Showing posts with label #KGB. Show all posts
Showing posts with label #KGB. Show all posts

रूस से पैसा लेते थे 150+ कांग्रेस सांसद, पत्रकारों ने दलाली में लिखे 16000 आर्टिकल- निशिकांत दुबे ने ‘कठपुतली गैंग’ की खोली पोल: इंदिरा हो या राजीव, DNA में ‘सूटकेस कल्चर’


पूर्व PM इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की Grok AI जनरेटेड तस्वीर, भाजपा MP निशिकांत दुबे (बाएँ)
भारत में बिकाऊ लोगों की कमताई नहीं। कदम-कदम पर बिकाऊ जयचन्द और मीर ज़ाफ़र की औलादें मिल जाएँगी। देशहित में वर्तमान मोदी सरकार को इसकी जाँच कर सच्चाई को सामने लानी चाहिए। इन मुद्दों पर दर्ज होने मुकदमों की सुनवाई करने वाली निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट और इनकी पैरवी करने वकीलों पर गिद्ध की निगाह रख सबके खातों की जाँच करवानी चाहिए। अगर किसी भी रूप में इनके बचाव में निर्णय दिया जाता है। इन मुद्दों पर ऐसे ही सख्ती से पेश आना जैसाकि पाकिस्तान के साथ। 
आज विपक्ष खासतौर से कांग्रेस देश में लोकतंत्र और संविधान खतरे पर चीखाचिल्ली कर देश को गुमराह कर चोर मचाए शोर वाली हालत किये हुए है। ऐसा इसलिए कि जनता ही इतनी भुलक्कड़ है जो इनके कुकर्मों को भूल इनके पाखंड के चक्रव्यू में फंसते रहे हैं। EVM को लागू करने वाले ही इसको हटा बैलेट पेपर लाने का शोर मचा रहे हैं ताकि इनके गुंडे बैलेट बॉक्स लूटने और बैलेट पेपर फाड़ने के काम लग जाए। 
दूसरे, भारत में CAA विरोध में बने शाहीन बागों से लेकर हुए प्रदर्शन, धरने और उपद्रव आदि कोई जनता के हित में नहीं किए गए थे बल्कि जॉर्ज सोरोस और अन्य भारत विरोधियों की दी भीख के धन से कर दुनिया में भारत को बदनाम करने का दुस्साहस किया जा रहा है। अक्ल से पैदल जनता समझती है कि मोदी सरकार जनता के साथ बहुत अन्याय कर रही है। जो विरोधी भारत विरोधियों की हाथ कठपुतली बन देश में उपद्रव कर जनता को गुमराह करने वाले क्या देशहित में काम कर सकते हैं। 
 
 
दूसरे, LoP राहुल गाँधी की कार्यशैली क्या पद के अनुरूप है? स्वतंत्रता सेनानियों को ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांगने वाला बताए क्या साबित करना चाहता है? साबित करता है कि इस आदमी को भारतीय इतिहास का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं।   
संविधान के मूल स्वरुप को बिगाड़ने वाले द्वारा जब संविधान की रक्षा का शोर मचाने वालों के कुकर्म को चोर मचाये शोर नहीं कहा जायेगा तो क्या कहा जायेगा? 
सोनिया गाँधी जिसे परिवार 'राजमाता' कहते है वही सोनिया उस FDL-AP की co-president जो कश्मीर विरोधी संगठन है। इतना ही नहीं कई पत्रकार भी शामिल हैं। यही वजह है कि कांग्रेस कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देती रही। अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करती है। INDI गठबंधन को समर्थन देने वाली जनता को इन पार्टियों से जवाब मांगना चाहिए।    
झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया है कि कभी कांग्रेस के 150 से अधिक सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे। उनका कहना है कि पत्रकारों के एक समूह भी रूस का दलाल था।

ट्विटर/एक्स पर निशिकांत दुबे ने ‘कांग्रेस, करप्शन और गुलामी’ शीर्षक के साथ किए पोस्ट में ये दावा किया है। उन्होंने कहा है;

