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FREE bees के नाम पर राहुल गाँधी करते हैं झूठे वादे, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ही खोल दी पोल: BJP ने कहा- जनता से माफी माँगें


2024 लोकसभा चुनावों में 'खटाखट' के नाम पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी द्वारा जो सीटें मिलने पर इतने खुश हो रहे है, भूल रहे है कि अगर 
'खटाखट' का लॉलीपॉप नहीं दिया होता, इन दोनों पार्टियों की प्रतिष्ठा धूमिल हो गयी होती। विदेशी चंदे से कभी चुनाव नहीं जीते जाते, जमीन पर काम करना पड़ता है। किसी भी विपक्षी को मोदी को हराने किसी विदेशी भीख की बजाए सरकार की कमियों को लेकर सड़क पर आना चाहिए था। लेकिन विदेशी भीख जो लेनी थी। CAA विरोध से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन और पहलवान महिलाओं का प्रायोजित आंदोलनों आदि का पर्दाफाश हो गया। जनता को गुमराह करना चाहा लेकिन पांसा सच्चाई सामने आने पर उल्टा पड़ गया। संभावनाएं व्यक्त की जा रही है कि महाराष्ट्र और झारखण्ड हारने पर कांग्रेस में दो फाड़ हो सकते हैं।     

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की वादाखिलाफियों को लेकर भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) ने हमला बोल दिया है। दरअसल, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कांग्रेस सरकार की योजनाओं की आलोचना करते हुए सुझाव दिया कि वादे उतने ही किए जाएँ, जितने पूरे हो सकें।

खरगे का ये बयान उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के एक बयान के बाद आया, जिसमें उन्होंने कर्नाटक की “शक्ति योजना” की समीक्षा करने का संकेत दिया था। इस योजना के तहत महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा का लाभ दिया जाता है, लेकिन कुछ महिलाओं की ओर से इसके लिए भुगतान करने की इच्छा जताने के बाद इसकी समीक्षा की बात कही गई।

खरगे के बयान को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस पर निशाना साधा। बीजेपी नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष का बयान इस बात को साबित करता है कि कांग्रेस चुनावी वादों के जरिए जनता को मूर्ख बनाती है। प्रसाद ने खरगे के बयान को कांग्रेस की स्वीकारोक्ति बताया और कहा कि कांग्रेस ने हमेशा से ही झूठे वादों के बल पर जनता को गुमराह किया है। उन्होंने कांग्रेस के पुराने “गरीबी हटाओ” नारे का भी उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस ने 1971 में ये नारा दिया था, लेकिन गरीबी हटाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए।

बीजेपी ने कांग्रेस पर केवल कर्नाटक ही नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना में भी झूठे वादों के आधार पर वोट लेने का आरोप लगाया। प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस की ऐसी घोषणाओं का असलियत से कोई लेना-देना नहीं होता और ये केवल कागजों पर ही रहती हैं। बीजेपी नेता ने कहा कि कांग्रेस ने कर्नाटक की जनता को पांच गारंटी का वादा किया था, लेकिन अब “शक्ति योजना” की समीक्षा की बात कहकर एक गारंटी पर पुनर्विचार कर रही है। बीजेपी के मुताबिक, कांग्रेस को अपने वादों पर कायम रहने की सीख लेनी चाहिए और जनता के सामने माफी माँगनी चाहिए।

रविशंकर प्रसाद ने आगे कहा कि कांग्रेस को अन्य राज्यों जैसे महाराष्ट्र और झारखंड में भी झूठे वादों से जनता को गुमराह करने से बचना चाहिए। उन्होंने बीजेपी की केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा शुरू की गई योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी पार्टी अपने वादों को पूरा करती है। प्रसाद ने लाडली लक्ष्मी योजना, किसान सम्मान निधि, गरीब कल्याण, और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं का उदाहरण दिया और कहा कि ये योजनाएं कांग्रेस के चुनावी वादों से अलग हैं जो पूरी की जाती हैं।

52 साल में IAS बनने वाली शैलबाला मार्टिन: मंदिर के भजन से दिक्कत, स्कूल में ईसाई प्रार्थना से प्यार, मिशनरियों के धर्मांतरण का करती हैं बचाव

