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रूस से पैसा लेते थे 150+ कांग्रेस सांसद, पत्रकारों ने दलाली में लिखे 16000 आर्टिकल- निशिकांत दुबे ने ‘कठपुतली गैंग’ की खोली पोल: इंदिरा हो या राजीव, DNA में ‘सूटकेस कल्चर’


पूर्व PM इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की Grok AI जनरेटेड तस्वीर, भाजपा MP निशिकांत दुबे (बाएँ)
भारत में बिकाऊ लोगों की कमताई नहीं। कदम-कदम पर बिकाऊ जयचन्द और मीर ज़ाफ़र की औलादें मिल जाएँगी। देशहित में वर्तमान मोदी सरकार को इसकी जाँच कर सच्चाई को सामने लानी चाहिए। इन मुद्दों पर दर्ज होने मुकदमों की सुनवाई करने वाली निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट और इनकी पैरवी करने वकीलों पर गिद्ध की निगाह रख सबके खातों की जाँच करवानी चाहिए। अगर किसी भी रूप में इनके बचाव में निर्णय दिया जाता है। इन मुद्दों पर ऐसे ही सख्ती से पेश आना जैसाकि पाकिस्तान के साथ। 
आज विपक्ष खासतौर से कांग्रेस देश में लोकतंत्र और संविधान खतरे पर चीखाचिल्ली कर देश को गुमराह कर चोर मचाए शोर वाली हालत किये हुए है। ऐसा इसलिए कि जनता ही इतनी भुलक्कड़ है जो इनके कुकर्मों को भूल इनके पाखंड के चक्रव्यू में फंसते रहे हैं। EVM को लागू करने वाले ही इसको हटा बैलेट पेपर लाने का शोर मचा रहे हैं ताकि इनके गुंडे बैलेट बॉक्स लूटने और बैलेट पेपर फाड़ने के काम लग जाए। 
दूसरे, भारत में CAA विरोध में बने शाहीन बागों से लेकर हुए प्रदर्शन, धरने और उपद्रव आदि कोई जनता के हित में नहीं किए गए थे बल्कि जॉर्ज सोरोस और अन्य भारत विरोधियों की दी भीख के धन से कर दुनिया में भारत को बदनाम करने का दुस्साहस किया जा रहा है। अक्ल से पैदल जनता समझती है कि मोदी सरकार जनता के साथ बहुत अन्याय कर रही है। जो विरोधी भारत विरोधियों की हाथ कठपुतली बन देश में उपद्रव कर जनता को गुमराह करने वाले क्या देशहित में काम कर सकते हैं। 
 
 
दूसरे, LoP राहुल गाँधी की कार्यशैली क्या पद के अनुरूप है? स्वतंत्रता सेनानियों को ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांगने वाला बताए क्या साबित करना चाहता है? साबित करता है कि इस आदमी को भारतीय इतिहास का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं।   
संविधान के मूल स्वरुप को बिगाड़ने वाले द्वारा जब संविधान की रक्षा का शोर मचाने वालों के कुकर्म को चोर मचाये शोर नहीं कहा जायेगा तो क्या कहा जायेगा? 
सोनिया गाँधी जिसे परिवार 'राजमाता' कहते है वही सोनिया उस FDL-AP की co-president जो कश्मीर विरोधी संगठन है। इतना ही नहीं कई पत्रकार भी शामिल हैं। यही वजह है कि कांग्रेस कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन देती रही। अनुच्छेद 370 हटाने का विरोध करती है। INDI गठबंधन को समर्थन देने वाली जनता को इन पार्टियों से जवाब मांगना चाहिए।    
झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया है कि कभी कांग्रेस के 150 से अधिक सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे। उनका कहना है कि पत्रकारों के एक समूह भी रूस का दलाल था।

ट्विटर/एक्स पर निशिकांत दुबे ने ‘कांग्रेस, करप्शन और गुलामी’ शीर्षक के साथ किए पोस्ट में ये दावा किया है। उन्होंने कहा है;