  1. ये अवर्गीकृत गुप्त दस्तावेज सीआईए का 2011 में जारी हुआ।
  2. कांग्रेस के बड़े नेता एचकेएल भगत की अगुवाई में 150 से ज्यादा कांग्रेस के सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे, रूस के लिए दलाली करते थे?
  3. पत्रकारों का एक समूह दलाल था, कुल 16000 न्यूज आर्टिकल रूस ने छपवाए?
  4. उस जमाने में रूस के जासूसी संस्थानों के 1100 लोग हिन्दुस्तान में थे जो नौकरशाही, व्यापारी संगठनों, कम्युनिस्ट पार्टियों, ओपिनियन मेकर को अपने पॉकेट में रखते थे और सूचना के आधार पर भारत की नीति बनाते थे?
  5. कांग्रेस की उम्मीदवार सुभद्रा जोशी ने लोकसभा चुनाव में उस वक्त 5 लाख रुपए लिए जर्मन सरकार से चुनाव के नाम पर, हारने के बाद इंडो जर्मन फोरम की अध्यक्ष बनीं।
उन्होंने लिखा है, “यह देश था या ग़ुलामों, दलालों या बिचौलियों की कठपुतली। कांग्रेस इसका जवाब दे, आज इस पर जाँच हो या नहीं?”
यह पहला मौका नहीं है जब रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी से पैसे लेने और उनके इशारे पर काम करने का आरोप कांग्रेस पर लगा है। इससे पहले भी इंदिरा गाँधी और उनके बेटे राजीव के जमाने में कॉन्ग्रेस के ‘ब्रीफकेस कल्चर’ को लेकर को लेकर तथ्य सामने आ चुके हैं।
2017 की शुरुआत में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के कुछ पुराने गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए गए थे। इससे पता चलता है कि इंदिरा गाँधी के जमाने में कांग्रेस के 40 फीसदी सांसदों को सोवियत संघ से पैसा मिला था। 2005 में केजीबी के ही एक पूर्व जासूस वासिली मित्रोकिन की किताब आई थी। इसमें तो बकायदा बताया गया है कि खुद इंदिरा गाँधी को सूटकेसों में भरकर पैसे भेजे गए थे।
                                                                                                                                                                                           साभार: indiafacts.org
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने ऑपइंडिया को बताया था कि जो तथ्य सार्वजनिक हुए, उससे जाहिर होता है कि 1967 के आम चुनाव के वक्त कांग्रेस सहित देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों को विदेश से पैसा मिला था। उन्होंने बताया था कि शीत युद्ध के जमाने में कम्युनिस्ट देश जहाँ भारत में साम्यवाद के फैलाव के लिए पैसे खर्च कर रहे थे, तो पूँजीवादी देश साम्यवाद को रोकने के लिए। ऐसे में जब सत्ताधारी दल का नेता ही बिकने को तैयार हो तो विदेशी ताकतों के लिए चीजें आसान हो जाती है।
किशोर ने ऐसी कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए एक फेसबुक पोस्ट भी लिखा है। इसमें उन्होंने बताया है कि विदेश से पैसा लेने के मामले की जाँच भी कराई गई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट दबा दी गई। जब कुछ विपक्षी सांसदों ने इसे सार्वजनिक करने की माँग की तो तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री यशवंत राव चव्हाण ने संसद में कहा कि जिन दलों और नेताओं को विदेशों से धन मिले हैं, उनके नाम जाहिर नहीं किए जा सकते, क्योंकि इससे उनके हितों को नुकसान पहुँचेगा।

