विरोध नहीं कर रहे हैं। उनका सवाल केवल इतना है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी एक निजी मजहबी व्यवस्था धीरे-धीरे खाने-पीने की चीजों के उत्पादन, बिक्री और सप्लाई की पूरी प्रक्रिया में जरूरी शर्त कैसे बन गई।

उनका कहना है कि बूचड़खानों से लेकर सुपरमार्केट और सरकारी खरीद तक, हलाल सर्टिफिकेट ही व्यवसाय की स्वीकार्यता निर्धारित करने लगा है। सर्टिफिकेट न लेने वाला कारोबारी कुछ आपूर्ति शृंखलाओं, ठेकों और बाजारों से बाहर हो जाता है। इस स्थिति में कागज पर स्वैच्छिक दिखने वाला सर्टिफिकेशन व्यवहार में अनिवार्य बन जा रहा है।

दूसरी आपत्ति प्रमाणन शुल्क को लेकर है। याचिका में दावा किया गया है कि निजी संस्थाओं को दिया जाने वाला शुल्क अंततः वस्तु की कीमत में जोड़कर उपभोक्ता से वसूला जा सकता है जबकि अधिकांश खरीदारों को न प्रमाणन की प्रक्रिया पता होती है, न उसकी कीमत।

केन्या के कानून में टकराव कहाँ है?

याचिका में केन्या के संविधान के अनुच्छेद 43, 46 और 47 का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 43 स्वास्थ्य और स्वीकार्य गुणवत्ता वाले भोजन जैसे सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से जुड़ा है। अनुच्छेद 46 उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता, आवश्यक जानकारी और उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा आर्थिक हितों की रक्षा का अधिकार देता है। अनुच्छेद 47 सरकारी प्रशासनिक कार्रवाई को वैध, तर्कसंगत और प्रक्रियात्मक रूप से निष्पक्ष बनाने की माँग करता है।

केन्या के मांस नियंत्रण नियम में पशु और मांस की जाँच का अधिकार सरकारी पशु चिकित्सकों, स्वास्थ्य निरीक्षकों और अधिकृत अधिकारियों को दिया गया है। पशु को काटने से पहले और मांस को बाजार में भेजने से पहले सरकारी निरीक्षण आवश्यक है। इसलिए धार्मिक प्रमाणन सार्वजनिक स्वास्थ्य की वैधानिक जाँच का स्थान नहीं ले सकता है।

हलाल वास्तव में क्या है?

हलाल अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है इस्लामी कानून के अनुसार जायज। यह केवल जानवर काटने की पद्धति नहीं है। किसी उत्पाद में सूअर, रक्त, शराब या अन्य निषिद्ध सामग्री न हो, उसके निर्माण, प्रसंस्करण, भंडारण और परिवहन के दौरान वह गैर-हलाल पदार्थों के संपर्क में न आया हो ये सभी शर्तें हलाल व्यवस्था का हिस्सा हो सकती हैं।
FAO और WHO की Codex Alimentarius Guidelines के अनुसार, हलाल पशु का वध एक मानसिक रूप से स्वस्थ और इस्लामी प्रक्रिया से परिचित मुस्लिम द्वारा किया जाना चाहिए। प्रत्येक पशु को काटने से ठीक पहले ‘बिस्मिल्लाह’ कहा जाना चाहिए, पशु जीवित होना चाहिए, उपकरण तेज होना चाहिए और गर्दन की श्वासनली, भोजन नली तथा मुख्य रक्त वाहिकाएँ काटी जानी चाहिए। Codex यह भी स्वीकार करता है कि विभिन्न इस्लामी मतों और देशों के बीच हलाल की व्याख्या में अंतर हो सकता है।
इसी Codex में यह चेतावनी भी दी गई है कि हलाल लेबल का प्रयोग इस तरह नहीं होना चाहिए जिससे दूसरे खाद्य पदार्थों की सुरक्षा पर संदेह पैदा हो या यह दावा किया जाए कि हलाल भोजन स्वभावतः अधिक पौष्टिक या स्वास्थ्यवर्धक है। इससे साफ जाहिर होता है कि हलाल एक धार्मिक अनुरूपता का दावा है, सरकारी खाद्य-सुरक्षा प्रमाणपत्र नहीं है।
हलाल मांस को लेकर सबसे तीखा विवाद जानवर को काटने से पहले बेहोश करने पर होता है। सभी हलाल व्यवस्थाएँ एक जैसी नहीं हैं। कई मुस्लिम प्रमाणन संस्थाएँ reversible stunning स्वीकार करती हैं, जिसमें जानवर मरे बिना अस्थायी रूप से बेहोश होता है। कुछ संस्थाएँ बिना stunning किए वध को ही स्वीकार करती हैं।
Codex के अनुसार हलाल करने वाला व्यक्ति मुस्लिम होना चाहिए। व्यक्तिगत मजहबी उपभोग के संदर्भ में यह इस्लामी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन यदि किसी देश का पूरा मांस बाजार हलाल व्यवस्था पर निर्भर हो जाए तो पशु काटने का एक विशेष काम गैर-मुस्लिम कर्मचारियों के लिए व्यावहारिक रूप से बंद हो सकता है।

