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बरेली हिंसा में मौलाना तौकीर रजा की जमानत याचिका खारिज, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा- आरोप बेहद संगीन: लगवाए थे ‘सर तन से जुदा’ के नारे, पुलिसकर्मी भी हुए थे घायल

                                                              मौलाना तौकीर रजा खान 
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मुख्य आरोपित और साजिशकर्ता मौलाना तौकीर रजा खान को बड़ा झटका देते हुए उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने मामले की गंभीरता और आरोपित के आपराधिक इतिहास को देखते हुए उसे राहत देने से साफ इनकार कर दिया। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने शुक्रवार (5 जून 2026) को यह कड़ा आदेश पारित किया। जो इस मौलाना के लिए बहुत जरुरी भी था। 

हाईकोर्ट ने जमानत याचिका नामंजूर करते हुए सख्त टिप्पणी की कि आरोपित को जेल से बाहर भेजने पर समाज की शांति को खतरा पैदा हो सकता है। कोर्ट ने कहा, “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि आवेदक(तौकीर रजा) ने एक सार्वजनिक सभा में मुस्लिम समुदाय के कई युवाओं को इस्लामिया इंटर कॉलेज में इकट्ठा होने के लिए उकसाया था। गवाहों के बयान और वीडियो क्लिप से ये संकेत मिलता है कि तौकीर रजा खान ने भड़काऊ भाषण देकर भीड़ को इकट्ठा होने के लिए प्रेरित किया। भीड़ द्वारा किए गए अपराध के लिए मुख्य साजिशकर्ता होने के नाते खान पूरी तरह जिम्मेदार हैं, क्योंकि उनके द्वारा भड़काने के बाद ही भीड़ ने कानून-व्यवस्था हाथ में ली।

सुनवाई के दौरान अदालत ने उस समय लगी पाबंदियों और उपद्रवियों के रवैये पर भी गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने नोट किया कि इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 163(पूर्व में धारा 144) के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। इसके बावजूद आरोपित के उकसावे में आकर भारी भीड़ सड़कों पर उतरी।

अदालत ने भीड़ द्वारा लगाए गए विवादित नारों को देश की संप्रभुता के लिए खतरा बताया। जज ने आदेश में लिखा, “भीड़ द्वारा ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा’ जैसे विवादित नारे लगाना देश के कानून की सत्ता के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता को एक सीधी चुनौती है। ये कृत्य सीधे तौर पर एक सशस्त्र विद्रोह की अपील करता है। इस तरह की हिंसक और भड़काऊ नारेबाजी करना न केवल भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत एक गंभीर दंडनीय अपराध है, बल्कि ये कृत्य इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों और शिक्षाओं के भी पूरी तरह खिलाफ है।”

जमानत याचिका खारिज करने का मुख्य आधार तौकीर रजा के पुराने रिकॉर्ड को बनाया गया। कोर्ट ने कहा, “तौकीर रजा खान का इसी तरह के मामलों में एक लंबा और विस्तृत आपराधिक इतिहास रहा है। ऐसे में इस बात का बड़ा जोखिम है कि यदि उन्हें जमानत पर रिहा किया गया, तो वो फिर से एक विशेष समुदाय को भड़का सकते हैं और समाज की शांति व सद्भाव को बिगाड़ सकते हैं।”

यह पूरा मामला पिछले साल 26 सितंबर 2025 को दर्ज पुलिस एफआईआर से जुड़ा है। आरोप है कि तौकीर रजा ने प्रशासन के कड़े प्रतिबंधों को दरकिनार कर मुस्लिमों को बरेली के इस्लामिया इंटर कॉलेज में एकत्र होने का आह्वान किया था। इसके बाद करीब 200 से 250 लोगों की उग्र इस्लामी भीड़ हाथों में भड़काऊ बोर्ड लेकर मौलाना आजाद इंटर कॉलेज से श्यामगंज चौराहे की तरफ बढ़ने लगी।

जब मौके पर तैनात पुलिस टीम ने उग्र हो रही भीड़ को समझाने और आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया, तो उपद्रवी हिंसक हो गए। भीड़ ने पुलिस टीम को निशाना बनाते हुए उन पर ईंट-पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब (एसिड) की बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं।

सरकार को उपद्रवियों के सरगनाओं पर कार्यवाही करने के साथ-साथ एसिड, पेट्रोल और पत्थर सप्लाई करने वालों पर भी कार्यवाही करनी चाहिए। इतना ही नहीं इन दंगाइयों को समर्थन में victim card खेल बचाने वालों पर नकेल जरुरी है।    

इस भयानक हिंसा और पथराव के दौरान उपद्रवियों ने कई राउंड फायरिंग भी की और पुलिसकर्मियों के कपड़े तक फाड़ दिए। इस हिंसक टकराव में दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए थे और सरकारी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुँचाया गया था। अदालत ने इन सभी तथ्यों को बेहद संगीन माना।