लेकिन, सालों तक जिन तथ्यों को कांग्रेस छिपाती रही उसे मित्रोकिन ने 2005 में दुनिया के सामने ला दिया। वे सोवियत संघ के जमाने के हजारों गोपनीय दस्तावेज चुराकर देश से बाहर ले गए थे। बाद में इसके आधार पर क्रिस्टोफर एंड्रयू (Christopher Andrew) के साथ मिलकर किताबें लिखी। द वर्ल्ड वॉज गोइंग आवर वे (The World Was Going Our Way) नामक किताब में कहा गया है कि केजीबी ने 1970 के दशक में पूर्व रक्षा मंत्री वीके मेनन के अलावा चार अन्य केंद्रीय मंत्रियों को भी चुनाव प्रचार के लिए फंड दिया था।
2017 में सामने आई दिसंबर 1985 की सीआईए की रिपोर्ट में बताया गया है कि सोवियत संघ ने भारतीय कारोबारियों के साथ समझौतों के जरिए कांग्रेस पार्टी को रिश्वत दी थी। सोवियत संघ का दूतावास कांग्रेस नेताओं को छिपकर रकम देने सहित कई खर्चों के लिए बड़ा रिजर्व रखता था। इसके मुताबिक कांग्रेस के अलावा सीपीआई और सीपीएम को भी सोवियत संघ से काफी पैसा मिलता था। ऐसा नहीं है कि सभी को पैसे ही दिए गए थे। कुछ के साथ तो सोवियत संघ ने बकायदा समझौता भी किया था।

इन दस्तावेजों से पता चलता है कि केजीबी के पैसे की वजह से भारत के ढेरो नेता सोवियत संघ की मुट्ठी में थे और वे भारतीय राजनीति को अपने हितों के हिसाब से प्रभावित करते थे। मित्रोकिन की किताब में भी यह बात कही गई है। केजीबी के लीक दस्तावेजों में भारत को तीसरी दुनिया की सरकारों में केजीबी के घुसपैठ का एक मॉडल बताया गया था। इन दस्तावेजों में साफ तौर पर भारत सरकार में केजीबी के बहुत से सूत्र होने की बात कही गई थी।

                                                                                                                                                                                               साभार: indiafacts.org

ऐसा भी नहीं है कि इंदिरा के बाद विदेश से पैसा लेने की कांग्रेस की आदत छूट गई। दस्तावेज बताते हैं कि सोवियत संघ से पैसा लेने का जो सिलसिला इंदिरा गाँधी के जमाने में शुरू हुआ था वह राजीव गाँधी के जमाने में भी जारी रहा है। हालॉंकि इस दौर में सोवियत संघ का प्रभाव कुछ सीमित करने की कोशिश भी हुई थी।

                                                                                                                                                                                                 साभार: indiafacts.org

ये दस्तावेज मीडिया में भी केजीबी की घुसपैठ के बारे में बताते हैं। इसके अनुसार सोवियत संघ ने अपने प्रोपेगेंडा के प्रचार के लिए भारत के बड़े मीडिया संस्थानों के साथ व्यापक पैमाने पर साँठगाँठ कर रखी थी। वे उसकी जरूरत के हिसाब से लेख लिखते थे। यहाँ तक की संपादकीय में भी सोवियत संघ की धुन बजाते थे। जिन संस्थानों का जिक्र है उनमें टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द स्टेट्समैन, द हिंदू शामिल है।

मित्रोकिन ने अपनी किताब में बताया है कि सोवियत संघ ने इस काम के लिए भारत में 40-50 पत्रकार रखे थे। बाद के सालों में इनकी संख्या बढ़कर 200 से 300 हो गई थी।

RAW को भी पूछना चाहिए कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA, फोर्ड फाउंडेशन और केजरीवाल में क्या है कनेक्शन?


दिल्ली शराब घोटाले में अरविंद केजरीवाल गिरफ्तार हो चुके हैं। अब RAW को भी केजरीवाल से पूछताछ करनी चाहिए। भारत में पाकिस्तानी गुप्तचरों पर तो चर्चा होती रहती है, लेकिन RAW और KGB दलालों के बारे में पूछताछ जरुरी है। आम आदमी पार्टी पर खालिस्तान समर्थक होने के आरोप लगते रहे हैं। इसका ताजा सबूत हाल ही में देखने को मिला जब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा आंख का आपरेशन कराने ब्रिटेन पहुंचे और वहां पहुंचते ही उन्होंने खालिस्तान समर्थक ब्रिटिश सांसद प्रीत गिल से मुलाकात की। यह भी किसी से छुपा नहीं है भारत में खालिस्तान आंदोलन को अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA हवा देती रही है। अमेरिका जिस तरह से खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू का बचाव करती है उससे भी साफ है कि पन्नू उसका एसेट है। क्या भारत में भी अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के एसेट हैं। केजरीवाल जब एक सरकारी कर्मचारी थे उसी समय से अपने एनजीओ के लिए फोर्ड फाउंडेशन से फंडिंग लेते रहे। फोर्ड फाउंडेशन को CIA फंडिंग करती है। ऐसे में सवाल उठता है कि CIA, फोर्ड फाउंडेशन और केजरीवाल के बीच कोई कनेक्शन है क्या? केजरीवाल के आवास से ईडी अधिकारियों से जुड़े दस्तावेज बरामद होना क्या इस ओर इशारा कर रही है कि भारत के खिलाफ कोई बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश रची जा रही है। 

