बलात्कार, घरेलू हिंसा और घटती नौकरियाँ… कारण जनसंख्या विस्फोट : वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय

अश्वनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में जनसंख्या के मुद्दे पर याचिका दायर की
जनसंख्या नियंत्रण एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर आए दिन बहस होती रहती है और इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई बार जनहित याचिका दायर कर देश में सख्त जनसंख्या नियंत्रण कानून को लागू करने की माँग भी की जाती रही है। हालाँकि, इसको लेकर अभी तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आए हैं। इसी क्रम में बीजेपी नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की है। उन्होंने ‘टू चाइल्ड पॉलिसी’ सहित कुछ कदम उठाने की माँग वाली इस जनहित याचिका में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पार्टी बनाने की माँग की है।

स्मरण हो, जब देश में इमरजेंसी थी, तब जनसंख्या विस्फोट को कांग्रेस के तत्कालीन नेता संजय गाँधी ने गंभीरता से लेते हुए "हम दो, हमारे दो" का नारा देकर देश को परिवार नियोजित करने के बाध्य किया, नसबंदी के अनेक कार्यक्रम हुए, लेकिन जब कांग्रेस ने अपने मुस्लिम वोटबैंक को नाराज होते देख नसबंदी केंद्रों का विरोध शुरू कर दिया, लेकिन संजय गाँधी पर इन विरोधों का असर न होते देख, उसे हिंसक बना दिया, उसके बावजूद संजय पर दंगे भी प्रभावहीन सिद्ध हुए। उन्होंने इस कार्यक्रम को व्यापी बनाने लिए हर सरकारी सुविधा के लिए नसबंदी के दो केस देने को कहा। उस दौर में आदेश लिखित नहीं मौखिक होते थे और किसी में संजय गाँधी के विरुद्ध बोलने का साहस नहीं था। आज प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध जिस प्रकार गाँधी परिवार बोलता है, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी में भी बेटे संजय के किसी मौखिक आदेश का विरोध करने का साहस नहीं था। ऐसे में वकील अश्विनी के इस कदम का विरोध करने की बजाए कांग्रेस विशेषकर राहुल और प्रियंका को इस कदम का समर्थन करना चाहिए।  

वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका में जनसंख्या विस्फोट को कई समस्याओं की जड़ बताया गया है। इनमें देश के प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक बोझ भी एक कारण है। उपाध्याय ने इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट में ऐसी ही याचिका दायर की थी, जिसे दिल्ली उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की है।

इससे पहले देश में फैमिली प्लानिंग का विरोध करते हुए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि फैमिली प्लानिंग परिवारों पर थोपना ठीक नहीं होगा। सरकार का यह मानना था कि ऐसा करने का विपरीत असर ये होगा कि क्षेत्र विशेष की डेमोग्राफी बदल सकती है, जो चिंता की बात होगी।

शीर्ष अदालत में दायर एक हलफनामे में केंद्र ने फैमिली प्लानिंग को लेकर अदालत को बताया था कि देश में परिवार कल्याण कार्यक्रम स्वैच्छिक प्रकृति का है। इसलिए लोग अपनी समझ से परिवार नियोजन करें और उनपर किसी तरह का कोई दबाव न हो।

देश में रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को मिलाएँ तो हम चीन से आगे

बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट स्वच्छ हवा के अधिकार, पेयजल, स्वास्थ्य, शांतिपूर्ण नींद, शेल्टर, आजीविका और सुरक्षा की गारंटी देने वाले संविधान के अनुच्छेद 21 और 21ए को मजबूत कर पाने में पूरी तरह से असफल रहा है। उन्होंने कहा कि 20 फीसदी आबादी के पास तो आधार कार्ड ही नहीं है। देश में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को जोड़ लिया जाए तो यह संख्या चीन से ज्यादा हो जाती है।
उपाध्याय का कहना है कि जनसंख्या विस्फोट बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसे जघन्य अपराधों के साथ-साथ भष्ट्राचार के बढ़ने का बड़ा कारण है। उन्होंने नौकरियों में कमी के अलावा प्रदूषण के लिए भी बढ़ती जनसंख्या को जिम्मेदार ठहराया है।

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