  1. ये अवर्गीकृत गुप्त दस्तावेज सीआईए का 2011 में जारी हुआ।
  2. कांग्रेस के बड़े नेता एचकेएल भगत की अगुवाई में 150 से ज्यादा कांग्रेस के सांसद सोवियत संघ के पैसे पर पलते थे, रूस के लिए दलाली करते थे?
  3. पत्रकारों का एक समूह दलाल था, कुल 16000 न्यूज आर्टिकल रूस ने छपवाए?
  4. उस जमाने में रूस के जासूसी संस्थानों के 1100 लोग हिन्दुस्तान में थे जो नौकरशाही, व्यापारी संगठनों, कम्युनिस्ट पार्टियों, ओपिनियन मेकर को अपने पॉकेट में रखते थे और सूचना के आधार पर भारत की नीति बनाते थे?
  5. कांग्रेस की उम्मीदवार सुभद्रा जोशी ने लोकसभा चुनाव में उस वक्त 5 लाख रुपए लिए जर्मन सरकार से चुनाव के नाम पर, हारने के बाद इंडो जर्मन फोरम की अध्यक्ष बनीं।
उन्होंने लिखा है, “यह देश था या ग़ुलामों, दलालों या बिचौलियों की कठपुतली। कांग्रेस इसका जवाब दे, आज इस पर जाँच हो या नहीं?”
यह पहला मौका नहीं है जब रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी से पैसे लेने और उनके इशारे पर काम करने का आरोप कांग्रेस पर लगा है। इससे पहले भी इंदिरा गाँधी और उनके बेटे राजीव के जमाने में कॉन्ग्रेस के ‘ब्रीफकेस कल्चर’ को लेकर को लेकर तथ्य सामने आ चुके हैं।
2017 की शुरुआत में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के कुछ पुराने गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए गए थे। इससे पता चलता है कि इंदिरा गाँधी के जमाने में कांग्रेस के 40 फीसदी सांसदों को सोवियत संघ से पैसा मिला था। 2005 में केजीबी के ही एक पूर्व जासूस वासिली मित्रोकिन की किताब आई थी। इसमें तो बकायदा बताया गया है कि खुद इंदिरा गाँधी को सूटकेसों में भरकर पैसे भेजे गए थे।
                                                                                                                                                                                           साभार: indiafacts.org
वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने ऑपइंडिया को बताया था कि जो तथ्य सार्वजनिक हुए, उससे जाहिर होता है कि 1967 के आम चुनाव के वक्त कांग्रेस सहित देश के ज्यादातर राजनीतिक दलों को विदेश से पैसा मिला था। उन्होंने बताया था कि शीत युद्ध के जमाने में कम्युनिस्ट देश जहाँ भारत में साम्यवाद के फैलाव के लिए पैसे खर्च कर रहे थे, तो पूँजीवादी देश साम्यवाद को रोकने के लिए। ऐसे में जब सत्ताधारी दल का नेता ही बिकने को तैयार हो तो विदेशी ताकतों के लिए चीजें आसान हो जाती है।
किशोर ने ऐसी कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए एक फेसबुक पोस्ट भी लिखा है। इसमें उन्होंने बताया है कि विदेश से पैसा लेने के मामले की जाँच भी कराई गई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट दबा दी गई। जब कुछ विपक्षी सांसदों ने इसे सार्वजनिक करने की माँग की तो तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री यशवंत राव चव्हाण ने संसद में कहा कि जिन दलों और नेताओं को विदेशों से धन मिले हैं, उनके नाम जाहिर नहीं किए जा सकते, क्योंकि इससे उनके हितों को नुकसान पहुँचेगा।

लेकिन, सालों तक जिन तथ्यों को कांग्रेस छिपाती रही उसे मित्रोकिन ने 2005 में दुनिया के सामने ला दिया। वे सोवियत संघ के जमाने के हजारों गोपनीय दस्तावेज चुराकर देश से बाहर ले गए थे। बाद में इसके आधार पर क्रिस्टोफर एंड्रयू (Christopher Andrew) के साथ मिलकर किताबें लिखी। द वर्ल्ड वॉज गोइंग आवर वे (The World Was Going Our Way) नामक किताब में कहा गया है कि केजीबी ने 1970 के दशक में पूर्व रक्षा मंत्री वीके मेनन के अलावा चार अन्य केंद्रीय मंत्रियों को भी चुनाव प्रचार के लिए फंड दिया था।
2017 में सामने आई दिसंबर 1985 की सीआईए की रिपोर्ट में बताया गया है कि सोवियत संघ ने भारतीय कारोबारियों के साथ समझौतों के जरिए कांग्रेस पार्टी को रिश्वत दी थी। सोवियत संघ का दूतावास कांग्रेस नेताओं को छिपकर रकम देने सहित कई खर्चों के लिए बड़ा रिजर्व रखता था। इसके मुताबिक कांग्रेस के अलावा सीपीआई और सीपीएम को भी सोवियत संघ से काफी पैसा मिलता था। ऐसा नहीं है कि सभी को पैसे ही दिए गए थे। कुछ के साथ तो सोवियत संघ ने बकायदा समझौता भी किया था।