फोर्ड फाउंडेशन को फंड करती है CIA
अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के डिक्लासीफाइड दस्तावेज के अनुसार, फोर्ड फाउंडेशन की परियोजनाओं के वित्तपोषण में CIA उनका भागीदार था। परियोजनाएं राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक युद्ध में शामिल हैं।

CIA, फोर्ड फाउंडेशन और मैग्सेसे पुरस्कार के बीच संबंध के सबूत
अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के कई दस्तावेज हैं, जो स्पष्ट रूप से CIA, फोर्ड फाउंडेशन और मैग्सेसे पुरस्कार के बीच संबंध दिखाते हैं।

केजरीवाल के एनजीओ की फंडिंग फोर्ड फाउंडेशन से
जनवरी 2000 में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया ने एक एनजीओ ‘संपूर्ण परिवर्तन’ उर्फ ​​’परिवर्तन’ शुरू किया। इसकी शुरुआत ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ की मदद से की गई थी लेकिन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल को फंडिंग कौन कर रहा था? फंडिंग कर रहा था फोर्ड फाउंडेशन और डीप स्टेट एजेंट जार्ज सोरोस!

केजरीवाल जब सरकारी कर्मचारी थे तभी से मिल रही फंडिंग
वर्ष 2002 में, फोर्ड फाउंडेशन ने केजरीवाल के वित्त पोषित एनजीओ ‘संपूर्ण परिवर्तन’ उर्फ ​​’परिवर्तन’ को सीधे फंड देना शुरू कर दिया। कृपया ध्यान दें कि वह उस समय भी एक सरकारी कर्मचारी थे!

केजरीवाल अशोका ‘फेलो’ बने, फंडिंग फोर्ड फाउंडेशन से
वर्ष 2004 में अरविंद केजरीवाल अशोका ‘फेलो’ बने। क्या आप जानते हैं कि अशोका में फेलोशिप का वित्तपोषण कौन करता है? यहां भी फोर्ड फाउंडेशन ही फंडिंग करता है।

रेमन मैग्सेसे पुरस्कार की फंडिंग फोर्ड फाउंडेशन से
अरविंद केजरीवाल को 2006 में इमरजेंट लीडरशिप की श्रेणी में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला। आप यह जान कर चौंक जाएंगे कि इस पुरस्कार के लिए फंडिंग फोर्ड फाउंडेशन ही करता है।

रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता एल रामदास AAP से जुड़े
वर्ष 2004 में, एडमिरल लक्ष्मीनारायण रामदास, पीवीएसएम, एवीएसएम, वीआरसी, वीएसएम (सेवानिवृत्त), पूर्व नौसेना प्रमुख को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला। बाद में एल रामदास AAP के आंतरिक लोकपाल बने!

एल रामदास की बेटी फोर्ड फाउंडेशन में सलाहकार
रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता एल रामदास की बेटी कविता रामदास, फोर्ड फाउंडेशन के अध्यक्ष की वरिष्ठ सलाहकार हैं और पहले कई वर्षों तक भारत में फोर्ड फाउंडेशन के देश प्रतिनिधि के रूप में काम कर चुकी हैं। उन्होंने जार्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन के साथ भी काम किया है!