अधिकार की रक्षा हो, लेकिन छिपी अनिवार्यता नहीं: क्यों मुसीबत में व्यापारी

किसी भी मुस्लिम व्यक्ति को हलाल खाना खरीदने, उसकी पहचान करने और उसका सर्टिफिकेट माँगने का पूरा अधिकार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे देश का खाद्य उद्योग हलाल व्यवस्था को ही सामान्य नियम मान ले। यह भी जरूरी नहीं कि गैर-मुस्लिम ग्राहक और व्यापारी किसी मजहबी सर्टिफिकेट का खर्च उठाएँ या उसके नियम मानने के लिए मजबूर हों।
इसका सही रास्ता न तो हलाल सर्टिफिकेशन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना है और न ही उसे हर जगह अनिवार्य बनाना। हलाल सर्टिफिकेशन लोगों और कारोबारियों की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए। सर्टिफिकेट देने वाली संस्था और उसकी फीस की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। खाने के पैकेट पर साफ लिखा होना चाहिए कि वह हलाल प्रमाणित है या नहीं। बाजार में गैर-हलाल विकल्प भी आसानी से उपलब्ध रहने चाहिए। सरकारी खाद्य-सुरक्षा जाँच को किसी मजहबी प्रमाणपत्र से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
सरकारी खरीद में भी हलाल सर्टिफिकेट की शर्त केवल तभी लगनी चाहिए, जब भोजन खास तौर पर उन लोगों के लिए खरीदा जा रहा हो जिन्हें हलाल खाना चाहिए। इसके लिए भी स्पष्ट कानून या सरकारी नियम होना जरूरी है।
केन्या का यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि अदालत को यह तय नहीं करना है कि हलाल सही है या गलत। अदालत को यह तय करना है कि किसी निजी मजहबी संस्था को बाजार और कारोबार पर कितनी ताकत दी जा सकती है। मजहबी स्वतंत्रता का मतलब लोगों को विकल्प देना है। लेकिन बिना किसी कानून के उसी विकल्प को व्यापार करने की जरूरी शर्त बना देना स्वतंत्रता नहीं बल्कि बाजार पर निजी नियंत्रण बन सकता है।

‘बिना बुर्का के थाने क्यों ले गई पुलिस, उन पर एक्शन लो’: दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की मुस्लिम महिला की याचिका