इन दस्तावेजों से पता चलता है कि केजीबी के पैसे की वजह से भारत के ढेरो नेता सोवियत संघ की मुट्ठी में थे और वे भारतीय राजनीति को अपने हितों के हिसाब से प्रभावित करते थे। मित्रोकिन की किताब में भी यह बात कही गई है। केजीबी के लीक दस्तावेजों में भारत को तीसरी दुनिया की सरकारों में केजीबी के घुसपैठ का एक मॉडल बताया गया था। इन दस्तावेजों में साफ तौर पर भारत सरकार में केजीबी के बहुत से सूत्र होने की बात कही गई थी।

                                                                                                                                                                                               साभार: indiafacts.org

ऐसा भी नहीं है कि इंदिरा के बाद विदेश से पैसा लेने की कांग्रेस की आदत छूट गई। दस्तावेज बताते हैं कि सोवियत संघ से पैसा लेने का जो सिलसिला इंदिरा गाँधी के जमाने में शुरू हुआ था वह राजीव गाँधी के जमाने में भी जारी रहा है। हालॉंकि इस दौर में सोवियत संघ का प्रभाव कुछ सीमित करने की कोशिश भी हुई थी।

                                                                                                                                                                                                 साभार: indiafacts.org

ये दस्तावेज मीडिया में भी केजीबी की घुसपैठ के बारे में बताते हैं। इसके अनुसार सोवियत संघ ने अपने प्रोपेगेंडा के प्रचार के लिए भारत के बड़े मीडिया संस्थानों के साथ व्यापक पैमाने पर साँठगाँठ कर रखी थी। वे उसकी जरूरत के हिसाब से लेख लिखते थे। यहाँ तक की संपादकीय में भी सोवियत संघ की धुन बजाते थे। जिन संस्थानों का जिक्र है उनमें टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, द स्टेट्समैन, द हिंदू शामिल है।

मित्रोकिन ने अपनी किताब में बताया है कि सोवियत संघ ने इस काम के लिए भारत में 40-50 पत्रकार रखे थे। बाद के सालों में इनकी संख्या बढ़कर 200 से 300 हो गई थी।

क्या IMA पैसे लेकर देता है सर्टिफिकेट? धंधे में कितनी कमाई, कोई हिसाब नहीं

                        IMA विभिन्न उत्पादों को देता है 'सर्टिफिकेट' (एक ट्विटर यूजर ने शेयर की तस्वीर)
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से जन विरोधी बिल में छुपे सांपों की बिलों से निकल रहे हैं, कभी तीन तलाक के विरोध में, कभी नागरिकता संशोधक कानून, तो कभी कृषि कानून पर किसानों को मोदी के विरोध में किसानों को भड़काना और अब कोरोना के खिलाफ लड़ाई को मोदी विरोधी बनाना आदि आदि। अब इस लड़ाई में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन(IMA) भी आ गयी। जिसे देख लगता है बाबा रामदेव और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और 
अध्यक्ष डॉ. जॉनरोज ऑस्टिन जयलाल की लड़ाई बीच सड़क पर आने वाली है। क्योकि जो IMA रामदेव पर कार्यवाही की बात कर रही है, वही IMA वैक्सीन को "बीजेपी की वैक्सीन" और अन्य अपवादों से बदनाम करने वालों पर क्यों खामोश है? क्या मोदी विरोधियों द्वारा मोदी विरोध में वैक्सीन को बदनाम करना, उन वैज्ञानिकों का अपमान नहीं? आखिर IMA इन सियासतखोरों के विरुद्ध क्यों चुप्पी साधे हुए हैं?   

जहाँ एक तरफ ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA)’ बाबा रामदेव के पीछे पड़ा हुआ है और उन पर कोरोना वैक्सीन के खिलाफ अफवाह फैलाने का आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ये संगठन खुद अजीबोगरीब तौर-तरीकों से रुपए कमाने में लगा हुआ है। प्रोडक्ट्स को ‘सर्टिफिकेट’ देने का ठेका लेने वाले IMA को क्यों न एक कमर्शियल कंपनी माना जाए? IMA कोई सरकारी या सरकार पोषित संस्था तो है नहीं, लेकिन इसका व्यवहार ऐसा है जैसे ये देश में मेडिकल नियामक संस्था हो।

