पश्चिम बंगाल कभी पूरे भारत के कारोबार का प्रमुख केंद्र माना जाता था, लेकिन आज ममता बनर्जी सरकार की गलत नीतियों के चलते यह उद्योगों की कब्रगाह बनता जा रहा है। एक तो वहां पहले से ही उद्योगों के आने में मुश्किलें दिख रही हैं और अब पश्चिम बंगाल सरकार ने एक ऐसा कानून बना दिया है, जिसके बाद कोई भी उद्योगपति वहां अपनी इंडस्ट्री लगाने से पहले 100 बार सोचेगा। हालात इतने खराब हो गए हैं कि अल्ट्राटेक, ग्रासिम और डालमिया सहित कई कंपनियां ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ कोलकाता हाईकोर्ट पहुंच चुकी हैं। उनका कहना है कि इस कानून से उद्योगों पर गहरा असर पड़ेगा। दरअसल, पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल में एक बिल पास किया है, जो कंपनियों को मिलने वाले अनुदान और प्रोत्साहन योजनाओं को खत्म करता है। इस कानून को सदन में पास भी किया जा चुका है। यह एक्ट कंपनियों को मिलने वाले सभी प्रोत्साहन को न सिर्फ खत्म करता है, बल्कि इसे साल 1993 से ही खत्म मान रहा है और तब से अब तक मिले सभी तरह की छूट और प्रोत्साहनों को वापस लौटाना होगा। इसका मतलब है कि पिछले 32 साल में जितनी भी स्कीम के तहत कंपनियों को छूट मिली होगी, सब सरकार को वापस करनी होंगी।
पहले नारीशक्ति को शोषण, अब उद्योगों को कब्रिस्तान बनाने वाला फैसला
महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद ममता बनर्जी के राज में महिलाओं के खिलाफ तो खूब ज्यादतियां हो ही रही हैं। अब ये सरकार उद्यमियों के खिलाफ भी मैदान में उतर आई है। सरकार ने उद्योग-धंधों की कब्रिस्तान बनाने वाला यह फैसला इस सच्चाई के बाद जानबूझकर लिया है कि ममता राज के 14 साल में 6500 सौ से ज्यादा कंपनियों ने बंगाल को ‘बाय-बाय’ बोल दिया है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के मुताबिक वर्ष 2011-12 से वर्ष 2024-25 के बीच पश्चिम बंगाल से 6688 कंपनियां राज्य छोड़ कर चली गई हैं। मंत्रालय के अनुसार, इनमें से एक तिहाई यानी 2200 से अधिक कंपनियां वर्ष 2019 के बाद से राज्य छोड़ कर गई हैं। यह आंकड़े भले ही चौंकाने वाले हों, लेकिन उद्योग-धंधों का पलायन और पश्चिम बंगाल का पुराना रिश्ता है। देश के बड़े कारोबारी घरानों के अपना मुख्यालय शिफ्ट करने से बड़े ब्रांड्स के फैक्ट्री बंद करने तक यही हाल बीते कई सालों से है। इसमें एक कारण ममता बनर्जी सरकार का उद्योग विरोधी रुख और राज्य की खस्ताहाल कानून-व्यवस्था है।
देश आगे बढ़ रहा, बंगाल में साढ़े छह हजार कंपनियों का पलायन
राज्य के उद्योगों के खिलाफ ममता बनर्जी का यह रुख पहली बार नजर नहीं आया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में राज्य औद्योगिक बदहाली के कगार पर है। कभी देश के औद्योगिक परिदृश्य में अग्रणी रहा पश्चिम बंगाल आज गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है। ममता राज में 2011 से 2025 के बीच सिर्फ 14 वर्षों में राज्य से 6,688 कंपनियां या तो बंद हो चुकी हैं या अन्य राज्यों में चली गई हैं। इन कंपनियों में 110 ऐसी भी थीं, जो देश के प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्टेड थीं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि राज्य के औद्योगिक पतन की दयनीय गाथा है। सवाल उठता है कि आज जब पूरा देश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों के कारण आर्थिक विकास और रोजगार सृजन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी चौथी अर्थव्यवस्था बन चुका है, तब आखिर पश्चिम बंगाल क्यों लगातार पिछड़ता जा रहा है? आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो राज्य कभी उद्योगों का केंद्र था, वह आज मजदूरों और पूंजीपतियों दोनों के लिए असुरक्षित और अव्यवहारिक बन गया है।
उद्योग-धंधों के खिलाफ कानून 32 साल पहले से लागू माना जाएगा
