यूरोप, पश्चिमी देश और अमेरिका, अब भारत के मामलों में दखल देना बंद करें; मुसलमानों के उत्पीड़न के लिए चिल्ल पों अब बंद होनी चाहिए ; उनका उत्पीड़न है तो उन्हें अपने देशों में शरण दे सकते हैं

 सुभाष चन्द्र 

अमेरिका की संस्था USCIRF 1998 में स्थापना के बाद से ही भारत के विरुद्ध मुस्लिमों के उत्पीड़न का आरोप लगाती रही है। शायद ही इसकी कोई रिपोर्ट आई हो जिसमें भारत की निंदा न की गई हो अभी इस संस्था “अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग” में एक भी हिंदू सदस्य नहीं रखा गया है और इसी से साबित होता है कि यह भारत के विरुद्ध नेरेटिव बनाने के लिए  एकतरफा रिपोर्ट बनाता है

ब्रिटेन के समाचार पत्र “डेली एक्सप्रेस” के असिस्टेंट एडिटर सैम स्टीवनसन भारत के लोकसभा चुनावों को कवर करने आए हुए हैं उन्होंने कल खुल कर कहा कि यूरोप और पश्चिमी देशों ने अपने मीडिया के जरिए भारत के खिलाफ “नकारात्मक और पक्षपातपूर्ण” कहानियों के हुजूम लगा दिए हैं जबकि जमीनी हकीकत है कि प्रधानमंत्रियों की चुनावी रैलियों में सांप्रदायिक सद्भाव की झांकी देखी जा सकती है

लेखक 
चर्चित यूटूबर 
स्टीवनसन ने कहा कि ब्रिटिश मीडिया कुछ जटिल चीज़ों को सतही रुप से देखने का प्रयास कर रहा है और मोदी को इस्लाम विरोधी बताते हैं जबकि मोदी की रैलियों में मुस्लिम महिलाओं समेत हर धर्म के लोग आते हैं इस देश की समृद्ध विरासत और समग्रता को नज़रअंदाज किया जा रहा है स्टीवनसन ने कहा कि भारत विरोधी बकवास के साथ भारत को नीचा दिखाने के प्रयास बंद होने चाहियें दुर्भाग्य से पश्चिमी और यूरोप के देशों का नजरिया भारत एक लिए अच्छा नहीं है

स्टीवनसन की बातों में मुझे और जोड़ना है कि ये पश्चिमी और यूरोपियन देश अपने मीडिया के जरिए ही भारत की नकारात्मक छवि नहीं बना रहे बल्कि उन्हें ऐसा करने में भारत के अनेक ढक्कन पत्रकार इन देशों में ही नहीं अमेरिका में भी बहरत के खिलाफ जहर पैदा करने में सहायक है और उनके काम में कुछ राजनेता भी भरपूर सहयोग कर रहे हैं सैम पित्रोदा जैसे लोग तो अमेरिका में ही बैठे हुए हैं मोदी को इस्लाम विरोधी बताने में इन विदेशी शक्तियों को भारत के राजनेता भी पूरा योगदान दे रहे हैं

लेकिन ये पश्चिमी, यूरोपीय देश और अमेरिका आदि अपने अपने देशों में मुस्लिमों को दी हुई छूट से कैसे मकड़जाल में फंसते जा रहे हैं, उन्हें इसका आभास भी नहीं है ब्रिटेन आज विभाजन के कगार पर खड़ा है, फ्रांस में जब मर्जी मुस्लिम आग लगाने में सक्षम हैं जैसे पिछले साल जनवरी में किया था और यही हाल जर्मनी और अन्य देशों का है

ब्रिटेन को यह विभाजन का दिन देखना ही पड़ेगा क्योंकि उसने जितने भी देश आज़ाद किए उनमे केवल एक भारत के टुकड़े किए मुस्लिमो के लिए और उस “कुकर्म”  का फल तो भुगतना पड़ेगा हर हाल में

अमेरिका को ऐसा देखने में कुछ समय लगेगा लेकिन इस्लामिक फोबिया जिसका वह विरोध करता है, उसे ऐसा भुगतना पड़ेगा कि स्थिति को संभालना मुश्किल हो जायेगा इसलिए बेहतर है अपने अपने मुल्कों को देखें, भारत पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है

लेकिन इन देशों को समझना चाहिए कि भारत में मुस्लिमों के “उत्पीड़न” नाम की कोई चीज़ नहीं है क्योंकि अगर होती फिर मुस्लिम भारत में आ कर क्यों रहना चाहते हैं पाकिस्तान बना कर भी पाकिस्तानी भारत आना चाहते हैं, बांग्लादेशी आए घुसपैठ करके और रोहिंग्या भी आए यहां आने से बेहतर था चीन चले जाते 

लेकिन फिर भी अगर इन देशों को लगता है मुस्लिमों का “उत्पीड़न” हो रहा है तो जो भी “पीड़ित” हैं, उन्हें अपने यहां ले जाएं और शरण दे दें इन देशों में जो मिल सकता है मुस्लिमों को, वह भारत नहीं दे सकता जैसे बेरोजगारी भत्ता 

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