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| पूर्व PM इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की Grok AI जनरेटेड तस्वीर, भाजपा MP निशिकांत दुबे (बाएँ) |
संविधान के मूल स्वरुप को बिगाड़ने वाले द्वारा जब संविधान की रक्षा का शोर मचाने वालों के कुकर्म को चोर मचाये शोर नहीं कहा जायेगा तो क्या कहा जायेगा? सोनिया गाँधी जिसे परिवार 'राजमाता' कहते है वही सोनिया उस FDL-AP की co-president जो कश्मीर विरोधी संगठन है। इतना ही नहीं कई पत्रकार भी शामिल हैं। यही वजह है कि कांग्रेस कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देती रही। अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करती है। INDI गठबंधन को समर्थन देने वाली जनता को इन पार्टियों से जवाब मांगना चाहिए।
ट्विटर/एक्स पर निशिकांत दुबे ने ‘कांग्रेस, करप्शन और गुलामी’ शीर्षक के साथ किए पोस्ट में ये दावा किया है। उन्होंने कहा है;
- ये अवर्गीकृत गुप्त दस्तावेज सीआईए का 2011 में जारी हुआ।
- कांग्रेस के बड़े नेता एचकेएल भगत की अगुवाई में 150 से ज्यादा कांग्रेस के सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे, रूस के लिए दलाली करते थे?
- पत्रकारों का एक समूह दलाल था, कुल 16000 न्यूज आर्टिकल रूस ने छपवाए?
- उस जमाने में रूस के जासूसी संस्थानों के 1100 लोग हिन्दुस्तान में थे जो नौकरशाही, व्यापारी संगठनों, कम्युनिस्ट पार्टियों, ओपिनियन मेकर को अपने पॉकेट में रखते थे और सूचना के आधार पर भारत की नीति बनाते थे?
- कांग्रेस की उम्मीदवार सुभद्रा जोशी ने लोकसभा चुनाव में उस वक्त 5 लाख रुपए लिए जर्मन सरकार से चुनाव के नाम पर, हारने के बाद इंडो जर्मन फोरम की अध्यक्ष बनीं।
कांग्रेस,करप्सन और ग़ुलामी
— Dr Nishikant Dubey (@nishikant_dubey) June 30, 2025
1. यह अवर्गीकृत गुप्त दस्तावेज CIA का 2011 में जारी हुआ
2. इसके अनुसार स्वर्गीय कांग्रेस के बड़े नेता HKL भगत के नेतृत्व में 150 से ज़्यादा कॉंग्रेस के सांसद सोवियत रुस के पैसे पर पलते थे,रुस के लिए दलाली करते थे?
3. पत्रकारों के समूह उनके दलाल थे तथा… pic.twitter.com/ozKx9nPUCe
इन दस्तावेजों से पता चलता है कि केजीबी के पैसे की वजह से भारत के ढेरो नेता सोवियत संघ की मुट्ठी में थे और वे भारतीय राजनीति को अपने हितों के हिसाब से प्रभावित करते थे। मित्रोकिन की किताब में भी यह बात कही गई है। केजीबी के लीक दस्तावेजों में भारत को तीसरी दुनिया की सरकारों में केजीबी के घुसपैठ का एक मॉडल बताया गया था। इन दस्तावेजों में साफ तौर पर भारत सरकार में केजीबी के बहुत से सूत्र होने की बात कही गई थी।
साभार: indiafacts.orgऐसा भी नहीं है कि इंदिरा के बाद विदेश से पैसा लेने की कांग्रेस की आदत छूट गई। दस्तावेज बताते हैं कि सोवियत संघ से पैसा लेने का जो सिलसिला इंदिरा गाँधी के जमाने में शुरू हुआ था वह राजीव गाँधी के जमाने में भी जारी रहा है। हालॉंकि इस दौर में सोवियत संघ का प्रभाव कुछ सीमित करने की कोशिश भी हुई थी।
साभार: indiafacts.orgये दस्तावेज मीडिया में भी केजीबी की घुसपैठ के बारे में बताते हैं। इसके अनुसार सोवियत संघ ने अपने प्रोपेगेंडा के प्रचार के लिए भारत के बड़े मीडिया संस्थानों के साथ व्यापक पैमाने पर साँठगाँठ कर रखी थी। वे उसकी जरूरत के हिसाब से लेख लिखते थे। यहाँ तक की संपादकीय में भी सोवियत संघ की धुन बजाते थे। जिन संस्थानों का जिक्र है उनमें टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द स्टेट्समैन, द हिंदू शामिल है।
मित्रोकिन ने अपनी किताब में बताया है कि सोवियत संघ ने इस काम के लिए भारत में 40-50 पत्रकार रखे थे। बाद के सालों में इनकी संख्या बढ़कर 200 से 300 हो गई थी।