केजरीवाल Aid Sathi चुने गए
केजरीवाल को 2006 में एड-इंडिया एनजीओ द्वारा Aid Sathi के रूप में चुना गया था। Aid Sathi को बिना किसी विशिष्ट परियोजना के धन, प्रचार और समर्थन प्राप्त होता है!
फिर, इस एनजीओ को फोर्ड फाउंडेशन से भी फंड मिलता है!

मेधा पाटकर को AID-इंडिया फंडिंग
मेधा पाटकर को भी AID-इंडिया फंडिंग कर रही थी। केजरीवाल उसके काम को बढ़ावा देने में भी पूरी तरह शामिल थे। एक समय गुजरात में मेधा पाटकर को आम आदमी पार्टी की मुख्यमंत्री चेहरा बनाने की भी बात चल रही थी वहीं मेधा पाटकर ने भी आम आदमी पार्टी का खुलकर समर्थन किया है।

‘आयरन लेडी’ इंदिरा गांधी रूसी खुफिया एजेंसी 𝗞𝗚𝗕 की कठपुतली को कोड नाम दिया गया था 𝗩𝗔𝗡𝗢

आज जिस तरह परदे के पीछे छिपे भारतीय राजनीति का गंद सामने आना शुरू हुआ, वह राजनेताओं पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है, जिसे झुठलाना शायद गली-कूचे के नेता से लेकर किसी राजनेता के लिए असंभव हो। कहते है, 'हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या' यानि जब किसी पार्टी को सदन में बहुमत करने की स्थिति में अपने-अपने सदस्यों को गुलाम अथवा बंधक की भांति किसी गुप्त स्थान या रिसोर्ट में ले जाया जाता है, कहीं गुलाम/बंधक को खरीदार न मिल जाये, दूसरे अर्थों में कहा जाए कि जनता किसी जनसेवक नहीं बल्कि बिकाऊ गुलाम/बंधक को अपना जनहितैषी मान वोट देकर आती है। कहाँ से आता है चुनाव उपरांत पार्टियों द्वारा इतना खर्चा करने के लिए धन? निम्न रपट सिद्ध करती है कि भारत के नेता ही नहीं सरकारें तक समय-समय पर बिकती रही हैं। 

जहाँ तक रूस और इंदिरा गाँधी के राजनीतिक व्यक्तित्व की बात है, इसकी सच्चाई को तत्कालीन भारतीय जनसंघ वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के जीवित नेता लालकृष्ण आडवाणी सहित अन्य दलों के नेताओं को बतानी होगी कि "इंदिरा गाँधी से वह कौन-सा प्रश्न था जिसे  दिल्ली के तत्कालीन सांसद प्रो बलराज मधोक द्वारा किये जाते ही तुरंत अटल बिहारी वाजपेयी ने माफ़ी मांगते हुए संसद की कार्यवाही से निकालने के अनुरोध करने के साथ ही प्रो मधोक को पार्टी से निकाल तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष से प्रो मधोक को जनसंघ से अलग स्थान देने को कहा था?" प्रश्न अशोभनीय जरूर था, लेकिन देशहित में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और तत्कालीन सोवियत यूनियन वर्तमान रूस के बीच गुप्त सम्बन्धों को उजागर कर रहा था। जिन पत्रकारों ने अपनी रपट में इस सच्चाई को प्रकाशित किया था, केंद्र सरकार द्वारा उस पत्रकार के साथ अख़बार पर भी कार्यवाही की थी। दूसरे, तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु नहीं हत्या भी ताशकंत(रूस) में ही हुई थी। शास्त्री जी शरीर नीला पड़ने पर पोस्टमार्टम न करवाने के अलावा परिवार को दूर रखने का प्रयास किया गया था, परन्तु धर्मपत्नी ललिता शास्त्री द्वारा हंगामा किये जाने उपरांत ही परिवार को पास जाने दिया गया था।    