                  शैलबाला मार्टिन (बाएँ) को मंदिर के लाउडस्पीकरों से दिक्कत (फोटो साभार: न्यूज18/जागरण)
शैलबाला मार्टिन, मध्य प्रदेश की एक प्रमोटी आईएएस अधिकारी, पिछले कुछ समय से अपने ट्वीट्स और बयानों के कारण चर्चा में रही हैं। उन्हें मंदिर पर लगे लाउडस्पीकर ध्वनि प्रदूषण की वजह लगते हैं। मंदिर पर आवाज उठाने वाली शैलबाला मार्टिन ने क्या कभी मस्जिद के लाउडस्पीकर या चर्च में होने वाली गतिविधियों पर सवाल उठाए हैं? आइए, इस रिपोर्ट में हम उनके बयानों और सार्वजनिक जीवन पर एक नजर डालते हैं।

शैलबाला मार्टिन के हिंदू विरोधी बयान

शैलबाला मार्टिन अपने ट्वीट्स और सार्वजनिक बयानों के कारण कई बार विवादों में आ चुकी हैं। विशेषकर, हिंदू त्योहारों और मंदिरों के खिलाफ उनके ट्वीट्स पर लोगों में गुस्सा भर रहा है। हाल ही में उन्होंने मंदिरों पर लगे लाउडस्पीकरों को ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाला बता दिया। शैलबाला ने लिखा, “मंदिरों पर लगे लाउडस्पीकर, जो कई कई गलियों में दूर तक स्पीकर्स के माध्यम से ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं, जो आधी-आधी रात तक बजते हैं, उनसे किसी को डिस्टर्बेंस नहीं होता?”
धार्मिक संवेदनशीलता के इस मुद्दे को लेकर कई लोग मानते हैं कि शैलबाला ने हिंदू मंदिरों में लाउडस्पीकर के उपयोग को निशाना बनाया, जबकि उन्होंने ईसाई प्रार्थनाओं और धार्मिक अनुष्ठानों पर कभी सवाल नहीं उठाया।
शैलबाला के इस ट्वीट पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। विष्णु झा ने लिखा, “ईसाई मिशनरियों के टुकड़े पे पली बढ़ी औरत से क्या उम्मीद की जानी चाहिए। क्या ये औरत इस्लाम की कुरीतियों पे बोल सकती है। हिंदू धर्म को टारगेट करना सबसे आसान काम लगता है। इस मिशनरी औरत से हिजाब, हलाला, मुस्लिम बहुविवाह, ट्रिपल तलाक पे तो आज तक बोलते नहीं दिखा। ऐसी मिशनरी औरत तो…”
विष्णु झा के तीखे हमले को शैलबाला बर्दाश्त नहीं कर पाई और तुरंत ही मिशनरियों के बचाव में उतर गई। उसे अपनी परवरिश से जोड़ते हुए शैलबाला ने लिखा, “कम से कम मेरे माता पिता और मिशनरियों ने मुझे सभ्य भाषा का इस्तेमाल करना और निष्पक्ष रूप से बोलना तो सिखाया है। इसका मुझे गर्व है। अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है। इसलिए आपको बाइज़्ज़त यहाँ से रवाना किया जा रहा है।”
यही नहीं, ईसाई मिशनरियों का गुणगान करने वाली शैलबाला मौका मिलते ही हिंदुओं पर हमला बोलना शुरू कर देती है, संदर्भ चाहे कितना भी अलग क्यों न हो। राजस्थान के सीकर में बलात्कार के मामले को सदफ अफरीन नाम की मुस्लिम आईडी से एक्स पर शेयर किया गया, तुरंत ही शैलबाला ने उस पर तंज कस दिया। शैलबाला ने तंज कसते हुए लिखा, “भेष देख मत भूलये, बुझि लीजिये ज्ञान। बिना कसौटी होत नहिं, कंचन की पहिचान।।” उनका तंज सीधे-सीधे भगवा वस्त्रों और हिंदू संतों की तरफ था।
हालाँकि बाबा बालकनाथ गिरफ्तार हो चुका है और उसका हिंदुओं ने जमकर विरोध किया है, लेकिन शैलबाला को सिर्फ हिंदुओं पर उंगली उठानी थी, तो उठा लिया और ईसाई मिशनरियों के कुकृत्यों पर चुप्पी साध ली। वो अलग बात है कि शैलबाला हिंदुओं पर तंज कसती हैं, तो उन्हीं के राज्य एमपी में कुछ समय पहले ही क्रिश्चियन मिशनरी के खेल बेनकाब हो रहे थे। ये मामला डिंडोरी जिले के समनापुर थाना क्षेत्र के जुनवानी गाँव का था, जहाँ रोमन कैथोलिक समुदाय के एक स्कूल की 8 छात्राओं से स्कूल के प्रिंसिपल, गेस्ट टीचर समेत कई लोगों पर छेड़छाड़ व अश्लीलता का आरोप लगा था।
स्कूल जबलपुर डायोकेसन एजुकेशन सोसाइटी (जेडीईएस) द्वारा चलाया जाता है। इस पूरे मामले का राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने भी संज्ञान लिया था, लेकिन शैलबाला मार्टिन के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला था। भले ही वो अप्रैल 2022 से एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर सक्रिय हैं, लेकिन ईसाई स्कूलों में रेप, धर्मांतरण जैसे मामलों पर वो खामोशी की चादर ओढ़ लेती हैं।