                                                                                                                             प्रतीकात्मक चित्र
दिल्ली हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला को बिना बुर्का पहनाए थाने ले जाने के मामले में दायर एक याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में किसी मुस्लिम महिला को बिना बुर्का के थाने ले जाने की कार्रवाई को संवेदनशील मामला बताते हुए पुलिस पर कार्रवाई के साथ भविष्य के लिए निर्देश देने की माँग की गई थी। याचिकाकर्ता रेशमा ने खुद को पर्दानशीं बताते हुए पुलिस पर खुद को बिना बुर्का के पकड़ कर ले जाने का आरोप लगाया था। मामला की सुनवाई शुक्रवार (1 मार्च 2024) को हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मामला दिल्ली के थानाक्षेत्र चांदनी महल में पड़ने वाले रकाबगंज का है। यहाँ 2 लोगों ने खुद को पीड़ित बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत में उन्होंने 3 लोगों पर आरोप लगाया था। याचिकाकर्ता रेशमा इन तीनों आरोपितों की बहन हैं। बताया जा रहा है कि रेशमा ने बालकनी से सारा झगड़ा होते देखा था। दावा यह भी है कि जब रेशमा अपने भाइयों (जो मारपीट के आरोपित हैं) द्वारा 2 लोगों (जो मार खाए, पीड़ित हैं) को पीटते देख रही थीं, तब उन्होंने बुर्का नहीं पहना था।

रेशमा के वकील ने हाईकोर्ट में आरोप लगाया कि सुबह 3 बजे दिल्ली पुलिस उनकी मुवक्किल के घर में घुसी थी। याचिका में इस कार्रवाई के दौरान पुलिस पर अभद्रता करने के साथ रेशमा को घसीट कर थाने ले जाने की भी शिकायत की गई थी।

रेशमा का यह कहना था कि पुलिस पहले से जानती थी कि वह बुर्कानशीं महिला है लेकिन उन्हें पर्दा करने का भी टाइम नहीं दिया गया। याचिका में बुर्का को रेशमा ने अपनी व्यक्तिगत पसंद बताया था और पुलिस पर कार्रवाई की माँग की थी। इस दौरान भविष्य में भी पुलिस को बुर्का वाली महिलाओं के मामलों को संवेदनशील मान कर दिशा-निर्देश देने की माँग उठाई गई थी।

रेशमा के इन तमाम आरोपों पर पुलिस ने भी अपना पक्ष अदालत में रखा। तब पुलिस ने रेशमा द्वारा लगाए गए प्रताड़ना के तमाम आरोपों को गलत बताया था। पुलिस ने यह भी दावा किया था कि खुद रेशमा ने उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए बुलाया था। पुलिस के मुताबिक तब रेशमा को यह डर था कि कहीं वो लोग उन पर हमला न कर दें, जिन्हे रेशमा के 3 भाइयों ने मिल कर पीटा है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और उनके द्वारा पेश किए गए सबूतों पर गौर किया।

याचिका की सुनवाई के बाद दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा ने अपना फैसला सुनाया। जस्टिस शर्मा ने कहा कि पुलिस की जाँच में गोपनीयता जैसी बातों के लिए जगह नहीं हो सकती। अदालत ने सुरक्षा और न्याय को ही सबसे पहली प्राथमिकता बताते हुए कहा कि इन दोनों को सुनिश्चित करने के लिए पहचान आवश्यक होती है। अदालत ने कहा कि धार्मिक या व्यक्तिगत चॉइस के नाम पर प्राइवेसी का अधिकार मिल जाने से इसके दुरूपयोग की आशंका बढ़ेगी और जाँच में रुकावट खड़ी होगी।

अंत में अदालत ने रेशमा की याचिका ख़ारिज कर दी। रेशमा की तरफ से वकील एम सूफियान सिद्दीकी, आलिया, नियाजुद्दीन और राकेश भुंगरा ने बहस की जबकि दिल्ली पुलिस का पक्ष एडिशनल स्टैंडिंग काउंसिल रुपाली बंधोपाध्याय ने रखा था।

बलात्कार, घरेलू हिंसा और घटती नौकरियाँ… कारण जनसंख्या विस्फोट : वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय

अश्वनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में जनसंख्या के मुद्दे पर याचिका दायर की
जनसंख्या नियंत्रण एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर आए दिन बहस होती रहती है और इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई बार जनहित याचिका दायर कर देश में सख्त जनसंख्या नियंत्रण कानून को लागू करने की माँग भी की जाती रही है। हालाँकि, इसको लेकर अभी तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आए हैं। इसी क्रम में बीजेपी नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की है। उन्होंने ‘टू चाइल्ड पॉलिसी’ सहित कुछ कदम उठाने की माँग वाली इस जनहित याचिका में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पार्टी बनाने की माँग की है।

स्मरण हो, जब देश में इमरजेंसी थी, तब जनसंख्या विस्फोट को कांग्रेस के तत्कालीन नेता संजय गाँधी ने गंभीरता से लेते हुए "हम दो, हमारे दो" का नारा देकर देश को परिवार नियोजित करने के बाध्य किया, नसबंदी के अनेक कार्यक्रम हुए, लेकिन जब कांग्रेस ने अपने मुस्लिम वोटबैंक को नाराज होते देख नसबंदी केंद्रों का विरोध शुरू कर दिया, लेकिन संजय गाँधी पर इन विरोधों का असर न होते देख, उसे हिंसक बना दिया, उसके बावजूद संजय पर दंगे भी प्रभावहीन सिद्ध हुए। उन्होंने इस कार्यक्रम को व्यापी बनाने लिए हर सरकारी सुविधा के लिए नसबंदी के दो केस देने को कहा। उस दौर में आदेश लिखित नहीं मौखिक होते थे और किसी में संजय गाँधी के विरुद्ध बोलने का साहस नहीं था। आज प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध जिस प्रकार गाँधी परिवार बोलता है, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी में भी बेटे संजय के किसी मौखिक आदेश का विरोध करने का साहस नहीं था। ऐसे में वकील अश्विनी के इस कदम का विरोध करने की बजाए कांग्रेस विशेषकर राहुल और प्रियंका को इस कदम का समर्थन करना चाहिए।  

वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका में जनसंख्या विस्फोट को कई समस्याओं की जड़ बताया गया है। इनमें देश के प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक बोझ भी एक कारण है। उपाध्याय ने इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट में ऐसी ही याचिका दायर की थी, जिसे दिल्ली उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की है।

इससे पहले देश में फैमिली प्लानिंग का विरोध करते हुए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि फैमिली प्लानिंग परिवारों पर थोपना ठीक नहीं होगा। सरकार का यह मानना था कि ऐसा करने का विपरीत असर ये होगा कि क्षेत्र विशेष की डेमोग्राफी बदल सकती है, जो चिंता की बात होगी।

शीर्ष अदालत में दायर एक हलफनामे में केंद्र ने फैमिली प्लानिंग को लेकर अदालत को बताया था कि देश में परिवार कल्याण कार्यक्रम स्वैच्छिक प्रकृति का है। इसलिए लोग अपनी समझ से परिवार नियोजन करें और उनपर किसी तरह का कोई दबाव न हो।

देश में रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को मिलाएँ तो हम चीन से आगे

बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट स्वच्छ हवा के अधिकार, पेयजल, स्वास्थ्य, शांतिपूर्ण नींद, शेल्टर, आजीविका और सुरक्षा की गारंटी देने वाले संविधान के अनुच्छेद 21 और 21ए को मजबूत कर पाने में पूरी तरह से असफल रहा है। उन्होंने कहा कि 20 फीसदी आबादी के पास तो आधार कार्ड ही नहीं है। देश में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को जोड़ लिया जाए तो यह संख्या चीन से ज्यादा हो जाती है।
उपाध्याय का कहना है कि जनसंख्या विस्फोट बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसे जघन्य अपराधों के साथ-साथ भष्ट्राचार के बढ़ने का बड़ा कारण है। उन्होंने नौकरियों में कमी के अलावा प्रदूषण के लिए भी बढ़ती जनसंख्या को जिम्मेदार ठहराया है।