रूस की खुफिया एजेंसी KGB के दस्तावेजों को संभालने वाले वैसिली मित्रोखिन ने 1992 में ब्रिटेन में शरण ली थी। वह अपने साथ KGB की फाइलों का जखीरा भी ले गए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार कैंब्रिज के इतिहासकार क्रिस्टोफर एंड्रयू ने दो किताबें लिखीं। 2005 में आई किताब ‘द मित्रोखिन आर्काइव II’ ने भारत के बारे में कई सनसनीखेज खुलासे किए। किताब के अनुसार, भारत में नेता से लेकर नौकरशाह तक, सब के सब पैसे के लिए देश के हितों से समझौता करने को तैयार थे। इंदिरा गांधी को सूटकेसों में भरकर पैसे दिए जाते थे वहीं केजीबी के मार्फत इंदिरा गांधी के जमाने में कांग्रेसी नेताओं एवं मंत्रियों को भी पैसा दिया जाता था। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी के समय में कांग्रेस के 40 फीसदी सांसदों को सोवियत संघ से पैसा मिला करता था।

मित्रोखिन आर्काइव के दस्तावेजों की माने तो 1947-84 की अवधि में भारत में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसे पैसे के बल पर खरीदा न जा सकता हो। कितनी दुखद बात है कि केजीबी ने भारत के केंद्रीय मंत्रियों को मुंहमांगी कीमत देकर खुफिया जानकारियां खरीदीं। उस वक्त के केजीबी जनरल ओलेग कलुगिन ने मित्रोखिन से कहा था, ‘ऐसा लगता है कि मानो पूरा भारत बिकने को तैयार है।’ कांग्रेस के चरित्र को गहराई से समझें तो यह बात सच ही लगती है क्योंकि कांग्रेस पार्टी आज के समय में भी भारत के दुश्मन देश चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से समझौते करती है।

 मॉस्को में भारतीय दूतावास में चल रहा था हनी ट्रैप

KGB ने नेहरू के दौर से ही भारत पर अपनी पकड़ बना ली थी। हालांकि, न तो नेहरू और न ही आईबी को यह एहसास हुआ कि मॉस्को में भारतीय दूतावास में हनी ट्रैप की कहानी को अंजाम दिया जा रहा है और KGB की घुसपैठ बढ़ रही है। 1950 के दशक में नेवरोवा कोडनेम वाली एक महिला ने प्रोखोर कोडनेम वाले भारतीय राजनयिक को अपनी गिरफ्त में ले लिया था।

वीके कृष्ण मेनन के दौर में रूस से हथियारों का आयात बढ़ा 

मई 1962 में सोवियत संघ ने वीके कृष्ण मेनन की स्थिति को मजबूत करने और उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता बढ़ाने के लिए नई दिल्ली में केजीबी को अधिकृत किया। मेनन के कार्यकाल के दौरान भारत के हथियारों के आयात का मुख्य स्रोत पश्चिम से सोवियत संघ में बदल गया।

केजीबी ने इंदिरा गांधी को कोडनेम VANO दिया

बाद के समय में केजीबी नंदा या शास्त्री के संपर्क में नहीं था। मॉस्को ने उस समय इनका समर्थन इसलिए किया कि जिससे दक्षिणपंथी हिंदू परंपरावादी मोरारजी देसाई को रोका जा सके। उसके बाद केजीबी ने इंदिरा गांधी को साधना शुरू कर दिया। केजीबी ने इंदिरा गांधी को कोडनेम VANO दिया था।

1967 के चुनाव में केजीबी का प्रभाव

फरवरी 1967 के चुनावों के बाद, केजीबी ने दावा किया कि वह नई संसद के 30 से 40 प्रतिशत को प्रभावित करने में सक्षम था। इससे पता चलता है कि इंदिरा गांधी के जमाने में कांग्रेस के 40 फीसदी सांसदों को सोवियत संघ से पैसा मिला था।

1971 में कांग्रेस फोरम के प्रमुख चेहरों को खुफिया जानकारी के लिए 1 लाख रुपये दिए गए 

सोशलिस्ट एक्शन के लिए कांग्रेस फोरम के प्रमुख चेहरों को 1971 में एजेंट RERO के रूप में भर्ती किया गया था और केजीबी ने एजेंट भर्तीकर्ता के रूप में कार्य करने के साथ-साथ केजीबी को महत्वपूर्ण राजनीतिक खुफिया जानकारी के लिए प्रति वर्ष लगभग 100,000 रुपये का भुगतान किया था।

