भारत में घुसपैठ पर 900 करोड़ रूपए साल खर्च करते हैं बांग्लादेशी, 1000 घाटों पर चलता अवैध कारोबार: शुभेंदु सरकार आई तो बंद हुआ बिचौलियों का धंधा

घुसपैठ को नासूर बनाने वाली हमारी भारत सरकार ही है। सियासतखोर नेता और उनकी पार्टियां कुछ काम करने की बजाए हिन्दू-मुसलमान कर जनता को गुमराह कर कुर्सी पर बैठते रहे। घुसपैठियों को घर में घुसाकर दामादों की तरह पाल अपने ही देश की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने का काम होता रहा है। जबकि दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं जहां घुसपैठियों को चोर रास्ते से घर में घुसा दामादों की तरह लालन-पालन करे। रोहिंग्या जिन्हे कोई मुस्लिम देश तक रखने को तैयार नहीं लेकिन भारत में सियासतखोर नेता और उनकी पार्टियां दामादों की तरह उनका बचाव करती हैं। क्या ऐसी पार्टियां देशहित में कोई काम कर सकती हैं? अपने आपको राष्ट्रवादी कहने वाली बीजेपी भी इस गंभीर मसले पर ज्यादा सख्त नहीं। हाँ, कुछ मुख्यमंत्री जरूर सख्ती से काम कर रहे हैं।       
घुसपैठियों को निकालने पर कट्टरपंथी और उनको समर्थन देने वाली पार्टियां दुष्प्रचार कर रही हैं कि भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं और मुसलमान भी इसे सच मान मोदी सरकार की कार्य क्षमता पर शक कर रहा है। 

कहने को पाकिस्तान कंगाली के दौर से गुजर रहा है। हाथ में कटोरा लिए घूम रहा है लेकिन आतंकवाद और भारत में दंगे/जेहाद पर खूब पैसा खर्च कर रहा है। बांग्लादेश जिसे भारत सरकार हर साल करोडो रुपया मानवीय सहायता देती है, क्यों? भारत में घुसपैठी भेजने पर जो पैसा खर्च हो रहा है कहाँ से आ रहा है? इस पर भी मोदी सरकार को गंभीरता से चिंतन करना होगा।     

भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ को लेकर सामने आई एक विस्तृत पड़ताल में एक पूर्व बिचौलिए ने कई बड़े दावे किए हैं। उसके मुताबिक, वर्षों तक सीमा पार लोगों की आवाजाही कराने वाला एक संगठित नेटवर्क सक्रिय था, जिसका सालाना कारोबार करीब 800 से 900 करोड़ रुपए तक था।

उत्तर 24 परगना के सीमा क्षेत्र से जुड़े इस बिचौलिए ने दावा किया कि इस नेटवर्क में सीमा के दोनों ओर मौजूद एजेंट, स्थानीय संपर्क, डिजिटल भुगतान व्यवस्था और फर्जी दस्तावेज तैयार कराने वाले लोग शामिल थे।

सत्ता के गलियारों में यह चर्चा भी गर्म है कि जिस तरह मुख्यमंत्री शुभेन्दु हरकत में हैं कभी भी उन सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों पर गाज गिर सकती जिन्होंने घुसपैठियों को राशन कार्ड, पहचान पत्र और दूसरी सरकारी सुविधाएं दिलवाई। दस्तावेज ऐसे ही नहीं बन गए। सबने अपनी-अपनी कमीशन जरूर ली होगी। जो इनके बैंक खातों की जाँच होने पर ही सामने आ पाएगा।  

TMC में बिखराव ऐसे ही नहीं हुआ है, इसके पीछे भी बहुत गहरा षड़यंत्र है। शक है कि इन घुसपैठियों को दामाद मान आबाद करवाने में इन लोगों का भी हाथ है। आज अपने आपको दूध का धुला साबित करने और मुख्यमंत्री के प्रकोप से बचने के लिए सब ममता का साथ छोड़ रहे हैं। और शायद यही कारण है कि बीजेपी ने इन बागियों को अपनी पार्टी में शामिल नहीं करने की बजाए त्रिपुरा की पार्टी में शामिल होने को कहा है।    