ईसाई मिशनरियों के मतांतरण का करती हैं बचाव

शैलबाला मार्टिन अपने ईसाई धर्म पर गर्व व्यक्त करती रही हैं और इस संबंध में उन्होंने कई विवादित बयान दिए हैं। उनका मानना है कि ईसाई मिशनरियाँ केवल शिक्षा और सेवा कार्यों के लिए जानी जाती हैं और उनके ऊपर लगे धर्मांतरण के आरोप निराधार हैं।
उन्होंने एक ट्वीट में लिखा, “अगर क्रिश्चियन स्कूलों में धर्मांतरण करवाया जाता तो आज हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा क्रिश्चियन होता। क्रिश्चियन आबादी की यह वृद्धि आँकड़ों में परिलक्षित नहीं होती है।”
यह बयान मिशनरियों के बारे में फैले मिथकों और पूर्वाग्रहों का विरोध करने का उनका प्रयास था। ये अलग बात है कि क्रिश्चियर मिशनरी स्कूलों में शिक्षा देने के नाम पर मतांतरण की साजिशों के जाल गहरे तक फैले हैं। अभी हाल ही में मथुरा से एक मामला सामने आया, जिसमें मिशनरी स्कूल के लोग बड़े पैमाने पर मतांतरण करा रहे थे, खासकर स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के परिजनों और परिवार के। ऐसे अनगिनत मामले खंडवा से लेकर जबलपुर तक सामने आते रहे हैं।
ऑपइंडिया ने अपनी स्पेशल रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से मध्य प्रदेश के कोरबा में क्रिश्चियन मिशनरी और कॉन्ग्रेसी नेताओं की मिलीभगत से पूरा इलाका ही लैंड जिहाद का शिकार हो गया।
मतांतरण का बचाव करने वाली शैलबाला ने यूपी की एक घटना को लेकर फिर से मिशनरी स्कूलों को सही ठहराने की कोशिश की। ये घटना स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा बच्ची के यौन शोषण से जुड़ी थी, जिस पर शैलबाला ने लिखा, “यही घटना अगर किसी कॉन्वेंट में हो गई होती तो नंगा नाच शुरू हो जाता।”