इंदिरा गांधी ने सोवियत राजनयिकों की संख्या पर कोई लगाम नहीं रखी

1970 के दशक की शुरुआत में भारत में केजीबी की उपस्थिति सोवियत ब्लॉक के बाहर दुनिया में सबसे बड़ी उपस्थिति बन गई थी। इंदिरा गांधी ने सोवियत राजनयिकों और व्यापार अधिकारियों की संख्या पर कोई सीमा नहीं रखी। इस प्रकार केजीबी को खुली छूट मिल गई और उन्हें अपनी इच्छानुसार कई कवर पदों की अनुमति दी गई।

इंदिरा गांधी को मिलते थे नोटों से भरे सूटकेस

कहा जाता है कि नोटों से भरे सूटकेस नियमित रूप से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर ले जाया जाता था। बताया जाता है कि पूर्व सिंडीकेट सदस्य एस.के. पाटिल ने कहा था कि इंदिरा गांधी ने सूटकेस कभी वापस नहीं किए।

अमेरिकी दूतावास के सामने 20,000 मुसलमानों के विरोध प्रदर्शन की योजना

भारत में केजीबी रेजिडेंसी के पास भारत में अमेरिकी दूतावास के सामने 20,000 मुसलमानों के विरोध प्रदर्शन का आयोजन करने का अवसर है। प्रदर्शन की लागत 5,000 रुपये होगी और इसे बजट में भारत में विशेष कार्यों के लिए शामिल किया जाएगा।

भारत के लिए रूस में 2.5 मिलियन रूबल का गुप्त कोष 

अप्रैल 1971 में, इंदिरा गांधी की भारी चुनावी जीत के दो महीने बाद, पोलित ब्यूरो ने अगले चार वर्षों में भारत में सक्रिय उपायों के संचालन के लिए 2.5 मिलियन परिवर्तनीय रूबल (कोड नाम DEPO) के एक गुप्त कोष की स्थापना को मंजूरी दी।

क्या आपातकाल लागू करवाने में थी रूस की भूमिका 

1975 से 1977 तक लियोनिद शेबर्शिन की अध्यक्षता वाली नई दिल्ली मुख्य रेजीडेंसी की रिपोर्टों ने इंदिरा गांधी को आपातकाल घोषित करने के लिए राजी करने के लिए अपने प्रभाव के एजेंटों का उपयोग करने का श्रेय (शायद अतिशयोक्तिपूर्ण) होने का दावा किया।

1977 के चुनावों में कांग्रेस (आर) के नौ उम्मीदवार केजीबी एजेंट थे

सफलता सुनिश्चित करने के लिए इसने 1977 के चुनाव अभियान के दौरान एजेंटों के साथ 120 से अधिक बैठक किए और एक अभियान चलाया, जिसका नाम KASKAD रखा गया था। 1977 के चुनावों में कांग्रेस (आर) के नौ उम्मीदवार केजीबी एजेंट थे।

इंदिरा गांधी के समर्थन के लिए 10.6 मिलियन रूबल खर्च किए गए

1975 के दौरान इंदिरा गांधी के समर्थन को मजबूत करने और उनके राजनीतिक विरोधियों को कमजोर करने के लिए भारत में सक्रिय उपायों पर कुल 10.6 मिलियन रूबल खर्च किए गए थे। (चित्र: द ग्रेट बियर हग: इंदिरा गांधी दिल्ली में लियोनिद ब्रेझनेव के साथ)

केजीबी के पेरोल पर 10 भारतीय समाचार पत्र और एक प्रेस एजेंसी

1973 तक, केजीबी के पेरोल पर 10 भारतीय समाचार पत्र और एक प्रेस एजेंसी थी। 1975 के दौरान केजीबी ने भारतीय अखबारों में 5,510 लेख छपवाए। कल्पना कीजिए कि कांग्रेस शासन के इस दौर में हमारा देश कैसा था।