पश्चिम बंगाल के सिंगूर और नंदीग्राम की घटना तो याद ही होगी, जहां टाटा कंपनी के प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया था। अब एक बार फिर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने एक ऐसा कानून पास किया है, जिससे उद्योगों पर निश्चित रूप से बड़ा असर पड़ने वाला है। इसलिए कंपनियों और उद्यमियों ने इस कानून को असंवैधानिक बताया है। उनका आरोप है कि सरकार ने कानून बनाया अभी है, लेकिन इसे लागू कर रही है 32 साल पहले से यानी रेट्रोस्पेक्टिव से कर रही है, जो पूरी तरह असंवैधानिक है। क्योंकि पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल में जो बिल पास किया है, जो कंपनियों को मिलने वाले अनुदान और प्रोत्साहन योजनाओं को खत्म करता है। यह एक्ट कंपनियों को मिलने वाले सभी प्रोत्साहन को न सिर्फ खत्म करता है, बल्कि इसे साल 1993 से ही खत्म मान रहा है और तब से अब तक मिले सभी तरह की छूट और प्रोत्साहनों को वापस लौटाना होगा। इसका मतलब है कि करीब तीन दशक में जितनी भी स्कीम के तहत कंपनियों को छूट मिली है, सब सरकार को वापस लौटानी पड़ेगी।
वामपंथियों के बाद ममता सरकार लिख रही उद्योगों के अवसान की पटकथा
कभी एशिया की बड़ी औद्योगिक ताकतों में से एक गिने जाने वाले कोलकाता के अवसान की यह पटकथा ममता बनर्जी खुद अपने हाथों से लिख रही हैं। हालांकि वामपंथियों ने भी ऐसा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। इसी कारण राज्य में तृणमूल कांग्रेस की सरकार आई। लेकिन ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद इस पटकथा को अंतिम रूप दिया है और उद्योग-धंधों में इजाफा करने के बजाय उनके ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की कसर पूरी कर दी है। राज्य सरकार के अधिकारियों के अनुसार, पहले कंपनियों को टैक्स, भूमि अधिग्रहण, बिजली, ब्याज के भुगतान आदि पर सब्सिडी मिलती थी। अब प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों को कोई भी प्रोत्साहन, वित्तीय लाभ, सब्सिडी, ब्याज माफी, शुल्क या टैक्स में छूट आदि नहीं दी जाएगी। अब किसी भी कंपनी को अपने किसी भी तरह के बकाया राशि पर दावा करने का कोई अधिकार नहीं रहेगा।
डालमिया, अल्ट्राटेक, ग्रासिम जैसी कई कंपनियां हाइकोर्ट पहुंची
पश्चिम बंगाल में एक बार फिर उद्योगों और ममता बनर्जी सरकार के बीच टकराव गहरा गया है। राज्य सरकार ने हाल ही में एक ऐसा कानून पारित किया है जो उद्योग और उद्यमियों के खिलाफ है। इस फैसले के खिलाफ कई कंपनियों को कोलकाता हाईकोर्ट में याचिका लगानी पड़ी है। राज्य सरकार के मुताबिक अब किसी भी औद्योगिक इकाई को टैक्स छूट, ब्याज माफी, बिजली या भूमि अधिग्रहण पर सब्सिडी और किसी भी प्रकार का वित्तीय प्रोत्साहन नहीं दिया जाएगा। कंपनियों को किसी भी बकाया राशि पर दावा करने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया है। सरकार के इस कानून के खिलाफ अल्ट्राटेक सीमेंट, इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग लिमिटेड, ग्रासिम इंडस्ट्रीज, नुवोको विस्टास और डालमिया सीमेंट ने कलकत्ता हाईकोर्ट में अपील दाखिल की है। सभी कंपनियों ने इसके खिलाफ अलग-अलग अपील दाखिल की है, लेकिन हाईकोर्ट इन सभी पर 7 नवंबर को सुनवाई करेगी। कंपनियों का कहना है कि यह कानून उद्योग-विरोधी है और प्रावधान यह कहता है कि इसे पूरी तरह निरस्त किया जाए।
कंपनियों को तीन दशक में मिली छूट सरकार को वापस देनी पड़ेगी
इस कानून को पारित करते समय सरकार ने दावा किया था कि इसका मकसद राज्य में चल रही तमाम कल्याणकारी योजनाओं को वित्तीय मदद उपलब्ध कराना है। लेकिन असल में राज्य सरकार ने इस कानून को लाकर उद्यमियों को मिल रही कल्याणकारी योजनाओं का रास्ता ही बंद कर दिया है। सरकार ने कंपनियों को छूट और रियायत बंद करते उद्योगों और उद्यमियों के पेट पर लात मारी है। उद्योग मामले एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि बिल पास होने के बाद कंपनियों ने इससे कारोबार में समस्या आने की बात कही थी। तब सरकार ने उन्हें बताया कि वह इस समस्या को हल करने के लिए नई औद्योगिक नीति बना रही है। लेकिन इंडस्ट्री फ्रेंडली कोई नीति लाने के बजाए उद्योग-विरोधी कानून को लागू कर दिया गया। जब सरकार ने उद्यमियों की कोई बात नहीं सुनी, तो मजबूरन उन्हें कोर्ट जाना पड़ा है।
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