शैलबाला मार्टिन ने मिशनरी स्कूलों को क्लीनचिट तो दे दी, साथ ही हिंदुओं पर निशाना भी साध लिया। लेकिन वो इस बात पर चुप्पी साधे रखी कि मिशनरी स्कूलों में खुलेआम यौन शोषण, पैसों का लालच देकर मतांतरण जैसे अनेकों मामले सामने आ चुके हैं। ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में साल 2022 में 15 ऐसे मामलों को सामने रखा था, जहाँ बच्चों को दबाव में ईसाई बनाया गया और उनका यौन शोषण भी किया गया।
ऐसा ही मामला दमोह से भी सामने आया, जहाँ क्रिश्चियन मिशनरी द्वारा संचालित स्कूल में मतांतरण के लिए दबाव डाले जाने की रिपोर्ट्स आई।
ये वही आईएएस हैं, जिन्हें मंदिर के लाउडस्पीकर से ध्वनि प्रदूषण की समस्या होती है, लेकिन शैक्षणिक संस्थान में जहाँ बच्चे पढ़ाई करते हैं, उसे शैलबाला मार्टिन जायज मानती हैं। उन्हें इसाई मिशनरियों की गाथा गाने से ही शायद फुरसत नहीं मिली, इसलिए इतनी बड़ी घटनाओं का ये कहकर बचाव करती रही, कि क्रिश्चियन प्रार्थना अपराध नहीं है। हालाँकि दोनों ही मामलों का संदर्भ अलग था, लेकिन ये शैलबाला की हिप्पोक्रेसी को जानने के लिए काफी है।

सरकारी सेवा में रहकर राजनीतिक बयानबाजी की भी आदत

यही नहीं, सरकारी सेवा में रहते हुए भी शैलबाला मार्टिन न सिर्फ सरकार की, बल्कि देश के बलिदानी अमर जवानों के बलिदान का भी मजाक उड़ाती रही हैं। पूर्व सीडीएस जनरल बिपिन रावत के बलिदान को लेकर किए गए ट्वीट पर जवाब देते हुए शैलबाला ने लिखा, “वैसे भी आदरणीय मिश्राजी शहीद तो अरबी भाषा का शब्द है। ये लोग इसे कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं?” यह टिप्पणी एक ऐसे संदर्भ में आई थी जब सीडीएस बिपिन रावत के बलिदान पर चर्चा हो रही थी।
शैलबाला मार्टिन के ट्वीट्स और उनके विचारों ने उन्हें एक विशेष धार्मिक विचारधारा का समर्थक दिखाया है। खासकर सोशल मीडिया पर उनके कुछ पोस्ट्स को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे एक सरकारी अधिकारी होते हुए भी अपने धर्म के प्रति अत्यधिक लगाव और अन्य धर्मों के प्रति विरोधाभासी दृष्टिकोण रखती हैं। यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब वे अपने ईसाई धर्म का बचाव करती हैं और ईशू के विचारों को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर शेयर भी करती हैं।

कौन हैं शैलबाला मार्टिन?

शैलबाला मार्टिन का जन्म 9 अप्रैल 1965 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में एक ईसाई परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता धार्मिक और सामाजिक सेवाओं से जुड़े रहे, जिससे उनकी परवरिश में धार्मिक शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। शैलबाला ने अपनी शिक्षा इंदौर के होल्कर साइंस कॉलेज से प्राप्त की, जहाँ उन्होंने मास्टर ऑफ आर्ट्स (एम.ए.) की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने 2009 में मध्य प्रदेश राज्य सेवा में प्रवेश किया, जहाँ से 2017 में वे प्रमोट होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में शामिल हुईं। वर्तमान में वे मध्य प्रदेश सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग में कार्यरत हैं।
इस मुद्दे पर संस्कृति बचाव मंच के अध्यक्ष पंडित चंद्रशेखर तिवारी ने शैलबाला मार्टिन पर सवाल उठाते हुए कहा कि मंदिरों में सुरीली आवाज में आरती और मंत्रों का उच्चारण होता है ना कि दिन में 5 बार लाउडस्पीकर पर अजान की तरह बोला जाता है। मेरा शैलबाला मार्टिन जी से सवाल है कि उन्होंने कब किसी मोहर्रम के जुलूस पर पथराव होते हुए देखा? जबकि हिन्दुओं के जुलूस पर पथराव हो रहा है और इसलिए मार्टिन मैडम आपको हिंदू धर्म की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का कोई अधिकार नहीं है।

तिरुपति के बीफ वाले लड्डू विवाद : सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मिलावट के पुख्ता सबूत नहीं; CM से पूछा- चल रही थी SIT जाँच तो प्रेस में क्यों गए? जज साहब बिना चिंगारी के धुआं नहीं उठता


सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (30 सितंबर 2024) को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू को तिरुमाला तिरुपति मंदिर में लड्डू बनाने के लिए मिलावटी घी के इस्तेमाल का दावा सार्वजनिक रूप से करने के लिए कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि ‘हम उम्मीद करते हैं कि भगवान को राजनीति में नहीं लाया जाएगा।’ यह मामला तिरुपति के प्रसिद्ध मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर के प्रसाद के रूप में दी जाने वाली लड्डूओं में मिलावटी घी के उपयोग से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट में बी.आर. गवई और के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि जब इस मामले की जाँच चल रही थी, तो मुख्यमंत्री द्वारा इस तरह का सार्वजनिक बयान देना कितना उचित था। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि जब संवेदनशील मुद्दे की जाँच जारी हो, तो जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों से उम्मीद की जाती है कि वे सावधानी बरतें और इस प्रकार के बयान देने से बचें, जिससे लोगों की भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने विशेष तौर पर कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट नहीं है कि जिस घी का उपयोग लड्डू बनाने में किया गया था, वह मिलावटी था। कोर्ट ने यह भी बताया कि लैब रिपोर्ट, जिसमें घी के नमूने जाँच के लिए भेजे गए थे, में दिखाया गया कि रिजेक्ट किए गए घी के सैंपल ही जाँच के लिए दिए गए थे। इस संबंध में कोर्ट ने पूछा कि जब मामले की जाँच चल रही थी, तो मुख्यमंत्री द्वारा इस मामले को सार्वजनिक रूप से उठाने की क्या जरूरत थी।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने की तीखी टिप्पणी

जस्टिस गवई और जस्टिस विश्वनाथन की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि यह याचिका धार्मिक विश्वासों से जुड़ी है, जो पूरे विश्व में करोड़ों लोगों को प्रभावित करती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुख्यमंत्री ने दावा किया था कि पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान तिरुपति लड्डू बनाने के लिए पशु वसा का उपयोग किया गया था। हालाँकि, तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने इस दावे का खंडन किया और कहा कि ऐसा मिलावटी घी कभी भी लड्डू बनाने में इस्तेमाल नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि मुख्यमंत्री नायडू द्वारा बयान 18 सितंबर को सार्वजनिक किया गया, जबकि इस मामले में प्राथमिकी (FIR) 25 सितंबर को दर्ज की गई और विशेष जाँच टीम (SIT) का गठन किया गया। इसका मतलब यह हुआ कि मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से दिया गया बयान जाँच शुरू होने से पहले का था। कोर्ट ने इस पर सवाल उठाया कि जाँच जारी होने के दौरान उच्च संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति को इस प्रकार का बयान देने की आवश्यकता क्यों थी।

लड्डू बनाने में इस्तेमाल किए गए घी पर उठे सवाल

इस मामले में टीटीडी की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट को बताया कि जून और 4 जुलाई तक जिस घी की आपूर्ति की गई थी, उसे जाँच के लिए नहीं भेजा गया था। बल्कि 6 और 12 जुलाई को प्राप्त घी के टैंकरों से नमूने एनडीडीबी (राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड) को भेजे गए थे और इन नमूनों में मिलावट पाई गई। उन्होंने यह भी बताया कि जून और 4 जुलाई तक आपूर्ति किया गया घी तिरुपति लड्डू बनाने के लिए उपयोग किया गया था।
कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि जब आपने जाँच शुरू कर दी थी और एसआईटी का गठन कर लिया था, तो मुख्यमंत्री द्वारा इस मामले को सार्वजनिक करने की क्या आवश्यकता थी? जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, “लैब रिपोर्ट में कुछ अस्वीकार किए गए तथ्य हैं, जो यह संकेत देते हैं कि अस्वीकार किए गए घी के नमूने ही परीक्षण के लिए भेजे गए थे। जब आपने स्वयं जाँच का आदेश दिया, तो प्रेस में जाने की क्या जरूरत थी?” जस्टिस गवई ने भी यही सवाल उठाया और कहा, “जब आपने एसआईटी द्वारा जाँच का आदेश दिया है, तो प्रेस में जाने की क्या जरूरत थी? जब आप संवैधानिक पद पर होते हैं, तो हम उम्मीद करते हैं कि भगवान को राजनीति से दूर रखा जाएगा।”

वकील की दलीलें और कोर्ट के सवाल

कोर्ट ने टीटीडी के वकील सिद्धार्थ लूथरा से यह स्पष्ट करने के लिए कहा कि तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के अधिकारियों ने यह बयान क्यों दिया था कि मिलावटी घी का उपयोग कभी नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा लाखों भक्तों की भावनाओं से जुड़ा है, और इस प्रकार की बातें सार्वजनिक रूप से करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि जिस घी का उपयोग लड्डू बनाने में किया गया था, वह मिलावटी था। जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, “लैब टेस्टिंग तो रूटीन प्रक्रिया के तहत होती है, ताकि खराब घी के खेप को लौटाया जा सके। अभी तक यह साफ नहीं है कि जिस घी का नमूना लिया गया था, वह वास्तव में लड्डू बनाने में इस्तेमाल हुआ था या नहीं।”
टीटीडी के वकील सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि टीटीडी द्वारा घी के नमूने की जाँच के बाद यह पाया गया कि उसमें मिलावट थी। हालाँकि जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि यह साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि यह घी लड्डू बनाने में इस्तेमाल किया गया था।

सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका और अन्य याचिकाएँ

इस विवाद पर सुनवाई के दौरान भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से सीनियर एडवोकेट राजशेखर राव ने दलील दी कि मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया बयान तथ्यात्मक रूप से गलत था और इसका खंडन तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) के कार्यकारी अधिकारी ने किया था। उन्होंने तर्क दिया कि जब इस प्रकार के बयान बिना उचित प्रमाण के दिए जाते हैं, तो इसका व्यापक प्रभाव होता है और यह सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ सकता है। उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री ने बिना किसी ठोस प्रमाण के यह दावा किया कि लड्डू बनाने के लिए मिलावटी घी का उपयोग किया गया था। इस प्रकार का बयान, जब किसी संवैधानिक पदधारी द्वारा दिया जाता है, तो यह न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करता है, बल्कि यह जाँच प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है।”
सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका में माँग की गई थी कि इस मामले की जाँच के लिए एक स्वतंत्र जाँच समिति गठित की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री नायडू का बयान टीटीडी के कार्यकारी अधिकारी के बयान से विरोधाभासी था और इस प्रकार की बयानबाजी से जाँच प्रभावित हो सकती है।
इसके अलावा चार अन्य याचिकाएँ भी दायर की गई थीं, जिनमें से एक टीटीडी के पूर्व चेयरमैन वाई.वी. सुब्बा रेड्डी द्वारा और अन्य याचिकाएँ इतिहासकार विक्रम संपथ, वैदिक प्रवक्ता दुश्यंत श्रीधर और न्यूज एंकर सुरेश चव्हाणके द्वारा दायर की गई थीं। इन याचिकाओं में भी कोर्ट की निगरानी में जाँच की माँग की गई थी और यह सुनिश्चित करने की माँग की गई थी कि हिंदू धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में राजनीतिक हस्तक्षेप न हो।
सुनवाई के अंत में कोर्ट ने कहा कि जब मुख्यमंत्री ने इस प्रकार का बयान दिया, तो जाँच प्रक्रिया पहले से ही जारी थी और यह उचित नहीं था कि मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया। कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को निर्देश दिया कि वह यह स्पष्ट करें कि क्या राज्य सरकार द्वारा गठित एसआईटी को जाँच जारी रखने दी जानी चाहिए या फिर इस मामले की जाँच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जानी चाहिए। अगली सुनवाई 3 अक्टूबर को निर्धारित की गई है, जिसमें इस मामले पर और विस्तृत चर्चा की जाएगी।
तिरुपति लड्डू विवाद एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है, जो न केवल धार्मिक भावनाओं को प्रभावित करता है, बल्कि इस पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप भी लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुख्यमंत्री नायडू की बयानबाजी की कड़ी आलोचना की है और कहा है कि इस प्रकार के संवेदनशील मुद्दों पर बयान देते समय सावधानी बरतनी चाहिए।