IMA का कहना है कि ‘पतंजलि आयुर्वेद’ के प्रमोटर बाबा रामदेव जनता को डर दिखा कर उससे एक तरह की फिरौती वसूल रहे हैं और वैज्ञानिकों दवाओं को बदनाम कर के अपना व्यापार बढ़ा रहे हैं, जो कि एक ‘अक्षम्य अपराध’ है। बाबा रामदेव तो खुद कहते रहे हैं कि वो व्यापारी हैं और व्यापार तो दुनिया के किसी भी कोने में एक कानून सम्मत कार्य है। ईसाई मिशनरी चंगुल में फँसे IMA को खुद के गिरेबान में झाँकना चाहिए।

दरअसल, खुद IMA ने पिछले दरवाजे से रुपए कमाने के लिए कुछ हथकंडे अपनाए हैं। वो प्राइवेट कंपनियों के प्रोडक्ट्स को ‘सर्टिफिकेट’ देकर उनका प्रचार करता है, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से नहीं कहता कि वो फलाँ प्रोडक्ट का प्रचार कर रहा है। ये किसी भी प्रोडक्ट को ‘स्वास्थ्य के लिए ठीक’ होने का सर्टिफिकेट बाँटता है। इसके लिए उन कंपनियों के साथ गुप्त समझौते होते हैं। IMA ये तक नहीं बताता कि वो कितने रुपए लेकर ऐसा करता है।

यहाँ तक कि उसने एक ‘एंटी-माइक्रोबियल LED बल्ब’ को भी सर्टिफिकेट दिया। ये 85% कृमियों को मारने का दावा करता है। साथ ही उसने संक्रमण पैदा करने वाले 99% बैक्टेरिया को 2 घंटे में मार गिराने का दावा करने वाले एक पेंट को भी सर्टिफिकेट दिया। IMA प्रोडक्ट्स के साथ-साथ ‘तकनीक’ को भी सर्टिफिकेट देने लगा है। कोरोना से पहले ही ये सब शुरू हो गया था। कोरोना में तो ये कारोबार और फला-फूला है।

इसके लिए कंपनियों से ‘प्रोसेसिंग फी’ लिए जाते हैं, लेकिन इसकी रकम का खुलासा नहीं किया जाता। किस वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर IMA ये सर्टिफिकेट देता है? कौन सी जाँच की जाती है? विज्ञान-विज्ञान रटने वाला IMA अगर सिर्फ पैसे के लिए ये सब नहीं कर रहा है तो वो बताए कि किस जर्नल में प्रकाशित कौन से रिसर्च पेपर के आधार पर वो किसी भी प्रोडक्ट या तकनीक को स्वास्थ्य के लिए अच्छा बता देता है?

इसके लिए कौन सी प्रक्रिया अपनाई जाती है, ये सार्वजनिक क्यों नहीं है? सब कुछ गुप्त क्यों? दरअसल, पहले IMA प्रत्यक्ष रूप से प्रोडक्ट्स का प्रचार किया करता था। 2010 में उसने फ्रूट जूस, ओट्स, साबुन और वॉटर प्यूरीफायर का प्रचार किया था, जिसके बाद ‘मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI)’ ने उसे नोटिस भी भेजी थी। इसके बाद उसने अप्रत्यक्ष तरीका आजमाया। ‘कोड ऑफ मेडिकल एथिक्स रेगुलेशन’ का उल्लंघन किया गया था।

2015 में उसने फिर वॉटर प्यूरीफायर का प्रचार किया और कहा कि इस तरह से रुपए जुटाना नियमों के विरुद्ध नहीं है। कई डॉक्टरों ने भी उसकी इस करतूतों का विरोध किया। IMA ‘हडसन केनोला आयल’ का प्रचार करता है। ‘रॉयल हेल्थ शील्ड’ नामक पेंट को उसके नाम पर बेचा जाता है। केंट वॉटर प्यूरीफायर से लेकर क्रॉम्पटन के बल्ब तक का उसके नाम पर प्रचार किया जाता रहा है। इसे एक व्यापारिक कंपनी क्यों न माना जाए?

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वैज्ञानिक चोला ओढ़ कर IMA अध्यक्ष डॉ. जॉनरोज ऑस्टिन जयलाल जीसस से प्रार्थना करने पर कोरोना ठीक होने की बातें करते हैं। बाबा रामदेव पर एलोपैथी को ख़ारिज करने का आरोप लगाते हुए 1000 करोड़ रुपए का मानहानि के मुक़दमे की धमकी दी गई है। बाबा रामदेव ने 25 सवाल पूछे, जिनमें से एक का भी जवाब IMA नहीं दे पाया। आयुर्वेद और भाजपा से नफरत करने वाले जयलाल मोदी सरकार विरोधी प्रोपेगंडा का हिस्सा हैं।