द मित्रोखिन आर्काइव II में भारत के बारे में कई सनसनीखेज खुलासे

द मित्रोखिन आर्काइव II में भारत को लेकर कई सनसनीखेज खुलासे किए गए। जिसमें कहा गया कि केजीबी के इंदिरा गांधी और कांग्रेस के साथ बहुत ही घनिष्ठ संबंध थे। केजीबी इंदिरा गांधी को चुनाव जिताने के लिए हर संभव सहयोग किया करती थी। शीत युद्ध के जमाने में कम्युनिस्ट देश भारत में साम्यवाद के फैलाव के लिए पैसे खर्च कर रहे थे। इस किताब की माने तो केजीबी भारत की आतंरिक राजनीति में इनवाल्व थी। द मित्रोखिन आर्काइव II के अनुसार, ‘इंदिरा गांधी की पिछली सरकार में कांग्रेस के लगभग 40 पर्सेंट सांसदों को सोवियत संघ से राजनीतिक चंदा मिला था। केजीबी ने 1970 के दशक में पूर्व रक्षा मंत्री वी के मेनन के अलावा चार अन्य केंद्रीय मंत्रियों के चुनाव प्रचार के लिए फंड दिया था। केजीबी ने भारत के केंद्रीय मंत्रियों को मुंहमांगी कीमत देकर खुफिया जानकारियां खरीदीं। 

उस वक्त के केजीबी जनरल ओलेग कलुगिन ने मित्रोखिन से कहा था, ‘ऐसा लगता है कि मानो पूरा भारत बिकने को तैयार है।’ उन्होंने भारत की मिसाल देकर बताया था कि किस तरह दूसरे मुल्क में घुसपैठ की जा सकती है। रिपोर्ट सामने आने के बाद उस वक्त बीजेपी ने काफी हल्ला मचाया था। विदेश से पैसा लेने के मामले की जांच भी कराई गई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट दबा दी गई। जब कुछ विपक्षी सांसदों ने इसे सार्वजनिक करने की मांग की तो तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री यशवंत राव चव्हाण ने संसद में कहा कि जिन दलों और नेताओं को विदेशों से धन मिले हैं, उनके नाम जाहिर नहीं किए जा सकते, क्योंकि इससे उनके हितों को नुकसान पहुंचेगा।

केजीबी के सीक्रेट ऑपरेशन की जानकारी कैसे दुनिया को पता चली?

रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी के दस्तावेजों को संभालने वाले वैसिली मित्रोखिन ने करीब 40 सालों तक केजीबी में काम किया। इस दौरान केजीबी द्वारा दुनियाभर में किए जाने वाले कोबर्ट और ब्लैक ऑपरेशन से जुड़े सभी टॉप डॉक्यूमेंट मित्रोखिन के पास ही आते थे जिन्हें वो आरकाइव करने का काम करते थे। इतने सालों तक केजीबी के टॉप सीक्रेट डॉक्यूमेंट्स को पढ़ते-पढ़ते धीरे-धीरे उनका मन कम्युनिस्ट विचारधारा और सोवियत यूनियन से उठने लगा। वैसिली मित्रोखिन ने 1992 में ब्रिटेन में शरण ली। वह अपने साथ छह ट्रक भरके केजीबी की फाइलों का जखीरा भी लाए। इसमें 1954 से लेकर 1990 के दशक तक केजीबी द्वारा अलग-अलग देशों में किए गए ऑपरेशन की डिटेल थी। इन्हीं दस्तावेजों के आधार कैंब्रिज के इतिहासकार क्रिस्टोफर एंड्रयू ने दो किताबें लिखीं- किताब ‘द मित्रोखिन आर्काइव I’ और ‘द मित्रोखिन आर्काइव II’ लिखी। इन किताबों में छपे रिपोर्ट्स ने इतनी सनसनी बचाई कि भारत, इटली और ब्रिटेन में तो संसदीय जांच भी बिठा दी गई।

 अवलोकन करें:-

बिस्तर पर इंदिरा किसी मर्द से कम न थी:--M.O MATHAI
NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
बिस्तर पर इंदिरा किसी मर्द से कम न थी:--M.O MATHAI
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जब हम पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की बात क