हालाँकि नवंबर 2025 में राज्य में मतदाता सूची के SIR अभियान शुरू होने और पिछले महीने भाजपा सरकार के आने से परिस्थितियाँ बदल गईं, जिसके चलते यह कारोबार लगभग बंद होने की स्थिति में पहुँच गया।

‘घाट’ और ‘लाइनमैन’ के जरिए होती थी घुसपैठ

आनंदबाजार पत्रिका में पूर्व बिचौलिए के हवाले से दावा किया गया कि भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़े कई इलाकों में ऐसे ‘घाट’ (1000 घाट) मौजूद थे, जहाँ से लोगों को सीमा पार कराया जाता था। उसके अनुसार, यह तय किया जाता था कि किस स्थान पर कब निगरानी कम है और उसी के आधार पर गतिविधियाँ संचालित होती थीं।

दावे के मुताबिक, भारतीय सीमा क्षेत्र में खेतों और झाड़ियों के बीच छिपकर बैठे कुछ लोग निगरानी करते थे और सीमा सुरक्षा बल की गश्त की जानकारी दूसरी ओर पहुँचाते थे। जब रास्ता सुरक्षित माना जाता, तब सीमापार आवाजाही कराई जाती थी। रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रक्रिया केवल रात तक सीमित नहीं थी, बल्कि अवसर मिलने पर दिन में भी की जाती थी।

फोन, Sim और भुगतान के जरिए चलता था संपर्क

बिचौलिए ने दावा किया कि सीमा के दोनों ओर मौजूद लोगों के बीच लगातार संपर्क बना रहता था। इसके लिए भारतीय और बांग्लादेशी सिम कार्ड का इस्तेमाल किया जाता था। कई बार डिजिटल माध्यमों से पैसों का लेनदेन भी होने का दावा किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, सीमा पार पहुँचने के बाद लोगों को नजदीकी बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन तक पहुँचाने की जिम्मेदारी स्थानीय नेटवर्क संभालता था। इसके बाद उन्हें बड़े शहरों तक भेजने के लिए अलग व्यवस्था की जाती थी। इस पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर पर भुगतान तय रहता था।

कमाई का मॉडल और सुरक्षा एजेंसियों को लेकर दावे

दावों के अनुसार, सीमा पार कराने के बदले प्रति व्यक्ति तय रकम ली जाती थी और उसका बंटवारा नेटवर्क से जुड़े अलग-अलग लोगों के बीच होता था। बिचौलिए का दावा है कि कुछ सीमावर्ती हिस्सों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग लाए जाते थे और इसी आधार पर पूरे कारोबार का आकार काफी बड़ा हो गया था।

रिपोर्ट में कुछ स्थानीय लोगों के हवाले से यह भी दावा किया गया कि सीमा पार के कुछ तत्वों को आर्थिक लाभ देकर गतिविधियों को आसान बनाया जाता था। वहीं यह भी कहा गया कि पिछले कुछ वर्षों में निगरानी बढ़ने और हालिया सत्यापन प्रक्रियाओं के बाद इस तरह की गतिविधियों में गिरावट आई है।

फर्जी दस्तावेजों का नेटवर्क और स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के आरोप

पड़ताल में यह भी दावा किया गया कि सीमा पार आने के बाद पहचान स्थापित करने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार कराने का समानांतर तंत्र मौजूद था। आरोप लगाए गए कि कुछ मामलों में जन्म प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र, आधार, वोटर ID और PAN कार्ड जैसे दस्तावेज हासिल कराने के लिए स्थानीय स्तर पर संपर्कों का इस्तेमाल किया जाता था। रिपोर्ट में कुछ पूर्व स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक तंत्र से जुड़े लोगों पर भी आरोप लगाए गए हैं कि वे ऐसे दस्तावेज तैयार कराने में मदद करते थे।

No comments: